गुरुवार, २२ अक्तूबर २००९

ब्राण्ड इमेज की महत्ता

दृश्य-1ः समाजवादी चिन्तक आचार्य जे0 बी0 कृपलानी एक बार जूते खरीदने एक प्रतिष्ठित कम्पनी के शो-रूम में गये। सेल्समैन ने आचार्य जी को दस नम्बर के जूते दिखाये, तो वे पाँव के आकार से कुछ बड़े निकले तदोपरान्त उसने नौ नम्बर के जूते दिखाये तो वे छोटे निकले। आचार्य जी ने सेल्समैन से उनकी फिटिंग के जूते निकालने को कहा तो पहले तो वह इधर-उधर चक्कर मारता रहा पर कुछ देर बाद आचार्य जी के पास आकर बोला- श्यदि आप मैनेजर से मेरी शिकायत न करने का वादा करें तो एक बात कहूँ।श् आचार्य जी बोले - श्अवश्य! निश्चिन्त होकर । सेल्समैन ने कहा- श्दरअसल बात यह है कि आपके पाँव ही सही आकार के नहीं हैं, इसलिए इनके अनुरूप जूते मिलना मुश्किल है
दृश्य-2ः मेरे मित्र के मोबाइल फोन पर एक मैसेज प्राप्त हुआ- श्यह तस्वीर देखने से पहले अपनी साँसों पर काबू पा लीजिए क्योंकि मल्लिका शेरावत को आप उस रूप में देखने जा रहे हैं, जिसमें आपने कल्पना भी नहीं की होगी ।श् जब बेसब्री से उसने वो तस्वीर देखने हेतु बटन दबाया तो ठीक उसके विपरीत निकला जो उसने सोचा था अर्थात मल्लिका शेरावत की साड़ी पहनी हुयी तस्वीर सामने थी।

उपरोक्त दोनों दृश्य आधुनिक समाज में ब्राण्ड-इमेज की महत्ता को दर्शाते हैं। जहाँ पहले दृश्य में कम्पनी के सेल्समैन द्वारा यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि हमारी कम्पनी जो भी उत्पाद बनाती है वह सुनिश्चित मानदण्डों के अनुसार है एवम् यदि कोई उस उत्पाद में फिट नहीं होता तो कम्पनी में नहीं वरन् उस व्यक्ति में ही दोष है अर्थात पैरों के हिसाब से नहीं वरन् जूतों के हिसाब से पैर होने चाहिए। द्वितीय दृश्य दर्शाता है कि जिस प्रकार कम्पनी व उसके उत्पाद का एक सम्बन्ध होता है और उत्पाद का नाम होते ही कम्पनी का नाम उभर कर सामने आ जाता है, उसी प्रकार मानवीय भाव-भंगिमाओं को भी एक ब्राण्ड-इमेज में ढाल दिया गया है। अर्थात मल्लिका शेरावत सिर्फ अधो-वस्त्रों में ही स्वीकार्य हैं, साड़ी में नहीं।

निश्चिततः ब्राण्ड-इमेज को बढ़ाने में बहुराष्ट्रªीय कम्पनियों एवम् मीडिया का सबसे बड़ा योगदान है। नब्बे के दशक में भारत द्वारा भूमण्डलीकरण एवम् उदारीकरण की नीति अपनाने के पश्चात बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपने उत्पादों की ब्राण्ड-इमेज बनाने के लिए स्थापित नायकों और नायिकाओं का सहारा लिया, चाहे वे फिल्म जगत से जुड़े हों या खेल-जगत से। चँूकि बहुराष्ट्र्रीय कम्पनियाँ इन नायक व नायिकाओं को उनकी शख्सियत के अनुसार विज्ञापनों का भुगतान भी करती हैं, सो उनके उत्पाद भी मँहगे होते हैं। इन विज्ञापनों ने टी0 वी0 चैनलों के माध्यम से मध्यवर्गीय परिवारों में ऐसी घुसपैठ बना ली है कि वे इसके पीछे भागते नजर आते हंै। भारत जैसे देश में जहाँ एक चैथाई जनसंख्या गरीबी-रेखा से नीचे रहती है, लोग दूध से भी मँहगा पानी खरीद कर पीना पसन्द करते हंै। दूध वाले से दूध की शुद्धता को लेकर हम अक्सर सवाल करते हैं, पर बोतल बन्द पानी के मानकों के बारे में कभी भी सवाल नहीं उठाते। यही कारण था कि जब सुनीता नारायण ने कोक और पेप्सी के नमूनों के वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा इनके शुद्धता मानदण्डों पर खरा न उतरने की बात कही तो इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने विज्ञापनों की भरमार द्वारा उस तथ्य को ही झुठलाने का प्रयास किया। ऐसा ही हश्र कैडबरी चाकलेट मंे कीड़े पाए जाने के सवाल का भी हुआ। एक कहावत भी है कि- श्एक ही झूठ को सौ बार चिल्लाकर बोलो तो वह भी सही लगने लगता है।श् इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपने झूठ के पक्ष में चर्चित अभिनेताओं और खिलाड़ियों को विज्ञापन के माध्यम से आगे खड़ा कर दिया।

यहाँ यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि आखिर जनता इन उत्पादों को खरीदने के लिए मजबूर क्यों है? वस्तुतः इसके पीछे विज्ञापन जगत का माया जाल और उपभोक्तावाद संस्कृति काम करती है। प्रथमतः, ये उत्पाद एक ब्राण्ड के रूप में स्थापित होकर जीवन शैली का हिस्सा बन गए हैं और लोग उनका प्रयोग इसलिए नहीें करते कि वाकई उन्हें इसकी जरूरत है वरन् अपने को हाई-फाई दिखाने का एक तरीका है। द्वितीयतः, टी0 वी0 चैनलों की संस्कृति ने बच्चों के मनोमस्तिष्क पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ा है। जिस नायक को बच्चे फिल्मों मंे अच्छा काम करते देखते हैं, जब वही विज्ञापनों में किसी उत्पाद का प्रचार करता है तो वे उसे उसकी छवि से जोड़कर देखते हैं। नतीजन, माँ-बाप से उस उत्पाद को घर लाने की जिद करना और माँ-बाप उनकी जिद के आगे मजबूर होते हैं। तृतीयतः, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ प्रिण्ट मीडिया और टी0 वी0 चैनलों को व्यवसायिक विज्ञापन देती हंै, जो कि उनकी आय का एक बहुत बड़ा óोत है। निश्चिततः बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विरूद्ध जाकर कोई भी अखबार या टी0 वी0 चैनल अपनी आय के भारी-भरकम óोत अर्थात विज्ञापन को नहीं खोना चाहेगा। शायद यही कारण था कि सुनीता नारायण द्वारा उठाए गए मुद्दों को मीडिया ने उतनी तरजीह नहीं दी जितना कि पेप्सी-कोक को। चतुर्थतः, बहुराष्ट्रªीय कम्पनियाँ विभिन्न कार्यक्रमों के स्पाॅनसरशिप द्वारा अपने ब्राण्ड को स्थापित कर रही हैं। यहाँ तक कि अब स्थानीय स्तर पर होने वाले ब्यूटी शो और फैशन प्रतियोगिताओं को भी बहुराष्ट्रªीय कम्पनियाँ प्रायोजित करने लगी हैं और बदले में बैठे-बिठाए ग्रामीण अंचल के उभरते बाजारों में अपनी ब्राण्ड-इमेज स्थापित करने में सफल हुयी हैं। पंचम, एक ही ब्राण्ड नाम का कई उत्पादों में प्रयोग करना। मसलन, जब शराब के विज्ञापनों पर रोक लगायी गयी तो शराब-कम्पनियाँ बोतल बन्द पानी को उसी ब्राण्ड-नाम से बाजार में उतारने लगीं और परोक्ष रूप से अपने ब्राण्ड का प्रचार करने लगीं।

आज हर बहुराष्ट्र्रीय कम्पनी दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता-बाजार को खँगालने में जुटी हुयी है और सारा दारोमदार विज्ञापन जगत एवम् उसके माध्यम से स्थापित ब्राण्ड-इमेज पर निर्भर है। एक तरफ शीतल-पेय कम्पनियाँ बाजार पर कब्जा करने के लिए अभिनेता, अभिनेत्रियों और खिलाड़ियों को अपना ब्राण्ड-अम्बेसडर बनाकर विज्ञापनों के माध्यम से प्रतिस्पर्धा पैदा कर रही हैं तो दूसरी तरफ मोबाइल कम्पनियाँ आजीवन इनकमिंग-फ्री के लुभावने नारों के साथ सामने आ रही हैं जबकि इनकी लाइसेंस वैधता ही बीस से पच्चीस साल तक है। आज के दौर में जहाँ कुछ लोग चाँद पर जमीन बेचने के नाम पर बुद्धिजीवी समाज से पैसा हड़प लेते हैं वहाँ यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आने वाले दिनों में मोबाइल कम्पनियाँ अगले जन्म और उससे भी आगे बढ़कर अगले सात जन्मों तक इनकमिंग-फ्री के लुभावने नारे देंगीं।

वस्तुतः उत्पादों और उनके विज्ञापनांे के माॅडलों में इतनी अभिन्नता स्थापित हो गयी है कि उन दोनों को अलग करके देखना आसान नहीं प्रतीत होता। स्टार प्लस चैनल ने ष्कौन बनेगा करोड़पतिष् धारावाहिक की शुरूआत इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को लेकर की। भारत में यह इस प्रकार का पहला धारावाहिक था पर अमिताभ बच्चन के जादू के चलते इसकी लोकप्रियता में और इजाफा हुआ। ष्लाइफ लाइनष् और ष्इसको लाॅक कर दिया जायष् जैसे सम्वाद इस कार्यक्रम की पहचान बन गये। एक तरफ जहाँ टी0 वी0 चैनल ने विज्ञापनों से काफी राशि अर्जित की वहीं टेलीफोन व मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनियों की भी चाँदी रही। अधिकतर लोगों के लिए एक या दो करोड़ रूपये की बजाय अमिताभ बच्चन से सीधा सम्वाद स्थापित होना ही बहुत बड़ी उपलब्धि थी। कोई उनसे कजरारे... कजरारे गाना सुनाने की फरमाइश करता तो कोई विजय चैहान वाला सम्वाद तो कुछ लोगों ने उनके बेटे अभिषेक बच्चन से मिलने की भी फरमाइश भी रख दी। समय-समय पर फिल्म जगत, खेल जगत और अन्य चर्चित हस्तियों को इस गेम शो में आमंत्रित कर इसको और भी मनोरंजक बनाया गया। निश्चिततः तब एक अजीब अनुभूति होती थी जब अमिताभ बच्चन किसी फिल्म या स्पोर्टस स्टार से कहते -श्एकदम सही जवाब। आप दो हजार रूपये जीत गए हैं।श् जहाँ सामान्य व्यक्ति के चेहरे पर इस जीत के लिए मुस्कान आ जाती वहीं इन स्टार लोगों के लिए दो हजार रुपये के क्या मायने? फिर भी वे हल्का सा मुस्कुराते थे, आखिर वे मुत में तो नहीं आते होंगे। कुछ साल पहले का वाकया है। एक नामचीन स्टार को मुम्बई में डांडिया-रास हेतु आमंत्रित किया गया। स्टेज पर डांडिया रास देखते-देखते उपस्थित दर्शकों ने उनके द्वारा अभिनीत एक फिल्म के प्रसिद्ध गाने पर नृत्य की फरमाइश कर डाली तो उनका जवाब था- श्मुझे उसके लिए पेमेण्ट नहीं किया गया है।श् लखनऊ महोत्सव के दौरान प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री व नृत्यांगना जयाप्रदा को ष्आम्रपाली नाटिकाष् में नृत्य हेतु चालीस लाख रूपया देने का मुद्दा चर्चित रहा, वहीं अन्य कलाकारों को काफी कम भुगतान किया गया। यहाँ भी सवाल ब्राण्ड-इमेज का है।

यदि ष्कौन बनेगा करोड़पतिष् धारावाहिक पर नजर डालें तो इसकी टक्कर में विभिन्न चैनलों पर करोड़पति बनाने वाले धारावाहिक आरम्भ हुए। यहाँ तक कि एक चैनल ने तीन करोड़ रूपये तक की डील दाँव पर लगा दीै, पर उसे ष्कौन बनेगा करोड़पतिष् जैसी लोकप्रियता नहीं मिली। कारण, अमिताभ बच्चन ने इस धारावाहिक के लिए जिस अन्दाज का प्रदर्शन किया, वह एक ब्राण्ड-इमेज बन गया और हर दर्शक अन्य धारावाहिकों केे एंकर की तुलना अमिताभ बच्चन से करता नजर आता। यही कारण है कि अमिताभ बच्चन के अस्वस्थ होने पर अन्य कड़ियों की शूटिंग न हो पाने के कारण धारावाहिक के पुुराने अंशों को ही प्रसारित किया गया पर एंकर बदलने की नहीं सोची गयी। बहुत बाद में जाकर शाहरुख खान को इसके लिए अनुबन्धित किया गया पर वे लम्बे समय तक इस धारावाहिक को न खींच सके और अन्ततः इसे बन्द ही करना पड़ा।

सबसे मजेदार वाकया तो लक्स साबुन का रहा जिसे एक लम्बे समय तक अभिनेत्रियों के बदन पर ही लगने का सौभाग्य प्राप्त होता रहा, चाहे वह हेमामालिनी, श्रीदेवी, जूही चावला या करीना कपूर हों। अचानक एक दिन दिखा कि शाहरूख खान बाथ टब मंे लेटकर इसका प्रचार कर रहे हंै। यह भी एक गाॅसिप खबर बन गई कि लक्स तो नारी-सौदर्य के लिए प्रयुक्त होने वाला साबुन है, फिर शाहरूख खान इसका प्रचार क्यों कर रहे हैं? पत्नियाँ अपने पतियों से चुहलबाजी करने लगीं -‘‘अच्छा! तो अभी तक आप नारियों वाले साबुन से नहाते थे।
अब तो मँहगी चीजें खरीदने का एक फैशन सा बन गया है। मँहगी होगी तो ब्राण्डेड ही होगी। आम-दुकानों मे दस-बीस रूपये के लिए मोल-तोल करने वाला व्यक्ति ब्राण्डेड कम्पनियों के शो-रूम में अपना मुँह बन्द ही रखता है कि कहीं मोल-तोल करने लगे तो सेल्समैन बोल न दे- श्अरे भाई! जब खरीदने की हैसियत नहीं, तो क्यों हमारा समय खराब कर रहे हैं। आप जिस दाम में ये चीज चाह रहे हैं, वो आपको सामने फुटपाथ वाली दुकान में मिल जाएगी।श् मामला सिर्फ यहीं तक सीमित रहता तो ठीक है, पर इसने तो साहित्य और वैचारिक जगत को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। जितनी मँहगी पत्रिका या किताब, उतने बड़े चोंचले। क्या कोई आम आदमी इन मँहगी किताबों को खरीदने की हिम्मत जुटा पाएगा। फिर ऐसा लिखने का क्या फायदा जो लोगों की पहुँच से बाहर हो? यहाँ भी उपभोक्तावाद की गूँज है। लेखकों और प्रकाशकों की प्राथमिकता अब समान्य पाठक नहीं वरन् सरकारी पुस्तकालय बन गए हैं, जहाँ थोक के भाव किताबें खरीदकर आलमारियों में सजा दी जाती हंै।

वस्तुतः उपभोक्तावाद, विज्ञापनों की चकाचैंध और ब्राण्ड-नेम के बीच सामान्य आदमी नित्य पिस रहा है। वह स्वयं निर्धारित नहीं करता कि उसकी जरूरतें क्या है वरन् बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ निर्धारित करती हैं कि उसे क्या चाहिए? उपभोक्ता बाजार में कोई उत्पाद खरीदने जाए तो सेल्समैन उसका ब्रेनवाश कर यह समझाने में सफल हो जाएगा कि अमुक ब्राण्ड वालेे उत्पाद से दूसरे ब्राण्ड वाला उत्पाद अच्छा है और इसकी माँग भी खूब है। कारण, सेल्समैन को दूसरे ब्राण्ड के उत्पाद पर अच्छा कमीशन मिलता है। यही नहीं कल तक जो अभिनेता या अभिनेत्री किसी कम्पनी के उत्पाद के विज्ञापन में नजर आते थे अगले दिन वो उस कम्पनी के प्रतिस्पर्धी ब्राण्ड- उत्पाद का विज्ञापन करते नजर आयेंगे। कारण, मेहनताने की राशि ज्यादा मिलना। सो, आज के उपभोक्तावादी बाजार मेें कुछ भी स्थायी नहीं है। कल तक जो फैशन था आज वह आउट-डेटेड है और परसों फिर वही थोड़ा सा रूप बदलकर फैशन बन जायेगा।

निश्चिततः ऐसे उपभोक्तावादी दौर के अपने नुकसान और फायदे हैं। प्रतिस्पर्धा ने उत्पादों को इतना सस्ता बना दिया है कि वे हर किसी की पहंुँच के अन्दर हैं। कल तक जिन उत्पादांे के विज्ञापन टी0 वी0 पर देखकर लोग संतोष कर लिया करते थे, वे अब स्थानीय बाजारों में उपलब्ध हैं। विलासिता वाली वस्तुओं के दाम घट रहे हैं। आज जरूरत है कि भटकाव की बजाय अपने सुनिश्चित बजट में ही उत्पादों की खरीद सुनिश्चित की जाय और पसन्द न आने पर अगली बार दूसरी कम्पनी के उत्पादों को आजमाया जाय। सरकार को भी चाहिए कि उदारीकरण की इस अन्धी दौड़ में उपभोक्ताओं का भविष्य बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों में पूर्णतया न सौंप दे वरन् लोगों को जागरूक बनाने के लिए गैर सरकारी संगठनों की मदद से प्रभावी अभियान छेड़ा जाय और उपभोक्ताओं की वास्तविक स्वतन्त्रता सुनिश्चित की जाय।
के.के.यादव

6 टिप्पणियाँ:

Rashmi Singh ने कहा…

बेहद दिलचस्प आलेख ...आभार.

Bhanwar Singh ने कहा…

उपभोक्तावादी समाज की धज्जियाँ उड़ाता बेहतरीन आलेख. के.के. जी को बधाई.

Bhanwar Singh ने कहा…

उपभोक्तावादी समाज की धज्जियाँ उड़ाता बेहतरीन आलेख. के.के. जी को बधाई.

Ghanshyam ने कहा…

सरकार को भी चाहिए कि उदारीकरण की इस अन्धी दौड़ में उपभोक्ताओं का भविष्य बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों में पूर्णतया न सौंप दे वरन् लोगों को जागरूक बनाने के लिए गैर सरकारी संगठनों की मदद से प्रभावी अभियान छेड़ा जाय और उपभोक्ताओं की वास्तविक स्वतन्त्रता सुनिश्चित की जाय।....के.के.यादव ji apne bilkul thik likha.

युवा ने कहा…

आज जरूरत है कि भटकाव की बजाय अपने सुनिश्चित बजट में ही उत्पादों की खरीद सुनिश्चित की जाय और पसन्द न आने पर अगली बार दूसरी कम्पनी के उत्पादों को आजमाया जाय।......फ़िलहाल मैं तो यही करता हूँ.

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

उपभोगतावाद का एक मन्त्र है खरीदो .. खरीदो ... क्या कहा जरुरत नहीं है ? ऑफर है ... खरीद ही लो... नहीं खरीदोगे तो जीवन व्यर्थ जाएगा ...