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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट होमी व्यारावाला को मिलेगी युवाओं की चहेती पहली ''नैनो"

एक कहावत है कि वक्त मेहरबान तो सब मेहरबान। आज पत्रकारिता के क्षेत्र में तमाम महिलाएं दिखती हैं पर एक दौर ऐसा भी था जब गिनी-चुनी महिलाएं ही पत्रकारिता में जाने का सपना पूरा कर पाती थी। ऐसे में एक नाम तेजी से उभरा- होमी व्यारावाला का। होमी व्यारावाला इस देश की प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट थीं। तमाम जर्नलिस्ट के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहीं होमी व्यारावाला आज 96 वर्ष की हैं और गुजरात के वड़ोदरा में अपना जीवन हँसी-खुशी गुजार रही हैं। अचानक वे चर्चा में है क्योंकि उन्हें प्रथम ग्राहक के रूप में टाटा की बहुचर्चित नैनो कार के लिए चुना गया है। फिलहाल वे अपनी 55 साल पुरानी फिएट कार से ही सफर करना पसन्द करती हैं, पर नैनो ने उनके नयनो में भी एक स्वप्न जगाया कि इस उम्र में एक नई कार पर सफर किया जाय। जहाँ आज की युवा पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी के लोगों को विस्मृत करती जा रही है वहाँ एक ऐसी लीजेण्ड महिला का इस रूप में प्रकटीकरण चैंकाता भी है और आश्वस्त भी करता है कि उनकी काया भले ही वृद्व हो गई हो पर उनका मन अभी भी जवान है। इसीलिए तो वे 96 वर्ष की उम्र में नैनो की सवारी करने को तैयार हैं। टाटा ग्रुप के मालिक रतन टाटा भी खुश होंगे कि इसी बहाने वे देश की प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट से लोगों को एक बार फिर रूबरू करा सकेंगे।
(होमी व्यारावाला के बारे में और जानें- http://www.boloji.com/people/04019.htm )

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

फर्जी विश्वविद्यालयों से सावधान हों युवा !!

देश के नौजवानों सावधान ! देश में २२ फर्जी विश्वविद्यालय चलने का खुलासा ! अमेरिकी मान्यता का दावा !
देश के नौ राज्यों में 22 फर्जी विश्वविद्यालय चलने का खुलासा हुआ है। इनमें से नौ विवि उत्तार प्रदेश में चल रहे हैं। इनमें से अधिकांश अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मान्यता के नाम पर अब तक लाखों विद्यार्थियों को ठग चुके हैं। अब इन विवि पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग [यूजीसी] ने प्रतिबंध लगाते हुए सभी राज्यों को आगाह किया है।

जिन राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालय चल रहे हैं उनमें उत्तार प्रदेश, दिल्ली, बिहार, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक पिछले माह यूजीसी ने फर्जी विश्वविद्यालयों [जनवरी 09 तक] की सूची जारी की। इसमें कई विवि ऐसे हैं, जिन पर 2005 और 2007 में भी प्रतिबंध लग चुका है। लेकिन वे अब भी चल रहे हैं। यूजीसी को पता चला है कि दिल्ली, उत्तार प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल ऐसे विवि की डिग्रियां अभी भी स्वीकार कर रहे हैं। नए शिक्षा सत्र में यूजीसी ने आगाह किया है कि संबंधित राज्य सुनिश्चित करें कि इनमें से किसी भी विवि से कालेज या छात्र न जुड़ें।

ये विवि अमेरिका के हवाई राज्य से मान्यता प्राप्त होने का दावा कर भारतीय महाविद्यालयों और छात्रों को ठगते हैं। वर्ष 2005 में भारत सहित 18 देशों में इस तरह के विवि संचालित होने की जानकारी सामने आई थी। भारत ने हवाई राज्य से इस संबंध में जानकारी मांगी थी। लेकिन वहां से जानकारी देने से इन्कार करते हुए संबंद्धता नकार दी गई थी।
फर्जी विवि उत्तार प्रदेश
1. इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद, इंटीट्यूशनल एरिया, खोड़ा मकनपुर, नोएडा फेस-दो
2. महिला ग्राम विद्यापीठ/विश्वविद्यालय, प्रयाग, इलाहबाद
3. इंडियन एजूकेशन काउंसिल आफ यूपी, लखनऊ
4. गांधी हिंदी विद्यापीठ, प्रयाग, इलाहबाद
5. नेशनल यूनिवर्सिटी आफ इलेक्ट्रो कांप्लेक्स होम्योपैथी, कानुपर
6. नेताजी सुभाष चंद बोस यूनिवर्सिटी , अछलताल, अलीगढ़
7. उत्तार प्रदेश विश्वविद्यालय, कोसीकला, मथुरा
8. महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन विश्वविद्यालय, प्रतापगढ़
9. गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृंदावन
दिल्ली
10. वारानसेया संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी , जगतपुरी, दिल्ली
11. कमर्शियल यूनिवर्सिटी लिमिटेड, दरियागंज, दिल्ली
12. यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी, दिल्ली
13. वोकेशनल यूनिवर्सिटी, दिल्ली
14. एडीआर-सेंट्रल ज्यूरिडीकल यूनिवर्सिटी, एडीआर हाउस, 8जे, गोपाला टावर, 25 राजेंद्र प्लेस, नई दिल्ली
15. इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एंड इंजीनियरिंग, नई दिल्ली
बिहार
16. मैथिली विश्वविद्यालय, दरभंगा
कर्नाटक
17. बादागनवी सरकार व‌र्ल्ड ओपन यूनिवर्सिटी एजूकेशन सोसाइटी, गोकेक, बेलगाम
केरल
18. सेंट जोंस यूनिवर्सिटी, किसनाट्टम
मध्यप्रदेश
19. केशरवानी विद्यापीठ, जबलपुर
महाराष्ट्र
20. राजा अरेबिक यूनिवर्सिटी, नागपुर
तमिलनाडु
21. डीडीबी संस्कृत यूनिवर्सिटी, पुतूर, त्रिची
पश्चिम बंगाल
२२. इंडियन इंस्टीट्यूट आफ अल्टरनेटिव मेडिसिन, कोलकाता
(साभार: जागरण)

रविवार, 19 अप्रैल 2009

किताबों की कीमत कम कीजिये हुज़ूर

साहित्य समाज का दर्पण होता है ,लेकिन साहित्य का दर्पण होना तभी सार्थक है जब वह जन सामान्य के हाथ में हो । अभिप्राय यह है कि वह आम आदमी की पहुच में हो , इन दिनो साहित्यिक पुस्तको की कीमत इतनी अधिक हो गई है कि अब पुस्तक खरीद कर पढ़ना आम आदमी के बजट में रहा ही नही । वैसे आटा दाल चांवल शक्कर कुछ भी तो सस्ता नही है फिर महंगाई की तोहमत पुस्तको पर ही लगाना ज़रा ज़्यादती ही होगी । लेकिन पुस्तको की तुलना आटा दाल से करना भी ठीक नही है । दोनो का मुकाम आदमी की ज़िंदगी में अलग अलग है , दोनो का महत्व अलग अलग है । एक वर्ग एैसा भी है जिसके अंदर अच्दे से अच्छा साहित्य को पढ़ने की भूख हमेशा रहा करती है । आज वह वर्ग भूखा है । वह भूखी नज़रो से किताबो की दुकान में रखे कबीर के दोहे , गालिब का दीवान ,अमृता प्रीतम की कहानियाू , मंटो का सम्रग साहित्य ,कमलेश्वर, मन्नू भंड़ारी , जावेद अख्तर , गुलज़ार ,अमृत लाल नागर , राही मासूम रज़ा , जैनेन्द्र , प्रेमचंद , मुक्तिबोध ,मीर ,बहादुर शाह ज़फ़र वगैरह वगैरह को मासूम निगाहो से निहार रहा है । उसका जी करता है कि दोनो हाथो से इस अनमोल खज़ाने को समेट लू,, जो चाहे वह किताब रैक में से खीच लू , कोई रोकन टोकने वाला न हो तो सुहाग के नुपुर ,आधा गांव ,गुनाहो का देवता , अंधा युग ,लखनउ की पांच राते ,शतरंज के मोहरे ,आपका बंटी ,इसमें से वह किसी को भी नही छोड़ेगा उसे इन सब को पढ़ना है । शौकीन आदमी बड़ी हसरत से अपने पसंदीदा लेखक की किताब हाथ में लेता है , बेहद अदब और एहतराम के साथ उसके मुख्य पृष्ठ पर हाथ फेरता है फिर पीछे की तरफ अपने लेखक की फोटो देखता है और वही खड़े खड़े सारांश पढ़ लेता है , तत्पश्चात बहुत ड़रती ड़रती निगाहो से उस स्थान पर नज़र करता है जहां मूल्य छपा होता है । वह किताब मंे छपा एक एक शब्द को आत्मसात कर लेना चाहता है लेकिन बस यह एक शब्द उसकी उम्मीदो पर पानी फेर देता है । इतनी कीमत अदा कर पाना उसके बस में नही है क्योकि अगर एक दो किताब ले लेने से उसकी भूख शांत हो जाती तो वह हिम्मत कर लेता लेकिन जो इल्म के बीमार है उनका इलाज दवा की दो खुराक से नही हो जाता । किताब का मूल्य देख कर वह उस किताब को जितने अदब और एहतराम से हाथ में लिया था उतनी ही बेरुखी से वही रख देता है जहां से निकाला था । फिर एक अपराध बोध लिये नज़रे झुकाये दुकान से एक सांध्य दैनिक लेते हुए बाहर निकल जाता है । दुकानदार बताता है राजकमल से या नेशनल से नई किताबे आई है देखे के नही ? अब वह बेचारा क्या बताये कि तुम्हारी दुकान में कौन सी किताब कहां , कब से रखी है उसे सब कुछ मालूम है । वह स्वयं को संभालता है और सामान्य लहजे में कहता है ये सब तो ले जा चुका हूॅ कोई और नई किताब आयेगी तो खबर करना ।

किताबो की इस बढ़ती कीमतो का परिणाम कितना भयंकर होगा ? धीरे धीरे पुस्तक और पाठको के बीच दुरियाॅ बढ़ती जायेगी और फिर फासला इतना ज्यादा हो जायेगा कि एक दिन अच्छा साहित्य पढ़ने की परम्परा ही लुप्त हो जायेगी । बच्चे को पोलियो का टीका लगाया ,च्यवनप्राश खिलाया ,बोर्नविटा पिलाया लेकिन पंच परमेश्वर , हार की जीत ,उसने कहा था ,नमक का दरोगा , बड़े भाई साहब ,टोबा टेक सिंह ,तेनालीराम के किस्से ,सिंहासन बत्तीसी ,मुल्ला नसीरूद्धीन ,नही पढ़या तो क्या खाक परवरिश की ? याद रखिये पोलियो की तरह ये साहित्य की खुराक भी ज़रूरी है । साहित्य दिमाग की कसरत है । साहित्य वह अखाड़ा है जहां सोच को तंदरुस्त किया जाता है । साहित्य की दो बूंद से सोच में संस्कार घुल जाते है जो जीवन को जीने लायक बना देते है । लेकिन दिनो दिन किताबो की बढ़ती कीमत हताश करते जा रही है । मध्यम वर्ग का बजट उसे इतनी इजाज़त नही देता कि इस माह फैज़ की शायरी ले आये तो अगले महीने अज्ञेय की कविताये ले आयेगे । किसी महीने बर्नाड़ शाह को पढेगे तो किसी महीने विवेकानंद को । शेक्सपियर और कालीदास को अगर नही पढ़ा तो क्या खाक पढ़ा ? बेचारा पाठक एैसा भी नही कर सकता कि इस महीने आटा नही लेते और परसाई का व्यंग्य संग्रह ले लेते है , बच्चे की स्कूल की फीस अगले महीने पटा देगे इस महीने मुक्तिबोध का काव्य संग्रह ले लेते है । अगर वह एैसा करने का प्रयास करेगा भी तो रैक में रखे परसाई जी खुद उसकी खबर ले लेगे और मुक्तिबोध जी की तरफ उसने हाथ बढ़ाया तो वे अपनी बीड़ी से चटका ही लगा देगे ।

किताबो की बढ़ती कीमत के संबंध में सबसे आश्यर्च की बात यह है कि इसे लेकर आज तक समाज के किसी वर्ग ने अपना विरोध प्रगट नही किया । आटा ,दाल, शक्कर की कीमत नियंत्रण मंे न होने पर सरकार को आड़े हाथो लिया जाता है ,विरोध व्यक्त किया जाता है , कैरोसिन , कुकिंग गैस और पेट्र्ोल की कीमतो को लेकर आंदोलन किये जाते है ,इसी बात पर सरकार का रहना या नही रहना तय किया जाता है लेकिन किताबो की बढ़ती कीमत पर किसी का विरोधी स्वर सुनाई नही देता । कोई भी राजनैकित पार्टी अपने घोषणा पत्र में इसे शामिल नही करती कि यदि उसकी सरकार बनी तो वह किताबो की कीमत कम करने की दिशा मे आवश्यक कदम उठायेगी । आज तक कभी यह सुनने में नही आया कि पुस्तको के अनाप शनाप बढ़े हुए मूल्य के विरोध में किसी शहर के बुद्धिजीवियो ने जुलूस निकाला या भूख हड़ताल की अथवा नगर बंद का आव्हान किया हो । कभी सुनने में नही आया कि किसी बुक स्टाॅल के सामने किताबो की बढती कीमतो के विरोध में कोई आमरण अनशन पर बैठा हो ,या पुस्तक प्रेमियो ने नारे बाज़ी की हो । कभी कही किसी शहर में पाठको ने एक़ित्रत होकर मुख्य मंत्री या राज्यपाल को इस संबंध में ज्ञापन नही दिया है । अगर कोई पढ़ने वाला इस तरह की नाराज़गी का इज़हार करे भी तो उसे पुस्तकालय का रास्ता दिखा दिया जाता है कि भाई इतनी बड़ी लाईब्रेरी तो है तेरे वास्ते वहां सस्ते में क्या लगभग मुफ्त में पढ़ना, , यहां खाली पीली हल्ला क्यो करता है । लाईब्रेरी यानि नही मामा से काना मामा भला । हम जिस साहित्य की चर्चा कर रहे है उसे एक घंटा लाईब्रेरी में बैठ कर नही पढ़ा जा सकता या एक दो दिन के लिये घर ले आना भी काफी नही है । दरअसल साहित्य कोई मसाला दोसा नही है कि गपागप खा लिये ये तो रूह अफज़ा है इसे चुस्की चुस्की पीना होता है , तभी आत्मा तर होती है । फैज़ से लेकर कैफ तक आौर ग़ालिब से लेकर साहिर तक एैसा कोई नही है जिसे एक बार पढ़ लिया और पेट भर गया ,समझ पुख्ता हो गई । ज़िन्दगी गुज़र गई है लोगो की गालिब और कबीर को पढ़ते पढ़ते आज तक पूरा नही कर पाये है । नही जनाब इन्हे तो किताब पूरी चाहिये यानि हमेशा के लिये । फिर तो खरीदना ही होगा , लेकिन किताबो की बढ़ती कीमत के आगे पढ़ने के शौकीन बेबस हो गये है । अब किताबे घर में आना बंद हो गई है । पहले बड़ो के लिये आती थी तो बच्चो से भी रिश्ता जुड़ जाता था ,यही से बच्चो के पढ़ने की शुरूआत होती थी । तब बच्चो के लिये अलग से चंदामामा और चाचा चैधरी मंगवाई जाती थी । पढ़ने की शुरूआत इन्ही पत्रिकाओ से होती है , एकाएक कोई अपने पढ़ने की शुरूआत ब्रेख्त या बर्नाड़ शाॅ से नही करता है , ये तो उसके आगामी पड़ाव होते है । साहित्य पहले कीमती था अब महंगा हो गया है ।

यह जीवन का कितना ड़रावना पक्ष है कि अब घर में किताबे नही आती । किताबे जिनके संबंध में कहा जाता है कि इससे अच्छा कोई दोस्त नही है ं। साहित्य की समझ रखने वाले कहते है कि अगर वहां ढ़ेर सारी किताबे नही होगी तो हम स्वर्ग में जाने से इंकार कर देगे । अकबर ईलाहबादी ,नज़ीर अकबराबादी ,कृष्ण बिहारी नूर ,कुर्रतुल एन हैदर ,कृष्ण चंदर ,सआदत हसन मंटो, , इसमत चुगताई , शहरयार ,नईम ,शाकिरा परवीन ,तसलीमा नसरीन , पाश ,अज्ञेय ,बच्चन ,निराला ,़़़ ़इनको पढ़ कर तो देखिये आप कह उठेगे साहित्य जीवन का श्रंगार है । यह आंख की काजल है , होठो की लिपिस्टिक है , ये कैलशियम है , ग्लूकोज़ है , आयरन है । साहित्य मस्तिष्क को रौशन करने वाला हैलोजन है । साथियो आज इस हैलोजन को बाजार नामक हुड़दंगी युवक ने मूल्य के पत्थर से फोड़ दिया है । पुस्तक और पाठक के बीच मूल्य की गहरी खाई आ गई है । पाठक तो किताब पढ़ नही पा रहा है लेकिन उसकी बेबसी को किताबे ज़रूर पढ़ रही होगी । अब अनियंत्रित होती हुई महंगाई पेट पर ही नही विचारो पर भी मार करने लगी है । रोटी कपड़ा और मकान मुहय्या हो गया न अब तुम्हारी एक एक चीज़ का ठेका सरकार ने थोड़ी ले रखा है ं। ये तुम्हारा अपना शौक है इसका इंतेज़ाम तुम खुद करो । नही नही एैसा बोलने से बात नही बनेगी । अगर किसान को खाद ,उघोगपति को लोन ,वैज्ञानिको को स्कालरशिप ,खिलाड़ियो को मैदान उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है तो पढ़ने वाले लोगो को उच्च स्तरीय साहित्य मुहय्या कराना सरकार की जिम्मेदारी क्यो नही है ? हालाॅकि सरकार ने अपने किसी बयान में इस जिम्मेदारी से स्वयं को अलग करने की बात नही की है लेकिन पुस्तकालय इसका सही समाधान नही है । सरकार को कुछ एैसे इंतेज़ाम करने चाहिये कि सीधा किताबो के दाम कम हो जाये । जिस तरह पेट्र्ोल और कुकिंग गैस का अतिरिक्त बोझ सरकार आम आदमी पर पड़ने नही देती है उसी तरह का कोई फार्मूला यहा भी बैठा देना चाहिये । रहन सहन का स्तर मंहगे कपड़े , खुबसूरत फर्नीचर और चमकदार गाड़ियो से ही उंचा नही होता । उसमे विचारधारा , तहज़ीब ,तमीज़ की भी आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति साहित्य से होती है । साहित्य जीने का सलीका सिखाता है ,बोलने का तरीका सिखाता है । वह समाज आर्कषक हो ही नही सकता जिसमें साहित्य के लिये जगह न हो । इंसानी ज़िंदगी दो मंज़िला मकान है ,पहली मंज़िल पर रोटी कपड़ा और मकान है और दूसरी मंज़िल पर साहित्य ।

साथियो अच्छे से अच्छा पढ़ने का मौहाल फिर से बनाना होगा । पढ़ने से जीवन में वैसा ही कुछ होता है जो मकान में पुताई कराने से होता है । किताबे हमारी सोच की व्हाईट वाशिंग करती है । कुछ लोगो ने अपने घर का एक कमरा सिर्फ किताबो के लिये रख छोड़ा है , उनकी अपनी पर्सनल लाईब्रेरी है , जहां उनके प्रिय लेखको की अनेको किताबे मौजूब है ,उनके सामने पढ़ने का कोई संकट नही है लेकिन हर आदमी इतना हैसियतदार नही होता और चंद हैसियतदारो के ही पढ़ लेने से पढ़ा जाना पूर्ण नही हो जाता । पढ़ने की लुप्त होती परम्परा को बचाना होगा । इसमंे प्रकाशक का कोई दोष नही , महंगाई का हमला तो चैतरफा है और मंहगाई से निजात दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है , हमें तो बस सरकार तक यह बात पहुचानी है कि दाल ,चावल,शक्कर , तेल , पेट्र्ोल ,कुकिंग गैस की कीमत पर नियंत्रण रखना ही महंगाई पर नियंत्रण रखना नही होता बल्कि और भी चीज़े इसमें शामिल की जानी चाहिये जैसे किताब । गालिब ,ईकबाल ,जिगर ,दुष्यंत ,शमशेर ,त्रिलोचन ,महादेवी ,परसाई ,शरदजोशी ,कमलेश ,मोहन राकेश ,मुर्शरफ आलम ज़ौकी ,कार्ल माक्र्स ,राहुल सांस्कृतांयन ,विवेकानंद ,एैसे अनेको लोगो की अनंेको कृतियो जो हमारी कीमती पूंजी है उसे पढ़ा नही तो फिर मानव जीवन प्राप्त करने का क्या लाभ ? जो पढ़ा जाना आवश्यक है उसे पढ़े जाने से रोकने के सारे रास्ते बंद कर देने होगे । शासन प्रशासन को इस समस्या का समाधान ढूंढ़ना होगा । वैसे भी पढ़ने वालो की संख्या कोई बहुत ज़्यादा नही है लेकिन जो थोड़े बहुत है वे भी पढ़ना छोड़ देगे तो उम्मीद की आखरी किरण भी बुझ जायेगी । हमारा एक ही मकसद नही होना चाहिये कि जो पढ़ने वाले है उनका पढ़ते जाना बरकरार रहे बल्कि हमारी कोशिश होनी चाहिये कि नये पढ़ने वाले पैदा हो क्योकि बुलंदी पर पहुचने की जो बहुत सारी सीढ़ियाॅ है उसमें एक सीढ़ी साहित्य भी है । यह भी कितनी दयनीय स्थति है कि पढ़ने वालो पर आये संकट से निपटने के लिये सहयोग की अपील हम नही पढ़ने वाले वर्ग से कर रहे है , जिनके संबंध मंे यह भी कहा जा सकता है कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद ? जिनके हाथ में अधिकार है वे लोग इस दिशा में जब कदम उठायेगे तब उठायेगे फिलहाल तो हम चिंता करने वालो को विभिन्न अवसरो पर किताब भेंट करने की परम्परा शुरू कर देनी चाहिये । हमारे साहित्यिक खज़ाने में से कोई एक किताब भी नही पढ़ने वाले ने पढ़ ली तो बाकी सारी चीज़े वह ढूंढ़ ढ़ंूढ़ कर पढ़ लेगा । पढ़ने वाली नस्ल तैयार करना निहायत ज़रूरी है क्योकि जहालत का बम बारूदी बम से ज्यादा खतरनाक होता है इसलिये किताबो की कीमत से उपजा पढ़ने का संकट खत्म करना ही होगा । इसके लिये हम सब को सामूहिक रूप से संबंधित व्यक्तियों से अपील करनी चाहिये कि ”कृपया किताबो की कीमत कम कीजिये हुजूर“।
अख्तर अली
फ़ज़ली अपार्टमेन्ट, आमानाका कुकुरबेड़ा,रायपुर (छ॰ग॰)
मो॰ 9826126781 / akhterspritwala@yahoo.co.in

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

आई0ए0एस0 बनने पर बलात्कार की सजा से माफ़ी क्यों ??

पहली नजर में यह आश्चर्यजनक लगता है पर वाकई सच है। एक बलात्कारी आई0ए0एस0 अधिकारी हो गया है और इसी बिना पर उसकी सजा भी माफ हो गई है। इस बलात्कारी का नाम अशोक राय है और उसने ट्यूशन पढ़ाने के दौरान सुनीता नामक लड़की से लम्बे समय तक बलात्कार किया और फिर अपने दोस्त से भी उसका शारीरिक शोषण करवाया। बदनामी के डर से सुनीता ने अप्रैल 2003 में सल्फास की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली। फिलहाल मामले में पुलिस केस बना और दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने बलात्कारी अशोक राय को वर्ष 2008 में 10 साल कैद की सजा सुनाई। कैद के दौरान अशोक ने आई0ए0एस0 की परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली जिसके आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 9 फरवरी में उसकी सजा माफ कर दी। उस समय तक अशोक की कुल 5 वर्ष 6 माह तिहाड़ जेल में बिताये। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस सजा को पर्याप्त माना।

फिलहाल राष्ट्रीय महिला आयोग ने मामले का संज्ञान लिया है एवं सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। राष्ट्रीय महिला आयोग का स्पष्ट मानना है कि उच्च न्यायालय के इस फैसले से समाज में गलत संदेश जाएगा। आई0ए0एस0 परीक्षा पास करना बलात्कार की सजा कम करने के लिए ‘पर्याप्त‘ और ‘विशेष‘ कारण नहीं हो सकता। वह भी तब जब बलात्कार के मामले में न्यूनतम सजा सात वर्ष हो। आयोग ने कहा है कि उच्च न्यायालय का यह फैसला संविधान में महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा अधिकारों के विरूद्ध है। साथ ही यह सुप्रीम कोर्ट के सिद्वांतों के खिलाफ भी है जिसमें कहा गया है कि एक बार बलात्कार में दंडित होने के बाद दोषी के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

प्रतिभा पलायन क्यों??????.......

पुराने जमाने में भारत को सोने की चिडिया कहते थे..ये हम सब जानते है...!अंग्रेज भी जानते थे ...पुर्तगाली भी जानते थे तभी वे इतनी दूर तक आ गए...!आज के .वर्तमान...भारत को पूरा विशव ज्ञान की चिडिया के रूप में जानने लगा है!समस्त विशव में भारतीयों ने अपने ज्ञान का डंका बजाया है तभी तो हर जगह भारतीय लोग छा..गए है...!अमेरिका में तो राष्ट्रपति ओबामा का आधा स्टाफ ही भारतीय है..!अपने ज्ञान के दम पर भारतीय लोगों ने पूरे संसार में अपनी एक अलग पहचान बनाई है...!लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है...!भारत ने इसकी कीमत भी चुकाई है....प्रतिभा पलायन के रूप में...!आज देश की प्रतिभा देश में नहीं बल्कि विदेश में अपना भविष्य देखती है..!देश अपने संसाधन लगा कर एक प्रतिभा को तैयार करता है और वो अपना ज्ञान देती है विदेशों को...!उसके ज्ञान और अनुभव से देश वंचित हो जाता.. है...!आखिर क्यूँ होता है..ऐसे...?जवाब ज्यादा जटिल नहीं है...इसका कारण है ..हमारी व्यवस्था....,लाल फीताशाही..और काम ना करने की आज़ादी..!यहाँ से अच्छा माहोल और पैसा उन्हें विदेशों में आकर्षित करता है....!अब देखिये ना हमारी सरकार गांधी जी की कुछ वस्तुओं ,कोहिनूर हीरे और कुछ अन्य अनुपयोगी वस्तुओं के लिए तो मगजमारी करती है जबकि प्रतिभा पलायन को रोकने के लिए कोई पहल नहीं करती..!अगर ये प्रतिभाएं देश को अपना ज्ञान देती तो आज हम हर मामले में विकासशील देशों से आगे खड़े होते !जहां हर राष्ट्र अपनी भाषा,संस्कृति और शिक्षा का संरक्षण करता है वहीँ हम.. इनका त्याग कर रहे है..ऐसे में देश का क्या होगा...! हमारे यहाँ योग्यता से ज्यादा महत्व व्यक्ति को दिया जाता है जो गलत है..!...आज .विदेश में रखे काले धन पर तप सब की नज़र है...पर विदेशों में बसे प्रतिभाशाली लोगों का क्या????क्या उन्हें कोई .पॅकेज देकर वापस नहीं लाया जा सकता...?क्यूँ सभी पार्टियाँ खामोश है?क्या देश का उन पर अब कोई हक नहीं रहा या आज उनकी यहाँ कोई जरुरत नहीं है?सच तो ये है की सब वापस आना चाहते है लेकिन कोई शुरुआत करें तो सही...!एक अच्छी और दिल से की गई शुरुआत देश का भविष्य बदल सकती है....

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

क्या है चुनावी मुद्दा...?

चुनावी माहोल में नेता लोग शायद देश की वास्तविक समस्याओं को भूल गए है!तभी तो सब एक दूसरे पर टीका टिप्पणी करने लगे है...!इनकी बातें सुन कर तो ऐसे लगता है जैसे देश में कोई मुद्दा ही नहीं है..!मोदी .कांग्रेस को बूढी बता रहे है तो कांग्रेस वाले बी जे पी को ?चलो दोनों .बूढी नहीं है...युवा है...पर ये तो बताइए युवा जन के लिए आपकी क्या योजना है....युवा वर्ग को क्या तोहफा देंगे आप?आज पूरे विशव में आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है....युवाओं की नोकरियाँ जा रही है...!कुछ दिनों के अन्दर ही लाखों युवा बेरोजगार हो गए है...!हमारा देश भी इससे अछूता नहीं है...!क्या हम बचा पाएंगे?मिलेगी नोकरी...?दूर होगी आर्थिक मंदी?इसके अलावा महंगाई भी सुरसा की तरह मुह बाए खड़ी है...?कीमते आसमान छू रही है...और नेताओं को मसखरी सूझ रही है....!क्या देश में अब कोई मुद्दा नहीं रहा...जो ने३त फालतू की बहस छेड़े .बैठे है....अब आप देखिये किस तरह ये लोग एक दूसरे पर कीचड उछालते फ़िर रहे है...?गडे मुर्दे उखाड़ने से या धर्म की ठेकेदारी करने से .क्या होगा...?युवा लोग आपसे उम्मीद लगायें बैठे है....उन्हें होंसला दीजिये...?आर्थिक मंदी दूर करने का ठोस प्रबंधन कीजिये....?

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

ग़ज़ल

सभी सरसब्ज मौसम के नये सपने दिखाते हैं
हमें मालूम है वो किस तरह वादे निभाते हैं।
इलेक्शन में हुनर, जादूगरी सब देखिए इनकी
ये हर भाषण में सड़कें और टूटे पुल बनाते हैं।
चलो मिल जायेगी अब वक्त पे दो वक्त की रोटी
हम इस मकसद से जिन्दाबाद के नारे लगाते हैं।
हमारा सच कभी देखा नहीं है इनकी आँखों ने
हमारे रहनुमा किस रंग का चश्मा लगाते हैं।
अभी हर शख्स के घर का पता मालूम है इनको
सदन में जाके ये पूरा इलाका भूल जाते हैं।
पुरानी साइकिल, हाथी, कमल, पंजा नया क्या है?
हमें हर बार ये देखा हुआ सर्कस दिखाते हैं।
हमारे वोट से संसद में नाकाबिल पहुँचते हैं
जो काबिल हैं गुनाहों से हमारे हार जाते हैं।
वो साहब हैं उन्हें हर काम के खातिर है चपरासी
हम अपना बोझ अपने हाथ से सिर पर उठाते हैं।
तबाही देखते हैं वो हमारी वायुयानों से
हम दरिया में बिना कश्ती के ही गोता लगाते हैं।
जो सत्ता में हैं वो सूरज उगा लेते हैं रातों को
हमारे घर दिये बस सांझ को ही टिमटिमाते हैं।
भँवर में घूमती कश्ती के हम ऐसे मुसाफिर हैं
न हम इस पार आते हैं न हम उस पार जाते हैं।
ये संसद हो गयी बाजार इसके मायने क्या हैं?
बिके प्यादों से हम सरकार का बहुमत जुटाते हैं।

जयकृष्ण राय तुषार
63 जी/7, बेली कालोनी, स्टैनली रोड, इलाहाबाद
मो0: 9415898913

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

अब भी जागो युवा

जब -जब देश में गलत का फैलाव हुआ
हमारा अपनी जमीर से अलगाव हुआ
बेचा खुद के अहसासों को
चांदी के टुकडों की खातिर
गरीबो के पैसों से शेयर
बेचते बाजार के शातिर
हल्का से एक झटका लगा
बड़ा पेड़ कट कर गिरा
हमारी अर्थ जगत की चूल हिल गई
गुरु की गुरुतई काम न आई
तब चेलो की की कैसी प्रभुताई !

फिर भी हम चिल्लाते
अपना गाल बजाते
देश के चंद अमीरों में
खुद को अमीर जतलाते
सोने को जमीं के लाले
चाँद पे जाने का गौरव गाते
खाने को अन्न नहीं पर
अरबों में नेता चुन कर लाते
धन्य हमारा लोकतंत्र
है धन्य हमारा देश स्वतंत्र
है धन्य हमारी जनता
हैं धन्य हमारे नेता
अब, बस बहुत हो चुका
अब भी जागो युवा
जगाओ अंदर के शिवा को
खोलो मन के द्वार
हो जाने दो
एक बार फिर इस जग का उद्धार !!
जयराम चौधरी
jay.choudhary16@gmail.com

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

वोटर यानि सौ सुनार की एक लोहार की

जाग वोटर अब तेरी बारी आई है । दिखा दे अपना जलवा, बता दे अपनी ताकत। बता दे अपनी हैसियत दिखा दे अगले को उसकी औकात। वोटर तू लोकतंत्र के सागर का मोती है, पहचान अपनी कीमत। तुझे वोट के बीज से खुशहाली के फूल उगाने है। ये समय तेरा है । इस समय के महत्व को समझना होगा। वोट देना हसी खेल नही है । अपने को इतना नासमझ मत बना कि कोई भी ऐरा-गैरा आकर तुझसे तेरा वोट चुरा ले। वोटर यही समय तेरा है । तू जज बनकर फैसला सुना दे, अम्पायर बनकर उंगली उठा दे । अभी ड़मरू तेरे हाथ में है । इस खेल मे तेरी भूमिका मदारी की होनी चाहिये बंदर की नही । वोटर भाई एक बात तो तू अच्छे से जान ले कि जैसी वोटर की औकात होती है वैसी ही उसकी सरकार होती है , उससे ज़रा भी अच्छी नही । भय्या अपने अंदर के सारे विवेक का एकत्रित कर ले, अपनी सारी सोच को सामने रख दे , अपनी सुंदर सोच से संसद को सजा दे। ध्यान रहे तेरी एक गलती से संसद गंदी हो सकती है । लोकतंत्र के इस मंदिर में तेरा चढावा ज़बरदस्त होना चाहिये ।

जब हम इन्टरव्यू देने जाते , जब लड़की देखने जाते है , जब मकान खरीदने जाते है , जब बच्चे के लिये खिलौना लेने जाते है , यहां तक कि जब धनिया मिर्ची भी खरीदने जाते है तो तैयारी कर के जाते है , लेकिन वोट देने जाते समय हमारी कोई खास तैयारी नही होती । हम अपने प्रत्याशी को अच्छे से ठोक बजाकर चैक क्यो नही करते है ? वोट देने से पहले उससे पचास सवाल क्यो नही करते ? उसको वोट देने या नही देने का आधार क्या होता है हमारे पास ? वोट को लेकर हमारी कोई पुख्ता सोच नही है , हम आगामी पांच साल तक अपने द्धारा चुने गये प्रत्याशी को गलियां देते रहते है , उसके निकम्मेपन पर कोसते रहते है , उसके द्धारा भुला दिये गये वादो को याद करते रहते है .......ये सब करना हमको अच्छे से आता है लेकिन वोट देते समय उसको ठेंगा दिखाना नही आता । हम अपने दरवाज़े वोट मांगने आये नेता को मुंह पर क्यो नही कहते कि हम तुमको वोट नही देंगे क्योकि तुम इस योग्य नही हो। वह मुस्कुराकर हाथ जोड़ता है हम भी मुस्कुरा कर हाथ जोड़ देते है । हाथ से हाथ जोड़ो पर दोना हाथ तुम्हारे ही नही होने चाहिये । एक हाथ नेता का और एक हाथ नागरिक का होना चाहिये । वोट के मामले मे वोटर का कर्तव्य होता है कि वह एक दम मुंह फट हो जाये , इसमें ज़रा भी संकोच और शर्म नही होनी चाहिये । याद रखिये दुनियाॅ मे हां उसी की होती है जिसको न बोलना आता है । उम्मीदवार हमारे दरवाज़े आता है तो हम गदगद हो जाते है , समर्पित हो जाते है , भूल जाते है कि इससे तो पुराना हिसाब किताब ठीक करना है । पिछले चुनाव के समय किये गये वादो का लेखा जोखा पूछना है । फलाने फलाने मामले मे इसके समर्थन या विरोध का कारण ज्ञात करना है । संसद में हमारे प्रतिनिधी की हैसियत से इसने कब कब क्या बोला ? स्थानीयत मुद्धो को इसने किस ढंग से उठाया ? जीतने के बाद इसने देशहित में क्या किया ? वोटर को चाहिये कि वह उम्मीदवार के सामने सवालो की बारिश कर दे । साथियो राजनीति की इस महफिल में तबला नही नगाड़ा बजाना होगा ।

लोकतंत्र के दर्पण के सामने खड़े होकर हमको अपनी ही ऐसी की तैसी कर देनी चाहिये । खुद को कटघरे में खड़े कर खुद पर आरोप लगाने चाहिये , खुद से सफाई मांगनी चाहिये और खुद ही खुद का फैसला करना चाहिये । इन दिनो हमें चाहिये कि कल्पना की कक्षा में खुद शिक्षक बन खुद का मार्ग दर्शन करे, खुद ही खुद से सवाल करे और खुद ही उसका जवाब भी दे, और गलत जवाब देने पर खुद ही खुद को दंड़ दे। अपना प्रतिनिधी चुनते समय हमें उतना ही चौकन्ना रहना पड़ेगा जितना हम दामाद चुनते समय रहते है । अगर गलत दामाद चुन लिये तो बिटिया का भविष्य बर्बाद हो जायेगा उसी प्रकार यदि हमारे द्धारा गलत प्रतिनिधी चुन लिया गया तो देश का भविष्य बर्बाद हो जायेगा । याद रखिये देश सर्वोपरि होता है, देश के लिये बड़ी से बड़ी कुर्बानी भी मामूली से बात होनी चाहिये । वोट देना किसी निशान पर बटन दबाना मात्र नही है बल्कि इस प्रक्रिया के द्धारा देश का भविष्य तय करना है । यह कोई छोटी मोटी ज़िम्मेदारी नही है , अगर एक बार आपने किसी को अपना वोट दे दिया तो फिर उसके किये गये हर अच्छे बुरे कार्य के जिम्मेदार हम खुद होंगे।अगर वह अयोग्य साबित होता है तो यह उसकी नही हमारी अयोग्यता मानी जायेगी कि हमे ढंग का आदमी चुनना तक नही आता । गलत आदमी को वोट देकर जिताने से बड़ा और कोई पाप नही हो सकता। अगर कोई सांसद या विधायक अपने कार्यकाल मे असफल साबित होता है तो इस बात का पता लगाना चाहिये कि यह किन किन के वोटो से जीता था , फिर उन सभी से वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिये । उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिये । ऐसे नासमझो के साथ कोई रियायत नही बरतनी चाहिये।

हम विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के नागरिक है । हम ऐसे देश के नागरिक है जहां दो चीज़े बहुत होती है , एक त्योहार और दूसरा चुनाव । आये दिन हमें कोई न कोई चुनाव का सामना करना ही पड़ता है । इसलिये यह अत्यंत आवश्यक है कि हम वोट देने के कुछ कड़क नियम स्वयं के लिये बना ले । पहला नियम तो यह होना चाहिये कि हम दिल से यह स्वीकार करे कि चुनाव में आस्था जैसी कोई चीज़ नही होनी चाहिये । आस्था धार्मिक मामलो में होनी चाहिये राजनीतिक मामलो मे नही । अक्सर वोटरो के मुंह से सुना जाता है कि हमारी फला -फला पार्टी पर आस्था है , या हम तो बाप दादाओ के ज़माने से कांग्रेसी , भाजपाई या कम्युनिस्ट है । इस तरह की कोई मान्यता हमारे मन में नही होना चाहिये । हर बार समय के साथ स्थितियां बदल जाया करती है , लिहाज़ा हमें भी अपना निर्णय बदलने पर विचार करना चाहिये । दूसरा नियम यह होना चाहिये कि हम हर वोट मांगने आने वाले को शक की नज़र से देखे । उस पर सहसा विश्वास करे ही नही । हमारी नज़र में हर प्रत्याशी संदिग्ध होना चाहिये । हमें हमेशा एक ही राग अलापना चाहिये कि अगर ये ऐसा बोल रहा है तो क्यो बोल रहा है , अगर ये ऐसा कर रहा है तो क्यो कर रहा है , अगर यह उससे मिल रहा है तो क्यो मिल रहा है , अगर इसने ये वादा किया है तो इसे पूरा क्यो करेगा , कब करेगा , कैसे करेगा ? अगर इसने फलाॅ फलाॅ वादो पर अमल नही किया तो हम इसका क्या कर लेगे ? हम कुछ नही कर सकेगे हमको एक बार वोट देने का मौका मिलता है अगर उसे नादानी में गवां दिये तो अगले पांच साल तक हमारे पास सिवाय आंसू बहाने और हाथ मसलने के आलावा और कुछ नही है । इसलिये भाईयो खुदा का शुक्र अदा करो कि तुम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हो जहां तुम्हे वोट देने की नैमत हासिल हुई है । अपने इस अधिकार से तूफान मचा दो , प्रगति के समंदर में देश की नाव के नाखुदा हो तुम । निर्माता हो तुम सरकार के । मतदान की कलम से देश का भविष्य लिख दो । कुछ ऐसा धमाल करो इस वोट से कि कमाल हो जाये । वोट वोट न रहे अलादीन का चिराग हो जाये , ज़रा अपनी सोच को संवारो , तुम्हारा वोट वोट नही एक शस्त्र है इसे ढंग से चलाना सीखो । इस बार ज़िद मे आ जाओ कि तुम्हे चाहिये सिर्फ योग्य योग्य और योग्य नुमाइंदा ।

योग्यता का मापदंड़ क्या होगा ? किसी प्रमाण पत्र से योग्यता का आंकलन नही किया जा सकता । किसी लैब की रिपोर्ट नही बताती कि प्रत्याशी मे कितने प्रतिशत ईमानदारी , कितने प्रतिशत जिम्मेदारी , कितने प्रतिशत देशप्रेम और कितने प्रतिशत लालच, मौकापरस्ती,, धोखाधड़ी है । योग्य प्रत्याशी को तो तुम्हे अपने विवेक से तलाशना होगा , सजग निगाहो से ढूंढ़ना होगा , अनुभवी हाथो से टटोलना होगा । एक बात तय है कि योग्यता को किसी प्रमाण पत्र की ,किसी रिपोर्ट की आवश्यकता नही होती । अयोग्यता की इतनी औकात नही है कि वह योग्यता को दबा दे । अयोग्यता के शोर मे इतनी आवाज़ नही होती कि उसमें योग्यता का गीत दब जाये । ए वोटरो तुम अयोग्यता के शोर के खिलाफ़ समूह गीत बन जाओ । लोकतंत्र के आकाश पर वोट के बादल बन कर गरजो , बिजली बन कर कड़को , बारिश बन कर बरसो और मौकापरस्ती के कचरे को बहा दो । प्रत्याशी के बैनर पोस्टर नही देखो , उसका घोषणा पत्र देखो । बांचो की उस में कुछ ज़मीनी सच्चाई भी है या सब कुछ हवा हवाई ही है । वोट के खौफ को इतना उभारो कि किसी नेता में इतना साहस ही न हो कि वह तुम्हारी भावनाओ के साथ खिलवाड़ करने का सोच भी सके । हमेशा उसके दिमाग में यही भय समाया रहना चाहिये कि अगर कुछ ऐसा वैसा किया तो अभी वोट का ड़ंड़ा पड़ेगा । ये ऐसी चोट है जिसकी कोई मरहम पट्टी नही होती । ये ऐसा नासूर है जो पूरा कैरियर गला देता है । तुम अपनी क्षमता पहचानो , वोट के तवे पर अच्छे अच्छो का भेजा फ्राई कर दो । एक कुशल खिलाड़ी की तरह वोट का पासा फेको और खुशहाली की बाज़ी जीत लो । चुनावी पिच तुम्हारे अनुकूल है अगर संभल कर बल्लेबाजी किये तो तुम्हारी जीत निश्चित है। चुनावी अखाड़े में हार और जीत सिर्फ उम्मीदवारो की ही नही होती बल्कि वोटर की हार जीत भी इसमें शामिल रहती है । गलत प्रत्याशी की जीत वोटर की हार है । वोट बेचने से बड़ा कोई देशद्रोह नही और देशद्रोह से बड़ा कोई पाप नही । तुम इस पाप में कभी भागीदार नही बनना ।

हर वोटर की खास कर युवा वोटरों की यह नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वोट देने के पहले इस बात का अच्छी तरह अनुमान लगा ले कि कही कोई ड़ेढ़ होशियार तुम्हारे हाथो मे घोषणा पत्र का छुनछुना तो नही पकड़ा रहा है । नामांकन दाखिल करने से लेकर मतदान के दिन तक हर वोटर को इतना समय मिलता है कि वह अपने प्रत्याशियो का तरीके से चरित्र चित्रण कर ले । इस बात पर ध्यान दो कि प्रत्याशी की शैक्षणिक योग्यता क्या है लेकिन अनुभव के महत्व को भी नज़र अंदाज़ नही किया जा सकता है । अनुभवी आदमी का अपना अलग महत्व होता है लेकिन युवा प्रतिभा भी किसी से कम नही होती । मेरा तो यह मानना है कि आप अपने मन की प्रयोगशाला में इस बात की जांच करो कि आप के प्रत्याशी की विशेषता क्या है ? वह किस क्षेत्र से है ? राजनीज्ञ ही सत्ता संभाले तो ठीक है । प्रसिद्ध अभिनेता , प्रतिभावान खिलाड़ी या सफल उद्योगपति की जगह अपने अपने क्षेत्र मे महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन राजनीति में उनकी क्या आावश्यकता ? अभिनेता को जीता कर क्या देश की संसद में ठुमके लगवाना है ? वोट देने की वजह उम्मीदवार की सिर्फ लोकप्रियता ही हो यह उचित नही है । कम लोकप्रिय आदमी भी ज्यादा काबिल हो सकता है । परिवर्तन भी वोटर का मुद्धा हो सकता है । वोट इतना सोच विचार कर दो कि वोट देने के बाद जीते हुए उम्मीदवार का हर निर्णय हर कदम तुम्हे स्वीकार होना चाहिये । तुम्हारे अंदर इतना सब्र होना चाहिये कि आगामी पांच साल तक पुनः इंतजार कर सको । उम्मीदवार के सारे वादे, आश्वासन, पर तुम्हारा एक वोट इतना भारी होना चाहिये कि वोट के संबंध में यह कहावत लागू हो जाये कि सौ सुनार की एक लोहार की.......!!!
अखतर अली, आमानाका , रायपुर
akhterspritwala@yahoo.co.in

रविवार, 5 अप्रैल 2009

ये हैं हमारे नेता...??

जिस तरह मेले का नाम लेते ही बच्चे उछल पड़ते है उसी तरह चुनाव की घोषणा होते ही नेताओं में खुशी की लहर दौड़ पड़ती है..!अब देखिये जैसे ही आम .चुनाव का एलान हुआ वैसे ही सब नेता उठ खड़े हुए...जैसे की देव उठनी ग्यारस को देवता उठते है...!जो जहाँ था वहीं से बयानबाजी कर रहा है..!सब को बस टिकट चाहिए..!इसके लिए वे सब भूल गए है या की भूल जाना चाहते है...!कल तक जो एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे वे अब गलबहियां डाले टी वी पर दिख रहे है..!टिकट के लिए मेंढक की तरह एक से दूसरी पार्टी के पोखर में फुदक रहे है..!सालों की दोस्ती और दुश्मनी को भुला कर रोज नए नए समीकरण बनाये जा रहे है..!एक अदद टिकट के लिए जी जान लगा रहें है..!झकाझक सफ़ेद कपडों में सजे धजे नेता हर गली मोहल्लों तक पहुँच गए है..!जिस तरह खंभे को देख कर कुत्ता पैर उठा देता है उसी प्रकार ये भी वोटर को देखते ही खींसे निपोर कर भाषण .पिला देते है..!मुझे हँसी आती है ये देख कर की....आज के ये नेता कुछ तो उसूल रखते होंगे..?जी हाँ है न ...वोटर को नए नए सपने दिखाना ,वाडे करना,वोट .खरीदना,प्रलोभन देना आदि बातें सब में समान..है..और ये सब इनमे कॉमन है...!इसके अलावा आधी अधूरी .शिक्षा, देश के बारे में अल्प ज्ञान और पुलिस रिकार्ड तो सबका एक है ही...अब आप बताइए किसे .चुनेंगे आप..?और हाँ पार्टी के नाम पर ना जियेगा...क्यूंकि चुनावों के बाद इन सब की एक ही पार्टी होगी...."सत्ता"

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

लोकतंत्र में भागीदारी सुनिश्चित करती स्याही

लोकसभा और विधान सभा चुनावों के दौरान हर मतदाता के बाएं हाथ की तर्जनी के नाखून पर एक स्याही लगाई जाती है, जो इस बात का प्रतीक होता है कि वह अपना मत दे चुका है। स्याही का यह निशान भारतीय लोकतंत्र की एक अनुपम पहचान बन चुका है। जब हम लोग छोटे-छोटे थे तो इस स्याही के प्रति काफी क्रेज था। इस स्याही को येन-केन-प्रकरेण मिटाना हम लोगो का शगल होता था पर ये मिटने का नाम नहीं लेती थी। तब न तो लोकतंत्र की परिभाषा पता थी और न ही चुनाव का मतलब। पूरी मित्र मण्डली के साथ जाकर अपना वोट दे आते थे और फिर उधर से विभिन्न राजनैतिक दलों के पम्फलेट्स इत्यादि बटोर कर लाते थे। वक्त के साथ जैसे-जैसे किताबी ज्ञान बढ़ा, वैसे-वैसे राजनीति की बारीकियाँ एवं चुनाव की महिमा भी समझ में आती गई। आज के चुनाव पहले के चुनावों जैसे नहीं रहे। जिस प्रकार पर्यावरण में प्रदूषण फैलता गया वैसे ही चुनाव भी प्रदूषित होते गये। जाति-धर्म-धन-गुण्डई जैसे तत्व प्रत्याशियों के लिए आम बात हो गये। इसके बावजूद लोकतंत्र की महिमा कम नहीं हुई और हर बार हम यह सोच कर वोट दे आते हैं कि शायद इससे अगली बार कुछ आमूल चूल परिवर्तन होंगे। इस सकारात्मक दृष्टिकोण पर ही लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है।

फिलहाल हम बात कर रहे थे वोट के दौरान बाएं हाथ की तर्जनी के नाखून पर लगाई जाने वाली स्याही की। इस चुनावी स्याही के उत्पादन का श्रेय कर्नाटक के प्रसाद नगर स्थित मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल) को जाता है। आजादी के बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में फर्जी मतदान रोकने के लिए स्याही लगाने का फैसला किया गया। मैसूर के पूर्व महाराजा नलवाड़ी कृष्णराजे वाडेयार और प्रसिद्ध इंजीनियर भारतरत्न सर मोक्षगंुडम विश्वेश्वरैया ने यह कंपनी बनाने का सपना देखा था। उनके प्रयासों से 1937 में इस कंपनी की स्थापना की गई और आजादी के बाद 1947 में इसे सार्वजनिक उपक्रम में बदल दिया गया। आज भी इस स्याही के उत्पादन का अधिकार केवल मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड के पास है।

यह चुनावी स्याही एक अलोप्य स्याही है, जो उंगली पर लगने के बाद एक मिनट में सूखती है। सूखने के बाद उंगली पर ऐसे चिपकती है कि लाख प्रयास कर लीजिए, कई महीनों तक छूटने का नाम ही नहीं लेती। इसे किसी रसायन, साबुन या तेल से भी नहीं हटाया जा सकता। वस्तुतः यह स्याही फर्जी मतदान को रोककर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में महत्वपूर्ण भूमिका चुपचाप अदा करती है। यह स्याही एक मतदाता द्वारा एक ही मत डालने की प्रक्रिया को भी सुनिश्चित करती है। एक फरवरी 2006 से चुनाव आयोग द्वारा मतदाता की उंगली पर इसके लगाने के तरीके में थोड़ा बदलाव किया गया है। अब इसे बांये हाथ की तर्जनी उंगली पर नाखून के निचले किनारे से लेकर ऊपरी किनारे और त्वचा के जोड़ तक एक रेखा के रूप में लगाया जाता है। इससे पहले इस स्याही को नाखून के ऊपरी किनारे और त्वचा के जोड़ पर ही लगाया जाता था। यह बात कम लोगों को ही पता होगी कि अगर कोई व्यक्ति फर्जी तौर पर मतदान करते हुए (प्राक्सी मतदान) पकड़ा गया तो इस स्याही को उसके बांये हाथ की बीच की उंगली पर लगाया जाता है।

आज मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड द्वारा इस स्याही का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन हो रहा है। पिछले साल सितंबर तक पहले छह महीने में एमपीवीएल से एनआरडीसी को करीब 20 लाख रूपये रायल्टी मिली। शुरू से यह उपक्रम ही इस स्याही की आपूर्ति चुनाव आयोग को करती आ रही है। खास बात तो यह है कि दुनिया के 25 देशों में यह चुनावों के सफल निष्पादन में अपनी भूमिका निभाती है। भारत में बनने वाली इस चुनावी स्याही को लगभग 25 देशों को निर्यात किया जाता है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

देखिये ये चुनाव है....!!

चुनावी..बिगुल बज चुका है......चारों तरफ़ युध्घोश हो रहे है ..इसी के साथ ही कुछ नेता गिरगिट की भाँती रंग बदलने लगे है तो कुछ ने अपना चोगा उतार फेंका है..!कुछ हिन्दुओं को तो कुछ मुसलमानों को गालियाँ निकाल रहे है....!कुछ जातिवाद को भुनाने में लगे है तो कुछ हमेशा की तरह गरीबों का वोट हथियाना चाहते है....!सब नेताओं ने तरह तरह के मुखोटे पहन लिए है....!वे मेंढक की तरह एक से दूसरी पार्टी में फुदक रहे है....अचानक ही वे हमारे हमदर्द बन गए है....उन्हें हर हाल में हमारा वोट चाहिए...!इस चुनावी .नदी...को पार करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते है...!हम सब ये देख कर भले ही हैरान हो लेकिन वे इस खेल के पुराने खिलाडी है....ये उनका पेशा है..!अब हमे चाहिए की हम उनकी बातों में ना आए...!चुनाव आते ही ये जहर उगलने वाले नेता बाद में फ़िर एक हो जायेंगे...इसलिए इनकी बातों में ना आना दोस्तों ...ये तो गरजने वाले बादल है जो बिन बरसे ही गुज़र जायेंगे.....!इनके पीछे हम अपना भाईचारा क्यूँ ख़तम करें....?

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

प्रथम युवा महिला सांसद : तारकेश्वरी सिन्हा

आज भारतीय राजनीति में तमाम युवा चेहरे हैं. संसद के गलियारों में इन युवाओं की धूम है पर एक दौर ऐसा भी था जब युवा चेहरे वह भी युवा महिला बमुश्किल ही संसद में देखने को मिलते थे. ऐसे समय में पहली लोकसभा में सबसे युवा चेहरा था- तारकेश्वरी सिन्हा का । मात्र 26 साल की उम्र में सांसद के तौर पर शपथ लेने वाली तारकेश्वरी सिन्हा नेहरू मंत्रिमंडल में उप-वित्त मंत्री भी रहीं। बिहार के बाढ़ संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ने वाली तारकेश्वरी सिन्हा एक बेहद संवेदनशील कवियत्री और अच्छी लेखिका भी थीं। उन्होंने अपनी यादों को सहेजकर कई संस्मरण भी लिखे। इनमें 'संसद में नहीं हूं, झक मार रही हूं' तो काफी लोकप्रिय रहा। यह संस्मरण उन्होंने लोकसभा चुनाव हारने के बाद लिखा। इतिहास गवाह है कि जब उनकी उम्र की लड़कियां सजने-संवरने में वक्त गंवा रही थीं, तारकेश्वरी सिन्हा 1942 के भारत छोडो आंदोलन में कूद पड़ीं। उस समय उनकी उम्र बमुश्किल 19 साल थी। फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई आंदोलनों में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यही नहीं, तारकेश्वरी सिन्हा उन चंद लोगों में शामिल थीं, जिन्हें नालंदा में महात्मा गांधी की आगवानी करने का मौका मिला था। बताते हैं कि तारकेश्वरी सिन्हा के घरवालों को उनकी राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी पसंद नहीं थी और जब उन्होंने छपरा के एक जमींदार परिवार में शादी की, तो घरवालों को यह सोचकर सुकून मिला कि शादी के बाद तारकेश्वरी सिन्हा राजनीति से दूर हो जाएंगी. पर देशभक्ति और समाज सेवा के जज्बे से भरपूर तारकेश्वरी को राजनीति से अलगाव मंजूर नहीं था। फिर तो वह लगातार भारतीय राजनीति में आगे बढ़ती गई। यहाँ तक कि मशहूर गीतकार गुलजार ने फिल्म 'आंधी' के मुख्य किरदार को इंदिरा गांधी के साथ-साथ तारकेश्वरी सिन्हा से भी प्रेरित बताया। आज भारतीय राजनीति में भले ही तमाम युवा महिलाएं आगे आ रही हैं और नए प्रतिमान स्थापित कर रही हैं पर वास्तव में युवा महिला शक्ति की अलख जगाने का श्रेय तारकेश्वरी सिन्हा को ही जाता है।