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रविवार, 21 जून 2009

फादर्स-डे

आज समूचे विश्व में फादर्स-डे मनाया जा रहा है। जून माह के तीसरे रविवार को फादर्स डे के रूप में मनाया जाता है। विश्व भर में देश और भाषा भले ही अलग हों लेकिन पिता का ओहदा सब जगह ऊंचा है। विश्व में 130 भाषाओं में पिता के लिए अलग-अलग शब्द प्रयोग होते हैं। कुछ प्रमुख भाषाओं में पिता के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द इस प्रकार हैं:
हिंदी : पिता जी
संस्कृत : जनक
अफ्रीकन : वदर
अरब : अब्बी
बांग्लादेश : अब्बा
ब्राजील : पाई
डच : पापा, पानी
इंग्लिश : फादर, डैड, डैडी, पॉप
फ्रेंच : पापा
जर्मन : पपी
हंगेरियन : अपा
इंडोनेशिया : बापा, पैब
इटली : बब्बो
जापान : ओटोसान
लैटिन : पटर, अटटा
केन्या : बाबा
नेपाल : बुवा
पर्सियन : बाबा, पितर
पुर्तगाल : पाई
रशियन : पापा
स्पेनिश : टाटा
स्वीडिश : पप्पा
तुर्किश : बाबा

शुक्रवार, 19 जून 2009

समोसा हुआ 1000 साल का !!

समोसा भला किसे नहीं प्रिय होगा। समोसे का नाम आते ही दिल खुश हो जाता है और मुँह में पानी आ जाता है। विदेशियों के समक्ष भी भारतीय स्नैक्स की बात हो, तो समोसे के जिक्र के बिना बात अधूरी ही लगती है। यही कारण है कि जिस तरह भारतीयों में विदेशों से आए पिज्जा और बर्गर का क्रेज है, उसी प्रकार भारतीय समोसा भी विदेशों में फास्ट फूड के रूप में काफी प्रसिद्ध है। ऐसा कोई विरला ही दुर्भाग्यशाली व्यक्ति होगा जिसने समोसे का स्वाद न लिया हो। यहाँ तक कि फिल्मों और राजनीति में भी समोसे को लेकर तमाम जुमले हैं। लालू प्रसाद यादव को लेकर प्रचलित जुमला मशहूर है कि- ‘‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू।‘‘ फिल्मों और राजनीति से परे तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक गोष्ठियां, सरकारी आयोजन एवं कोई भी कार्यक्रम समोसे के बिना अधूरा है। ऐसे में इस स्टड डीप फ्राई समोसे का स्वाद छोटे-बड़े सभी लोगों की जुबां पर है, तो हैरान होने की जरूरत नहीं।

समोसे के बारे में सबसे रोचक तथ्य यह है कि इन महाशय की उम्र एक हजार साल हो चुकी है, पर अपने जवां अन्दाज से सभी को ललचाये रहते हैं। माना जाता है कि सर्वप्रथम दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में समोसा एक व्यंजन के रूप में सामने आया था। 13-14वीं शताब्दी में व्यापारियों के माध्यम से समोसा भारत पहुँचा। महान कवि अमीर खुसरो (1253-1325) ने एक जगह जिक्र किया है कि दिल्ली सल्तनत में उस दौरान स्टड मीट वाला घी में डीप फ्राई समोसा शाही परिवार के सदस्यों व अमीरों का प्रिय व्यंजन था। 14वीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आये इब्नबतूता ने मो0 बिन तुगलक के दरबार का वृतांत देते हुए लिखा कि दरबार में भोजन के दौरान मसालेदार मीट, मंूगफली और बादाम स्टफ करके तैयार किया गया लजीज समोसा परोसा गया, जिसे लोगों ने बड़े चाव से खाया। यही नहीं 16वीं शताब्दी के मुगलकालीन दस्तावेज आईने अकबरी में भी समोसे का जिक्र बकायदा मिलता है।

समोसे का यह सफर बड़ा निराला रहा है। समोसे की उम्र भले ही बढ़ती गई पर पिछले एक हजार साल में उसकी तिकोनी आकृति में जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ। आज समोसा भले ही शाकाहारी-मांसाहारी दोनों रूप में उपलब्ध है पर आलू के समोसों का कोई सानी नहीं है और यही सबसे ज्यादा पसंद भी किया जाता है। इसके बाद पनीर एवं मेवे वाले समोसे पसंद किये जाते हैं। अब तो मीठे समोसे भी बाजार में उपलब्ध हैं। समोसे का असली मजा तो उसे डीप फ्राई करने में है, पर पाश्चात्य देशों में जहाँ लोग कम तला-भुना पसंद करते हैं, वहां लोग इसे बेक करके खाना पसंद करते हैं। भारत विभिन्नताओं का देश है, सो हर प्रांत में समोसे के साथ वहाँ की खूबियाँ भी जुड़ती जाती हैं। उ0प्र0 व बिहार में आलू के समोसे खूब चलते हैं तो गोवा में मांसाहारी समोसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। पंजाबी समोसा खूब चटपटा होता है तो चाइनीज क्यूजीन पसंद करने वालों के लिए नूडल्स स्टड समोसे भी उपलब्ध हैं। बच्चों और बूढ़ों दोनों में समोसे के प्रति दीवानगी को भुनाने के लिए तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इसे फ्रोजेन फूड के रूप में भी बाजार में प्रस्तुत कर रही हैं।

तो आइये समोसा जी की 1000 वीं वर्षगाँठ मनाई जाय और ढेर सारे समोसे खाये जायें !!

मंगलवार, 16 जून 2009

चाहे बदले सारा ज़माना


जी हाँ,चाहे सारा जमाना बदल जाए..पर हम नहीं बदलेंगे...!आपने ठीक समझा मैं बी जे पी की ही बात कर रहा हूँ..!चुनाव में लुटिया डूब गई...पर अकड़ नहीं गई...!कोई हार की जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं है...!सब अपने अपने खेमे को मजबूत .करने..में लगे है..!हर कोई पार्टी में अपनी हसियत साबित करने पे तुला है..!होना तो ये चाहिए था की पार्टी अपनी हार स्वीकार करके आत्म मंथन करती...पर इसके उलट सब अपनी अपनी डफली बजाने .में..लगे है...!आडवानी जी शुरूआती ना नुकर के बाद फ़िर से पार्टी नेता बन गए है,जबकि उन्हें अब तक समझ जन चाहिए था की अब युवाओं की बारी है...!वे क्यूँ कुर्सी से चिपके रहना चाहते है...?बाकि नेता भी त्यागपत्र त्यागपत्र खेल रहे है....!अरे आप क्यूँ नहीं सामूहिक रूप से इस्तीफे दे देते ताकि .पार्टी नई टीम बना सके..!अब एक आधे त्यागपत्र से कुछ.. नहीं होने वाला,अब तो नई शुरुआत करनी होगी,नया चेहरा प्रस्तुत .करना होगा ..!आप क्यूँ नहीं कुछ करना..चाहते ,जबकि जनता ने आपको नकार दिया है...!अब भी समय है...पार्टी को एक बार फ़िर नए जोश और नए रूप के साथ आगे आना होगा...!आडवानी जी को जिद छोड़ कर युवा पीढ़ी को कमान सौपनी होगी...!द्वितीय पीढी के नेताओं को आगे लाना होगा...!इस में कोई बड़ी बात भी नहीं है ,क्यूंकि आगामी चुनावों से पहले काफ़ी समय है काया कल्प के लिए..!सिर्फ़ हिन्दुत्व और साम्प्रदायिकता के नारे को छोड़ नए नारे ..ढूँढने...... होगे,एक नया माडल पेश करना होगा...!क्या ये सब कुछ बी जे पी कर पायेगी?इसी पर उसका भविष्य टिका है....

गुरुवार, 11 जून 2009

क्यूँ बदल गया इंसान....


आज की इस भीड़ भाड़ वाली जिंदगी में हर आदमी व्यस्त है...!किसी के पास वक्त नहीं है ,हर कोई भागा जा रहा है..!लोग क्यूँ भाग रहे है?कहाँ जा रहे है?किसी को कुछ नही पता..!सड़क पार करने के लिए इंतजार करना पड़ता है ..!सड़क पर गाड़ियों का बहाव देख कर ऐसा लगता है जैसे पूरा शहर आज खाली हो जाएगा...!अस्पताल में देखो तो ऐसे लगता है जैसे पूरा शहर ही बीमार हो गया है !चारों और दर्द से कराहते लोग,रोते,चीखते लोग....लगता है जैसे दुनिया में दर्द ही बचा है...!रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर बहुत ज्यादा भीड़ है ,दम घुटने लगता है..!कभी मन बहलाने पार्क में चला जाऊँ तो लगता है ..सारा शहर मेरे .पीछे वहीँ आ गया है....!मैं अक्सर भीड़ देख कर चिंता में पड़ जाता हूँ....जब संसार में इतनी भीड़ है तो भी फ़िर इंसान अकेला क्यूँ है?अकेलापन अन्दर ही अन्दर क्यूँ ..खाने को आता है?आज इस भरी भीड़ में भी हमें कोई अपना सा क्यूँ नहीं लगता.....~!अभी कुछ समय पहले की तो बात है जब शहर जाते थे तो पूरा गाँव स्टेशन पर छोड़ने आता था ..बहुत होंसला होता था...लगता ही नहीं था की हम अकेले है...!फ़िर गाड़ी में भी लोग अपनत्व की बातें करते थे !कब शहर आ जाता था...महसूस ही नहीं होता था...!फ़िर .शहर में किराये के कमरे में रहते हुए कभी नहीं लगा की मैं बाहर रह रहा हूँ...!पूरा मोह्ह्ल्ला मेरे साथ था..सब लोगों के घर आना जाना था...!कोई .चाचा...... कोई ताऊ और कोई बाबा होते थे....जो अपनों से ज्यादा प्यार करते थे...!मैं भी भाग भाग कर सबके काम कर देता था....!स्कूल हो या कालेज सभी जगह कोई ...ना कोई जानकार मिल जाता था या बन जाता था........! कुल मिला कर बड़ी मस्ती से दिन निकल जाते थे ...! फ़िर अब इस शहर को क्या हो गया ?किसकी नज़र लग गई?क्यूँ सभी अजनबी से हो गए?अब किसी को देख कर क्यूँ मुंह फेरने लग गए ?इस भीड़ भाड़ वाली दुनिया में हम अकेले क्यूँ पड़ गए?अब दूसरो के दर्द में दर्द और खुशी में खुशी क्यूँ नहीं .महसूस...होती..?क्या .सच में इंसान बदल गया या रिश्ते बदल गए...?

बुधवार, 10 जून 2009

है कोई जवाब तो बताना .....!!

सुनो, खुद को सेकुलर कहने वालों !
कुकुरमुत्ते कभी सड़े खून पर नहीं उगते
पेड़ लाश लटकने के लिए पैदा नहीं होते
लोहा तलवार बनने के लिए नहीं होता
गुजरात हिंसा के लिए बना नहीं
मगर, क्या एक तरफा नजरिया नहीं तुम्हारा
जो घृणा में जन्मा उसने घृणा भोगा
उसमे प्रेम कहाँ सेकुलरों ?

एकतरफा नजरिया इसलिए कि
क्या दंगों में हिन्दू या मुस्लमान मारे जाते हैं ?
नहीं, दंगों में इंसान मारे जाते हैं.
क्या दंगों में भगवा ही लहराता हैं ?
क्यूँ तुम्हे हरा रंग नजर नही आता है ?
अपनी सेकुलर तहजीब का हवाला देने वाले देश में
मकबूल के नाम पर आर्ट गैलरी बनाया जाता है
पर पूछता हूँ , सलमान रुश्दी और तसलीमा को
क्यूँ गरियाया जाता है ?

है कोई जवाब तो बताना ................!!!

जयराम चौधरी , जामिया मिल्लिया इस्लामिया.M:09210907050

शुक्रवार, 5 जून 2009

पर्यावरण दिवस और हम



जी हाँ ,आज पर्यावरण दिवस है...!हमेशा की तरह ही बड़ी बड़ी बातें,भाषण और ढकोसले होंगे !और लो .हो गया..अपना दायित्व पूरा....!लेकिन यदि हम थोड़ा सा भी .संजीदा हो तो बहुत कुछ कर सकते है...!हमें अपने जीवन में छोटी छोटी बातों का ध्यान .रखना है..जैसे की एक पेड़ कम से कम जरुर लगाना है !अब ये बहाना की जगह नहीं है,छोड़ना होगा!अपनी पृथ्वी बहुत बड़ी है..आप कहीं पर भी ये शुभ कार्य कर सकते है...!इसके साथ ही जो पेड़ पहले से ही लगे हुए है उनकी रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है..!आज शहर कंक्रीट के जंगल बन गए है,लेकिन फ़िर भी यहाँ कुछ पार्क आदि अभी बचे है,जिन्हें हम सहेज सकते है..!इसके अलावा खुले स्थानों पर गन्दगी फैलाना,कचरा डालना और जलाना,प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग करना..,भूमिगत जल को गन्दा करना आदि अनेक ऐसे कार्य है जिन पर हम स्वत रोक लगा सकते है!लेकिन हम .ऐसा ना करके सरकार के कदम का इंतजार करते है...!आज हम ये छोटे किंतु महत्त्व पूरण कदम उठा कर पर्यावरण सरंक्षण में अपना .अमूल्य योगदान दे .सकते...है...

सोमवार, 1 जून 2009

घर बैठे हो सकेगा एचआईवी परीक्षण

युवा वर्ग एचआईवी संक्रमण को लेकर सदैव सशंकित रहता है। ऐसे में उसके लिए एक अच्छी ख़बर यह है कि एचआईवी संक्रमण का परीक्षण अब घर बैठे किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सिस्टम विकसित किया है, जिससे बिना प्रयोगशाला में जाए और कम दामों में एचआईवी संक्रमण का परीक्षण किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों का दावा है कि नए सिस्टम से सिर्फ 30 मिनट में मरीज यह जान सकेंगे कि वे एचआईवी विषाणु से संक्रमित तो नहीं हैं और इसके लिए प्रयोगशाला में जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने सीडी4 रेपिड परीक्षण सिस्टम का विकास किया है, जिससे व्यक्ति के रक्त में सीडी4प्लस टी कोशिकाओं की संख्या की गणना की जा सकेगी। यह कोशिकाएं शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं। एचआईवी संक्रमण के दौरान यह कोशिकाएं बड़ी संख्या में नष्ट होने लगती हैं, जिससे व्यक्ति आसानी से बीमारियों की चपेट में आ जाता है। शोध में कहा गया है कि बड़ी संख्या में एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त मरीज विकासशील देशों के ऐसे लोग हैं, जो प्रयोगशाला में किया जाने वाला महंगा सीडी4 परीक्षण नहीं करा पाते। वहीं इस परीक्षण का परिणाम आने में कई सप्ताह का समय लगता है, जिसके चलते ग्रामीण इलाकों के मरीजों के लिए यह प्रक्रिया आसान नहीं होती। नया सिस्टम इस परेशानी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।