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शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

ब्लागर, साहित्यकार, प्रशासक के.के. यादव के निदेशक बनने पर ससम्मान विदाई

कानपुर मण्डल के प्रवर डाक अधीक्षक, चीफ पोस्टमास्टर एवं प्रवर रेलवे डाक अधीक्षक पदों का दायित्व निरवाहन कर चुके कृष्ण कुमार यादव को डर्बी रेस्टोरेंट, दि माल में आयोजित एक भव्य समारोह में भावभीनी विदाई दी गई। गौरतलब है कि श्री यादव का प्रमोशन निदेशक पद के लिए हो गया है और वे अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएं रुप में अपना नया पद ज्वाइन करने जा रहे हैं। एक प्रशासक के साथ-साथ साहित्यकार के रूप में चर्चित श्री यादव की इस विदाई की गवाह नगर के तमाम प्रमुख साहित्यकार, बुद्विजीवी, शिक्षाविद, पत्रकार, अधिकारीगण एवं डाक विभाग के तमाम कर्मचारी बने।


डर्बी रेस्टोरेंट में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर ने कहा कि प्रशासन के साथ-साथ साहित्यिक दायित्वों का निर्वहन बेहद जटिल कार्य है पर श्री कृष्ण कुमार यादव ने इसका भलीभांति निर्वहन कर रचनात्मकता को बढ़ावा दिया। गिरिराज किशोर ने इस बात पर जोर दिया कि आज समाज व राष्ट्र को ऐसे ही अधिकारी की जरूरत है जो पदीय दायित्वों के कुशल निर्वहन के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं से भी अपने को जोड़ सके। जीवन में लोग इन पदों पर आते-जाते हैं, पर मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसकी विराटता का परिचायक होता है। मानस संगम के संयोजक डॉ0 बद्री नारायण तिवारी ने कहा कि बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, रचनाशीलता के पर्याय एवं सरस्वती साधक श्री यादव जिस बखूबी से अपने अधीनस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों से कार्य लेते हैं, सराहनीय है। अपने निष्पक्ष, स्पष्टवादी, साहसी व निर्भीक स्वभाव के कारण प्रसिध्द श्री यादव जहाँ कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार अधिकारी की भूमिका अदा कर रहे हैं, वहीं एक साहित्य साधक एवं सशक्त रचनाधर्मी के रूप में भी अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। विशिष्ट अतिथि के रुप में उपस्थित टी0आर0 यादव, संयुक्त निदेशक कोषागार, कानपुर मण्डल ने एक कहावत के माध्यम से श्री यादव को इंगित करते हुए कहा कि कोई भी पद महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि उसे धारण करने वाला व्यक्ति अपने गुणों से महत्वपूर्ण बनाता है। एक ही पद को विभिन्न समयावधियों में कई लोग धारण करते हैं पर उनमें से कुछ पद व पद से परे कार्य करते हुए समाज में अपनी अमिट छाप छोड़ देते हैं, के0के0 यादव इसी के प्रतीक हैं। समाजसेवी एवं व्यवसायी सुशील कनोडिया ने कहा कि यह कानपुर का गौरव है कि श्री यादव जैसे अधिकारियों ने न सिर्फ यहां से बहुत कुछ सीखा बल्कि यहां लोगों के प्रेरणास्त्रोत भी बने।

वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ0 राष्टबन्धु ने अपने अनुभवों को बांटते हुए कहा कि वे स्वयं डाक विभाग से जुड़े रहे हैं, ऐसे में के0के0 यादव जैसे गरिमामयी व्यक्तित्व को देखकर हर्ष की अनुभूति होती है। सामर्थ्य की संयोजिका गीता सिंह ने कहा कि बहुआयामी प्रतिभा सम्पन्न श्री यादव अपने कार्यों और रचनाओं में प्रगतिवादी हैं तथा जमीन से जुडे हुए व्यक्ति हैं। उत्कर्ष अकादमी के निदेशक डॉ0 प्रदीप दीक्षित ने कहा कि श्री के0के0 यादव इस बात के प्रतीक हैं कि साहित्य हमारे जाने-पहचाने संसार के समानांतर एक दूसरे संसार की रचना करता है और हमारे समय में हस्तक्षेप भी करता है। जे0के0 किड्स स्कूल के प्रबन्धक इन्द्रपाल सिंह सेंगर ने श्री यादव को युवाओं का प्रेरणास्त्रोत बताया।

के0के0 यादव पर संपादित पुस्तक ''बढ़ते चरण शिखर की ओर'' के संपादक दुर्गाचरण मिश्र ने कहा कि उनकी नजर में श्री यादव डाक विभाग के पहले ऐसे अधिकारी हैं, जिन्होंने नगर में रहकर नये कीर्तिमान स्थापित किये। इसी कारण उन पर पुस्तक भी संपादित की गई। चार साल के कार्यकाल में श्री यादव ने न सिर्फ तमाम नई योजनाएं क्रियान्वित की बल्कि डाकघरों के प्रति लोगों का रूझान भी बढ़ाया। प्रेस इन्फारमेशन ब्यूरो इंचार्ज एम0एस0 यादव ने आशा व्यक्त की कि श्री यादव जैसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों के चलते लोगों का साहित्य प्रेम बना रहेगा। नगर हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ0 एस0पी0 शुक्ल ने श्री यादव को भावभीनी विदाई देते हुए कहा कि कम समय में ज्यादा उपलब्धियों को समेटे श्री यादव न सिर्फ एक चर्चित अधिकारी हैं बल्कि साहित्य-कला को समाज में उचित स्थान दिलाने के लिए कटिबध्द भी दिखते हैं। चर्चित कवयित्री गीता सिंह चौहान ने श्री यादव की संवेदनात्मक अनुभूति की प्रशंसा की।

सहायक निदेशक बचत राजेश वत्स ने श्री यादव के सम्मान में कहा कि आप डाक विभाग जैसे बड़े उपक्रम में जो अपने कठोर अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा व ईमानदारी के लिए प्रसिध्द है, में एक महत्वपूर्ण तथा जिम्मेदार-सजग अधिकारी के रूप में अपनी योग्यता, कुशाग्र बुध्दि और दक्षता के चलते प्रशासकीय क्षमता के दायित्वों का कुशलता से निर्वहन कर रहे हैं। जिला बचत अधिकारी विमल गौतम ने श्री यादव के कार्यकाल के दौरान महत्वपूर्ण उपलब्धियों को इंगित किया तो सेवानिवृत्त अपर जिलाधिकारी श्यामलाल यादव ने श्री यादव को एक लोकप्रिय अधिकारी बताते हुए कहा कि प्रशासन में अभिनव प्रयोग करने में सिध्दस्त श्री यादव बाधाओं को भी चुनौतियों के रूप में स्वीकारते हैं और अपना आत्म्विश्वास नहीं खोते।

अपने भावभीनी विदाई समारोह से अभिभूत के0के0 यादव ने इस अवसर पर कहा कि अब तक कानपुर में उनका सबसे लम्बा कार्यकाल रहा है और इस दौरान उन्हें यहाँ से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। यहाँ के परिवेश में न सिर्फ मेरी सृजनात्मकता में वृध्दि की बल्कि उन्नति की राह भी दिखाई। श्री यादव ने कहा कि वे विभागीय रूप में भले ही यहाँ से जा रहे हैं पर कानपुर से उनका भावनात्मक संबंध हमेशा बना रहेगा।

श्री के0के0 यादव की प्रोन्नति के अवसर पर नगर की तमाम साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं द्वारा अभिनन्दन एवं सम्मान किया गया। इसमें मानस संगम, उ0प्र0 हिन्दी साहित्य सम्मेलन युवा प्रकोष्ठ, विधि प्रकोष्ठ, सामर्थ्य, उत्कर्ष अकादमी, मानस मण्डल जैसी तमाम चर्चित संस्थाएं शामिल थीं। कार्यक्रम की शुरूआत अनवरी बहनों द्वारा स्वागत गान से हुई। स्वागत-भाषण शैलेन्द्र दीक्षित, संचालन सियाराम पाण्डेय एवं संयोजन सुनील शर्मा द्वारा किया गया।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

सरस्वती न सही लक्ष्मी तो मेहरबान है!

(एक दैनिक पत्र के ऑन-लाइन संसकरण में प्रकाशित इस वैचारिक-समाचार को पढ़ें और सोचें कि क्या ऐसे लोग ही इस देश का उद्धार कर सकेंगें ?)

शुरुआत करते हैं अक्षय प्रताप सिंह से। एक राजघराने से ताल्लुक रखते हैं। प्रतापगढ़ के सांसद भी रहे हैं और बुधवार को वह राज्य के उच्च सदन के लिए निर्वाचित हुए हैं। कई महंगी कारें उनके पास हैं, जिसमें पजेरो, बैलेनो, टाटा सफारी, स्विफ्ट शामिल हैं। हाथ में वह जो अंगूठी और गले में जो सोने की चेन पहनते हैं, उसकी कीमत भी पौने तीन लाख रुपये है। पत्‍‌नी के जेवर और उनके नाम तमाम-दूसरी जमीन जायदाद की कीमत जोड़ी जाए तो वह करोड़पतियों की सूची में आते हैं। उनकी हैसियत जानकर लोगों को उतना आश्चर्य नहीं होगा, जितना यह जानकार कि वह सिर्फ कक्षा नौ पास हैं। बस्ती-सिद्धार्थनगर से जीते मनीष जायसवाल को आप अरबपति मान सकते हैं। वह एक बड़े व्यवसाई हैं। जिस रोज उन्होंने नामांकन दाखिल किया था, उनके पास कैश इन हैण्ड 50 लाख रुपये था। पत्‍‌नी के पास 30 लाख रुपये। पत्‍‌नी के पास जेवर ही एक करोड़ रुपये का है। लगभग 30 करोड़ रुपये के तो उनके पास शेयर हैं। बस्ती में दो बड़े होटल हैं, जिनकी कीमत एक करोड़ रुपये है। लखनऊ में 25 लाख रुपये की कीमत का एक प्लाट है। 30 लाख रुपये कीमत का एक फ्लैट है। बस्ती में 30 लाख रुपये की जमीन है। दस लाख रुपये का एक मकान है। एलआईसी पालिसी, एफडी, पांच-पांच महंगी गाड़िया। अब आप उनकी हैसियत का अंदाजा खुद लगा सकते हैं लेकिन इतने बड़े व्यवसाई की शैक्षिक योग्यता सिर्फ हाईस्कूल है।

वाराणसी से चुनाव जीती हैं अन्नपूर्णा सिंह। कक्षा नौ पास हैं। उनकी शैक्षिक योग्यता देखकर आप कह सकते हैं कि वह बहुत घरेलू महिला होंगी लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि वह शेयर में भी पैसे लगाती हैं और सम्पत्तियों की खरीद-फरोख्त में भी। यह भी बताते चलें कि वह डान बृजेश सिंह की पत्‍‌नी हैं। छह लाख रुपये उनके पास कैश इन हैण्ड है। बैंक में उनके नाम से दस लाख रुपये के आस पास जमा है। जेवर, शेयर और उनके नाम जमीन-जायदाद है, उसकी कीमत उन्हें करोड़पति की श्रेणी में रखती है। अब जैसे मुबंई, वाराणसी और इलाहाबाद में उनके तीन फ्लैट ही हैं। मुंबई वाला फ्लैट 41 लाख का है। वाराणसी वाले की कीमत 20 लाख है तो इलाहाबाद वाले की 32 लाख। दो करोड़ रुपये की उनके पास कृषि योग्य भूमि है। 35 लाख के उनके पास जेवर हैं और 50 लाख रुपये की एलआईसी स्कीम चल रही है।

बांदा-हमीरपुर से चुनाव जीती हुस्ना सिद्दीकी प्रदेश सरकार के लोक निर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पत्‍‌नी हैं। उनके बैंक एकाउंट में ही लगभग साठ लाख रुपये जमा हैं। उनके पास जो सोने के जेवर हैं, उनकी कीमत भी 64 लाख रुपये के करीब है। 19 किलो तो चांदी ही उनके पास है। 20 लाख रुपये एनएससी वगैरह में लगे हैं। तमाम दूसरी सम्पत्तियों की कीमत उन्हें कई करोड़ का मालिक बनाती है लेकिन वह सिर्फ आठवीं तक पढ़ी हैं। मुजफ्फरनगर से चुनाव जीते मुहम्मद इकबाल के बैंक एकाउंट में सवा करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हैं। 12 लाख रुपये तो कैश इन हैण्ड हैं। जिस गाड़ी से चलते हैं, उसकी कीमत 30 लाख रुपये से ऊपर की है। उनके देनदार एक करोड़ 30 लाख रुपये के हैं। 90 लाख रुपये की तो उनके पास गैर कृषि योग्य भूमि और 80 लाख रुपये की कृषि योग्य भूमि है। 65 लाख रुपये की कीमत के उनके मकान और दुकान हैं। 26 लाख रुपये शेयर में लगे हैं और 28 लाख रुपये की एलआईसी पालिसी है। इतने पैसे वाले मुहम्मद इकबाल की शैक्षिक योग्यता सिर्फ जूनियर हाईस्कूल है।

कानपुर-फतेहपुर से जीते अशोक कटियार भी करोड़पति हैं। फोर्ड, इनोवा, वर्ना जैसी महंगी गाड़िया उनके पास हैं। लखनऊ, देहरादून सहित कई शहरों में उनके नाम सम्पत्ति है। लखनऊ में गोमतीनगर में जो प्लाट है, उसकी कीमत 31 लाख रुपये है लेकिन अशोक कटियार की शैक्षिक योग्यता सिर्फ कक्षा आठ है। मुरादाबाद-बिजनौर सीट से चुनाव जीतने वाले परमेश्वर लाल का भी कुछ ऐसा ही हाल है। वह सिर्फ कक्षा पांच पास हैं।

मथुरा-एटा-मैनपुरी से चुनाव जीतने वाले लेखराज, उनकी पत्‍‌नी और पुत्रों के नाम सम्पत्ति की कीमत को अगर जोड़ा जाए तो वह करोड़पति हैं लेकिन सिर्फ हाई स्कूल पास हैं। बहराइच से चुनाव जीतने वाले माधुरी वर्मा सिर्फ साक्षर हैं। यानी कि वह सिर्फ वह अपने हस्ताक्षर कर सकती हैं। उनके पति बहराइच से पूर्व विधायक हैं। माधुरी वर्मा के नाम लखनऊ में एक प्लाट है, जिसकी कीमत सात लाख रुपये है। नानपारा में उनके नाम जो खेत हैं, उसकी कीमत छह लाख रुपये हैं। अलीगढ़ से चुनाव जीतने वाले मुकुल उपाध्याय काबीना मंत्री रामवीर उपाध्याय के भाई हैं। वह सिर्फ हाईस्कूल तक पढ़े हैं। आजमगढ़ से चुनाव जीते कैलाश भी करोड़पति हैं लेकिन वह भी सिर्फ हाईस्कूल पास हैं।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

भारत के पहले मुस्लिम देहदानीः अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’

दान से पुण्य कोई कार्य नहीं होता। दान जहाँ मनुष्य की उदारता का परिचायक है, वहीं यह दूसरों की आजीविका चलाने या किसी सामूहिक कार्य में संकल्पबद्ध होकर अपना योगदान देने की मानवीय प्रवृति को दर्शाता है। राजा हरिश्चन्द्र को उनकी दानवीरता के लिए ही जाना जाता है। महर्षि दधीचि जैसे ऋषिवर ने तो अपनी अस्थियाँ ही मानव के कल्याण हेतु दान कर दीं। महर्षि दधीचि ने मानवता को जो रास्ता दिखाया आज उस पर चलकर तमाम लोग समाज एवं मानव की सेवा में जुटे हुए हैं। देहदान के पवित्र संकल्प द्वारा दूसरों को जीवन देने का जज्बा विरले लोगों में ही देखने को मिलता है। चूँकि मनुष्य के देहान्त पश्चात की परिस्थितियां मानवीय हाथ में नहीं होती, अतः विभिन्न धर्मों में इसे अलग-अलग रूप में व्याख्यायित किया गया है। धर्मों की परिभाषा से परे एक मानव धर्म भी है जो सिखाता है कि जिन्दा होकर किसी व्यक्ति के काम आये तो उत्तम है और यदि मृत्यु के बाद भी आप किसी के काम आये तो अतिउत्तम है।

हाल ही में विष्णु प्रभाकर एवं प्रतीक मिश्र जैसे वरेण्य साहित्यकारों ने जिस प्रकार मृत्यु के बाद भी देहदान द्वारा लोगों को शिक्षित एवं जागरुक किया है, वह स्तुत्य है। वस्तुतः आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान व नेत्रदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है। हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है। इसी परम्परा में भारतवर्ष में तमाम लोग नेत्रदान-देहदान की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मरने के बाद हाथी के दांँतांे से कामोत्तेजक औषधियाँ एवं खिलौने, जानवरों की खाल से चमड़ा बनता है, उसी प्रकार से इन्सान भी मृत्यु के बाद 4 नेत्रहीनों को नेत्रज्योति, 14 लोगो को अस्थियाँ व हजारों मेडिकल छात्रों को चिकित्सा शिक्षा दे सकता है। दान की हुई आँखें तीन पीढ़ी तक काम आती हैं। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-
हाथी के दाँत से खिलौने बने भाँति-भाँति
बकरी की खाल भी पानी भर लाई
मगर इंसान की खाल किसी काम न आई


आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है, फिर चाहे वह किसी भी जाति या धर्म के हों। इसी परिपाटी में एक ऐसा युवक उभर कर सामने आया है, जिसने रूढ़ियों को तोड़कर समाज को नई राह दिखाई है। अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’ नामक यह 23 वर्षीय युवक भारत का प्रथम मुस्लिम देहदानी है। मूलतः कायमगंज, जिला फर्रूखाबाद (उ0प्र0) के इस होनहार युवक ने लीक से हटकर धार्मिक मान्यताओं के विपरीत दूसरों के लिए देहदान (नेत्रदान, रक्तदान, अस्थिदान भी) करके इंसानियत की एक नई मिसाल कायम की है। बकौल अरशद मंसूरी-‘‘परम्परागत रूढ़ियों से परे मेरे इस ऐतिहासिक कारनामे से तमाम उलेमा, धार्मिक नेता व कट्टरपंथी वर्ग नाराज हो गये और मेरे इस कार्य का पुरजोर विरोध करने लगे। यही नहीं मेरे खिलाफ फतवा जारी करने की धमकी दे डाली तथा देहदान करने के निर्णय को वापस लेकर माफी मांगने को कहा, किन्तु मैं अपने संकल्प पर दृढ़ रहा और मानव धर्म को सर्वोपरि धर्म बताते हुए इन तथाकथित विरोधियों से भी नेत्रदान व देहदान की मार्मिक अपील कर डाली।‘‘

कानपुर विश्वविद्यालय में बी0फार्मा0 तृतीय वर्ष के मेडिकल छात्र एवं विगत 6 वर्षो से समाजसेवा में समर्पित अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट‘ के देहदान व नेत्रदान कार्यो से उनके रिश्तेदार यहाँ तक कि घर वाले भी खिलाफ हो गये। इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल इण्डिया टीवी का एक प्रेस रिपोर्टर अनिल वर्मा शेखर, जब अरशद मंसूरी का इंटरव्यू लेने उनके घर कायमगंज(फर्रूखाबाद) पहुँचा, तो अरशद के पिता अल्लाहदीन ने उस प्रेस रिपोर्टर को ही अपमानित करके घर से भगा दिया। उन्हें यह डर था कि मीडिया में यह प्रकरण आ जाने से पूरे देश में उनका विराध होने लगेगा और उनके खिलाफ फतवा जारी होने में देर न लगेगी।

फिलहाल अरशद मंसूरी अपने इस नेक कार्य से प्रसन्न हैं एवं मानते हैं कि यह कार्य उन्होंने लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं किया बल्कि इसलिए किया कि लोग (मुस्लिम सम्प्रदाय के व्यक्ति भी) उनसे प्रेरित होकर नेत्रदान व देहदान जैसे पुण्य कार्यो में आगे आयें। आंकड़ों की बदौलत धारदार तर्क देते हुए जब यह नवयुवक कहता है कि- ‘‘हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है और मैंने इसी परिस्थित को देखकर अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर लोगों के हक में देहदान व नेत्रदान का यह फैसला लिया।‘‘ लोगों से मिल रहे प्रोत्साहन से यह नवयुवक अभिभूत है और 'दृष्टि- एक प्रयास' नामक पुस्तक भी लिख रहा है। लोगो के अन्दर खत्म होती इंसानियत को देखकर यह नवयुवक व्यथित हो जाता हैं और कहता है कि डाॅक्टर, इंजीनियर बनने की तरह इंसान को इंसान बनाने के लिए भी शिक्षा देनी चाहिए। अरशद की कर्तव्यनिष्ठा देखकर किसी शायर के शब्द याद आते हैं-

'एक ऐसा मजहब चलाना होगा.
जिसमें इंसान को इंसान बनाना होगा।।'

बुधवार, 13 जनवरी 2010

युवा दिवस :सिर्फ मनाने को ??



विवेकानंद जी के जन्म दिन को पूरे देश में युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है !पर सिर्फ नाम को!अब देखिये न हॉकी के युवा खिलाडी अपने पैसे को लेकर हड़ताल कर रहे है और सरकार उन्हें निकलने की धमकी दे रही है!देश के राष्ट्रीय खेल 'हॉकी" को शीर्ष पर पहुँचाने वाले खिलाडियों की राष्ट्र भावना पर सवाल खड़े किये जा रहें है!हमें तो इन युवा खिलाडियों पर गर्व होना चाहिए जिन्होंने क्रिकेट के इस युग में हॉकी को चुना! क्रिकेट में बरस रहा धन हर किसी को आकर्षित करता है,पर ये युवा उसी को चुनते है!तो क्या हमारा,सरकार का या किसी का भी कोई कर्त्तव्य नहीं की हम इनका समर्थन करें?ये आर्थिक भी हो सकता है और नैतिक भी!यदि देश में हॉकी को बचाना है तो कुछ करना ही होगा! विवेकानंद जयंती पर हमें संकल्प लेना चाहिए की हम हॉकी को,राष्ट्रीय खेल को बचने का दिल से प्रयास करेंगे..!
                             हॉकी को यदि बचाना है तो हमें स्कूल स्तर पर ही शुरुआत करनी होगी!इसके लिए क्रिकेट की तरह ही खेल आयोजन करने चाहिए,जिसमे विभिन्न देशों की टीमों को बुलाया जाये!हॉकी से अच्छे प्रायोजकों को भी जोड़ना होगा ताकि धन की कमी ना आये!युवाओं को भी क्रिकेट का आकर्षण छोड़ हॉकी को अपनाना चाहिए!तभी हॉकी बचेगी...

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

लजीज व्यंजन के साथ पर्यावरण ज्ञान परोसता रेस्टोरेंट

क्या आपने कभी किसी ऐसे रेस्टोरेंट के बारे में सुना या पढ़ा है, जहां खाना तो लजीज मिलता ही है लेकिन इसके बाद एक अनूठी स्वीट डिश भी फ्री आफ कास्ट स्वयं होटल मालिक द्वारा परोसी जाती है। स्वीट डिश भी ऐसी कि इससे पेट नहीं ज्ञान की भूख शांत होती है। यह अनूठी स्वीट डिश है पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां, जिन्हें ग्रहण करना प्रत्येक कस्टमर के लिए आवश्यक है। उत्तराखंड केगोपेश्वर, चमोली में स्थित इस अनूठे रेस्टोरेंट का नाम है 4875-दि कैफे, जिसे खोलने का मकसद व्यवसाय नहीं, बल्कि लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है।

मुंबई निवासी एक सेवानिवृत्त आर्मी अफसर ब्रिगेडियर एसके त्रिखा की 22 वर्षीया इकलौती बेटी निखिला त्रिखा इस अनूठे रेस्टोरेंट की मालिक भी है और वेटर भी। यहां आने वाले हर ग्राहक को लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाने के साथ-साथ अनिवार्य रूप से उसका लेक्चर भी सुनना पड़ता है। रेस्टोरेंट से हो रही कमाई को वह अपनी जरूरतों पर नहीं, बल्कि पर्यावरण को बचाने में खर्च कर रही है। आपदा प्रबंधन और पहाड़ों से युवाओं का पलायन रोकना भी उसके लेक्चर का हिस्सा रहते हैं।

दरअसल, कुछ वर्ष पूर्व निखिला उत्तराखंड भ्रमण पर आई थी, तो यहां पर्यावरण की बदहाल स्थित देख द्रवित हो उठीं। पहाड़ों से बड़े पैमाने पर हो रहे युवाओं के पलायन ने भी उसे झकझोर कर रख दिया। इसी बीच वह अपने एक स्कूलमेट पुष्पेंद्र सिंह रावत के संपर्क में आई और दोनों ने उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण का बीड़ा उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने वर्ष 2007 में 'पीस ट्रस्ट' नामक संस्था का गठन किया, जिसके तहत पुष्पेंद्र विभिन्न स्कूलों में कार्यक्रम प्रस्तुत कर छात्रों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे हैं, जबकि घर-परिवार से दूर आकर निखिला ने जिला मुख्यालय गोपेश्वर से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित घिंघराण गांव में '4875-दि कैफै' नाम का एक रेस्टोरेंट खोला। घिंघराण गांव में एक छोटे से माल्टा के बगीचे में उसने मात्र 16 हजार की लागत से यह रेस्टोरेंट खोला है, जिसमें सूखे पेड़ों की डाटें फर्नीचर के रूप व्यवस्थित हैं। यहां आने वाले ग्राहकों को निखिला आन डिमांड अपने हाथ से बनाए लजीज व्यंजन परोसती हैं, लेकिन बातों-बातों में वो उन्हें पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाना नहीं भूलती। स्टाइल उनका ऐसा कि ग्राहकों की क्लास भी लग जाती है और उन्हें खलती भी नहीं। निखिला कहती हैं कि यदि हम हिमालय को सुरक्षित रखेंगे, तो ही हिमालय भी हमारी सुरक्षा करेगा।

इतना ही नहीं, उनका यह रेस्टोरेंट रोजगार के नाम पर पहाड़ों से पलायन कर रहे युवाओं के लिए भी नजीर है। दो वर्ष के दौरान निखिला और पुष्पेंद्र सारे गांव के आस-पास पांच हजार फूल और फल के पेड़ लगा चुके हैं। इसके अलावा, सिद्घपीठ तुंगनाथ के मार्ग पर भी वे दर्जनों डस्टबिन भी स्थापित कर चुके हैं।

सोमवार, 4 जनवरी 2010

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा कृष्ण कुमार यादव को ‘’ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2009‘‘

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2009‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। इसके अलावा आल इण्डिया नवोदय परिवार के इलाहाबाद में सम्पन्न हुए कार्यक्रम में श्री यादव को अखिल भारतीय स्तर पर साहित्यिक योगदान हेतु भी सम्मानित किया गया है। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में कानपुर मण्डल के वरिष्ठ रेलवे डाक अधीक्षक पद पर कार्यरत हैं एवं तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रखरता से लेखन के साथ-साथ उनकी विभिन्न विधाओं में 5 पुस्तकें भी प्रकाशित हैं।

साहित्य के क्षेत्र में नई बुलन्दियों को छू रहे 32 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री कृष्ण कुमार यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुतगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु हाल ही में आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर कृष्ण कुमार यादव‘‘ भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें तमाम संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी से भी उनकी कविताएं तरंगित होती रहती हैं।

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व श्री कृष्ण कुमार यादव को नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘,ं खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘ मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘ मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘ साहित्य का रत्न, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा श्विवेकानन्द सम्मानश्, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा श्महिमा साहित्य भूषण सम्मानश् इत्यादि तमाम सम्मानों से से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को इस सम्मान हेतु बधाईयाँ।

शनिवार, 2 जनवरी 2010

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र को कनाडा का सर्वोच्च नागरिक सम्मान

कनाडा में भारतीय मूल के वैज्ञानिक श्रवण कुमार को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा गया है। इस सम्मान को 'द आर्डर ऑफ कनाडा' कहा जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1967 में की गई थी। गत 40 वर्षो में यह पुरस्कार 5,000 से अधिक लोगों को दिया जा चुका है। यूनीवर्सिटी ऑफ अलबर्टा में तीन दशकों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय शोध कार्य के लिए श्रवण कुमार को गुरुवार को सम्मानित किया गया।

श्रवण कुमार का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की थी। श्रवण कुमार वर्ष 1971 से 1973 तक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से जुड़े रहे। श्रवण कुमार वर्ष 1977 में यूनीवर्सिटी ऑफ अलबर्टा से जुड़े। उन्होंने दो वर्ष पूर्व इस विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण किया। फिलहाल वह नार्थ टेक्सास विश्वविद्यालय से जुड़े है। कनाडा के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हासिल करने से श्रवण कुमार काफी खुश है।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव !

******आप सभी को नववर्ष-2010 की ढेरों शुभकामनायें******

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।

नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

(हरिवंशराय बच्चन जी के संग्रह सतरंगिनी से साभार)