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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

मुखियाजी

भैयाजी
कल मेरा ऑपरेशन है
मुखियाजी की सुन आवाज मैं
अतीत से वर्तमान में आया
मैंने उनको बैठक में बिठाया
कुछ व्यस्तता ऐसी थी की
कई दिनों से उनसे
मुलाकात हो नहीं पाया

वस्तुतः मुखियाजी एक युवा वृद्ध थे
पूरी जीवटता व तन्मयता से
सुरक्षा गार्ड का कार्य करते हुए
खुद्दारी से काफी दिनों से हमारे
आवास के पास ही रह रहे थे
कई वर्षों से गाँव को छोड़
शहर में ही बस गए थे
गाँव घर की चर्चा आने पर
एकाएक उदास हो जाते थे
मानो किसी ने रख दिया हो
उनकी दुखती राग पर हाथ
अचानक छोड़ हमारा साथ
बैठक से उदास चले जाते थे
मोहल्लेवालों के हर सुख दुःख में
बड़े ही लगन से अपनी
उपस्थिति दर्ज कराते थे
न जाने कौन सा अनकहा दर्द
उन्हें अनवरत सालता था
जिससे उन्हें गाँव से दूर
रहना ही भाता था
माँ की याद आने पर अचानक
ही उदास हो जाते थे
परिवार और बच्चो के बारे में
सोच अतीत में खो जाते थे
कुल मिलकर अपने आप में
एक अजीम सख्सियास थे
मानवीय सभ्यता और भारतीय
संस्कृति को समेटे हमें
अत्यंत ही प्रिय लगते थे

इधर कई दिनों से उनका
स्वास्थ्य ख़राब चल रहा था
कभी पेट तो कभी पैर
परेशान किया करता था
मेरे भी काफी दावा आदि करने पर
परेशानी कम नहीं हो रही थी
जाँच कराने पर डाक्टर ने
आंत उतरने की बीमारी कह
ऑपरेशन की सलाह दी थी
किसी तरह जुगाड़ कर उनके सुपरविजर ने
उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया
कुछ आर्थिक सहयोग हमने भी कर दिया

ऑपरेशन के उपरांत उनका पहला फोन
मेरे पास ऑफिस में आया
भैया आइबा न का हमके देखे
कहते उनका आवाज भर्राया
शाम को ऑफिस से सीधे मैं अस्पताल गया
देख बिस्तर पर एक छोटे बच्चे के साथ
उनको खेलते मेरा दिल भर आया
मुझे देख उनकी बाछें खिल गयी
आ गए भैया कहते
उनकी आंखे भर गयी

कितने लोग यहाँ भर्ती है
सबको नित्य कितने ही
देखने आते होगें
साथ में फल मेवे और
मिठाइयाँ भी साथ लाते होंगे
पर यहाँ कौन आया होगा
कौन इन्हे भाया होगा
घरवालों को तो पता ही नहीं होगा
कि मुखियाजी ने ऑपरेशन करवाया होगा

दुसरे बिस्तरों पर देख भीड़ क्या
इनका दिल भर नहीं आया होगा
पर अपने मिलनसारिता से उन्होंने
पूरे वार्ड को अपना परिवार बना डाला था
मुझे देख आँखों के कोरो से
ढुलकते आंसुओं ने
उनकी सारी व्यथा कह डाला था
दिल के अनकहे दर्द को
दिल में ही छिपा लिया था
सभी लोगो से एक अंजान
रिश्ता बना लिया था
दूसरों के बच्चे दादा दादा कह
उनकी गोद में उछलते थे
मिलाजुला कर सभी
उनका ख्याल रखते थे

पर इस सच्चाई से भी सभी परिचित थे
कि गैर रख ले कितना भी ख्याल
पर अपने तो अपने ही होते है
इस बात को मुझे देख
उनकी भाव भंगिमाओं ने दर्शाया
जिसने मुझे मेरे कुछ और
दायित्वों का अहसास कराया
कुछ देर बैठ वहां धीरे से
उनकी मुठ्ठी में कुछ थमाया
पुनः इस अपरिभाषित रिश्तों के
बारे में सोचते थके कदमो और
भारी मन से मैं घर लौट आया

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

दिखेगा आज भी बसंत परिपूर्ण

पप्पू तनी जल्दी से
नहाय धोई लो
पीला पजामा कुरता बकस मा रखा है
उसे पहिन लो
तनी खेतन से सरसों कई
पियरका फूल लई आयों
मंदिर चले के बा
पंडित जी का बुलावा आवा रहा
पूजन क मुहूरत निकल जइये
एहिलिये जल्दी करयो

सुबह सुबह माँ के इस
अनुनय से निद्रा भंग हुई
सुबह संग हुई
जागने पर देखा तो न माँ थी
न माँ का कोई अनुनय
रसोई से पत्नी करती रिक्की से विनय
बाबू जल्दी से तैयार हो लो
स्कूल की बस आ गयी होगी
यह टिफिन बैग में रख लो
अरे आप भी न जल्दी उठिए
ऑफिस नहीं जाना है क्या
चलिए तैयार होइए
मैंने कहा प्रिये क्यों उठा दिया
एक प्यारे सपने से क्यों जगा दिया
अपना प्यारा बचपन और बचपन का
प्यारा बसंत देख रहा था
उसमे मैं तुमको रीतिकालीन
नायिका के रूप में तलाश रहा था
कहते पुनः अपने अतीत के
स्वप्न में खो गया था

बसन्त ने देखे है कितने आयाम
त्रेतायुगीन बसंत था जहाँ निष्काम
वही द्वापर के बसंत में व्याप्त थी
चिरंतन सत्य और कर्मयोग से
पूरित कृष्ण की योगलीला
गोपियों की वेदना व विरहपिदा
मगध्कालीन बसंत बसंतसेना
और बसंतोत्सव से था परिपूर्ण
जिससे आज का बसंत है बेशक अपूर्ण
कालांतर में बसंत को सूर के बाद
पद्माकर और केशवदास ने गहनता से देखा
महादेवी पन्त आदि ने तो इसकी
खींच दी जीवनरेखा
भ्रमर का गुंजन कोयल की कूक
पनघट की नायिका को देखते हम मूक
वेदना विरही नायिका की
उठाती हिय में हूक
उन्माद में डूबी प्रेयसी
महकती फूलो का गुच्छा
झर झर बहते हुए झरने
कल कल करती नदियाँ
दृश्य था मनोरम कितना अच्छा
पहाड़ो का सौंदर्य अप्रितम
आमंत्रण देती अमावस की रातें भी तम
बासंती बयार कर देती
प्रेमियों को मदहोश
परागित पंखुडिया और सौरभ की
भीनी सुगंध उड़ाती हमारे होश
बृक्षों से गिरते पत्तों की लड़ियाँ
पुनः जीवन को जीवंत करती
नन्हे फूल और कोमल पत्तियां

एकबारगी हमें लगता है
हमारे संपन्न प्यारे अतीत का सौरभ बसंत
नित पा रहा है कंक्रीट के
जंगलों में असमय अपना अंत
ध्यान से परखने पर हम पाते है
बसंत की जीवन्तता को
दुसरे रूपों में देखते है
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत सत्य है
बसंत भी इससे अछूता नहीं है
बसंत आज भी विद्यमान है
उसका पूर्ण सौंदर्य आज भी विराजमान है
फर्क बस इतना है कि
इसके प्रारूप बदल गए है
नए प्रतिमान सज रहे है
आओ देखे बसंत के बदलते
रूपों और प्रतिमानों को
इसके नए पैमाने को
स्कूल कि बजते ही बेल
तमाम बच्चों के आह्लादित मुखमंडल
और खुशियों से भरी रेलमरेल
हर बच्चा एक फूल और स्कूल
उपवन सा दिखता है
बच्चों से भरा आंगन
मधुवन सा दिखता है
साथही बसंत कालेज के परिसरों में
भी सिद्दत से दिखता है
जो हमें अनायास ही खिचता है
जहाँ पर प्रकृति ने पहाड़ो झरनों
व बागों से बासंती उल्लास को
बाहर निकाल बिखेरा है यैवन का
सौंदर्य अनुपम
कराती शोख चंचल अदाओ के दर्शन
मल्तिकोम्प्लेक्स में युवाओं के मेले
रंगीन माडर्न ड्रेस्सों से घिरे
चाट चाव्मिन और स्नेक्स के ठेले
आर्चिज गैलेरी में दिखते युवा
बसंत के पर्याय को चुनते
तमाम मोहक कार्डो पर इठलाते झूमते
बड़े बड़े पेंटिंग के रूप में
ड्र्यिंग रूम में सजते
आज भी प्रयासरत दीखता है बसंत
अपना अस्तित्वा बचाते
बसंत कहीं खोया नहीं है
पर परिवर्तन कि शाश्वत अवधारणा
से भी अछूता नहीं है
सौंदर्य उर्जा और नूतन
ताजगी से परिपूर्ण
दिखेगा आज भी बसंत संपूर्ण

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

अधूरा घोंसला

अपने
घोसले का निर्माण
करने में तल्लीन नर
एक एक तिनका चुन चुन कर लाता
मादा गौरैया के चोच में थमाता
पुनः और तिनके की तलाश में
सुदूर जंगलों में चला जाता
मादा उन तिनको को
घोसले में सजाती

अपने प्रियतम को प्यार से निहारती
सुखद भविष्य की कल्पना से ओत प्रोत
प्यार से उसकी बलैया लेती
अनवरत श्रम से थकने पर
उसे अपने नाजुक पंखों से हवा कर
एक मादक अदा से इठलाती
पुनः आने वाले जीव के
बारे में सोच सपनों में खो जाती
कुछ तिनका इस प्रक्रिया में
नीचे गिर गया था
घोसला बनाने के ही करीब था
मादा ने कहा प्रियतम तुम थक गए हो
इतना दूर न जाकर
क्यों नहीं इन गिरे तिनके को लाते हो
व्यर्थ में पसीना अब क्यों बहाते हो
अब तो घोसला भी तैयार है
देखो कितनी अच्छी बसंती बयार है
आओ जल्दी से इसे पूरा करे
फिर आराम से बैठ अपने
घोसले में भोजन करें

थक चुके नर ने
पुनः साहस जुटाया
अपनी मादा को प्यार से पुचकाया
उन गिरे तिनको को
एक एक कर लाने लगा
निर्मम कल भी वहां धीरे से
आहट देने लगा
एक बिल्ली की निगाह उस
बेसुध सपने में खोये नर पर पड़ी
उसके बांछे खिल गयी
पंजे में दबोच वह उसे ले चली
मादा पूरे दम से चिल्लाते
उसके पीछे दौड़ पड़ी

पल में ही देख
सारे सपने धूसरित
आकान्छाये अपूरित
बेदम नर ने उसे समझाया
उस होनी को कौन रोक सकता है
जो ईश्वर को है भाया
गर्भ में पल रहे हमारे
भविष्य को बचाओ
उसी के सहारे अब जीवन सजाओ
मुझे बचाने की चेष्टा
मत करो अनायास
जानती ही हो बेकार होंगे
तुम्हारे सभी प्रयास
तुम्हारे बचने से कम से कम
हमारा अस्तित्व तो बचेगा
बाकी न्याय इसका तो ईश्वर ही करेगा
प्रिये अब मेरी मौत तो करीब है
क्या करे शायद यही हमारा नसीब है
कहते हुए नर ने
वही तोड़ दिया दम
यह देख मादा के
हताश रुक गए कदम
अपने आपको समझाते
अपने पति की याद और पहचान को
अपने गर्भ में छिपाते
न चाहते हुए भी अज्ञात भविष्य के
नए ताने बाने बुनते
अस्थियों के नाम पर उसे
जो कुछ मिला वहां
ले चल पड़ी अपने अधूरे घोसले को
उसके प्रियतम की
यादे शेष थी जहाँ

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

सुबह होने पर

जियावन की तेज आवाज से
सहसा निद्रा भंग हुई
सामने खिड़की से उदीयमान सूरज से
ऑंखें चार चौबंद हुई
बाहर वह धरमू पर
जोर जोर से चिल्ला रहा था
पानी पी पी कर गालियों की
बौछार किये जा रहा था
ऑंखें मलते हुए मैं बाहर आया
देख नजारा वहां का मैं घबराया
धरमू का जेनेरटर जियावन के
दरवाजे पर धंस गया था
बेटी का विवाह नजदीक था
दुआर ख़राब होने की जियावन
दुहाई दिए जा रहा था
किसी तरह मैंने बीच बचाव कर
घटना को दुर्घटना होने से बचाया
समझा बुझा कर
मामले को शांत कराया

आज जियावन की बेटी
उर्मिला का विवाह है
सहेलियों ने जीभर कर
उसका श्रृंगार किया है
सभी व्यस्त है
बारात की अगवानी में
जियावन का भरपूर प्रयास की
रहे न कोई कोर कसर
बारातियों की अगवानी में

रात्रि का दूसरा पहर
नाचते गाते बारात पहुच ही
रही थी दरवाजे पर
तभी एकाएक आंधी के साथ
पानी का भी हो गया प्रकोप
बिजली भी हो गयी
तबियत से गोल
किसी ने कहा अरे
पास ही में तो धरमू है
उससे कहो लगा दे जेनेरटर
किसी ने कहा कहाँ से लायेगा
वो इतनी रत में ओपेरटर
जियावन मुहँ लटकाए
हो गया था निराश
उसकी तो टूट चुकी थी पूरी आस
हताश वह सोचता हो बेचैन
अब कैसे वह
धरमू से मिलाये नैन
अभी दो दिन पहले ही तो
उसका जीना हराम कर दिया था
बिना बात का ही
तिल का ताड़ बना दिया था
उन गालियों से आहत
धरमू अपनी बखरी में लेटा था
उसे उस विवाह का
निमंत्रण नहीं था

दूर से धरमू ने
सुनी जब जिक्जिक
सोचने लगा वो
कैसी है ये किचकिच
निरापद वो जियावन के
दुआर पर तेज कदमो से गया
देख मामला तुरंत
ले दो लोगो को जेनरेटर ले आया
स्वयं ही बन ओपेरटर
पूरी रात उसने जेनेरटर चलाया

सुबह होने पर
बारात बिदा होने पर
जियावन और धरमू
एक दुसरे को देख अनदेखा करते रहे
अचानक दौड़ एक दुसरे की ओर
लग एक दुसरे के गले
अपनी सारी व्यथा
आँखों ही आँखों में कहते रहे
घंटो रोते रहे
उनके चहरे बिना कुछ कहे
बहुत कुछ कहते रहे

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

कृष्ण कुमार यादव को डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय फेलोशिप अवार्ड-2010

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2010‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर कार्यरत हैं.

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव‘‘ ( स0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र) भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर‘ और ‘डाकिया डाक लाया‘ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं.

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्वे विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान -2009‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा '' विवेकानंद सम्मान'' , महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ''महिमा साहित्य भूषण सम्मान'' नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘, मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘साहित्यकार रत्न‘‘, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘ व ’’अक्षर शिल्पी सम्मान’’, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना (म0प्र0) द्वारा ’’अक्षर शिल्पी सम्मान-2010’’ , साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ''हिंदी भाषा भूषण-2010'' इत्यादि तमाम सम्मानों से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को इस सम्मान हेतु बधाईयाँ।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

वसंत पंचमी की शुभकामनायें..


वसंत-पंचमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। माँ सरस्वती का आशीर्वाद आप सब पर बना रहे.

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पोर्टब्लेयर में कवि सम्मेलन

हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्टब्लेयर द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 25 जनवरी को कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दक्षिण अंडमान के उप मंडलीय मजिस्ट्रेट श्री राजीव सिंह परिहार मुख्य अतिथि थे और कार्यक्रम की अध्यक्षता चर्चित युवा साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने की. दूरदर्शन केंद्र पोर्टब्लेयर के सहायक निदेशक श्री जी0 साजन कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे. कार्यक्रम का शुभारम्भ द्वीप प्रज्वलन द्वारा हुआ.

इस अवसर पर द्वीप समूह के तमाम कवियों ने अपनी कविताओं से शमां बांधा, वहीँ तमाम नवोदित कवियों को भी अवसर दिया गया. एक तरफ देश-भक्ति की लहर बही, वहीँ समाज में फ़ैल रहे भ्रष्टाचार, महंगाई और अन्य बुराइयाँ भी कविताओं का विषय बनीं. कविवर श्रीनिवास शर्मा ने देश-भक्ति भरी कविता और द्वीपों के इतिहास को छंदबद्ध करते कवि सम्मलेन का आगाज किया. जगदीश नारायण राय ने संसद की स्थिति को शब्दों में ढलकर लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया. जयबहादुर शर्मा ने महंगाई को इंगित किया तो उभरते हुए कवि ब्रजेश तिवारी ने गणतंत्र की महिमा गाई. डाॅ0 एम0 अयया राजू ने आज की राजनैतिक व्यवस्था पर कविता के माध्यम से गहरी चोट की तो डाॅ0 रामकृपाल तिवारी ने यह सुनकर सबको मंत्रनुग्ध कर दिया कि नेताओं के चलते 'तंत्र' ही बचा और 'गण' गायब हो गया. श्रीमती डी0 एम0 सावित्री ने कविताओं के सौन्दर्य बोध को उकेरा तो डाॅ0 व्यासमणि त्रिपाठी ने ग़ज़लों से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया. अन्य कवियों में संत प्रसाद राय, अनिरूद्ध त्रिपाठी, बी0 के0 मिश्र, राजीव कुमार तिवारी, सदानंद राय, एस0 के0 सिंह, रामसिद्ध शर्मा, रामसेवक प्रसाद, परशुराम सिंह, डाॅ0 मंजू नायर एवं श्रीमती रागिनी राय ने अपने काव्य पाठ द्वारा काव्य संध्या को यादगार शाम बना दिया। मुख्य अतिथि श्री राजीव सिंह परिहार ने भी हिन्दी कविता की आस्वादन प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए स्वरचित कविताओं का पाठ किया।

कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए चर्चित युवा साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के
निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने सामाजिक परिवर्तन में कविता की क्रांतिकारी भूमिका की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। आज के लेखन में राष्ट्रीय चेतना की कमी और राष्ट्रीयता के विलुप्त होने की प्रवृत्ति के भाव पर रचनाकारों को सचेत करते हुए उन्होंने कविता को प्रभावशाली बनाने पर जोर दिया। श्री यादव ने जोर देकर कहा कि कविता स्वयं की व्याख्या भी करती है एवं बहुत कुछ अनकहा भी छोड़ देती है। इस अनकहे को ढूँढ़ने की अभिलाषा ही एक कवि-मन को अन्य से अलग करती है। ऐसे में साहित्यकारों और कवियों का समाज के प्रति दायित्व और भी बढ़ जाता है. उन्होंने परिषद द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन की सराहना करते हुए कहा कि मुख्यभूमि से कटे होने के बावजूद भी यहाँ जिस तरह हिंदी सम्बन्धी गतिविधियाँ चलती रहती हैं, वह प्रशंसनीय है.

कार्यक्रम के आरम्भ में परिषद के अध्यक्ष श्री आर0 पी0 सिंह ने उपस्थिति का स्वागत किया, जबकि प्रधान सचिव श्री बी0 के0 मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कवि सम्मेलन का संयोजक एवं संचालन हिंदी साहित्य कला परिषद् के साहित्य सचिव डाॅ0 व्यासमणि त्रिपाठी ने किया।

डाॅ0 व्यासमणि त्रिपाठी
साहित्य सचिव- हिंदी साहित्य कला परिषद्, पोर्टब्लेयर-744101
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह.