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सोमवार, 26 दिसंबर 2011

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा राम शिव मूर्ति यादव को ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2011‘‘

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा 11-12 दिसंबर को दिल्ली के पंचशील आश्रम, झड़ोदा (बुराड़ी) में आयोजित 27 वें राष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मलेन में सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन, विशिष्ट कृतित्व, समृद्ध साहित्य-साधना एवं समाज सेवा हेतु श्री राम शिव मूर्ति यादव को ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2011‘‘ से सम्मानित किया गया। उक्त समारोह में केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने श्री यादव को यह सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर ओड़ीशा, महाराष्ट्र, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, केरल तथा आंध्र-प्रदेश के कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम कर शमा बांधा.

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय पुस्तकों और संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। श्री राम शिव मूर्ति यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ”यदुकुल” (http://www.yadukul.blogspot.com/) ब्लॉग का आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है।

इससे पूर्व श्री राम शिव मूर्ति यादव को भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा ‘ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान-2007‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद द्वारा ‘भारती ज्योति’ सम्मान, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘बृज गौरव‘, ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी, म0प्र0 द्वारा ’भारत-भूषण’, अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले द्वारा ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ इत्यादि से सम्मानित किया है।

भारतीय दलित साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. सोहनपाल सुमनाक्षर ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री डॉ॰ फारुख अब्दुल्ला, लोकसभा के उपाध्यक्ष श्री करिया मुंडा एवं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महामंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे । इस सम्मेलन को सुशोभित करने वाले अन्य मुख्य अतिथियों में अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल एवं चर्चित दलित साहित्यकार डॉ माता प्रसाद, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष श्री पी॰ एल॰ पुनिया, पूर्व केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ॰ सत्य नारायण जटिया, पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं सम्प्रति राज्य सभा सांसद श्री रामविलास पासवान, दिल्ली विधान सभा उपाध्यक्ष श्री अमरीश सिंह गौतम, त्रिपुरा के शिक्षा मंत्री श्री अनिल सरकार, महाराष्ट्र के पूर्व समाज कल्याण मंत्री व सम्प्रति विधायक श्री बबनराव घोलप, आर॰ पी॰ आई॰ के अध्यक्ष व पूर्व सांसद श्री रामदास अठावले, गोवा विधानसभा के पूर्व डिप्टी स्पीकर श्री शंभुभाऊ बांडेकर, गुरु जम्भेश्वर तकनीकी यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ॰ एम॰ एल॰ रंगा, झांसी यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो॰ रमेश चन्द्र, दिल्ली की मेयर प्रो॰ रजनी अब्बी एवं लखनऊ के पूर्व मेयर डॉ दाऊजी गुप्ता सहित तमाम साहित्यकार, शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी,पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे। इस सम्मेलन में देश के सभी प्रान्तों और संघ शासित प्रदेश के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विदेशों से नेपाल, अमेरिका, ब्रिटेन, मारिशस, श्रीलंका इत्यादि देशों के प्रतिनिधियों ने भी शिरकत की ।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

मुखरित मौन सन्देश प्रकृति का नूतन वर्षाभिनंदन

नूतन ऊष्मा से ओत प्रोत
नवल श्रृष्टि का पोर पोर
नए वर्ष कि पूर्व साँझ में
झंकृत हिय का कोर कोर

नूतन सुषमा से वासित तन
होता अनुरागी वैरागी मन
धरा धन्य धनो से पूरित
आराधनारत एक एक कण

अनुपम अक्षय अनंत उर्जा के
अनिद्य स्रोत से पूरित अन्तस्तल
मुखरित मौन सन्देश प्रकृति का
दे रही सृष्टि को जीवन पल पल

हरा भरा भूभाग बड़ा
मरकत मणि सी मोहक वीणा
शुभ्र शरद की धवल चांदनी
अमृत वर्षं झीना झीना

शीतल शीत कि शीतल धूप
हारती हर तन का हर क्लेश
कलकल करती निर्झर निश्छल
हरती सुरसरि अवसाद शेष

है माँ का ह्रदय क्षीरसागर
ह्रदय पिता का न्यारा बैकुंठ
है ह्रदय गुरु का ज्ञान रथ
आओ करे आत्मसात आकंठ

कल तक अनल उगलती अवनी
पर्याय पियूष का बनी आज है
प्रज्ञा पूरित पूरा परिपथ
ऐसी मातृभूमि पर हमें नाज है

गिरिराज सुशोभित मस्तक पर
है पखारता सिन्धु पाव है
नूतन तृष्णा से नित घिरा शहर
पर सागर सा शांत गाँव है

है बनी राष्ट्र कि हिय रेखा
गंगा का अविरल प्रवाह
दुग्ध श्वेत से पोत युगल
बने शांति के आज भी गवाह

परम दिव्य अत्यंत भव्य है
सिद्धांत सत्य अहिंसा का
असमय आतुर बने विनाश के
क्यों उद्यत प्रलय आलिंगन का

मातृभूमि पारस सी मेरी
दानव पा सानिध्य देव हो जाते
दग्ध हृदय के दाहक शूल
सुरभित सरस सुमन बन जाते

है रहा इतिहास हमारा
संहारक शिव ने कर गरल पान
बन गए स्वयं भी नीलकंठ
दे दिया सृष्टि को अभयदान

हूँ परिचित अधरों कि भाषा से
नाहक बुनते तुम शब्दजाल हो
चलो आज ही लो नूतन संकल्प
बचे अभी तुम बाल बाल हो

शाश्वत मूल्यों कि प्राण प्रतिष्ठा
ज्यों तपती रेत में नीर धाम
निर्माण करे ऐसे भुवन का
जहाँ ह्रिदय प्रेम का दिव्य ग्राम

जिज्ञासा का भर ज्ञान कुम्भ
सुविचारों का नन्दन कानन
निलय धरा के संगम पर
कर रहा प्रकृति का मै वंदन

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

भैयालाल

रत के बारह बज रहे थे
लच्छू चाचा दरवाजे पर खड़े
अपने मंद बुद्धि बच्चे
भैयालाल की
बड़े बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे थे
कोरो से बहते आंसुओं को
रह रह कर पोछ रहे थे

आज चार दिन हो गए
जाने वह कहा चला गया
कही बहुत दूर तो नहीं निकल गया
शायद रास्ता भटक गया
इसीलिए घर नहीं पाया
जाने कैसे और कहाँ होगा
कैसे अपना ख्याल रख कर
क्या खता पीता होगा
समय तो नित्य सुबह
नाश्ते के बाद वह घर से निकल जाता
बाजार में जाकर इनके उनके यहाँ बैठ
दोपहर में खाने घर जाता
सोच सोच चाचा का कलेजा
मुह को जाता
चाची के देहावसान के उपरांत
पिता के साथ वही थे उसके माता
शेष भाइयों या बच्चों को
उसकी कोई खास चिंता नहीं थी
बड़ी बहुओं को तो बस
उसके मौत की ही प्रतीक्षा थी
उनकी बेचैनिओं ने मुझे
इस कदर बेचैन कर दिया
जा तो रहा था मै बड़े ही जरूरी काम से
पर उनके मौन आग्रह पर
छोटे को लेकर भैया लाल को
खोजने चल दिया
मन तमाम अनिष्ट कि आशंका से
आहत हो रहा था
साथ ही एक दूसरे से पूछते टोह लेते
उसको खोजने का उपक्रम जारी था
अचानक घर से लगभग पच्चीस मील दूर
सड़क के किनारे उसे लेटे देखा
ऐसा लगा कही किसी ट्रक से
दब तो नहीं गया
घबड़ाकर मन काप गया
लच्छू चाचा कि दशा सोच
तन सिहर गया
मैंने रुक कर उसे आवाज दिया
एक ही आवाज में वह उठ गया
उसकी दीन हीन दशा देख
भगवान के फैसले पर अफ़सोस होने लगा
शारीर पर तमाम चोटों के
निशान से वह बेचैन था
घावों से अनवरत रक्त बह रहा था
पता नहीं बच्चों ने उसे पागल समझ
कितना पत्थर बरसाया होगा
इसी बीच कितने ऐसे जुल्म
इस बेचारे ने सहा होगा

मैंने तुरंत उसे अपनी
मोटर साइकिल पर बैठाया
छोटे ने मोबाइल से घर पर
उसेक पाने कि सूचना तुरन्त ही पहुचाया
अज्ञात खुशी से आह्लादित
उसे ले मै घर आया
सिसक कर चाचा ने उसे
विह्वल हो गले लगा लिया

पिता पुत्र के इस मिलन को
भीगी पलकों से मैं
जीभर कर निहारता रहा
टूटते परिवार
और छीजते घर
बारके दौर में
रक्त के मजबूत रिश्तों की
गाथा कहता रहा
मेरा कविहृदय इन रिश्तो को
एक नूतन आयाम देता रहा
वस्तुतः मै एक बार पुनः
रिश्तों कि इस अबूझ पहेली को
हल करने में विफल रहा
सबसे अक्षम बेटे के लिए भी
पिता के सामान्य से भी बहुत ज्यादा
प्यार के बिपुलता की दासता
कहता रहा