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शुक्रवार, 13 जून 2014

निष्कर्ष

जून की तपती 
दोपहरी 
आकाश से अनल की 
वारिश हो रही 
हो रही 
बिजली का बिल जमा कर 
सर पर गमछा और 
टोपी के साथ 
काला चश्मा लगाये 
मै घर वापस आ रहा था 
तिस पर भी 
भीषण उमस और जलन 
के कारण 
एक पेड़ की छाँव 
तलाश रहा था 
 
तभी नवनिर्मित 
सड़क पर बने डिवाइडरो पर 
मेरी नजर गयी 
दो मजदूर एक वृद्ध 
और एक किशोर
नंगे सर और बदन 
केवल सैंडो गंजी में 
काले और पीले रंग के 
पेंट कर रहे थे 
पता नहीं क्यों वे मुझे 
भयभीत कर रहे थे 
 
भीषण तपिश के कारण 
मुझे लगा कि वे
बेहोश होकर 
अभी गिर पड़ेंगे 
पर वे थे कि अपने 
काम में मगन 
कान में इयरफोन लगाये 
गंजी के गर्भ में 
मोबाइल डाले 
तन्मयता से अपने कार्य 
का निष्पादन करते हुए 
गाने सुन रहे थे
 
मै एक पेड़ की 
छाँव में खड़ा 
थोड़ा आराम फरमाते 
प्रकृति की इन 
विसंगतियों 
पर विचारमग्न था
 
साधन संपन्न
होने के बाद भी 
भीषण लू और तपिश 
मुझे मारे जा रहे थे 
जबकि  साधन विहीन 
प्रतीत वह 
सब  मस्त थे 
 
निष्कर्ष 
 
वस्तुतः प्रकृति 
किसी के साथ अन्याय 
नही करती 
पुरुषार्थ मद से प्राप्त 
साधन सम्पन्नता 
पर जहाँ हमें 
गुमान होता है 
सच्चे अर्थों में वही हमने 
अपने आप को 
प्रकृति से बहुत दूर 
कर लिया है
प्रकृति से 
सामंजस्यता 
के अभाव ने हमें 
लगभग साधनविहीन 
बना दिया है 
 
वही प्रकृति  के 
सानिध्य  व 
सामंजस्य ने उन्हें 
वास्तविक
प्राकृतिक सम्पन्नता से 
युक्त कर रखा है 
जहाँ उल्लास है कि 
कभी थमता नहीं 
साथ ही पराभव 
दूर तक कहीं 
फटकता  नहीं  
 
साधन सम्पन्नता 
और विपन्नता के बीच 
अंतर्मन में अंतर्द्वंद 
अनवरत जारी था 
उनकी साधन सम्पन्नता 
मेरे प्रबल साधनों पर 
भारी प्रतीत था 
इतना सब 
प्राप्य होने के बाद भी 
आज पहली बार 
मैं अपने आपको 
ठगा और 
साधनविहीन 
पा रहा था 
 
निर्मेष 

सोमवार, 19 मई 2014

अच्छे दिन आनेवाले है

विराम देवे 
अपनी उद्दात उत्तेजनाओं को 
मन को बनाएँ धैर्यपूरित  शान्त 
करने दो इस युगपुरुष को 
धीरता से अपना काम 

आओ उन्हें दे 
एक ऐसा कार्मिक मोहक 
विद्वेषरहित तुष्टीकरणविहीन 
वातावरण 
सफल हो जिससे 
वह कर सके 
हमारी आकांछाओ और 
अपने उद्देश्यों का वरण 

रखी जा सके 
एक नूतन सबल सक्षम सम्पन्न 
विश्वगुरु सर्वप्रभुता संपन्न 
राष्ट्र की नीव 
कराहती सुप्त हो चुकी भारतीयता 
पुनः हो सके सजीव 

बेशक साथ देता है 
कौन यहाँ  जीवनभर 
लाश को भी ले जाते
मरघट  तक
बदलते है हम भी कंधे 
रास्तेभर 

अस्तु 
आओ समय रहते 
समग्र लाभ उठा ले हम 
इस कालजयी युगपुरुष की 
विराट सोच का 
साकार हो सके स्वप्न 
सर्वप्रभुतासम्पन्न राष्ट्र के 
उत्थान का  

बहुत हो चुका देश को 
धर्म सम्प्रदाय पन्थ और 
जाति के आधार पर 
तुष्टिकरण की राजनीति 
जिससे सदा ही  बढ़ी है 
अन्याय असमानता 
और अनीति 

आओ तत्पर हो 
इन खोखले तिक्त 
विद्वेषपूर्ण आदर्शो और 
विचारों की देने को आहुति 

स्वागत करें 
इस आर्यावर्त के सम्पूर्ण  आवाम  को 
समग्र राष्ट्र और राष्ट्रीयता 
के परिप्रेक्ष्य में देखने 
की सोच का 
समग्र देश को समरसता 
समदर्शिता से 
आत्मसात करने जैसे 
उद्दात विचारों का 

प्रथमदृष्टया 
यह लग सकता है असंभव
या एक कुचक्र की लग 
सकती है आहट 
पर चिंतित हो 
जल्दी ही दूर होगी 
आपकी घबराहट 
नकली घी के लगातार सेवन से 
आपने जहाँ बरबाद की है 
अपनी सेहत 
वही भूल चुके है 
असली  घी की नेमत 

अतः आओ 
समग्र भारत के अभ्युदय  का 
ले इस युगपुरुष के नेतृत्वा में 
मोदी युग का एक संकल्प 
क्योकि इसके सिवा और है 
कोई नहीं सार्थक 
विकल्प   

निश्चय ही प्रतीत है 
सफलता समरसता और 
विकासयुक्त 
अच्छे दिन आनेवाले है 
छल छद्म पांखण्ड अविश्वास 
अन्याय  अनीति असमानता
 विप्लव और विफलता
आदि के दिन 
जानेवाले है 

डा रमेश कुमार निर्मेष