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शनिवार, 28 मार्च 2009

किसका चुनाव और किसके लिए चुनाव ??

चुनाव की चारों तरफ़ बहार है। क्या युवा..क्या बूढे सभी चुनावी रंग में रंगे हुए हैं। हर किसी को लगता है कि वह जिस दल को वोट देगा वही सत्ता में आयेगा। राजनीति में युवा चेहरों की इस बार ज्यादा पूछ है। राहुल गाँधी से लेकर वरुण गाँधी तक चर्चा में हैं तो प्रिया दत्त से लेकर तमाम युवा महिलाएं चुनाव में अपना भाग्य अजमा रही हैं। कहीं फिल्मी सितारे तो कहीं क्रिकेट सितारे मानो चुनाव नहीं मेला चल रहा हो। हर प्रत्याशी को अपनी जीत का भरोसा है तो हर मतदाता को अपने मत पर। इन सबसे परे एक ऐसा भी वर्ग है जो लम्बी-लम्बी बातें तो करता है, पर मतदान में उसकी कोई रूचि नहीं है। उसे लगता है की वह लोकतंत्र रूपी पायदान के सबसे शीर्ष पर है , जहाँ से वह या तो बौधिक बहस करता है या फतवे जारी करता है। इस चुनावी लोकतंत्र में हर किसी की अपनी भूमिका है और हर किसी का अपना मूल्य (?) भी। व्यक्ति से बड़े जाति-धर्म हो गए हैं, तभी तो ऐन वक्त तक प्रत्याशी बदले जा रहे हैं। अब इन राजनेताओं को कौन समझाए कि यह पब्लिक है, जो सब कुछ जानती है। चुनाव आयोग ने दीवालों पर नारे लिखना मन कर दिया तो अख़बारों की चाँदी हो गई। यहाँ हर कुछ मैनेज होता है, बस आपको ढंग आना चाहिए। एक वो है जो दिखता है, तो एक वो है जो दीखता नहीं, आखिर चुनाव आयोग भी क्या-क्या देखे ? बस यूँ समझिये कि चुनाव है और फ़िर पॉँच साल के लिए भूल जाना है। आप मत किसी को देते हैं, सरकार किसी की बनती है। सत्ता के लिए सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं, फ़िर किसका चुनाव और किसके लिए चुनाव....विचार करें ???

बुधवार, 25 मार्च 2009

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का अद्भुत ‘प्रताप’ (पुण्य तिथि-२५ मार्च पर)

साहित्य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्ति की ज्वाला क्रान्तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्तम्भ थे, जिनके अखबार ‘प्रताप‘ ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल अतरसुइया, इलाहाबाद में हुआ था। उनके नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्तव सहायक जेलर थे, अतः अनुशासन उन्हें विरासत में मिला। गणेश शंकर के नामकरण के पीछे भी एक रोचक वाकया है- उनकी नानी ने सपने में अपनी पुत्री गोमती देवी के हाथ गणेश जी की प्रतिमा दी थी, तभी से उन्होंने यह माना था कि यदि गोमती देवी का कोई पुत्र होगा तो उसका नामकरण गणेश शंकर किया जायेगा। मूलतः फतेहपुर जनपद के हथगाँव क्षेत्र के निवासी गणेश शंकर के पिता मुंशी जयनारायण श्रीवास्तव ग्वालियर राज्य में मुंगावली नामक स्थान पर अध्यापक थे। गणेश शंकर आरम्भ से ही किताबें पढ़ने के काफी शौकीन थे, इसी कारण मित्रगण उन्हें ‘विद्यार्थी‘ कहते थे। बाद में उन्होंने यह उपनाम अपने नाम के साथ लिखना आरम्भ कर दिया। विद्यार्थी जी की प्रारम्भिक शिक्षा पिता जी के स्कूल मुंगावली, जहाँ वे एंग्लो-वर्नाकुलर मिडिल स्कूल में अध्यापक थे, में हुई। विद्यार्थी जी उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। 1904 में उन्होंने भलेसा से अंग्रेजी मिडिल की परीक्षा पास किया, जिसमें पहली बार हिंदी द्वितीय भाषा के रूप में मिली थी। तत्पश्चात पिताजी ने विद्यार्थी जी को पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के लिए बड़े भाई शिवव्रत नारायण के पास कानपुर भेज दिया। कानपुर में आकर विद्यार्थी जी ने क्राइस्ट चर्च कालेज की प्रवेश परीक्षा दी पर भाई का तबादला मुंगावली हो जाने से आगे की पढ़ाई फिर वहीं हुई। वर्ष 1907 में विद्यार्थी जी आगे की पढ़ाई के लिए कायस्थ पाठशाला गये। इलाहाबाद प्रवास के दौरान विद्यार्थी जी की मुलाकात ‘कर्मयोगी‘ साप्ताहिक के सम्पादक सुन्दर लाल से हुई एवं इसी दौरान वे उर्दू पत्र ‘स्वराज्य‘ के संपर्क में भी आये। गौरतलब है कि अपनी क्रान्तिधर्मिता के चलते ‘स्वराज्य‘ पत्र के आठ सम्पादकों को सजा दी गई थी, जिनमें से तीन को कालापानी की सजा मुकर्रर हुई थी। सुन्दरलाल उस दौर के प्रतिष्ठित संपादकों में से थे। लोकमान्य तिलक को इलाहाबाद बुलाने के जुर्म में उन्हें कालेज से निष्कासित कर दिया गया था एवं इसी कारण उनकी पढ़ाई भी भंग हो गई थी। सुन्दरलाल के संपर्क में आकर विद्यार्थी जी ने ‘स्वराज्य‘ एवं ‘कर्मयोगी‘ के लिए लिखना आरम्भ किया। यहीं से पत्रकारिता एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति उनकी आस्था भी बढ़ती गई।

इलाहाबाद से गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ कानपुर आये एवं इसे अपनी कर्मस्थली बनाया। कानपुर में कलकत्ता से अरविंद घोष द्वारा सम्पादित ‘वन्देमातरम्‘ ने विद्यार्थी जी को आकृष्ट किया एवं इसी दौरान उनकी मुलाकात पं0 पृथ्वीनाथ मिडिल स्कूल के अध्यापक नारायण प्रसाद अरोड़ा से हुई। अरोड़ा जी की सिफारिश पर विद्यार्थी जी को उसी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गई। पर पत्रकारिता की ओर मन से प्रवृत्त विद्यार्थी जी का मन यहाँ भी नहीं लगा और नौकरी अन्ततः छोड़ दी। उस समय महावीर प्रसाद द्विवेदी कानपुर में ही रहकर ‘सरस्वती‘ का सम्पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी इस पत्र से भी सहयोगी रूप में जुड़े रहे। एक तरफ पराधीनता का दौर, उस पर से अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार ने विद्यार्थी जी को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने पत्रकारिता को राजनैतिक चेतना को जोड़कर कार्य करना आरम्भ किया। इसी दौरान वे इलाहाबाद लौटकर वहाँ से प्रकाशित साप्ताहिक ‘अभ्युदय‘ के सहायक संपादक भी रहे। पर विद्यार्थी जी का मनोमस्तिष्क तो कानपुर में बस चुका था, अतः वे पुनः कानपुर लौट आये। कानपुर में विद्यार्थी जी ने 1913 से साप्ताहिक ‘प्रताप’ के माध्यम से न केवल क्रान्ति का नया प्राण फूँका बल्कि इसे एक ऐसा समाचार पत्र बना दिया जो सारी हिन्दी पत्रकारिता की आस्था और शक्ति का प्रतीक बन गया। प्रताप प्रेस में कम्पोजिंग के अक्षरों के खाने में नीचे बारूद रखा जाता था एवं उसके ऊपर टाइप के अक्षर। ब्लाक बनाने के स्थान पर नाना प्रकार के बम बनाने का सामान भी रहता था। पर तलाशी में कभी भी पुलिस को ये चीजें हाथ नहीं लगीं। विद्यार्थी जी को 1921-1931 तक पाँच बार जेल जाना पड़ा और यह प्रायः ‘प्रताप‘ में प्रकाशित किसी समाचार के कारण ही होता था। विद्यार्थी जी ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं थे, पर एक ऐसी असीम ऊर्जा थी, जिसका संचरण स्वतंत्रता प्राप्ति के निमित्त होता था। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी। यह ‘प्रताप’ ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा और चम्पारण-सत्याग्रह की नियमित रिपोर्टिंग कर राष्ट्र को गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित कराया। चैरी-चैरा तथा काकोरी काण्ड के दौरान भी विद्यार्थी जी ‘प्रताप’ के माध्यम से प्रतिनिधियों के बारे में नियमित लिखते रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्ति कविता ’पुष्प की अभिलाषा’ प्रताप अखबार में ही मई 1922 में प्रकाशित हुई। बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेहीजी, प्रताप नारायण मिश्र इत्यादि ने प्रताप के माध्यम से अपनी देशभक्ति को मुखर आवाज दी।

विद्यार्थी जी एक पत्रकार के साथ-साथ क्रान्तिधर्मी भी थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने काकोरी षडयंत्र केस के अभियुक्तों के मुकदमे की पैरवी करवायी और जेल में क्रान्तिकारियों का अनशन तुड़वाया। कानपुर को क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बनाने में विद्यार्थी जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विजय कुमार सिन्हा, राजकुमार सिन्हा जैसे तमाम क्रान्तिकारी विद्यार्थी जी से प्रेरणा पाते रहे। वस्तुतः प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। बनारस षडयंत्र से भागे सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्पादक थे। बाद में भट्टाचार्य और प्रताप अखबार से ही जुड़े पं0 राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्ड में सजा मिली। भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। सर्वप्रथम दरियागंज, दिल्ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए भगत सिंह ने दिल्ली की यात्रा की और लौटकर ‘प्रताप’ के लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी, फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही थे कि जेल में भंेट करके क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा छिपाकर लाये तथा उसे ‘प्रताप‘ प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की माँ की मदद की और रोशन सिंह की कन्या का कन्यादान भी किया। यही नहीं अशफाकउल्ला खान की कब्र भी विद्यार्थी जी ने ही बनवाई।

विद्यार्थी जी का ‘प्रताप‘ तमाम महापुरूषों को भी आकृष्ट करता था। 1916 में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक इक्के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ दो दिन रहे। 1925 के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान विद्यार्थी जी स्वागत मंत्री रहे और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ घोड़े पर चढ़कर अधिवेशन स्थल का भ्रमण करते थे। यह विद्यार्थी जी ही थे जिन्होंने श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद‘ को प्रताप प्रेस में रखा एवं उनके गान ‘राष्ट्र पताका नमो-नमो‘ को ‘झण्डा ऊँचा रहे हमारा‘ में तब्दील कर दिया। विद्यार्थी जी सिद्धांतप्रिय व्यक्ति थे। एक बार जब ग्वालियर नरेश ने उन्हें सम्मानित किया और कहा कि मुझे खुशी है कि आपके पिताजी मेरे अंतर्गत मुंगावली में कार्यरत रहे हैं, परन्तु आप मेरे बारे में अपने अखबार में लगातार विरोधी खबरें छाप रहे हैं। तो विद्यार्थी जी ने निडरता से कहा कि मैं आपका और पिताजी के आपसे सम्बन्धों का सम्मान करता हूँ, परन्तु इसके चलते अखबार के साथ अन्याय नहीं कर सकता। हाँ, यदि आप इन खबरों का प्रतिवाद लिखकर भेजेंगे तो अवश्य प्रकाशित करूँगा।

कालान्तर में विद्यार्थी जी गाँधीवादी विचारधारा से काफी प्रभावित हुए एवं यह उनकी लोकप्रियता का भी सबब बना। वे क्रान्तिकारियों एवं गाँधीवादी विचारधारा के अनुयायियों के लिए समान रूप से प्रिय थे। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया तो भारतीय जनमानस आगबबूला हो उठा। अंगे्रजी निर्दयता के विरूद्ध जनमानस सड़कों पर उतर आया। निडर एवं साहसी व्यक्तित्व के धनी तथा साम्प्रदायिकता विरोधी विद्यार्थी जी इस दौरान भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शान्त कराने के लिए लोगों के बीच उतर पड़े। उधर विद्यार्थी जी के प्रताप से अंग्रेजी हुकूमत भी भयभीत थी। रायबरेली में मुंशीगंज गोली काण्ड के तहत ‘प्रताप‘ पर मानहानि का केस चल रहा था और अंग्रेज बार-बार यह संदेश दे रहे थे कि जब तक कानपुर में ‘प्रताप‘ जीवित है, तब तक प्रदेश में शान्ति स्थापना मुश्किल है। भड़की हिंसा को काबू करने के दौरान 25 मार्च 1931 को विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए। उनका शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अन्तिम संस्कार कर दिया गया पर ‘प्रताप‘ के माध्यम से ‘विद्यार्थी‘ जी ने राजनैतिक आन्दोलन, क्रान्तिकारी चेतना, क्रान्तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्य को जो ऊँचाईयाँ दीं, उसने उन्हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच में ही अन्ततः स्वाधीनता की लौ प्रज्जवलित हुई।
कृष्ण कुमार यादव

सोमवार, 23 मार्च 2009

कोई भी रोक नहीं पाया भगत सिंह की फांसी (शहादत-दिवस पर विशेष)

इतिहासकारों के बीच आज भी इस बात को लेकर विवाद है कि क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था? क्या उन्हें गांधी ने मार डाला? क्या वाकई बापू और अन्य बड़े नेता भगत सिंह के इंकलाबी तेवर और लोकप्रियता से डर गए थे? दरअसल शहीदे आजम की मौत अपने पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गई है जिसे सुलझाया नहीं जा सका है। और शायद जिसे कभी सुलझाया जा भी नहीं सकेगा।

लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी। बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।

-'..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]
-'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]
-'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]
-'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]
-'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]
-'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]
-'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]
-'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]
-'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]
(साभार: दैनिक जागरण)

मंगलवार, 10 मार्च 2009

रंग-बिरंगी होली आई (बाल कविता)

होली आई, होली आई
रंग-बिरंगी होली आई
आओ पाखी, आओ बंटी
मिलजुल सभी मनाएं होली
पाखी ने भर ली पिचकारी
आई देखो किसकी बारी
उसने सबको ही रँग डाला
लाल, गुलाबी, नीला, काला
आई अब गुलाल की बारी
संग में गुझिया की तैयारी
सब मिलजुल गुझिया खाएं
पाठ प्यार का रोज पढ़ाएं
मिलजुल बन जाएं हमजोली
ऐसी प्यारी है यह होली !!!
कृष्ण कुमार यादव

शनिवार, 7 मार्च 2009

21वीं सदी में स्त्री समाज के बदलते सरोकार ( अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर)

भारत में नारी को पूजनीय माना गया है। वैदिक काल से ही नारी विभिन्न रूपों में सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करती आ रही है। नारी की सुकोमलता, सौंदर्य, लज्जा व स्नेहिल स्वभाव सदैव से इसके आभूषण रहे हैं पर दुर्भाग्यवश इन्हीं गुणों के कारण उसके साथ बार-बार छल भी हुआ है। समाज की सामन्तवादी सोच ने नारी की आन्तरिकता की उपेक्षा कर उसकी भौतिक काया एवं बाहरी रूप-रंग को ही आधार बनाया । आज जहाँ पुरूष की शुचिता उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के आधार पर मापी जाती है, वहीं नारी की शुचिता अंग विशेष के आधार पर मापी जाती है।

प्राचीन काल से ही जहाँ नारी को एक तरफ समाज में प्रतिष्ठा मिली, वहीं दूसरी तरफ वह बर्बरता का शिकार हुयी । तुलसीदास ने तो नारी को ताड़ना का अधिकारी बताकर पशु के समकक्ष खड़ा कर दिया- ‘‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।’’ मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने पत्नी सीता के अग्निपरीक्षा में खरे उतरने के बाद भी एक धोबी के कहने पर धोखे से अपनी पत्नी को घर से निर्वासित कर दिया । सती-प्रथा की आड़ में तमाम नवयुवतियों को मृत पति के साथ चिता में जिन्दा भस्म कर दिया गया । तमाम राजाओं की हैवानियत तब तक पूरी नहीं होती थी जब तक वे पराजित राजाओं की रानियों को अपने हरम का हिस्सा नहीं बना लेते थे। जौहर-प्रथा इसी का नतीजा थी । यह सब तो बीते युग की बातें हैं, वर्तमान दौर में भी इस तरह की व्यथायें देखी और सुनी जा सकती हैं। बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी0 टी0 ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से परिचय देने के बावजूद इसलिये बाहर निकाल दिया क्योंकि वह वेश-भूषा से वातानुकूलित कोच में बैठने लायक नहीं लगती थीं। याद कीजिये दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा गाँधी जी को टेªन के प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर निकालने का दृश्य। राजस्थान में ‘साथिन’ नामक संस्था से जुड़ी भँवरी देवी ने जन-जागरूकता का बीड़ा उठाया तो हश्र्र बलात्कार के रूप में सामने आया। देवदासी प्रथा के नाम पर कुंवारी कन्या को भगवान के दरबार में सौंप देना और तत्पश्चात मन्दिर के पुरोहित द्वारा कन्या के साथ संभोग करना जैसी घटनायें भी कुछेक देशों में देखी जा सकती हैं। पंचायत संस्थाओं में निम्न वर्ग की महिलाओं को आरक्षण मिलने के साथ ही देश के कई क्षेत्रों में निर्वाचित सरपंचों के साथ बद्सलूकी की घटनायें अखबारों की सुर्खियाँ बनी । मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हुआ ‘सती काण्ड’ अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है । इक्कीसवीं सदी की ओर उन्मुख राष्ट्र की गर्वोक्ति घोषणाओं के साथ ही अखबारों में नित्य नाबालिगों के साथ दुष्कर्म की घटनायें छपती रहती हैं। मुम्बई की लोकल टेªन में एक वहशी द्वारा पाँच-छः यात्रियों के सामने एक बालिका से बलात्कार करना और उन यात्रियों का चुप-चाप तमाशा देखना क्या इंगित करता है ? सभ्य समाज का दर्जा पा चुकने के बाद भी घर की महिलाओं से बलात्कार कर बदला चुकाने का पाशविक अंदाज नहीं बदला है। विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र एवम् लोकतन्त्र व सभ्यता के स्वयंभू रक्षक अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी अपने कार्यालय की एक अदना सी महिला कर्मचारी मोनिका लेविंस्की के साथ अंतरंग क्षणों का लोभ नहीं छोड़ सके। एक सभ्य समाज की ये असभ्य घटनायें हमें कहाँ लेे जा रही हैं ?

आधुनिक समाज संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। आाधुनिकता के नाम पर सफलता हेतु शार्टकट रास्ते अपनाना, स्वतन्त्रता के नाम पर उन्मुक्तता का पक्ष- पोषण करना इसकी विशेषतायें बन चुकी हैं । ‘आई डोन्ट केयर’ की संस्कृति फलने-फूलने लगी है। शारीरिक वर्जनायें खत्म होती जा रही हैं । गली- मुहल्लों में तेजी से बढ़ता सौन्दर्य का बाजार, ब्यूटी-क्वीन प्रतियोगिताओं की भरमार, कुछ ही समय में सब कुछ पा लाने की महत्वाकांक्षा, विज्ञापन के नाम पर नारी माॅंडलों के शरीर का प्रदर्शन, फिल्मों और धारावाहिकों में रिश्तों के तेजी से टूटने का प्रचलन एवम् कम होते कपड़े किस आाधुनिकता व स्वतंत्रता के परिचायक हैं? क्या भारतीय संस्कृति अपनी मूल आस्थाओं को छोड़कर उस पाश्चात्य संस्कृति की तरफ उन्मुख हो रही है, जहाँ बात-बात में नारी स्वतन्त्रता के नाम पर छाती उधाड़ देना फैशन बन गया है?

इस संक्रमण काल के बीच 21वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षो में एक ऐसा वर्ग उभरा जो अपनी मुक्ति शारीरिक वर्जनाओं को तोड़ने में नहीं अपितु खोखली सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों को तोड़ने में देखता है। इनकी शक्लो-सूरत ओर हैसियत पर मत जाईये। ये न तो फेमिनिस्ट के रूप में नारी आन्दोलनों से जुड़ी हैं और न पश्चिमी देशों की उन नारियों की तरह है जो स्वतंत्रता के नाम पर अपनी छाती उघाड़कर प्रदर्शन करती हैं। न ही इनके साथ किसी बड़े घराने या काॅरपोरेट जगत या राजनैतिक दल का नाम जुड़ा हुआ है और न ही ये कोई बड़े-बड़े दावे करती हैं। ये वो महिलायें हैं जो हमारे पास-पड़ोस की और हमारे बीच की हैं, जिनसे हम न जाने कितने बार रूबरू हुए होंगे पर हमंे उनकी खासियत का पता ही नहीं। एक लम्बे समय से धर्मशास्त्रों और रूढ़ियों के नाम पर इन्हें यही बताया जाता रहा कि फला काम तुम्हारे लिए वर्जित है और यदि तुम ऐसा करने का प्रयास करोगी तो तुम्हारे ऊपर अपशकुन व ईश्वरीय प्रकोप का खतरा मंडरायेगा। पर ये औरों से अलग हैं क्योंकि वर्जनाओं को तोड़कर एक अलग लीक बनाना ही इनकी खासियत है। पाश्चात्य सभ्यता के समर्थक कुछ लोगों को नारी स्वतंत्रता का रास्ता दैहिक वर्जनाओं को तोड़ने और उन्मुुक्तता में दिखा। नतीजन, गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन, माॅडल बनने की होड,़ फिल्मों में काम पाने हेतु सर्वस्व न्यौछावर कर देने वालों की बढती भीड़ .... पर समाज का यह वर्ग ऐसा है जो अभी भी सिर से पांव तक पूरे कपड़े पहने अपनी बौद्धिकता और जीवटता के दम पर समाज की रूढ़िगत वर्जनाओं को तोड़ने का साहस रखता है।
कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस की लड़कियों ने तमाम रूढ़िगत वर्जनाओं और परम्पराओं को बहुत पीछे धकेल कर कुछ नये मानदण्ड स्थापित किये हैं। कर्मकाण्ड का सबसे प्रमुख तत्व पुरोहिती है और पांडित्य में बनारस का कोई सानी नहीं। प्राचीन काल से ही यहाँ के पंडितों ने दुनिया भर में अपनी धाक जमाई है। प्राचीनकाल में जहाँ लोमशा एवं लोपामुद्रा आदि नारियों ने ऋग्वेद के अनेक सूक्तों की रचना करके और मैत्रेयी, गार्गी, शाश्वती, घोषा, अदिति इत्यादि विदुषियों ने अपने ज्ञान से तब के तत्वज्ञानी पुरूषों को कायल बना रखा था, उसी परम्परा मंे अब पुरूष पुरोहितों की परम्परा को बनारस की लड़कियों ने तोड़ दिया है। तुलसीपुर स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा उतीर्ण कई लड़कियाँ अब लोगों के विवाह करवा रही हैं और यह जरूरी नहीं कि वे ब्राह्मण ही हों। महाविद्यालय की आचार्या नंदिता शास्त्री बड़े गर्व से बताती हैं कि विवाह कराने के लिये उनकी छात्राओं को बनारस ही नहीं वरन् दूर-दूर से लोग आमंत्रित कर रहे हैं। हैदराबाद में बसी यहाँ की पूर्व छात्रा मैत्रेयी को वैदिक रीति से विवाह कराने के लिए अमेरिका तक से आमंत्रण आ चुके हैं। जब इन छात्राओं ने आरम्भ में यह कार्य आरम्भ किया तो इनका विरोध करने के लिए परम्परागत पंडितांे ने वर व कन्या पक्ष को शास्त्रों से उद्धरण देकर काफी भड़काया पर अब वही पंडित इन लड़कियों का लोहा मानने लगे हैं। कारण- मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, उसकी सम्यक व्याख्या और वैवाहिक संस्कार की सभी रस्मों का पालन करवाने में लड़कियाँ परम्परागत पंडितों से कहीं आगे हैं। आम तौर पर कम पढ़े-लिखे पंडित विवाहों में शुद्ध मंत्र का उच्चारण तक नहीं कर पाते। अब ये छात्रायंे विवाह ही नहीं शांति यज्ञ, गृह प्रवेश, मंुडन, नामकरण और यज्ञोपवीत भी करा रही हंै। ऐसा नहीं है कि यह क्रांतिकारी बदलाव सिर्फ बनारस तक ही सीमित है वरन् देश के अन्य भागों में भी इस बदलाव को महसूस किया जाने लगा है। औद्योगिक महानगर कानपुर में कानपुर विद्या मंदिर डिग्री काॅलेज की प्राचार्या डाॅ0 आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करती हैं। उन्होंने जब छात्राओं को सार्वजनिक रूप से वेद पाठ आरम्भ कराया तो व्यापक विरोध भी झेलना पड़ा। यहाँ तक कि एक शंकराचार्य ने इसे वेद विरूद्ध तक घोषित कर दिया। पर आशारानी ने हार नहीं मानी और नतीजन आज उनकी तमाम छात्रायें कर्मकाण्ड कराने लगी हैं। हरिद्वार में कनखल स्थिति माँ योग शक्ति धाम की अधिष्ठाता माँ योग शक्ति ने अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल की साध्वी माँ ज्योतिषानन्दन को जगद्गुरू शंकराचार्य के समकक्ष पार्वत्याचार्य की उपाधि से अलंकृत किया तो गुस्साये साधु सन्तों ने किसी महिला को यह उपाधि देने के विरोध में जमकर हंगामा किया।

सिर्फ घरेलू कर्मकाण्डों तक ही क्यों, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने का साहस भी इन लड़कियों ने किया है, जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई। इस दिशा में सुनीति गाडगिल ने अलख जगाई जिन्होंने विवाह, पूजा, यज्ञ आदि करवाने में ही भूमिका नहीं निभाई वरन् श्राद्ध कर्म भी करवाकर मिसाल कायम की। बनारस के ही पाण्डेयपुर क्षेत्र की निवासी तनू उर्फ वन्दना जायसवाल, मंडुवाडीह की लक्ष्मीणा देवी, नगर निगम के सफाईकर्मी रहे गोलगड्ढा निवासी मुन्ना की विधवा बीदा देवी और भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डाॅ0 अलका मुखर्जी ने परिवार में किसी अन्य पुरूष सदस्य के न रहने पर अपनी माँ, पिता और पति का अंतिम संस्कार धार्मिक क्रियाओं के बीच विधिवत सम्पन्न किया। वन्दना जायसवाल ने घंट इत्यादि बाँधकर नित्य घाट पर अपनी माँ का तर्पण भी किया। अब तो इस सामाजिक बदलाव की बयार का असर देश के अन्य भागों में भी दिखाई पड़ने लगा। तभी तो कानपुर की डाॅ0 आशारानी राय महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार सम्पन्न कराने से नहीं हिचकतीं। अपने पिता और श्वसुर का अंतिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने ही सम्पन्न किया। यही नहीं कुछेक समय पहले तक प्रयाग के रसूलाबाद घाट पर महाराजिन बुआ नामक महिला श्मशानघाट में वैदिक रीति से अंतिम संस्कार सम्पन्न कराती थीं। राजस्थान के भीलवाड़ा में एक 72 वर्षीया विधवा की मृत्यु पर उसकी सात बेटियों ने मिलकर अर्थी को कंधा दिया तथा अंतिम संस्कार के लिये चिता को मुखाग्नि दी और पिण्डदान किया। परिवार में बेटों के न होने पर लोगों ने बड़े दामाद से मुखाग्नि दिलवाने का प्रयास किया पर सातों बेटियों ने कहा कि- ‘‘उनकी माँ ने बेटा न पैदा होने पर बेटियों को ही बेटों की तरह पाला तथा किसी भी तरह की कमी नहीं होने दी।’’ हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमी देवी ने तो अपने पति की अर्थी को बेटों को कन्धा तक नहीं लगाने दिया और अर्थी को कंधा देने की जिद करने पर उन्हें धक्के मारकर घर से निकाल दिया। उसने कहा कि मेरे पति के जिन्दा होने पर इन बेटों ने कभी हमारी सेवा नहीं की और न ही रोजमर्रा के खर्च के लिये कोई इन्तजाम किया और ऐसे में पति का निर्देश था कि- ‘‘इन अवारा कलयुगी बेटों को मेरी अर्थी में कंधा न लगाने दिया जाये।’’ अंततः अर्थी को दोनों बहुओं व पड़ोस की दो अन्य औरतों ने कंधा दिया और मुखाग्नि उसके चार पोतों ने दी। इसी प्रकार गोरखपुर स्थित सहजनवां के दीनदयाल उपाध्याय महिला विद्यालय में स्नातक की विकलांग छात्रा बुधवन्त सिंह ने अपने पिता की अर्थी को अपने हाथों से सजाया और कंधा देने वालों के अभाव में ठेले पर रखकर श्मशान घाट ले जाकर विधिवत मुखाग्नि देकर अपना कर्तव्य निभाया। बाँदा में निर्मला गर्ग नामक महिला ने पुत्र के होते हुए भी अपने पति की चिता को आग दी तो शाँहजहापुर में पेशे से इंजीनियर शिप्रा नामक लड़की ने सगाई के अगले ही दिन दिवंगत हुए अपने पिता की अर्थी को न केवल मेंहदी रचे हाथों से कांधों पर धरा बल्कि उन्हें मुखाग्नि देकर रूढ़ियों को भी ललकारा। धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो अंतिम संस्कार कोई भी सम्पन्न करा सकता है किन्तु अदृश्य की उत्पत्ति का अधिकार शास्त्रों में पुत्र और पौत्र के अलावा राजा व ब्राह्मण को ही होता है। भले ही धर्म के पुरोधा मानंे कि शवदाह के बाद का काम ब्राह्मण ही करेगा वरना आत्मा भटकेगी और अगले जन्म में शरीर का अंग-प्रत्यंग भी ठीक-ठाक नहीं होगा पर इन महिलाओं की मानें तो यह पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच है जो सारे पुण्य अकेले ही लूटना चाहता है। हिमाचल प्रदेश की घटना समाज के सामने यह भी सवाल खड़ा करती है कि अपने माँ-बाप की देखरेख न करने वाले बेटों को धार्मिक मान्यताओं के नाम पर माँ-बाप की अर्थी में कंधा देने का क्या नैतिक अधिकार है? निश्चिततः उस निरक्षर दलित महिला ने इसी बहाने माँ-बाप के प्रति संतानों को दायित्व बोध का पाठ भी पढ़ाया।

याद कीजिये ‘बीबी हो तो ऐसी’ फिल्म में नायिका रेखा का घोड़ी पर सवार होकर दूल्हे के द्वार बारात ले जाना। इस फिल्मी कथानक को भी लड़कियों ने हकीकत में बदल दिया। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई यानी भोलेनाथ की नगरी में गंगा एक बार फिर उल्टी बही। इस सब के पीछे कश्यप फिल्म एण्ड टेलीविजन रिसर्च इन्स्टीट्यूट के निदेशक डा0 डी0एल0कश्यप की प्रमुख भूमिका रही, जिन्होंने अपने तीन बेटों और दो बेटियों के हाथ बनारस के घमहापुर गाँव में एक साथ एक ही मण्डप में पीले किये। अभी तक दहेजलोलुप दूल्हों को लड़कियों द्वारा विवाह मण्डप से बाहर निकालने या शराबी दूल्हे के साथ विवाह करने से इन्कार करने जैसे उदाहरण ही सामने आये हैं पर परम्पराओं को दरकिनार करते हुए डा0 कश्यप के तीनों बेटों से विवाह करने उनकी दुल्हनें घोड़ी पर सवार होकर मय बारात उनके दरवाजे आयीं जहाँ दूल्हे के पिता ने बहुओं की आगवानी की तथा उन्हें घोड़ी से उतारकर उनका पाँव पूजा। जबकि परम्परा है कि लड़की का पिता दूल्हे का पाँव पूजता है। प्रतीकात्मक द्वारपूजा के बाद दुल्हनों को मंच पर महाराजा कुर्सी पर बिठाया गया और फिर दूल्हे राजा मंच पर आये। लड़की वालों की ओर से निभाये जाने वाले सभी रस्मोरिवाज लड़कों के पिता ने पूरे किये। इस विवाह में न तो कोई मंत्र पढ़ा गया और न ही सात फेरों के साथ कसमें खायी गयीं, अपितु सिर्फ जयमाल व सिन्दूरदान हुआ। इसी प्रकार जयपुर में कानून की छात्रा रही दो जुड़वा बहनें अपनी शादी के अवसर पर निकाली जानेवाली ‘बिन्दौरी’ में घोड़ी पर सवार होकर निकलीं। उनका मानना था कि- ‘‘यह क्रांतिकारी कदम दर्शाता है कि हमारे समाज में लड़के-लड़कियों में कोई भेद-भाव नहीं है।’’ उ0प्र0 के जौनपुर में जब शादी पश्चात एक लम्बे समय तक पति अपनी विवाहिता को लेने नहीं पहुँचे तो कुछेक लड़कियाँ खुद ही बारात (गौना) लेकर पतियों के दरवाजे पहुँच गयीं। यही नहीं आधी आबादी की प्रतीक नारियों ने अब अनचाहे दूल्हों को दरवाजे से लौटाना भी आरम्भ कर दिया है। गाय की बछिया समझकर किसी के भी हाथ में पगहा पकड़ा देने वाले माता-पिता की पगड़ी की लाज की खातिर, सामाजिक संस्कारों के बोझ तले दबकर अपना भविष्य बर्बाद करने की बजाय तमाम लड़कियों ने दहेज लोभी, शराबी, उम्रदराज इत्यादि जैसे दूल्हों को निडरता से दरवाजे से लौटाने में संकोच नहीं किया।

सामान्यतः शादी योग्य लड़कियांे के लिये लड़के ढूँढ़ने का काम पुरूष वर्ग का माना जाता रहा है पर लखनऊ के अमीनाबाद में रहने वाली नीलम पाण्डे 1996 से इस कार्य को सहजता के साथ कर रही हैं और अब तक उन्होंने सैकड़ों शादियाँ करवाई हैं। नीलम बेबाक रूप में स्वीकारती हैं कि- ‘‘वर्तमान परिवेश में शादी को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि दस काबिल लड़कियों पर मुश्किल से एक लड़का ढूँढ़ने पर मिलता है।’’ शायद यही कारण है कि तमाम लड़कियों ने अब अयोग्य वरों को शादी के मण्डप से बाहर निकालना आरम्भ कर दिया है। दुल्हन के वेश में सजी-धजी बैठी ये लड़कियाँ किसी ऐसे व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में नहीं चाहती, जो उनको व उनके परिवार को प्रतिष्ठाजनक स्थान न दे सके या दहेज की आड़ में धनलोलुपता का शिकार हो। अब तो कुछ ऐसे भी मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ लड़की ने कलयुग में स्वयंवर रचा कर वर चुनने की आजादी ली हो। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गाँव में 8 जुलाई 2008 को एक लड़की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर द्वारा अपना पति चुना। 8वीं पास 22 वर्षीया अन्नपूर्णा द्वारा स्वयंवर रचा कर वर चुनने की योजना का शुरू में समाज में काफी विरोध हुआ लेकिन समाज की परवाह किए बिना वह अपने रास्ते चलती रही। आखिरकार समाज भी साथ हो गया। स्वयंवर के प्रचार के लिए बाकायदा इलाके में पोस्टर लगाए गए और पास-पड़ोस के गाँवों में डुग्गी और लाउडस्पीकर के जरिए भी लोगों को इसकी जानकारी दी गई थी। स्वयंवर में शामिल होने वाले युवाओं की अधिकतम उम्र 26 साल तय की गई थी। अन्नपूर्णा से विवाह के इच्छुक लोगों को उसके पाँच धार्मिक सवालों का जवाब देना था। हल्बा आदिवासी समुदाय के युवकों को ही इसमें शामिल होने की अनुमति थी। स्वयंवर में केवल तीन युवक ही शामिल हुए। इनमें मात्र 12वीं पास और पेशे से किसान घनाराम नामक व्यक्ति ने स्वयंवर में पूछे सभी पाँच सवालों के सही जवाब दिये और अन्नपूर्णा ने इस व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में चुना।

वक्त के साथ पुरानी परम्परायें टूटती हैं और नयी परम्परायें स्थापित होती हैं। आंध्रप्रदेश का तिरूपति बालाजी मंदिर पूरे विश्व में विख्यात है और हर दिन यहाँ बेशुमार लोग भगवान बालाजी कोे अपने केश अर्पित करने आते हैं। इनमें अच्छी खासी तादाद महिलाओं की होती है और एक लम्बे समय से मंदिर में महिला मुण्डनकर्मियों को बिठाने की माँग उठती रही है। 31 मार्च 2005 को एक लम्बे संघर्ष बाद नाईनों को यहाँ नियुक्त करने का फैसला किया गया। इसके बाद तो इस निर्णय को भी धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर देखा जाने लगा और तर्क दिया गया कि- ‘‘प्रतीकात्मक रूप से स्त्रियाँ देवी लक्ष्मी की प्रतिनिधि हैं इसलिए उन्हें मुण्डन कर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कृत्य उनकी दरिद्रता को दर्शाता है।’’ पर नाईनों ने हार नहीं मानी और तर्क दिया कि इस कार्य से उन्हें रोजगार मिलेगा और उनकी दरिद्रता व गरीबी दूर हो सकेगी। यही नहीं कर्म के आधार पर पुरूष नाईयों से अपने को कमतर नहीं आंकने वाली इन महिलाओं ने यह भी कहा कि उनसे बाल उतरवाने वाली महिलायें अपने को ज्यादा सहज महसूस कर सकेंगी। समाज की दरियाकनूसी परम्पराओं के चलते जहाँ अभी भी दलितों के घरों में पूजा-पाठ व धार्मिक अनुष्ठानों हेतु पंडित ढूँढ़े नही मिलते, वहाँ बरेली के भमोरा इलाके की आशा और ज्योति नामक दो बहनें तमाम दलित और मलिन बस्तियों में जाकर अनुष्ठान करती हैं और इस कार्य से मिलने वाले धन को गरीब लड़कियों की शादी, भण्डारा या किसी पीड़ित व्यक्ति की सेवा पर खर्च कर देती हैं।

राजस्थान सदैव से सामंती समाज माना जाता रहा है पर उस सामंती समाज की विधवाओं ने उन अमानवीय सामाजिक रूढ़ियों को दुत्कारने का साहस दिखाया है, जहाँ सती प्रथा जैसी बुराईयों के महिमामण्डन के जरिये विधवाओं से जीने का हक तक छीना जाता रहा है। यह वही राजस्थान है जहाँ 1987 में देवराला सती काण्ड के दौरान सती रूपकँवर के चबूतरे पर चूड़ियाँ और सिन्दूर चढ़ाने की स्त्रियों में होड़ सी मची थी। अब उसी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘एकल नारी शक्ति संगठन’ के नेतृत्व में वैधव्य जीवन जी रही हजारों स्त्रियों ने उन साज-श्रंृगारों का इस्तेमाल करना आरम्भ कर दिया है जो विधवा होते ही समाज उनसे छीन लेता है। हाथों में मंेहदी, कलाईयों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, माथे पर बिंदिया और खूबसूरत परिधानों के साथ ये विधवायें मांगलिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर अपनी सहभागिता दर्ज करा रही हैं।

मुस्लिम समुदाय में जहाँ काजी का काम पुरूष के बूते का ही माना जाता रहा है, एक नारी ने पुरूषों का वर्चस्व तोड़ दिया है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की काजी शबनम आरा बेगम इस देश की पहली महिला काजी हैं। शबनम के काजी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काजी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काजी बना दिया। सन् 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काजी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काजी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काजी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुयीं। अंततः धमकियों और मुकदमों के बीच शबनम अपने को काजी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं। इसी प्रकार लखनऊ में अगस्त 2008 में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की अध्यक्ष नाइश हसन और दिल्ली के इमरान का निकाह एक महिला काजी डाॅ0 सईदा हमीद ने पढ़ाया। गौरतलब है कि डाॅ0 सईदा हमीद योजना आयोग की सदस्य भी हैं।

21वीं सदी में जब महिलायें, पुरूषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, ऐसे में सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों की आड़ में उन्हें गौण स्थान देना जागरूक महिलाओं के गले नीचे नहीं उतर रहा है। यही कारण है कि ऐसी रूढ़िगत मान्यताओं और परम्पराओं के विरूद्ध उन्हीं क्षेत्रों से सामाजिक बदलाव की बयार चली है, जिन्हें इन रूढ़िगत कर्मकाण्डों का गढ़ माना जाता रहा है। इस सामाजिक बदलाव का कारण जहाँ महिलाओं में आई जागरूकता है, जिसके चलते महिलायें अपने को दोयम नहीं मानतीं और कैरियर के साथ-साथ सामाजिक परम्पराओं के क्षेत्र में भी बराबरी का हक चाहती हैं। वर्षों से रस्मो-रिवाज के दरवाजों के पीछे शर्मायी -सकुचायी सी खड़ी महिलाओं की छवि अब सजग और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व में तब्दील हो चुकी है। आधुनिक महिलायें इस तर्क को बेबाकी से खारिज करतीं हैं कि पुण्य कमाने के क्षेत्र में ईश्वर ने पुरूषों को ज्यादा अधिकार दिये हैं। ऐसे तर्कों को वे पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच मात्र मानती है। उनके लिये सवाल अब परम्पराओं का ही नहीं वरन् उनके कसौटी पर खरे उतरने का भी है। मात्र किसी धार्मिक गं्रथ के उद्धरणों के आधार पर नारी शक्ति को दबाया नहीं जा सकता। अब ये महिलायें पूछने लगी हैं कि पुण्य के कामों के समय हाथ पर बाँधा जाने वाला कलावा लड़कों के दायें और लड़कियों के बायें हाथ पर क्यों बाँधा जाता है, क्यों नहीं दोनों के एक ही हाथ पर बाँध दिया जाता है? यदि पूजा-पाठ या पुण्य के कार्य कराने के लिए जनेऊ धारण करना शास्त्रों में जरूरी माना गया है तो पुरोहित का कार्य करने वाली महिला जनेऊ क्यों नहीं धारण कर सकती? योग्यता चाहे वह पुरूष की हो अथवा महिला की- बराबर ही कही जायेगी। जहाँ प्रकृति पुरूष-स्त्री को बिना किसी भेदभाव के बराबर धूप-छांव बाँटती हो, वहाँ धर्म या परम्परा की आड़ में अतार्किक आधार पर स्त्रियों को तमाम सुविधाओं से वंचित करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोई महिला यदि किसी क्षेत्र में जाना चाहती है तो मात्र इसलिए कि वह एक महिला है, उसको उस क्षेत्र में जाने से नहीं रोका जा सकता। आखिर अपनी पसन्द का क्षेत्र चुनने का सभी को अधिकार है। यह निर्णय करने का समय आ चुका है कि अज्ञानी एवं अल्पज्ञानी पुरूषों के भरोसे धर्म की सनातन परम्परा और उसके आचार-विचार सुरक्षित रहेंगे या शिक्षित-प्रशिक्षित नारियों के हाथ में उसकी पताका महफूज रहेगी? प्रख्यात ज्योतिषी के0ए0दुबे पद्मेश जैसे विद्वान भी इन छात्राओं के कदम से उत्साहित दिखते हैं और इससे प्रेरित होकर अपना उत्तराधिकारी किसी नारी को ही बनाना चाहते हैं। फर्क मात्र इतना है कि आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत सामाजिक मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठायी थी पर 21वीं सदी के इस दौर में महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं।
कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 3 मार्च 2009

२९ वर्ष की आयु में ही ग्राहम बेल ने किया टेलीफोन का अविष्कार

दुनिया में हर खोज के पीछे युवाओं की महती भूमिका रही है। नौजवानी का जज्बा लोगों की कल्पनाशीलता में जहाँ रंग भरता है, वहीँ कुछ कर दिखने का हौसला भी देता है। संचार क्रांति के इस दौर में टेलीफोन अपरिहार्य बन चुका है। जिसे देखो वही फ़ोन से चिपका हुआ है। पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि दुनिया में संचार क्रांति लाने वाले इस क्रन्तिकारी टेलीफोन के आविष्कारक महान वैज्ञानिक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने सिर्फ 29 साल की ही उम्र में ही 1876 में टेलीफोन की खोज कर ली थी। इसके एक साल बाद ही 1877 में उन्होंने बेल टेलीफोन कंपनी की स्थापना की। इसके बाद वह लगातार विभिन्न प्रकार की खोजों में लगे रहे। बेल टेलीफोन की खोज के बाद उसमें सुधार के लिए प्रयासरत रहे और 1915 में पहली बार टेलीफोन के जरिए हजारों किलोमीटर की दूरी से बात की। न्यूयार्क टाइम्स ने इस घटना को काफी प्रमुखता देते हुए इसका ब्यौरा प्रकाशित किया था। इसमें न्यूयार्क में बैठे बेल ने सैनफ्रांसिस्को में बैठे अपने सहयोगी वाटसन से बातचीत की थी। तीन मार्च 1847 को स्काटलैंड में पैदा हुए ग्राहम बेल शुरू से ही जिज्ञासु प्रवृति के थे और अपने विभिन्न प्रकार के विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए लगे रहते थे। इसके अलावा उनकी विभिन्न खोजों पर उनके निजी अनुभवों का भी प्रभाव था। उदाहरण के तौर पर जब उनके नवजात पुत्र की सांस की समस्याओं के कारण मौत हो गई तो उन्होंने एक मेटल वैक्यूम जैकेट तैयार किया जिससे सांस लेने में आसानी होती थी। उनका यह उपकरण 1950 तक काफी लोकप्रिय रहा और बाद के दिनों में इसमें और सुधार किया गया। अपने आसपास कई लोगों को बोलने एवं सुनने में कठिनाई होते देख उन्होंने इस दिशा में भी अपना ध्यान दिया और सुनने की समस्या के आकलन के लिए आडियोमीटर की खोज की। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के अलावा वैकल्पिक ऊर्जा और समुद्र के पानी से नमक हटाने की दिशा में भी काम किया।ग्राहम बेल की कई क्षेत्रों में एक साथ दिलचस्पी थी और वह काफी देर तक अध्ययनशील रहते थे। वह देर तक इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका पढ़ते थे। आज ग्राहम बेल के नाम 18 पेटेंट दर्ज हैं। इसके अलावा 12 पेटेंट उनके सहयोगियों के साथ दर्ज हैं। इन पेटेंटों में टेलीफोन, फोटोफोन, फोनोग्राफ और टेलीग्राफ शामिल हैं। उन्होंने आइसबर्ग का पता लगाने वाला एक उपकरण भी बनाया था, जिससे समुद्री यात्रा करने वाले नाविकों खासकर अत्यधिक ठंडे प्रदेशों में को विशेष मदद मिली। यही नहीं ग्राहम बेल ने चिकित्सा के क्षेत्र में भी काफी काम किया। सांस लेने के लिए उपयोगी उपकरण के साथ ही मूक बधिर लोगों की समस्या दूर करने के लिए काम किया। उन्होंने वैमानिकी के क्षेत्र में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है। मेटल डिटेक्टर जो आज आतंकवाद सहित अन्य प्रकार के अपराधों से लड़ने में कारगर उपकरण साबित हो रहा है, का अविष्कार भी ग्राहम बेल की ही देन है।ग्राहम बेल को अपने जीवन में कई पुरस्कार और सम्मान मिले। इन पुरस्कारों में से एक था फ्रांस का वोल्टा सम्मान जो उन्हें टेलीफोन की खोज के लिए दिया गया था। इस पुरस्कार की स्थापना नेपोलियन बोनापार्ट ने भौतिकीविद अलेस्रांद्रो वोल्टा के सम्मान में की थी। वोल्टा ने बैट्री को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी। बेल ने इस पुरस्कार में मिली विशाल राशि का उपयोग वोल्टा फंड, वोल्टा लैबोरेट्रीज और वोल्टा ब्यूरो सहित अन्य संस्थाओं की स्थापना में की ताकि नई खोज के कार्य को गति मिल सके। इस महान वैज्ञानिक का निधन दो अगस्त 1922 को हो गया, पर अपनी महान खोजों से जनमानस में वे सदैव जिन्दा रहेंगें। आज उनकी जयंती पर हम उनका पुण्य-स्मरण करते हैं और उनके युवा जज्बे को सलाम करते हैं !!

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

वैलेंटाइन डे की बधाई !!

प्रकृति ने हमें केवल प्रेम के लिए यहाँ भेजा है. इसे किसी दायरे में नहीं बाधा जा सकता है. बस इसे सही तरीके से परिभाषित करने की आवश्यकता है. हम २४ घंटे केवल प्रेम करना चाहते हैं, ज्यादा से ज्यादा सोना, अच्छा खाना, सुन्दरता को देखना और उसे अपना बनाना, दोस्तों के साथ रहना, परिवार का लुफ्त उठाना, खेलना और अच्छा पहनना और बहुत कुछ ...... लेकिन हम केवल दिन के कुछ सीमित हिस्से को ही प्रेम क्यों समझते हैं? जब हम हर समय प्रेम ही करना चाहते हैं तो फिर प्रकृति को क्यों नाराज करना !!
इसलिए यहाँ कायम रहने लिए हमें केवल प्रेम करना प्रेम करना प्रेम करना और प्रेम करना होगा !
***वैलेंटाइन डे की आप सभी को बहुत-बहुत बधाइयाँ***

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ऋतुराज वसंत का आगमन

ऋतुराज वसंत के आगमन के साथ ही सब कुछ बदला-बदला नज़र आता है. फिजा में रोमांस का जुनून छाने लगता है. मात्र मानव ही नहीं पूरी प्रकृति वसंत के आगोश में समा जानी चाहती है. प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिझाने लगता है, कवि की अभिव्यक्ति परवान चढ़ने लगती है, पेडों पर नए पत्ते दिखने लगते हैं,रंग-बिरंगे फूल खिलने लगते हैं, तितलियाँ उन पर मंडराने लगती हैं, हमारी संवेदनाएं ताजगी से भर उठती हैं. वसंत-पंचमी का आगाज़ सरस्वती जी की आराधना से आरम्भ होता है तो निराला जी की जयंती भी अब इस मस्तमौले वसंत के आगाज़ के साथ ही मनाये जानी लगी है. आज के सबसे प्रसिद्द गीतकार गोपाल दास 'नीरज'' जी की जन्म-तिथि भी इसी दौरान पड़ती है. पाश्चात्य देशों से तैरता-तैरता आया वैलेंटाइन डे की खुमारी भी इन दिनों अपने शवाब पर होती है. यूँ ही वसंत को ऋतुराज नहीं कहा गया है. फ़िलहाल यह मेरा सबसे पसंदीदा मौसम है और शायद आपका भी. तो आइये इसे जी भर कर जी लेते हैं. पता नहीं कब यह ख़त्म हो जाय. जिस तरह से पारिस्थितिक असंतुलन पैदा हो रहा है, उसमें सदैव यह भय बना रहता है कि ऋतुराज कितने दिन के मेहमान हैं !!!

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

आओ इश्क की बातें कर ले…….


आओ इश्क की बातें कर ले , आओ खुदा की इबादत कर ले ,
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

लबो पर कोई लफ्ज़ न रह जाए, खामोशी जहाँ खामोश हो जाए ;
सारे तूफ़ान जहाँ थम जाये , जहाँ समंदर आकाश बन जाए......!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

तुम अपनी आंखो में मुझे समां लेना , मैं अपनी साँसों में तुम्हे भर लूँ ,
ऐसी बस्ती में चले चलो , जहाँ हमारे दरमियाँ कोई वजूद न रह जाए !
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

कोई क्या दीवारे बनायेंगा , हमने अपनी दुनिया बसा ली है ,
जहाँ हम और खुदा हो, उसे हमने मोहब्बत का आशियाँ नाम दिया है.!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

मैं दरवेश हूँ तेरी जन्नत का ,रिश्तो की क्या कोई बातें करे.
किसी ने हमारा रिश्ता पूछा ,मैंने दुनिया के रंगों से तेरी मांग भर दी !
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

मोहब्बत और क्या किया जाये किसे से , ये तो मोहब्बत की इन्तेहाँ हो गई
किसी ने मुझसे खुदा का नाम पूछा और मैंने तेरा नाम ले लिया.................!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

आओ इश्क की बातें कर ले , आओ खुदा की इबादत कर ले ,
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!


vijay kumar sappatti
M: 09849746500
E: vksappatti@gmail.com
B: www.poemsofvijay.blogspot.com

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

अभी से चढ़ने लगा वेलेण्टाइन-डे का खुमार


वसंत का मौसम आ गया है। मौसम में रूमानियत छाने लगी है। हर कोई चाहता है कि अपने प्यार के इजहार के लिए उसे अगले वसंत का इंतजार न करना पड़े। सारी तैयारियां आरम्भ हो गई हैं। प्यार में खलल डालने वाले भी डंडा लेकर तैयार बैठे हैं। भारतीय संस्कृति में ऋतुराज वसंत की अपनी महिमा है। वेदों में भी प्रेम की महिमा गाई गई है। यह अलग बात है कि हम जब तक किसी चीज पर पश्चिमी सभ्यता का ओढ़ावा नहीं ओढ़ा लेते, उसे मानने को तैयार ही नहीं होते। ‘योग‘ की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘योगा‘ होकर आयातित हुआ। ऋतुराज वसंत और इनकी मादकता की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘वेलेण्टाइन‘ के पंखों पर सवार होकर अपनी खुमारी फैलाने लगे।

प्रेम एक बेहद मासूम अभिव्यक्ति है। मशहूर दार्शनिक ख़लील जिब्रान एक जगह लिखते हैं-‘‘जब पहली बार प्रेम ने अपनी जादुई किरणों से मेरी आंखें खोली थीं और अपनी जोशीली अंगुलियों से मेरी रूह को छुआ था, तब दिन सपनों की तरह और रातें विवाह के उत्सव की तरह बीतीं।‘‘ अथर्ववेद में समाहित प्रेम गीत भला किसको न बांध पायेंगे। जो लोग प्रेम को पश्चिमी चश्मे से देखने का प्रयास करते हैं, वे इन प्रेम गीतों को महसूस करें और फिर सोचें कि भारतीय प्रेम और पाश्चात्य प्रेम का फर्क क्या है?

फिलहाल वेलेण्टाइन-डे का खुमार युवाओं पर चढ़कर बोल रहा है। कोई इसी दिन पण्डित से कहकर अपना विवाह-मुहूर्त निकलवा रहा है तो कोई इसे अपने जीवन का यादगार लम्हा बनाने का दूसरा बहाना ढूंढ रहा है। एक तरफ नैतिकता की झंडाबरदार सेनायें वेलेण्टाइन-डे का विरोध करने और इसी बहाने चर्चा में आने का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं-‘ करोगे डेटिंग तो करायेंगे वेडिंग।‘ यही नहीं इस सेना के लोग अपने साथ पण्डितों को लेकर भी चलेंगे, जिनके पास ‘मंगलसूत्र‘ और ‘हल्दी‘ होगी। तो अब वेलेण्टाइन डे के बहाने पण्डित जी की भी बल्ले-बल्ले है। जब सबकी बल्ले-बल्ले हो तो भला बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कैसे पीछे रह सकती हैं। आर्थिक मंदी के इस दौर में ‘प्रेम‘ रूपी बाजार को भुनाने के लिए उन्होंने ‘वेलेण्टाइन-उत्सव‘ को बकायदा 11 दिन तक मनाने की घोषणा कर दी है। हर दिन को अलग-अलग नाम दिया है और उसी अनुरूप लोगों की जेब के अनुरूप गिट भी तय कर लिये हैं। यह उत्सव 5 फरवरी को ‘फ्रैगरेंस डे‘ से आरम्भ होगा तो 15 फरवरी को ‘फारगिव थैंक्स फारेवर योर्स डे‘ के रूप में खत्म होगा। यह भी अजूबा ही लगता है कि शाश्वत प्रेम को हमने दिनों की चहरदीवारी में कैद कर दिया है। खैर इस वर्ष ज्वैलरी पसंद लड़कियों के लिये बुरी खबर है कि मंहगाई के इस दौर में पिछले वर्ष का 12 फरवरी का ‘ज्वैलरी डे‘ और 13 फरवरी का ‘लविंग हार्टस डे‘ इस बार हटा दिया गया है। वेलेण्टाइन-डे के बहाने वसंत की मदमदाती फिजा में अभी से ‘फगुआ‘ खेलने की तैयारियां आरम्भ हो चुकी हैं।

5 फरवरी - फ्रैगरेंस डे
6 फरवरी - टैडीबियर डे
7 फरवरी - प्रपोज एण्ड स्माइल डे
8 फरवरी - रोज स्माइल प्रपोज डे
9 फरवरी - वेदर चॉकलेट डे
10 फरवरी - चॉकलेट मेक ए फ्रेंड टैडी डे
11 फरवरी - स्लैप कार्ड प्रामिस डे
12 फरवरी - हग चॉकलेट किस डे
13 फरवरी - किस स्वीट हर्ट हग डे
14 फरवरी - वैलेण्टाइन डे
15 फरवरी - फारगिव थैंक्स फारेवर योर्स डे

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

रात भर यूं ही.........


कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

चाहता हूँ कि तुम प्यार ही जताते रहो,
अपनी आंखो से तुम मुझे पुकारते रहो,
कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

चुपके से हवा ने कुछ कहा शायाद ..
या तुम्हारे आँचल ने कि कुछ आवाज़..
पता नही पर तुम गीत सुनाते रहो...
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये क्या हुआ , यादों ने दी कुछ हवा ,
कि आलाव के शोले भड़कने लगे ,
पता नही , पर तुम दिल को सुलगाते रहो
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये कैसी सनसनाहट है मेरे आसपास ,
या तुमने छेडा है मेरी जुल्फों को ,
पता नही पर तुम भभकते रहो..
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

किसने की ये सरगोशी मेरे कानो में ,
या थी ये सरसराहट इन सूखे हुए पत्तों की,
पता नही ,पर तुम गुनगुनाते रहो ;
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये कैसी चमक उभरी मेरे आसपास ,
या तुमने ली है ,एक खामोश अंगढाईं
पता नही पर तुम मुस्कराते रहो;
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

रविवार, 1 फ़रवरी 2009

युवा शक्ति को नमन की जरुरत: BHU में चरण छूने पर प्रतिबन्ध

बनारस अपनी वैदिक परम्पराओं, पांडित्य एवं कर्मकाण्डों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यही कारण है कि महात्मा बुद्ध ने भी वैदिक कर्मकांडो के विरूद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तन से पहले बनारस में अवस्थित सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया। बनारस में स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शिष्यों द्वारा गुरू के चरण छूने की लम्बी परंपरा है। वैसे भी पूर्वांचल में नया अनाज पैदा होने पर जब उसका नेवान किया जाता है तो लोग मुहल्ले भर में घूम कर बड़ों का चरण छूते हैं। इसी प्रकार कभी दान देते समय दाता दान स्वीकार करने वाले का चरण छूता था। इसके पीछे मकसद था कि लेने वाले के मन में याचक का भाव न जगे। पहली नजर में यह अटपटा भी नहीं लगता, पर बदलते दौर में किसी के प्रति आदर प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं। चरण छूना आदर का सूचक हो सकता है लेकिन यह दूसरों के अहं को ठेस भी पहुंचाता है। समाजशास्त्रियों की नजर में आज चरण छूना कई मायनों में अच्छा नहीं है क्योंकि चरण छूने की प्रथा छद्म व्यवहार का परिचायक हो रही है। इसके पीछे कुछ लोग दूसरों को भी भ्रम में रखने की कोशिश करते हैं। इसी के मद्देनजर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने चरण छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके लिए बकायदा विभाग में नोटिस तक जारी की गई है।

वस्तुतः इस सोच के पीछे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. एम0के0 चतुर्वेदी एक संस्मरण भी बताते हैं। प्रयाग में कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर आए थे। सब उनका चरण छू रहे थे। एक दृढ़ व्यक्तित्व का धनी सुदर्शन युवक आया। उसने नमस्ते किया और भीतर चला गया। इस घटना ने विश्वकवि को झकझोर कर रख दिया था। वह बहुत देर तक संयत नहीं हो पाए। युवक भी कोई नहीं बल्कि हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। प्रो. एम0के0 चतुर्वेदी जे0पी0 आंदोलन के दौरान अज्ञेय से मिलने दिल्ली गए। जैसे ही वह आए, उनके साथ गए लोग अज्ञेय के चरण की ओर लपके। पर अज्ञेय ने कहा कि- ‘‘नहीं! चरण छूने की जरूरत नहीं। युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ।‘‘ यह बात प्रो0 एम0के0 चतुर्वेदी के मन को अन्दर तक छू गई। अब उन्होंने इससे प्रेरणा लेते हुए अपने समाजशास्त्र विभाग में चरण छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। उनका तर्क है कि दिल की भाषा को दिल समझ लेता है। आदरणीय को अपने मन के भाव को समझाने के लिए चरण छूना जरूरी नहीं है।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

अभिव्यंजना द्वारा आकांक्षा यादव को ‘‘काव्य-कुमुद‘‘ सम्मान

कानपुर की चर्चित साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था ‘‘अभिव्यंजना‘‘ द्वारा युवा कवयित्री एवं साहित्यकार श्रीमती आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में सृजनात्मक योगदान एवं काव्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा के लिए ‘‘काव्य-कुमुद‘‘ की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं अन्तर्जाल पर प्रकाशित होने वाली श्रीमती आकांक्षा यादव वर्तमान में राजकीय बालिका इण्टर कालेज, नरवल, कानपुर में प्रवक्ता हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली श्रीमती आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘ इत्यादि प्रमुख हैं। आकांक्षा जी ''युवा'' ब्लॉग को भी सक्रिय सहयोग देती रहती हैं. उनको प्राप्त इस सम्मान पर शत्-शत् बधाई !!!

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

अख़बारों में भी छाया युवा ब्लॉग

युवा सरोकारों को समर्पित ''युवा'' ब्लॉग की चर्चा अब प्रिंट-मीडिया में भी होने लगी है। जागरण समूह द्वारा प्रकाशित दैनिक पत्र "आई-नेक्स्ट" ने आज २९ जनवरी, २००९ के अंक में ''युवा'' ब्लॉग पर आकांक्षा जी द्वारा प्रस्तुत ८ साल के बालक अमन रहमान की अद्भुत प्रतिभा को स्थान दिया है। इसके लिए हम आई-नेक्स्ट अख़बार और आकांक्षा जी का आभार व्यक्त करते हैं। यदि इसी प्रकार आप सभी शुभचिंतकों का प्यार और सहयोग मिलता रहेगा, तो निश्चितत: ''युवा'' ब्लॉग प्रगति-पथ पर अग्रसर होगा !!!

रविवार, 25 जनवरी 2009

लोक चेतना में स्वाधीनता की लय

स्वतंत्रता व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। आजादी का अर्थ सिर्फ राजनैतिक आजादी नहीं अपितु यह एक विस्तृत अवधारणा है, जिसमें व्यक्ति से लेकर राष्ट्र का हित व उसकी परम्परायें छुपी हुई हैं। कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत राष्ट्र को भी पराधीनता के दौर से गुजरना पड़ा। पर पराधीनता का यह जाल लम्बे समय तक हमें बाँध नहीं पाया और राष्ट्रभक्तों की बदौलत हम पुनः स्वतंत्र हो गये। स्वतंत्रता रूपी यह क्रान्ति करवटें लेती हुयी लोकचेतना की उत्ताल तरंगों से आप्लावित है। यह आजादी हमें यूँ ही नहीं प्राप्त हुई वरन् इसके पीछे शहादत का इतिहास है। लाल-बाल-पाल ने इस संग्राम को एक पहचान दी तो महात्मा गाँधी ने इसे अपूर्व विस्तार दिया। एक तरफ सत्याग्रह की लाठी और दूसरी तरफ भगतसिंह व आजाद जैसे क्रान्तिकारियों द्वारा पराधीनता के खिलाफ दिया गया इन्कलाब का अमोघ अस्त्र अंग्रेजों की हिंसा पर भारी पड़ी और अन्ततः 15 अगस्त 1947 के सूर्योदय ने अपनी कोमल रश्मियों से एक नये स्वाधीन भारत का स्वागत किया और 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र राष्ट्र के रूप में अवतरित हुआ।

इतिहास अपनी गाथा खुद कहता है। सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोकमानस के कंठ में, गीतों और किवदंतियों इत्यादि के माध्यम से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। लोकलय की आत्मा में मस्ती और उत्साह की सुगन्ध है तो पीड़ा का स्वाभाविक शब्द स्वर भी। कहा जाता है कि पूरे देश में एक ही दिन 31 मई 1857 को क्रान्ति आरम्भ करने का निश्चय किया गया था, पर 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे की शहादत से उठी ज्वाला वक्त का इन्तजार नहीं कर सकी और प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आगाज हो गया। मंगल पाण्डे के बलिदान की दास्तां को लोक चेतना में यूँ व्यक्त किया गया है- जब सत्तावनि के रारि भइलि/ बीरन के बीर पुकार भइल/बलिया का मंगल पाण्डे के/ बलिवेदी से ललकार भइल/मंगल मस्ती में चूर चलल/ पहिला बागी मसहूर चलल/गोरनि का पलटनि का आगे/ बलिया के बाँका सूर चलल।

1857 की क्रान्ति में जिस मनोयोग से पुरुष नायकों ने भाग लिया, महिलायें भी उनसे पीछे न रहीं। लखनऊ में बेगम हजरत महल तो झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई ने इस क्रान्ति की अगुवाई की। बेगम हजरत महल ने लखनऊ की हार के बाद अवध के ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर क्रान्ति की चिन्गारी फैलाने का कार्य किया- मजा हजरत ने नहीं पाई/ केसर बाग लगाई/कलकत्ते से चला फिरंगी/ तंबू कनात लगाई/पार उतरि लखनऊ का/ आयो डेरा दिहिस लगाई/आसपास लखनऊ का घेरा/सड़कन तोप धराई। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी वीरता से अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। झाँसी की रानी’ नामक अपनी कविता में सुभद्राकुमारी चैहान उनकी वीरता का बखान करती हैं, पर उनसे पहले ही बुंदेलखण्ड की वादियों में दूर-दूर तक लोक लय सुनाई देती है- खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी/पुरजन पुरजन तोपें लगा दई, गोला चलाए असमानी/ अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी/सबरे सिपाइन को पैरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी/......छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूढ़ेहूँ मिले नहीं पानी/अरे झाँसी वारी रानी, खूब लड़ी मरदानी।

बंगाल विभाजन के दौरान 1905 में स्वदेशी-बहिष्कार-प्रतिरोध का नारा खूब चला। अंग्रेजी कपड़ों की होली जलाना और उनका बहिष्कार करना देश भक्ति का शगल बन गया था, फिर चाहे अंग्रेजी कपड़ों में ब्याह रचाने आये बाराती ही हों- फिर जाहु-फिरि जाहु घर का समधिया हो/मोर धिया रहिहैं कुंआरि/ बसन उतारि सब फेंकहु विदेशिया हो/ मोर पूत रहिहैं उघार/ बसन सुदेसिया मंगाई पहिरबा हो/तब होइहै धिया के बियाह। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता व नृशंसता का नमूना था। इस हत्याकाण्ड ने भारतीयों विशेषकर नौजवानों की आत्मा को हिलाकर रख दिया। गुलामी का इससे वीभत्स रूप हो भी नहीं सकता। सुभद्राकुमारी चैहान ने ‘जलियावाले बाग में वसंत’ नामक कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की है-कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर/कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर/आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं/अपने प्रिय-परिवार देश से भिन्न हुए हैं/कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना/करके उनकी याद अश्रु की ओस बहाना/तड़प-तड़पकर वृद्ध मरे हैं गोली खाकर/शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जाकर/यह सब करना, किन्तु बहुत धीरे-से आना/यह है शोक-स्थान, यहाँ मत शोर मचाना।

कोई भी क्रान्ति बिना खून के पूरी नहीं होती, चाहे कितने ही बड़े दावे किये जायें। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक ऐसा भी दौर आया जब कुछ नौजवानों ने अंग्रेजी हुकूमत की चूल हिला दी, नतीजन अंग्रेजी सरकार उन्हें जेल में डालने के लिये तड़प उठी। उस समय अंग्रेजी सैनिकों की पदचाप सुनते ही बहनें चैकन्नी हो जाती थीं। तभी तो सुभद्राकुमारी चैहान ने ‘बिदा’ में लिखा कि- गिरफ्तार होने वाले हैं/आता है वारंट अभी/धक्-सा हुआ हृदय, मैं सहमी/हुए विकल आशंक सभी/मैं पुलकित हो उठी! यहाँ भी/आज गिरतारी होगी/फिर जी धड़का, क्या भैया की /सचमुच तैयारी होगी। आजादी के दीवाने सभी थे। हर पत्नी की दिली तमन्ना होती थी कि उसका भी पति इस दीवानगी में शामिल हो। तभी तो पत्नी पति के लिए गाती है- जागा बलम् गाँधी टोपी वाले आई गइलैं..../ राजगुरू सुखदेव भगत सिंह हो/तहरे जगावे बदे फाँसी पर चढ़ाय गइलै।

सरदार भगत सिंह क्रान्तिकारी आन्दोलन के अगुवा थे, जिन्होंने हँसते-हँसते फासी के फन्दों को चूम लिया था। एक लोकगायक भगत सिंह के इस तरह जाने को बर्दाश्त नहीं कर पाता और गाता है- एक-एक क्षण बिलम्ब का मुझे यातना दे रहा है/तुम्हारा फंदा मेरे गरदन में छोटा क्यों पड़ रहा है/मैं एक नायक की तरह सीधा स्वर्ग में जाऊँगा/अपनी-अपनी फरियाद धर्मराज को सुनाऊँगा/मैं उनसे अपना वीर भगत सिंह मांँग लाऊँगा। इसी प्रकार चन्द्रशेखर आजाद की शहादत पर उन्हें याद करते हुए एक अंगिका लोकगीत में कहा गया- हौ आजाद त्वौं अपनौ प्राणे कऽ /आहुति दै के मातृभूमि कै आजाद करैलहों/तोरो कुर्बानी हम्मै जिनगी भर नैऽ भुलैबे/देश तोरो रिनी रहेते। सुभाष चन्द्र बोस ने नारा दिया कि- ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, फिर क्या था पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी उनकी फौज में शामिल होने के लिए बेकरार हो उठे - हरे रामा सुभाष चन्द्र ने फौज सजायी रे हारी/कड़ा-छड़ा पैंजनिया छोड़बै, छोड़बै हाथ कंगनवा रामा/ हरे रामा, हाथ में झण्डा लै के जुलूस निकलबैं रे हारी।

महात्मा गाँधी आजादी के दौर के सबसे बड़े नेता थे। चरखा कातने द्वारा उन्होंने स्वावलम्बन और स्वदेशी का रूझान जगाया। नौजवान अपनी-अपनी धुन में गाँधी जी को प्रेरणास्त्रोत मानते और एक स्वर में गाते- अपने हाथे चरखा चलउबै/हमार कोऊ का करिहैं/गाँधी बाबा से लगन लगउबै/हमार कोई का करिहैं। 1942 में जब गाँधी जी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का आह्वान किया तो ऐसा लगा कि 1857 की क्रान्ति फिर से जिन्दा हो गयी हो। क्या बूढ़े, क्या नवयुवक, क्या पुरुष, क्या महिला, क्या किसान, क्या जवान...... सभी एक स्वर में गाँधी जी के पीछे हो लिये। ऐसा लगा कि अब तो अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही होगा। गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ ने इस ज्वार को महसूस किया और इस जन क्रान्ति को शब्दों से यूँ सँवारा- बीसवीं सदी के आते ही, फिर उमड़ा जोश जवानों में/हड़कम्प मच गया नए सिरे से, फिर शोषक शैतानों में/सौ बरस भी नहीं बीते थे सन् बयालीस पावन आया/लोगों ने समझा नया जन्म लेकर सन् सत्तावन आया/आजादी की मच गई धूम फिर शोर हुआ आजादी का/फिर जाग उठा यह सुप्त देश चालीस कोटि आबादी का।

भारत माता की गुलामी की बेड़ियाँ काटने में असंख्य लोग शहीद हो गये, बस इस आस के साथ कि आने वाली पीढ़ियाँ स्वाधीनता की बेला में साँस ले सकें। इन शहीदों की तो अब बस यादें बची हैं और इनके चलते पीढ़ियाँ मुक्त जीवन के सपने देख रही हैं। कविवर जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ इन कुर्बानियों को व्यर्थ नहीं जाने देते- शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले/वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा/कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे/जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमाँ होगा।

देश आजाद हुआ। 15 अगस्त 1947 के सूर्योदय की बेला में विजय का आभास हो रहा था। फिर कवि लोकमन को कैसे समझाता। आखिर उसके मन की तरंगें भी तो लोक से ही संचालित होती हैं। कवि सुमित्रानन्दन पंत इस सुखद अनुभूति को यूँ सँजोते हैं-चिर प्रणम्य यह पुण्य अहन्, जय गाओ सुरगण/आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन/नव भारत, फिर चीर युगों का तमस आवरण/ तरुण-अरुण-सा उदित हुआ परिदीप्त कर भुवन/सभ्य हुआ अब विश्व, सभ्य धरणी का जीवन/ आज खुले भारत के संग भू के जड़ बंधन/शांत हुआ अब युग-युग का भौतिक संघर्षण/मुक्त चेतना भारत की यह करती घोषण! देश आजाद हो गया, पर अंग्रेज इस देश की सामाजिक-सांस्कृतिक- आर्थिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। एक तरफ आजादी की उमंग, दूसरी तरफ गुलामी की छायाओं का डर......गिरिजाकुमार माथुर ‘पन्द्रह अगस्त’ की बेला पर उल्लास भी व्यक्त करते हैं और सचेत भी करते हैं-आज जीत की रात, पहरुए, सावधान रहना/खुले देश के द्वार, अचल दीपक समान रहना/ऊँची हुई मशाल हमारी, आगे कठिन डगर है/शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है/शोषण से मृत है समाज, कमजोर हमारा घर है/किन्तु आ रही नई जिंदगी, यह विश्वास अमर है। उल्लास और सचेतता के बीच अन्ततः 26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र राष्ट्र के रूप में अवतरित हुआ।

स्वतंत्रता की कहानी सिर्फ एक गाथा भर नहीं है बल्कि एक दास्तान है कि क्यों हम बेड़ियों में जकड़े, किस प्रकार की यातनायें हमने सहीं और शहीदों की किन कुर्बानियों के साथ हम आजाद हुये। यह ऐतिहासिक घटनाक्रम की मात्र एक शोभा यात्रा नहीं अपितु भारतीय स्वाभिमान का संघर्ष, राजनैतिक दमन व आर्थिक शोषण के विरूद्ध लोक चेतना का प्रबुद्ध अभियान एवं सांस्कृतिक नवोन्मेष की दास्तान है। जरूरत है हम अपनी कमजोरियों का विश्लेषण करें, तद्नुसार उनसे लड़ने की चुनौतियाँ स्वीकारें और नए परिवेश में नए जोश के साथ आजादी के नये अर्थों के साथ एक सुखी व समृद्ध भारत का निर्माण करें।
आकांक्षा

शनिवार, 24 जनवरी 2009

मैं अजन्मी (राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष)

मैं अजन्मी
हूँ अंश तुम्हारा
फिर क्यों गैर बनाते हो
है मेरा क्या दोष
जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो

मै माँस-मज्जा का पिण्ड नहीं
दुर्गा, लक्ष्मी औ‘ भवानी हूँ
भावों के पुंज से रची
नित्य रचती सृजन कहानी हूँ

लड़की होना किसी पाप
की निशानी तो नहीं
फिर
मैं तो अभी अजन्मी हूँ
मत सहना मेरे लिए क्लेश
मत सहेजना मेरे लिए दहेज
मैं दिखा दूँगी
कि लड़कों से कमतर नहीं
माद्दा रखती हूँ
श्मशान घाट में भी अग्नि देने का

बस विनती मेरी है
मुझे दुनिया में आने तो दो!!
आकांक्षा यादव

सोमवार, 19 जनवरी 2009

आठ साल के बालक की अद्भुत प्रतिभा

कहते हैं प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। इसका साक्षात उदाहरण है 8 साल का अमन रहमान। यह होनहार बालक देहरादून के कालेज आफ इंट्रेक्टिव आट्र्स में कम्प्यूटर से निर्मित जीव प्रोत्साहन फिल्म पर स्नातक छात्रों को पढ़ा रहा है। अपनी उम्र से दुगुने बीएससी लेवल के छात्र-छात्राओं को एनिमेशन के गुर सिखाने वाले इस अद्भुत प्रतिभा को देखकर अच्छे-अच्छे दांतो तले अंगुली दबा लेते हैं। चुक्खूवाला में एक छोटे से स्कूटर मैकेनिक एम0 रहमान के घर 26 जुलाई 2000 में जन्मे सेंट थामस के कक्षा चार के छात्र अमन को अपने भाई को कम्प्यूटर से जूझते देख इसका शौक जगा। पिता ने मोहित के लिए सेकंड हैंड कम्प्यूटर खरीदा था लेकिन उस पर कब्जा जमा लिया अमन ने। लिहाजा, अब कम्प्यूटर था और अमन। अंगुलियों ने वह जादू जगाया कि बड़े-बड़े उसके कायल हो गए। बेसिक सीख जल्द ही वह पिता से तमाम साटवेयर लाने की जिद करने लगा। पुत्र की धुन ने पिता को भी उत्साहित कर दिया। हिल्ट्रान सेंटर आॅफ एक्सीलेंस में अपनी मेधा से उसने मल्टीमीडिया में वह स्पीड पकड़ी कि अच्छों-अच्छों की पकड़ से बाहर हो गया। अब तक वह डाटा लाजिस्टिक्स, आजीविका सुधार परियोजना आदि के लिए वेब पेज भी डिजाइन कर चुका है। ‘द एनिमेटर‘ के नाम से मशहूर दून के इस नन्हें जीनियस की आवाज अब लंदन तक जा पहुंची है। लंदन की एक एजेंसी ने अमन की इस खूबी पर समाचार भी प्रकाशित किया है। कालेज ने तो अमन का नाम ‘गिनीज बुक आफ वर्ड रिकॉर्ड ‘ में विश्व के सबसे कम उम्र के प्रवक्ता रूप में शुमार करने की अपील की है। इस 8 वर्षीय नन्हें जीनियस अमन रहमान को ढेरों बधाई.......!!!
आकांक्षा

शनिवार, 17 जनवरी 2009

भोर


भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा,

रवि ने किया दूर ,जग का दुःख भरा अन्धकार ;
किरणों ने बिछाया जाल ,स्वर्णिम किंतु मधुर
अश्व खींच रहें है रविरथ को अपनी मंजिल की ओर ;
तू भी हे मानव , जीवन रूपी रथ का सार्थ बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

सुंदर प्रभात का स्वागत ,पक्षिगण ये कर रहे
रही कोयल कूक बागों में , भौंरें ये मस्त तान गुंजा रहे ,
स्वर निकले जो पक्षी-कंठ से ,मधुर वे मन को हर रहे ;
तू भी हे मानव , जीवन रूपी गगन का पक्षी बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

खिलकर कलियों ने खोले ,सुंदर होंठ अपने ,
फूलों ने मुस्कराकर सजाये जीवन के नए सपने ,
पर्णों पर पड़ी ओस ,लगी मोतियों सी चमकने ,
तू भी हे मानव ,जीवन रूपी मधुबन का माली बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

प्रभात की ये रुपहली किरने ,प्रभु की अर्चना कर रही
साथ ही इसके ,घंटियाँ , मंदिरों की एक मधुर धुन दे रही ,
मन्त्र और श्लोक प्राचीन , पंडितो की वाणी निखार रही
तू भी हे मानव ,जीवन रूपी देवालय का पुजारी बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!

प्रक्रति ,जीवन के इस नए भोर का स्वागत कर रही
जैसे प्रभु की साड़ी सृष्टि ,इस का अभिनन्दन कर रही ,
और वसुंधरा पर ,एक नए युग ,नए जीवन का आवहान कर रही ,
तू भी हे मानव ,इस जीवन रूपी सृष्टि का एक अंग बन जा !
भोर भई मनुज अब तो तू उठ जा !!!


vijay kumar sappatti
M : 09849746500
E : vksappatti@gmail.com
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बुधवार, 14 जनवरी 2009

प्रशासन और साहित्य के ध्वजवाहक : कृष्ण कुमार यादव

एक समय ऐसा भी था जब सभी क्षेत्रों-वर्गों में साहित्यकारों-रचनाकारों की बड़ी संख्या होती थी। वर्तमान समाज में दूरदर्शनी संस्कृति के चलते पठन-पाठन से दूर मात्र येनकेन धनोपार्जन मुख्य उद्देश्य बन चुका है। रायबरेली के दौलतपुर ग्राम में जन्मे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी झाँसी में रेलवे विभाग में सेवारत होते हुए भी अनवरत् साहित्यिक लेखन करते रहे और अन्ततः हिन्दी साहित्य में ‘द्विवेदी युग‘ नाम से मील के पत्थर बने। साहित्य की ऐतिहासिक पत्रिका ‘सरस्वती‘ का सम्पादन उन्होंने कानपुर के जूही मोहल्ले में किया।

इसी संदर्भ में दो घटनाओं की चर्चा बिना यह बात अपूर्ण रहेगी। हिन्दी साहित्य के भीष्म पितामह तथा तमाम साहित्यकारों के निर्माता पद्मविभूषण पं0 श्री नारायण चतुर्वेदी ने लंदन में प्राचीन इतिहास से एम0ए0 किया। उनकी पहली कृति-'महात्मा टाल्सटाय' सन् 1917 में प्रकाशित हुई। इनके पिता पं0 द्वारिका प्रसाद चतुर्वेदी ने भी विदेशी शासन काल में राजकीय सेवा में रहते हुए गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा भारतीयों के साथ चालाकी से किये गये योजनापूर्वक षडयन्त्र का यथार्थ चित्रण करते हुए एक ग्रंथ लिखा। नतीजन, अंग्रेजी शासन ने बौखला कर उन्हें माफी माँगने पर बाध्य किया पर ऐसे समय में उन्होंने इस्तीफा देकर अपनी देशभक्ति का प्रमाण दिया। उनके सुपुत्र जीवनपर्यन्त शिक्षा विभाग, सूचना विभाग तथा उपनिदेशक आकाशवाणी के उच्च प्रशासनिक पदों पर रहते हुए अनेकों पुस्तकों की रचना के अलावा अवकाश ग्रहण पश्चात भी लगभग चार दशकों तक विभिन्न प्रकार से हिन्दी की सेवा एवं ‘सरस्वती‘ का सम्पादन आदि सक्रिय रूप से करते रहे। उन्होंने अपने सेवाकाल में हिन्दी के अनेक शलाका-पुरूष निर्माण किये जो साहित्य की विभिन्न विधाओं के प्रकाश स्तम्भ बने। इसी प्रकार उच्चतर प्रशासनिक सेवा आई0सी0एस0 (अब परिवर्तित होकर आई0ए0एस0) उत्तीर्ण करके उत्तर प्रदेश कैडर के अन्तिम अधिकारी डा0 जे0डी0 शुक्ल प्रदेश के अनेक शीर्षस्थ पदों पर सफल प्रशासनिक अधिकारी होते हुए भी हिन्दी तथा तुलसीदास के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थे। उनके ऊपर लेख, अन्त्याक्षरी तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलनों में वे सक्रिय होकर भाग लेते रहे।

हिन्दी साहित्य के प्रति दीवानगी विदेशियों में भी रही है। इटली के डा0 लुइजि पियो तैस्सीतोरी ने लोरेंस विश्वविद्यालय से सन् 1911 में सर्वप्रथम ‘तुलसी रामायण और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन‘ पर शोध करके हिन्दी में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वे इटली की सेना में भी सेवारत रहे। तत्पश्चात भारत में जीवनपर्यन्त रहकर इस विदेशी शंकराचार्य ने अनेक कृतियाँ लिखीं जिसमें ‘शंकराचार्य और रामानुजाचार्य का तुलसी पर प्रभाव‘ ‘वैसवाड़ी व्याकरण का तुलसी पर प्रभाव‘ प्रमुख हैं। यहाँ रहकर वह हिन्दी में बोलते और पत्र-व्यवहार भी भारत में हिन्दी में ही करते थे। डा0 तैस्सीतोरी पुरातत्व के प्रति भी लगाव होने से राजस्थान में ऊँट की सवारी करके जानकारी अर्जित करते रहे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि हिन्दी का यह विदेशी निष्पृह सेवक मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में ‘बीकानेर‘ में स्वर्ग सिधार गया। उसकी समाधि बीकानेर में तथा विश्व में सर्वप्रथम इनकी प्रतिमा की स्थापना ‘तुलसी उपवन‘ मोतीझील, कानपुर में करने इटली के सांस्कृतिक दूत प्रो0 फरनान्दो बरतोलनी आये। उन्होंने प्रतिमा स्थापना के समय आश्चर्यमिश्रित शब्दों में कहा कि हमारे देश में भी नहीं मालूम है कि हमारे देश का यह युवा इण्डिया की राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रथम शोधार्थी है। डा0 तैस्सीतोरी ने विश्वकवि तुलसीदास को वाल्मीकि रामायण का अनुवादक न मानते हुए सर्वप्रथम उनको स्वतन्त्र रचनाकार के रूप में सिद्ध किया।

(डा० बद्रीनारायण तिवारी संग कृष्ण कुमार यादव)

(वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर संग कृष्ण कुमार यादव)

तीस वर्षीय युवा अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव पर लिखते समय उपरोक्त घटनाक्रम स्मरण हो आये। वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों से तद्विषयक चर्चा करने पर वह ‘समयाभाव‘ कहते हुए साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यों के प्रति अभिरुचि नहीं रखते हैं। जिन कंधों के ऊपर राष्ट्र का नेतृत्व टिका हुआ है, यदि वे ही समयाभाव की आड़ में साहित्य-संस्कृति की अपनी सुदृढ़ परम्पराओं की उपेक्षा करने लगें तो राष्ट्र की आगामी पीढ़ियाँ भला उनसे क्या सबक लेंगीं? पर सौभाग्यवश अभी भी प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ ऐसे अधिकारी हैं जो अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी समझते हैं और इसे अपने दायित्वों का ही एक अंग मानकर क्रियाशील हैं। ऐसे अधिकारियों के लिए पद की जिम्मेदारियां सिर्फ कुर्सी से नहीं जुड़ी हुई हैं बल्कि वे इसे व्यापक आयामों, मानवीय संवेदनाओं और अनुभूतियों के साथ जोड़कर देखते हैं। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव ऐसे ही अधिकारियों में से हैं। प्रशासन में बैठकर भी आम आदमी के मर्म और उसके जीवन की जद्दोजहद को जिस गहराई से श्री यादव छूते हैं, वह उन्हें अन्य अधिकारियों से अलग करती है। जीवन तो सभी लोग जीते हैं, पर सार्थक जीवन कम ही लोग जीते हैं। नई स्फूर्ति, नई ऊर्जा, नई शक्ति से आच्छादित श्री यादव प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन की इस उक्ति के सार्थक उदाहरण हैं कि-‘‘सिर्फ सफल होने की कोशिश न करें, बल्कि मूल्य-आधारित जीवन जीने वाला मनुष्य बनने की कोशिश कीजिए।‘‘ आपके सम्बन्ध में काव्य-मर्मज्ञ एवं पद्मभूषण श्री गोपाल दास ‘नीरज‘ जी के शब्द गौर करने लायक हैं- ‘‘कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ साहित्यकार हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’’

प्रशासन के साथ साहित्य में अभिरुचि रखने वाले श्री कृष्ण कुमार युवा पीढ़ी के अत्यन्त सक्रिय रचनाकार हैं। पदीय दायित्वों का निर्वाहन करते हुए और लोगों से नियमित सम्पर्क-संवाद स्थापित करते हुए जो बिंब उनके मन-मस्तिष्क पर बनते हैं, उनकी कलात्मक अभिव्यंजना उनकी साहित्यिक रचनाओं में स्पष्ट देखी जा सकती है। इन विलक्षण रचनाओं के गढ़ने में उनकी संवेदनशीलता, सतत् काव्य-साधना, गहन अध्ययन, चिंतन-अवचिंतन, अवलोकन, अनुभूतियों आदि की महत्वपूर्ण भूमिका है। बकौल प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित- ’’कृष्ण कुमार यादव न किसी वैचारिक आग्रह से प्रतिबद्ध हैं और न किसी कलात्मक फैशन से ग्रस्त हैं। उनका आग्रह है- सहज स्वाभाविक जीवन के प्रति और रचनाओं में उसी के यथावत अकृत्रिम उद्घाटन के प्रति।’’ यही कारण है कि मुख्यधारा के साथ-साथ बाल साहित्य से भी रचनात्मक जुड़ाव रखने वाले श्री यादव की अल्प समय में ही दो निबन्ध संग्रह ’’अभिव्यक्तियों के बहाने’’ व ’’अनुभूतियाँ और विमर्श’’, एक काव्य संग्रह ’’अभिलाषा’’, 1857-1947 की क्रान्ति गाथा को सहेजती ’’क्रान्ति-यज्ञ’’ एवं भारतीय डाक के इतिहास को कालानुक्रम में समेटती ’’इण्डिया पोस्ट: 150 ग्लोरियस ईयर्स’’ सहित कुल पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अपने व्यस्ततम शासकीय कार्यों में साहित्य या रचना-सृजन को बाधक नहीं मानने वाले श्री यादव की रचनाएँ देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और सूचना-संजाल के इस दौर में तमाम अन्तर्जाल पत्रिकाओं- सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट इत्यादि में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। आकाशवाणी से कविताओं के प्रसारण के साथ-साथ दो दर्ज़न से अधिक प्रतिष्ठित काव्य संकलनों में उनकी सशक्त रचनाधर्मिता के दर्शन होते हैं। अल्पायु में ही प्रशासन के साथ-साथ उनकी विलक्षण रचनाधर्मिता के मद्देनजर कानपुर से प्रकाशित ’’बाल साहित्य समीक्षा’’ एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ’’गुफ्तगू'' पत्रिकाओं ने उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक जारी किये हैं। यही नहीं उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को समेटती और एक साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में उनके योगदान को परिलक्षित करती पुस्तक ’’बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव’’ शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। निश्चिततः ऐसे में उनकी रचनाधर्मिता ऐतिहासिक महत्व की अधिकारी है। प्रशासनिक पद पर रहने के कारण वे जीवन के यथार्थ को बहुत बारीकी से महसूस करते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति चित्रण और जीवन के श्रृंगार के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सरोकारों से भरपूर जीवन का यथार्थ और भी मन को गुदगुदाता है। प्रसिद्ध साहित्यकार डा0 रामदरश मिश्र लिखते हैं कि- ’’कृष्ण कुमार की कविताएं सहज हैं, पारदर्शी हैं, अपने समय के सवालों और विसंगतियों से रूबरू हैं। इनकी संवेदनशीलता अपने भीतर से एक मूल्यवादी स्वर उभारती है।’’ वस्तुतः एक प्रतिभासम्पन्न, उदीयमान् नवयुवक रचनाकार में भावों की जो मादकता, मोहकता, आशा और महत्वाकांक्षा की जो उत्तेजना एवं कल्पना की जो आकाशव्यापी उड़ान होती है, उससे कृष्ण कुमार जी का व्यक्तित्व-कृतित्व ओत-प्रोत है। ‘क्लब कल्चर‘ एवं अपसंस्कृति के इस दौर में एक युवा प्रशासनिक अधिकारी की हिन्दी-साहित्य के प्रति ऐसी अटूट निष्ठा व समर्पण शुभ एवं स्वागत योग्य है। ऐसा अनुभव होता है कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन के जनपद आज़मगढ़ की माटी का प्रभाव श्री यादव पर पड़ा है।

श्री कृष्ण कुमार यादव अपनी कर्तव्यनिष्ठा में ऊपर से जितने कठोर दिखाई पड़ते हैं, वह अन्तर्मन से उतने ही कवि-हृदय के कोमल व्यक्तित्व वाले हैं। स्पष्ट सोच, पारखी दृष्टिकोण एवम् दृढ़ इच्छाशक्ति से भरपूर श्री यादव जी की जीवन संगिनी श्रीमती आकांक्षा यादव भी संस्कृत विषय की प्रखर प्रवक्ता एवं विदुषी कवयित्री व लेखिका हैं, सो सोने में सुहागा की लोकोक्ति स्वतः साकार हो उठती है। सुविख्यात समालोचक श्री सेवक वात्स्यायन इस साहित्यकार दम्पत्ति को पारस्परिक सम्पूर्णता की उदाहृति प्रस्तुत करने वाला मानते हुए लिखते हैं - ’’जैसे पंडितराज जगन्नाथ की जीवन-संगिनी अवन्ति-सुन्दरी के बारे में कहा जाता है कि वह पंडितराज से अधिक योग्यता रखने वाली थीं, उसी प्रकार श्रीमती आकांक्षा और श्री कृष्ण कुमार यादव का युग्म ऐसा है जिसमें अपने-अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कारण यह कहना कठिन होगा कि इन दोनों में कौन दूसरा एक से अधिक अग्रणी है।’’

श्री यादव की कृतियों पर समीक्षक ही अपने विचार व्यक्त करने की क्षमता रखते हैं पर इतने कम समय में उन्होंने साहित्यिक एवं प्रशासनिक रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, जो विरले ही देखने को मिलती हैं। प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती, अस्तु प्रशासकीय व्यस्तताओं के मध्य विराम समय में उनकी सरस्वती की लेखनी सतत् चलती रहती है। यही नहीं, वह दूसरों को भी उत्साहित करने में सक्रिय योगदान देते रहते हैं। उनकी पुस्तक ’’अनुभूतियाँ और विमर्श’’ के कानपुर में विमोचन के दौरान पद्मश्री गिरिराज किशोर जी के शब्द याद आते हैं- ’’आज जब हर लेखक पुस्तक के माध्यम से सिर्फ आपने बारे में बताना चाहता है, ऐसे में कृष्ण कुमार जी की पुस्तक में तमाम साहित्यकारों व मनीषियों के बारे में पढ़कर सुकून मिलता है और इस प्रकार युवा पीढ़ी को भी इनसे जोड़ने का प्रयास किया गया है।’’ मुझे ऐसा अनुभव होता है कि ऐसे लगनशील व कर्मठ व्यक्तित्व वाले श्री कृष्ण कुमार यादव पर साहित्य मनीषी कविवर डा0 अम्बा प्रसाद ‘सुमन’ की पंक्तियाँ उनके कृतित्व की सार्थकता को उजागर करती हैं-चरित्र की ध्वनि शब्द से ऊँची होती है/कल्पना कर्म से सदा नीचे होती है/प्रेम जिहृI में नहीं नेत्रों में है/नेत्रों की वाणी की व्याख्या कठिन है/मौन रूप प्रेम की परिभाषा कठिन है /चरित्र करने में है कहने में नहीं/चरित्र की ध्वनि शब्द से ऊँची होती है।
डा0 बद्री नारायण तिवारी, संयोजक
- राष्ट्रभाषा प्रचार समिति-वर्धा, उत्तर प्रदेश
पूर्व अध्यक्ष-उ0प्र0 हिन्दी साहित्य सम्मेलन, संयोजक-मानस संगम
38/24, शिवाला, कानपुर (उ0प्र0)-208001

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

स्वामी विवेकानंद


आज भी परिभाषित है
उसकी ओज भरी वाणी से
निकले हुए वचन ;
जिसका नाम था विवेकानंद !

उठो ,जागो , सिंहो ;
यही कहा था कई सदियाँ पहले
उस महान साधू ने ,
जिसका नाम था विवेकानंद !

तब तक न रुको ,
जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो ...
कहा था उस विद्वान ने ;
जिसका नाम था विवेकानंद !

सोचो तो तुम कमजोर बनोंगे ;
सोचो तो तुम महान बनोंगे ;
कहा था उस परम ज्ञानी ने
जिसका नाम था विवेकानंद !

दूसरो के लिए ही जीना है
अपने लिए जीना पशु जीवन है
जिस स्वामी ने हमें कहा था ,
उसका नाम था विवेकानंद !

जिसने हमें समझाया था की
ईश्वर हमारे भीतर ही है ,
और इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है
उसका नाम था विवेकानंद !

आओ मित्रो , हम एक हो ;
और अपनी दुर्बलता से दूर हो ,
हम सब मिलकर ; एक नए समाज ,
एक नए भारत का निर्माण करे !
यही हमारा सच्चा नमन होंगा ;
भारत के उस महान संत को ;
जिसका नाम था स्वामी विवेकानंद !!!

vijay kumar sappatti

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सोमवार, 12 जनवरी 2009

संक्रमण काल के दौर में युवा शक्ति

(स्वामी विवेकानंद का जन्म-दिवस:१२ जनवरी ''युवा-दिवस'' के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर देश की युवा शक्ति की संक्रमणकालीन स्थिति पर यह लेख प्रस्तुत करते हुए ''युवा'' ब्लॉग की तरफ से सभी को ''युवा-दिवस'' पर हार्दिक शुभकामनायें अर्पित करते हैं !!)

युवा किसी भी समाज और राष्ट्र के कर्णधार हैं, वे उसके भावी निर्माता हैं। चाहे वह नेता या शासक के रूप में हों , चाहे डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार व कलाकार के रूप में हों। इन सभी रूपों में उनके ऊपर अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे ले जाने का गहरा दायित्व होता है। पर इसके विपरीत अगर वही युवा वर्ग उन परम्परागत विरासतों का वाहक बनने से इन्कार कर दे तो निश्चिततः किसी भी राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

युवा शब्द अपने आप में ही उर्जा और आन्दोलन का प्रतीक है। युवा को किसी राष्ट्र की नींव तो नहीं कहा जा सकता पर यह वह दीवार अवश्य है जिस पर राष्ट्र की भावी छतों को सम्हालने का दायित्व है। भारत की कुल आबादी में युवाओं की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत है जो कि विश्व के अन्य देशों के मुकाबले काफी है। इस युवा शक्ति का सम्पूर्ण दोहन सुनिश्चित करने की चुनौती इस समय सबसे बड़ी है। जब तक यह ऊर्जा और आन्दोलन सकारात्मक रूप में है तब तक तो ठीक है, पर ज्यों ही इसका नकारात्मक रूप में इस्तेमाल होने लगता है वह विध्वंसात्मक बन जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर किन कारणों से युवा उर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है? वस्तुतः इसके पीछे जहाँ एक ओर अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर हटना है, वहीं दूसरी तरफ हमारी शिक्षा व्यवस्था का भी दोष है। इन सब के बीच आज का युवा अपने को असुरक्षित महसूस करता है, फलस्वरूप वह शार्टकट तरीकों से लम्बी दूरी की दौड़ लगाना चाहता है। जीवन के सारे मूल्यों के उपर उसे ‘अर्थ‘ भारी नजर आता है। इसके अलावा समाज में नायकों के बदलते प्रतिमान ने भी युवाओं के भटकाव में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्मी परदे और अपराध की दुनिया के नायकों की भांति वह रातों-रात उस शोहरत और मंजिल को पा लेना चाहता है, जो सिर्फ एक मृगण्तृष्णा है। ऐसे में एक तो उम्र का दोष, उस पर व्यवस्था की विसंगतियाँ, सार्वजनिक जीवन में आदर्श नेतृत्व का अभाव एवम् नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन ये सारी बातें मिलकर युवाओं को कुण्ठाग्रस्त एवम् भटकाव की ओर ले जाती हैं, नतीजन-अपराध, शोषण, आतंकवाद, अशिक्षा, बेरोजगारी एवम् भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं।

भारतीय संस्कृति ने समग्र विश्व को धर्म, कर्म, त्याग, ज्ञान, सदाचार और मानवता की भावना सिखाई है। सामाजिक मूल्यों के रक्षार्थ वर्णाश्रम व्यवस्था, संयुक्त परिवार, पुरूषार्थ एवम् गुरूकुल प्रणाली की नींव रखी। भारतीय संस्कृति की एक अन्य विशेषता समन्वय व सौहार्द्र रहा है, जबकि अन्य संस्कृतियाँ आत्म केन्द्रित रही हैं। इसी कारण भारतीय दर्शन आत्मदर्शन के साथ-साथ परमात्मा दर्शन की भी मीमांसा करते हैं। अंग्रेजी शासन व्यवस्था एवम् उसके पश्चात हुए औद्योगीकरण, नगरीकरण और अन्ततः पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने भारतीय संस्कृति पर काफी प्रभाव डाला। निश्चिततः इन सबका असर युवा वर्ग पर भी पड़ा है। आर्थिक उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के बाद तो युवा वर्ग के विचार-व्यवहार में काफी तेजी से परिवर्तन आया है। पूँजीवादी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बाजारी लाभ की अन्धी दौड़ और उपभोक्तावादी विचारधारा के अन्धानुकरण ने उसे ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और शार्टकट के गर्त में धकेल दिया। कभी विद्या, श्रम, चरित्रबल और व्यवहारिकता को सफलता के मानदण्ड माना जाता था पर आज सफलता की परिभाषा ही बदल गयी है। आज का युवा अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों से परे सिर्फ आर्थिक उत्तरदायित्वों की ही चिन्ता करता है। युवाओं को प्रभावित करने में फिल्मी दुनिया और विज्ञापनों का काफी बड़ा हाथ रहा है पर इनके सकारात्मक तत्वों की बजाय नकारात्मक तत्वों ने ही युवाओं को ज्यादा प्रभावित किया है। फिल्मी परदे पर हिंसा, बलात्कार, प्रणय दृश्य, यौन-उच्छश्रंृखलता एवम् रातों-रात अमीर बनने के दृश्यों को देखकर आज का युवा उसी जिन्दगी को वास्तविक रूप में जीना चाहता है। फिल्मी परदे पर पहने जाने वाले अधोवस्त्र ही आधुनिकता का पर्याय बन गये हैं। वास्तव में परदे का नायक आज के युवा की कुण्ठाओं का विस्फोट है। पर युवा वर्ग यह नहीं सोचता कि परदे की दुनिया वास्तविक नहीं हो सकती, परदे पर अच्छा काम करने वाला नायक वास्तविक जिन्दगी में खलनायक भी हो सकता है।

शिक्षा एक व्यवसाय नहीं संस्कार है, पर जब हम आज की शिक्षा व्यवस्था देखते हंै, तो यह व्यवसाय ही ज्यादा ही नजर आती है। युवा वर्ग स्कूल व काॅलेजों के माध्यम से ही दुनिया को देखने की नजर पाता है, पर शिक्षा में सामाजिक और नैतिक मूल्यों का अभाव होने के कारण वह न तो उपयोगी प्रतीत होती है व न ही युवा वर्ग इसमें कोई खास रूचि लेता है। अतः शिक्षा मात्र डिग्री प्राप्त करने का गोरखधंधा बन कर रह गयी है। पहले शिक्षा के प्रसार को सरस्वती की पूजा समझा जाता था, फिर जीवन मूल्य, फिर किताबी और अन्ततः इसका सीधा सरोकार मात्र रोजगार से जुड़ गया है। ऐसे में शिक्षा की व्यवहारिक उपयोगिता पर प्रश्नचिन्ह लगने लगा है। शिक्षा संस्थानों में प्रवेश का उद्देश्य डिग्री लेकर अहम् सन्तुष्टि, मनोरंजन, नये सम्बन्ध बनाना और चुनाव लड़ना रह गया है। छात्र संघों की राजनीति ने काॅलेजों में स्वस्थ वातावरण बनाने के बजाय महौल को दूषित ही किया है, जिससे अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसे में युवा वर्ग की सक्रियता हिंसात्मक कार्यों, उपद्रवांे, हड़तालांे, अपराधों और अनुशासनहीनता के रूप में ही दिखाई देती है। शिक्षा में सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अभाव ने युवाओं को नैतिक मूल्यों के सरेआम उल्लंघन की ओर अग्रसर किया है, मसलन-मादक द्रव्यों व धूम्रपान की आदतें, यौन-शुचिता का अभाव, काॅलेज को विद्या स्थल की बजाय फैशन ग्राउण्ड की शरणस्थली बना दिया है। दुर्भाग्य से आज के गुरूजन भी प्रभावी रूप में सामाजिक और नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में असफल रहे हैं।

आज के युवा को सबसे ज्यादा राजनीति ने प्रभावित किया है पर राजनीति भी आज पदों की दौड़ तक ही सीमित रह गयी है। स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने जब मताधिकर की उम्र अट्ठारह वर्ष की थी तो उन्होंने श्इक्कीसवीं सदी युवाओं कीश् आहृान के साथ की थी पर राजनीति के शीर्ष पर बैठे नेताओं ने युवाओं का उपयोग सिर्फ मोहरों के रूप में किया। विचारधारा के अनुयायियों की बजाय व्यक्ति की चापलूसी को महत्ता दी गयी। स्वतन्त्रता से पूर्व जहाँ राजनीति देश प्रेम और कत्र्तव्य बोध से प्रेरित थी, वहीं स्वतन्त्रता बाद चुनाव लड़ने, अपराधियों को सरंक्षण देने और महत्वपूर्ण पद हथियाने तक सीमित रह गयी। राजनीतिज्ञों ने भी युवा कुण्ठा को उभारकर उनका अपने पक्ष में इस्तेमाल किया और भविष्य के अच्छे सब्जबाग दिखाकर उनका शोषण किया। विभिन्न राजनैतिक दलों के युवा संगठन भी शोशेबाजी तक ही सीमित रह गये हैं। ऐसे में अवसरवाद की राजनीति ने युवाओं को हिंसा भड़काने, हड़ताल व प्रदर्शनों में आगे करके उनकी भावनाओं को भड़काने और स्वंय सत्ता पर काबिज होकर युवा पीढ़ी को गुमराह किया है।

आदर्श नेतृत्व ही युवाओं को सही दिशा दिखा सकता है, पर जब नेतृत्व ही भ्रष्ट हो तो युवाओं का क्या? किसी दौर में युवाओं के आदर्श गाँधी, नेहरू, विवेकानन्द, आजाद जैसे लोग या उनके आसपास के सफल व्यक्ति, वैज्ञानिक और शिक्षक रहे। पर आज के युवाओं के आदर्श वही हैं, जो शार्टकट के माध्यम से ऊँचाइयों पर पहुँच जाते हैं। फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियाँ, विश्व-सुन्दरियाँ, भ्रष्ट अधिकारी, अपराध जगत के डाॅन, उद्योगपति और राजनीतिज्ञ लोग उनके आदर्श बन गये हंै। नतीजन, अपनी संस्कृति के प्रतिमानों और उद्यमशीलता को भूलकर रातों-रात ग्लैमर की चकाचैंध में वे शीर्ष पर पहुँचना चाहते हंै। पर वे यह भूल जाते हंै कि जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बज सकती उसी प्रकार बिना उद्य्म के कोई ठोस कार्य भी नहीं हो सकता। कभी देश की आजादी में युवाओं ने अहम् भूमिका निभाई और जरूरत पड़ने पर नेतृत्व भी किया। कभी विवेकानन्द जैसे व्यक्तित्व ने युवा कर्मठता का ज्ञान दिया तो सन् 1977 में लोकनायक के आहृान पर सारे देश के युवा एक होकर सड़कांे पर निकल आये पर आज वही युवा अपनी आन्तरिक शक्ति को भूलकर चन्द लोगों के हाथों का खिलौना बन गये हंै।
आज का युवा संक्रमण काल से गुजर रहा है। वह अपने बलबूते आगे तो बढ़ना चाहता है, पर परिस्थितियाँ और समाज उसका साथ नहीं देते। चाहे वह राजनीति हो, फिल्म व मीडिया जगत हो, शिक्षा हो, उच्च नेतृत्व हो- हर किसी ने उसे सुखद जीवन के सब्ज-बाग दिखाये और फिर उसको भँवर में छोड़ दिया। ऐसे में पीढ़ियों के बीच जनरेशन गैप भी बढ़ा है। समाज की कथनी-करनी में भी जमीन आसमान का अन्तर है। एक तरफ वह सभी को डिग्रीधारी देखना चाहता है, पर उन सभी हेतु रोजगार उपलब्ध नहीं करा पाता, नतीजन- निर्धनता, मँहगाई, भ्रष्टाचार इन सभी की मार सबसे पहले युवाओं पर पड़ती है। इसी प्रकार व्यावहारिक जगत मंे आरक्षण, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, भाई-भतीजावाद और कुर्सी लालसा जैसी चीजों ने युवा हृदय को झकझोर दिया है। जब वह देखता है कि योग्यता और ईमानदारी से कार्य सम्भव नहीं, तो कुण्ठाग्रस्त होकर गलत रास्तों पर चल पड़ता है। निश्चिततः ऐसे में ही समाज के दुश्मन उनकी भावनाओं को भड़काकर व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित करते हंै, फलतः अपराध और आतंकवाद का जन्म होता है। युवाओं को मताधिकार तो दे दिया गया है पर उच्च पदों पर पहुँचने और निर्णय लेने के उनके स्वप्न को दमित करके उनका इस्तेमाल नेताओं द्वारा सिर्फ अपने स्वार्थ में किया जा रहा है।

इसमें कोई शक नहीं कि युवा वर्ग ही भावी राष्ट्र की आधारशिला रखता है, पर दुःख तब होता है जब समाज युवाओं में भटकाव हेतु युवाओं को ही दोषी ठहराता है। क्या समाज की युवाओं के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्ति जब सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का सरेआम क्षरण करते नजर आते हैं, तो फिर युवाओं को ही दोष क्यों? क्या मीडिया ''राष्ट्रीय युवा दिवस'' को वही कवरेज देता है, जो ''वैलेंटाइन-डे'' को मिलता है? एक व्यक्ति द्वारा अटपटे बयान देकर या किसी युवती द्वारा अर्द्धनग्न पोज देकर जो (बद्) नाम हासिल किया जा सकता है वह दूर किसी गाँव में समाज सेवा कर रहे व्यक्ति को तभी मिलता है जब उसे किसी अन्तराष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जाता है। आखिर ये दोहरापन क्यों ? युवाओं ने आरम्भ से ही इस देश के आन्दोलनों में रचनात्मक भूमिका निभाई है- चाहे वह समाजिक, शैक्षणिक, राजनैतिक या सांस्कृतिक हो। लेकिन आज युवा आन्दोलनों के पीछे किन्हीं सार्थक उद्देश्यों का अभाव दिखता है। युवा आज उद्देश्यहीनता और दिशाहीनता से ग्रस्त है, ऐसे में कोई शक नहीं कि यदि समय रहते युवा वर्ग को उचित दिशा नहीं मिली तो राष्ट्र का अहित होने एवम् अव्यवस्था फैलने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। युवा व्यवहार मूलतः एक शैक्षणिक, सामाजिक, संरचनात्मक और मूल्यपरक समस्या है जिसके लिए राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक सभी कारक जिम्मेदार हैं। ऐसे में समाज के अन्य वर्गों को भी जिम्मेदारियों का अहसास होना चाहिए, सिर्फ युवाओं को दोष देने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि सवाल सिर्फ युवा शक्ति के भटकाव का नहीं है, वरन् अपनी संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का भी है। युवाओं को भी ध्यान देना होगा कि कहीं उनका उपयोग सिर्फ मोहरों के रूप में न किया जाय।
कृष्ण कुमार यादव

रविवार, 11 जनवरी 2009

आलोचना होती रही है.......



सतयुग हो,द्वापरयुग या कलयुग!

आलोचना होती रही है॥

राम ने राज्य का परित्याग किया,

पिता के वचन को उनकी आज्ञा मान-

कैकेयी का मान रखा,

१४ वर्ष का वनवास लिया..............

सीता के मनुहार में,

स्वर्ण-मृग का पीछा किया,

सीता हरण से व्याकुल रावण का संहार किया,

फिर प्रजा हितबध होकर ,

सारे सुखों का त्याग किया...........................

कृष्ण ने राम से अलग दिखाई नीति,

लीला के संग छल का जवाब दिया छल से

'महाभारत' के पहले-कुरुक्षेत्र का दृश्य दिखाया,

दुर्योधन से संधि-प्रस्ताव रखा,

स्वयं और पूरी सेना का चयन भीउसके हाथ दिया-

दुर्योधन ने जाना इसे कृष्ण की कमजोरी,

ग्वाले को बाँध लेने की ध्रिष्ठता दिखलाई...

कृष्ण ने विराट रूप लिया,

महाभारत के रूप में,

रिश्तों का रक्त तांडव चला...

फिर आया कलयुग!

१०० वर्षों की गुलामी का चक्र चला-

गाँधी का सत्याग्रह ,नेहरू की भक्ति,भगत सिंह का खून शिराओं में दौड़ा ......

एक नहीं,दो नहीं-पूरे १०० वर्ष,

शहीदों की भरमार हो गई,

जाने-अनजाने कितने नाम मिट गए-

'वंदे-मातरम्' की आन पर!

हुए आजाद हम अपने घर में,१०० वर्षों के

बादऔर जन-गण-मन का सम्मान मिला...........

सतयुग गया,गया द्वापर युग,हुए आजादी के ६० साल........

स्वर उभरे-

राम की आलोचना,

कृष्ण की आलोचना,

गाँधी की खामियां...दिखाई देने लगीं-

क्या करना था राम को,या श्री कृष्ण को,या गाँधी को.............

इसकी चर्चा चली!

आलोचकों का क्या है,

आलोचना करते रहेंगे...

आलोचना करने में वक्त नहीं लगता,

राम,कृष्ण,गाँधी बनने को,

जीवन का पल दूसरो को देना होता है,

मर्यादा,सत्य,स्वतन्त्रता कीराहों को सींचना होता है...

गर डरते हो आलोचनाओं से,

देवदार नहीं बन सकते हो,

नहीं संभव है फिर चक्र घुमाना-

सतयुग नहीं ला सकते हो!!!!!!!!!!!!

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

बीती कहानी बंद करो........



इति यानि बीती........

हास यानि कहानी...

बीती कहानी बंद करो!

नहीं जानना -वंदे मातरम् की लहर के बारे में,

नहीं सुनना -'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल....

'नहीं सुनना-'फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल....

'नहीं जानना-ईस्ट इंडिया कंपनी कब आई!

कब अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया!

कहना है तो कहो-आज कौन आतंक बनकर आया है!

और अब कौन गाँधी है?कौन नेहरू?कौन भगत सिंह ?

वंदे मातरम् की गूंजकिनकी रगों में आज है?

अरे यहाँ तो अपने घर सेकोई किसी को देश की खातिर नहीं भेजता

( गिने-चुनों को छोड़कर )

जो भेजते हैंउनसे कहते हैं,'एक बेटा-क्यूँ भेज दिया?

'क्या सोच है!........ऐसे में किसकी राह देख रहे हैं देश के लिए?

देश?जहाँ से विदेश जाने की होड़ है..........

एक सर शर्म से झुका है,'हम अब तक विदेश नहीं जा पाए,

'दूसरी तरफ़ गर्वीला स्वर,'विदेश में नौकरी लग गई है'........

भारत - यानि अपनी माँ को प्रायः सब भूल गए हैं

तो -बीती कहानी बंद करो!!!!!!!!

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

धर्म

एक दिन आशु का भी स्कूल में दाखिला लेने का समय आ गया। उसकी पाँच वर्षीय बड़ी बहन पूजा स्वयं स्कूल में दाखिले के लिए फार्म ले आई। आशु उत्साह के साथ फार्म भरने की जिद करने लगा, उसकी जिद के कारण मुझे अपना आफिस का कार्य रोक कर फार्म को शीघ्र भरना पड़ा। फार्म के कालम भरते हुए मैं उससे प्रश्न भी करने लगा- तुम्हारा नाम....?, आशु.....। अपना पूरा नाम बताओ.....? आशुतोष शर्मा.......। तुम्हारे पापा क्या करते हैं.......? आफिस में काम करते हैं......। किस क्लास में नाम लिखेगा.....? के।जी. में ......। आशु के सही उत्तर सुनकर किचन में खाना बनाते हुए पत्नी को भी हँसी आ रही थी। मैंने दाखिला के फार्म के कालम के अनुसार आगे प्रश्न किया। तुम्हारा धर्म....? लेकिन इसका उत्तर आशु नहीं दे सका। मैंने प्रश्न को पुनः दोहराया- तुम्हारा धर्म क्या है? हमें नहीं मालूम, आप बताइये। शायद आशु को अपने धर्म की जानकारी किसी से नहीं मिल सकी थी। इसी कारण वह मेरी ओर इस प्रश्न के उत्तर की जानकारी के लिए देख रहा था। मैं सोचने लगा- आज तो ये लोग अपने धर्म के लिए मरने तक को तैयार हो जाते हैं। जिसकी जानकारी अपने माता पिता द्वारा ही सर्वप्रथम सबको मिलती है। यही विश्वास जीवन भर अपना धर्म का ज्ञान करवाता है। आज के राजनेताओं ने तो धर्म को राजनीति में पूरी तरह जोड़ दिया है जिसका फायदा चुनाव के समय पूरी तरह मिलता है। मैंने बिना कोई उत्तर दिये धर्म के कालम के सामने ‘हिन्दू‘ शब्द लिख दिया, लेकिन आशु अपने प्रश्न के उत्तर के लिए मेरी ओर लगातार देख रहा था।
अनुराग,13/152 डी (5) परमट, कानपुर (उ0प्र0)

सोमवार, 5 जनवरी 2009

जम्मू-कश्मीर में युवा मुख्यमंत्री का आगाज़

साल के अंत में जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र की जो चुनावी बयार बही, उसने हर बात पर कश्मीर का रोना रोने वाले पाकिस्तान की बोलती बंद करदी। 1965 में राज्य बनने के बाद जम्मू कश्मीर में अब तक 10 मुख्यमंत्री बने हैं और 5 बार राष्ट्रपति शासन लगा है। अब्दुल्ला परिवार से शेख अब्दुल्ला दो बार, फारूख अब्दुल्ला तीन बार और अब नेशनल कान्फ्रेंस के 38 वर्षीय युवा उमर अब्दुल्ला राज्य के 11वें मुख्यमंत्री होंगे। युवा होने के कारण उनसे सिर्फ कश्मीरी आवाम ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क को आशायें हैं। राजनीति में जहां वृद्ध नेतृत्व का रोना रोया जाता है, वहां उमर अब्दुल्ला ने कम उम्र में ही राजनीति में बड़े मुकाम हासिल किये हैं। यहां बताना गौरतलब होगा कि सबसे कम उम्र में मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड प्रफुल्ल कुमार महन्त के नाम है, जिन्होंने 1985 में मात्र 31 साल की उम्र में असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी। आशा की जानी चाहिए कि एक युवा की अगुवाई में जम्मू-कश्मीर नई अंगडाई लेगा और एक बार फिर से इस धरा के स्वर्ग का खिताब पायेगा !!