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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट होमी व्यारावाला को मिलेगी युवाओं की चहेती पहली ''नैनो"

एक कहावत है कि वक्त मेहरबान तो सब मेहरबान। आज पत्रकारिता के क्षेत्र में तमाम महिलाएं दिखती हैं पर एक दौर ऐसा भी था जब गिनी-चुनी महिलाएं ही पत्रकारिता में जाने का सपना पूरा कर पाती थी। ऐसे में एक नाम तेजी से उभरा- होमी व्यारावाला का। होमी व्यारावाला इस देश की प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट थीं। तमाम जर्नलिस्ट के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहीं होमी व्यारावाला आज 96 वर्ष की हैं और गुजरात के वड़ोदरा में अपना जीवन हँसी-खुशी गुजार रही हैं। अचानक वे चर्चा में है क्योंकि उन्हें प्रथम ग्राहक के रूप में टाटा की बहुचर्चित नैनो कार के लिए चुना गया है। फिलहाल वे अपनी 55 साल पुरानी फिएट कार से ही सफर करना पसन्द करती हैं, पर नैनो ने उनके नयनो में भी एक स्वप्न जगाया कि इस उम्र में एक नई कार पर सफर किया जाय। जहाँ आज की युवा पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी के लोगों को विस्मृत करती जा रही है वहाँ एक ऐसी लीजेण्ड महिला का इस रूप में प्रकटीकरण चैंकाता भी है और आश्वस्त भी करता है कि उनकी काया भले ही वृद्व हो गई हो पर उनका मन अभी भी जवान है। इसीलिए तो वे 96 वर्ष की उम्र में नैनो की सवारी करने को तैयार हैं। टाटा ग्रुप के मालिक रतन टाटा भी खुश होंगे कि इसी बहाने वे देश की प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट से लोगों को एक बार फिर रूबरू करा सकेंगे।
(होमी व्यारावाला के बारे में और जानें- http://www.boloji.com/people/04019.htm )

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

फर्जी विश्वविद्यालयों से सावधान हों युवा !!

देश के नौजवानों सावधान ! देश में २२ फर्जी विश्वविद्यालय चलने का खुलासा ! अमेरिकी मान्यता का दावा !
देश के नौ राज्यों में 22 फर्जी विश्वविद्यालय चलने का खुलासा हुआ है। इनमें से नौ विवि उत्तार प्रदेश में चल रहे हैं। इनमें से अधिकांश अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मान्यता के नाम पर अब तक लाखों विद्यार्थियों को ठग चुके हैं। अब इन विवि पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग [यूजीसी] ने प्रतिबंध लगाते हुए सभी राज्यों को आगाह किया है।

जिन राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालय चल रहे हैं उनमें उत्तार प्रदेश, दिल्ली, बिहार, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक पिछले माह यूजीसी ने फर्जी विश्वविद्यालयों [जनवरी 09 तक] की सूची जारी की। इसमें कई विवि ऐसे हैं, जिन पर 2005 और 2007 में भी प्रतिबंध लग चुका है। लेकिन वे अब भी चल रहे हैं। यूजीसी को पता चला है कि दिल्ली, उत्तार प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल ऐसे विवि की डिग्रियां अभी भी स्वीकार कर रहे हैं। नए शिक्षा सत्र में यूजीसी ने आगाह किया है कि संबंधित राज्य सुनिश्चित करें कि इनमें से किसी भी विवि से कालेज या छात्र न जुड़ें।

ये विवि अमेरिका के हवाई राज्य से मान्यता प्राप्त होने का दावा कर भारतीय महाविद्यालयों और छात्रों को ठगते हैं। वर्ष 2005 में भारत सहित 18 देशों में इस तरह के विवि संचालित होने की जानकारी सामने आई थी। भारत ने हवाई राज्य से इस संबंध में जानकारी मांगी थी। लेकिन वहां से जानकारी देने से इन्कार करते हुए संबंद्धता नकार दी गई थी।
फर्जी विवि उत्तार प्रदेश
1. इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद, इंटीट्यूशनल एरिया, खोड़ा मकनपुर, नोएडा फेस-दो
2. महिला ग्राम विद्यापीठ/विश्वविद्यालय, प्रयाग, इलाहबाद
3. इंडियन एजूकेशन काउंसिल आफ यूपी, लखनऊ
4. गांधी हिंदी विद्यापीठ, प्रयाग, इलाहबाद
5. नेशनल यूनिवर्सिटी आफ इलेक्ट्रो कांप्लेक्स होम्योपैथी, कानुपर
6. नेताजी सुभाष चंद बोस यूनिवर्सिटी , अछलताल, अलीगढ़
7. उत्तार प्रदेश विश्वविद्यालय, कोसीकला, मथुरा
8. महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन विश्वविद्यालय, प्रतापगढ़
9. गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृंदावन
दिल्ली
10. वारानसेया संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी , जगतपुरी, दिल्ली
11. कमर्शियल यूनिवर्सिटी लिमिटेड, दरियागंज, दिल्ली
12. यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी, दिल्ली
13. वोकेशनल यूनिवर्सिटी, दिल्ली
14. एडीआर-सेंट्रल ज्यूरिडीकल यूनिवर्सिटी, एडीआर हाउस, 8जे, गोपाला टावर, 25 राजेंद्र प्लेस, नई दिल्ली
15. इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एंड इंजीनियरिंग, नई दिल्ली
बिहार
16. मैथिली विश्वविद्यालय, दरभंगा
कर्नाटक
17. बादागनवी सरकार व‌र्ल्ड ओपन यूनिवर्सिटी एजूकेशन सोसाइटी, गोकेक, बेलगाम
केरल
18. सेंट जोंस यूनिवर्सिटी, किसनाट्टम
मध्यप्रदेश
19. केशरवानी विद्यापीठ, जबलपुर
महाराष्ट्र
20. राजा अरेबिक यूनिवर्सिटी, नागपुर
तमिलनाडु
21. डीडीबी संस्कृत यूनिवर्सिटी, पुतूर, त्रिची
पश्चिम बंगाल
२२. इंडियन इंस्टीट्यूट आफ अल्टरनेटिव मेडिसिन, कोलकाता
(साभार: जागरण)

रविवार, 19 अप्रैल 2009

किताबों की कीमत कम कीजिये हुज़ूर

साहित्य समाज का दर्पण होता है ,लेकिन साहित्य का दर्पण होना तभी सार्थक है जब वह जन सामान्य के हाथ में हो । अभिप्राय यह है कि वह आम आदमी की पहुच में हो , इन दिनो साहित्यिक पुस्तको की कीमत इतनी अधिक हो गई है कि अब पुस्तक खरीद कर पढ़ना आम आदमी के बजट में रहा ही नही । वैसे आटा दाल चांवल शक्कर कुछ भी तो सस्ता नही है फिर महंगाई की तोहमत पुस्तको पर ही लगाना ज़रा ज़्यादती ही होगी । लेकिन पुस्तको की तुलना आटा दाल से करना भी ठीक नही है । दोनो का मुकाम आदमी की ज़िंदगी में अलग अलग है , दोनो का महत्व अलग अलग है । एक वर्ग एैसा भी है जिसके अंदर अच्दे से अच्छा साहित्य को पढ़ने की भूख हमेशा रहा करती है । आज वह वर्ग भूखा है । वह भूखी नज़रो से किताबो की दुकान में रखे कबीर के दोहे , गालिब का दीवान ,अमृता प्रीतम की कहानियाू , मंटो का सम्रग साहित्य ,कमलेश्वर, मन्नू भंड़ारी , जावेद अख्तर , गुलज़ार ,अमृत लाल नागर , राही मासूम रज़ा , जैनेन्द्र , प्रेमचंद , मुक्तिबोध ,मीर ,बहादुर शाह ज़फ़र वगैरह वगैरह को मासूम निगाहो से निहार रहा है । उसका जी करता है कि दोनो हाथो से इस अनमोल खज़ाने को समेट लू,, जो चाहे वह किताब रैक में से खीच लू , कोई रोकन टोकने वाला न हो तो सुहाग के नुपुर ,आधा गांव ,गुनाहो का देवता , अंधा युग ,लखनउ की पांच राते ,शतरंज के मोहरे ,आपका बंटी ,इसमें से वह किसी को भी नही छोड़ेगा उसे इन सब को पढ़ना है । शौकीन आदमी बड़ी हसरत से अपने पसंदीदा लेखक की किताब हाथ में लेता है , बेहद अदब और एहतराम के साथ उसके मुख्य पृष्ठ पर हाथ फेरता है फिर पीछे की तरफ अपने लेखक की फोटो देखता है और वही खड़े खड़े सारांश पढ़ लेता है , तत्पश्चात बहुत ड़रती ड़रती निगाहो से उस स्थान पर नज़र करता है जहां मूल्य छपा होता है । वह किताब मंे छपा एक एक शब्द को आत्मसात कर लेना चाहता है लेकिन बस यह एक शब्द उसकी उम्मीदो पर पानी फेर देता है । इतनी कीमत अदा कर पाना उसके बस में नही है क्योकि अगर एक दो किताब ले लेने से उसकी भूख शांत हो जाती तो वह हिम्मत कर लेता लेकिन जो इल्म के बीमार है उनका इलाज दवा की दो खुराक से नही हो जाता । किताब का मूल्य देख कर वह उस किताब को जितने अदब और एहतराम से हाथ में लिया था उतनी ही बेरुखी से वही रख देता है जहां से निकाला था । फिर एक अपराध बोध लिये नज़रे झुकाये दुकान से एक सांध्य दैनिक लेते हुए बाहर निकल जाता है । दुकानदार बताता है राजकमल से या नेशनल से नई किताबे आई है देखे के नही ? अब वह बेचारा क्या बताये कि तुम्हारी दुकान में कौन सी किताब कहां , कब से रखी है उसे सब कुछ मालूम है । वह स्वयं को संभालता है और सामान्य लहजे में कहता है ये सब तो ले जा चुका हूॅ कोई और नई किताब आयेगी तो खबर करना ।

किताबो की इस बढ़ती कीमतो का परिणाम कितना भयंकर होगा ? धीरे धीरे पुस्तक और पाठको के बीच दुरियाॅ बढ़ती जायेगी और फिर फासला इतना ज्यादा हो जायेगा कि एक दिन अच्छा साहित्य पढ़ने की परम्परा ही लुप्त हो जायेगी । बच्चे को पोलियो का टीका लगाया ,च्यवनप्राश खिलाया ,बोर्नविटा पिलाया लेकिन पंच परमेश्वर , हार की जीत ,उसने कहा था ,नमक का दरोगा , बड़े भाई साहब ,टोबा टेक सिंह ,तेनालीराम के किस्से ,सिंहासन बत्तीसी ,मुल्ला नसीरूद्धीन ,नही पढ़या तो क्या खाक परवरिश की ? याद रखिये पोलियो की तरह ये साहित्य की खुराक भी ज़रूरी है । साहित्य दिमाग की कसरत है । साहित्य वह अखाड़ा है जहां सोच को तंदरुस्त किया जाता है । साहित्य की दो बूंद से सोच में संस्कार घुल जाते है जो जीवन को जीने लायक बना देते है । लेकिन दिनो दिन किताबो की बढ़ती कीमत हताश करते जा रही है । मध्यम वर्ग का बजट उसे इतनी इजाज़त नही देता कि इस माह फैज़ की शायरी ले आये तो अगले महीने अज्ञेय की कविताये ले आयेगे । किसी महीने बर्नाड़ शाह को पढेगे तो किसी महीने विवेकानंद को । शेक्सपियर और कालीदास को अगर नही पढ़ा तो क्या खाक पढ़ा ? बेचारा पाठक एैसा भी नही कर सकता कि इस महीने आटा नही लेते और परसाई का व्यंग्य संग्रह ले लेते है , बच्चे की स्कूल की फीस अगले महीने पटा देगे इस महीने मुक्तिबोध का काव्य संग्रह ले लेते है । अगर वह एैसा करने का प्रयास करेगा भी तो रैक में रखे परसाई जी खुद उसकी खबर ले लेगे और मुक्तिबोध जी की तरफ उसने हाथ बढ़ाया तो वे अपनी बीड़ी से चटका ही लगा देगे ।

किताबो की बढ़ती कीमत के संबंध में सबसे आश्यर्च की बात यह है कि इसे लेकर आज तक समाज के किसी वर्ग ने अपना विरोध प्रगट नही किया । आटा ,दाल, शक्कर की कीमत नियंत्रण मंे न होने पर सरकार को आड़े हाथो लिया जाता है ,विरोध व्यक्त किया जाता है , कैरोसिन , कुकिंग गैस और पेट्र्ोल की कीमतो को लेकर आंदोलन किये जाते है ,इसी बात पर सरकार का रहना या नही रहना तय किया जाता है लेकिन किताबो की बढ़ती कीमत पर किसी का विरोधी स्वर सुनाई नही देता । कोई भी राजनैकित पार्टी अपने घोषणा पत्र में इसे शामिल नही करती कि यदि उसकी सरकार बनी तो वह किताबो की कीमत कम करने की दिशा मे आवश्यक कदम उठायेगी । आज तक कभी यह सुनने में नही आया कि पुस्तको के अनाप शनाप बढ़े हुए मूल्य के विरोध में किसी शहर के बुद्धिजीवियो ने जुलूस निकाला या भूख हड़ताल की अथवा नगर बंद का आव्हान किया हो । कभी सुनने में नही आया कि किसी बुक स्टाॅल के सामने किताबो की बढती कीमतो के विरोध में कोई आमरण अनशन पर बैठा हो ,या पुस्तक प्रेमियो ने नारे बाज़ी की हो । कभी कही किसी शहर में पाठको ने एक़ित्रत होकर मुख्य मंत्री या राज्यपाल को इस संबंध में ज्ञापन नही दिया है । अगर कोई पढ़ने वाला इस तरह की नाराज़गी का इज़हार करे भी तो उसे पुस्तकालय का रास्ता दिखा दिया जाता है कि भाई इतनी बड़ी लाईब्रेरी तो है तेरे वास्ते वहां सस्ते में क्या लगभग मुफ्त में पढ़ना, , यहां खाली पीली हल्ला क्यो करता है । लाईब्रेरी यानि नही मामा से काना मामा भला । हम जिस साहित्य की चर्चा कर रहे है उसे एक घंटा लाईब्रेरी में बैठ कर नही पढ़ा जा सकता या एक दो दिन के लिये घर ले आना भी काफी नही है । दरअसल साहित्य कोई मसाला दोसा नही है कि गपागप खा लिये ये तो रूह अफज़ा है इसे चुस्की चुस्की पीना होता है , तभी आत्मा तर होती है । फैज़ से लेकर कैफ तक आौर ग़ालिब से लेकर साहिर तक एैसा कोई नही है जिसे एक बार पढ़ लिया और पेट भर गया ,समझ पुख्ता हो गई । ज़िन्दगी गुज़र गई है लोगो की गालिब और कबीर को पढ़ते पढ़ते आज तक पूरा नही कर पाये है । नही जनाब इन्हे तो किताब पूरी चाहिये यानि हमेशा के लिये । फिर तो खरीदना ही होगा , लेकिन किताबो की बढ़ती कीमत के आगे पढ़ने के शौकीन बेबस हो गये है । अब किताबे घर में आना बंद हो गई है । पहले बड़ो के लिये आती थी तो बच्चो से भी रिश्ता जुड़ जाता था ,यही से बच्चो के पढ़ने की शुरूआत होती थी । तब बच्चो के लिये अलग से चंदामामा और चाचा चैधरी मंगवाई जाती थी । पढ़ने की शुरूआत इन्ही पत्रिकाओ से होती है , एकाएक कोई अपने पढ़ने की शुरूआत ब्रेख्त या बर्नाड़ शाॅ से नही करता है , ये तो उसके आगामी पड़ाव होते है । साहित्य पहले कीमती था अब महंगा हो गया है ।

यह जीवन का कितना ड़रावना पक्ष है कि अब घर में किताबे नही आती । किताबे जिनके संबंध में कहा जाता है कि इससे अच्छा कोई दोस्त नही है ं। साहित्य की समझ रखने वाले कहते है कि अगर वहां ढ़ेर सारी किताबे नही होगी तो हम स्वर्ग में जाने से इंकार कर देगे । अकबर ईलाहबादी ,नज़ीर अकबराबादी ,कृष्ण बिहारी नूर ,कुर्रतुल एन हैदर ,कृष्ण चंदर ,सआदत हसन मंटो, , इसमत चुगताई , शहरयार ,नईम ,शाकिरा परवीन ,तसलीमा नसरीन , पाश ,अज्ञेय ,बच्चन ,निराला ,़़़ ़इनको पढ़ कर तो देखिये आप कह उठेगे साहित्य जीवन का श्रंगार है । यह आंख की काजल है , होठो की लिपिस्टिक है , ये कैलशियम है , ग्लूकोज़ है , आयरन है । साहित्य मस्तिष्क को रौशन करने वाला हैलोजन है । साथियो आज इस हैलोजन को बाजार नामक हुड़दंगी युवक ने मूल्य के पत्थर से फोड़ दिया है । पुस्तक और पाठक के बीच मूल्य की गहरी खाई आ गई है । पाठक तो किताब पढ़ नही पा रहा है लेकिन उसकी बेबसी को किताबे ज़रूर पढ़ रही होगी । अब अनियंत्रित होती हुई महंगाई पेट पर ही नही विचारो पर भी मार करने लगी है । रोटी कपड़ा और मकान मुहय्या हो गया न अब तुम्हारी एक एक चीज़ का ठेका सरकार ने थोड़ी ले रखा है ं। ये तुम्हारा अपना शौक है इसका इंतेज़ाम तुम खुद करो । नही नही एैसा बोलने से बात नही बनेगी । अगर किसान को खाद ,उघोगपति को लोन ,वैज्ञानिको को स्कालरशिप ,खिलाड़ियो को मैदान उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है तो पढ़ने वाले लोगो को उच्च स्तरीय साहित्य मुहय्या कराना सरकार की जिम्मेदारी क्यो नही है ? हालाॅकि सरकार ने अपने किसी बयान में इस जिम्मेदारी से स्वयं को अलग करने की बात नही की है लेकिन पुस्तकालय इसका सही समाधान नही है । सरकार को कुछ एैसे इंतेज़ाम करने चाहिये कि सीधा किताबो के दाम कम हो जाये । जिस तरह पेट्र्ोल और कुकिंग गैस का अतिरिक्त बोझ सरकार आम आदमी पर पड़ने नही देती है उसी तरह का कोई फार्मूला यहा भी बैठा देना चाहिये । रहन सहन का स्तर मंहगे कपड़े , खुबसूरत फर्नीचर और चमकदार गाड़ियो से ही उंचा नही होता । उसमे विचारधारा , तहज़ीब ,तमीज़ की भी आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति साहित्य से होती है । साहित्य जीने का सलीका सिखाता है ,बोलने का तरीका सिखाता है । वह समाज आर्कषक हो ही नही सकता जिसमें साहित्य के लिये जगह न हो । इंसानी ज़िंदगी दो मंज़िला मकान है ,पहली मंज़िल पर रोटी कपड़ा और मकान है और दूसरी मंज़िल पर साहित्य ।

साथियो अच्छे से अच्छा पढ़ने का मौहाल फिर से बनाना होगा । पढ़ने से जीवन में वैसा ही कुछ होता है जो मकान में पुताई कराने से होता है । किताबे हमारी सोच की व्हाईट वाशिंग करती है । कुछ लोगो ने अपने घर का एक कमरा सिर्फ किताबो के लिये रख छोड़ा है , उनकी अपनी पर्सनल लाईब्रेरी है , जहां उनके प्रिय लेखको की अनेको किताबे मौजूब है ,उनके सामने पढ़ने का कोई संकट नही है लेकिन हर आदमी इतना हैसियतदार नही होता और चंद हैसियतदारो के ही पढ़ लेने से पढ़ा जाना पूर्ण नही हो जाता । पढ़ने की लुप्त होती परम्परा को बचाना होगा । इसमंे प्रकाशक का कोई दोष नही , महंगाई का हमला तो चैतरफा है और मंहगाई से निजात दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है , हमें तो बस सरकार तक यह बात पहुचानी है कि दाल ,चावल,शक्कर , तेल , पेट्र्ोल ,कुकिंग गैस की कीमत पर नियंत्रण रखना ही महंगाई पर नियंत्रण रखना नही होता बल्कि और भी चीज़े इसमें शामिल की जानी चाहिये जैसे किताब । गालिब ,ईकबाल ,जिगर ,दुष्यंत ,शमशेर ,त्रिलोचन ,महादेवी ,परसाई ,शरदजोशी ,कमलेश ,मोहन राकेश ,मुर्शरफ आलम ज़ौकी ,कार्ल माक्र्स ,राहुल सांस्कृतांयन ,विवेकानंद ,एैसे अनेको लोगो की अनंेको कृतियो जो हमारी कीमती पूंजी है उसे पढ़ा नही तो फिर मानव जीवन प्राप्त करने का क्या लाभ ? जो पढ़ा जाना आवश्यक है उसे पढ़े जाने से रोकने के सारे रास्ते बंद कर देने होगे । शासन प्रशासन को इस समस्या का समाधान ढूंढ़ना होगा । वैसे भी पढ़ने वालो की संख्या कोई बहुत ज़्यादा नही है लेकिन जो थोड़े बहुत है वे भी पढ़ना छोड़ देगे तो उम्मीद की आखरी किरण भी बुझ जायेगी । हमारा एक ही मकसद नही होना चाहिये कि जो पढ़ने वाले है उनका पढ़ते जाना बरकरार रहे बल्कि हमारी कोशिश होनी चाहिये कि नये पढ़ने वाले पैदा हो क्योकि बुलंदी पर पहुचने की जो बहुत सारी सीढ़ियाॅ है उसमें एक सीढ़ी साहित्य भी है । यह भी कितनी दयनीय स्थति है कि पढ़ने वालो पर आये संकट से निपटने के लिये सहयोग की अपील हम नही पढ़ने वाले वर्ग से कर रहे है , जिनके संबंध मंे यह भी कहा जा सकता है कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद ? जिनके हाथ में अधिकार है वे लोग इस दिशा में जब कदम उठायेगे तब उठायेगे फिलहाल तो हम चिंता करने वालो को विभिन्न अवसरो पर किताब भेंट करने की परम्परा शुरू कर देनी चाहिये । हमारे साहित्यिक खज़ाने में से कोई एक किताब भी नही पढ़ने वाले ने पढ़ ली तो बाकी सारी चीज़े वह ढूंढ़ ढ़ंूढ़ कर पढ़ लेगा । पढ़ने वाली नस्ल तैयार करना निहायत ज़रूरी है क्योकि जहालत का बम बारूदी बम से ज्यादा खतरनाक होता है इसलिये किताबो की कीमत से उपजा पढ़ने का संकट खत्म करना ही होगा । इसके लिये हम सब को सामूहिक रूप से संबंधित व्यक्तियों से अपील करनी चाहिये कि ”कृपया किताबो की कीमत कम कीजिये हुजूर“।
अख्तर अली
फ़ज़ली अपार्टमेन्ट, आमानाका कुकुरबेड़ा,रायपुर (छ॰ग॰)
मो॰ 9826126781 / akhterspritwala@yahoo.co.in

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

आई0ए0एस0 बनने पर बलात्कार की सजा से माफ़ी क्यों ??

पहली नजर में यह आश्चर्यजनक लगता है पर वाकई सच है। एक बलात्कारी आई0ए0एस0 अधिकारी हो गया है और इसी बिना पर उसकी सजा भी माफ हो गई है। इस बलात्कारी का नाम अशोक राय है और उसने ट्यूशन पढ़ाने के दौरान सुनीता नामक लड़की से लम्बे समय तक बलात्कार किया और फिर अपने दोस्त से भी उसका शारीरिक शोषण करवाया। बदनामी के डर से सुनीता ने अप्रैल 2003 में सल्फास की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली। फिलहाल मामले में पुलिस केस बना और दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने बलात्कारी अशोक राय को वर्ष 2008 में 10 साल कैद की सजा सुनाई। कैद के दौरान अशोक ने आई0ए0एस0 की परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली जिसके आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 9 फरवरी में उसकी सजा माफ कर दी। उस समय तक अशोक की कुल 5 वर्ष 6 माह तिहाड़ जेल में बिताये। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस सजा को पर्याप्त माना।

फिलहाल राष्ट्रीय महिला आयोग ने मामले का संज्ञान लिया है एवं सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। राष्ट्रीय महिला आयोग का स्पष्ट मानना है कि उच्च न्यायालय के इस फैसले से समाज में गलत संदेश जाएगा। आई0ए0एस0 परीक्षा पास करना बलात्कार की सजा कम करने के लिए ‘पर्याप्त‘ और ‘विशेष‘ कारण नहीं हो सकता। वह भी तब जब बलात्कार के मामले में न्यूनतम सजा सात वर्ष हो। आयोग ने कहा है कि उच्च न्यायालय का यह फैसला संविधान में महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा अधिकारों के विरूद्ध है। साथ ही यह सुप्रीम कोर्ट के सिद्वांतों के खिलाफ भी है जिसमें कहा गया है कि एक बार बलात्कार में दंडित होने के बाद दोषी के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

प्रतिभा पलायन क्यों??????.......

पुराने जमाने में भारत को सोने की चिडिया कहते थे..ये हम सब जानते है...!अंग्रेज भी जानते थे ...पुर्तगाली भी जानते थे तभी वे इतनी दूर तक आ गए...!आज के .वर्तमान...भारत को पूरा विशव ज्ञान की चिडिया के रूप में जानने लगा है!समस्त विशव में भारतीयों ने अपने ज्ञान का डंका बजाया है तभी तो हर जगह भारतीय लोग छा..गए है...!अमेरिका में तो राष्ट्रपति ओबामा का आधा स्टाफ ही भारतीय है..!अपने ज्ञान के दम पर भारतीय लोगों ने पूरे संसार में अपनी एक अलग पहचान बनाई है...!लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है...!भारत ने इसकी कीमत भी चुकाई है....प्रतिभा पलायन के रूप में...!आज देश की प्रतिभा देश में नहीं बल्कि विदेश में अपना भविष्य देखती है..!देश अपने संसाधन लगा कर एक प्रतिभा को तैयार करता है और वो अपना ज्ञान देती है विदेशों को...!उसके ज्ञान और अनुभव से देश वंचित हो जाता.. है...!आखिर क्यूँ होता है..ऐसे...?जवाब ज्यादा जटिल नहीं है...इसका कारण है ..हमारी व्यवस्था....,लाल फीताशाही..और काम ना करने की आज़ादी..!यहाँ से अच्छा माहोल और पैसा उन्हें विदेशों में आकर्षित करता है....!अब देखिये ना हमारी सरकार गांधी जी की कुछ वस्तुओं ,कोहिनूर हीरे और कुछ अन्य अनुपयोगी वस्तुओं के लिए तो मगजमारी करती है जबकि प्रतिभा पलायन को रोकने के लिए कोई पहल नहीं करती..!अगर ये प्रतिभाएं देश को अपना ज्ञान देती तो आज हम हर मामले में विकासशील देशों से आगे खड़े होते !जहां हर राष्ट्र अपनी भाषा,संस्कृति और शिक्षा का संरक्षण करता है वहीँ हम.. इनका त्याग कर रहे है..ऐसे में देश का क्या होगा...! हमारे यहाँ योग्यता से ज्यादा महत्व व्यक्ति को दिया जाता है जो गलत है..!...आज .विदेश में रखे काले धन पर तप सब की नज़र है...पर विदेशों में बसे प्रतिभाशाली लोगों का क्या????क्या उन्हें कोई .पॅकेज देकर वापस नहीं लाया जा सकता...?क्यूँ सभी पार्टियाँ खामोश है?क्या देश का उन पर अब कोई हक नहीं रहा या आज उनकी यहाँ कोई जरुरत नहीं है?सच तो ये है की सब वापस आना चाहते है लेकिन कोई शुरुआत करें तो सही...!एक अच्छी और दिल से की गई शुरुआत देश का भविष्य बदल सकती है....

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

क्या है चुनावी मुद्दा...?

चुनावी माहोल में नेता लोग शायद देश की वास्तविक समस्याओं को भूल गए है!तभी तो सब एक दूसरे पर टीका टिप्पणी करने लगे है...!इनकी बातें सुन कर तो ऐसे लगता है जैसे देश में कोई मुद्दा ही नहीं है..!मोदी .कांग्रेस को बूढी बता रहे है तो कांग्रेस वाले बी जे पी को ?चलो दोनों .बूढी नहीं है...युवा है...पर ये तो बताइए युवा जन के लिए आपकी क्या योजना है....युवा वर्ग को क्या तोहफा देंगे आप?आज पूरे विशव में आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है....युवाओं की नोकरियाँ जा रही है...!कुछ दिनों के अन्दर ही लाखों युवा बेरोजगार हो गए है...!हमारा देश भी इससे अछूता नहीं है...!क्या हम बचा पाएंगे?मिलेगी नोकरी...?दूर होगी आर्थिक मंदी?इसके अलावा महंगाई भी सुरसा की तरह मुह बाए खड़ी है...?कीमते आसमान छू रही है...और नेताओं को मसखरी सूझ रही है....!क्या देश में अब कोई मुद्दा नहीं रहा...जो ने३त फालतू की बहस छेड़े .बैठे है....अब आप देखिये किस तरह ये लोग एक दूसरे पर कीचड उछालते फ़िर रहे है...?गडे मुर्दे उखाड़ने से या धर्म की ठेकेदारी करने से .क्या होगा...?युवा लोग आपसे उम्मीद लगायें बैठे है....उन्हें होंसला दीजिये...?आर्थिक मंदी दूर करने का ठोस प्रबंधन कीजिये....?

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

ग़ज़ल

सभी सरसब्ज मौसम के नये सपने दिखाते हैं
हमें मालूम है वो किस तरह वादे निभाते हैं।
इलेक्शन में हुनर, जादूगरी सब देखिए इनकी
ये हर भाषण में सड़कें और टूटे पुल बनाते हैं।
चलो मिल जायेगी अब वक्त पे दो वक्त की रोटी
हम इस मकसद से जिन्दाबाद के नारे लगाते हैं।
हमारा सच कभी देखा नहीं है इनकी आँखों ने
हमारे रहनुमा किस रंग का चश्मा लगाते हैं।
अभी हर शख्स के घर का पता मालूम है इनको
सदन में जाके ये पूरा इलाका भूल जाते हैं।
पुरानी साइकिल, हाथी, कमल, पंजा नया क्या है?
हमें हर बार ये देखा हुआ सर्कस दिखाते हैं।
हमारे वोट से संसद में नाकाबिल पहुँचते हैं
जो काबिल हैं गुनाहों से हमारे हार जाते हैं।
वो साहब हैं उन्हें हर काम के खातिर है चपरासी
हम अपना बोझ अपने हाथ से सिर पर उठाते हैं।
तबाही देखते हैं वो हमारी वायुयानों से
हम दरिया में बिना कश्ती के ही गोता लगाते हैं।
जो सत्ता में हैं वो सूरज उगा लेते हैं रातों को
हमारे घर दिये बस सांझ को ही टिमटिमाते हैं।
भँवर में घूमती कश्ती के हम ऐसे मुसाफिर हैं
न हम इस पार आते हैं न हम उस पार जाते हैं।
ये संसद हो गयी बाजार इसके मायने क्या हैं?
बिके प्यादों से हम सरकार का बहुमत जुटाते हैं।

जयकृष्ण राय तुषार
63 जी/7, बेली कालोनी, स्टैनली रोड, इलाहाबाद
मो0: 9415898913

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

अब भी जागो युवा

जब -जब देश में गलत का फैलाव हुआ
हमारा अपनी जमीर से अलगाव हुआ
बेचा खुद के अहसासों को
चांदी के टुकडों की खातिर
गरीबो के पैसों से शेयर
बेचते बाजार के शातिर
हल्का से एक झटका लगा
बड़ा पेड़ कट कर गिरा
हमारी अर्थ जगत की चूल हिल गई
गुरु की गुरुतई काम न आई
तब चेलो की की कैसी प्रभुताई !

फिर भी हम चिल्लाते
अपना गाल बजाते
देश के चंद अमीरों में
खुद को अमीर जतलाते
सोने को जमीं के लाले
चाँद पे जाने का गौरव गाते
खाने को अन्न नहीं पर
अरबों में नेता चुन कर लाते
धन्य हमारा लोकतंत्र
है धन्य हमारा देश स्वतंत्र
है धन्य हमारी जनता
हैं धन्य हमारे नेता
अब, बस बहुत हो चुका
अब भी जागो युवा
जगाओ अंदर के शिवा को
खोलो मन के द्वार
हो जाने दो
एक बार फिर इस जग का उद्धार !!
जयराम चौधरी
jay.choudhary16@gmail.com

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

वोटर यानि सौ सुनार की एक लोहार की

जाग वोटर अब तेरी बारी आई है । दिखा दे अपना जलवा, बता दे अपनी ताकत। बता दे अपनी हैसियत दिखा दे अगले को उसकी औकात। वोटर तू लोकतंत्र के सागर का मोती है, पहचान अपनी कीमत। तुझे वोट के बीज से खुशहाली के फूल उगाने है। ये समय तेरा है । इस समय के महत्व को समझना होगा। वोट देना हसी खेल नही है । अपने को इतना नासमझ मत बना कि कोई भी ऐरा-गैरा आकर तुझसे तेरा वोट चुरा ले। वोटर यही समय तेरा है । तू जज बनकर फैसला सुना दे, अम्पायर बनकर उंगली उठा दे । अभी ड़मरू तेरे हाथ में है । इस खेल मे तेरी भूमिका मदारी की होनी चाहिये बंदर की नही । वोटर भाई एक बात तो तू अच्छे से जान ले कि जैसी वोटर की औकात होती है वैसी ही उसकी सरकार होती है , उससे ज़रा भी अच्छी नही । भय्या अपने अंदर के सारे विवेक का एकत्रित कर ले, अपनी सारी सोच को सामने रख दे , अपनी सुंदर सोच से संसद को सजा दे। ध्यान रहे तेरी एक गलती से संसद गंदी हो सकती है । लोकतंत्र के इस मंदिर में तेरा चढावा ज़बरदस्त होना चाहिये ।

जब हम इन्टरव्यू देने जाते , जब लड़की देखने जाते है , जब मकान खरीदने जाते है , जब बच्चे के लिये खिलौना लेने जाते है , यहां तक कि जब धनिया मिर्ची भी खरीदने जाते है तो तैयारी कर के जाते है , लेकिन वोट देने जाते समय हमारी कोई खास तैयारी नही होती । हम अपने प्रत्याशी को अच्छे से ठोक बजाकर चैक क्यो नही करते है ? वोट देने से पहले उससे पचास सवाल क्यो नही करते ? उसको वोट देने या नही देने का आधार क्या होता है हमारे पास ? वोट को लेकर हमारी कोई पुख्ता सोच नही है , हम आगामी पांच साल तक अपने द्धारा चुने गये प्रत्याशी को गलियां देते रहते है , उसके निकम्मेपन पर कोसते रहते है , उसके द्धारा भुला दिये गये वादो को याद करते रहते है .......ये सब करना हमको अच्छे से आता है लेकिन वोट देते समय उसको ठेंगा दिखाना नही आता । हम अपने दरवाज़े वोट मांगने आये नेता को मुंह पर क्यो नही कहते कि हम तुमको वोट नही देंगे क्योकि तुम इस योग्य नही हो। वह मुस्कुराकर हाथ जोड़ता है हम भी मुस्कुरा कर हाथ जोड़ देते है । हाथ से हाथ जोड़ो पर दोना हाथ तुम्हारे ही नही होने चाहिये । एक हाथ नेता का और एक हाथ नागरिक का होना चाहिये । वोट के मामले मे वोटर का कर्तव्य होता है कि वह एक दम मुंह फट हो जाये , इसमें ज़रा भी संकोच और शर्म नही होनी चाहिये । याद रखिये दुनियाॅ मे हां उसी की होती है जिसको न बोलना आता है । उम्मीदवार हमारे दरवाज़े आता है तो हम गदगद हो जाते है , समर्पित हो जाते है , भूल जाते है कि इससे तो पुराना हिसाब किताब ठीक करना है । पिछले चुनाव के समय किये गये वादो का लेखा जोखा पूछना है । फलाने फलाने मामले मे इसके समर्थन या विरोध का कारण ज्ञात करना है । संसद में हमारे प्रतिनिधी की हैसियत से इसने कब कब क्या बोला ? स्थानीयत मुद्धो को इसने किस ढंग से उठाया ? जीतने के बाद इसने देशहित में क्या किया ? वोटर को चाहिये कि वह उम्मीदवार के सामने सवालो की बारिश कर दे । साथियो राजनीति की इस महफिल में तबला नही नगाड़ा बजाना होगा ।

लोकतंत्र के दर्पण के सामने खड़े होकर हमको अपनी ही ऐसी की तैसी कर देनी चाहिये । खुद को कटघरे में खड़े कर खुद पर आरोप लगाने चाहिये , खुद से सफाई मांगनी चाहिये और खुद ही खुद का फैसला करना चाहिये । इन दिनो हमें चाहिये कि कल्पना की कक्षा में खुद शिक्षक बन खुद का मार्ग दर्शन करे, खुद ही खुद से सवाल करे और खुद ही उसका जवाब भी दे, और गलत जवाब देने पर खुद ही खुद को दंड़ दे। अपना प्रतिनिधी चुनते समय हमें उतना ही चौकन्ना रहना पड़ेगा जितना हम दामाद चुनते समय रहते है । अगर गलत दामाद चुन लिये तो बिटिया का भविष्य बर्बाद हो जायेगा उसी प्रकार यदि हमारे द्धारा गलत प्रतिनिधी चुन लिया गया तो देश का भविष्य बर्बाद हो जायेगा । याद रखिये देश सर्वोपरि होता है, देश के लिये बड़ी से बड़ी कुर्बानी भी मामूली से बात होनी चाहिये । वोट देना किसी निशान पर बटन दबाना मात्र नही है बल्कि इस प्रक्रिया के द्धारा देश का भविष्य तय करना है । यह कोई छोटी मोटी ज़िम्मेदारी नही है , अगर एक बार आपने किसी को अपना वोट दे दिया तो फिर उसके किये गये हर अच्छे बुरे कार्य के जिम्मेदार हम खुद होंगे।अगर वह अयोग्य साबित होता है तो यह उसकी नही हमारी अयोग्यता मानी जायेगी कि हमे ढंग का आदमी चुनना तक नही आता । गलत आदमी को वोट देकर जिताने से बड़ा और कोई पाप नही हो सकता। अगर कोई सांसद या विधायक अपने कार्यकाल मे असफल साबित होता है तो इस बात का पता लगाना चाहिये कि यह किन किन के वोटो से जीता था , फिर उन सभी से वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिये । उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिये । ऐसे नासमझो के साथ कोई रियायत नही बरतनी चाहिये।

हम विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के नागरिक है । हम ऐसे देश के नागरिक है जहां दो चीज़े बहुत होती है , एक त्योहार और दूसरा चुनाव । आये दिन हमें कोई न कोई चुनाव का सामना करना ही पड़ता है । इसलिये यह अत्यंत आवश्यक है कि हम वोट देने के कुछ कड़क नियम स्वयं के लिये बना ले । पहला नियम तो यह होना चाहिये कि हम दिल से यह स्वीकार करे कि चुनाव में आस्था जैसी कोई चीज़ नही होनी चाहिये । आस्था धार्मिक मामलो में होनी चाहिये राजनीतिक मामलो मे नही । अक्सर वोटरो के मुंह से सुना जाता है कि हमारी फला -फला पार्टी पर आस्था है , या हम तो बाप दादाओ के ज़माने से कांग्रेसी , भाजपाई या कम्युनिस्ट है । इस तरह की कोई मान्यता हमारे मन में नही होना चाहिये । हर बार समय के साथ स्थितियां बदल जाया करती है , लिहाज़ा हमें भी अपना निर्णय बदलने पर विचार करना चाहिये । दूसरा नियम यह होना चाहिये कि हम हर वोट मांगने आने वाले को शक की नज़र से देखे । उस पर सहसा विश्वास करे ही नही । हमारी नज़र में हर प्रत्याशी संदिग्ध होना चाहिये । हमें हमेशा एक ही राग अलापना चाहिये कि अगर ये ऐसा बोल रहा है तो क्यो बोल रहा है , अगर ये ऐसा कर रहा है तो क्यो कर रहा है , अगर यह उससे मिल रहा है तो क्यो मिल रहा है , अगर इसने ये वादा किया है तो इसे पूरा क्यो करेगा , कब करेगा , कैसे करेगा ? अगर इसने फलाॅ फलाॅ वादो पर अमल नही किया तो हम इसका क्या कर लेगे ? हम कुछ नही कर सकेगे हमको एक बार वोट देने का मौका मिलता है अगर उसे नादानी में गवां दिये तो अगले पांच साल तक हमारे पास सिवाय आंसू बहाने और हाथ मसलने के आलावा और कुछ नही है । इसलिये भाईयो खुदा का शुक्र अदा करो कि तुम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हो जहां तुम्हे वोट देने की नैमत हासिल हुई है । अपने इस अधिकार से तूफान मचा दो , प्रगति के समंदर में देश की नाव के नाखुदा हो तुम । निर्माता हो तुम सरकार के । मतदान की कलम से देश का भविष्य लिख दो । कुछ ऐसा धमाल करो इस वोट से कि कमाल हो जाये । वोट वोट न रहे अलादीन का चिराग हो जाये , ज़रा अपनी सोच को संवारो , तुम्हारा वोट वोट नही एक शस्त्र है इसे ढंग से चलाना सीखो । इस बार ज़िद मे आ जाओ कि तुम्हे चाहिये सिर्फ योग्य योग्य और योग्य नुमाइंदा ।

योग्यता का मापदंड़ क्या होगा ? किसी प्रमाण पत्र से योग्यता का आंकलन नही किया जा सकता । किसी लैब की रिपोर्ट नही बताती कि प्रत्याशी मे कितने प्रतिशत ईमानदारी , कितने प्रतिशत जिम्मेदारी , कितने प्रतिशत देशप्रेम और कितने प्रतिशत लालच, मौकापरस्ती,, धोखाधड़ी है । योग्य प्रत्याशी को तो तुम्हे अपने विवेक से तलाशना होगा , सजग निगाहो से ढूंढ़ना होगा , अनुभवी हाथो से टटोलना होगा । एक बात तय है कि योग्यता को किसी प्रमाण पत्र की ,किसी रिपोर्ट की आवश्यकता नही होती । अयोग्यता की इतनी औकात नही है कि वह योग्यता को दबा दे । अयोग्यता के शोर मे इतनी आवाज़ नही होती कि उसमें योग्यता का गीत दब जाये । ए वोटरो तुम अयोग्यता के शोर के खिलाफ़ समूह गीत बन जाओ । लोकतंत्र के आकाश पर वोट के बादल बन कर गरजो , बिजली बन कर कड़को , बारिश बन कर बरसो और मौकापरस्ती के कचरे को बहा दो । प्रत्याशी के बैनर पोस्टर नही देखो , उसका घोषणा पत्र देखो । बांचो की उस में कुछ ज़मीनी सच्चाई भी है या सब कुछ हवा हवाई ही है । वोट के खौफ को इतना उभारो कि किसी नेता में इतना साहस ही न हो कि वह तुम्हारी भावनाओ के साथ खिलवाड़ करने का सोच भी सके । हमेशा उसके दिमाग में यही भय समाया रहना चाहिये कि अगर कुछ ऐसा वैसा किया तो अभी वोट का ड़ंड़ा पड़ेगा । ये ऐसी चोट है जिसकी कोई मरहम पट्टी नही होती । ये ऐसा नासूर है जो पूरा कैरियर गला देता है । तुम अपनी क्षमता पहचानो , वोट के तवे पर अच्छे अच्छो का भेजा फ्राई कर दो । एक कुशल खिलाड़ी की तरह वोट का पासा फेको और खुशहाली की बाज़ी जीत लो । चुनावी पिच तुम्हारे अनुकूल है अगर संभल कर बल्लेबाजी किये तो तुम्हारी जीत निश्चित है। चुनावी अखाड़े में हार और जीत सिर्फ उम्मीदवारो की ही नही होती बल्कि वोटर की हार जीत भी इसमें शामिल रहती है । गलत प्रत्याशी की जीत वोटर की हार है । वोट बेचने से बड़ा कोई देशद्रोह नही और देशद्रोह से बड़ा कोई पाप नही । तुम इस पाप में कभी भागीदार नही बनना ।

हर वोटर की खास कर युवा वोटरों की यह नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वोट देने के पहले इस बात का अच्छी तरह अनुमान लगा ले कि कही कोई ड़ेढ़ होशियार तुम्हारे हाथो मे घोषणा पत्र का छुनछुना तो नही पकड़ा रहा है । नामांकन दाखिल करने से लेकर मतदान के दिन तक हर वोटर को इतना समय मिलता है कि वह अपने प्रत्याशियो का तरीके से चरित्र चित्रण कर ले । इस बात पर ध्यान दो कि प्रत्याशी की शैक्षणिक योग्यता क्या है लेकिन अनुभव के महत्व को भी नज़र अंदाज़ नही किया जा सकता है । अनुभवी आदमी का अपना अलग महत्व होता है लेकिन युवा प्रतिभा भी किसी से कम नही होती । मेरा तो यह मानना है कि आप अपने मन की प्रयोगशाला में इस बात की जांच करो कि आप के प्रत्याशी की विशेषता क्या है ? वह किस क्षेत्र से है ? राजनीज्ञ ही सत्ता संभाले तो ठीक है । प्रसिद्ध अभिनेता , प्रतिभावान खिलाड़ी या सफल उद्योगपति की जगह अपने अपने क्षेत्र मे महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन राजनीति में उनकी क्या आावश्यकता ? अभिनेता को जीता कर क्या देश की संसद में ठुमके लगवाना है ? वोट देने की वजह उम्मीदवार की सिर्फ लोकप्रियता ही हो यह उचित नही है । कम लोकप्रिय आदमी भी ज्यादा काबिल हो सकता है । परिवर्तन भी वोटर का मुद्धा हो सकता है । वोट इतना सोच विचार कर दो कि वोट देने के बाद जीते हुए उम्मीदवार का हर निर्णय हर कदम तुम्हे स्वीकार होना चाहिये । तुम्हारे अंदर इतना सब्र होना चाहिये कि आगामी पांच साल तक पुनः इंतजार कर सको । उम्मीदवार के सारे वादे, आश्वासन, पर तुम्हारा एक वोट इतना भारी होना चाहिये कि वोट के संबंध में यह कहावत लागू हो जाये कि सौ सुनार की एक लोहार की.......!!!
अखतर अली, आमानाका , रायपुर
akhterspritwala@yahoo.co.in

रविवार, 5 अप्रैल 2009

ये हैं हमारे नेता...??

जिस तरह मेले का नाम लेते ही बच्चे उछल पड़ते है उसी तरह चुनाव की घोषणा होते ही नेताओं में खुशी की लहर दौड़ पड़ती है..!अब देखिये जैसे ही आम .चुनाव का एलान हुआ वैसे ही सब नेता उठ खड़े हुए...जैसे की देव उठनी ग्यारस को देवता उठते है...!जो जहाँ था वहीं से बयानबाजी कर रहा है..!सब को बस टिकट चाहिए..!इसके लिए वे सब भूल गए है या की भूल जाना चाहते है...!कल तक जो एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे वे अब गलबहियां डाले टी वी पर दिख रहे है..!टिकट के लिए मेंढक की तरह एक से दूसरी पार्टी के पोखर में फुदक रहे है..!सालों की दोस्ती और दुश्मनी को भुला कर रोज नए नए समीकरण बनाये जा रहे है..!एक अदद टिकट के लिए जी जान लगा रहें है..!झकाझक सफ़ेद कपडों में सजे धजे नेता हर गली मोहल्लों तक पहुँच गए है..!जिस तरह खंभे को देख कर कुत्ता पैर उठा देता है उसी प्रकार ये भी वोटर को देखते ही खींसे निपोर कर भाषण .पिला देते है..!मुझे हँसी आती है ये देख कर की....आज के ये नेता कुछ तो उसूल रखते होंगे..?जी हाँ है न ...वोटर को नए नए सपने दिखाना ,वाडे करना,वोट .खरीदना,प्रलोभन देना आदि बातें सब में समान..है..और ये सब इनमे कॉमन है...!इसके अलावा आधी अधूरी .शिक्षा, देश के बारे में अल्प ज्ञान और पुलिस रिकार्ड तो सबका एक है ही...अब आप बताइए किसे .चुनेंगे आप..?और हाँ पार्टी के नाम पर ना जियेगा...क्यूंकि चुनावों के बाद इन सब की एक ही पार्टी होगी...."सत्ता"

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

लोकतंत्र में भागीदारी सुनिश्चित करती स्याही

लोकसभा और विधान सभा चुनावों के दौरान हर मतदाता के बाएं हाथ की तर्जनी के नाखून पर एक स्याही लगाई जाती है, जो इस बात का प्रतीक होता है कि वह अपना मत दे चुका है। स्याही का यह निशान भारतीय लोकतंत्र की एक अनुपम पहचान बन चुका है। जब हम लोग छोटे-छोटे थे तो इस स्याही के प्रति काफी क्रेज था। इस स्याही को येन-केन-प्रकरेण मिटाना हम लोगो का शगल होता था पर ये मिटने का नाम नहीं लेती थी। तब न तो लोकतंत्र की परिभाषा पता थी और न ही चुनाव का मतलब। पूरी मित्र मण्डली के साथ जाकर अपना वोट दे आते थे और फिर उधर से विभिन्न राजनैतिक दलों के पम्फलेट्स इत्यादि बटोर कर लाते थे। वक्त के साथ जैसे-जैसे किताबी ज्ञान बढ़ा, वैसे-वैसे राजनीति की बारीकियाँ एवं चुनाव की महिमा भी समझ में आती गई। आज के चुनाव पहले के चुनावों जैसे नहीं रहे। जिस प्रकार पर्यावरण में प्रदूषण फैलता गया वैसे ही चुनाव भी प्रदूषित होते गये। जाति-धर्म-धन-गुण्डई जैसे तत्व प्रत्याशियों के लिए आम बात हो गये। इसके बावजूद लोकतंत्र की महिमा कम नहीं हुई और हर बार हम यह सोच कर वोट दे आते हैं कि शायद इससे अगली बार कुछ आमूल चूल परिवर्तन होंगे। इस सकारात्मक दृष्टिकोण पर ही लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है।

फिलहाल हम बात कर रहे थे वोट के दौरान बाएं हाथ की तर्जनी के नाखून पर लगाई जाने वाली स्याही की। इस चुनावी स्याही के उत्पादन का श्रेय कर्नाटक के प्रसाद नगर स्थित मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (एमपीवीएल) को जाता है। आजादी के बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में फर्जी मतदान रोकने के लिए स्याही लगाने का फैसला किया गया। मैसूर के पूर्व महाराजा नलवाड़ी कृष्णराजे वाडेयार और प्रसिद्ध इंजीनियर भारतरत्न सर मोक्षगंुडम विश्वेश्वरैया ने यह कंपनी बनाने का सपना देखा था। उनके प्रयासों से 1937 में इस कंपनी की स्थापना की गई और आजादी के बाद 1947 में इसे सार्वजनिक उपक्रम में बदल दिया गया। आज भी इस स्याही के उत्पादन का अधिकार केवल मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड के पास है।

यह चुनावी स्याही एक अलोप्य स्याही है, जो उंगली पर लगने के बाद एक मिनट में सूखती है। सूखने के बाद उंगली पर ऐसे चिपकती है कि लाख प्रयास कर लीजिए, कई महीनों तक छूटने का नाम ही नहीं लेती। इसे किसी रसायन, साबुन या तेल से भी नहीं हटाया जा सकता। वस्तुतः यह स्याही फर्जी मतदान को रोककर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में महत्वपूर्ण भूमिका चुपचाप अदा करती है। यह स्याही एक मतदाता द्वारा एक ही मत डालने की प्रक्रिया को भी सुनिश्चित करती है। एक फरवरी 2006 से चुनाव आयोग द्वारा मतदाता की उंगली पर इसके लगाने के तरीके में थोड़ा बदलाव किया गया है। अब इसे बांये हाथ की तर्जनी उंगली पर नाखून के निचले किनारे से लेकर ऊपरी किनारे और त्वचा के जोड़ तक एक रेखा के रूप में लगाया जाता है। इससे पहले इस स्याही को नाखून के ऊपरी किनारे और त्वचा के जोड़ पर ही लगाया जाता था। यह बात कम लोगों को ही पता होगी कि अगर कोई व्यक्ति फर्जी तौर पर मतदान करते हुए (प्राक्सी मतदान) पकड़ा गया तो इस स्याही को उसके बांये हाथ की बीच की उंगली पर लगाया जाता है।

आज मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड द्वारा इस स्याही का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन हो रहा है। पिछले साल सितंबर तक पहले छह महीने में एमपीवीएल से एनआरडीसी को करीब 20 लाख रूपये रायल्टी मिली। शुरू से यह उपक्रम ही इस स्याही की आपूर्ति चुनाव आयोग को करती आ रही है। खास बात तो यह है कि दुनिया के 25 देशों में यह चुनावों के सफल निष्पादन में अपनी भूमिका निभाती है। भारत में बनने वाली इस चुनावी स्याही को लगभग 25 देशों को निर्यात किया जाता है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

देखिये ये चुनाव है....!!

चुनावी..बिगुल बज चुका है......चारों तरफ़ युध्घोश हो रहे है ..इसी के साथ ही कुछ नेता गिरगिट की भाँती रंग बदलने लगे है तो कुछ ने अपना चोगा उतार फेंका है..!कुछ हिन्दुओं को तो कुछ मुसलमानों को गालियाँ निकाल रहे है....!कुछ जातिवाद को भुनाने में लगे है तो कुछ हमेशा की तरह गरीबों का वोट हथियाना चाहते है....!सब नेताओं ने तरह तरह के मुखोटे पहन लिए है....!वे मेंढक की तरह एक से दूसरी पार्टी में फुदक रहे है....अचानक ही वे हमारे हमदर्द बन गए है....उन्हें हर हाल में हमारा वोट चाहिए...!इस चुनावी .नदी...को पार करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते है...!हम सब ये देख कर भले ही हैरान हो लेकिन वे इस खेल के पुराने खिलाडी है....ये उनका पेशा है..!अब हमे चाहिए की हम उनकी बातों में ना आए...!चुनाव आते ही ये जहर उगलने वाले नेता बाद में फ़िर एक हो जायेंगे...इसलिए इनकी बातों में ना आना दोस्तों ...ये तो गरजने वाले बादल है जो बिन बरसे ही गुज़र जायेंगे.....!इनके पीछे हम अपना भाईचारा क्यूँ ख़तम करें....?

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

प्रथम युवा महिला सांसद : तारकेश्वरी सिन्हा

आज भारतीय राजनीति में तमाम युवा चेहरे हैं. संसद के गलियारों में इन युवाओं की धूम है पर एक दौर ऐसा भी था जब युवा चेहरे वह भी युवा महिला बमुश्किल ही संसद में देखने को मिलते थे. ऐसे समय में पहली लोकसभा में सबसे युवा चेहरा था- तारकेश्वरी सिन्हा का । मात्र 26 साल की उम्र में सांसद के तौर पर शपथ लेने वाली तारकेश्वरी सिन्हा नेहरू मंत्रिमंडल में उप-वित्त मंत्री भी रहीं। बिहार के बाढ़ संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ने वाली तारकेश्वरी सिन्हा एक बेहद संवेदनशील कवियत्री और अच्छी लेखिका भी थीं। उन्होंने अपनी यादों को सहेजकर कई संस्मरण भी लिखे। इनमें 'संसद में नहीं हूं, झक मार रही हूं' तो काफी लोकप्रिय रहा। यह संस्मरण उन्होंने लोकसभा चुनाव हारने के बाद लिखा। इतिहास गवाह है कि जब उनकी उम्र की लड़कियां सजने-संवरने में वक्त गंवा रही थीं, तारकेश्वरी सिन्हा 1942 के भारत छोडो आंदोलन में कूद पड़ीं। उस समय उनकी उम्र बमुश्किल 19 साल थी। फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई आंदोलनों में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यही नहीं, तारकेश्वरी सिन्हा उन चंद लोगों में शामिल थीं, जिन्हें नालंदा में महात्मा गांधी की आगवानी करने का मौका मिला था। बताते हैं कि तारकेश्वरी सिन्हा के घरवालों को उनकी राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी पसंद नहीं थी और जब उन्होंने छपरा के एक जमींदार परिवार में शादी की, तो घरवालों को यह सोचकर सुकून मिला कि शादी के बाद तारकेश्वरी सिन्हा राजनीति से दूर हो जाएंगी. पर देशभक्ति और समाज सेवा के जज्बे से भरपूर तारकेश्वरी को राजनीति से अलगाव मंजूर नहीं था। फिर तो वह लगातार भारतीय राजनीति में आगे बढ़ती गई। यहाँ तक कि मशहूर गीतकार गुलजार ने फिल्म 'आंधी' के मुख्य किरदार को इंदिरा गांधी के साथ-साथ तारकेश्वरी सिन्हा से भी प्रेरित बताया। आज भारतीय राजनीति में भले ही तमाम युवा महिलाएं आगे आ रही हैं और नए प्रतिमान स्थापित कर रही हैं पर वास्तव में युवा महिला शक्ति की अलख जगाने का श्रेय तारकेश्वरी सिन्हा को ही जाता है।

शनिवार, 28 मार्च 2009

किसका चुनाव और किसके लिए चुनाव ??

चुनाव की चारों तरफ़ बहार है। क्या युवा..क्या बूढे सभी चुनावी रंग में रंगे हुए हैं। हर किसी को लगता है कि वह जिस दल को वोट देगा वही सत्ता में आयेगा। राजनीति में युवा चेहरों की इस बार ज्यादा पूछ है। राहुल गाँधी से लेकर वरुण गाँधी तक चर्चा में हैं तो प्रिया दत्त से लेकर तमाम युवा महिलाएं चुनाव में अपना भाग्य अजमा रही हैं। कहीं फिल्मी सितारे तो कहीं क्रिकेट सितारे मानो चुनाव नहीं मेला चल रहा हो। हर प्रत्याशी को अपनी जीत का भरोसा है तो हर मतदाता को अपने मत पर। इन सबसे परे एक ऐसा भी वर्ग है जो लम्बी-लम्बी बातें तो करता है, पर मतदान में उसकी कोई रूचि नहीं है। उसे लगता है की वह लोकतंत्र रूपी पायदान के सबसे शीर्ष पर है , जहाँ से वह या तो बौधिक बहस करता है या फतवे जारी करता है। इस चुनावी लोकतंत्र में हर किसी की अपनी भूमिका है और हर किसी का अपना मूल्य (?) भी। व्यक्ति से बड़े जाति-धर्म हो गए हैं, तभी तो ऐन वक्त तक प्रत्याशी बदले जा रहे हैं। अब इन राजनेताओं को कौन समझाए कि यह पब्लिक है, जो सब कुछ जानती है। चुनाव आयोग ने दीवालों पर नारे लिखना मन कर दिया तो अख़बारों की चाँदी हो गई। यहाँ हर कुछ मैनेज होता है, बस आपको ढंग आना चाहिए। एक वो है जो दिखता है, तो एक वो है जो दीखता नहीं, आखिर चुनाव आयोग भी क्या-क्या देखे ? बस यूँ समझिये कि चुनाव है और फ़िर पॉँच साल के लिए भूल जाना है। आप मत किसी को देते हैं, सरकार किसी की बनती है। सत्ता के लिए सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं, फ़िर किसका चुनाव और किसके लिए चुनाव....विचार करें ???

बुधवार, 25 मार्च 2009

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का अद्भुत ‘प्रताप’ (पुण्य तिथि-२५ मार्च पर)

साहित्य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्ति की ज्वाला क्रान्तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्तम्भ थे, जिनके अखबार ‘प्रताप‘ ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल अतरसुइया, इलाहाबाद में हुआ था। उनके नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्तव सहायक जेलर थे, अतः अनुशासन उन्हें विरासत में मिला। गणेश शंकर के नामकरण के पीछे भी एक रोचक वाकया है- उनकी नानी ने सपने में अपनी पुत्री गोमती देवी के हाथ गणेश जी की प्रतिमा दी थी, तभी से उन्होंने यह माना था कि यदि गोमती देवी का कोई पुत्र होगा तो उसका नामकरण गणेश शंकर किया जायेगा। मूलतः फतेहपुर जनपद के हथगाँव क्षेत्र के निवासी गणेश शंकर के पिता मुंशी जयनारायण श्रीवास्तव ग्वालियर राज्य में मुंगावली नामक स्थान पर अध्यापक थे। गणेश शंकर आरम्भ से ही किताबें पढ़ने के काफी शौकीन थे, इसी कारण मित्रगण उन्हें ‘विद्यार्थी‘ कहते थे। बाद में उन्होंने यह उपनाम अपने नाम के साथ लिखना आरम्भ कर दिया। विद्यार्थी जी की प्रारम्भिक शिक्षा पिता जी के स्कूल मुंगावली, जहाँ वे एंग्लो-वर्नाकुलर मिडिल स्कूल में अध्यापक थे, में हुई। विद्यार्थी जी उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। 1904 में उन्होंने भलेसा से अंग्रेजी मिडिल की परीक्षा पास किया, जिसमें पहली बार हिंदी द्वितीय भाषा के रूप में मिली थी। तत्पश्चात पिताजी ने विद्यार्थी जी को पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के लिए बड़े भाई शिवव्रत नारायण के पास कानपुर भेज दिया। कानपुर में आकर विद्यार्थी जी ने क्राइस्ट चर्च कालेज की प्रवेश परीक्षा दी पर भाई का तबादला मुंगावली हो जाने से आगे की पढ़ाई फिर वहीं हुई। वर्ष 1907 में विद्यार्थी जी आगे की पढ़ाई के लिए कायस्थ पाठशाला गये। इलाहाबाद प्रवास के दौरान विद्यार्थी जी की मुलाकात ‘कर्मयोगी‘ साप्ताहिक के सम्पादक सुन्दर लाल से हुई एवं इसी दौरान वे उर्दू पत्र ‘स्वराज्य‘ के संपर्क में भी आये। गौरतलब है कि अपनी क्रान्तिधर्मिता के चलते ‘स्वराज्य‘ पत्र के आठ सम्पादकों को सजा दी गई थी, जिनमें से तीन को कालापानी की सजा मुकर्रर हुई थी। सुन्दरलाल उस दौर के प्रतिष्ठित संपादकों में से थे। लोकमान्य तिलक को इलाहाबाद बुलाने के जुर्म में उन्हें कालेज से निष्कासित कर दिया गया था एवं इसी कारण उनकी पढ़ाई भी भंग हो गई थी। सुन्दरलाल के संपर्क में आकर विद्यार्थी जी ने ‘स्वराज्य‘ एवं ‘कर्मयोगी‘ के लिए लिखना आरम्भ किया। यहीं से पत्रकारिता एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति उनकी आस्था भी बढ़ती गई।

इलाहाबाद से गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ कानपुर आये एवं इसे अपनी कर्मस्थली बनाया। कानपुर में कलकत्ता से अरविंद घोष द्वारा सम्पादित ‘वन्देमातरम्‘ ने विद्यार्थी जी को आकृष्ट किया एवं इसी दौरान उनकी मुलाकात पं0 पृथ्वीनाथ मिडिल स्कूल के अध्यापक नारायण प्रसाद अरोड़ा से हुई। अरोड़ा जी की सिफारिश पर विद्यार्थी जी को उसी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गई। पर पत्रकारिता की ओर मन से प्रवृत्त विद्यार्थी जी का मन यहाँ भी नहीं लगा और नौकरी अन्ततः छोड़ दी। उस समय महावीर प्रसाद द्विवेदी कानपुर में ही रहकर ‘सरस्वती‘ का सम्पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी इस पत्र से भी सहयोगी रूप में जुड़े रहे। एक तरफ पराधीनता का दौर, उस पर से अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार ने विद्यार्थी जी को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने पत्रकारिता को राजनैतिक चेतना को जोड़कर कार्य करना आरम्भ किया। इसी दौरान वे इलाहाबाद लौटकर वहाँ से प्रकाशित साप्ताहिक ‘अभ्युदय‘ के सहायक संपादक भी रहे। पर विद्यार्थी जी का मनोमस्तिष्क तो कानपुर में बस चुका था, अतः वे पुनः कानपुर लौट आये। कानपुर में विद्यार्थी जी ने 1913 से साप्ताहिक ‘प्रताप’ के माध्यम से न केवल क्रान्ति का नया प्राण फूँका बल्कि इसे एक ऐसा समाचार पत्र बना दिया जो सारी हिन्दी पत्रकारिता की आस्था और शक्ति का प्रतीक बन गया। प्रताप प्रेस में कम्पोजिंग के अक्षरों के खाने में नीचे बारूद रखा जाता था एवं उसके ऊपर टाइप के अक्षर। ब्लाक बनाने के स्थान पर नाना प्रकार के बम बनाने का सामान भी रहता था। पर तलाशी में कभी भी पुलिस को ये चीजें हाथ नहीं लगीं। विद्यार्थी जी को 1921-1931 तक पाँच बार जेल जाना पड़ा और यह प्रायः ‘प्रताप‘ में प्रकाशित किसी समाचार के कारण ही होता था। विद्यार्थी जी ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं थे, पर एक ऐसी असीम ऊर्जा थी, जिसका संचरण स्वतंत्रता प्राप्ति के निमित्त होता था। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी। यह ‘प्रताप’ ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा और चम्पारण-सत्याग्रह की नियमित रिपोर्टिंग कर राष्ट्र को गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित कराया। चैरी-चैरा तथा काकोरी काण्ड के दौरान भी विद्यार्थी जी ‘प्रताप’ के माध्यम से प्रतिनिधियों के बारे में नियमित लिखते रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्ति कविता ’पुष्प की अभिलाषा’ प्रताप अखबार में ही मई 1922 में प्रकाशित हुई। बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेहीजी, प्रताप नारायण मिश्र इत्यादि ने प्रताप के माध्यम से अपनी देशभक्ति को मुखर आवाज दी।

विद्यार्थी जी एक पत्रकार के साथ-साथ क्रान्तिधर्मी भी थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने काकोरी षडयंत्र केस के अभियुक्तों के मुकदमे की पैरवी करवायी और जेल में क्रान्तिकारियों का अनशन तुड़वाया। कानपुर को क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बनाने में विद्यार्थी जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विजय कुमार सिन्हा, राजकुमार सिन्हा जैसे तमाम क्रान्तिकारी विद्यार्थी जी से प्रेरणा पाते रहे। वस्तुतः प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। बनारस षडयंत्र से भागे सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्पादक थे। बाद में भट्टाचार्य और प्रताप अखबार से ही जुड़े पं0 राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्ड में सजा मिली। भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। सर्वप्रथम दरियागंज, दिल्ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए भगत सिंह ने दिल्ली की यात्रा की और लौटकर ‘प्रताप’ के लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी, फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही थे कि जेल में भंेट करके क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा छिपाकर लाये तथा उसे ‘प्रताप‘ प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की माँ की मदद की और रोशन सिंह की कन्या का कन्यादान भी किया। यही नहीं अशफाकउल्ला खान की कब्र भी विद्यार्थी जी ने ही बनवाई।

विद्यार्थी जी का ‘प्रताप‘ तमाम महापुरूषों को भी आकृष्ट करता था। 1916 में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक इक्के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ दो दिन रहे। 1925 के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान विद्यार्थी जी स्वागत मंत्री रहे और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ घोड़े पर चढ़कर अधिवेशन स्थल का भ्रमण करते थे। यह विद्यार्थी जी ही थे जिन्होंने श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद‘ को प्रताप प्रेस में रखा एवं उनके गान ‘राष्ट्र पताका नमो-नमो‘ को ‘झण्डा ऊँचा रहे हमारा‘ में तब्दील कर दिया। विद्यार्थी जी सिद्धांतप्रिय व्यक्ति थे। एक बार जब ग्वालियर नरेश ने उन्हें सम्मानित किया और कहा कि मुझे खुशी है कि आपके पिताजी मेरे अंतर्गत मुंगावली में कार्यरत रहे हैं, परन्तु आप मेरे बारे में अपने अखबार में लगातार विरोधी खबरें छाप रहे हैं। तो विद्यार्थी जी ने निडरता से कहा कि मैं आपका और पिताजी के आपसे सम्बन्धों का सम्मान करता हूँ, परन्तु इसके चलते अखबार के साथ अन्याय नहीं कर सकता। हाँ, यदि आप इन खबरों का प्रतिवाद लिखकर भेजेंगे तो अवश्य प्रकाशित करूँगा।

कालान्तर में विद्यार्थी जी गाँधीवादी विचारधारा से काफी प्रभावित हुए एवं यह उनकी लोकप्रियता का भी सबब बना। वे क्रान्तिकारियों एवं गाँधीवादी विचारधारा के अनुयायियों के लिए समान रूप से प्रिय थे। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया तो भारतीय जनमानस आगबबूला हो उठा। अंगे्रजी निर्दयता के विरूद्ध जनमानस सड़कों पर उतर आया। निडर एवं साहसी व्यक्तित्व के धनी तथा साम्प्रदायिकता विरोधी विद्यार्थी जी इस दौरान भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शान्त कराने के लिए लोगों के बीच उतर पड़े। उधर विद्यार्थी जी के प्रताप से अंग्रेजी हुकूमत भी भयभीत थी। रायबरेली में मुंशीगंज गोली काण्ड के तहत ‘प्रताप‘ पर मानहानि का केस चल रहा था और अंग्रेज बार-बार यह संदेश दे रहे थे कि जब तक कानपुर में ‘प्रताप‘ जीवित है, तब तक प्रदेश में शान्ति स्थापना मुश्किल है। भड़की हिंसा को काबू करने के दौरान 25 मार्च 1931 को विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए। उनका शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अन्तिम संस्कार कर दिया गया पर ‘प्रताप‘ के माध्यम से ‘विद्यार्थी‘ जी ने राजनैतिक आन्दोलन, क्रान्तिकारी चेतना, क्रान्तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्य को जो ऊँचाईयाँ दीं, उसने उन्हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच में ही अन्ततः स्वाधीनता की लौ प्रज्जवलित हुई।
कृष्ण कुमार यादव

सोमवार, 23 मार्च 2009

कोई भी रोक नहीं पाया भगत सिंह की फांसी (शहादत-दिवस पर विशेष)

इतिहासकारों के बीच आज भी इस बात को लेकर विवाद है कि क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था? क्या उन्हें गांधी ने मार डाला? क्या वाकई बापू और अन्य बड़े नेता भगत सिंह के इंकलाबी तेवर और लोकप्रियता से डर गए थे? दरअसल शहीदे आजम की मौत अपने पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गई है जिसे सुलझाया नहीं जा सका है। और शायद जिसे कभी सुलझाया जा भी नहीं सकेगा।

लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब 23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सूली पर लटकाया गया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनी गई। ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की, वहीं देश-विदेश के तमाम अखबारों ने भी इसे सुर्खियां बनाया। फांसी 24 मार्च को दी जानी थी। लेकिन जनविद्रोह के डर से ब्रिटिश हुक्मरानों ने तिथि चुपके से बदलकर 23 मार्च कर दी। बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में इस घटना पर तत्कालीन नेताओं और अखबारों द्वारा व्यक्त की गई तीखी टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दर्ज हैं।

-'..यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि भगत सिंह और उसके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई। 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद समाचार मिला। भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है।' [सुभाष चंद्र बोस]
-'मैंने भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा। मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है। लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया। मैं भगत और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूं। साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें।' [महात्मा गांधी]
-'हम सबके लाड़ले भगत सिंह को नहीं बचा सके। उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है।' [जवाहर लाल नेहरू]
-'अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सांडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। फिर भी उसे फांसी दे दी गई।' [वल्लभ भाई पटेल]
-'भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती। हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' [प्रसिद्ध वकील और केंद्रीय विधानसभा सदस्य डीबी रंगाचेरियार]
-'भगत सिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है। हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन 'क्रांति अमर रहे' और 'भगत सिंह अमर रहे' जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं।' [अंग्रेजी अखबार द पीपुल]
-'पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा।' [उर्दू अखबार रियासत]
-'राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है।' [आनंद बाजार पत्रिका]
-'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी, वह देश का गद्दार और शैतान था।' [पंजाब केसरी]
(साभार: दैनिक जागरण)

मंगलवार, 10 मार्च 2009

रंग-बिरंगी होली आई (बाल कविता)

होली आई, होली आई
रंग-बिरंगी होली आई
आओ पाखी, आओ बंटी
मिलजुल सभी मनाएं होली
पाखी ने भर ली पिचकारी
आई देखो किसकी बारी
उसने सबको ही रँग डाला
लाल, गुलाबी, नीला, काला
आई अब गुलाल की बारी
संग में गुझिया की तैयारी
सब मिलजुल गुझिया खाएं
पाठ प्यार का रोज पढ़ाएं
मिलजुल बन जाएं हमजोली
ऐसी प्यारी है यह होली !!!
कृष्ण कुमार यादव

शनिवार, 7 मार्च 2009

21वीं सदी में स्त्री समाज के बदलते सरोकार ( अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर)

भारत में नारी को पूजनीय माना गया है। वैदिक काल से ही नारी विभिन्न रूपों में सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करती आ रही है। नारी की सुकोमलता, सौंदर्य, लज्जा व स्नेहिल स्वभाव सदैव से इसके आभूषण रहे हैं पर दुर्भाग्यवश इन्हीं गुणों के कारण उसके साथ बार-बार छल भी हुआ है। समाज की सामन्तवादी सोच ने नारी की आन्तरिकता की उपेक्षा कर उसकी भौतिक काया एवं बाहरी रूप-रंग को ही आधार बनाया । आज जहाँ पुरूष की शुचिता उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के आधार पर मापी जाती है, वहीं नारी की शुचिता अंग विशेष के आधार पर मापी जाती है।

प्राचीन काल से ही जहाँ नारी को एक तरफ समाज में प्रतिष्ठा मिली, वहीं दूसरी तरफ वह बर्बरता का शिकार हुयी । तुलसीदास ने तो नारी को ताड़ना का अधिकारी बताकर पशु के समकक्ष खड़ा कर दिया- ‘‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।’’ मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने पत्नी सीता के अग्निपरीक्षा में खरे उतरने के बाद भी एक धोबी के कहने पर धोखे से अपनी पत्नी को घर से निर्वासित कर दिया । सती-प्रथा की आड़ में तमाम नवयुवतियों को मृत पति के साथ चिता में जिन्दा भस्म कर दिया गया । तमाम राजाओं की हैवानियत तब तक पूरी नहीं होती थी जब तक वे पराजित राजाओं की रानियों को अपने हरम का हिस्सा नहीं बना लेते थे। जौहर-प्रथा इसी का नतीजा थी । यह सब तो बीते युग की बातें हैं, वर्तमान दौर में भी इस तरह की व्यथायें देखी और सुनी जा सकती हैं। बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी0 टी0 ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से परिचय देने के बावजूद इसलिये बाहर निकाल दिया क्योंकि वह वेश-भूषा से वातानुकूलित कोच में बैठने लायक नहीं लगती थीं। याद कीजिये दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा गाँधी जी को टेªन के प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर निकालने का दृश्य। राजस्थान में ‘साथिन’ नामक संस्था से जुड़ी भँवरी देवी ने जन-जागरूकता का बीड़ा उठाया तो हश्र्र बलात्कार के रूप में सामने आया। देवदासी प्रथा के नाम पर कुंवारी कन्या को भगवान के दरबार में सौंप देना और तत्पश्चात मन्दिर के पुरोहित द्वारा कन्या के साथ संभोग करना जैसी घटनायें भी कुछेक देशों में देखी जा सकती हैं। पंचायत संस्थाओं में निम्न वर्ग की महिलाओं को आरक्षण मिलने के साथ ही देश के कई क्षेत्रों में निर्वाचित सरपंचों के साथ बद्सलूकी की घटनायें अखबारों की सुर्खियाँ बनी । मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हुआ ‘सती काण्ड’ अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है । इक्कीसवीं सदी की ओर उन्मुख राष्ट्र की गर्वोक्ति घोषणाओं के साथ ही अखबारों में नित्य नाबालिगों के साथ दुष्कर्म की घटनायें छपती रहती हैं। मुम्बई की लोकल टेªन में एक वहशी द्वारा पाँच-छः यात्रियों के सामने एक बालिका से बलात्कार करना और उन यात्रियों का चुप-चाप तमाशा देखना क्या इंगित करता है ? सभ्य समाज का दर्जा पा चुकने के बाद भी घर की महिलाओं से बलात्कार कर बदला चुकाने का पाशविक अंदाज नहीं बदला है। विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र एवम् लोकतन्त्र व सभ्यता के स्वयंभू रक्षक अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी अपने कार्यालय की एक अदना सी महिला कर्मचारी मोनिका लेविंस्की के साथ अंतरंग क्षणों का लोभ नहीं छोड़ सके। एक सभ्य समाज की ये असभ्य घटनायें हमें कहाँ लेे जा रही हैं ?

आधुनिक समाज संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। आाधुनिकता के नाम पर सफलता हेतु शार्टकट रास्ते अपनाना, स्वतन्त्रता के नाम पर उन्मुक्तता का पक्ष- पोषण करना इसकी विशेषतायें बन चुकी हैं । ‘आई डोन्ट केयर’ की संस्कृति फलने-फूलने लगी है। शारीरिक वर्जनायें खत्म होती जा रही हैं । गली- मुहल्लों में तेजी से बढ़ता सौन्दर्य का बाजार, ब्यूटी-क्वीन प्रतियोगिताओं की भरमार, कुछ ही समय में सब कुछ पा लाने की महत्वाकांक्षा, विज्ञापन के नाम पर नारी माॅंडलों के शरीर का प्रदर्शन, फिल्मों और धारावाहिकों में रिश्तों के तेजी से टूटने का प्रचलन एवम् कम होते कपड़े किस आाधुनिकता व स्वतंत्रता के परिचायक हैं? क्या भारतीय संस्कृति अपनी मूल आस्थाओं को छोड़कर उस पाश्चात्य संस्कृति की तरफ उन्मुख हो रही है, जहाँ बात-बात में नारी स्वतन्त्रता के नाम पर छाती उधाड़ देना फैशन बन गया है?

इस संक्रमण काल के बीच 21वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षो में एक ऐसा वर्ग उभरा जो अपनी मुक्ति शारीरिक वर्जनाओं को तोड़ने में नहीं अपितु खोखली सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों को तोड़ने में देखता है। इनकी शक्लो-सूरत ओर हैसियत पर मत जाईये। ये न तो फेमिनिस्ट के रूप में नारी आन्दोलनों से जुड़ी हैं और न पश्चिमी देशों की उन नारियों की तरह है जो स्वतंत्रता के नाम पर अपनी छाती उघाड़कर प्रदर्शन करती हैं। न ही इनके साथ किसी बड़े घराने या काॅरपोरेट जगत या राजनैतिक दल का नाम जुड़ा हुआ है और न ही ये कोई बड़े-बड़े दावे करती हैं। ये वो महिलायें हैं जो हमारे पास-पड़ोस की और हमारे बीच की हैं, जिनसे हम न जाने कितने बार रूबरू हुए होंगे पर हमंे उनकी खासियत का पता ही नहीं। एक लम्बे समय से धर्मशास्त्रों और रूढ़ियों के नाम पर इन्हें यही बताया जाता रहा कि फला काम तुम्हारे लिए वर्जित है और यदि तुम ऐसा करने का प्रयास करोगी तो तुम्हारे ऊपर अपशकुन व ईश्वरीय प्रकोप का खतरा मंडरायेगा। पर ये औरों से अलग हैं क्योंकि वर्जनाओं को तोड़कर एक अलग लीक बनाना ही इनकी खासियत है। पाश्चात्य सभ्यता के समर्थक कुछ लोगों को नारी स्वतंत्रता का रास्ता दैहिक वर्जनाओं को तोड़ने और उन्मुुक्तता में दिखा। नतीजन, गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन, माॅडल बनने की होड,़ फिल्मों में काम पाने हेतु सर्वस्व न्यौछावर कर देने वालों की बढती भीड़ .... पर समाज का यह वर्ग ऐसा है जो अभी भी सिर से पांव तक पूरे कपड़े पहने अपनी बौद्धिकता और जीवटता के दम पर समाज की रूढ़िगत वर्जनाओं को तोड़ने का साहस रखता है।
कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस की लड़कियों ने तमाम रूढ़िगत वर्जनाओं और परम्पराओं को बहुत पीछे धकेल कर कुछ नये मानदण्ड स्थापित किये हैं। कर्मकाण्ड का सबसे प्रमुख तत्व पुरोहिती है और पांडित्य में बनारस का कोई सानी नहीं। प्राचीन काल से ही यहाँ के पंडितों ने दुनिया भर में अपनी धाक जमाई है। प्राचीनकाल में जहाँ लोमशा एवं लोपामुद्रा आदि नारियों ने ऋग्वेद के अनेक सूक्तों की रचना करके और मैत्रेयी, गार्गी, शाश्वती, घोषा, अदिति इत्यादि विदुषियों ने अपने ज्ञान से तब के तत्वज्ञानी पुरूषों को कायल बना रखा था, उसी परम्परा मंे अब पुरूष पुरोहितों की परम्परा को बनारस की लड़कियों ने तोड़ दिया है। तुलसीपुर स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा उतीर्ण कई लड़कियाँ अब लोगों के विवाह करवा रही हैं और यह जरूरी नहीं कि वे ब्राह्मण ही हों। महाविद्यालय की आचार्या नंदिता शास्त्री बड़े गर्व से बताती हैं कि विवाह कराने के लिये उनकी छात्राओं को बनारस ही नहीं वरन् दूर-दूर से लोग आमंत्रित कर रहे हैं। हैदराबाद में बसी यहाँ की पूर्व छात्रा मैत्रेयी को वैदिक रीति से विवाह कराने के लिए अमेरिका तक से आमंत्रण आ चुके हैं। जब इन छात्राओं ने आरम्भ में यह कार्य आरम्भ किया तो इनका विरोध करने के लिए परम्परागत पंडितांे ने वर व कन्या पक्ष को शास्त्रों से उद्धरण देकर काफी भड़काया पर अब वही पंडित इन लड़कियों का लोहा मानने लगे हैं। कारण- मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, उसकी सम्यक व्याख्या और वैवाहिक संस्कार की सभी रस्मों का पालन करवाने में लड़कियाँ परम्परागत पंडितों से कहीं आगे हैं। आम तौर पर कम पढ़े-लिखे पंडित विवाहों में शुद्ध मंत्र का उच्चारण तक नहीं कर पाते। अब ये छात्रायंे विवाह ही नहीं शांति यज्ञ, गृह प्रवेश, मंुडन, नामकरण और यज्ञोपवीत भी करा रही हंै। ऐसा नहीं है कि यह क्रांतिकारी बदलाव सिर्फ बनारस तक ही सीमित है वरन् देश के अन्य भागों में भी इस बदलाव को महसूस किया जाने लगा है। औद्योगिक महानगर कानपुर में कानपुर विद्या मंदिर डिग्री काॅलेज की प्राचार्या डाॅ0 आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करती हैं। उन्होंने जब छात्राओं को सार्वजनिक रूप से वेद पाठ आरम्भ कराया तो व्यापक विरोध भी झेलना पड़ा। यहाँ तक कि एक शंकराचार्य ने इसे वेद विरूद्ध तक घोषित कर दिया। पर आशारानी ने हार नहीं मानी और नतीजन आज उनकी तमाम छात्रायें कर्मकाण्ड कराने लगी हैं। हरिद्वार में कनखल स्थिति माँ योग शक्ति धाम की अधिष्ठाता माँ योग शक्ति ने अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल की साध्वी माँ ज्योतिषानन्दन को जगद्गुरू शंकराचार्य के समकक्ष पार्वत्याचार्य की उपाधि से अलंकृत किया तो गुस्साये साधु सन्तों ने किसी महिला को यह उपाधि देने के विरोध में जमकर हंगामा किया।

सिर्फ घरेलू कर्मकाण्डों तक ही क्यों, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने का साहस भी इन लड़कियों ने किया है, जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई। इस दिशा में सुनीति गाडगिल ने अलख जगाई जिन्होंने विवाह, पूजा, यज्ञ आदि करवाने में ही भूमिका नहीं निभाई वरन् श्राद्ध कर्म भी करवाकर मिसाल कायम की। बनारस के ही पाण्डेयपुर क्षेत्र की निवासी तनू उर्फ वन्दना जायसवाल, मंडुवाडीह की लक्ष्मीणा देवी, नगर निगम के सफाईकर्मी रहे गोलगड्ढा निवासी मुन्ना की विधवा बीदा देवी और भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डाॅ0 अलका मुखर्जी ने परिवार में किसी अन्य पुरूष सदस्य के न रहने पर अपनी माँ, पिता और पति का अंतिम संस्कार धार्मिक क्रियाओं के बीच विधिवत सम्पन्न किया। वन्दना जायसवाल ने घंट इत्यादि बाँधकर नित्य घाट पर अपनी माँ का तर्पण भी किया। अब तो इस सामाजिक बदलाव की बयार का असर देश के अन्य भागों में भी दिखाई पड़ने लगा। तभी तो कानपुर की डाॅ0 आशारानी राय महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार सम्पन्न कराने से नहीं हिचकतीं। अपने पिता और श्वसुर का अंतिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने ही सम्पन्न किया। यही नहीं कुछेक समय पहले तक प्रयाग के रसूलाबाद घाट पर महाराजिन बुआ नामक महिला श्मशानघाट में वैदिक रीति से अंतिम संस्कार सम्पन्न कराती थीं। राजस्थान के भीलवाड़ा में एक 72 वर्षीया विधवा की मृत्यु पर उसकी सात बेटियों ने मिलकर अर्थी को कंधा दिया तथा अंतिम संस्कार के लिये चिता को मुखाग्नि दी और पिण्डदान किया। परिवार में बेटों के न होने पर लोगों ने बड़े दामाद से मुखाग्नि दिलवाने का प्रयास किया पर सातों बेटियों ने कहा कि- ‘‘उनकी माँ ने बेटा न पैदा होने पर बेटियों को ही बेटों की तरह पाला तथा किसी भी तरह की कमी नहीं होने दी।’’ हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमी देवी ने तो अपने पति की अर्थी को बेटों को कन्धा तक नहीं लगाने दिया और अर्थी को कंधा देने की जिद करने पर उन्हें धक्के मारकर घर से निकाल दिया। उसने कहा कि मेरे पति के जिन्दा होने पर इन बेटों ने कभी हमारी सेवा नहीं की और न ही रोजमर्रा के खर्च के लिये कोई इन्तजाम किया और ऐसे में पति का निर्देश था कि- ‘‘इन अवारा कलयुगी बेटों को मेरी अर्थी में कंधा न लगाने दिया जाये।’’ अंततः अर्थी को दोनों बहुओं व पड़ोस की दो अन्य औरतों ने कंधा दिया और मुखाग्नि उसके चार पोतों ने दी। इसी प्रकार गोरखपुर स्थित सहजनवां के दीनदयाल उपाध्याय महिला विद्यालय में स्नातक की विकलांग छात्रा बुधवन्त सिंह ने अपने पिता की अर्थी को अपने हाथों से सजाया और कंधा देने वालों के अभाव में ठेले पर रखकर श्मशान घाट ले जाकर विधिवत मुखाग्नि देकर अपना कर्तव्य निभाया। बाँदा में निर्मला गर्ग नामक महिला ने पुत्र के होते हुए भी अपने पति की चिता को आग दी तो शाँहजहापुर में पेशे से इंजीनियर शिप्रा नामक लड़की ने सगाई के अगले ही दिन दिवंगत हुए अपने पिता की अर्थी को न केवल मेंहदी रचे हाथों से कांधों पर धरा बल्कि उन्हें मुखाग्नि देकर रूढ़ियों को भी ललकारा। धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो अंतिम संस्कार कोई भी सम्पन्न करा सकता है किन्तु अदृश्य की उत्पत्ति का अधिकार शास्त्रों में पुत्र और पौत्र के अलावा राजा व ब्राह्मण को ही होता है। भले ही धर्म के पुरोधा मानंे कि शवदाह के बाद का काम ब्राह्मण ही करेगा वरना आत्मा भटकेगी और अगले जन्म में शरीर का अंग-प्रत्यंग भी ठीक-ठाक नहीं होगा पर इन महिलाओं की मानें तो यह पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच है जो सारे पुण्य अकेले ही लूटना चाहता है। हिमाचल प्रदेश की घटना समाज के सामने यह भी सवाल खड़ा करती है कि अपने माँ-बाप की देखरेख न करने वाले बेटों को धार्मिक मान्यताओं के नाम पर माँ-बाप की अर्थी में कंधा देने का क्या नैतिक अधिकार है? निश्चिततः उस निरक्षर दलित महिला ने इसी बहाने माँ-बाप के प्रति संतानों को दायित्व बोध का पाठ भी पढ़ाया।

याद कीजिये ‘बीबी हो तो ऐसी’ फिल्म में नायिका रेखा का घोड़ी पर सवार होकर दूल्हे के द्वार बारात ले जाना। इस फिल्मी कथानक को भी लड़कियों ने हकीकत में बदल दिया। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई यानी भोलेनाथ की नगरी में गंगा एक बार फिर उल्टी बही। इस सब के पीछे कश्यप फिल्म एण्ड टेलीविजन रिसर्च इन्स्टीट्यूट के निदेशक डा0 डी0एल0कश्यप की प्रमुख भूमिका रही, जिन्होंने अपने तीन बेटों और दो बेटियों के हाथ बनारस के घमहापुर गाँव में एक साथ एक ही मण्डप में पीले किये। अभी तक दहेजलोलुप दूल्हों को लड़कियों द्वारा विवाह मण्डप से बाहर निकालने या शराबी दूल्हे के साथ विवाह करने से इन्कार करने जैसे उदाहरण ही सामने आये हैं पर परम्पराओं को दरकिनार करते हुए डा0 कश्यप के तीनों बेटों से विवाह करने उनकी दुल्हनें घोड़ी पर सवार होकर मय बारात उनके दरवाजे आयीं जहाँ दूल्हे के पिता ने बहुओं की आगवानी की तथा उन्हें घोड़ी से उतारकर उनका पाँव पूजा। जबकि परम्परा है कि लड़की का पिता दूल्हे का पाँव पूजता है। प्रतीकात्मक द्वारपूजा के बाद दुल्हनों को मंच पर महाराजा कुर्सी पर बिठाया गया और फिर दूल्हे राजा मंच पर आये। लड़की वालों की ओर से निभाये जाने वाले सभी रस्मोरिवाज लड़कों के पिता ने पूरे किये। इस विवाह में न तो कोई मंत्र पढ़ा गया और न ही सात फेरों के साथ कसमें खायी गयीं, अपितु सिर्फ जयमाल व सिन्दूरदान हुआ। इसी प्रकार जयपुर में कानून की छात्रा रही दो जुड़वा बहनें अपनी शादी के अवसर पर निकाली जानेवाली ‘बिन्दौरी’ में घोड़ी पर सवार होकर निकलीं। उनका मानना था कि- ‘‘यह क्रांतिकारी कदम दर्शाता है कि हमारे समाज में लड़के-लड़कियों में कोई भेद-भाव नहीं है।’’ उ0प्र0 के जौनपुर में जब शादी पश्चात एक लम्बे समय तक पति अपनी विवाहिता को लेने नहीं पहुँचे तो कुछेक लड़कियाँ खुद ही बारात (गौना) लेकर पतियों के दरवाजे पहुँच गयीं। यही नहीं आधी आबादी की प्रतीक नारियों ने अब अनचाहे दूल्हों को दरवाजे से लौटाना भी आरम्भ कर दिया है। गाय की बछिया समझकर किसी के भी हाथ में पगहा पकड़ा देने वाले माता-पिता की पगड़ी की लाज की खातिर, सामाजिक संस्कारों के बोझ तले दबकर अपना भविष्य बर्बाद करने की बजाय तमाम लड़कियों ने दहेज लोभी, शराबी, उम्रदराज इत्यादि जैसे दूल्हों को निडरता से दरवाजे से लौटाने में संकोच नहीं किया।

सामान्यतः शादी योग्य लड़कियांे के लिये लड़के ढूँढ़ने का काम पुरूष वर्ग का माना जाता रहा है पर लखनऊ के अमीनाबाद में रहने वाली नीलम पाण्डे 1996 से इस कार्य को सहजता के साथ कर रही हैं और अब तक उन्होंने सैकड़ों शादियाँ करवाई हैं। नीलम बेबाक रूप में स्वीकारती हैं कि- ‘‘वर्तमान परिवेश में शादी को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि दस काबिल लड़कियों पर मुश्किल से एक लड़का ढूँढ़ने पर मिलता है।’’ शायद यही कारण है कि तमाम लड़कियों ने अब अयोग्य वरों को शादी के मण्डप से बाहर निकालना आरम्भ कर दिया है। दुल्हन के वेश में सजी-धजी बैठी ये लड़कियाँ किसी ऐसे व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में नहीं चाहती, जो उनको व उनके परिवार को प्रतिष्ठाजनक स्थान न दे सके या दहेज की आड़ में धनलोलुपता का शिकार हो। अब तो कुछ ऐसे भी मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ लड़की ने कलयुग में स्वयंवर रचा कर वर चुनने की आजादी ली हो। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गाँव में 8 जुलाई 2008 को एक लड़की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर द्वारा अपना पति चुना। 8वीं पास 22 वर्षीया अन्नपूर्णा द्वारा स्वयंवर रचा कर वर चुनने की योजना का शुरू में समाज में काफी विरोध हुआ लेकिन समाज की परवाह किए बिना वह अपने रास्ते चलती रही। आखिरकार समाज भी साथ हो गया। स्वयंवर के प्रचार के लिए बाकायदा इलाके में पोस्टर लगाए गए और पास-पड़ोस के गाँवों में डुग्गी और लाउडस्पीकर के जरिए भी लोगों को इसकी जानकारी दी गई थी। स्वयंवर में शामिल होने वाले युवाओं की अधिकतम उम्र 26 साल तय की गई थी। अन्नपूर्णा से विवाह के इच्छुक लोगों को उसके पाँच धार्मिक सवालों का जवाब देना था। हल्बा आदिवासी समुदाय के युवकों को ही इसमें शामिल होने की अनुमति थी। स्वयंवर में केवल तीन युवक ही शामिल हुए। इनमें मात्र 12वीं पास और पेशे से किसान घनाराम नामक व्यक्ति ने स्वयंवर में पूछे सभी पाँच सवालों के सही जवाब दिये और अन्नपूर्णा ने इस व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में चुना।

वक्त के साथ पुरानी परम्परायें टूटती हैं और नयी परम्परायें स्थापित होती हैं। आंध्रप्रदेश का तिरूपति बालाजी मंदिर पूरे विश्व में विख्यात है और हर दिन यहाँ बेशुमार लोग भगवान बालाजी कोे अपने केश अर्पित करने आते हैं। इनमें अच्छी खासी तादाद महिलाओं की होती है और एक लम्बे समय से मंदिर में महिला मुण्डनकर्मियों को बिठाने की माँग उठती रही है। 31 मार्च 2005 को एक लम्बे संघर्ष बाद नाईनों को यहाँ नियुक्त करने का फैसला किया गया। इसके बाद तो इस निर्णय को भी धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर देखा जाने लगा और तर्क दिया गया कि- ‘‘प्रतीकात्मक रूप से स्त्रियाँ देवी लक्ष्मी की प्रतिनिधि हैं इसलिए उन्हें मुण्डन कर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कृत्य उनकी दरिद्रता को दर्शाता है।’’ पर नाईनों ने हार नहीं मानी और तर्क दिया कि इस कार्य से उन्हें रोजगार मिलेगा और उनकी दरिद्रता व गरीबी दूर हो सकेगी। यही नहीं कर्म के आधार पर पुरूष नाईयों से अपने को कमतर नहीं आंकने वाली इन महिलाओं ने यह भी कहा कि उनसे बाल उतरवाने वाली महिलायें अपने को ज्यादा सहज महसूस कर सकेंगी। समाज की दरियाकनूसी परम्पराओं के चलते जहाँ अभी भी दलितों के घरों में पूजा-पाठ व धार्मिक अनुष्ठानों हेतु पंडित ढूँढ़े नही मिलते, वहाँ बरेली के भमोरा इलाके की आशा और ज्योति नामक दो बहनें तमाम दलित और मलिन बस्तियों में जाकर अनुष्ठान करती हैं और इस कार्य से मिलने वाले धन को गरीब लड़कियों की शादी, भण्डारा या किसी पीड़ित व्यक्ति की सेवा पर खर्च कर देती हैं।

राजस्थान सदैव से सामंती समाज माना जाता रहा है पर उस सामंती समाज की विधवाओं ने उन अमानवीय सामाजिक रूढ़ियों को दुत्कारने का साहस दिखाया है, जहाँ सती प्रथा जैसी बुराईयों के महिमामण्डन के जरिये विधवाओं से जीने का हक तक छीना जाता रहा है। यह वही राजस्थान है जहाँ 1987 में देवराला सती काण्ड के दौरान सती रूपकँवर के चबूतरे पर चूड़ियाँ और सिन्दूर चढ़ाने की स्त्रियों में होड़ सी मची थी। अब उसी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘एकल नारी शक्ति संगठन’ के नेतृत्व में वैधव्य जीवन जी रही हजारों स्त्रियों ने उन साज-श्रंृगारों का इस्तेमाल करना आरम्भ कर दिया है जो विधवा होते ही समाज उनसे छीन लेता है। हाथों में मंेहदी, कलाईयों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, माथे पर बिंदिया और खूबसूरत परिधानों के साथ ये विधवायें मांगलिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर अपनी सहभागिता दर्ज करा रही हैं।

मुस्लिम समुदाय में जहाँ काजी का काम पुरूष के बूते का ही माना जाता रहा है, एक नारी ने पुरूषों का वर्चस्व तोड़ दिया है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की काजी शबनम आरा बेगम इस देश की पहली महिला काजी हैं। शबनम के काजी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काजी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काजी बना दिया। सन् 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काजी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काजी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काजी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुयीं। अंततः धमकियों और मुकदमों के बीच शबनम अपने को काजी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं। इसी प्रकार लखनऊ में अगस्त 2008 में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की अध्यक्ष नाइश हसन और दिल्ली के इमरान का निकाह एक महिला काजी डाॅ0 सईदा हमीद ने पढ़ाया। गौरतलब है कि डाॅ0 सईदा हमीद योजना आयोग की सदस्य भी हैं।

21वीं सदी में जब महिलायें, पुरूषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, ऐसे में सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों की आड़ में उन्हें गौण स्थान देना जागरूक महिलाओं के गले नीचे नहीं उतर रहा है। यही कारण है कि ऐसी रूढ़िगत मान्यताओं और परम्पराओं के विरूद्ध उन्हीं क्षेत्रों से सामाजिक बदलाव की बयार चली है, जिन्हें इन रूढ़िगत कर्मकाण्डों का गढ़ माना जाता रहा है। इस सामाजिक बदलाव का कारण जहाँ महिलाओं में आई जागरूकता है, जिसके चलते महिलायें अपने को दोयम नहीं मानतीं और कैरियर के साथ-साथ सामाजिक परम्पराओं के क्षेत्र में भी बराबरी का हक चाहती हैं। वर्षों से रस्मो-रिवाज के दरवाजों के पीछे शर्मायी -सकुचायी सी खड़ी महिलाओं की छवि अब सजग और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व में तब्दील हो चुकी है। आधुनिक महिलायें इस तर्क को बेबाकी से खारिज करतीं हैं कि पुण्य कमाने के क्षेत्र में ईश्वर ने पुरूषों को ज्यादा अधिकार दिये हैं। ऐसे तर्कों को वे पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच मात्र मानती है। उनके लिये सवाल अब परम्पराओं का ही नहीं वरन् उनके कसौटी पर खरे उतरने का भी है। मात्र किसी धार्मिक गं्रथ के उद्धरणों के आधार पर नारी शक्ति को दबाया नहीं जा सकता। अब ये महिलायें पूछने लगी हैं कि पुण्य के कामों के समय हाथ पर बाँधा जाने वाला कलावा लड़कों के दायें और लड़कियों के बायें हाथ पर क्यों बाँधा जाता है, क्यों नहीं दोनों के एक ही हाथ पर बाँध दिया जाता है? यदि पूजा-पाठ या पुण्य के कार्य कराने के लिए जनेऊ धारण करना शास्त्रों में जरूरी माना गया है तो पुरोहित का कार्य करने वाली महिला जनेऊ क्यों नहीं धारण कर सकती? योग्यता चाहे वह पुरूष की हो अथवा महिला की- बराबर ही कही जायेगी। जहाँ प्रकृति पुरूष-स्त्री को बिना किसी भेदभाव के बराबर धूप-छांव बाँटती हो, वहाँ धर्म या परम्परा की आड़ में अतार्किक आधार पर स्त्रियों को तमाम सुविधाओं से वंचित करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोई महिला यदि किसी क्षेत्र में जाना चाहती है तो मात्र इसलिए कि वह एक महिला है, उसको उस क्षेत्र में जाने से नहीं रोका जा सकता। आखिर अपनी पसन्द का क्षेत्र चुनने का सभी को अधिकार है। यह निर्णय करने का समय आ चुका है कि अज्ञानी एवं अल्पज्ञानी पुरूषों के भरोसे धर्म की सनातन परम्परा और उसके आचार-विचार सुरक्षित रहेंगे या शिक्षित-प्रशिक्षित नारियों के हाथ में उसकी पताका महफूज रहेगी? प्रख्यात ज्योतिषी के0ए0दुबे पद्मेश जैसे विद्वान भी इन छात्राओं के कदम से उत्साहित दिखते हैं और इससे प्रेरित होकर अपना उत्तराधिकारी किसी नारी को ही बनाना चाहते हैं। फर्क मात्र इतना है कि आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत सामाजिक मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठायी थी पर 21वीं सदी के इस दौर में महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं।
कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 3 मार्च 2009

२९ वर्ष की आयु में ही ग्राहम बेल ने किया टेलीफोन का अविष्कार

दुनिया में हर खोज के पीछे युवाओं की महती भूमिका रही है। नौजवानी का जज्बा लोगों की कल्पनाशीलता में जहाँ रंग भरता है, वहीँ कुछ कर दिखने का हौसला भी देता है। संचार क्रांति के इस दौर में टेलीफोन अपरिहार्य बन चुका है। जिसे देखो वही फ़ोन से चिपका हुआ है। पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि दुनिया में संचार क्रांति लाने वाले इस क्रन्तिकारी टेलीफोन के आविष्कारक महान वैज्ञानिक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने सिर्फ 29 साल की ही उम्र में ही 1876 में टेलीफोन की खोज कर ली थी। इसके एक साल बाद ही 1877 में उन्होंने बेल टेलीफोन कंपनी की स्थापना की। इसके बाद वह लगातार विभिन्न प्रकार की खोजों में लगे रहे। बेल टेलीफोन की खोज के बाद उसमें सुधार के लिए प्रयासरत रहे और 1915 में पहली बार टेलीफोन के जरिए हजारों किलोमीटर की दूरी से बात की। न्यूयार्क टाइम्स ने इस घटना को काफी प्रमुखता देते हुए इसका ब्यौरा प्रकाशित किया था। इसमें न्यूयार्क में बैठे बेल ने सैनफ्रांसिस्को में बैठे अपने सहयोगी वाटसन से बातचीत की थी। तीन मार्च 1847 को स्काटलैंड में पैदा हुए ग्राहम बेल शुरू से ही जिज्ञासु प्रवृति के थे और अपने विभिन्न प्रकार के विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए लगे रहते थे। इसके अलावा उनकी विभिन्न खोजों पर उनके निजी अनुभवों का भी प्रभाव था। उदाहरण के तौर पर जब उनके नवजात पुत्र की सांस की समस्याओं के कारण मौत हो गई तो उन्होंने एक मेटल वैक्यूम जैकेट तैयार किया जिससे सांस लेने में आसानी होती थी। उनका यह उपकरण 1950 तक काफी लोकप्रिय रहा और बाद के दिनों में इसमें और सुधार किया गया। अपने आसपास कई लोगों को बोलने एवं सुनने में कठिनाई होते देख उन्होंने इस दिशा में भी अपना ध्यान दिया और सुनने की समस्या के आकलन के लिए आडियोमीटर की खोज की। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के अलावा वैकल्पिक ऊर्जा और समुद्र के पानी से नमक हटाने की दिशा में भी काम किया।ग्राहम बेल की कई क्षेत्रों में एक साथ दिलचस्पी थी और वह काफी देर तक अध्ययनशील रहते थे। वह देर तक इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका पढ़ते थे। आज ग्राहम बेल के नाम 18 पेटेंट दर्ज हैं। इसके अलावा 12 पेटेंट उनके सहयोगियों के साथ दर्ज हैं। इन पेटेंटों में टेलीफोन, फोटोफोन, फोनोग्राफ और टेलीग्राफ शामिल हैं। उन्होंने आइसबर्ग का पता लगाने वाला एक उपकरण भी बनाया था, जिससे समुद्री यात्रा करने वाले नाविकों खासकर अत्यधिक ठंडे प्रदेशों में को विशेष मदद मिली। यही नहीं ग्राहम बेल ने चिकित्सा के क्षेत्र में भी काफी काम किया। सांस लेने के लिए उपयोगी उपकरण के साथ ही मूक बधिर लोगों की समस्या दूर करने के लिए काम किया। उन्होंने वैमानिकी के क्षेत्र में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है। मेटल डिटेक्टर जो आज आतंकवाद सहित अन्य प्रकार के अपराधों से लड़ने में कारगर उपकरण साबित हो रहा है, का अविष्कार भी ग्राहम बेल की ही देन है।ग्राहम बेल को अपने जीवन में कई पुरस्कार और सम्मान मिले। इन पुरस्कारों में से एक था फ्रांस का वोल्टा सम्मान जो उन्हें टेलीफोन की खोज के लिए दिया गया था। इस पुरस्कार की स्थापना नेपोलियन बोनापार्ट ने भौतिकीविद अलेस्रांद्रो वोल्टा के सम्मान में की थी। वोल्टा ने बैट्री को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी। बेल ने इस पुरस्कार में मिली विशाल राशि का उपयोग वोल्टा फंड, वोल्टा लैबोरेट्रीज और वोल्टा ब्यूरो सहित अन्य संस्थाओं की स्थापना में की ताकि नई खोज के कार्य को गति मिल सके। इस महान वैज्ञानिक का निधन दो अगस्त 1922 को हो गया, पर अपनी महान खोजों से जनमानस में वे सदैव जिन्दा रहेंगें। आज उनकी जयंती पर हम उनका पुण्य-स्मरण करते हैं और उनके युवा जज्बे को सलाम करते हैं !!

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

वैलेंटाइन डे की बधाई !!

प्रकृति ने हमें केवल प्रेम के लिए यहाँ भेजा है. इसे किसी दायरे में नहीं बाधा जा सकता है. बस इसे सही तरीके से परिभाषित करने की आवश्यकता है. हम २४ घंटे केवल प्रेम करना चाहते हैं, ज्यादा से ज्यादा सोना, अच्छा खाना, सुन्दरता को देखना और उसे अपना बनाना, दोस्तों के साथ रहना, परिवार का लुफ्त उठाना, खेलना और अच्छा पहनना और बहुत कुछ ...... लेकिन हम केवल दिन के कुछ सीमित हिस्से को ही प्रेम क्यों समझते हैं? जब हम हर समय प्रेम ही करना चाहते हैं तो फिर प्रकृति को क्यों नाराज करना !!
इसलिए यहाँ कायम रहने लिए हमें केवल प्रेम करना प्रेम करना प्रेम करना और प्रेम करना होगा !
***वैलेंटाइन डे की आप सभी को बहुत-बहुत बधाइयाँ***

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ऋतुराज वसंत का आगमन

ऋतुराज वसंत के आगमन के साथ ही सब कुछ बदला-बदला नज़र आता है. फिजा में रोमांस का जुनून छाने लगता है. मात्र मानव ही नहीं पूरी प्रकृति वसंत के आगोश में समा जानी चाहती है. प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिझाने लगता है, कवि की अभिव्यक्ति परवान चढ़ने लगती है, पेडों पर नए पत्ते दिखने लगते हैं,रंग-बिरंगे फूल खिलने लगते हैं, तितलियाँ उन पर मंडराने लगती हैं, हमारी संवेदनाएं ताजगी से भर उठती हैं. वसंत-पंचमी का आगाज़ सरस्वती जी की आराधना से आरम्भ होता है तो निराला जी की जयंती भी अब इस मस्तमौले वसंत के आगाज़ के साथ ही मनाये जानी लगी है. आज के सबसे प्रसिद्द गीतकार गोपाल दास 'नीरज'' जी की जन्म-तिथि भी इसी दौरान पड़ती है. पाश्चात्य देशों से तैरता-तैरता आया वैलेंटाइन डे की खुमारी भी इन दिनों अपने शवाब पर होती है. यूँ ही वसंत को ऋतुराज नहीं कहा गया है. फ़िलहाल यह मेरा सबसे पसंदीदा मौसम है और शायद आपका भी. तो आइये इसे जी भर कर जी लेते हैं. पता नहीं कब यह ख़त्म हो जाय. जिस तरह से पारिस्थितिक असंतुलन पैदा हो रहा है, उसमें सदैव यह भय बना रहता है कि ऋतुराज कितने दिन के मेहमान हैं !!!

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

आओ इश्क की बातें कर ले…….


आओ इश्क की बातें कर ले , आओ खुदा की इबादत कर ले ,
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

लबो पर कोई लफ्ज़ न रह जाए, खामोशी जहाँ खामोश हो जाए ;
सारे तूफ़ान जहाँ थम जाये , जहाँ समंदर आकाश बन जाए......!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

तुम अपनी आंखो में मुझे समां लेना , मैं अपनी साँसों में तुम्हे भर लूँ ,
ऐसी बस्ती में चले चलो , जहाँ हमारे दरमियाँ कोई वजूद न रह जाए !
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

कोई क्या दीवारे बनायेंगा , हमने अपनी दुनिया बसा ली है ,
जहाँ हम और खुदा हो, उसे हमने मोहब्बत का आशियाँ नाम दिया है.!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

मैं दरवेश हूँ तेरी जन्नत का ,रिश्तो की क्या कोई बातें करे.
किसी ने हमारा रिश्ता पूछा ,मैंने दुनिया के रंगों से तेरी मांग भर दी !
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

मोहब्बत और क्या किया जाये किसे से , ये तो मोहब्बत की इन्तेहाँ हो गई
किसी ने मुझसे खुदा का नाम पूछा और मैंने तेरा नाम ले लिया.................!
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!

आओ इश्क की बातें कर ले , आओ खुदा की इबादत कर ले ,
तुम मुझे ले चलो कहीं पर , जहाँ हम खामोशी से बातें कर ले.......!!!


vijay kumar sappatti
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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

अभी से चढ़ने लगा वेलेण्टाइन-डे का खुमार


वसंत का मौसम आ गया है। मौसम में रूमानियत छाने लगी है। हर कोई चाहता है कि अपने प्यार के इजहार के लिए उसे अगले वसंत का इंतजार न करना पड़े। सारी तैयारियां आरम्भ हो गई हैं। प्यार में खलल डालने वाले भी डंडा लेकर तैयार बैठे हैं। भारतीय संस्कृति में ऋतुराज वसंत की अपनी महिमा है। वेदों में भी प्रेम की महिमा गाई गई है। यह अलग बात है कि हम जब तक किसी चीज पर पश्चिमी सभ्यता का ओढ़ावा नहीं ओढ़ा लेते, उसे मानने को तैयार ही नहीं होते। ‘योग‘ की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘योगा‘ होकर आयातित हुआ। ऋतुराज वसंत और इनकी मादकता की महिमा हमने तभी जानी जब वह ‘वेलेण्टाइन‘ के पंखों पर सवार होकर अपनी खुमारी फैलाने लगे।

प्रेम एक बेहद मासूम अभिव्यक्ति है। मशहूर दार्शनिक ख़लील जिब्रान एक जगह लिखते हैं-‘‘जब पहली बार प्रेम ने अपनी जादुई किरणों से मेरी आंखें खोली थीं और अपनी जोशीली अंगुलियों से मेरी रूह को छुआ था, तब दिन सपनों की तरह और रातें विवाह के उत्सव की तरह बीतीं।‘‘ अथर्ववेद में समाहित प्रेम गीत भला किसको न बांध पायेंगे। जो लोग प्रेम को पश्चिमी चश्मे से देखने का प्रयास करते हैं, वे इन प्रेम गीतों को महसूस करें और फिर सोचें कि भारतीय प्रेम और पाश्चात्य प्रेम का फर्क क्या है?

फिलहाल वेलेण्टाइन-डे का खुमार युवाओं पर चढ़कर बोल रहा है। कोई इसी दिन पण्डित से कहकर अपना विवाह-मुहूर्त निकलवा रहा है तो कोई इसे अपने जीवन का यादगार लम्हा बनाने का दूसरा बहाना ढूंढ रहा है। एक तरफ नैतिकता की झंडाबरदार सेनायें वेलेण्टाइन-डे का विरोध करने और इसी बहाने चर्चा में आने का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं-‘ करोगे डेटिंग तो करायेंगे वेडिंग।‘ यही नहीं इस सेना के लोग अपने साथ पण्डितों को लेकर भी चलेंगे, जिनके पास ‘मंगलसूत्र‘ और ‘हल्दी‘ होगी। तो अब वेलेण्टाइन डे के बहाने पण्डित जी की भी बल्ले-बल्ले है। जब सबकी बल्ले-बल्ले हो तो भला बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कैसे पीछे रह सकती हैं। आर्थिक मंदी के इस दौर में ‘प्रेम‘ रूपी बाजार को भुनाने के लिए उन्होंने ‘वेलेण्टाइन-उत्सव‘ को बकायदा 11 दिन तक मनाने की घोषणा कर दी है। हर दिन को अलग-अलग नाम दिया है और उसी अनुरूप लोगों की जेब के अनुरूप गिट भी तय कर लिये हैं। यह उत्सव 5 फरवरी को ‘फ्रैगरेंस डे‘ से आरम्भ होगा तो 15 फरवरी को ‘फारगिव थैंक्स फारेवर योर्स डे‘ के रूप में खत्म होगा। यह भी अजूबा ही लगता है कि शाश्वत प्रेम को हमने दिनों की चहरदीवारी में कैद कर दिया है। खैर इस वर्ष ज्वैलरी पसंद लड़कियों के लिये बुरी खबर है कि मंहगाई के इस दौर में पिछले वर्ष का 12 फरवरी का ‘ज्वैलरी डे‘ और 13 फरवरी का ‘लविंग हार्टस डे‘ इस बार हटा दिया गया है। वेलेण्टाइन-डे के बहाने वसंत की मदमदाती फिजा में अभी से ‘फगुआ‘ खेलने की तैयारियां आरम्भ हो चुकी हैं।

5 फरवरी - फ्रैगरेंस डे
6 फरवरी - टैडीबियर डे
7 फरवरी - प्रपोज एण्ड स्माइल डे
8 फरवरी - रोज स्माइल प्रपोज डे
9 फरवरी - वेदर चॉकलेट डे
10 फरवरी - चॉकलेट मेक ए फ्रेंड टैडी डे
11 फरवरी - स्लैप कार्ड प्रामिस डे
12 फरवरी - हग चॉकलेट किस डे
13 फरवरी - किस स्वीट हर्ट हग डे
14 फरवरी - वैलेण्टाइन डे
15 फरवरी - फारगिव थैंक्स फारेवर योर्स डे

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

रात भर यूं ही.........


कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

चाहता हूँ कि तुम प्यार ही जताते रहो,
अपनी आंखो से तुम मुझे पुकारते रहो,
कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

चुपके से हवा ने कुछ कहा शायाद ..
या तुम्हारे आँचल ने कि कुछ आवाज़..
पता नही पर तुम गीत सुनाते रहो...
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये क्या हुआ , यादों ने दी कुछ हवा ,
कि आलाव के शोले भड़कने लगे ,
पता नही , पर तुम दिल को सुलगाते रहो
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये कैसी सनसनाहट है मेरे आसपास ,
या तुमने छेडा है मेरी जुल्फों को ,
पता नही पर तुम भभकते रहो..
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

किसने की ये सरगोशी मेरे कानो में ,
या थी ये सरसराहट इन सूखे हुए पत्तों की,
पता नही ,पर तुम गुनगुनाते रहो ;
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये कैसी चमक उभरी मेरे आसपास ,
या तुमने ली है ,एक खामोश अंगढाईं
पता नही पर तुम मुस्कराते रहो;
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

रविवार, 1 फ़रवरी 2009

युवा शक्ति को नमन की जरुरत: BHU में चरण छूने पर प्रतिबन्ध

बनारस अपनी वैदिक परम्पराओं, पांडित्य एवं कर्मकाण्डों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यही कारण है कि महात्मा बुद्ध ने भी वैदिक कर्मकांडो के विरूद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तन से पहले बनारस में अवस्थित सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया। बनारस में स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शिष्यों द्वारा गुरू के चरण छूने की लम्बी परंपरा है। वैसे भी पूर्वांचल में नया अनाज पैदा होने पर जब उसका नेवान किया जाता है तो लोग मुहल्ले भर में घूम कर बड़ों का चरण छूते हैं। इसी प्रकार कभी दान देते समय दाता दान स्वीकार करने वाले का चरण छूता था। इसके पीछे मकसद था कि लेने वाले के मन में याचक का भाव न जगे। पहली नजर में यह अटपटा भी नहीं लगता, पर बदलते दौर में किसी के प्रति आदर प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं। चरण छूना आदर का सूचक हो सकता है लेकिन यह दूसरों के अहं को ठेस भी पहुंचाता है। समाजशास्त्रियों की नजर में आज चरण छूना कई मायनों में अच्छा नहीं है क्योंकि चरण छूने की प्रथा छद्म व्यवहार का परिचायक हो रही है। इसके पीछे कुछ लोग दूसरों को भी भ्रम में रखने की कोशिश करते हैं। इसी के मद्देनजर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने चरण छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके लिए बकायदा विभाग में नोटिस तक जारी की गई है।

वस्तुतः इस सोच के पीछे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. एम0के0 चतुर्वेदी एक संस्मरण भी बताते हैं। प्रयाग में कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर आए थे। सब उनका चरण छू रहे थे। एक दृढ़ व्यक्तित्व का धनी सुदर्शन युवक आया। उसने नमस्ते किया और भीतर चला गया। इस घटना ने विश्वकवि को झकझोर कर रख दिया था। वह बहुत देर तक संयत नहीं हो पाए। युवक भी कोई नहीं बल्कि हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। प्रो. एम0के0 चतुर्वेदी जे0पी0 आंदोलन के दौरान अज्ञेय से मिलने दिल्ली गए। जैसे ही वह आए, उनके साथ गए लोग अज्ञेय के चरण की ओर लपके। पर अज्ञेय ने कहा कि- ‘‘नहीं! चरण छूने की जरूरत नहीं। युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ।‘‘ यह बात प्रो0 एम0के0 चतुर्वेदी के मन को अन्दर तक छू गई। अब उन्होंने इससे प्रेरणा लेते हुए अपने समाजशास्त्र विभाग में चरण छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। उनका तर्क है कि दिल की भाषा को दिल समझ लेता है। आदरणीय को अपने मन के भाव को समझाने के लिए चरण छूना जरूरी नहीं है।