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शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

ब्लोगिंग से युवाओं को जोडें......


ब्लोगिंग आज बहुत ही लोकप्रिय होती जा रही है.!इतने अच्छे अच्छे ब्लॉग रोज़ आ रहे है...!लगभग हर विषय पर ब्लॉग लिखे जा रहे है!यहाँ तक की बड़ी बड़ी सेलिब्रिटीज़ भी ब्लॉग का सहारा ले रही है !हर कोई ब्लॉग के जरिये अपने विचार सब के सामने रख रहा है!अकेले चिठा जगत पर ही रोजाना लगभग २५ ब्लॉग रोज़ .रजिस्टर हो रहे है!मुझे इन्टरनेट यूज़ करते आज ५ साल हो गए लेकिन असली संतुष्टि ब्लोगिंग से ही मिली !इसके ज़रिये कितने ही .लोगों से परिचय हुआ है और नई नई जानकारियां भी हुई है!लेकिन मैंने नोट किया है की आज भी अधिकाँश युवा इन्टरनेट पर चाटिंग या फ़िर सोशल नेट्वर्किंग में ही उलझे है !शायद इसका कारण .ब्लोगिंग के बारे में अनभिज्ञता ही है !जो लोग काफ़ी समय से ब्लॉग लिख रहे है,उन्हें चाहिए की इस बारे में वे कुछ प्रयास करे !युवा ही देश का भविष्य है ..यदि वे अपने विचार सबके सामने रखेंगे तो निश्चित तौर पर ब्लोगिंग के लिए एक शुभ संकेत होगा !तो आइये हम सब मिल कर ये कोशिश करें की अधिक से अधिक लोग विशेषत:...युवा इससे जुड़े...!जानकर लोगों को चाहिए की ऐसा कोई मंच प्रस्तुत करें जहाँ इस सम्बन्ध में ज्यादा जानकारी मिल सके....

रविवार, 23 अगस्त 2009

|| ॐ गं गणपतये नमो नमः ||



|| ॐ गं गणपतये नमो नमः |||| श्री सिद्धिविनायक नमो नमः ||
|| अष्टविनायक नमो नमः |||| वक्रतुंडाय नमो नमः ||

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

चिंतन से पहले चिंता में बी जे पी



जी हाँ ,आख़िर बी जे पी में वह तूफ़ान आ ही गया जो लोकसभा चुनावों ऐ हार के बाद आना था!लेकिन उस समय पार्टी सदमे में थी सो सभी नेता अपना अपना चेहरा छुपाने में जुट गए!किसी ने हार के कारणों पर मनन या चिंतन करना उचित नहीं समझा!सब एक दूसरे पर दोषारोपण में व्यस्त हो गए!और देखिये एक बड़ी राष्ट्रीय ..पार्टी की क्या हालत हो गई!लेकिन बड़े नेताओं ने फ़िर भी कोई सबक नहीं लिया!सबसे पहले तो आडवानी जी जिन्हें पूरी तरह से नकार दिया गया,इस्तीफा देते!फ़िर नई टीम बने जाती जो युवा हो ,उर्जावान हो और सबसे बड़ी बात जिन पर जनता भरोसा कर सके!क्योंकि पुराने नेता तो अपना भरोसा खो ही चुकें है!जनता ने पार्टी को नहीं इसके आपस में लड़ते नेताओं को नकारा है,जो देश को ..स्थिर सरकार का विशवास नहीं दिला पाए...!ये नेताओं की असफलता थी,नेताओं की नहीं...!लेकिन देखिये हुआ क्या.......!जिन्ना मुद्दे पर .आडवानी जी इस्तीफा नहीं देते,लेकिन जसवंत सिंह से इस्तीफा माँगा जाता है..!हार पर आडवानी जी इस्तीफा नहीं देते ,लेकिन वसुंधरा से इस्तीफा माँगा जाता है..!कांग्रेस पर आरोप लगाने वाली पार्टी ख़ुद इतनी कमजोर हो गई की क्या कहें..!देश को कुशल .सरकार देने का .वादा करने वाली पार्टी ख़ुद कुशल सेनापति नहीं दे पाई...!सारे के सारे नेता जनता के प्रति अपने कर्तव्य को भूल आपस में लड़ते रहे!और अब जब चिंतन का समय आया तो चिंता में डूब गए....!जिन लोगों ने बी जे पी को वोट दिया वो उससे क्या अपेक्षा करे?हार जीत चलती रहती है लेकिन पार्टी ख़तम होने के कगार पर पहुँच जाए,ये चिंतनीय बात है!क्या बी जे पी का अंत निकट है ?क्या पार्टी आपसी कलह से उबार पायेगी?क्या पार्टी पुराने समय को फ़िर दोहरा पाएगी?इन्ही सवालों के जवाब में ही पार्टी का भविष्य टिका है....

शनिवार, 15 अगस्त 2009

नेहरू ने 17 बार लहराया तिरंगा

देश में बीते छह दशक से जारी जश्न-ए-आजादी के सिलसिले में लाल किले की प्राचीर से सबसे ज्यादा 17 बार तिरंगा लहराने का मौका प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को मिला। वहीं उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने भी राष्ट्रीय राजधानी स्थित सत्रहवीं शताब्दी की इस धरोहर पर 16 बार राष्ट्रध्वज फहराया।

नेहरू ने आजादी के बाद सबसे पहले 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर झंडा फहराया और अपना बहुचर्चित संबोधन 'नियति से एक पूर्वनिश्चित भेंट' दिया। नेहरू 27 मई 1964 तक प्रधानमंत्री पद पर रहे। इस अवधि के दौरान उन्होंने लगातार 17 स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण किया। आजाद भारत के इतिहास में गुलजारी लाल नंदा और चंद्रशेखर ऐसे नेता रहे जो प्रधानमंत्री तो बने लेकिन उन्हें स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने का एक भी बार मौका नहीं मिल सका।

नेहरू के निधन के बाद 27 मई 1964 को नंदा प्रधानमंत्री बने लेकिन उस वर्ष 15 अगस्त आने से पहले ही नौ जून 1964 को वह पद से हट गए और उनकी जगह लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। नंदा 11 से 24 जनवरी 1966 के बीच भी प्रधानमंत्री पद पर रहे। इसी तरह चंद्रशेखर 10 नवंबर 1990 को प्रधानमंत्री बने लेकिन 1991 के स्वतंत्रता दिवस से पहले ही उस वर्ष 21 जून को पद से हट गए।

लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद नंदा कुछ दिन प्रधानमंत्री पद पर रहे लेकिन बाद में 24 जनवरी 1966 को नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी ने सत्ता की बागडोर संभाली। नेहरू के बाद सबसे अधिक बार जिस प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा फहराया, वह इंदिरा ही रहीं।

इंदिरा 1966 से लेकर 24 मार्च 1977 तक और फिर 14 जनवरी 1980 से लेकर 31 अक्टूबर 1984 तक प्रधानमंत्री पद पर रहीं। बतौर प्रधानमंत्री अपने पहले कार्यकालमें उन्होंने 11 बार और दूसरे कार्यकाल में पांच बार लाल किले पर झंडा फहराया। स्वतंत्रता दिवस पर सबसे कम बार राष्ट्रध्वज फहराने का मौका चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980, विश्वनाथ प्रताप सिंह दो दिसंबर 1989 से 10 नवंबर 1990, एच डी. देवेगौड़ा, एक जून 1996 से 21 अप्रैल 1997, और इंद्र कुमार गुजराल 21 अप्रैल 1997 से लेकर 28 नवंबर 1997, को मिला। इन सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों ने एक-एक बार 15 अगस्त को लाल किले से राष्ट्रध्वज फहराया।

नौ जून 1964 से लेकर 11 जनवरी 1966 तक प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री और 24 मार्च 1977 से लेकर 28 जुलाई 1979 तक प्रधानमंत्री रहे मोरारजी देसाई को दो-दो बार यह सम्मान हासिल हुआ। स्वतंत्रता दिवस पर पांच या उससे अधिक बार तिरंगा फहराने का मौका नेहरू और इंदिरा गांधी के अलावा राजीव गांधी, पी. वी. नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेई और मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मिला है।

राजीव 31 अक्तूबर 1984 से लेकर एक दिसंबर 1989 तक और नरसिंह राव 21 जून 1991 से 10 मई 1996 तक प्रधानमंत्री रहे। दोनों को पांच-पांच बार ध्वज फहराने का मौका मिला। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर चुके अटल बिहारी वाजपेई जब 19 मार्च 1998 से लेकर 22 मई 2004 के बीच प्रधानमंत्री रहे तो उन्होंने कुल छह बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया। इससे पहले वह एक जून 1996 को भी प्रधानमंत्री बने लेकिन 21 अप्रैल 1997 को ही उन्हें पद से हटना पड़ा था।

वर्ष 2004 के आम चुनाव में राजग की हार के बाद संप्रग सत्ता में आया और मनमोहन ने 22 मई 2004 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। तब से अब तक वह पांच बार स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर राष्ट्रध्वज फहरा चुके हैं। इस बार 63वें स्वतंत्रता दिवस पर वह छठी बार तिरंगा लहराएंगे और राष्ट्र को संबोधित करेंगे।
(साभार: जागरण)
(स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें )

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं कृष्ण (कृष्ण-जन्माष्टमी की बधाई )

विगत पांच हजार वर्षों में श्रीकृष्ण जैसा अद्भुत व्यक्तित्व भारत क्या, विश्व मंच पर नहीं हुआ और न होने की संभावना है। यह सौभाग्य व पुण्य भारत भूमि को ही मिला है कि यहाँ एक से बढकर एक दिव्य पुरूषों ने जन्म लिया। इनमें श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अनूठा, अपूर्व और अनुपमेय है। हजारों वर्ष बीत जाने पर भी भारत वर्ष के कोने-कोने में श्रीकृष्ण का पावन जन्मदिन अपार श्रद्धा, उल्लास व प्रेम से मनाया जाता है। श्रीकृष्ण अतीत के होते हुए भी भविष्य की अमूल्य धरोहर हैं। उनका व्यक्तित्व इतना बहुआयामी है कि उन्हें पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है। मुमकिन है कि भविष्य में उन्हें समझा जा सकेगा। हमारे अध्यात्म के विराट आकाश में श्रीकृष्ण ही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों व ऊंचाइयों पर जाकर भी गंभीर या उदास नहीं हैं। श्रीकृष्ण उस ज्योतिर्मयी लपट का नाम है जिसमें नृत्य है, गीत है, प्रीति है, समर्पण है, हास्य है, रास है, और है जरूरत पड़ने पर युद्ध का महास्वीकार। धर्म व सत्य के रक्षार्थ महायुद्ध का उद्घोष। एक हाथ में वेणु और दूसरे में सुदर्शन चक्र लेकर महाइतिहास रचने वाला दूसरा व्यक्तित्व नहीं हुआ संसार में।

कृष्ण ने कभी कोई निषेध नहीं किया। उन्होंने पूरे जीवन को समग्रता के साथ स्वीकारा है। प्रेम भी किया तो पूरी शिद्दत के साथ, मैत्री की तो सौ प्रतिशत निष्ठा के साथ और युद्ध के मैदान में उतरे तो पूरी स्वीकृति के साथ। हाथ में हथियार न लेकर भी विजयश्री प्राप्त की। भले ही वो साइड में रहे। सारथी की जिम्मेदारी संभाली पर कौन नहीं जानता कि अर्जुन के पल-पल के प्रेरणा स्त्रोत और दिशा निर्देशक कृष्ण थे।

अल्बर्ट श्वाइत्जर ने भारतीय धर्म की आलोचना में एक बात बड़ी मूल्यवान कही। वह यह कि भारत का धर्म जीवन निषेधक है। यह बात एकदम सत्य है, यदि कृष्ण का नाम भुला दिया जाए तो ओशो के शब्दों में कृष्ण अकेले दुख के महासागर में नाचते हुए एक छोटे से द्वीप हैं। यानी कि उदासी, दमन, नकारात्मकता और निंदा के मरूस्थल में नाचते-गाते मरू-उद्यान हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि कृष्ण केवल रास रचैया भर थे। इन लोगों ने रास का अर्थ व मर्म ही नहीं समझा है। कृष्ण का गोपियों के साथ नाचना साधारण नृत्य नहीं है। संपूर्ण ब्राह्मांड में जो विराट नृत्य चल रहा है प्रकृति और पुरूष (परमात्मा) का, श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ नृत्य उस विराट नृत्य की एक झलक मात्र है। उस रास का कोई सामान्य या सेक्सुअल मीनिंग नहीं है। कृष्ण पुरूष तत्व है और गोपिकाएं प्रकृति। प्रकृति और पुरूष का महानृत्य है यह। विराट प्रकृति और विराट पुरूष का महारस है यह, तभी तो हर गोपी को महसूस होता है कि कृष्ण उसी के साथ नृत्यलीन हैं। यह कोई मनोरंजन नहीं, पारमार्थिक है।

कृष्ण एक महासागर हैं। वे कोई एक नदी या लहर नहीं, जिसे पकड़ा जा सके। कोई उन्हें बाल रूप से मानता है, कोई सखा रूप में तो कोई आराध्य के रूप में। किसी को उनका मोर मुकुट, पीतांबर भूषा, कदंब वृक्ष तले, यमुना के तट पर भुवनमोहिनी वंशी बजाने वाला, प्राण वल्लभा राधा के संग साथ वाला प्रेम रूप प्रिय है, तो किसी को उनका महाभारत का महापराक्रमी रणनीति विशारद योद्धा का रूप प्रिय है। एक ओर हैं-
वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात्,
पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्,
पूर्णेंदु संुदर मुखादरविंदनेत्रात्,
कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने।।

तो दूसरी ओर-
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।।

वस्तुतः श्रीकृष्ण पूर्ण पुरूष हैं। पूर्णावतार सोलह कलाओं से युक्त उनको योगयोगेश्वर कहा जाता है और हरि हजार नाम वाला भी।

आज देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र के बृहद अध्ययन की जरूरत है। राजनेताओं को उनकी विलक्षण राजनीति समझने की दरकार है और धर्म के प्रणेताओं, उपदेशकों को यह समझने की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण ने जीवन से भागने या पलायन करने या निषेध का संदेश कभी नहीं दिया। वे महान योगी थे तो ऋषि शिरोमणि भी। उन्होंने वासना को नहीं, जीवन रस को महत्व दिया। वे मीरा के गोपाल हैं तो राधा के प्राण बल्लभ और द्रोपदी के उदात्त सखा मित्र। वे सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान और सर्व का कल्याण व शुभ चाहने वाले हैं। अति रूपवान, असीम यशस्वी और सत् असत् के ज्ञाता हैं। जिसने भी श्रीकृष्ण को प्रेम किया या उनकी भक्ति में लीन हो गया, उसका जन्म सफल हो गया। धर्म, शौय और प्रेम के दैदीप्यमान चंद्रमा श्रीकृष्ण को कोटि कोटि नमन।
यतो सत्यं यतो धर्मों यतो हीरार्जव यतः !
ततो भवति गोविंदो यतः श्रीकृष्णस्ततो जयः !!

सत्या सक्सेना

बुधवार, 12 अगस्त 2009

भारत और इंडिया में बंटता देश



पिछले कुछ वर्षों में इस विभाजन को सपष्ट देखा जा सकता है!हमारा देश बहुत तेजी से बदल रहा है...लेकिन इसके दोनों चेहरे बहुत साफ़ साफ़ देखे जा सकते है!.पहला तो वह आधुनिक इंडिया है..जिसमे आसमान छूती इमारते है,साफ़ सड़कें और बिजली से जगमगाते शहर है..!सड़क पर दौड़ती महँगी गाडियाँ विदेश का सा भ्रम पैदा करती है!यहाँ लोग सूट बूट पहने शिक्षित है जो आम बोलचाल में भी अंग्रेज़ी बोलते है...!बड़े बड़े होटल ,माल और .मल्टी प्लेक्स किसी सपने जैसे लगते है..!यहाँ के लोग इंडियन कहलवाना पसंद करते है...!ये हमारे देश का आधुनिक रूप है जो एक सीमित क्षेत्र में दिखाई .देता है...!और इस चका चौंध से दूर कहीं एक भारत बसा है जो अभी भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा है..!यहाँ अभी सड़कें,होटल मॉल नहीं है..बिजली भी कभी कभार आती है...!यहाँ के लोग सीधे सादे है जो बहुत ज्यादा शिक्षित नहीं है,इसलिए इन्हे अपने अधिकारों के लिए अक्सर लड़ना पड़ता है..!इस भारत और इंडिया को देख कर भी अनदेखा करने वाले नेता है जो हमेशा अपना हित साधते रहते है !लेकिन अफ़सोस इस बात का है की हमारी ७० %आबादी गाँवों में रहती है लेकिन इन भारत वासियों के लिए न फिल्में बनती है ना .कार्यक्रम ...!सभी लोग बाकि ३०% आबादी को खुश करने में लगे है....!तभी तो देखिये वर्षा न होने पर जहाँ लोग रो रहे है,सूखे खेतों को देख कर किसान तड़प उठते है...दाने दाने को मोहताज़ हो जाते है ..!वहीं ये इंडियन रैन डांस करने जाते है ..इनके लिए .कृतिम बरसात भी हो जाती है...!क्या कभी पिज्जा खाने वाले लोग उन भारतवासियों के बारे में सोचेंगे जो एक समय आज भी भूखे सोते है????क्या कभी हमारे नेता इन ऊंची इमारतों .के पीछे अंधेरे में सिसकती उन झोपड़ पट्टियों को देख पाएंगे जो इंडिया पर एक पाबन्द की भांति है....!इन में रहने वालों और गाँवों में रहने वालों में कोई अन्तर नहीं है.....!यहाँ बसने वाला ही सही भारत है जिसे कोई इंडियन देखना पसंद नहीं करता,लेकिन जब ये सुखी होंगे तभी इंडियन सुखी रह पंगे..पाएंगे...इस इंडिया और भारत की दूरी को पाटना बहुत जरूरी है....!ये दोनों मिल कर ही देश को विकसित बना सकते है....!

सोमवार, 10 अगस्त 2009

तुम जियो हजारों साल...








आप जिओ हज़ारों साल,
साल के दिन हों पचास हज़ार
ये दिन आये बारम्बार,
आये आपके जीवन में बहार !
"युवा" टीम के सक्रिय ब्लागर और हिन्दी साहित्य के चमकते सितारे कृष्ण कुमार यादव जी को जन्म-दिवस की ढेरों बधाइयाँ.
















प्रशासन-साहित्य में सुदृढ़ पकड़ किये
मनस्वी की विनम्रता का भी मान है
ऐसे कर्मवीर ही प्रेरणा बनते हैं
कलम लिख गाथा बांटती सम्मान है

साहित्य और प्रशासन की दुनिया में
जिनका जन-जन में है आदर-सम्मान
ऐसे श्री कृष्ण कुमार यादव जी का
विद्वान्-मनीषी भी करते हैं मान

भारतीय डाक सेवा के अधिकारी बन
अपने कृतित्व-मान को और बढ़ाया
प्रशासन और साहित्य का हुआ समन्वय
इस बेजोड़ संतुलन ने सबको चैंकाया

कई विधाओं में उनकी रचनायें
यत्र-तत्र होती रहतीं सतत प्रकाशित
श्री कृष्ण कुमार की साहित्यधर्मिता से
राष्ट्रभाषा हिन्दी हो रही सुवासित

लगभग दो सौ पत्र-पत्रिकाओं में
रचनाएं अब छपती हैं बारम्बार
कविता, कहानियाँ, व्यंग्य, निबंध और
समीक्षाएं, संस्मरण एवं साहित्य-सार

गद्य-पद्य शैली में सिद्धहस्त हैं आप
और लिखते हैं अतिशय व्यंग्य सटीक
काव्य में उभारें आप मृदुल अभिव्यक्ति
कहानियां हैं समाज की स्पष्ट प्रतीक

शब्द-शब्द की अपार सम्पदा से
लेख और निबंध रचते वह विशेष
विद्वत जनों को कर रहे प्रभावित
कुछ भी नहीं रहा यहाँ अवशेष

आकाशवाणी से सुन सरस कविता
श्रोताजन होते खूब भाव-विभोर
शब्द-कथ्य और भाव की सुभग त्रिवेणी
कलकल बहती है जो चारों ओर

संचार क्रान्ति के इस नये दौर में
इण्टरनेट का आया ऐसा जमाना
अंतरजाल पर पत्रिकायें खूब चलें
कृष्ण कुमार जी का भी गायें तराना

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के संयोजक
बद्रीनारायण तिवारी जी सस्नेह
साथ मिल बैठें तो देखें चकित सब
फैले चारों तरफ बस ज्ञान का मेह

प्रथम काव्य संकलन ‘अभिलाषा‘ रच
विद्वत जनों का खूब स्नेहाशीष पाया
‘नीरज‘ जी ने की भूरि-भूरि प्रशंसा
सूर्यप्रसाद दीक्षित ने मनोबल बढ़ाया

‘अभिव्यक्तियों के बहाने‘ निबन्ध संग्रह
फिर ‘अनुभूतियाँ और विमर्श‘ भी आया
गिरिराज किशोर जी ने किया विमोचन
पत्र-पत्रिकाओं में जमकर चर्चा पाया

‘साहित्य सम्पर्क‘ पत्रिका से जुड़े
बने ‘कादम्बिनी क्लब‘ के संरक्षक
अल्पायु में ही खूब नाम कमाकर
श्री कृष्ण कुमार बने हिन्दी के रक्षक

आपकी अप्रतिम प्रतिभा का आकलन
करते सुविज्ञ-जन हो करके हर्षित मन
संस्थायें देकर उपाधियां व अलंकरण
करती हैं सहर्ष स्वागत एवं अभिनन्दन

प्रशासन की अतिव्यस्तताओं के बीच
करते हैं निरन्तर सारस्वत-साधना
हर क्षेत्र में खूब यश-कीर्ति कमायें
होती रहें पूर्ण सब मनोकामना

ज्ञानवान, सुयशी, सराहनीय रहें सदा
प्रगति के मान् विश्व में बनायें आप
प्रशासन-साहित्य में रहें वंदनीय
अभिनन्दनीय मनीषी कहायें आप

वाणी के वरद पुत्र! तुम बनो मनस्वी
निज प्रबुद्ध रचनाओं से बनो यशस्वी
जगदीश्वर से है प्रार्थना हमारी
नित्य फूले-फले आपकी फुलवारी।
(कृष्ण कुमार जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर प्रकाशित पुस्तक "बढ़ते चरण शिखर की ओर" से साभार)

(कृष्ण कुमार जी पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति-उत्तर प्रदेश के संयोजक एवं पूर्व अध्यक्ष-उ0प्र0 हिन्दी साहित्य सम्मेलन डा0 बद्री नारायण तिवारी जी द्वारा रचित लेख "प्रशासन और साहित्य के ध्वजवाहक : कृष्ण कुमार यादव" युवा ब्लाग पर देख सकते हैं)

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

आज का सच !!

प्रथम रश्मि का आना
अब किसने है जाना?
पक्षी तो गुम हैं ,
जो हैं,उन्हें आभास नहीं,
दिन चढ़ आया है !
कमरे के अन्दर सुबह खर्राटे लेती है,
१२ बजे आँखें खोलती है,
आधी रात को गुड नाईट करती है!
सारे जोड़-घटाव ,
उल्टे बहाव में हैं ,
जीवन की भागदौड़ में,
सबकुछ उल्टा हो चला है !!

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

अंतर

सारी रात

आँखों की बारिश में

दर्द के ओले गिरते गए ...

उन्हें फोटोग्राफी का जूनून है

लेते गए तस्वीर.....

तस्वीर की बेबस मुस्कान

शर्मीली मुस्कान बनी

लाल आँखें हया का आइना बनी

सब्ज़ ओले बर्फ हो गए.............

हकीकत और चित्र में कितना अंतर होता है

सोमवार, 3 अगस्त 2009

इन सीरियल्स से हमें बचाओ



आज के समय में जितने टी वी .चैनल बढे है उतने ही विवाद भी !हर चैनल हर रोज ये नए शो लेकर आ रहा है जिनका मकसद हमारे मनोरंजन से ज्यादा अपनी टी आर पी को बढ़ाना होता है!हर कोई नई चीज़ पेश करने के चक्कर में हमें घनचक्कर बना रहा है जैसे की हमने अपनी फरमाइश पर इन्हे बनवाया हो..!ये बार कहते है आपकी भारी मांग पर इसे पुनः टेलीकास्ट कर रहे है जबकि हम तो इन्हे एक बार भी नहीं देखना चाहते...!एक सीरीयल आता है ...."इस जंगल से मुझे बचाओ"...भाई हमने कब कहा था की जंगल में जाओ,जो अब हम सब काम छोड़ कर आपको बचाएं...!!इसी तरह "सच का सामना"में तथाकथित सच बोलने वाले हमें बिना मतलब बच्चों के सामने शर्मिंदा कर रहे है....सच बोल कर..!अगर ये सच इतना ही बोझ बना हुआ था तो .मन्दिर...,मस्जिद या गुरूद्वारे में जाकर गलती मानो,स्वीकार करो या अपने घर वालों के सामने आँख उठा कर बात करो ...हमें नाहक ही क्यूँ परेशान करते हो ?इधर राखी सावंत अपना अलग ड्रामा चला के बैठी है.....सब को पता है ..ये शादी नहीं करेगी...पर कईयों की करवा जरूर देगी ..!कुछ लोग कहते है की आप देखते क्यूँ हो ?टी वी बंद कर दो ?अरे .भाई...पहली बात तो बच्चे रिमोट को छोड़ते नही और ..दूसरे आप इतनी इतनी बार रीपीट काहे करते हो भाई?इधर नयूज वाले सारे दिन कहते है देखिये क्या होगा राखी का?कौन बनेगा दूल्हा?एक चैनल ने तो ख़बर चला दी ...राखी के सवयम्बर .का रिजल्ट आउट!!!!!और ऊपर से .सारे दिन आते ये ........ऐड...!!!क्या करे दर्शक????मैं पूछना चाहता हूँ की इन से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?ये समाज को क्या देना चाहते है...?विदेश में परिवेश अलग है ..वहां के हिट शो यहाँ भी हिट होंगे .....ये जरूरी तो नहीं?फ़िर इनकी भोंडी नक़ल करने का क्या तुक?????हमारे अपने देश में ऐसे अनेक विषय है जिन पर हजारों शो बन सकते है...फ़िर ये बेतुका प्रदर्शन क्यूँ????मुझे याद है दूरदर्शन के वो दिन ..जब एक पत्र के लिखने से कार्यकर्म बदल जाता था.....!उन दिनों आन्मे वाला सुरभि नामक सीरीयल तो लोग आज भी याद करते है .......!और एक ये सीरीयल है जिनसे हर कोई बचना चाहता है....!.केवल हल्ला करने से कोई सीरीयल हिट नहीं होता है और ना ही ये लोकप्रियता का कोई पैमाना है !आख़िर समाज के प्रति कोई जवाब देही भी होनी चाहिए?? [फोटो-गूगल से .साभार ]

शनिवार, 1 अगस्त 2009

फ्रेण्डशिप-डे: ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे

मित्रता किसे नहीं भाती। यह अनोखा रिश्ता ही ऐसा है जो जाति, धर्म, लिंग, हैसियत कुछ नहीं देखता, बस देखता है तो आपसी समझदारी और भावों का अटूट बन्धन। कृष्ण-सुदामा की मित्रता को कौन नहीं जानता। ऐसे ही तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं जहाँ मित्रता ने हार जीत के अर्थ तक बदल दिये। सिकन्दर-पोरस का संवाद इसका जीवंत उदाहरण है। मित्रता या दोस्ती का दायरा इतना व्यापक है कि इसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। दोस्ती वह प्यारा सा रिश्ता है जिसे हम अपने विवेक से बनाते हैं। अगर दो दोस्तों के बीच इस जिम्मेदारी को निभाने में जरा सी चूक हो जाए तो दोस्ती में दरार आने में भी ज्यादा देर नहीं लगती। सच्चा दोस्त जीवन की अमूल्य निधि होता है। दोस्ती को लेकर तमाम फिल्में भी बनी और कई गाने भी मशहूर हुए-ये तेरी मेरी यारी/ये दोस्ती हमारी/भगवान को पसन्द है/अल्लाह को है प्यारी। ऐसे ही एक अन्य गीत है-ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे/छोड़ेंगे दम मगर/तेरा साथ न छोड़ेंगे। हाल ही में रिलीज हुई एक अन्य फिल्म के गीतों पर गौर करें- आजा मैं हवाओं में बिठा के ले चलूँ/ तू ही-तू ही मेरा दोस्त है।

दोस्ती की बात पर याद आया कि 2 अगस्त को ‘फ्रेण्डशिप-डे‘ है। यद्यपि मैं इस बात से इत्तफाक नहीं रखती कि किसी संबंध को दिन विशेष के लिए बांध दिया जाय, पर उस दिन को इन्ज्वाय करने में कोई हर्ज भी नहीं दिखता। फ्रेण्डशिप कार्ड, क्यूट गिफ्ट्स और फ्रेण्डशिप बैण्ड से इस समय सारा बाजार पटा पड़ा है। हर कोई एक अदद अच्छे दोस्त की तलाश में है, जिससे वह अपने दिल की बातें शेयर कर सके। पर अच्छा दोस्त मिलना वाकई एक मुश्किल कार्य है। दोस्ती की कस्में खाना तो आसान है पर निभाना उतना ही कठिन। आजकल तो लोग दोस्ती में भी गिरगिटों की तरह रंग बदलते रहते हैं। पर किसी शायर ने भी खूब लिखा है-दुश्मनी जमकर करो/लेकिन ये गुंजाइश रहे/कि जब कभी हम दोस्त बनें/तो शर्मिन्दा न हों।


फिलहाल, फ्रेण्डशिप-डे की बात करें तो यह अगस्त माह के प्रथम रविवार को सेलीबे्रट किया जाता है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा 1935 में अगस्त माह के प्रथम रविवार को दोस्तों के सम्मान में ‘राष्ट्रीय मित्रता दिवस‘ के रूप में मनाने का फैसला लिया गया था। इस अहम दिन की शुरूआत का उद्देश्य प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उपजी कटुता को खत्म कर सबके साथ मैत्रीपूर्ण भाव कायम करना था। पर कालान्तर में यह सर्वव्यापक होता चला गया। दोस्ती का दायरा समाज और राष्ट्रों के बीच ज्यादा से ज्यादा बढ़े, इसके मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र संघ ने बकायदा 1997 में लोकप्रिय कार्टून कैरेक्टर विन्नी और पूह को पूरी दुनिया के लिए दोस्ती के राजदूत के रूप में पेश किया।

इस फ्रेण्डशिप-डे पर बस यही कहूंगी कि सच्चा दोस्त वही होता है जो अपने दोस्त का सही मायनों में विश्वासपात्र होता है। अगर आप सच्चे दोस्त बनना चाहते हैं तो अपने दोस्त की तमाम छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी बातों को उसके साथ तो शेयर करो लेकिन लोगों के सामने उसकी कमजोरी या कमी का बखान कभी न करो। नही तो आपके दोस्त का विश्वास उठ जाएगा क्योंकि दोस्ती की सबसे पहली शर्त होती है विश्वास। हाँ, एक बात और। उन पुराने दोस्तों को विश करना न भूलें जो हमारे दिलों के तो करीब हैं, पर रहते दूरियों पर हैं।
आकांक्षा यादव

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

लेखन से पिरोती साहित्य की माला: आकांक्षा यादव

(आज आकांक्षा जी का जन्मदिन है. वे न सिर्फ "युवा" ब्लॉग की सक्रिय सदस्य हैं बल्कि बहुविध व्यक्तित्व को अपने में समेटे एवं साहित्यिक सरोकारों से अटूट लगाव रखने वाली एक प्रतिभाशाली युवा कवयित्री व लेखिका हैं. स्वभाव से सहज, सौम्य, विनम्र व संस्कारों की लड़ी से सुवासित आकांक्षा यादव जी के जन्मदिन पर कानपुर से "सांस्कृतिक टाईम्स" की संपादिका निशा वर्मा जी ने यह लेख हमें भेजा है. निशा जी के प्रति हम आभार व्यक्त करते हैं. इस लेख को प्रकाशित करते हुए हम आकांक्षा जी के स्वस्थ, दीर्घायु, समृद्ध एवं यशस्वी जीवन की कामना करते हैं और जन्म-दिन की ढेरों शुभकामनायें देते हैं !!)
मुंशी प्रेमचन्द का कहना था कि-‘‘सुन्दरता को अलंकारों की जरूरत नहीं है, कोमलता अलंकारों का भार नहीं सह सकती।‘‘ विद्वान गेटे के अनुसार-‘‘सौन्दर्य का आदर्श सादगी और शान्ति है।‘‘ एक चीनी कहावत भी है कि-‘‘बिना सद्गुणों के सुन्दरता अभिशाप है।‘‘ सीरत की खुशबू व्यक्ति के व्यवहार और बौद्धिकता को सुरक्षित करती है। जिसके पास सूरत और सीरत दोनों हो, तो सोने पर सुहागा हो जाता है। भारतीय संस्कृति में तमाम ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ शिक्षा एवं साहित्य के अद्भुत समन्वय द्वारा नये प्रतिमानों की स्थापना हुई है। शिक्षा व्यक्ति में ज्ञान उत्पन्न करती है तो साहित्य संवेदना की संपोषक है। इस परम्परा में तमाम ऐसे व्यक्तित्व देखे जा सकते हैं जो अपने विषय के विद्वान होने के साथ-साथ साहित्यिक गतिविधियों में भी उतने ही सक्रिय रहे हैं। इसी क्रम में बहुविध व्यक्तित्व को अपने में समेटे देववाणी संस्कृत की प्रवक्ता एवं साहित्यिक सरोकारों से अटूट लगाव रखने वाली आकांक्षा यादव का नाम भी शामिल है। स्वभाव से सहज, सौम्य, विनम्र व संस्कारों की लड़ी से सुवासित आकांक्षा यादव एक प्रतिभाशाली कवयित्री व लेखिका हैं। आपका जन्म 30 जुलाई 1982 को सैदपुर, गाजीपुर में हुआ। आपके पिता श्री राजेन्द्र प्रसाद एवं माता श्रीमती सावित्री देवी सैदपुर में नगरपालिका अध्यक्ष रहे एवं वर्तमान में समाज सेवा में रत हैं। उच्च शिक्षा से आपके परिवार का अभिन्न नाता रहा है। आपके बड़े भाई श्री पीयूष कुमार आई0आई0टी0 रूड़की से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में उप महाप्रबन्धक, मंझले भाई श्री समीर सौरभ लखनऊ विश्वविद्यालय से एल0एल0बी0 करने के बाद उत्तर प्रदेश में उप पुलिस अधीक्षक, एवं श्री अश्विनी कुमार आई0आई0टी0 कानपुर से शिक्षा पश्चात गुजरात कैडर के 1997 बैच के आई0 ए0 एस0 अधिकारी के रूप में जूनागढ़ के जिलाधिकारी पद पर कार्यरत हैं। ऐसे में आकांक्षा जी का साहित्य की ओर रूझान पहली नजर में चैंकाता है। आपने प्राथमिक शिक्षा दयानन्द बाल विद्या मन्दिर, सैदपुर से एवं हाईस्कूल व इण्टर की शिक्षा क्रमशः 1996 व 1998 में राजकीय बालिका इण्टर कालेज, सैदपुर से प्राप्त की। वर्ष 2001 में संस्कृत, हिन्दी और राजनीति शास्त्र विषयों के साथ आपने पं0 दीन दयाल उपाध्याय राजकीय महाविद्यालय, सैदपुर से स्नातक और वर्ष 2003 में स्नाकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर से संस्कृत में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की। फिलहाल लोक सेवा आयोग, उत्तर प्रदेश से चयनित होकर आकांक्षा यादव राजकीय बालिका इण्टर काॅलेज, नरवल कानपुर में प्रवक्ता (संस्कृत) के पद पर कार्यरत हैं।

आकांक्षा यादव ने अपने लेखन की शुरूआत कविता से की और बाद में अन्य विधाओं से भी जुड़ीं। साहित्यिक विधाओं में कविता इस दृष्टि से विशिष्ट है कि इसमें आत्माभिव्यक्ति की अकुलाहट सबसे ज्यादा देखी जाती है। एक कवयित्री के रूप में आकांक्षा जी ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाधर्मिता का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। आपकी कविताओं में जहाँ जीवंतता है वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है। चरित्र कहानी की पहचान है और बिम्ब कविता की। कविता में प्रयुक्त शब्द का आशय शब्द की कैद से आजाद हो उठता है, तभी कविता को अतल गहराई और अनंत विस्तार मिलता है। उन्होंने कविता को परिभाषित करने का उपक्रम यूँ किया है- जज्बातों के गुंफन से/ रचती है कविता/जीवन की लय-ताल से/सँवरती है कविता (अनुभूति, मई 2008)। निश्चिततः ये पंक्तियाँ उनकी रचनात्मकता की भाव-भूमि का खुलासा करने में नितांत सक्षम हैं। इसी प्रकार ‘संपूर्ण बनूँ‘ कविता में वे लिखती हैं- तुम गीत कहो, मैं पंक्ति बनूँ/तुम कहो गजल, मैं शब्द बनूँ/बिन तेरे मेरा वजूद है क्या/हो शब्द तेरे, मैं भाव बनूँ (गोलकोण्डा दर्पण, मई 2008)। आकांक्षा युवा हैं और नारी हैं, सो इनके अन्तद्र्वन्दों से भलीभांति परिचित हैं। ‘कादम्बिनी’ (दिसम्बर 2005) में ‘युवा बेटी’ शीर्षक से आपकी प्रथम कविता प्रकाशित हुईं। यह आधुनिक सुशिक्षित आत्मनिर्भर नारी के विचारों का सटीक व सशक्त प्रतिनिधित्व करती है- ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है/वह उतनी ही सचेत है/अपने अधिकारों को लेकर/जानती है/स्वयं अपनी राह बनाना (कादम्बिनी, दिसम्बर 2005)। इसी प्रकार ‘एक लड़की’ कविता में बेबसी की सहज भावात्मक अभिव्यक्ति है। जो लोग जीती-जागती लड़की को वस्तु की तरह ठांेक-बजाकर देखते है, उन पर तीक्ष्ण कटाक्ष किया गया है- कोई उसके रंग को निहारता/तो कोई लम्बाई मापता/पर कोई नहीं देखता/उसकी आँखों में/जहाँ प्यार है, अनुराग है/लज्जा है, विश्वास है (साहित्य अमृत, जुलाई 2007)। मासूम भावनाओं व सौंदर्य बोध का ‘अहसास‘ कराती कविताएं भी आपने रची हैं- लौकिकता की/सीमा से परे/अलौकिक है/अहसास तुम्हारा (गृहशोभा, जुलाई 2006)। मातृत्व की अनुभूति की नितान्त स्नेहिल अभिव्यक्ति को मर्मस्पर्शी भंगिमा के साथ सीधे-सीधे पाठक तक संप्रेषित करने का प्रयत्न ‘मातृत्व‘ में किया गया है- उसके आने के अहसास से/सिहर उठती हूँ/अपने अंश का/एक नए रूप में प्रादुर्भाव (साहित्य जनमंच, सितम्बर 2007)।

आकांक्षा यादव किसी तकनीक को सिर्फ उसके बाहरी रूप रंग और प्रभाव के आधार पर नहीं देखतीं, बल्कि उसके पीछे मानवीय भावनाओं की सिकुड़न को भी महसूस करती हैं- एस0 एम0 एस0 के साथ ही/शब्द छोटे होते गए/भावनाएँ सिमटती गईं/लघु होता गया सब कुछ/रिश्तों की कद्र का अहसास भी (पुनर्नवा, दैनिक जागरण, 29 सितम्बर 2006)। ‘सिमटता आदमी’ कविता में भी भूमण्डलीकरण के दौर में आदमी के सिमटते जाने की नियति का चित्रण है- देखता है दुनिया को/टी0 वी0 चैनल की निगाहों से/पर नहीं देखता/पास-पड़ोस का समाज (युगतेवर, मार्च-मई, 2007)। वर्तमान दौर की विद््रूपताओं पर भी आकांक्षा जी ने कलम चलायी- आपाधापी के इस दौर में/कोई नहीं जानता कि/देर शाम को वे/एक-दूसरे के पास/होंगे भी या नहीं (कलायन, दिसम्बर 2008)। आपकी कवितायें स्थूल वर्णन से हटकर अनुभूतिगत तरलता और सांद्रता के साथ व्यंजित हुई हैं और इसी कारण वे अधिक प्रभावशाली हो गयी हैं। इन रचनाओं में समाज के निचले वर्ग की वेदना और निराशा को भी वाणी मिली है- पर नहीं सुनता कोई उनकी/चैनलों पर लाइव कवरेज होता है/लोगों की गृहस्थियों के/श्मशान में बदलने का (प्रगतिशील आकल्प, अप्रैल-जून 2007)। आकांक्षा जी में अपने आस-पास की जिन्दगी को खुली आँखों से देखने की सामथ्र्य है और मानवीय रिश्तों के साथ जीवन के विविध आयामों का निदर्शन करने का सत्साहस भी। बढ़ते पर्यावरण असंतुलन से विकल हो रही पृथ्वी की वेदना को भी वे शब्द देती हंै- कंक्रीटों की इस दुनिया में/तपिश सहना भी हुआ मुश्किल/मानवता के अस्थि-पंजर टूटे/पृथ्वी नित् हो रही विकल (सीप, अक्टूबर-दिसम्बर 2008)। निश्चिततः उन्होंने अपने मनोभावों को जो शब्दाभिव्यक्ति दी है, वह विलक्षण है और अन्तर्मन से विशु़द्ध साहित्यिक है। समकालीन कवियों की कविताओं पर दुर्बोधता के कारण उनकी ग्रहणीयता या आस्वादकता पर जो प्रश्नचिन्ह लगाया जाता है, वह आकांक्षा जी की कविताओं में नहीं है।

इसी प्रकार अनेक कविताएं हैं जो भिन्न-भिन्न रंगों में लिखी गई हैं। मन के सुुकुमार भावों के स्पंदन, कविता की किलकारियों के रूप में स्वतः ही गूँॅंज उठे हैं। कहीं कोई कृत्रिमता नहीं, कहीं कोई मलाल नहीं। जो कविता सहज रूप में अभिव्यक्त हो, वही जिन्दा रहती है। वह समाज की अन्तरात्मा को अन्दर तक छू जाती है। आकांक्षा जी की कविता पाठकों को ऐसे भाव लोक में ले जाती है, जहाँ कविता कवि की न होकर पाठकों की हो जाती है। रचना और संवेदना को विराट फलक पर यथार्थ से जोड़ने की सार्थक पहल में आकांक्षा यादव सफल हुई हंै। सबसे प्रसन्नता की बात तो यह है कि आपका आत्म बहुत सीमित नहीं है और उसमें निकटवर्ती परिवेश से लेकर दूर-दराज की दुनिया तक प्रतिबिंबित है। आपकी रचनाओं में बदलते हुए समय में बदलते हुए मनुष्य के हालात का अच्छा भाव बिम्ब देखने को मिलता है। इसी प्रकार आपकी कविताओं में विविधता के साथ एक सच्चाई है, जो अनेक बार हृदय पर सीधे चोट करती है।

अपनी सशक्त रचनाधर्मिता को लोगों तक पहुँचाने के लिए आकांक्षा यादव सिर्फ पत्र-पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं हैं। जहाँ सौ से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में आपकी कवितायें, लेख एवं लघु कथायें निरन्तर प्रकाशित हो रही हैं, वहीं आपकी कवितायें एक दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में भी स्थान बना चुकी हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं एवं सृजनगाथा, अनुभूति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, शब्दकार, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, कलायन, युगमानस, स्वर्गविभा, कथाव्यथा इत्यादि वेब-पत्रिकाओं पर आपकी रचनाएं नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। शब्द शिखर शीर्षक से आप एक ब्लाॅग का भी संचालन करती हैं, जहाँ पर रचनाओं के साथ-साथ आपके विचार प्रतिबिम्बित होते रहते हैं। यही नहीं चोखेर बाली, युवा, नारी, नारी का कविता जैसे सामूहिक ब्लाॅगों पर भी आपकी अभिव्यक्तियाँ विस्तार पाती रहती हैं। सबसे सुखद बात तो यह है कि ब्लाॅग पर प्रकाशित आपकी रचनाओं व विचारों को प्रिन्ट मीडिया ने भी तरजीह दी है एवं हिन्दुस्तान, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा एवं आई नेक्स्ट जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में उनकी सारगर्भित चर्चा हुई है।

व्यक्ति के उत्कृष्ट कार्यों से सिर्फ उसी का उन्नयन नहीं होता बल्कि समाज व राष्ट्र का भी उन्नयन होता है। ऐसी प्रतिभाओं का सम्मान जहाँ उनकी पहचान स्थापित करता है, वहीं यह समाज का नैतिक दायित्व भी है। आकांक्षा यादव का मानना है कि शिक्षा और साहित्य के बिना हम अपनी सामाजिक तथा सांस्कृतिक विरासत को सजोकर रखने में सक्षम नहीं हो सकेंगे। सहज-सरल-सहृदय आकांक्षा जी का मन पीड़ित व दुःखी व्यक्ति को देखकर पिघल उठता है। व्यक्ति अपनी सभ्यता, संस्कार, सौम्यता व व्यवहारिक कुशलता से पहचाना जाता है ओर ऐसे लोगों से लोग बार-बार मिलना चाहते हैं। संस्कृति संस्कार से बनती है ओर सभ्यता नागरिकता का रूप है। संस्कृत विषय की कुशल प्रवक्ता होने के साथ-साथ साहित्यिक सरोकारों से गहरे जुड़ाव, राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार, रचनाधर्मिता, सतत् साहित्य सृजनशीलता एवं सम्पूर्ण कृतित्व हेतु तमाम प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं ने आकांक्षा जी को विभिन्न सम्मानों से विभूषित किया है। इनमें राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज शिरोमणि‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, अभिव्यंजना, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य कुमुद‘‘ सम्मान एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘‘ सहित तमाम सम्मान शामिल हैं।

समाज में बिरले उदाहरण ही ऐसे मिलते हैं जहाँ पति और पत्नी दोनों ही साहित्य सेवा में रत हों। आकांक्षा जी के पति श्री कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक सेवा के अधिकारी होने के साथ-साथ अच्छे साहित्यकार भी हैं। आपने अपने पति के साथ मिलकर ‘‘क्रान्तियज्ञ: 1857-1947 की गाथा‘‘ नामक पुस्तक का सम्पादन भी किया है। इसका विमोचन भारत सरकार में मंत्रीद्वय श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया व श्री श्रीप्रकाश जायसवाल द्वारा किया गया। श्री कृष्ण कुमार यादव की अब तक पाँच पुस्तकें प्रकाशित हैं और आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘‘ का वर्ष 2009 में प्रकाशन किया गया। सुविख्यात समालोचक सेवक वात्स्यायन इस साहित्यकार दम्पत्ति को पारस्परिक सम्पूर्णता की उदाहृति प्रस्तुत करने वाला मानते हुए लिखते हैं-’’जैसे पंडितराज जगन्नाथ की जीवन-संगिनी अवन्ति-सुन्दरी के बारे में कहा जाता है कि वह पंडितराज से अधिक योग्यता रखने वाली थीं, उसी प्रकार श्रीमती आकांक्षा और श्री कृष्ण कुमार यादव का युग्म ऐसा है जिसमें अपने-अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कारण यह कहना कठिन होगा कि इन दोनों में कौन दूसरा एक से अधिक अग्रणी है।’’

आकांक्षा यादव की प्रतिभा स्वत: प्रस्फुटित होकर सामने आ रही है। आकांक्षा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर दहलीज, वुमेन ऑन टॉप, बाल साहित्य समीक्षा, गुफ्तगू, नेशनल एक्सप्रेस, दलित टुडे, सुदर्शन श्याम सन्देश, यादव ज्योति, यादव साम्राज्य, नवोदित स्वर जैसी तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने आलेख प्रकाशित किये हैं. दिल्ली से प्रकाशित नारी सरोकारों को समर्पित पत्रिका ‘‘वुमेन आॅन टाॅप‘‘ ने जून 2008 अंक में अपनी आवरण कथा ‘हम में है दम, सबसे पहले हम‘ में देश की तमाम प्रतिष्ठित नारियों में आपको स्थान दिया है, जिन्होंने अपनी बहुआयामी प्रतिभा की बदौलत समाज में नाम रोशन किया। इन नारियों में माधुरी दीक्षित, लता मंगेशकर, लारा दत्ता, तब्बू, हेमा मालिनी, उमा भारती, सुषमा स्वराज, वृंदा करात, पं0 रवि शंकर की बेटी नोरा जोन, सचिन पायलट की पत्नी सारा पायलट, फिल्म आलोचक व लेखिका अनुपमा चोपड़ा के साथ आपका नाम भी शामिल है। जीवन के लम्बे पड़ाव में ऐसे न जाने कितने स्वर्णिम पृष्ठ आपकी उपलब्धियों के भण्डार में जुड़ते जायेंगे और इसी के साथ आप का जीवन अपनी चरमता पर पहुँचता जायेगा। साहित्याकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में आपकी उत्तरोत्तर प्रगति हो, यही कामना हैै। आपका जीवन उत्तरोत्तर नये आयामों के साथ विकसित होता रहे, आप यशस्वी और दीर्घस्वी हों, यही ईश्वर से प्रार्थना है। कृतित्व एवं व्यक्तित्व में ऐसा समन्वय दैव योग से ही होता है।
निशा वर्मा,सम्पादक-सांस्कृतिक टाइम्स, 106/63-ए, गाँधी नगर, कानपुर-208012

बुधवार, 22 जुलाई 2009

ये देश है मेरा ??

अपनी पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था की हमें बेवजह विदेशियों के लिए पलकें पावडे नहीं बिछाना चाहिए !और लो उन्होंने साबित भी कर दिया..!एक विदेशी एयर लाइन ने पूर्व राष्ट्रपति के साथ जो सलूक किया वो हर भारतीय के लिए शर्मनाक है !ऊपर से तुर्रा ये की हम..सब.... से बराबरी का व्यहवार करते है,तो क्या जनाब ओबामा के साथ भी ऐसे,लेकिन अफ़सोस तब नहीं !क्योंकि भारतियों को अपमान सहने की आदत सी हो गई है ना !पहले तो वे अपने अपने देशों में अपमानित करते थे ,अब हमारे देश में भी वे हमारा अपमान करेंगे..!क्या एयर लाइन को विशिष्ट अतिथियों की गाइड लाइन का पता नही?क्या वे पूर्व राष्ट्रपति को जानते नही?क्या सुरक्षा के नाम पर जूते उतरवाए जाते है?साफ़ है की उनका मकसद अपमानित करना ही था...!और हम है की रत लगा राखी है...पधारो म्हारे देश ....!आओ हमारा अपमान करो,बीमारियाँ .फैलाओ...हमें बुरा नहीं लगता..! हमारे देश के नेता बहुत उदार है ,उनकी मोटी चमडी पर कुछ असर नहीं होता..!इसीलिए कभी कुछ नहीं होता !कभी जोर्ज फर्नांडिस तो कभी प्रणब मुखर्जी को जांच के नाम पर कपड़े उतारने पड़ते है..!कभी भी विदेशी नेताओं से हम ऐसा करने की हिमाकत कर सकते है?शायद नहीं.....!हर विदेशी चीज़ को भाग कर अपनाने वाले क्या अपमान करना भी अपना पायेंगे? नहीं...क्यूंकि हम तो अपमान सहना जानते है करना नहीं.....!

सोमवार, 20 जुलाई 2009

प्रतियोगी परीक्षाओं में महिलाओं की फीस माफ

केंद्र सरकार अपने यहां होने वाली नियुक्तियों के मामले में महिलाओं पर खासा मेहरबान हो गई है। अब केंद्र द्वारा संचालित होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में महिलाएं बगैर कोई फीस दिए शामिल हो सकती हैं। यानी उनकी फीस माफ कर दी गई है। सरकार की ओर से कहा गया है कि संघ लोक सेवा आयोग [यूपीएससी] व कर्मचारी चयन आयोग [एसएससी] द्वारा आयोजित होने वाली सीधी भर्ती, विभागीय प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने के लिए महिला प्रत्याशियों को अब फीस नहीं देनी होगी। इसके साथ ही आयोग द्वारा लिए जाने वाले साक्षात्कार के लिए भी उन्हें कोई फीस नहीं देना पड़ेगा। हाल ही में केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों और विभागीय सचिवों, यूपीएससी और कर्मचारी चयन आयोग के संबंधित अधिकारियों को इस बारे में एक पत्र लिखा है। इसमें केंद्र सरकार की नौकरियों में महिलाओं को ईमानदारी पूर्वक बेहतर प्रतिनिधित्व देना सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।

सरकारी दिशा-निर्देशों की श्रृंखला में यह भी कहा गया है कि चयन समिति का संयोजन ऐसे किया जाना चाहिए ताकि उसमें महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। दस या उससे अधिक रिक्तियों के लिए चयन समिति का जब गठन हो तो उसमें एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य हो। महिलाओं की नियुक्ति के रुझान पर नजर रखने के लिए सभी मंत्रालयों और विभागों से 31 अगस्त तक कुल पदों व कर्मचारियों की संख्या पर सिलसिलेवार रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है।

गौरतलब है कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद के दोनों सदनों के संयुक्त संबोधन के दौरान सरकारी नौकरियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए ठोस उपाय करने को कहा था। इसी के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है। सरकार नौकरियों में शारीरिक रूप से अपंग व्यक्तियों का भी विशेष ध्यान रख रही है। हाल के आदेश में कहा गया है कि नौकरी में आने के बाद अपंग हो जाने वाला सरकारी कर्मचारी जिस दिन इसका उचित प्रमाण पेश कर दे, उसी दिन से वह विकलांग कोटे में आरक्षण का लाभ पाने का हकदार होगा।
(साभार: जागरण)
आकांक्षा यादव

बुधवार, 15 जुलाई 2009

पधारो म्हारे देश, लेकिन...

जी हाँ..यही हमारे देश की संस्कृति है...~!राजस्थान टूरिजम का तो नारा भी यही है..पधारो म्हारे देश...!पर्यटक हमारे देश के मेहमान है,वे हमारे यहाँ आते है ,खर्चा करते है और हमारे देश से अच्छी यादें लेकर जाते है !यहाँ तक तो ठीक है लेकिन बदले में वे हमें जो नुक्सान पहुँचा रहे है ,उस और ध्यान देना जरूरी है!वे नई नई बीमारियाँ लेकर आ रहे है यहाँ लोगों से घुल मिल कर वे इनका प्रसार कर रहे है !अख़बारों में प्रकाशित रिपोर्ट्स के अनुसार ऐसी अनेक बीमारियाँ जो भारत में प्रचलित नहीं थी ,इन विदेशी मेहमानों द्वारा आ रही है..!और देखिये हमारी सरकार इनके प्रति कितनी उदार है जो इन्हे बिना जांचे परखे सर आँखों पर बिठा रही है..!आपको याद होगा .की किस तरह आस्ट्रेलिया दौरे पर हवाई अड्डे पर भारतीय खिलाड़ियों के जूते उतरवा लिए गए थे..?और एक बार भारतीय मंत्री जी को नंगे होकर तलाशी देनी पड़ी थी...फ़िर हम क्यूँ इतने उदार बने हुए है?आज जरूरी है की हम पूरी जांच पड़ताल के बाद ही इन मेहमानों का स्वागत करे....!बिमारियों के साथ साथ हमें इनकी सांस्कृतिक बुराइयों से भी बचना होगा...!

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

समलैंगिकता पर बाबा रामदेव से असहमति

फायर फिल्म के प्रदर्शन के उपरांत गे रिलेशन एक बार फ़िर चर्चा में हैं। उस समय अवधूत बाबा ठाकरे की शिवसेना ने इतन कोहराम मचाया था कि डर के मारे कई सिनेमा हाल के मालिको को इस फिल्म का प्रदर्शन बंद करना पड़ा था। फिल्म की निर्माता दीपा मेहता को ठाकरे महाराज से माफी मांगते हुए अपनी नायिकाओं के नाम राधा और सीता से बदलकर कुछ और करने पड़े थे।दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद भारतीय संस्कृति की रक्षा की कमान बाबा रामदेव और ज्योतिषी सुरेश कौशल ने सॅभाली है। बाबा रामदेव कुछ ज्यादा ही मुखर हैं। उनके वकील सुरेश शर्मा और गंधर्व मक्कर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से भरतीय संस्कति और मूल्य खतरे में पड़ सकते हैं,अतः इस पर रोक की आवश्यकता है। बाल ठाकरे की तरह योग गुरु रामदेव ने भी इस विरोध का आधार सनातन ग्रंथों को बनाया है,जिसके तहत वेद पुराण और समृति ग्रंथ आते हैं।
आइये देखते हैं कि हमारे ये ग्रंथ सेक्स संबंधों को लेकर कितने पाक साफ हैं,उसके बाद हम बाबा रामदेव से चंद सवाल करेगें। सबसे पहले हम प्रजापिता ब्रह्मा की चर्चा करगें,क्योंकि वही वेदों के रचयिता और जनक माने जाते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में स्पष्ट उल्लेख है कि ब्रह्मा अपनी पृत्री के पास मृग का रुप धारण करके गये और उन्होंने अपनी पृत्री के साथ सहवास किया। एक बार वो अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया के पास भी सहवास करने अत्रि का रुप धारण करके गये,किन्तु वो सफल नहीं हो सके। ब्रह्मा की इस दुराचारी प्रवृत्ति के कारण ही देव समाज ने उन्हें दण्डित किया और उनकी उपासना पर रोक लगा दी। इसीलिए आर्यावर्त में कहीं भी उनके मंदिर नहीं मिलते।वेदों में सेक्स संबंध इतने खुले थे कि वहाँ वर्जना का सर्वथ अभाव था। योग्य पुरुष किसी भी स्त्री के साथ रमण कर सकता था और यह स्त्री उसकी बहन,माँ,बुआ कोई भी हो सकती थी। ऋग्वेद में यमी अपने सगे भाई यम के साथ संभोग का प्रस्ताव रखती है। उर्वशी-पुरुरवा प्रसंग यह बताता है कि अप्सराएं एक साथ परिवार की कई पीढ़ियां के मनोरंजन का साधन थी। जिस सरस्वती का चित्र बनाने पर भगवाधारियों ने एम एफ हुसैन की प्रदर्शनी तोड़ डाली थी,वही सरस्वती पहले ब्रह्मा की पु़त्री थी और बाद में उनकी पत्नी बनी। यजुर्वेद के अनुसार ब्रह्मा की पत्नी होने के बावजूद उन्होंने अश्विनी कुमारों से गर्भ धारण किया था। महान दार्शनिक चार्वाक ने इसीलिए वेदों के रचयिता को ‘‘त्रयो वेदस्यकतौरः,भांड,घूर्त,निशाचरः’’ अर्थात भांड,धूर्त और निशाचर कहकर निंदा की थी। गौतम बुद्ध ने अपनी भिक्षुणियों के लिए 166 पश्चाताप निर्धारित किए थे। उनमें 49,50 में वेदों का पठन-पाठन उनकी अश्लीलता के कारण स्पष्ट रुप से वर्जित था।
टी एच ग्रीफिथ पहले अंग्रेज थे जिन्होंने वेदों का अंगे्रजी अनुवाद किया। ऋग्वेद के कुछ मंत्रों का अनुवाद उन्होंने यह कहकर छोड़ दिया कि वो इतने अश्लील हैं कि उनका अनुवाद करना न तो मेरे लिए संभव हैं और न ही उनके लिए अंगे्रजी में शब्द हैं।यज्ञ,जो वेदों की एक महत्वपूर्ण स्थापना है, दरअसल यौनाचार का ही एक रुपांतर है। वेदों में स्पष्ट उल्लेख है कि आचार्य किस प्रकार यज्ञस्थल पर ही अपने शिष्यों को समूह में यौन संपादन की शिक्षा देते थे। वेद के अतिरिक्त महाभारत और पुराण भी इस सेक्स वार्ता से अछूते नहीं हैं। महाभारत के आदिपर्व में वर्णित है कि ब्रह्मा के प्रथम पुत्र और पुत्री दक्ष और दक्षा जुड़वा भाई-बहन थे और वो कालांतर में पति-पत्नी बनकर रहे। ब्रह्मा के नाती कश्यप अपनी तेरह चचेरी बहनों के साथ समागम करते थे। ब्रह्मा के पुत्र धर्म के अपनी दस सगी भतीजियों के साथ संबंध थे। हरिवंशपुराण के दूसरे अध्याय के अनुसार वशिष्ठ प्रजापति की कन्या शतरुपा कालांतर में उनकी पत्नी बनी। जलप्रलय के पश्चात सृष्टि के आदि पुरुष मनु ने अपनी पुत्री इला को अपनी वासना का शिकार बनाया। जयशंकर प्रसाद की कामायनी का कथानक इसी पर आधरित है,जहाँ इला का नाम इड़ा दिया गया है।
बाबा रामदेव ने जिन वेदों और पुराणें के आधर पर गे रिलेशन पर उंगुली उठाई है,वह आधरहीन है। उनका अपना खुद का नजरिया भी आधरहीन है। वो मूलतः शारीरिक स्वास्थ्य के अध्येता और विशेषज्ञ हैं। ब्रह्चर्य से उन्होंने सीधे वानप्रस्थ में छलांग लगा दी। गृहस्थ का तपोवन उनके जीवन में अनुपस्थित है। अतः जीवन का समग्र दृष्टिकोण भी उनके जीवन से गायब है। उन्हें जानना और समझना होगा कि अश्लीलता वस्तु में नहीं बल्कि नजरिए में होती है। हमने आदिवासी समाजों में देखा है कि वहा स्त्री पुरुष प्रायः नंगे रहते हैं। अतः वहाॅ सेक्स को लेकर कुंठा नहीं है। न तो वहाॅ नवयुवक चोरी-छिपे ब्ल्यू फिल्में देखते है और न ही बलात्कार का घटनाएं होती हैं। सेक्स को लेकर कुंठित मनोरोगी भी वहाॅ नहीं मिलते। सह सब कुछ हमारे तथाकथित सभ्य समाज में ही होता है जहाॅ सभ्यता के नाम पर जीवन की अनिवार्यतायें भी गोपन के घेरे में हैं। इसीलिए सब जगह छेड़छाड़ है,बलात्कार है,कुंठित युवक हैं और मनोचिकित्सक हैं। यह सब बाबा बाबा टाइप गुरुओं का प्रताप है। कभी विक्टोरिया काल में ब्रिटेन में कुर्सी-मेजों के पैर ढॅककर रखे जाते थे,क्योंकि उनसे स्त्री की टांगों का आभस होता था। लेकिन ब्रिटेन जल्द ही इस दोगलेपन से बाहर निकला। आज बाबा रामदेव जैसे लोग उसी युग की वकालत करते हैं। दरअसल गे रिलेशन को सभ्यता,संस्कृति से न जोड़कर निजता से जोड़कर देखा जाए तो यह समस्या स्वतः समाप्त हो जायेगी। बाबा को भी यह नेक सलाह है कि अश्लीलता कैसे छुपे इसके बजाय अश्लीलता क्यों पैदा होती है,इस पर नजरें इनायत करें तो शायद ज्यादा बेहतर परिणाम हासिल होगें।
कौशलेन्द्र प्रताप यादव
लेखक परिचय
जन्म 4 जनवरी 1974। शिक्षा- इलाहाबाद विश्वविद्यालय। 1999 में पी.सी.एस. एलाइड में चयन। चयन से पूर्व मूलतः पत्रकार। सम्प्रति बिजनौर (उ.प्र.) जिले में तैनात। स्तम्भ लेखन एवं आकाशवाणी में वार्ताकार के रुप में सक्रिय। सामाजिक संस्था "ब्रेन वाश'' के माध्यम से सांप्रदायिकता और जातिगत संरचना पर चोट और उनका समाधान। हमेशा कट्टरपंथियों के निशाने पर। कहानी संग्रह ‘अछूत’ और ‘आल्हा-ऊदल और बुंदेलखण्ड की एक झलक’ शीघ्र प्रकाशित।संपर्कः आर.टी.ओ. चेक पोस्ट भागूवाला,बिजनौर,उ0प्र0।फोनः 09415167275./09452814256Mail: yadavkaushalendra@yahoo.in

आप कालू को जानते हैं ??

आप कालू को जानते हैं। ...अब आप कहेंगे कि वही कालू (कलुआ) जो ढाबे पर या अन्य किसी जगह बालश्रम की चक्की में पिस रहा है। आपका उत्तर गलत नहीं है, हम आज ऐसे ही एक कालू की बात करेंगे। कहते हैं प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। कमल कीचड़ में ही खिलता है। बिहार में मधेपुरा के मूढ़ो गाँव का कालू इसी तर्ज पर अब समाजसेवियों का अगुवा बन गया है। जर्मनी की संख्या ‘ब्रेड फार द वर्ल्ड‘ ने अपने 50वें स्थापना दिवस समारोह में कालू को न्यौता देकर बुलाया है। वहां मौजूद रहने वाले 50 देशों के समाजसेवियों से वह बालश्रम उन्मूलन के लिए सहयोग मांगेगा। कालू 4 जुलाई 2009 की रात नई दिल्ली से जर्मनी के लिए रवाना हो गया। ग्यारह साल पहले बचपन बचाओ आन्दोलन के अध्यक्ष कैलाश सत्यार्थी ने उसे वाराणसी के कालीन उद्योग से मुक्त कराया था। तभी से वह एक एक्टिविस्ट के रूप में बच्चों के लिए काम कर रहा है। अपनी दूसरी विदेश यात्रा पर जर्मनी गया कालू वहाँ भारत में बाल श्रम मिटाने के लिए सहयोग मागेगा। फिलहाल इस कार्यक्रम में भाग लेने वाला कालू भारत का इकलौता एक्टिविस्ट है। गौरतलब है कि कालू पांच साल पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से भी मिल चुका है !!

बुधवार, 1 जुलाई 2009

एक पत्रकार की इच्छाशक्ति ने बदली मुगल शासक के वंशज की जिंदगी

देश को आजादी प्राप्त किए एक लम्बा समय बीत गया पर अभी भी तमाम ऐसे वाकये देखने को मिलते हैं कि दंग रह जाएं। तमाम रजवाड़ों के वंशज आज उपेक्षित एवं गरीबी की हालत में जीवन जी रहे हैं। अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर की वंशज सुल्ताना बेगम के बारे में अक्सर अखबारों में पढ़ने को मिलता रहता है। वे पश्चिम बंगाल के हावड़ा जनपद में फोरशोर रोड के पास कावीज घाट बस्ती में चाय का स्टाल चलाती हैं। उनकी इस दुर्दशा पर कईयों ने कलम चलाई पर किया कुछ भी नहीं। फिलहाल एक पत्रकार सुल्ताना बेगम की मद्द के लिए सामने आया है और उन्हें बतौर मद्द दो लाख रूपए की राशि प्रदान की है।

वस्तुतः जर्नलिस्ट शिवनाथ झा ने अपनी पत्नी नीना के साथ मिलकर 14 प्राइम मिनिस्टर्स पर एक पुस्तक ’प्राइम मिनस्टर्स आॅफ इण्डियाः भारत भाग्य विधाता’ लिखी है। यह पुस्तक एक आन्दोलन है। शिवनाथ झा ने अपनी पत्नी नीना के साथ मिलकर ’आन्दोलन एक पुस्तक से’ चलाया है। इसके तहत हर एक साल पुस्तक प्रकाशित की जायेगी और इससे मिली राशि से भारत को गौरवान्वित करने वाले परिवारों के वंशजों को सम्मानित किया जाएगा। इसी क्रम में सुल्ताना बेगम को दो लाख रूपए की मद्द दी गई। अब इस राशि से सुल्ताना बेगम अपनी बेटी मधु की शादी भी कर सकेंगी।

आज समाज में जहाँ हर कोई बड़ी-बड़ी बातें करता है, वहाँ पर एक पत्रकार दम्पत्ति का यह अद्भुत अभियान उन तमाम राजनेताओं, प्रशासकों, समाजसेवकों एवं मीडियाकर्मियों को अद्भुत सीख है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति से लोगों का जीवन बदल सकता है।
राम शिव मूर्ति यादव

रविवार, 21 जून 2009

फादर्स-डे

आज समूचे विश्व में फादर्स-डे मनाया जा रहा है। जून माह के तीसरे रविवार को फादर्स डे के रूप में मनाया जाता है। विश्व भर में देश और भाषा भले ही अलग हों लेकिन पिता का ओहदा सब जगह ऊंचा है। विश्व में 130 भाषाओं में पिता के लिए अलग-अलग शब्द प्रयोग होते हैं। कुछ प्रमुख भाषाओं में पिता के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द इस प्रकार हैं:
हिंदी : पिता जी
संस्कृत : जनक
अफ्रीकन : वदर
अरब : अब्बी
बांग्लादेश : अब्बा
ब्राजील : पाई
डच : पापा, पानी
इंग्लिश : फादर, डैड, डैडी, पॉप
फ्रेंच : पापा
जर्मन : पपी
हंगेरियन : अपा
इंडोनेशिया : बापा, पैब
इटली : बब्बो
जापान : ओटोसान
लैटिन : पटर, अटटा
केन्या : बाबा
नेपाल : बुवा
पर्सियन : बाबा, पितर
पुर्तगाल : पाई
रशियन : पापा
स्पेनिश : टाटा
स्वीडिश : पप्पा
तुर्किश : बाबा

शुक्रवार, 19 जून 2009

समोसा हुआ 1000 साल का !!

समोसा भला किसे नहीं प्रिय होगा। समोसे का नाम आते ही दिल खुश हो जाता है और मुँह में पानी आ जाता है। विदेशियों के समक्ष भी भारतीय स्नैक्स की बात हो, तो समोसे के जिक्र के बिना बात अधूरी ही लगती है। यही कारण है कि जिस तरह भारतीयों में विदेशों से आए पिज्जा और बर्गर का क्रेज है, उसी प्रकार भारतीय समोसा भी विदेशों में फास्ट फूड के रूप में काफी प्रसिद्ध है। ऐसा कोई विरला ही दुर्भाग्यशाली व्यक्ति होगा जिसने समोसे का स्वाद न लिया हो। यहाँ तक कि फिल्मों और राजनीति में भी समोसे को लेकर तमाम जुमले हैं। लालू प्रसाद यादव को लेकर प्रचलित जुमला मशहूर है कि- ‘‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू।‘‘ फिल्मों और राजनीति से परे तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक गोष्ठियां, सरकारी आयोजन एवं कोई भी कार्यक्रम समोसे के बिना अधूरा है। ऐसे में इस स्टड डीप फ्राई समोसे का स्वाद छोटे-बड़े सभी लोगों की जुबां पर है, तो हैरान होने की जरूरत नहीं।

समोसे के बारे में सबसे रोचक तथ्य यह है कि इन महाशय की उम्र एक हजार साल हो चुकी है, पर अपने जवां अन्दाज से सभी को ललचाये रहते हैं। माना जाता है कि सर्वप्रथम दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में समोसा एक व्यंजन के रूप में सामने आया था। 13-14वीं शताब्दी में व्यापारियों के माध्यम से समोसा भारत पहुँचा। महान कवि अमीर खुसरो (1253-1325) ने एक जगह जिक्र किया है कि दिल्ली सल्तनत में उस दौरान स्टड मीट वाला घी में डीप फ्राई समोसा शाही परिवार के सदस्यों व अमीरों का प्रिय व्यंजन था। 14वीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आये इब्नबतूता ने मो0 बिन तुगलक के दरबार का वृतांत देते हुए लिखा कि दरबार में भोजन के दौरान मसालेदार मीट, मंूगफली और बादाम स्टफ करके तैयार किया गया लजीज समोसा परोसा गया, जिसे लोगों ने बड़े चाव से खाया। यही नहीं 16वीं शताब्दी के मुगलकालीन दस्तावेज आईने अकबरी में भी समोसे का जिक्र बकायदा मिलता है।

समोसे का यह सफर बड़ा निराला रहा है। समोसे की उम्र भले ही बढ़ती गई पर पिछले एक हजार साल में उसकी तिकोनी आकृति में जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ। आज समोसा भले ही शाकाहारी-मांसाहारी दोनों रूप में उपलब्ध है पर आलू के समोसों का कोई सानी नहीं है और यही सबसे ज्यादा पसंद भी किया जाता है। इसके बाद पनीर एवं मेवे वाले समोसे पसंद किये जाते हैं। अब तो मीठे समोसे भी बाजार में उपलब्ध हैं। समोसे का असली मजा तो उसे डीप फ्राई करने में है, पर पाश्चात्य देशों में जहाँ लोग कम तला-भुना पसंद करते हैं, वहां लोग इसे बेक करके खाना पसंद करते हैं। भारत विभिन्नताओं का देश है, सो हर प्रांत में समोसे के साथ वहाँ की खूबियाँ भी जुड़ती जाती हैं। उ0प्र0 व बिहार में आलू के समोसे खूब चलते हैं तो गोवा में मांसाहारी समोसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। पंजाबी समोसा खूब चटपटा होता है तो चाइनीज क्यूजीन पसंद करने वालों के लिए नूडल्स स्टड समोसे भी उपलब्ध हैं। बच्चों और बूढ़ों दोनों में समोसे के प्रति दीवानगी को भुनाने के लिए तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इसे फ्रोजेन फूड के रूप में भी बाजार में प्रस्तुत कर रही हैं।

तो आइये समोसा जी की 1000 वीं वर्षगाँठ मनाई जाय और ढेर सारे समोसे खाये जायें !!

मंगलवार, 16 जून 2009

चाहे बदले सारा ज़माना


जी हाँ,चाहे सारा जमाना बदल जाए..पर हम नहीं बदलेंगे...!आपने ठीक समझा मैं बी जे पी की ही बात कर रहा हूँ..!चुनाव में लुटिया डूब गई...पर अकड़ नहीं गई...!कोई हार की जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं है...!सब अपने अपने खेमे को मजबूत .करने..में लगे है..!हर कोई पार्टी में अपनी हसियत साबित करने पे तुला है..!होना तो ये चाहिए था की पार्टी अपनी हार स्वीकार करके आत्म मंथन करती...पर इसके उलट सब अपनी अपनी डफली बजाने .में..लगे है...!आडवानी जी शुरूआती ना नुकर के बाद फ़िर से पार्टी नेता बन गए है,जबकि उन्हें अब तक समझ जन चाहिए था की अब युवाओं की बारी है...!वे क्यूँ कुर्सी से चिपके रहना चाहते है...?बाकि नेता भी त्यागपत्र त्यागपत्र खेल रहे है....!अरे आप क्यूँ नहीं सामूहिक रूप से इस्तीफे दे देते ताकि .पार्टी नई टीम बना सके..!अब एक आधे त्यागपत्र से कुछ.. नहीं होने वाला,अब तो नई शुरुआत करनी होगी,नया चेहरा प्रस्तुत .करना होगा ..!आप क्यूँ नहीं कुछ करना..चाहते ,जबकि जनता ने आपको नकार दिया है...!अब भी समय है...पार्टी को एक बार फ़िर नए जोश और नए रूप के साथ आगे आना होगा...!आडवानी जी को जिद छोड़ कर युवा पीढ़ी को कमान सौपनी होगी...!द्वितीय पीढी के नेताओं को आगे लाना होगा...!इस में कोई बड़ी बात भी नहीं है ,क्यूंकि आगामी चुनावों से पहले काफ़ी समय है काया कल्प के लिए..!सिर्फ़ हिन्दुत्व और साम्प्रदायिकता के नारे को छोड़ नए नारे ..ढूँढने...... होगे,एक नया माडल पेश करना होगा...!क्या ये सब कुछ बी जे पी कर पायेगी?इसी पर उसका भविष्य टिका है....

गुरुवार, 11 जून 2009

क्यूँ बदल गया इंसान....


आज की इस भीड़ भाड़ वाली जिंदगी में हर आदमी व्यस्त है...!किसी के पास वक्त नहीं है ,हर कोई भागा जा रहा है..!लोग क्यूँ भाग रहे है?कहाँ जा रहे है?किसी को कुछ नही पता..!सड़क पार करने के लिए इंतजार करना पड़ता है ..!सड़क पर गाड़ियों का बहाव देख कर ऐसा लगता है जैसे पूरा शहर आज खाली हो जाएगा...!अस्पताल में देखो तो ऐसे लगता है जैसे पूरा शहर ही बीमार हो गया है !चारों और दर्द से कराहते लोग,रोते,चीखते लोग....लगता है जैसे दुनिया में दर्द ही बचा है...!रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर बहुत ज्यादा भीड़ है ,दम घुटने लगता है..!कभी मन बहलाने पार्क में चला जाऊँ तो लगता है ..सारा शहर मेरे .पीछे वहीँ आ गया है....!मैं अक्सर भीड़ देख कर चिंता में पड़ जाता हूँ....जब संसार में इतनी भीड़ है तो भी फ़िर इंसान अकेला क्यूँ है?अकेलापन अन्दर ही अन्दर क्यूँ ..खाने को आता है?आज इस भरी भीड़ में भी हमें कोई अपना सा क्यूँ नहीं लगता.....~!अभी कुछ समय पहले की तो बात है जब शहर जाते थे तो पूरा गाँव स्टेशन पर छोड़ने आता था ..बहुत होंसला होता था...लगता ही नहीं था की हम अकेले है...!फ़िर गाड़ी में भी लोग अपनत्व की बातें करते थे !कब शहर आ जाता था...महसूस ही नहीं होता था...!फ़िर .शहर में किराये के कमरे में रहते हुए कभी नहीं लगा की मैं बाहर रह रहा हूँ...!पूरा मोह्ह्ल्ला मेरे साथ था..सब लोगों के घर आना जाना था...!कोई .चाचा...... कोई ताऊ और कोई बाबा होते थे....जो अपनों से ज्यादा प्यार करते थे...!मैं भी भाग भाग कर सबके काम कर देता था....!स्कूल हो या कालेज सभी जगह कोई ...ना कोई जानकार मिल जाता था या बन जाता था........! कुल मिला कर बड़ी मस्ती से दिन निकल जाते थे ...! फ़िर अब इस शहर को क्या हो गया ?किसकी नज़र लग गई?क्यूँ सभी अजनबी से हो गए?अब किसी को देख कर क्यूँ मुंह फेरने लग गए ?इस भीड़ भाड़ वाली दुनिया में हम अकेले क्यूँ पड़ गए?अब दूसरो के दर्द में दर्द और खुशी में खुशी क्यूँ नहीं .महसूस...होती..?क्या .सच में इंसान बदल गया या रिश्ते बदल गए...?

बुधवार, 10 जून 2009

है कोई जवाब तो बताना .....!!

सुनो, खुद को सेकुलर कहने वालों !
कुकुरमुत्ते कभी सड़े खून पर नहीं उगते
पेड़ लाश लटकने के लिए पैदा नहीं होते
लोहा तलवार बनने के लिए नहीं होता
गुजरात हिंसा के लिए बना नहीं
मगर, क्या एक तरफा नजरिया नहीं तुम्हारा
जो घृणा में जन्मा उसने घृणा भोगा
उसमे प्रेम कहाँ सेकुलरों ?

एकतरफा नजरिया इसलिए कि
क्या दंगों में हिन्दू या मुस्लमान मारे जाते हैं ?
नहीं, दंगों में इंसान मारे जाते हैं.
क्या दंगों में भगवा ही लहराता हैं ?
क्यूँ तुम्हे हरा रंग नजर नही आता है ?
अपनी सेकुलर तहजीब का हवाला देने वाले देश में
मकबूल के नाम पर आर्ट गैलरी बनाया जाता है
पर पूछता हूँ , सलमान रुश्दी और तसलीमा को
क्यूँ गरियाया जाता है ?

है कोई जवाब तो बताना ................!!!

जयराम चौधरी , जामिया मिल्लिया इस्लामिया.M:09210907050

शुक्रवार, 5 जून 2009

पर्यावरण दिवस और हम



जी हाँ ,आज पर्यावरण दिवस है...!हमेशा की तरह ही बड़ी बड़ी बातें,भाषण और ढकोसले होंगे !और लो .हो गया..अपना दायित्व पूरा....!लेकिन यदि हम थोड़ा सा भी .संजीदा हो तो बहुत कुछ कर सकते है...!हमें अपने जीवन में छोटी छोटी बातों का ध्यान .रखना है..जैसे की एक पेड़ कम से कम जरुर लगाना है !अब ये बहाना की जगह नहीं है,छोड़ना होगा!अपनी पृथ्वी बहुत बड़ी है..आप कहीं पर भी ये शुभ कार्य कर सकते है...!इसके साथ ही जो पेड़ पहले से ही लगे हुए है उनकी रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है..!आज शहर कंक्रीट के जंगल बन गए है,लेकिन फ़िर भी यहाँ कुछ पार्क आदि अभी बचे है,जिन्हें हम सहेज सकते है..!इसके अलावा खुले स्थानों पर गन्दगी फैलाना,कचरा डालना और जलाना,प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग करना..,भूमिगत जल को गन्दा करना आदि अनेक ऐसे कार्य है जिन पर हम स्वत रोक लगा सकते है!लेकिन हम .ऐसा ना करके सरकार के कदम का इंतजार करते है...!आज हम ये छोटे किंतु महत्त्व पूरण कदम उठा कर पर्यावरण सरंक्षण में अपना .अमूल्य योगदान दे .सकते...है...

सोमवार, 1 जून 2009

घर बैठे हो सकेगा एचआईवी परीक्षण

युवा वर्ग एचआईवी संक्रमण को लेकर सदैव सशंकित रहता है। ऐसे में उसके लिए एक अच्छी ख़बर यह है कि एचआईवी संक्रमण का परीक्षण अब घर बैठे किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सिस्टम विकसित किया है, जिससे बिना प्रयोगशाला में जाए और कम दामों में एचआईवी संक्रमण का परीक्षण किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों का दावा है कि नए सिस्टम से सिर्फ 30 मिनट में मरीज यह जान सकेंगे कि वे एचआईवी विषाणु से संक्रमित तो नहीं हैं और इसके लिए प्रयोगशाला में जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने सीडी4 रेपिड परीक्षण सिस्टम का विकास किया है, जिससे व्यक्ति के रक्त में सीडी4प्लस टी कोशिकाओं की संख्या की गणना की जा सकेगी। यह कोशिकाएं शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं। एचआईवी संक्रमण के दौरान यह कोशिकाएं बड़ी संख्या में नष्ट होने लगती हैं, जिससे व्यक्ति आसानी से बीमारियों की चपेट में आ जाता है। शोध में कहा गया है कि बड़ी संख्या में एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त मरीज विकासशील देशों के ऐसे लोग हैं, जो प्रयोगशाला में किया जाने वाला महंगा सीडी4 परीक्षण नहीं करा पाते। वहीं इस परीक्षण का परिणाम आने में कई सप्ताह का समय लगता है, जिसके चलते ग्रामीण इलाकों के मरीजों के लिए यह प्रक्रिया आसान नहीं होती। नया सिस्टम इस परेशानी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।