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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

पूस का पाला

अभी कल की बात

मै था अस्सी घाट पर

मित्रो के साथ

पता चला बी एच यूं अ इ टी के

तिन छात्र डूब गए

हम सकते मै आ गए

पुरे घाट पर छात्रो और

अध्यापको की भीड़ भारी

किनारे पर बैठी उनके माएं बिचारी

रुदन से उनके वातावरण

गमगीन हो गया सारा

स्तब्ध गंगा को अपलक निहारता

पिता किस्मत का मारा

क्या क्या उम्मीदे थी उसे

की किस तरह बनेगे वे नौनिहाल

उनके बुदापे की लाठी ये लाल

पर बीच मै ही सफ़र जिंदगी का

छोड़ कर चले गए

न जाने किसके सहारे वे अपने

बूड़े माँ बाप को छोड़ गए

मन मेरा उद्वेलित हो गया

एकाएक आक्रोस से भर गया

की आखिर क्या समझते है

ये बच्चे अपने आपको

क्यों समझते नहीं

वो इस पापको

की क्या उनके माँ बाप ने

इसी दिन के लिए उन्हें पाला था

क्या अपने खाने का निवाला

इसीलिए पहले उन्ही के मुह में डाला था

तनिक भी अगर सोचे होते

बेजा मौज मस्ती से बचे होते

जिसे की होस्टल को चलते समय

बापू ने कम पर माँ ने बहुत

ज्यादा समझाया होगा

कितने अरमानो से आचार और मुरब्बे का

डब्बा थमाया होगा

और कितनी बलिया लेकर कहा होगा

बचवा जातां से रहियो

अपन ख्याल रखियो

मौज मस्ती के चक्कर मै

जीतेजी उनको मार डाला

इसके बूते वो सहेगे

अब पूस का पाला

क्या खूब ख्याल रखा उनका इन्होने

पाला था बारे अरमानो से उन्हें जिन्होंने

बुधवार, 29 सितंबर 2010

विचलित है मन

कृष्ण कराओ पुनः
अपने विराट स्वरुप का दर्शन
विचलित है मन
आसन्न एक परिवर्तन
गीता का भाष्य
पठनीय पाठ्य
पूरित परिपथ
निश्चित दर्शनीय
एक और अग्निपथ
पिटती परंपराओं की लकीरें
क्या खोल पायेगी
उन शहीदों की तकदीरें
जिन्होंने सहर्ष
किया था जीवन अर्पण
उनकी विधवाएं मांजती
आज इन नेताओं के घर बर्तन
बच्चे जिनके चाटते
इनके आज जूठन
सरकारी अनुदानों हेतु
लगाते चक्कर
खाते टक्कर पे टक्कर
भूखे भेड़ियों का बन गयी शिकार
अस्मत हो गई तार -तार
बिक गए घर-द्वार
आज भी जोहती निराला की वह तोड़ती पत्थर
अपना पालनहार !!

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

हिंदी दिवस

हिंदी दिवस की
एक और उत्सव
पूछता पुनः एक बार अपना भावार्थ
विस्मृत युगबोध का यथार्थ
कल्पित
स्तित्वाहिनता का आभास
निरंतर प्रसरित पावन प्रकाश
लक्षित
एक पुनर्जागरण
याकि करना वैराग्य का वरण
जागृत
चेतना की शिखार्यात्रा
यदि हो विवेक की लाघुमात्र
अलाम्बित एक नूतन प्रभात
विलंबित
राग्यमिनी से गुजित
धवल आकाश
होगी रंगीन पुनः
सुरमई शाम
चमकेगा छितिज पर
आर्यावर्त का क्या नाम
याकि छिरेगी
एक और बहस
es यथार्थ पर
सत्य से दूर
मद से चूर
प्रारंभ होगी
एक और नई
यात्रा अंतहीन
pidit दिन और मलिन



सोमवार, 27 सितंबर 2010

आज भी धन्नी नहीं बिक सका

लेबरो की मंडी में
सुबह से शाम हो गयी
दिन तक़रीबन ढल गयी
पर आज भी धन्नी नहीं बिका
एक भी पैसा नहीं वो कमा सका
सामने मुनिया का
बुखार से तपता चेहरा हूम रहा था
जिससे सुबह hi उसने कहा था
आज वो जरुर दावा लेकर आयेगा
और पपू की फ़ीस भी दे पायेगा
ताकि वो पढ़ कर बड़ा आदमी बनेगा
हमरे दुखो को वो हारेगा
सोचते सोचते उसकी अखे भर आई
wah रे किस्मत की माई
काम के तलश में साथ लायी
रोटिय भी सुख चुकी थी
शाम एकदम ढल चुकी थी
थका हरा वो चल pada घर की और
तन में तनिक भी नहीं था जोर
सूखे pero की माफिक वो
रस्ते से बेखबर चला जा रहा था
उधर से एक ट्रक तेजी से आ रहा था
उसने समाप्त कर दिया धन्नी का जीवन
उसके बच्चो को कर गया
अनाथ आजीवन

शनिवार, 25 सितंबर 2010

माँ की गोद

एक दिन माँ की गोद में

रख कर सर

मैं सो रहा था बाखबर

नीद के आगोश में

हो गया था तन
कल से ही था बेचन ये मन

माँ गुनगुना रही थी प्यारी लोरियां

मेरे सर पे घुमाती अपनी बहिया

एकाएक माँ के लोरियों में से

दर्द की आवाज आई

मैंने कहा क्या हुआ माई

उसने कहा कुछ नहीं बेटा

शायद किसी का है तोता

तभी मने देखा गोद दस निचे से

रक्त की धर

मई हो गया bajar

सोचा वह रे माँ

कैसी है तुम्हारी दुनिया

पर आज के बेटे क्या समझेगे

की क्या होती है पुरनिया

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

सृजनात्मक लेखन कार्यशाला हेतु ब्लॉगरों से प्रविष्टि आमंत्रित

रायपुर । रचनाकारों की संस्था, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा देश के उभरते हुए कवियों/लेखकों/निबंधकारों/कथाकारों/लघुकथाकारों/ब्लॉगरों को देश के विशिष्ट और वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा साहित्य के मूलभूत सिद्धातों, विधागत विशेषताओं, परंपरा, विकास और समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक तथा उनके रचनाधर्मिता से तादात्मय स्थापित कराने के लिए अ.भा.त्रिदिवसीय (13, 14, 15 नवंबर, 2010) सृजनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन बिलासपुर में किया जा रहा है । इस अखिल भारतीय स्तर के कार्यशाला में देश के 75 नवोदित/युवा रचनाकारों को सम्मिलित किया जायेगा ।


संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-
प्रतिभागियों को 20 अक्टूबर, 2010 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा । पंजीयन फ़ार्म संलग्न है ।
प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।
प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 40 वर्ष से अधिक ना हो ।
प्रतिभागियों में 5 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।
प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।
प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।
कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।
प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं ।
प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था संस्थान द्वारा किया जायेगा ।
प्रतिभागियों को कार्यशाला में संदर्भ सामग्री दी जायेगी ।
प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।
प्रतिभागियों को 12 नवंबर, 2010 शाम 5 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल - बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा । पंजीकृत/चयनित प्रतिभागी लेखकों को कार्यशाला स्थल (होटल) की जानकारी, संपर्क सूत्र आदि की सम्यक जानकारी पंजीयन पश्चात दी जायेगी ।
प्रस्तावित/संभावित विषय एवं विशेषज्ञ लेखक
दिनाँक 13 नवंबर, 2010
रचना की दुनिया – दुनिया की रचना – श्री चंद्रकांत देवताले – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी – प्रभाकर श्रोत्रिय
रचना में यथार्थ और कल्पना – श्री राजेन्द्र यादव – नीलाभ – केदारनाथ सिंह
रचना और प्रजातंत्र – श्री अखिलेश – रघुवंशमणि – परमानंद श्रीवास्तव
रचना और भारतीयता – श्री नंदकिशोर आचार्य – श्री अरविंद त्रिपाठी – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
रचना : महिला, दलित और आदिवासी –– सुश्री अनामिका - कात्यायनी - मोहनदास नैमिशारण्य
रचना और मनुष्यता के नये संकट - श्री विनोद शाही- श्रीप्रकाश मिश्र – सीताकांत महापात्र
दिनाँक 14 नवंबर, 2010
रचना और संप्रेषण – श्री कृष्ण मोहन – ज्योतिष जोशी – मधुरेश
शब्द, समय और संवेदना – श्री नंद भारद्वाज - श्रीभगवान सिंह – ए.अरविंदाक्षन
कविता की अद्यतन यात्रा – श्री वीरेन्द्र डंगवाल – ओम भारती - अशोक बाजपेयी
कविता - छंद और लय – श्री दिनेश शुक्ल – राजेन्द्र गौतम – डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
कैसा गीत कैसे पाठक ? - श्री राजगोपाल सिंह – यश मालवीय – माहेश्वर तिवारी
कहानी-विषयवस्तु, भाषा, शिल्प – श्री शशांक – डॉ. परदेशीराम वर्मा – गोविन्द मिश्र
दिनाँक 15 नवंबर, 2010
कहानी की पहचान – सुश्री उर्मिला शिरीष - सूरज प्रकाश – सतीश जायसवाल

लघुकथा क्या ? लघुकथा क्या नहीं ? – श्री अशोक भाटिया – फ़ज़ल इमाम मल्लिक - बलराम
आलोचना क्यों, आलोचना कैसी? श्री शंभुनाथ – डॉ. रोहिताश्व - विजय बहादुर सिंह
ललित निबंध : कितना ललित-कितना निबंध – श्री नर्मदा प्रसाद उपा.-अष्टभुजा शुक्ल – डॉ.श्रीराम परिहार
(अंतिम नाम निर्धारण स्वीकृति/अस्वीकृति उपरांत)

संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664
बिलासपुर
श्री सुरेन्द्र वर्मा, मो.-94255-70751
श्री राजेश सोंथलिया, 9893048220
पंजीयन हेतु आवेदन पत्र फार्म नमूना
01. नाम -
02. जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03. शैक्षणिक योग्यता –
04. वर्तमान व्यवसाय -
05. प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06. प्रकाशित कृति का नाम –
07. ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08. अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09. पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता (ई-मेल सहित) –
हस्ताक्षर

(जयप्रकाश मानस द्वारा प्रेषित प्रेस-विज्ञप्ति)

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

हिंदी दिवस पर एक सन्देश...

आज हिंदी दिवस है. अपने देश में हिंदी की क्या स्थिति है, यह किसी से छुपा नहीं है. हिंदी को लेकर तमाम कवायदें हो रही हैं, पर हिंदी के नाम पर खाना-पूर्ति ज्यादा हो रही है. जरुरत है हम हिंदी को लेकर संजीदगी से सोचें और तभी हिंदी पल्लवित-पुष्पित हो सकेगी...! ''हिंदी-दिवस'' की बधाइयाँ !!

रविवार, 12 सितंबर 2010

अंध विश्वाश और उसका प्रचार

आज धर्म के नाम पर कुछ धर्म के कथित ठेकेदार अन्धविसवासी प्रवृति को नये-नये कलेवर में बढ़ावा दे रहे हैं। परिणाम स्वरूप अंधविश्वास से ओत प्रोत व्यक्ति धर्म के कथित ठेकेदारों द्वारा प्रस्तुत घटनाओं अथवा कथनों पर स्व-विवेक से काम न लेकर सुझायी गयी बातों पर पूर्ण विश्वास कर लेते हैं। वे कथित सुझायी गयी बातों पर तनिक भी विचार नही करते कि उक्त के अनुपालन में उनका वांछित लाभ होगा अथवा नुकसान। वे तो बस अपने कथित ”गुरू अथवा महाराज “ की बातों से प्रभावित होकर श्वयम के द्वारा ही उत्पन्न की गयी मुसीबतों/ समस्याओं से बचने के लिए सुझाये गये रास्ते पर चल पड़ते हैं। उन्हें पूर्ण विश्वास होता है कि उक्त सुझाये गये पथ पर ही उन्हें वाछित लाभ होगा अन्यथा उन्हें कठोर यातना सहनी होगी।ऎसी ही प्रवृति से ग्रसित व्यक्ति की क्रिया कलापों के परिणाम स्वरूप मेरे घर के दरवाजे पर करीब 10-12 पर्चे ड़ाले गये जो दरवाजे पर नाली की तरफ बिखरे हुए पाये गये। कौतुहल वश मैंने उन्हें उठाकर पढ़ा। उक्त पर्चों पर मजमून कुछ इस प्रकार था तथा पर्चे के बीच में श्री सांई बाबा की तस्वीर भी छापी गयी थी।सांई बाबा का अद्भुत चमत्कारमद्रास शहर के पास सांई बाबा के मंदिर में एक भयानक दृष्य देखा गया, उस मंदिर मेें पुजारी पूजा कर रहा था । अचानक एक सर्प निकला उसे देखकर पुजारी डर गया। सर्प कन्या के रूप में आकर बोली डरने की कोई बात नही, जो कहती हूँ ध्यान से सुनो। मैं थोड़े दिन में पृथ्वी पर अवतार लूगीं जो धर्म का नास करते हैं उसका नास करूगीं। जो मेरे नाम का 100 पर्चे छपवाकर बांटेगा, 24 दिनों के अन्दर मेैं उसकी मनोकामना पूर्ण करूगीं,जो आज कल करके 24 दिन बितायेगा, उसका बड़ा नुकसान होगा।इतना कहकर सर्प रूपी कन्या 2 फुट पीछे हटकर अन्र्तध्यान हो गयी। यह खबर सुनकर मुम्बई के एक आदमी ने 2000 पर्चे छपवाकर बांटे तो उसे 51 लाख रूपय की लाटरी निकली। धनबाद के एक रिक्षा चालक ने 6000 पर्चे बांटे तो उसे आठ दिन में हीरों से भरा कलष मिला। एक बेरोजगार लड़का पर्चे छपवाने की सोच रहा था कि उसकी नौकरी लग गयी । उसने 1000 पर्चा छपवाकर बांटा।एक आदमी ने उसे झूठा समझकर फाड़ दिया तो उसका लड़का मर गया। आगरा के बाबू लाल गुप्ता को पर्चा मिला तो उसने सोचने में ही एक महीना बिता दिया, उसे ब्यापार में काफी नुकसान हुआ और उसकी पत्नी मर गयी। यह सुनकर बानतला गाँव के 5 भाईयों ने 1200 पर्चा बांटा तो एक घंटे के अन्दर 15 लाख की लाटरी मिली और उन्होने एक मंदिर बनवाने की सोची।।। जय सांई बाबा की जय ।।इस पर्चे को पढ़ने पर छापे गये तथ्यों के सार को इस प्रकार विश्लेशित किया जा सकता है। - क्या घटना का उल्लेख करने वाला व्यक्ति घटनाओं की पूरी जानकारी रखता है ?- क्या उसके द्वारा घटनाओं की सत्यता की पुश्टि की गयी है ? - जब उस सर्प कन्या द्वारा मात्र 100 पर्चे ही छपवाने पर मनोकामना पूर्ण करने का आष्वासन दिया गया था तो उल्लिखित व्यक्तियों ने क्रमशः 2000, 6000,1000 एवं 1200 पर्चे क्यों छपवाये ?- पर्चे छपवाने वालों को क्रमशः 51 लाख रूपये की लाटरी, हीरों से भरा कलश, एक बेरोजगार को नौकरी तथा पांच भाईयों को 15 लाख रूपये की लाटरी का लाभ मिला। उक्त की पुष्टि क्या निवेदक द्वारा की गयी ?- निवेदक को क्या लाभ मिला इसका उल्लेख क्यों नही किया गया ?- पर्चा झूठा समझकर फाड़ने वाले का लड़का मर गया। क्या सांई बाबा इतने कठोर हृदय के हैं कि पर्चे न छपवाने पर वे किसी की जान भी ले सकते हैं ? जबकि मेरे संज्ञान के अनुसार श्री सांई बाबा बहुत ही उदार एवं सहज प्रवृति के तथा सर्व जन कल्याण की कामना रखने वाले सात्विक विचारों और सभी धर्माें को मानने वाले अवतारिक सख्शियत देव पुरूष थे, जो आज भी चमत्कारिक रूप से सर्व जन कल्याण कर रहे हैं। ऐसे पर्चे छपवाकर निवेदक समाज को क्या सन्देश देना चाहता है, यह पूर्णतयः स्पश्ट है। यह संदेश लोगों मेंअंधविश्वास फैलाकर जन सामान्य की धार्मिक आस्था को चोट पहुँचाकर उसे तनाव ग्रस्त करने का ही मंतव्य रखता है। पर्चे पर मुद्रक का नाम त्रिवेदी प्रिन्टर्स छपा है तथा मोबाइल नंबर भी दिया गया है-9889923509. इस नंबर पर संपर्क करने पर कोई बात ही नही हो पाती है।
एस. आर. भारती

शनिवार, 11 सितंबर 2010

नशे में डूबा युवा वर्ग...


भारतीय समाज हमेशा से ही पूरे विश्व के लिए एक आदर्श और कौतुहल रहा है !सयुइंक्त परिवार में रहने वाले बच्चे बहुत ही संस्कारशील होते है !इसी करण हमारे युवा काफी समय तक कुरीतियों से दूर रहे और अपने आप को नशे से बचाए रखा....परन्तु अब ऐसा नही रहा!सयुंक्त परिवार टूटने लगे है..बच्चे पढने और करियर बनाने बड़े शहरों में जाने लगे है !इन महानगरों में वे अपना सामजस्य नही बना सके,यहाँ की व्यस्त जीवन शैली ने उन्हें तोड़ के रख दिया!
ऐसे में वे विभिन्न प्रकार के नशों के जाल में उलझ कर रह गए !अनुभव की कमी और पहले के कड़े अनुशासन में रहे ये युवा अब अचानक आज़ाद हो गए!शहर की एकल जीवन शैली ने भी इन्हें बढ़ावा दिया जिसके चलते ये नशे की गिरफ्त में फंसते चले गए !अपने व्यस्त कार्यालय समय के बाद वे नशे को ही आराम समझने लगे !आज का युवा परम्परागत नशे नही करता...क्यूंकि शराब बीयर आदि की महक इनकी पोल खोल देती है,इसलिए इन्होने नए नशे तलाश लिए जो आसानी से उपलब्ध है और जिनके सेवन का किसी को पता भी नही चलता....जैसे-आयोडेक्स ,विक्स वेपोरब,व्हाइटनर,दीवारों के पेंट और कफ सिरप! ये नशे हर जगह और कम कीमत में मिल जाते है !इसके बाद नंबर आता है  दुकानों पर मिलने वाली विभिन्न टेबलेट्स जो कई नामों से बेचीं जाती है !ये गोलियां बिना डाक्टर की पर्ची के सब जगह मिल जाती है !केमिस्ट भी कभी तनाव दूर करने तो कभी एकाग्रता बढ़ने के नाम पर इन्हें बेचते है !मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले अधिकांश बच्चे इन्हें इस्तेमाल करते है !

इन छोटे मोटे नशों को करते करते ये नशे की उस अंधी दुनिया में पहुँच जाते है जहाँ से वापिस आना नामुमकिन है !शहर वसे दूर फार्म हॉउस में होने वाली रेव और कोकटेल पार्टियाँ इनकी मनपसंद जगह बन जाती है !शौक शौक में शुरू हुआ ये खेल अब इनकी आदत बन जाता है !नशे का बढ़ता प्रभाव आखिर एक दिन जान लेकर छोड़ता है !
इन सब से बचने का एकमात्र रास्ता है बच्चों को शुरू से ही नशे के दुष्प्रभाव बताये जाएँ ,टी वी पर नशे से सम्बंधित दृश्य और विज्ञापन प्रतिबंधित किये जाएँ !लगभग सभी शराब कम्पनियां सोडे के नाम पर शराब बेचती है !स्कूलों और कालेज में नशों की जानकारी के बारे में शिक्षा दी जाए तथा जरूरत पड़ने पर नशा मुक्ति केंद्र की भी व्यवस्था हो.......वरना युवाओं को नशे से बचाना मुश्किल हो जायेगा.....!

सोमवार, 6 सितंबर 2010

अरुणेश मिश्र
संपादक की ओर से
सब जन कहत कागज की लेखी । हम हैँ कहत आँखिन की देखी - महान संत कवि कबीर दास का यह कथन हमारा आदर्श है ।इस साइट को प्रारम्भ करने का उद्देश्य साहित्य . संस्कृति . कला . विज्ञान और अन्यान्य विधाओं के साम्प्रतिक रूप से पाठकों को अवगत कराना ही नही अपितु उनकी साझेदारी भी सुनिश्चित कराना है ।इन्कलाब एक खुला मंच है . इसमे प्रत्येक विधा और क्षेत्र के रचनाधर्मियों एवं समीक्षकों के लेखकीय सहयोग का स्वागत है । यह हमारा . आपका , सबका मंच है - जो जहाँ . जैसा . जिस तरह है . प्रस्तुत करने के लिए . और अच्छा बनाने के लिए ।

इन्कलाब.कॉम
inqlaab.com

ईश्वर कहाँ मिलेगा... (कविता : एस. आर. भारती)

देखा है लोगो को
मन्दिर, मस्जिद ,गुरूद्वारे एवं गिरजाघर में
"ईश्वर"को खोजते हुए,
मन्नतों के लिए दर-दर भटकते हुए
वे जानते हैं कि "ईश्वर" वहाँ नहीं मिलेगा
’फिर व्यर्थ क्यों खोजते हैं तुष्टि के लिए’
एक यक्ष प्रश्न ने सिर उठाया
फिर ”ईश्वर“ कहाँ मिलेगा ’
सोचते-सोचते चिन्तन आगोश में खो गया
अचानक अन्र्तमन के पट पर
चलचित्र की तरह कुछ पात्र उभरे
मन ने माना कि ये ही ”ईश्वर“ के रूप हैं
किसान ,माँ ,डाक्टर ,
गिरते को उठाने वाला ,
मरते को बचाने वाला ,
सबकी प्यास बुझाने वाला ,
सबकी भूख मिटाने वाला ,
भटके को राह दिखाने वाला ,
बिछडे़ को मिलवाने वाला ,
गुणगान योग्य है ऐसा गुणवान
यही सुपात्र की नजर में ”भगवान“ है ।

रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षक दिवस की बधाइयाँ


डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्ण के जन्म-दिवस एवं शिक्षक दिवस की आप सभी को हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें !!

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

गाँधी जी पर आधारित हिन्दी फिल्म का शुभारम्भ पोर्टब्लेयर में

आइलैंड फिल्म प्रोडक्शन के द्वारा गाँधी जी पर आधारित एक हिन्दी फिल्म का शुभारम्भ पोर्टब्लेयर में हुआ। फिल्म की कथा, निर्माण एवं निर्देशन नरेश चन्द्र लाल द्वारा किया जा रहा है। कई राष्ट्रीय पुरस्कारों के विजेता श्री लाल की अंडमान आधारित ‘अमृत जल‘ फिल्म चर्चा में रही है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक एवं चर्चित साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने मुहुर्त क्लैप शाॅट देकर फिल्म का शुभारंभ किया। फिल्म सेंसर बोर्ड, कोलकाता रीजन के सदस्य नंद किशोर सिंह ने मुहुर्त नारियल तोड़ा। इस अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि-” गाँधी जी की प्रासंगिकता सदैव बनी रहेगी और अपने विचारों के कारण वे सदैव जिंदा रहेंगे। काला-पानी कहे जाने वाले अंडमान के द्वीपों में वे भले ही कभी नहीं आएं हों, पर द्वीप-समूहों ने भावनात्मक स्तर पर उन्हें अपने करीब महसूस किया है। जाति-धर्म-भाषा क्षेत्र की सीमाओं से परे जिस तरह द्वीपवासी अपने में एक ‘लघु भारत ‘ का एहसास कराते हैं, वह गाँधी जी के सपनों के करीब है।“ श्री यादव ने फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के अंडमान से लगाव पर प्रशंसा जाहिर की और आशा व्यक्त की कि ऐसी फिल्में द्वीप-समूहों की ऐतिहासिकता, प्राकृतिक सुन्दरता के साथ-साथ सेलुलर जेल जैसे क्रांति-तीर्थ स्थलों को बढ़ावा देने में भी सफल हांेगी।गौरतलब है कि इस फिल्म में बालीवुड के जाने-माने चेहरे मुकुल नाग, अनुकमल, राजेश जैश, मुम्बई फिल्म उद्योग के मनोज कुमार यादव के अलावा स्थानीय कलाकार गीतांजलि आचार्य, कृष्ण कुमार विश्वेन्द्र, रविन्दर राव, डी0पी0 सिंह, ननकौड़ी के रशीद, पर्सी आयरिश मेयर्श तथा पोर्टब्लेयर महात्मा गाँधी स्कूल के चार बच्चे इस फिल्म में काम करेंगे।

निर्देशक नरेश चंद्र लाल ने बताया कि सेलुलर जेल के बाद महाराष्ट्र के वर्धा स्थित गाँधी आश्रम सेवा ग्राम में भी इस फिल्म की शूटिंग होगी और यह फिल्म दिसम्बर, 2010 में रिलीज होगी।

नरेश चन्द्र लाल, निदेशक - अंडमान पीपुल थिएटर एसोसिएशन, पोर्टब्लेयर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

बुधवार, 1 सितंबर 2010

अब टचस्क्रीन 3डी टीवी ...

जापान के शोधकर्ताओं ने दुनिया का पहला टचस्क्रीन 3डी टीवी बनाने का दावा किया है। इस टीवी में अव्वल तो तस्वीरें एकदम जीवंत होंगी, साथ ही दर्शक इन्हें छूकर इनके होने का अहसास कर सकेंगे।नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड इंडस्ट्रियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में वरिष्ठ वैज्ञानिक नोरियो नाकामुरा ने बताया केक की तस्वीर को छूने पर आपको इसके चिपचिपेपन का अहसास होगा। वेबसाइट फायसोर्ग के अनुसार, ऐसे टीवी के व्यावसायिक उत्पादन की फिलहाल योजना नहीं है। इसे साइंस के क्षेत्र में उपयोग किया जाएगा, जहां सर्जन ऑपरेशन से पहले प्रक्रिया का इसके जरिए अभ्यास कर सकेंगे।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें



रक्षाबंधन पर्व बहन की, समाज की, राष्ट्र की रक्षा हेतु बंधन से जुड़ने का प्रतीक त्यौहार है. यह धार्मिक स्वाध्याय के प्रचार का, विद्या विस्तार का पर्व भी है इस दिन यज्ञोपवीत बदला जाता है और द्विजत्व को धारण किया जाता है, वेद मंत्रों से मंत्रित किया जाता है. नारी जाति पर कोई कष्ट न आए, इसके लिये संकल्पित होने, संस्कृति की शालीनता को बचाए रखने हेतु संकल्पबद्ध होने का भी यह अनूठा पर्व है. इस पर्व को इसकी मूल भावना के साथ मनाएं... !! रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें !!

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

सेलुलर जेल भी पहुँची क्वींस बैटन रिले

भारत इस वर्ष 19 वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन कर रहा है। परंपरानुसार इसकी शुरूआत 29 अक्तूबर, 2009 को बकिंघम पैलेस, लंदन में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को क्वीन्स बैटन हस्तांतरित करके हुई। इसके बाद ओलम्पिक एयर राइफल चैंपियन, अभिनव बिंद्रा ने क्वीन विक्टोरिया माॅन्युमेंट के चारों ओर रिले करते हुए क्वीन्स बैटन की यात्रा शुरू की। क्वीन्स बैटन सभी 71 राष्ट्रमंडल देशों में घूमने के बाद 25 जून, 2010 को पाकिस्तान से बाघा बार्डर द्वारा भारत में पहुँच गई और उसे पूरे देश में 100 दिनों तक घुमाया जाएगा। इस बीच यह जिस भी शहर से गुजर रही है, वहाँ इसका रंगारंग कार्यक्रमों द्वारा स्वागत किया जा रहा है। गौरतलब है कि आस्ट्रेलिया के बाद भारत दूसरा देश है, जहाँ इसके सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में बैटन रिले ले जाया जा रहा है.

19 अगस्त 2010 को राष्ट्रमंडल खेलों की क्वींस बैटन रिले भारत के दक्षिणतम क्षोर अण्डमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में भी चेन्नई से पहुंची, जहाँ सवेरे 7.45 बजे पोर्टब्लेयर हवाई अड्डे पर बैटन रिले का भव्य स्वागत किया गया. रिले औपचारिक रूप से शाम को 3 बजे ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल परिसर से आरंभ हुई, जहाँ उपराज्यपाल (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) भूपेंद्र सिंह द्वारा इसका शुभारम्भ किया गया. सेलुलर जेल में बैटन का आगमन एक तरह से उन तमाम क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि भी थी, जिन्होंने इन्हीं चहारदीवारियों में रहकर आजाद भारत और उसकी तरक्की का सपना देखा था. अंडमान-निकोबार ओलम्पिक असोसिअशन के अध्यक्ष जी. भास्कर ने राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अतिरिक्त महानिदेशक (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) राज कड़ियान से क्वींस बैटन को प्राप्त कर इसे उपराज्यपाल को सौंपा और इसी के साथ विश्व-प्रसिद्ध ऐतिहासिक सेलुलर जेल और यहाँ एकत्र तमाम सैन्य व सिविल अधिकारी, खिलाडी और गणमान्य नागरिक इस पल के जीवंत गवाह बने. उपराज्यपाल ने प्रतीकात्मक रूप से कुछ देर दौड़ लगाकर इसे प्रथम धावक के रूप में मुख्य सचिव विवेक रे को सौंपा और फिर तो बढ़ते क़दमों के साथ कड़ियाँ जुडती ही गईं. वाकई इसे नजदीक से देखना एक सुखद अनुभव था. राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल से शुरू होकर क्वींस बैटन रिले पोर्टब्लेयर के विभिन्न प्रमुख भागों - घंटाघर, माडल स्कूल, बंगाली क्लब, गोलघर, दिलानिपुर, फिनिक्स बे, लाइट हाउस सिनेमा, गाँधी प्रतिमा, अबरदीन बाजार, घंटाघर से होते हुए ऐतिहासिक नेताजी स्टेडियम पहुँचकर सम्पन्न हुई, जहाँ सांसद श्री विष्णुपद राय ने क्वींस बैटन को प्राप्त कर सक्षम अधिकारियों को सौंपा. इस शानदार अवसर पर बैटन रिले को यादगार बनाने के लिए जहाँ प्रमुख स्थलों पर तोरण द्वार स्थापित किये गए, वहीँ पोर्टब्लेयर के डा0 बी. आर. अम्बेडकर सभागार में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया . यही नहीं अबर्दीन जेटी और रास द्वीपों के बीच जहाजों को रोशनियों से सजाया भी गया और पूरा पोर्टब्लेयर मानो रंगायमान हो उठा. रिले के दौरान भारी संख्या में स्कूली विद्यार्थी और नागरिक जन इसका स्वागत करते दिखे. रिले के दौरान द्वीपों के राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त खिलाड़ियों और अधिकारीयों के अलावा करीब 30 लोग बैटन धारक के रूप में इसे लेकर आगे बढ़ते रहे. पोर्टब्लेयर में क्वींस बैटन रिले का आगमन भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाता है, क्योंकि यहाँ देश के प्राय: सभी प्रान्तों के लोग बसे हुए हैं और इसका लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया. इसे नजदीक से देखना वाकई एक यादगार अनुभव रहा. क्वींस बैटन रिले के इस परिभ्रमण के साथ ही द्वीपवासियों और देशवासियों की शुभकामनायें भी इससे जुडती जा रही हैं और आशा की जानी चाहिए की 3 अक्तूबर, 2010 से दिल्ली में आरंभ होने वाले कामनवेल्थ गेम्स भी ऐतिहासिक होंगें और विश्व-पटल पर भारत को एक नई पहचान देंगें !!

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

कृष्ण कुमार यादव जी को जन्मदिन पर हार्दिक बधाई

कृष्ण कुमार यादव सर को उनके जन्मदिन 10 अगस्त पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें. आप एक अच्छे प्रशासक और साहित्यकार के साथ-साथ अच्छे व्यक्ति भी हैं, आपका सान्निध्य हम सब को प्राप्त है. आपके सान्निध्य में हम लोगों को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ है. आपके जन्मदिन पर आपके सुखी, समृद्ध एवं यशस्वी जीवन की कामना करते हैं.

रविवार, 1 अगस्त 2010

फ्रैंडशिप-डे....ये दोस्ती

****फ्रैंडशिप-डे के अवसर पर बहुत-बहुत बधाइयाँ। इस दिवस के बारे में ज्यादा जानकारी
उत्सव के रंग पर देख सकते हैं. ****

शनिवार, 31 जुलाई 2010

अग्नि मान

ये कापुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे ,
नारी जीवन को कबतक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे


पुरुष और लड़कियों की मानसिकता में बहुत अंतर होता है ! पुरुष अपनी भड़ास को औरतो पर चिल्ला कर निकाल लेता है! क्योंकि उसका काम है औरत के विचारो को दबाना ! पर एक लड़की अपनी सारी भड़ास अपने अन्तःकरण में समा लेती है, और अग्नि की तरह जलती रहती है ! हो सकता है सारे लोग इस विचार से इतफ़ाक रखते हो। पर यदि यह मत गलत होता तो आज के परिवेश में महिला आत्महत्या दर निरन्तर नहीं बढ़ता। आंकड़ों का सत्य कहता है महिला आत्महत्या दर पुरषों की अपेक्षा 10 गुना अधिक है ! यदि आंकड़ों पर द्रष्टि डालें तो देखेंगे की बहार काम करने वाली लड़कियां जो आत्मनिर्भर हैं तथा समाज में उनका अपना मुकाम है और वो अपने जीवन के सारे फैसले स्वयं ले सकती हैं! इसके बावजूद भी उन महिलाओं की आत्महत्या दर अधिक है चाहे वो आम लड़की हो या सेलेब्रिटी जब उन्हें प्यार में धोखा मिलता है तो वो धोखे का आघात बर्दाश्त नही कर पाती है ! तब वे अपने जीवन को समाप्त करना ही एक आसान रास्ता मानती है ! अभी हाल ही में प्रसिद्ध माडॅल विवेका बाबा ने आत्महत्या कर ली , कारण अपने प्रेमी का धोखा और तिरस्कार बर्दाश्त नही कर सकी तो उन्होंने आत्महत्या कर ली वाही मिसइण्डिया रही नफीसा जोसेफ ने भी अपने प्रेमी से धोखा खाकर कुछ समय पूर्व आत्महत्या कर ली थी। ऐसे ही यदि आंकड़ों पे दृष्टि डालें तो देखेंगे की रोजाना कोई न कोई लड़की प्रेम में आघात पाकर अपनी जीवन लीला समाप्त करती जा रही है ! मनोविज्ञानिको का मत्त है ‘आज के परिवेश में जहाँ लोगों को अपने जीवन निर्वहन के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ रहा है घर और बाहर अत्यंत मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है वही प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनीय होता है और उनके लिए जीवन समाप्त करना एक आसान उपाय लोगों को दिखता है ’ चाहे कोई औरत पूरी तरह स्वतंत्र या आत्मनिर्भर क्यों न हो प्यार का धोखा उसके लिए असहनीय होता है क्योकि स्त्रियों में संवेदनशीलता एवेम भावुकता अधिक होती है। पुरुषमानसिकता स्त्रियों की मानसिकता से बिलकुल विपरीत होती है! पुरुष का आकर्षण स्त्रियों के शारीरिक सौन्दर्य पर केन्द्रति होता है ! उसका प्रेम शरीर से शुरू होकर उसी शरीर पे समाप्त हो जाता है और वो आसानी से एक को छोड़ कर दूसरे से जुड़ जाता है! उसके लिए प्रेम प्यार की बातें आम होती हैृ! परन्तु एक लड़की किसी भी पुरुष से आत्मा तथा मन से जुडती है और जब उसे आत्मिक आघात होता है , तो वो अघात उसके लिए असहनीय होता है और तब उसके सामने सबसे आसान विकल्प बचता है अपनी जीवन लीला को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर दें ! स्त्री मानसिकता मतलब समय से पहले अपने आप को उम्र से बड़ा मान लेना ! इसका बड़ा कारण ईश्वरी बेइंसाफी भी है ! एक पुरुष 60 वर्ष की आयु में भी पिता बन सकता है पर एक स्त्री का 3५ से 3७ वर्ष की आयु के बाद उसका माँ बनना कठिन होता है! और आज जहाँ लोग अपना कैरियर बनाने के लिए 30 का आंकड़ा पार कर जाते हैं तो उस उम्र में प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनिय हो जाता ह। और उनका सारा आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है! तब या तो अपनी पूरी उर्जा को इन्साफ की गुहार के लिए लगा देती हैं! तब उन पर दूसरा आघात उनके चरित्र पर होता है जो उनकी आत्मा पर असहनीय प्रहार होता है! क्या किसी ने सोचा है कभी भी महिला हो या लड़की उनमे संवीदनशीलता होती है! क्या वो ऐसे ही मरती जाएँगी ? उन्हें भी जीने का हक्क है ! इन नपुंसक व का-पुरुषों को किसने हक्क दिया है रोज रोज लड़कियों एवम महिलाओं को ऐसे ही मारते जा रहे हैं!
उन्हें किसने हक दिया है कि झूठे प्रेम जाल में फंसाओ और जब सच सामने आता है तो वो इंसान भाग खड़ा हो ता है और जब उसका सच समाज के लोगों और उसके परिजनो व प्रियजनो को बताया जाए तो वे नारी चरित्र पर प्रहार करते है जान से मारने की भी धमकी देते है ! तब लड़की के पास दो रास्ते होते हैं या तो अपने सम्मान के लिए लड़ाई लड़े और अपने चरित्र पर प्रहार करने वाले को सबके सामने लज्जित करे और अपने स्वाभिमान की रक्षा करे। पर मै जानती हूँ की कोई भी लड़की किसी भी परुष का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती और वो जिस भी पुरुष से अपने इन्साफ की गुहार करेगी वो उसे इन्साफ नहीं दिला सकते क्यूंकि वो भी स्वयं पुरुष है तब लड़की मजबूर हो जाती है क्यूंकि उसका एक कदम उसके माता पिता के नाम पर सवालिया निशाँ लगा देता हैै। उसके लिए तीसरा रास्ता बचता है अपने आपको अनंत अँधेरे में झोंक दे जिसमे वो तिल तिल मरती है पर उसको मरता हुआ कोई नही देख पाता आज मेरा प्रश्न ईश्वर और समाज से है ऐसे नपुंसक पुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे और नारी को कब तक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

'बाल-दुनिया' हेतु रचनाएँ आमंत्रित

बचपन भला किसे नहीं भाता. हम कितने भी बड़े हो जाएँ, पर बचपन की यादें कभी नहीं भूलतीं. हमारे अंतर्मन में एक बच्चा सदैव जीवंत रहता है, जरुरत बस उसे खोजने की है. कई बार जब हम उदासी के दरमियाँ होते हैं, तो अचानक बचपन से जुडी कोई याद हमें गुदगुदा जाती है. आजकल के बच्चे भी तो काफी फास्ट हो गए हैं. ब्लॉग जगत में उनके बनाये चित्र दिखने लगे हैं तो उनकी प्यारी-प्यारी अभिव्यक्तियाँ भी रंग बिखेरनी लगी हैं. 'बाल-दुनिया' में बच्चों की बातें होंगी, बच्चों के बनाये चित्र और रचनाएँ होंगीं, उनके ब्लॉगों की बातें होगीं, बाल-मन को सहेजती बड़ों की रचनाएँ होंगीं और भी बहुत कुछ....पर यह सब हम अकेले नहीं कर सकते, इसलिए हमें आप सभी के सहयोग की भी जरुरत पड़ेगी। 'बाल-दुनिया' हेतु बच्चों से जुडी रचनाएँ, चित्र और बच्चों के बारे में जानकारियां आमंत्रित हैं. आशा है आप सभी का सहयोग हमें मिलेगा.आप इसे hindi.literature@yahoo.com पर भेज सकते हैं.

सोमवार, 12 जुलाई 2010

ज्ञान की जर्जर काया



मनु मंजू शुक्ल
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कल ’शाम की बात है। मै अपनेआप से बात कर रही थी। और जीवन के हजारों तानेबाने बुन रही थी कि अचानक एक कोलाहल सा सुनाई पडा। पकडो-पकडो मारो-मारो का ’शोर सुनकर मै दौडकर दरवाजे पर आ गई। देखा तो स्तम्भ सी देखती ही रह गई। एक जर्जर काया छीड शरीर मानो मृतशरीरढॉचा सा, ना हड्रडी ना रक्त संचार बस नेत्र खुले ले दयनीयभाव, थी आशा दया की नेत्रों मे, मन रो उठा देख यह मायाजाल। आयी दया घर ले आयी।
मैंने पूछा ,“ अय सात्यआत्मा हो कौन क्यों विवश हो धराशाई सी भटक रही हो राहों मे। किसे खोज रही इस भ्रमित समाज के पगचिन्हों में। है कैसी मृगतृष्णा?”
पूछा तो जान पडा, यह है एक सत्य की परछाई, यह तो है, “ ज्ञान की जर्जर काया” लिए अस्थी कंकाल दरदर खोज रहा सत्य’िाक्षा का द्वार।
वो बोली द्र्रवित भाव से , “हे प्राणमित्र कहने को है मंजूसंसार, पर सच पूछो तो अब बन गया भोग का द्वार। हर कोई है ’शिक्षित, पर मूढ अभिमानी ना दया, ना ज्ञान, ना नेत्रों मे लाज, लालच कर रही है हर घर-घर में वास। ममता तो है बस तमस द्वार। ना लाज है श्रंगार में ना दया है अत्मसम्मान पर। है रुधिर का रंग अब नही लाल। कहने को सब है ज्ञानी पर है सच पूर्ण भ्रमित अभिमान। नही स्वंय को स्वंय का ज्ञान। मै तो बस खोजू एक सत्यद्वार। जो सच पूछो वो है एक अतिश्रुक्ति, ना कोई है भाव प्रधान, ना किसी में स्वाभिमान।
इतना कहकर वो ज्ञानछाया खो गयी कोहरे की घुपत राहों में। नेत्रपटल खुले मेरे खोजते रहे उसे अंध राहों को। शायद वो रुक जाती शायद पलठ कर फिर आती शायद वो कुछ और कह पाती पर सच पूछो तो है यह सपना। यहॉ ज्ञानी दर-दर फिर रहे अज्ञानी का होता सतकार । ये जीवन की है सच्ची विडम्बन ना कोई अतिसुक्ति पा कोई अभिप्रेणा।


मेरे भाव



गुरुवार, 8 जुलाई 2010

गणतंत्र दिवस पर बहादुरी पुरस्कार के लिए बच्चों से आवेदन आमंत्रित

भारतीय बाल कल्याण परिषद द्वारा हर वर्ष बच्चों को उनकी बहादुरी के अनुकरणीय कार्यों के लिए पुरस्कार प्रदान किया जाता है। ये पुरस्कार भारत के प्रधानमंत्री द्वारा गणतंत्र दिवस से ठीक पहले भेंट किया जाता है। पुरस्कार प्राप्त बच्चे राजधानी दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में भी हिस्सा लेते हैं।

उम्मीदवारों के चयन के लिए मुख्य मानदंडों में जीवन के खतरों से मुकाबला करते हुए घायल होना, सामाजिक बुराई अथवा अपराध के खिलाफ बहादुरी तथा साहसिकता, बाल्यकाल में जोखिमपूर्ण कार्य आदि को ध्यान में रखा जाएगा। आवेदन की सिफारिश से पहले प्रत्येक मामले की मौके पर जाँच अनिवार्य होगी। प्रत्येक आवेदन के साथ मामले की जांच रिपोर्ट भी होनी चाहिए। सभी संबंधों में पूर्ण सिफारिश के साथ आवेदन 30 सितम्बर, 2010 तक भारतीय बाल कल्याण परिषद, 4 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली- 110002 पर पहँचना अनिवार्य है।

आकांक्षा यादव

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

ये पहेली सुलझाइए


जरा आप भी बताइए कि इस चित्र में किन 10 राजनेताओं के चेहरे छुपे हुए हैं।

!! मैं तो कन्फ्युजड हूँ, अब आपकी बारी है !!