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मंगलवार, 29 मार्च 2011

गंतव्य

कार्यालयी कार्य से मैं
था लोखंवाला मुंबई के प्रवास पर
कार्य समाप्ति के उपरांत
स्थानीय एक मित्र ने बुलाया था
मुझे रात्रि सात बजे डिनर के लिए
अपने आवास पर

औपचारिक अभिवादन के साथ
चाय पीते हुए हो रही थी
बातें अतीत की सारी
पर कहीं भी दिख नहीं रही थी
डिनर की तैयारी

मैंने मेजबान मित्र से कहा
बॉस क्या खिला रहे हो आज डिनर में
मुझे निकलना है
आज की ही रात में

बोला चलते है काकोरी हाउस
जम के खायेंगे काकोरी कबाब
बड़ा उम्दा है उसका स्वाद
मैंने कहा काकोरी कबाब
यह क्या बला है
बोला क्या यार काकोरी हाउस का
काकोरी कबाब नहीं जानते हो
तुम यार हिंदुस्तान को
क्या पहचानते हो
अक्खा मुंबई कहलो या अक्खा हिंदुस्तान
या विदेशों तक में मशहूर है
इसका स्वाद ही तो हमारा गुरुर है

मैंने कहा यार मैं तो
काकोरी कांड के बारे में ही जानता हूँ
लखनऊ के पास एक गाँव है मानता हूँ
इससे अपने स्वतंत्रता का इतिहास पहचानता हूँ
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी आर्यसमाजी
रामप्रसाद बिस्मिल अस्फाकुल्लाह आजाद
आदि के बलिदानों को बस
इससे जुड़ा जानता हूँ

समीप में खड़ा उनका बेटा
आश्चर्य से मुझे देख रहा था
मानो मैं किसी
स्वप्न की बातें कर रहा था
मित्र ने कहा की हाँ हाँ कही पढ़ा है
किसी काकोरी कांड के बारे में
ठीक से मालूम नहीं मेरा नोलेज भी कम है
इतिहास के गलियारे में
छोडो आओ चले
काकोरी कबाब का लज्जत चखे
वहां की रंगीनियत को
जी भर कर देखें

मैं शून्य में ताकता रहा
अतीत में बिस्मिल के साथ
साक्षात्कार करता रहा
बिस्मिल कह रहे थे
क्या यही है हमारी भावी पीढ़ी
जो निसंकोच आगे बढ रही
लगा कर हमारे बलिदानों की सीढ़ी
क्या इन्ही दिनों के लिए हमने
राष्ट्रप्रेम के माले में त्याग और
बलिदानों की मोती पिरोई थी
हर बार इसी धरा पर आने के लिए
फांसी के समय ईश्वर से
अनुशंषा की थी
अपने परिवार की चिंता न कर
पुरे देश को अपना परिवार
समझाने की जुर्रत की थी

सब्र मेरा भी टूट चला था
आंसुओं ने भी आखों का साथ
देना छोड़ दिया था
बिह्वल नतमस्तक हो मैं कह रहा था
मान्यवर आप घबराये नहीं
केवल इन्हें ही अपना पीढ़ी माने नहीं
हाँ बेशक है ये अफ़सोस की बात
पर मानिये है ये अपवाद
आज भी हमारे जैसे बहुत लोग है
जो आप जैसे के
बलिदानों की कदर कर रहें है
आज जिस आबोहवा में हम
खुल कर सास ले रहे है
निसंदेह इसे आप ही की
देन मान रहे है

तैयार होकर मित्र ने
एकाएक हमें हिलाया
उस स्वप्न से मुझे जगाया
मैंने कहा मित्र मैं तो शाकाहारी हूँ
काकोरी कबाब का मेरे लिए
क्या औचित्य
मैं तो खाऊंगा वही
जो खाता हूँ नित्य
मेरा आपसे मिलने का ही
था उपक्रम
जो हो गया पूरा
आप काकोरी कबाब का स्वाद ले
अभी मेरा कुछ काम है अधूरा
कह मैं अपने
गंतव्य को चला

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

पाखी जियो हजारों साल...


पाखी लगती सबसे प्यारी.
सबकी है वो राजदुलारी.
आज उसका जन्मदिन आया.
यह देख है मन हर्षाया।

पाखी जियो हजारों साल.
मस्ती करो और धमाल.
यूँ ही खूब कमाओ नाम.
जन्मदिन पर यही पैगाम।


एस. आर. भारती
मैनेजर- नेशनल स्पीड पोस्ट सेंटर, कानपुर
कानपुर जी.पी.ओ. -208001

मंगलवार, 22 मार्च 2011

दिवास्वप्न

आज धरमू
घर से सुबह सात बजे सुबह ही
काम के लिए निकल गया
तबियत थोड़ी नासाज थी
फिर भी मण्डी पहुच गया
कई दिनों की बीमारी ने उसे
कमजोर इस कदर कर दी थी
बची खुची जमा पूजी भी
दवा के नाम पर होम हो गयी थी

आज सुबह मुनिया के अनुनय ने
उसे व्यथित कर दिया था
न चाहते हुए भी काम पर जाने को
मजबूर कर दिया था
बापू हमके उ बंदूकवाला पिचकारी चाहिए
मोनू के पापा ओका कल्हे लइके दीन है
अउर अबकी हमके औ गुडिया वदे
फ़िराक वाला सुइट लई के दियो
ओमे हम बहुतै अच्छा लागब
उहे पहीन के तोहे अउर
माई के टीका कारब

सोचते सोचते पता ही नहीं चला की
वह मण्डी कब पहुच गया
जाकर मजदूरों की लाइन में
खड़ा हो गया
आज त्यौहार के कारण
वैसे भी मजदूरो की भीड़ बड़ी थी
पर मालिको की कमी भी
साफ दीख रही थी
कुछ आये भी तो उसे कमजोर देख
उसकी तरफ ताके तक नहीं
कुछ ने बातें तो की पर
वाजिब मजदूरी देने को तैयार नहीं
सोचते अउर बातें करते करते
दोपहर होने को आयी
बात कही बन नहीं पाई
अंत में एक ठीकेदार ने
उस पर तरस खाया
आधी मजदूरी पर तय कर
उसे अपनी साईट पर लाया
धरमू लग गया काम पर जी जान से
शाम की मजदूरी के प्लान में
सोच रहा था की आज की मजदूरी से
कुछ खाने के सामान के साथ
मुनिया की पिचकारी जरुर लायेंगे
उसेक चहरे की ख़ुशी को
तबियत से देखेंगे
अगर कल परसों भी काम लग गया
तब उसके अउर गुडिया के
फ्राक के लिए भी सोचेंगे

आगे भी काम पाने की लालसा में
बीमारी से उठे बदन से उसने
भरपूर मेहनत किया
ठीकेदार को खुश करने का
हरसंभव प्रयास किया
साथ में लाये रोटी और अचार को भी
बिसराय कर किनारे कर दिया
कमजोर बदन आखिर
ये कब तक सहता
धरमू साईट पर ही अचानक
बुखार की चपेट में पुनः आ गया
कापते पैरो ने उसका और चलना
मुश्किल कर दिया
एकाएक वह बांस से गिर गया
एक पटरे में फस उसका
पैर भी टूट गया

ठीकेदार चिल्लाया अरे साले
ये तुम्हे क्या हो गया
साले ने एक अटिया सेमेंट
ख़राब कर दिया
चल भाग साले यहाँ से
तुम लोगो पर दया करना बेकार है
थाम ये बीस रुपये
यही तुम्हारी अब तक की पगार है
धरमू बीस का नोट थामे
वही बैठ गया
कभी अपने टूटे पैर को
कभी उस नोट को देखता रहा
सोचता रहा की अब क्या होगा
इससे अब कौन सा
पूरा अरमान होगा
मुनिया और गुडिया के
सपनों का क्या होगा
उनके भाग्य में क्या दिवास्वप्न ही होगा
ईश्वर ने मुझे बचा ही क्यों लिया
मै मर क्यों नहीं गया
कम से कम इस संताप से
तो दूर रहता
परिवार के आंसूं देखने से
बच गया होता

पर वह शायद कैसे मरता
यदि मर जाता
तो दुःख पीड़ा और अवसाद के
नए प्रतिमान फिर
कौन बनता

मंगलवार, 15 मार्च 2011

महिला सशक्तीकरण सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार - आकांक्षा यादव

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ (8 मार्च) पर पोर्टब्लेयर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारम्भ अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाए एवं चर्चित साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने दीप जलाकर किया। श्री यादव ने अपने उदबोधन में कहा कि - ‘‘नारी ही सृजन का आधार है और इसके विभिन्न रूपों को पहचानने की जरूरत है। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस इस तथ्य को उजागर करता है कि विश्व शान्ति और सामाजिक प्रगति को कायम रखने तथा मानवाधिकार और मूलभूत स्वतंत्रता को पूर्णरूप से हासिल करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, समानता और उनके विकास के साथ-साथ महिलाओं के योगदान को मान्यता प्रदान करना भी अपेक्षित है।‘‘
संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं युवा लेखिका सुश्री आकांक्षा यादव ने महिला सशक्तीकरण को सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार बताया। बदलते परिवेश में समाज में महिलाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं आज राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, मीडिया, कला, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, ब्लागिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं।
पोर्टब्लेयर प्रधान डाकघर की पोस्टमास्टर श्रीमती एम. मरियाकुट्टी ने कहा कि-'' संविधान में महिला सशक्तीकरण के अनेक प्रावधान हैं पर दूरदराज और ग्रामीण स्तर तक भी लोगों को उनके बारे में जागरुक करने की जरूरत है। सुश्री सुप्रभा ने इस अवसर पर नारी की भूमिका के अवमूल्यन के लिए विज्ञापनों और चन्द फिल्मों को दोषी ठहराया जो नारी को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सुश्री शांता देब ने कहा कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ भगवान वास करते हैं, फिर भी नारी के प्रति समाज का रवैया दोयम है। सुश्री जयरानी ने उन महिलाओं पर प्रकाश डाला जो उपेक्षा के बावजूद समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल हुईं। इसके अलावा अन्य तमाम लोगों ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन जयरानी ने किया और आभार शांता देब ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में तमाम महिलाएं और प्रबुद्ध-जन उपस्थिति रहे।

शनिवार, 12 मार्च 2011

दूध का कर्ज

खामोश सुखिया
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी
रक्त की एक बोतल उसे चढ़ चुकी थी
एक और अभी बाकी थी

सोच रही थी
किसने दिया होगा उसे रक्त
उसका मरद तो हो चुका
पहले ही अशक्त
बच्चे कभी झाकने नहीं आते
कभी आते तो करके हज़ार
बहाने वे लौट जाते
छोटू ने हिम्मत की थी
तभी उसके कानो में
बहू की आवाज पड़ी थी
अरे छोड़ा बूढ़ा के ऊ त
मरले दाखिल हई
अभी तोहे बहुत कम करे का है
चला हिला एहन से बहाना बनाय के
मरि जैहन त अभी
क्रिया करम भी है करे के

वह बोल तो नहीं पर
सुन तो थी ही सकती
ऑपरेशन के बाद अचेत
अपलक छत को निहारती
अतीत में चली गयी
डॉक्टर का चेहरा उसे
जाना पहचाना लग रहा था
दिमाग पर जोर देने पर उसे
कुछ धुधला सा याद आया
लक्षमण का चेहरा जेहन में भाया

जिसे जिसकी माँ
बचपन में ही छोड़
पड़ोसन संग इश्क लड़ाई
और भाग गयी थी
पड़ोसन के नाते जिसे उसने
अपना दूध पिला कर बड़ा की थी
फिर उसके बापू के तबादले ने
सबकुछ भुलवा दिया था
कुछ दिनों में ही सब अतीत का
हिस्सा बन गया था

हाँ हाँ ई त वही
लाछमनावा लागत है
पर इहा त सब एका
डॉक्टर एल के सिंह कहत है

छोड़ा कुछो होय हमै का करे का है
दिमाग पर ज्यादा जोर
डाले का हमै का पड़ा है
सोचते सोचते न जाने वह
कब सो गयी
भोर में जगी तो देखा
सुबह हो गयी
डॉक्टर बाबु राउंड पर आये थे
उसके सर पर हाथ रख सहला रहे थे
आज उसे तबियत कल से
बहुत ठीक लग रही थी
सुखिया अम्मा कैसी हो सुन
डॉक्टर के मुख से अपना नाम
वह दंग रह गयी थी

बहुतै दूध पिलवा है हमका
अब हमरी बारी आवा है
एक बोतल खून हम दै चुके
एक अउर देना बाकी है
हम तोहरा बदे आपन
सब खून दै सकत है
तबो माई तोहरे दूध का करज
हम कभों न उतार सकित है

सुन आपन माटी क आवाज
सुखिया सकते में आ गयी
अरे तू त लाछामन्वा ही हवे
कहते सुखिया गदगद हो गयी
पर यहाँ तो सब तोहके
डॉक्टर एल के सिंह कहत है
पर तू त लाछामन्वा ही है
बाबा इ कैसी विपत है

सुखिया की देख निश्छल सोच और हंसी
डॉक्टर बाबू ने सुखिया की गोद में
अपना सर रख दिया
सुखिया ने भी तुरंत अपने आंचल से
उनका मुख ढक दिया
आंचल के दूसरे कोने से मुंह ढाप
सुखिया रो पड़ी थी
दूध के कर्ज को सुखिया
आज बडे मार्मिक ढंग से
समझ रही थी

जिनसे थी अपेक्षा
उन्होंने तो मुंह फेर लिया था
पर आज दूघ के रिश्ते ने
अपने को रक्त के रिश्ते से
बेहतर साबित कर दिया था
पूरे वार्ड में पसरा सन्नाटा
बन गवाह इस बात की
सच्चाई बड़ी सिद्दत से
बयां कर रहा था

बुधवार, 9 मार्च 2011

अभिशापित जीवन और अरुणा

मृत्यु तो एक शाश्वत सत्य
के रूप में है ही विरासित
पर अब उसका जीवन भी
बन चुका है अभिशापित

दे रहा है उसे कौन सा सुख
अरुणा का अर्थहीन जीवन
ऐसे जीवन से है अच्छा नहीं
क्या करना मृत्यु का वरण

हम एक बार के मृत्यु की
कल्पना से सिहर उठते है
हज़ार बार वह नित्य मरती है
हम भावनाओ में बहा करते है

हर चीज कानून के दायरे में
तय हुआ नहीं करती है
सही और गलत बातें हमारे
विवेक पर निर्भर करती है

निरंतर पिछले सैतीस वर्षों से
जो हमारी भावनाओ को ढो रही
डोलने बोलने में सर्वथा अक्षम
एक्षम्रित्यु जाहिर करने से रही

सार्थक जीवन भी रागिनियो का
एक सार्थक नाम होता है
तमाम उतर चढाओं के साथ
रस प्रसाद माधुर्य से भरा होता है

उसकी निस्वार्थ सेवा कर
हम उसे कौन सा सुख दे रहे
बस भावनाओ में बहकर
उसे दुःख ही दुःख दे रहे है

हमारी सेवा अगर किसी के लिए
बनजाये अंतहीन दुःख का कारण
जीवन के औचित्यहीन दंश से कही
अच्छा है उसका औचित्यपूर्ण मारण

अगर तीस बत्तीस वर्ष पूर्व ही
उसे मिल जाती नारकीय जीवन से मुक्ति
उपरांत पुनर्जीवन के वह होती
आज एक नूतन युवा नारी शक्ति

करती अठखेलियाँ पावन प्रकृति से
बागों और बसंत से होती आनंदित
उसके यौवन की खुशुबुओं से
पावन धरा भी होती दिगंदित

जीवन के एक एक पल का करती
कितनी सिद्दत से रसपान
दे पाए नहीं जो हम उसे करके
अपने हज़ार प्रयास के उपरांत

सम्मान करता हूँ मै दिल से
अरुणा के उन सह्कर्मिओं का
रातदिन एक कर दिया जिन्होंने
लेकर निस्वार्थ सेवाव्रत का

पर क्या कही दिखाती नहीं
इसमे भी स्वार्थ की आहट
भावनाओं के पीछे से आ रही
निरंतर नाम की सरसराहट

कि देखे और सोचे लोग मेरे
इस सेवाव्रत के नूतन आयाम को
पर सार्थक सेवाव्रत ही देती है
एक सुखद अंजाम को

इस सेवा व्रत ने तो लटका दिया है
अधर में किसी के जीवन को
जबकि प्रतीक्षा एक सुखद मौत की
है त्रिशंकु बनी अरुणा रामचंद्र को

वस्तुतः है नहीं यह किसी को जीवन देना
है क्रमशः उसे मौत के करीब ही ले जाना
तो क्यों न उसे मर्सी किलिंग दे दी जाय
अच्छा नहीं है किसी को तिल तिल कर मारना

इस ब्लॉग के माध्यम से सम्मान करता हूँ
जिंदादिल याचिका पिकी वीरानी का
समाप्त हो जिंदगी और मौत का यह खेल
पक्षधर हूँ उनके जज्बे और कद्रदानी का

बुधवार, 2 मार्च 2011

'न्यू ऋतंभरा भारत-भारती साहित्य सम्मान' से सम्मानित हुईं आकांक्षा यादव

युवा कवयित्री एवँ साहित्यकार सुश्री आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवँ अनुपम कृतित्व के लिए छत्तीसगढ़ की प्रमुख साहित्यिक संस्था न्यू ऋतंभरा साहित्य मंच, दुर्ग द्वारा ''भारत-भारती साहित्य सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि सुश्री आकांक्षा यादव की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई और फ़िलहाल वे देश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवँ सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों/पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं।

आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता सुश्री आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि इत्यादि प्रमुख हैं। सुश्री आकांक्षा यादव को इस अलंकरण हेतु हार्दिक बधाईयाँ।

गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)-480001

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

मुखियाजी

भैयाजी
कल मेरा ऑपरेशन है
मुखियाजी की सुन आवाज मैं
अतीत से वर्तमान में आया
मैंने उनको बैठक में बिठाया
कुछ व्यस्तता ऐसी थी की
कई दिनों से उनसे
मुलाकात हो नहीं पाया

वस्तुतः मुखियाजी एक युवा वृद्ध थे
पूरी जीवटता व तन्मयता से
सुरक्षा गार्ड का कार्य करते हुए
खुद्दारी से काफी दिनों से हमारे
आवास के पास ही रह रहे थे
कई वर्षों से गाँव को छोड़
शहर में ही बस गए थे
गाँव घर की चर्चा आने पर
एकाएक उदास हो जाते थे
मानो किसी ने रख दिया हो
उनकी दुखती राग पर हाथ
अचानक छोड़ हमारा साथ
बैठक से उदास चले जाते थे
मोहल्लेवालों के हर सुख दुःख में
बड़े ही लगन से अपनी
उपस्थिति दर्ज कराते थे
न जाने कौन सा अनकहा दर्द
उन्हें अनवरत सालता था
जिससे उन्हें गाँव से दूर
रहना ही भाता था
माँ की याद आने पर अचानक
ही उदास हो जाते थे
परिवार और बच्चो के बारे में
सोच अतीत में खो जाते थे
कुल मिलकर अपने आप में
एक अजीम सख्सियास थे
मानवीय सभ्यता और भारतीय
संस्कृति को समेटे हमें
अत्यंत ही प्रिय लगते थे

इधर कई दिनों से उनका
स्वास्थ्य ख़राब चल रहा था
कभी पेट तो कभी पैर
परेशान किया करता था
मेरे भी काफी दावा आदि करने पर
परेशानी कम नहीं हो रही थी
जाँच कराने पर डाक्टर ने
आंत उतरने की बीमारी कह
ऑपरेशन की सलाह दी थी
किसी तरह जुगाड़ कर उनके सुपरविजर ने
उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया
कुछ आर्थिक सहयोग हमने भी कर दिया

ऑपरेशन के उपरांत उनका पहला फोन
मेरे पास ऑफिस में आया
भैया आइबा न का हमके देखे
कहते उनका आवाज भर्राया
शाम को ऑफिस से सीधे मैं अस्पताल गया
देख बिस्तर पर एक छोटे बच्चे के साथ
उनको खेलते मेरा दिल भर आया
मुझे देख उनकी बाछें खिल गयी
आ गए भैया कहते
उनकी आंखे भर गयी

कितने लोग यहाँ भर्ती है
सबको नित्य कितने ही
देखने आते होगें
साथ में फल मेवे और
मिठाइयाँ भी साथ लाते होंगे
पर यहाँ कौन आया होगा
कौन इन्हे भाया होगा
घरवालों को तो पता ही नहीं होगा
कि मुखियाजी ने ऑपरेशन करवाया होगा

दुसरे बिस्तरों पर देख भीड़ क्या
इनका दिल भर नहीं आया होगा
पर अपने मिलनसारिता से उन्होंने
पूरे वार्ड को अपना परिवार बना डाला था
मुझे देख आँखों के कोरो से
ढुलकते आंसुओं ने
उनकी सारी व्यथा कह डाला था
दिल के अनकहे दर्द को
दिल में ही छिपा लिया था
सभी लोगो से एक अंजान
रिश्ता बना लिया था
दूसरों के बच्चे दादा दादा कह
उनकी गोद में उछलते थे
मिलाजुला कर सभी
उनका ख्याल रखते थे

पर इस सच्चाई से भी सभी परिचित थे
कि गैर रख ले कितना भी ख्याल
पर अपने तो अपने ही होते है
इस बात को मुझे देख
उनकी भाव भंगिमाओं ने दर्शाया
जिसने मुझे मेरे कुछ और
दायित्वों का अहसास कराया
कुछ देर बैठ वहां धीरे से
उनकी मुठ्ठी में कुछ थमाया
पुनः इस अपरिभाषित रिश्तों के
बारे में सोचते थके कदमो और
भारी मन से मैं घर लौट आया

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

दिखेगा आज भी बसंत परिपूर्ण

पप्पू तनी जल्दी से
नहाय धोई लो
पीला पजामा कुरता बकस मा रखा है
उसे पहिन लो
तनी खेतन से सरसों कई
पियरका फूल लई आयों
मंदिर चले के बा
पंडित जी का बुलावा आवा रहा
पूजन क मुहूरत निकल जइये
एहिलिये जल्दी करयो

सुबह सुबह माँ के इस
अनुनय से निद्रा भंग हुई
सुबह संग हुई
जागने पर देखा तो न माँ थी
न माँ का कोई अनुनय
रसोई से पत्नी करती रिक्की से विनय
बाबू जल्दी से तैयार हो लो
स्कूल की बस आ गयी होगी
यह टिफिन बैग में रख लो
अरे आप भी न जल्दी उठिए
ऑफिस नहीं जाना है क्या
चलिए तैयार होइए
मैंने कहा प्रिये क्यों उठा दिया
एक प्यारे सपने से क्यों जगा दिया
अपना प्यारा बचपन और बचपन का
प्यारा बसंत देख रहा था
उसमे मैं तुमको रीतिकालीन
नायिका के रूप में तलाश रहा था
कहते पुनः अपने अतीत के
स्वप्न में खो गया था

बसन्त ने देखे है कितने आयाम
त्रेतायुगीन बसंत था जहाँ निष्काम
वही द्वापर के बसंत में व्याप्त थी
चिरंतन सत्य और कर्मयोग से
पूरित कृष्ण की योगलीला
गोपियों की वेदना व विरहपिदा
मगध्कालीन बसंत बसंतसेना
और बसंतोत्सव से था परिपूर्ण
जिससे आज का बसंत है बेशक अपूर्ण
कालांतर में बसंत को सूर के बाद
पद्माकर और केशवदास ने गहनता से देखा
महादेवी पन्त आदि ने तो इसकी
खींच दी जीवनरेखा
भ्रमर का गुंजन कोयल की कूक
पनघट की नायिका को देखते हम मूक
वेदना विरही नायिका की
उठाती हिय में हूक
उन्माद में डूबी प्रेयसी
महकती फूलो का गुच्छा
झर झर बहते हुए झरने
कल कल करती नदियाँ
दृश्य था मनोरम कितना अच्छा
पहाड़ो का सौंदर्य अप्रितम
आमंत्रण देती अमावस की रातें भी तम
बासंती बयार कर देती
प्रेमियों को मदहोश
परागित पंखुडिया और सौरभ की
भीनी सुगंध उड़ाती हमारे होश
बृक्षों से गिरते पत्तों की लड़ियाँ
पुनः जीवन को जीवंत करती
नन्हे फूल और कोमल पत्तियां

एकबारगी हमें लगता है
हमारे संपन्न प्यारे अतीत का सौरभ बसंत
नित पा रहा है कंक्रीट के
जंगलों में असमय अपना अंत
ध्यान से परखने पर हम पाते है
बसंत की जीवन्तता को
दुसरे रूपों में देखते है
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत सत्य है
बसंत भी इससे अछूता नहीं है
बसंत आज भी विद्यमान है
उसका पूर्ण सौंदर्य आज भी विराजमान है
फर्क बस इतना है कि
इसके प्रारूप बदल गए है
नए प्रतिमान सज रहे है
आओ देखे बसंत के बदलते
रूपों और प्रतिमानों को
इसके नए पैमाने को
स्कूल कि बजते ही बेल
तमाम बच्चों के आह्लादित मुखमंडल
और खुशियों से भरी रेलमरेल
हर बच्चा एक फूल और स्कूल
उपवन सा दिखता है
बच्चों से भरा आंगन
मधुवन सा दिखता है
साथही बसंत कालेज के परिसरों में
भी सिद्दत से दिखता है
जो हमें अनायास ही खिचता है
जहाँ पर प्रकृति ने पहाड़ो झरनों
व बागों से बासंती उल्लास को
बाहर निकाल बिखेरा है यैवन का
सौंदर्य अनुपम
कराती शोख चंचल अदाओ के दर्शन
मल्तिकोम्प्लेक्स में युवाओं के मेले
रंगीन माडर्न ड्रेस्सों से घिरे
चाट चाव्मिन और स्नेक्स के ठेले
आर्चिज गैलेरी में दिखते युवा
बसंत के पर्याय को चुनते
तमाम मोहक कार्डो पर इठलाते झूमते
बड़े बड़े पेंटिंग के रूप में
ड्र्यिंग रूम में सजते
आज भी प्रयासरत दीखता है बसंत
अपना अस्तित्वा बचाते
बसंत कहीं खोया नहीं है
पर परिवर्तन कि शाश्वत अवधारणा
से भी अछूता नहीं है
सौंदर्य उर्जा और नूतन
ताजगी से परिपूर्ण
दिखेगा आज भी बसंत संपूर्ण

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

अधूरा घोंसला

अपने
घोसले का निर्माण
करने में तल्लीन नर
एक एक तिनका चुन चुन कर लाता
मादा गौरैया के चोच में थमाता
पुनः और तिनके की तलाश में
सुदूर जंगलों में चला जाता
मादा उन तिनको को
घोसले में सजाती

अपने प्रियतम को प्यार से निहारती
सुखद भविष्य की कल्पना से ओत प्रोत
प्यार से उसकी बलैया लेती
अनवरत श्रम से थकने पर
उसे अपने नाजुक पंखों से हवा कर
एक मादक अदा से इठलाती
पुनः आने वाले जीव के
बारे में सोच सपनों में खो जाती
कुछ तिनका इस प्रक्रिया में
नीचे गिर गया था
घोसला बनाने के ही करीब था
मादा ने कहा प्रियतम तुम थक गए हो
इतना दूर न जाकर
क्यों नहीं इन गिरे तिनके को लाते हो
व्यर्थ में पसीना अब क्यों बहाते हो
अब तो घोसला भी तैयार है
देखो कितनी अच्छी बसंती बयार है
आओ जल्दी से इसे पूरा करे
फिर आराम से बैठ अपने
घोसले में भोजन करें

थक चुके नर ने
पुनः साहस जुटाया
अपनी मादा को प्यार से पुचकाया
उन गिरे तिनको को
एक एक कर लाने लगा
निर्मम कल भी वहां धीरे से
आहट देने लगा
एक बिल्ली की निगाह उस
बेसुध सपने में खोये नर पर पड़ी
उसके बांछे खिल गयी
पंजे में दबोच वह उसे ले चली
मादा पूरे दम से चिल्लाते
उसके पीछे दौड़ पड़ी

पल में ही देख
सारे सपने धूसरित
आकान्छाये अपूरित
बेदम नर ने उसे समझाया
उस होनी को कौन रोक सकता है
जो ईश्वर को है भाया
गर्भ में पल रहे हमारे
भविष्य को बचाओ
उसी के सहारे अब जीवन सजाओ
मुझे बचाने की चेष्टा
मत करो अनायास
जानती ही हो बेकार होंगे
तुम्हारे सभी प्रयास
तुम्हारे बचने से कम से कम
हमारा अस्तित्व तो बचेगा
बाकी न्याय इसका तो ईश्वर ही करेगा
प्रिये अब मेरी मौत तो करीब है
क्या करे शायद यही हमारा नसीब है
कहते हुए नर ने
वही तोड़ दिया दम
यह देख मादा के
हताश रुक गए कदम
अपने आपको समझाते
अपने पति की याद और पहचान को
अपने गर्भ में छिपाते
न चाहते हुए भी अज्ञात भविष्य के
नए ताने बाने बुनते
अस्थियों के नाम पर उसे
जो कुछ मिला वहां
ले चल पड़ी अपने अधूरे घोसले को
उसके प्रियतम की
यादे शेष थी जहाँ

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

सुबह होने पर

जियावन की तेज आवाज से
सहसा निद्रा भंग हुई
सामने खिड़की से उदीयमान सूरज से
ऑंखें चार चौबंद हुई
बाहर वह धरमू पर
जोर जोर से चिल्ला रहा था
पानी पी पी कर गालियों की
बौछार किये जा रहा था
ऑंखें मलते हुए मैं बाहर आया
देख नजारा वहां का मैं घबराया
धरमू का जेनेरटर जियावन के
दरवाजे पर धंस गया था
बेटी का विवाह नजदीक था
दुआर ख़राब होने की जियावन
दुहाई दिए जा रहा था
किसी तरह मैंने बीच बचाव कर
घटना को दुर्घटना होने से बचाया
समझा बुझा कर
मामले को शांत कराया

आज जियावन की बेटी
उर्मिला का विवाह है
सहेलियों ने जीभर कर
उसका श्रृंगार किया है
सभी व्यस्त है
बारात की अगवानी में
जियावन का भरपूर प्रयास की
रहे न कोई कोर कसर
बारातियों की अगवानी में

रात्रि का दूसरा पहर
नाचते गाते बारात पहुच ही
रही थी दरवाजे पर
तभी एकाएक आंधी के साथ
पानी का भी हो गया प्रकोप
बिजली भी हो गयी
तबियत से गोल
किसी ने कहा अरे
पास ही में तो धरमू है
उससे कहो लगा दे जेनेरटर
किसी ने कहा कहाँ से लायेगा
वो इतनी रत में ओपेरटर
जियावन मुहँ लटकाए
हो गया था निराश
उसकी तो टूट चुकी थी पूरी आस
हताश वह सोचता हो बेचैन
अब कैसे वह
धरमू से मिलाये नैन
अभी दो दिन पहले ही तो
उसका जीना हराम कर दिया था
बिना बात का ही
तिल का ताड़ बना दिया था
उन गालियों से आहत
धरमू अपनी बखरी में लेटा था
उसे उस विवाह का
निमंत्रण नहीं था

दूर से धरमू ने
सुनी जब जिक्जिक
सोचने लगा वो
कैसी है ये किचकिच
निरापद वो जियावन के
दुआर पर तेज कदमो से गया
देख मामला तुरंत
ले दो लोगो को जेनरेटर ले आया
स्वयं ही बन ओपेरटर
पूरी रात उसने जेनेरटर चलाया

सुबह होने पर
बारात बिदा होने पर
जियावन और धरमू
एक दुसरे को देख अनदेखा करते रहे
अचानक दौड़ एक दुसरे की ओर
लग एक दुसरे के गले
अपनी सारी व्यथा
आँखों ही आँखों में कहते रहे
घंटो रोते रहे
उनके चहरे बिना कुछ कहे
बहुत कुछ कहते रहे

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

कृष्ण कुमार यादव को डा0 अम्बेडकर राष्ट्रीय फेलोशिप अवार्ड-2010

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2010‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर कार्यरत हैं.

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय 33 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव‘‘ ( स0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र) भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें पचास से ज्यादा संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर और पोर्टब्लेयर से भी उनकी रचनाएँ और वार्ता प्रसारित हो चुके हैं. श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और ‘शब्द सृजन की ओर‘ और ‘डाकिया डाक लाया‘ नामक उनके ब्लॉग चर्चित हैं.

ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्वे विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान -2009‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा '' विवेकानंद सम्मान'' , महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ''महिमा साहित्य भूषण सम्मान'' नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘, मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘साहित्यकार रत्न‘‘, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘ व ’’अक्षर शिल्पी सम्मान’’, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना (म0प्र0) द्वारा ’’अक्षर शिल्पी सम्मान-2010’’ , साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ''हिंदी भाषा भूषण-2010'' इत्यादि तमाम सम्मानों से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को इस सम्मान हेतु बधाईयाँ।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

वसंत पंचमी की शुभकामनायें..


वसंत-पंचमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। माँ सरस्वती का आशीर्वाद आप सब पर बना रहे.

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पोर्टब्लेयर में कवि सम्मेलन

हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्टब्लेयर द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 25 जनवरी को कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दक्षिण अंडमान के उप मंडलीय मजिस्ट्रेट श्री राजीव सिंह परिहार मुख्य अतिथि थे और कार्यक्रम की अध्यक्षता चर्चित युवा साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने की. दूरदर्शन केंद्र पोर्टब्लेयर के सहायक निदेशक श्री जी0 साजन कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे. कार्यक्रम का शुभारम्भ द्वीप प्रज्वलन द्वारा हुआ.

इस अवसर पर द्वीप समूह के तमाम कवियों ने अपनी कविताओं से शमां बांधा, वहीँ तमाम नवोदित कवियों को भी अवसर दिया गया. एक तरफ देश-भक्ति की लहर बही, वहीँ समाज में फ़ैल रहे भ्रष्टाचार, महंगाई और अन्य बुराइयाँ भी कविताओं का विषय बनीं. कविवर श्रीनिवास शर्मा ने देश-भक्ति भरी कविता और द्वीपों के इतिहास को छंदबद्ध करते कवि सम्मलेन का आगाज किया. जगदीश नारायण राय ने संसद की स्थिति को शब्दों में ढलकर लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया. जयबहादुर शर्मा ने महंगाई को इंगित किया तो उभरते हुए कवि ब्रजेश तिवारी ने गणतंत्र की महिमा गाई. डाॅ0 एम0 अयया राजू ने आज की राजनैतिक व्यवस्था पर कविता के माध्यम से गहरी चोट की तो डाॅ0 रामकृपाल तिवारी ने यह सुनकर सबको मंत्रनुग्ध कर दिया कि नेताओं के चलते 'तंत्र' ही बचा और 'गण' गायब हो गया. श्रीमती डी0 एम0 सावित्री ने कविताओं के सौन्दर्य बोध को उकेरा तो डाॅ0 व्यासमणि त्रिपाठी ने ग़ज़लों से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया. अन्य कवियों में संत प्रसाद राय, अनिरूद्ध त्रिपाठी, बी0 के0 मिश्र, राजीव कुमार तिवारी, सदानंद राय, एस0 के0 सिंह, रामसिद्ध शर्मा, रामसेवक प्रसाद, परशुराम सिंह, डाॅ0 मंजू नायर एवं श्रीमती रागिनी राय ने अपने काव्य पाठ द्वारा काव्य संध्या को यादगार शाम बना दिया। मुख्य अतिथि श्री राजीव सिंह परिहार ने भी हिन्दी कविता की आस्वादन प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए स्वरचित कविताओं का पाठ किया।

कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए चर्चित युवा साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के
निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने सामाजिक परिवर्तन में कविता की क्रांतिकारी भूमिका की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। आज के लेखन में राष्ट्रीय चेतना की कमी और राष्ट्रीयता के विलुप्त होने की प्रवृत्ति के भाव पर रचनाकारों को सचेत करते हुए उन्होंने कविता को प्रभावशाली बनाने पर जोर दिया। श्री यादव ने जोर देकर कहा कि कविता स्वयं की व्याख्या भी करती है एवं बहुत कुछ अनकहा भी छोड़ देती है। इस अनकहे को ढूँढ़ने की अभिलाषा ही एक कवि-मन को अन्य से अलग करती है। ऐसे में साहित्यकारों और कवियों का समाज के प्रति दायित्व और भी बढ़ जाता है. उन्होंने परिषद द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन की सराहना करते हुए कहा कि मुख्यभूमि से कटे होने के बावजूद भी यहाँ जिस तरह हिंदी सम्बन्धी गतिविधियाँ चलती रहती हैं, वह प्रशंसनीय है.

कार्यक्रम के आरम्भ में परिषद के अध्यक्ष श्री आर0 पी0 सिंह ने उपस्थिति का स्वागत किया, जबकि प्रधान सचिव श्री बी0 के0 मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कवि सम्मेलन का संयोजक एवं संचालन हिंदी साहित्य कला परिषद् के साहित्य सचिव डाॅ0 व्यासमणि त्रिपाठी ने किया।

डाॅ0 व्यासमणि त्रिपाठी
साहित्य सचिव- हिंदी साहित्य कला परिषद्, पोर्टब्लेयर-744101
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह.

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

बेशक हम स्वतंत्र हो गए

बेशक हम स्वतंत्र हो गए है
क्या आपको लगता नहीं की
स्वतंत्र होने के उपरांत हम
कुछ ज्यादा ही स्वछन्द हो गए है
तमाम वर्जनाओं के साथ साथ
अपनी मर्यादाओं की परिधि को
निरंतर तोड़ते जा रहे है
अपने पंखों को तोड़ हम
क्षितिज तक उड़ना चाह रहे है
हताश परिजनों की कर
उपेक्षा और अवहेलना
अपनी वल्दियत शान से
बताना चाहते है
अपने सिमित ज्ञान के आधार पर
वैश्विक स्तर पर अपनी
असीमित पहचान बनाना चाहते है
आधारहीन एक सुदृढा
आवास बनाना चाहते है

वस्तुतः हमारी देह
बन चुकी है लंका
जहा बज रहा है केवल
आततायी अल्पज्ञानी असुरों का डंका
बन चुके है हम स्वयंभू
जरा भी सहमते नहीं लूटने में
प्रसाद और निराला के
नायिकाओं की आबरू
इनमे शुद्ध आत्माओं का
हो चुका है प्रवेशनिशेध

आओं इस गणतंत्र दिवस पर
ले संकल्प बन हनुमान
सुक्ष्म रूप में करे लंका प्रवेश
करे पुनः सीता शोध
त्याग आपसी प्रतिशोध
यथार्थतः सीता है जहाँ शुचिता पवित्रता
भव्यता न्याय और भक्ति का पर्याय
किसी भी कीमत पर सहन
नहीं होना चाहिए अन्याय
इनके शोधन से बदती है
आत्मबल और आत्मशक्ति
जाग्रत होता अपने इष्ट के प्रति
समर्पण और भक्ति
जिससे होता है अन्याय का प्रतिकार
असुर करते चीत्कार

ज्ञात हो सेतुबंध है नहीं केवल
एक साधारण ऐतिहासिक घटना
है यह समाज को जोड़ने का
एक पावन उपक्रम
जिससे मात खाता है अन्याय
रुपी रावन का पराक्रम
सुग्रीव की मित्रता
त्यागती निजता
है एक ऐसी दोस्ती की पवित्रता
आज के परिवेश में है
जिसकी नितांत आवश्यकता
मानव और शाखामृगों की दोस्ती से
जब होसकता है त्रेतायुगी असुरों का नाश
तो मानव और मानव की दोस्ती के आगे
कलयुगी असुरों की क्या औकात
लिखा जा सकता है
एक नूतन इतिहास

बस सीता की शुचिता बनी रहे
यही है इस संकल्प दिवस पर
हमारी इक्षा
इसीलिए बार बार देनी पड़ती है
सीता को ही अग्निपरीक्षा
चलती है हर बार राम की ही इक्षा
नेपथ्य का यही सत्य है
इस संकल्प दिवस पर अपनी
सीता की शुचिता को नयी चुनौतियों
और नए आयामों के मध्य परखना चाहिए
लगातार नई कसौटियों पर कसना चाहिए
निडर काँटों के बीच से
सुगढ़ गुलाबों का चयन करना चाहिए
बिछाकर राहों में ओसासक्त दूब
और परागित पंखुड़िया
सजा द्वार पर तोरण बन्दनवार
और तिरंगी झंडियाँ
हमें एक नूतन प्रभात की
प्रतीक्षा करनी चाहिए

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

जीने का अभिनय

अनिमेष पाँच वर्ष पूर्व
सॉफ्टवेर इंजिनियर बन
दिल्ली आया
इन पाँच वर्षो में उसने
वह सब पाया
जो एक स्टेटस लाइफ को भाया
चैन और सुकून खोने की
कीमत पर आकर्षक वेतन पॅकेज
व लक्सेरी लाइफ
एक प्यारी सी मोडर्न wife

पर रात रात भर की शिफ्टो ने
असमय ही उसे थका
और सिमटा दिया था
जिंदगी की तेज दौड़ ने
जीवन को मुश्किल बना दिया था
सब कुछ पाने के उपरांत भी
अपने को वह खाली
हाथ पा रहा था

वह हैरान अक्सर सोचता
की जिंदगी जो वह जी रहा है
उसमे जीवन कहाँ है
इन तमाम सुविधाओं के बीच
चैन और संतुष्टि कहाँ है
शांति व सुकून कहाँ है
वह तो जी ही नहीं रहा है
बल्कि जीने का
अभिनय कर रहा है

धीरे धीरे जीवन को
निराशाओं और कुंठाओं ने
समेटना प्रारंभ किया
शरीर और चेहरे को
असमय बुदापे ने
घेरना आरंभ किया

बेशक जीवन बदल रहा है
दुनिया बदल रही है
तमाम झंझावातो के बीच
जिंदगी के मायने बदल रहे है
साथही नियति भी बन गयी है
इन बदलावों के बीच
स्वयं को ढालना
और परिवार को वर्तमान परिवेश में
बेहतर ढंग से पालना
पर यह भी सत्य है की
सच्चे अर्थों में यदि जीवन जीना है
तमाम उपार्जित सुविधाओं का
सुख और आनंद पाना है
तो पहले स्वयं को
स्वस्थ्य रखना है
जहाँ तक इसके विकल्प का प्रश्न है
मल्टी टास्किंग से दूर रहना
नूतन परिवेश में संतोष जैसे
मानव मूल्यों का प्रतिस्थापन
और प्रासंगिकता को समझना
बदलते वक़्त में इसकी उपयोगिता
और पुनर्निरीक्षण करना
इसका अर्थ अकर्मण्यता
कदापि नहीं समझना
अपना बेस्ट देने पर जो मिले
उसी पर संतोष करना

तभी हम इस
जटिलतम जीवन को
सुगमता से जीभर कर जी पायेगे
और जीवन संग्राम में
टिक पायेगे

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

मीरा मांसी

प्रभात की बेला
कालबेल की असमय अनचाही ध्वनि
दूर हो चुकी थी अवनि
स्वयं को सहेज कर
दरवाजे को खोला
सामने एक अजनबी को पाया
लिए हाथों में एक थैला
बरसात के कारण
कपड़ा हो गया था जिसका मैला
तन भी लगभग हो गया था गीला
अन्दर आने को कहकर
बैठक तुरंत खोला
बदलने को दिया कपड़ा
चाय नाश्ते के उपरांत
उन्होंने आने का राज खोला

यादों के झुरमुटों में
बचपन की बातें
अक्सर माँ के साथ उठती
गिरती थी मीरा मासी की सांसे
सगी थी नहीं पर सगी से कम नहीं
दूसरे के गम के आगे
कभी अपने गम को समझा नहीं
जाड़े की नर्म धूप में
छत पर बैठ साथ में धूप सेकना
माँ के हर कम में
पूरी तन्मयता से हाथ बटाना
उनकी दिनचर्या में था शामिल
उनके सानिध्य में आसान
होता था हर कार्य मुश्किल
हम भले ही भूल जाएँ अपना जन्मदिन
भूल जाये मासी यह था नामुमकिन
हर बार एक नयी भेंट
अनवरत खुशी से
ढीली करती अपनी टेंट

माँ के असमय पयान से
हम सभी विचलित थे ही
पर मीरा मासी ने
माँ की कमी खलने दी ही नहीं
अपने आंचल में छिपा कर
हमें बहुत ही समझाया
जीभर कर प्यार और ममता लुटाया
मांसी ने इस कदर हम पर
स्नेह और अपनत्व बरसाया
हमारे चक्कर में कभी कभी
अपने परिवार को भी बिसराया
अपने बच्चो के साथ हमें भी
इस कदर प्यार किया
की माँ को लगभग भुलवा ही दिया

समय अबाध गति से चलता रहा
पापा का स्थानांतरण होता रहा
हम सभी अपने अपने कैरियर को
संभालने में व्यस्त रहे
मांसी के उपहार
हमें समय से मिलते रहे
आज वही उपहार मीरा मांसी के
छोटे भाई थे लेकर आये
साथ में एक दुखद समाचार भी लाये
मांसी रही नहीं दो वर्ष पूर्व ही
सुन के लगा
पैरों के नीचे जमीं ही नहीं
फिर ये उपहार
दो वर्षों से यही सज्जन भेजते थे
हम उनके पैर छूने को विवश थे
शायद उनकी कमी हमें
होने नहीं देना चाहते थे
पर अँधेरे में भी हमें
रखना नहीं चाहते थे
इसी से इस बार स्वयं
चल कर आये थे
आज पहली बार सही मायने में
हमें माँ के खोने का अहसास हुआ
पहली बार अनाथ
होने का आभास हुआ
एकबारगी लगा की काश
यह सत्य इसी तरह छिपा रहता
आशाओं की मृगतृष्णा में ही सही
मै जिया करता
मैं स्तब्ध कभी उनको
कभी उनके लाये उपहारों को देखता
इन अकथ अनकहे अनसुलझे
रिश्तों की डोर को समझता
अंत मैं पाता
इस तरह के रिश्तों को डोर
ही है हमारी संस्कृति
और हमारा शानी
रक्त के रिश्ते भी
भरते है जिनके आगे पानी

शनिवार, 8 जनवरी 2011

सत्य संवेदनाओं की ताकत

अलसाई सुबह
चिड़ियों की चहचाहट से निद्रा हुई भंग
बीती रात के बुखार से
अभी भी टूट रहा था अंग
टोय्फोइड के कारण
माँ पिछले तिन दिनों से
अस्पताल की छटी मंजिल पर भर्ती थी
माँ की देखभाल हेतु
मैंने भी छुट्टी ले रखी थी

माँ के निकट भूमि पर
मैं था शयनित
बगल के बिस्तर पर
एक वृद्धा दंपत्ति था शराणित
वृद्ध का कल ही हुआ था ऑपरेशन
उसके लिए उसका पति ही
था संकटमोचन
कृशकाय और लिए झुकी कमर
अपनी पत्नी की सेवा को सदा तत्पर
दिनभर में न जाने कितनी बार
छ्मंजिली इमारत से
निचे ऊपर करता था
फिर भी कर्कश पत्नी के डांट
और ताने दिनभर सुनता था
फिर भी नहीं थकता था
सदा उसका ख्याल रखने में
रत रहता था

हर रात जब सभी सो जाते
पूरे वार्ड की अनावश्यक बत्तियों
और पंखों को बुझाता
दर्द और थकन से सो चुके लोगों पर
उनके चादर और कम्बल डालता
अंत में आकार पत्नी के पास
उसके सर पर तेल रख थपथपाता
बड़े प्रेम से उसका सर दबाता
लोरियों की तरह कुछ गुनगुनाता

अन्दर तक हिला गया वो
हमारे सुनहरे अतीत की
तस्वीर दिखा गया वो
संस्कार केवल शिक्षा से आती है
इसे झुटालाता दिखा वो

हर सुबह अपनी
भार्या के सिरहाने वो चैती
भजनों की धुन छेड़ता
नीद से उसे उठाता
उसे नित्य कर्म से निवृत कराकर
नाश्ता व दवा खिलाता
मेरी आँखों को भा गया वो
तक़रीबन नित्य ही मेरी निद्रा
उसकी भक्तिरस से सराबोर
चैती से खुलती
मेरी ऑंखें नहीं थकती
उस वृद्ध की तन्मयता को निहारती
उनके हर क्रिया कलाप को
करीब से महसूस और देखने का
लोभ संवरण मैं कर नहीं पाता
उसे निरे ग्रामीण में मैं लुप्त हो रहे
अपने आदर्श और संस्कारों के बीज तलाशता
बहुत कुछ खोजता
पर अंत में अपने को अनुततरित पाकर
पूछ बैठा एक दिन
दादा आखिर इतना दर्द क्यों लेते है आप
इस अस्पताल को भी घर समझते है आप
दादा घर मे और कोई नहीं है क्या
जो इतना परेशान होते है आप
वह मेरी आँखों में आंख
डाल कर बोला
जेब में तम्बाकू की डिबिया टटोला
बेटा पहले तो ये जानो की अगर
मुफ्त में मिला खाने को तो
खाकर नहीं मर जाने को
आज सब दुसरे को सुधारने में लगे रहते है
हम अपने को सुधारने की बात
क्यों पहले नहीं करते है
जो भी सुविधाएँ हमें मिलती हैं
कितनी आत्माएं उसके लिए तरसती हैं
तो क्यों न उसमे से कुछ बचा लिया जाये
क्या पाता उससे किसी का
जीवन बच जाये
बेशक तुम चिंतन भी करते होगे
मेरे और मेरी लुगाई के रिश्ते को लेकर
तुम भी तो कई दिनों से
अपनी माँ को लेकर
परेशान हो अकेले
ये सब केवल दुनिया के नहीं है
केवल झमेले
यह मानवीय रिश्तों और
सत्य संवेदनाओं की ताकत है
अतीत के तारों की गर्माहट है
बेशक कर्कशा है मेरी भार्या
पर जीवन का हर सुख दुःख है
मेरे साथ जिया
मैं जानता हूँ उसके प्यार की ताकत
अपने बुरे दिनों में महसूस की है
सिद्दत से उसकी जरूरत
बीमारी मैं तो सभी कर्कश हो जाते है
अपने हित और अहित को समझ नहीं पाते है
वो अनपढ़ है इसलिए मुझे
आइई लव यु कह नहीं सकती
पर बेटे सच तो ये है की
वह मुझे अपने जान से भी
ज्यादा प्यार है करती

आज की पीढ़ी के प्यार में
कहाँ है वो ताकत
प्यार तो पैसे में तब्दील हो गया है
समाप्त हो चुकी है रिश्तो की गर्माहट
विवाहेतर रिश्तो के पीछे की सच्चाई
कपड़ो की तरह बदलते लुगाई
माँ बाप समेत सभी सम्बन्ध
अपने मायने खो चुके है
गाँव पर भी शहर के प्रभाव पड़े है
इसीलिए आज हम उस दोराहे पर खड़े है
बच्चो को हमारी नहीं है फिकर
मैं अभी जिन्दा हूँ मगर
शहर और सभ्य लोगो से दूर हूँ
इसीलिए नहीं मजबूर हूँ
पाल सकता हूँ अगर
अपने चार बच्चो को
तो सक्षम हूँ पाल सकने में स्वयं को
ये जीवन और इसका दुःख दर्द
प्रभु की कृपा से संचालित है सर्वस
हम तो माध्यम है बस

देख उसके जीवन का फलसफा
उम्र के इस पड़ाव पर भी देख उसका हौसला
मैंने प्रणाम उसको किया
मैं बेजुबान हो गया
सोचता रहा हम इन कंक्रीट के जंगलो में
बेकार ही शिक्षित हो रहे
गाँव के मिटटी की सोढ़ी गंध
आज भी हमसे बेहतर प्रतीत हो रहे
बेबाक कह सकता हूँ की
शहर की संस्कृति के मध्य
मानवीय मूल्य कहीं तेजी से खो रहे

सोमवार, 3 जनवरी 2011

रेत : प्रकाश यादव "निर्भीक"

रेत का ढेर है
यह जिन्दगी
जिसमें अनगिनत
सपनों के घरौंदें
रेत से, रेत पर
बनते और ढहते हैं
पलभर में
हकीकत की दुनियां से
बेहद परे
अपनी कल्पना लोक में
सपने सारे
सच ही तो लगते हैं
इस छोटी सी
समय सीमा के भीतर
सच्चाई के सामने आने तक
इन नाजुक सपनों को
क्या पता कि
रेत कभी भी अपना
साकार रुप धारण नहीं करता
बल्कि जितनी ही जतन से
रखों उन्हें समेटकर
मुट्ठी में
वह उतनी ही तेजी से
फिसलता चला जाता है
मुट्ठी से
और कर जाता है खाली
मुट्ठी को
एक बार फिर
टुटे हुए
सपनों के साथ...

प्रकाश यादव "निर्भीक"
अधिकारी, बैंक ऑफ बड़ौदा, तिलहर शाखा,
जिला शाहजहाँपुर, उ0प्र0 मो. 09935734733
E-mail:nirbhik_prakash@yahoo.co.in

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

हे नूतन वर्ष तू ठहर जरा

परम आदरणीय सुधि पाठक वन्धुओं पिछले काफी दिनों से आप मुझे युवामन पर देख रहे है और सराह रहे है जिससे मुझे सदा कुछ नया करने की प्रेरणा मिलती रहती है पहले तो मै आपका आभारी हूँ और नूतन वर्ष पूर्व संध्या पर हृदय से धन्यवाद् देना चाहता हूँ आप सबको नए वर्ष की ढेर सारी शुभ कामनाओ के साथ मेरी ये रचना उस आतंकी घटना पर आधारित है जिसने पिछलो दिनों वाराणसी को न केवल हिला दिया बल्कि दहला दिया था और ऐसे परिवेश में स्थानीय अवाम में एक नया जोश व जूनून भरने का एक छोटा सा प्रयास है मेरा आशा है सदा की भाति आपको पसंद आयेगा
पुनः धन्यवाद् के साथ सादर

निर्मेश

हे नूतन वर्ष तू ठहर जरा
क्यों ठिठक रहे है पावँ तिहारे
क्यों उदास तुम आज लग रहे
निर्भय आओ तुम पावँ पसारे

भरी आज क्यों आंख तिहारी
तन तेरा निस्तेज है क्यों
मस्तक पर चिंता की लहरे
मुख मंडल खामोश है क्यों

बेशक असुरों की बढ़ी बाढ़ है
आसुरी प्रवृतियाँ है हमें डराती
निसंदेह सहमती आज धरा भी
पर तुम मानवता की हो थाती

ये असुर भटकते अधियारों में
हो चुके कर्म मर्यादाहीन
लक्ष्य दीखता इन असुरों का
बने धरा सौन्दर्यविहींन

देखे कितने विनाश है तुमने
कितनो युद्धहों के तुम गवाह हो
साक्षी रहे प्रलय के तुम भी
नई श्रृष्टि के तुम प्रवाह हो

पनप रही दैवी प्रवृतियाँ भी
लिए हाथ में इनकी गर्दन
होगी अतीत की पुनरावृत्ती
होगा इनका मान मर्दन

सदा रही विनाश से दूर धरा
आजीवन इसने वरदान दिया
हर तन का अवसाद छीन
हर चेहरे पर मुस्कान दिया

ये स्वयं रही अनभिज्ञ मधु से
जीवनभर विषपान किया
इस माँ ने झेले लाखो कष्ट
अविरल श्रृष्टि को पनाह दिया

शश्य श्यामला आर्य भूमि पर
होगा तेरा शत शत वंदन
नई श्रृष्टि की चादर तान
प्रकृति करे तेरा अभिनन्दन

होगा पुनः अमृत का वर्षण
हे नूतन वर्ष तेरे नेतृत्व में
मुखरित होगी पावन प्रकृति
हम अर्याजानो के कृतित्व से

निर्भय आओ तुम सौगात लिए
होती नहीं अब और प्रतीक्षा
करो दानवों का तुम नाश
पूरित मानव की हर इक्क्षा

पथ में बिछा दूब चांदनी
कर युवाशक्ति का आह्वाहन
दूर क्षितिज तक बूंद ओंस की
नयनाभिराम दर्शन पावन

ले अतीत से नूतन सीख
कर पावन भविष्य का निर्माण
नहीं चाहिए और किसी
अपनी जीवन्तता का प्रमाण

अभिनन्दन शत शत वंदन
हे पावन प्रकृति हे वसुंधरा
लिए अंक में चारो पुरुषार्थ
है नमन तुम्हे पावन धरा

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

वेदना से नवोन्मेष की शिखर यात्रा

सहसा ठिठक गए पावँ
देख सामने एक नाव
एक वृद्ध को को तमाम बच्चो के साथ
करते देख अटखेलिया
करते गलबहिया

अरे ये तो वही है
जिसे मेंटल अस्पताल में
देखा था कुछ महीने पहले
चीखते जोर जोर से
पूछने पर नर्से ने बताया
हाल कुछ इस तरह सुनाया

इसके दोनों बेटें निकट भूत में
सीमा पर हो गए शहीद
नाम इसका है अब्दुल वाहिद
पत्नी पहले ही चल बसी थी
यही इनकी आखिरी उम्मीद बची थी
इसी सदमे ने कर दिया इसे पागल
सुन मन हो गया बेकल
दिल दहल उठा था
मैं मौन निस्तब्ध बस
उसे ही देखे जा रहा था

अंत में संवेदना व्यक्त करते
साथ लाये फलो को
उसे ही अर्पित करते
अपने मरीज को देख
मैं बाहर हो गया था
समय के साथ उस घटना को
भी भूल गया था

पर आज वह घाव
पूजने के बजाय हरी हो गयी
आंखे पुनः भर गयी
मुझे लगा की शायद
वह पूरा पगला गया था
क्योकि जिसे देखा था
भीषण दुःख और अवसाद से ग्रसित
वह तो खुल कर आज हस रहा था

जिज्ञासवास मैं उसके करीब आया
उसका देख व्यवहार आंख भर आया
मैंने कहा चाचा आप कैसे है
बोला पहले से बेहतर है
बच्चो के जाने के बाद
जीवन में भर गया था अवसाद
एकबारगी लगा था
जीवन हो गया समाप्त
पर अंतर्मन में जो शक्ति थी व्याप्त
उससे मुझे मिले निर्देश
जीवन में करने है अभी और कुछ शेष

पुनः एक दृढ संकल्प के साथ
तैयार हो गया जीवन से करने दो दो हाथ
बेशक मैंने अपने दो लाल है खोये
पर हमारे पारम्परिक मूल्य
वसुधैव कुटुम्बकम ने
ये अनेक लाल है मुझको दिए
बेटा अब इन अनाथ बच्चो की
देखभाल करता हूँ
अपने पेंसन के सभी पैसे
इन्ही पर खर्च करता हूँ

देश पर मर मिटने हेतु
इन्हें ही प्रेरित करता हूँ
ताकि इन्हें रोजी रोटी के साथ साथ
देश की सेवा का अवसर भी मिल सके
बेटा यह इस देश का है पराक्रम
जहाँ लाइन लगाकर
फौज में भर्ती होकर
जान देना ही है इन कर्णधारों का
प्रारब्ध और उपक्रम
देश की वर्तमान स्थिति से तो
आप हो ही परिचित
इन नेताओं और नौकरशाहों से
हो नहीं आप अपरिचित
देश कैसे रहेगा सुरक्षित सत्रुओं से
इन्हें तो फुर्सत है नहीं
अपनी जेबे भरने से
मची है चारों ओर जो मारा मारी
ऐसे परिवेश में मेरा
छोटा सा प्रयास रहेगा जारी
मरना तो सभी को है ही एक दिन
कम से कम ये देश को बचायेगे
इस आर्यावर्त के इतिहास को दोहरायेगे

अपलक खामोश मैं
उस वृद्ध को देख रहा था
उसके जीवन का फलसफा
समझने का प्रयास कर रहा था
देख रहा था उसके जीवन की
कामना और लालसा
वेदना से नवोन्मेष की शिखर यात्रा
उसके जीवन की जिजिविषिका को
अपने से कम्पयेर कर रहा था
उसके सामने अपने को
बहुत ही तुक्ष
महसूस कर रहा था

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

स्तब्ध मैं विचलित .....

कुम्भस्नान हेतु
सपरिवार मैं इलाहाबाद जा रहा था
रिजेर्वेशन कम्पार्टमेंट में भी
भीड़ बड़ा जा रहा था

बहुत सारे स्नानार्थी
और यात्री पुण्य कमाने
संगम में जा रहे थे
डुबकी लगाने

डिब्बे में सदा की भांति
चना मूंगफली वाल़े व
भिखारी आ जा रहे थे
अपनी अपनी तरह से
अपनी आजीविका कमा रहे थे

उसी भीड़ में हमें भीख
माँगते हुए दो बच्चियां मिली
एक की आंख थी बंद
शायद थी वो अंधी दुसरे की थी खुली

जीर्ण शीर्ण वस्त्रों में
आवर्णित तन
व्यथित मन
बड़े हे करुण रस में
कर रही थी वो विलाप
दग्ध हो गया मन
देख उनका प्रलाप

विदेशी सैलानियों ने
उनके फोटो लिए
चाँद सिक्के के साथ
खाने को भी कुछ दिए
सभी की तरह मैंने भी
कुछ रुपये दिए उनको
देख उनकी करुण गाथा
समझा रहा था मैं
अपने व्यथित मन को

हाय ईश्वर ने
ये क्या किया
असमय ही इनके माँ बापू को
इनसे क्यों छीन लिया

यही सोचते सोचते
स्टेशन आया
नीचे उतरा मैं लेकर सारे सामान
चारो ओर बिखरी भीड़ देख
मन हो गया परेशान
एक किनारे खड़ा मैं
आगे के लिए सोच रहा था
तभी उन बच्चियों को
हंस हंस कर बातें करते
एक कोने मैं देख रहा था

उनके आँखों की
देख चमक
आवाज की खनक
माथा गया ठनक
वो कह रही थी
कितना मजा आया
ऑंखें बंद करके
खुली आँखों वालों को
कितनी खूबसूरती से
बेवकूफ बनाया

स्तब्ध
हो विचलित
कभी मैं आसमान की ओर
कभी उनको देखता रहा
उनके अतीत और भविष्य के
आकान्छाओं के बीच
मैं मूर्तिवत झूलता रहा

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

नया जीवन

ख़ुदकुशी की असफल
कोशिश के बाद अस्पताल के
विस्तर पर मै पड़ा था
बगल में ही एक और मरीज
गंभीर रोग से पीड़ित था
असाध्य रोग से ग्रस्त
पर देखा उसके अन्दर
जीने की प्रबल लालसा
एक मै था की स्वस्थ होकर भी
स्वयं को काल के गाल में
भेजने को उद्यत था

एक खिडकी थी
ठीक उसके पीछे
रोज उसके पास बैठता था
वो आंखे मीचे
मै अक्सर कई बार उससे
बिस्तर बदलने को कहता
करके नए बहाने
वो हर बार टाल जाता

मै उदास उससे ही
बाहर के हाल चाल पूछता
वो हर बार मुझे
कुछ सुन्दर बताता
मेरे अन्दर जीने की
एक नई इच्छा भरता

प्रकृति के तमाम
सौंदर्य का दे हवाला
मेरी इक्षाशक्ति बढाकर उसने
मेरी मृत्यु को लगभग टाला
मुझे ठीक होते देख उसकी
खुशियों का नहीं था पारावार
जबकि उसकी तबियत
बिगड़ रही थी लगातार

एक दिन सुबह उठकर मैंने
आवाज सुनी नहीं उसकी
मेरे नीचे से जमीन सरकी
जिग्यासवास धीरे से उठकर
गया जब उसके बिस्तर
पर उसे मौन पाया
उसके खिड़की के पीछे
बस एक सख्त दीवाल पाया

हतप्रभ मैं कभी उसे
कभी उस दीवाल को देखता
सोचता
बेशक वो जीवन की जंग
भले ही हार गया
पर जाते जाते
अनजाने में ही सही
मुझे नया जीवन
वो दे गया

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

आज का भारत

है कहाँ-कहाँ न प्रगति हुई
चहुँ ओर प्रगति दिखलाई पड़े
अथाह-प्रगति के सागर में
अविराम प्रगति के खम्ब जडे

है लुटेरों का राज यहाँ
पग-पग फैला भ्रष्टाचार
अपराधों की प्रगति हो रही
हर दिन होता अत्याचार

कुछ वर्ष पूर्व हम जीते थे
व्यवस्थित मतवाली लहरों संग
है अस्त-व्यस्त जीवन अब तो
होती भोर अभावों संग

सब कुछ कागज पर होता है
सड़क नालियों का निर्माण
लूट-लूट सरकारी पैसा
रचते नित ’’भ्रष्टाचार-पुराण’’


गुलाम समय में ‘चालीस’ थे
आजादी में सौ आजाद हुए
अब अर्धशतक के पहले ही
एक सौ दस ‘आबाद’ हुए

सरेआम लुटती है अबला
जीवन की गूंजे चित्कार
निशदिन ऐसा फैल रहा है
मानवता पर अत्याचार

जनसंख्या में उन्नति जारी है
अवनति ने कदम बढ़ाये हैं
अभावों की भीषणता ने
पग-पग ध्वज फहराये हैं

फिर भी भाषण में होता है
प्रखर-प्रगति का ही गुणगान
पाश्चत्य सभ्यता में खोकर के
‘‘कहते मेरा भारत महान’’

नेता के भाषण-प्रवाह में
जन-मानस यूँ बह जाता है
मिथ्या वादों की गम्भीर मार से
सारे दुःख सह जाता है

भारत की सोयी जनता जागे
गद्दारों का हो प्रतिकार
तभी देश का भाग्य जगेगा
माँ-‘भारती’ का हो सत्कार

कहीं-कहीं पर अन्न नही है
कहीं-कहीं मिलता न पानी
कहीं-कहीं न घर रहने को
कहीं सदा तड़पी जिन्दगानी !!

एस. आर. भारती

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

पापा का प्यार

अपनी छोटी सी दुनिया में
खो गए थे हम
मन में लिए उच्च शिछा के सपने
दो बहन और एक भाई के साथ
बड़े हो रहे थे हम
पापा के सिमित आय में ही
मजे से चल रहा था गुजरा
एक दुसरे की तकलीफे
थी नहीं हमें गवारा
बड़ी होने के कारण मैं
माँ बापू की थी दुलारी
हर छोटे बड़े घरेलु निर्णयों में
मेरा होता था पलड़ा भारी
पापा चाहते थे
मुझे जान से भी ज्यादा
कितनी बार कहा था
तुमसे दूर होना हमें
तनिक भी नहीं भाता
अचानक पापा के हृदयाघात ने
हमें झकझोर दिया
मेरे सारे सपने को
तक़रीबन ही तोड़ दिया
हृदयाघात के उपरांत
स्वास्थ्यलाभ कर रहे पापा को
मम्मी समझा रही थी
मेरे विवाह की चिंता ही
उन्हें खा रही थी
मैंने अपने सारे सपने को
पापा की खातिर दे दी तिलांजलि
विवाह के लिए भर हामी
शायद भर दी थी उनकी अंजलि
विवाह के उपरांत भरे मन से
दे दी गयी मुझे विदाई
पापा मम्मी के साथ
भाई बहनों की आंखे भी
रो रो कर सूज आयी
देख सबका प्रेम इतना सारा
मेरा भी कलेजा मुह को आया
बरबस आसुओं के सैलाब के साथ
अपने को अनजान लोगो के बीच
ससुराल में पाया
रास्ते भर सोचती रही की
अब पापा का क्या होगा
सोच कर मन काप गया
की मेरे बिना उनका जीवन
कितना सूना होगा
समयचक्र के खेल ने मुझे
ससुराल में व्यस्त कर दिया था
बेशक मोबाइल ने दूरियों को
कम कर दिया था
फिर भी रह रह कर कलेजे में
हूक उठती रही
पापा से मिलने की इक्छा
बलवती होती रही
सोचती पता नहीं पापा कैसे होगे
कैसे उनके दिन और रात कटते होगे
चाय और डिनर पर पापा अब
किसका इंतजार करते होगे
पारवारिक फैसले पर अब
किसकी मुहर लगती होगी
और किससे अपने दिल की बात
शेयर करते होगे
सोचते सोचते मैं अतीत में
इतना खो जाती
तभी अतीत और वर्तमान के बीच
सेतु के रूप में सुमित को
अपने करीब पाती
एक सहचर के रूप में सुमित को पाकर
निश्चिन्त और निशब्द हो जाती
उसकी बाँहों में झूलकर
उनके सानिध्य में कमी कम
खलती थी अपनों की
अफसोस नहीं होता
अपने अपूर्ण सपनों की
संयोग
दीपावली पर भाई के टीका हेतु
सुमित के साथ पीहर पहुची
देख अपनों का व्यवहार
पैरो की जमीं खिसकी
किसी को मेरी परवाह नहीं
मेरे लिए सबके पास वो गर्मजोशी दिखी नहीं
लगा सबके लिए मैं एक अनचाही
वस्तु बन गयी
जब भी मैंने अपने पूर्वाधिकार के साथ
कोई बात कहनी चाही
अपने को उन लोगो से उपेक्षा और
अवहेलना का शिकार ही पाई
पापा ने भी हाल चाल और
बातचीत की खानापूरी ही की
कही भी वो गर्मजोशी नहीं दिखी
हमें तो लगा था की सब
हमें देखते ही हाथो हाथ उठा लेगे
मेरे तो पाव ही जमीं पर नहीं पड़ेगे
लगा लोगो को हो क्या गया
की सब हमसे कन्नी काट रहे
मेरी हर बात जान बूझ कर टाल रहे
मैं हूँ एक अवांछित वस्तु
इसका अहसास करा रहे
मन मेरा जार जार रोना चाहा
तभी बैठक में पापा को
मम्मी से बाते करते पाया
जल्दी से कुमकुम के बाद
गुडिया का कर विवाह
जल्दी से गंगा नहाने की
थी उन्हें चाह
बाद में बबलू की करेंगे
धूम धाम से शादी
करेंगे पूरे अरमान अपने बाकी
बहू को घर में लाने की बेताबी
उनकी बातो में प़ा रही थी
उनके शब्दों में एक
नई खनक प़ा रही थी
जहाँ अपने बिना पापा के निराधार
व शुन्य की थी कल्पना
अफसोस मेरे विछुडाना उनके लिए
बस हो गया था एक सपना
सत्य ही लगा
कर ले बेटी आज भी
त्याग चाहे जितना
बेटे का स्थान उसके लिए
है एक सपना
और आज भी है वो
एक पराये वस्तु जितना
मै जडवत सुनती रही
बातें उनकी सारी
लगा कहाँ गया पापा का
प्यार वो भारी
जिस घर के संस्कार पर था
हमें स्वाभिमान इतना
अपने जिस परिवार पर गुमान था इतना
तरस आयी देख उनकी सोच अदना
हृदय की उग्र पीड़ा ले आंसुओं का समुन्दर
पी लेना चाहा सारे दर्द को अन्दर ही अन्दर
मेरी सिसकियों ने छोड़ दिया
मेरी हिचकियो का साथ
तभी महसूस हुआ कंधे पर
कोई भारी हाथ
पलट कर देखा सुमित मुझे
पीछे से सहला रहे थे
भर बाँहों में मुझे जी भर समझा रहे थे
चलो जल्दी से टीका कर
आओ चले अपने घर
उनके समझाने के साथ ही साथ
मेरी सिसकियाँ बदती जा रही थी
अपने घर की परिभाषा
अब समझ में आ रही थी
जो बातें कभी माँ बापू के बाँहों में
हुआ करती थी
वो आज पती के बाँहों में प़ा रही थी
एक बार पुनः आंचल में दूध
और आखों में है पानी को
चरितार्थ होते देख प़ा रही थी
एक लड़की की व्यथा को
पुनः अपारभाषित प़ा रही थी
भर ले समाज चाहे
कितना भी दम
एक नए सूर्योदय की और
बढेगा बस बातो के सहारे ही
हमारा कदम