एक बार पुनः
अतीत ने अपनी श्रेष्ठता
वर्तमान पर सिद्ध की
हम काफी दिनों से बात
कर रहे थे भ्रष्टाचार पर प्रहार की
एक दूसरे का मुंह देख रहे थे
कौन करे प्रारंभ बस यही सोच रहे थे
इसी बीच उम्र को चुनौती देते हुए
एक सत्तर साल के युवा ने
हमारे बेचैनी को देखा
एक बार पुनः अतीत की अगुआई
करते हुए वर्तमान को सीख
देने की मुद्रा में मोर्चा खोला
न केवल विजयश्री का
किया वरण
वरन भ्रष्टाचार भी मांगता
दिखा शरण
हाँ इस मुद्दे पर देशव्यापी
समर्थन युवाओं ने भरपूर दिया
ऊब चुके है इस व्यवस्था से
अपनी पुरजोर उपस्थिति से
यह सिद्ध किया
काश इसका आगाज
और पहले हो गया होता
तो देश इक्कीसवी सदी में
नए जोश और जज्बातों के साथ
कब का पहुँच गया होता
निसंदेह आज की तमाम
समस्याओं की जननी है
भ्रष्टाचार की यह विषबेल
निश्चित रूप से अब
समाप्त हो जानी चाहिए
यह नूरा कुश्तियों का खेल
पर सनद रहे
अन्ना हजारे से मिली उर्जा को
हमें संजो कर रखना होगा
इस लगी हुई आग को किसी
कीमत पर बुझने देना नहीं होगा
अन्ना के त्याग ने रखी है
जिस सत्य अहिंसा पर आधारित
लड़ाई की पुनः नीव
लगभग वर्तमान परिवेश में
विलुप्त हो चुके गाँधी की
प्रासंगिकता को किया है पुनः सजीव
तभी इस आन्दोलन की
सार्थकता फलित होगी
वर्ना इन भ्रष्टाचारियों की एक
नयी व्यवस्था के साथ
पुनः विषबेल बढेगी
कर ले हम चाहे
कितनी ही ऊँची बाते
करले कितने ही दौर की मुलाकाते
पर सच्चाई यही है कि
अतीत को बिसरा कर
बनती नहीं बातें
निकट अतीत कि घटना ने
इस बात के इतिहास को
पुनः दोहराया
कि सत्य परेशान भले ही हो
पर पराजित कभी हो नहीं पाया
बेशक यह कुछ लोगो के लिए
वही होता रहा है जो
उनको है नहीं भाया
पर देर से ही सही अन्ना ने
उनको भी जमीन पर लाया
संभव है आगे भविष्य में
ऐसे और मोर्चे अवश्य ही खोलने होगे
बेशक अन्ना हमारे साथ नहीं होगे
अतः हमें तैयार और जागरूक
इस निमित्त रहना होगा
एक नूतन शंखनाद के लिए
अन्ना से मिली उर्जा को
हमें सुरक्षित रखना होगा
गुरुवार, 28 अप्रैल 2011
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
चेतना
नई चेतना
नई चेतना, नई आस है
नव बेला की सांझ नई
लोग खड़े हैं राष्ट्र सृजन को
कलुषित मानव हुए विकल
भांति-भांति के तर्क हैं गढ़ते
कहते इससे क्या हो सकता
मंजिल की है बातें करते
चलने पर बेचैनी
बेखौफ जवानी की अंगड़ाई
परिवर्तन का मार्ग प्रसस्त हुआ
प्रथम कदम है शुरूवात
नव उषा की मादकता है
इसकी सुगन्ध में नव जीवन की।
जागी है उम्मीद नई।।
अन्ना हजारे के आन्दिलन को समर्पित और उन लोगों को जिन्होंने भ्रष्टाचार से लड़ने की ठानी।
एम. अफसर खान सागर
शनिवार, 23 अप्रैल 2011
अभियान
जुड़ कर संघर्ष करें...

आइए, भारत को भ्रष्टाचार मुक्त करने का प्रयास करें। सहयोग व सुझाव दें और साथ चलें इस मुहीम में। आज जो मुल्क के हालात हैं उन्हे आप नहीं समझेंगें तो कौन समझेगा? अब वक्त आन पडा है युवाओं को भ्रष्टाचार के इस महाभारत में कूदने का। तलाश है अर्जुन का। समय है आपका। तो बढ़ाइए हाथ, लड़ीये जंग, छेड़िये अभियान अनवरत भ्रष्टाचार के खिलाफ। आप नहीं चेतेंगे, तो कौन आयेगा आगे?
तो शुरू करिये नया जंग....
ए पी जे अब्दुल कलम सर के शब्दों में...
खुद सोचो कि क्या दे सकते हो?
http://youthbrigadeac.blogspot.com
अपने विचार मेल करें...
youthbrigadeac@gmail.com
जुड़ें और इस संघर्ष में साथ दें...
join.ybac@gmail.com
गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
रिश्तों की नीव
आधुनिक
भारतीय समाज में सुदूर
विदेशों कि तमाम सोसल नेट्वोर्किंग
सैएटों को बड़े ही जोशो खारोशों से
अपनाने का उपक्रम
बड़े ही तेजी से चल रहा है
पर अपने ही नीचे की
जमीन खिसक रही है
इसका पता हमें क्या लग रहा है
विर्चुवल वर्ल्ड के स्वागत को
तत्पर दिखते है
रियल वर्ल्ड से कोसों दूर हो रहे है
अपनो की ही नेट्वोर्किंग से
अंजान और क्रमशः दूर हो गए है
एकाकी जीवन में इस कदर खो गए है
टूटते घर और छीजते परिवार
इस व्यथा को चीख कर कह रहे है
फेसबुक पर तो सिस्टर वीक को
उद्यमता से सेलेब्रेट कर रहे है
पर अपनी सगी बहनों की
खबर से अंजान हो रहे है
अपने जीवन के न जाने
कितने मूल्यवान बसंत को जिसने
अजीज भाई के लिए बड़े ही
तत्परता से बलिदान कर डाला
भाई को युवा करने के लिए
अपने यौवन का गला घोट डाला
उस भाई ने इस मर्यादा को ही
बड़े ही सिद्दत से धो डाला
रहे होंगे उन बहनों के
भी कितने अरमान
कभी कम नहीं थे सोसाइटी में
उनके भी मान सम्मान
जब एक अज्ञात अनिष्ट कि
आशंका ने उन्हें स्वयं घर में
कैद के लिए विवश कर दिया था
क्या उस दशा में उस भाई का
कोई फर्ज नहीं था
उस भाई ने अपने को
अपने सपनों कि दुनिया में ही सिमटा लिया
जिनकी बिना पर वह सपने देख रहा था
उन्ही को ठुकरा दिया
न जाने कितनी फ़िल्मी और
गैरफिल्मी गीत भाई बहन के
रिश्ते पर लिखी गयी होगी
जिन्हें पढ़ लिख कर कितनी बार
हमारी आंखे नम हो गयी होगी
पर नम क्यों नहीं होती इन
रियल भाइयों कि आंखे
क्या रह जाएँगी ये सिर्फ
किताब कि बातें
जिन्हें जब चाह पढ़ा और
आंसूं गिरा आँखों को धो लिया
दिल के बोझ को इक्छानुसार
जब चाह कम कर लिया
फिर उन भावनाओं को
पन्नो में दफ़न कर दिया
दूर करना होगा हमें
इन विसंगतियों को
गहराई से समझना होगा
इन रक्त के रिश्तो को
जीवन में एक दिन ऐसा
हर किसी के जीवन में आता है
जीवन के सबसे करीबी और कीमती
रिश्तों के रूप में
माँ बापू का साया
सर से उठ जाता है
ऐसे में मात्र एक बहन ही
रक्त के रिश्ते के रूप में शेष रहती है
बाकी रिश्ते तो बस
रिश्तों के अवशेष सी दिखती है
बहन अगर बड़ी है तो
माँ का प्यार देती है
छोटी बहन का क्या कहना
वह तो बेटियों सी होती है
आंगन का सृंगार होती है
जो कितनी भी आपदा से घिरी हो
पर पापा पर अपने जान को
बेहिचक न्योछावर करती है
आइये सुदृढ़ करे इन
रिश्तों के जीव को
सजीव करे पुनः निर्जीव हो चुके
रिश्तों की नीव को
भारतीय समाज में सुदूर
विदेशों कि तमाम सोसल नेट्वोर्किंग
सैएटों को बड़े ही जोशो खारोशों से
अपनाने का उपक्रम
बड़े ही तेजी से चल रहा है
पर अपने ही नीचे की
जमीन खिसक रही है
इसका पता हमें क्या लग रहा है
विर्चुवल वर्ल्ड के स्वागत को
तत्पर दिखते है
रियल वर्ल्ड से कोसों दूर हो रहे है
अपनो की ही नेट्वोर्किंग से
अंजान और क्रमशः दूर हो गए है
एकाकी जीवन में इस कदर खो गए है
टूटते घर और छीजते परिवार
इस व्यथा को चीख कर कह रहे है
फेसबुक पर तो सिस्टर वीक को
उद्यमता से सेलेब्रेट कर रहे है
पर अपनी सगी बहनों की
खबर से अंजान हो रहे है
अपने जीवन के न जाने
कितने मूल्यवान बसंत को जिसने
अजीज भाई के लिए बड़े ही
तत्परता से बलिदान कर डाला
भाई को युवा करने के लिए
अपने यौवन का गला घोट डाला
उस भाई ने इस मर्यादा को ही
बड़े ही सिद्दत से धो डाला
रहे होंगे उन बहनों के
भी कितने अरमान
कभी कम नहीं थे सोसाइटी में
उनके भी मान सम्मान
जब एक अज्ञात अनिष्ट कि
आशंका ने उन्हें स्वयं घर में
कैद के लिए विवश कर दिया था
क्या उस दशा में उस भाई का
कोई फर्ज नहीं था
उस भाई ने अपने को
अपने सपनों कि दुनिया में ही सिमटा लिया
जिनकी बिना पर वह सपने देख रहा था
उन्ही को ठुकरा दिया
न जाने कितनी फ़िल्मी और
गैरफिल्मी गीत भाई बहन के
रिश्ते पर लिखी गयी होगी
जिन्हें पढ़ लिख कर कितनी बार
हमारी आंखे नम हो गयी होगी
पर नम क्यों नहीं होती इन
रियल भाइयों कि आंखे
क्या रह जाएँगी ये सिर्फ
किताब कि बातें
जिन्हें जब चाह पढ़ा और
आंसूं गिरा आँखों को धो लिया
दिल के बोझ को इक्छानुसार
जब चाह कम कर लिया
फिर उन भावनाओं को
पन्नो में दफ़न कर दिया
दूर करना होगा हमें
इन विसंगतियों को
गहराई से समझना होगा
इन रक्त के रिश्तो को
जीवन में एक दिन ऐसा
हर किसी के जीवन में आता है
जीवन के सबसे करीबी और कीमती
रिश्तों के रूप में
माँ बापू का साया
सर से उठ जाता है
ऐसे में मात्र एक बहन ही
रक्त के रिश्ते के रूप में शेष रहती है
बाकी रिश्ते तो बस
रिश्तों के अवशेष सी दिखती है
बहन अगर बड़ी है तो
माँ का प्यार देती है
छोटी बहन का क्या कहना
वह तो बेटियों सी होती है
आंगन का सृंगार होती है
जो कितनी भी आपदा से घिरी हो
पर पापा पर अपने जान को
बेहिचक न्योछावर करती है
आइये सुदृढ़ करे इन
रिश्तों के जीव को
सजीव करे पुनः निर्जीव हो चुके
रिश्तों की नीव को
सम्मान
अम्बेडकरवादियों का सम्मान


मैं 19 अप्रैल 2011 को लखनऊ में था। 18 अप्रैल को मुगलसरा से श्रमजीवी से लखनऊ पंहुचा। रात्रि विश्राम के बाद चारबाग के रवीन्द्रालय सभागार में 12 बजे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ हवालदार सिंह जी के साथ पहुंचा। अवसर था अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011 सम्मान समारोह का। रामदास आठवले ने उत्तर प्रदेश के 120 अम्बेडकरवादियों को सम्मानित किया। मुख्य रूप से अज़ीज़ इलाहाबादी, डॉ हवालदार सिंह, डॉ झूरी राम, डॉ जयराम सिंह, श्री राम शिव मूर्ति यादव, राम नगीना यादव सहित 120 लोगों को सम्मानित किया गया।
बुधवार, 13 अप्रैल 2011
आगाज़
सभी हजरात को एम अफसर खान सागर का आदाब और सलाम,
बड़े भाई और हमारे अग्रज कृष्ण कुमार यादव जी की जानिब से युवा मन ब्लॉग से जुड़ कर अपनी भावना और विचार रखने का एक सशक्त जगह मिला, इसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। आज मौका बेहतर है इसलिए मैं युवा मन में शुरुवात कवि और साहित्यकार जनाब विजय कुमार मिश्र बुद्धिहीन जी की दो रचना से कर रहा हूँ।
आप सभी के दुआओं का हमेशा तलबगार....
एम अफसर खान सागर
http://afsarpathan.blogspot.com
बड़े भाई और हमारे अग्रज कृष्ण कुमार यादव जी की जानिब से युवा मन ब्लॉग से जुड़ कर अपनी भावना और विचार रखने का एक सशक्त जगह मिला, इसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। आज मौका बेहतर है इसलिए मैं युवा मन में शुरुवात कवि और साहित्यकार जनाब विजय कुमार मिश्र बुद्धिहीन जी की दो रचना से कर रहा हूँ।
आप सभी के दुआओं का हमेशा तलबगार....
एम अफसर खान सागर
http://afsarpathan.blogspot.com
मन की बातें

चलो प्रिये करें मन की बातें
कटते दिन नहीं कटती रातें
द्वार खड़े उसपार नदी के
खड़े-ख्रड़े क्यों हमें बंलाते।
चलो प्रिये...
बरसों पहले जहां मिले हम
सपने ढ़ेर सजाए
सपनों में खोए अब हमतुम
करें वहीं फिर से मुलाकातें।
चलो प्रिये...
हवा में झोंकों से बल खाते
नदी के लहरों पर लहराते
नाव सरीखे क्यों बहती हो
पल्लू को अपने पाल बनाके
आओ प्रिये तुम मेरे तट पर
जहां चांद हंसे तारे मुस्काते।
चलो प्रिये....
नदी की बहती कल-कल धारा
आंखों से कर रही इशारे।
चुप बैठो ऐ, पवन निगोड़े
प्रियतम हमको पास बुलाते
आओ प्रिये करें मन की बातें।।
इबादत
मंदिरों की घंटियां या
मस्जिदे सुबहो अजान
है इबादत एक ही
हिन्दू करें या मुसलमान।
फर्क क्या पड़ता है ऐ, रब
मैं करूं या वो करें
मैं पूजूं पूनम का चंदा
वो निहारे दूज के चांद।
है कहां मतभेद जब
सूरज और चंदा एक है
है कहां तकरार जब
आबो हवा सब एक है।
क्यों घिरे खौफ ये बादल
जब इरादा नेक है
आब गंगा से जुड़ा है
और जुड़ा काबे से पानी।
है नहीं खैरात की यह जिन्दगानी
सांस चलती है खुदा की मेहरबानी।
सिंध हो या हिन्द हो या पाके सरजमीं
सब खुदा के एक बन्दे हिन्दुस्तान-पाकिस्तानी
राम और रहमान में ना फर्क है
धर्म और ईमान में क्या तर्क है।।
विजय बुद्धिहीन
पेशे से अधिशासी इंजीनियर, रेलवे मुगलसराय, दिल से उच्चकोटि के मंचीय कवि। दो काव्य संग्रह ‘दर्द की है गीत सीता’ और ‘भावांजलि’ शीघ्र ही आने वाली है ।
अन्ना से मिली उर्जा को हमें सुरक्षित रखना होगा
एक बार पुनः
अतीत ने अपनी श्रेष्ठता
वर्तमान पर सिद्ध की
हम काफी दिनों से बात
कर रहे थे भ्रष्टाचार पर प्रहार की
एक दूसरे का मुंह देख रहे थे
कौन करे प्रारंभ बस यही सोच रहे थे
इसी बीच उम्र को चुनौती देते हुए
एक सत्तर साल के युवा ने
हमारे बेचैनी को देखा
एक बार पुनः अतीत की अगुआई
करते हुए वर्तमान को सीख
देने की मुद्रा में मोर्चा खोला
न केवल विजयश्री का
किया वरण
वरन भ्रष्टाचार भी मांगता
दिखा शरण
हाँ इस मुद्दे पर देशव्यापी
समर्थन युवाओं ने भरपूर दिया
ऊब चुके है इस व्यवस्था से
अपनी पुरजोर उपस्थिति से
यह सिद्ध किया
काश इसका आगाज
और पहले हो गया होता
तो देश इक्कीसवी सदी में
नए जोश और जज्बातों के साथ
कब का पहुँच गया होता
निसंदेह आज की तमाम
समस्याओं की जननी है
भ्रष्टाचार की यह विषबेल
निश्चित रूप से अब
समाप्त हो जानी चाहिए
यह नूरा कुश्तियों का खेल
पर सनद रहे
अन्ना हजारे से मिली उर्जा को
हमें संजो कर रखना होगा
इस लगी हुई आग को किसी
कीमत पर बुझने देना नहीं होगा
अन्ना के त्याग ने रखी है
जिस सत्य अहिंसा पर आधारित
लड़ाई की पुनः नीव
लगभग वर्तमान परिवेश में
विलुप्त हो चुके गाँधी की
प्रासंगिकता को किया है पुनः सजीव
तभी इस आन्दोलन की
सार्थकता फलित होगी
वर्ना इन भ्रष्टाचारियों की एक
नयी व्यवस्था के साथ
पुनः विषबेल बढेगी
कर ले हम चाहे
कितनी ही ऊँची बाते
करले कितने ही दौर की मुलाकाते
पर सच्चाई यही है कि
अतीत को बिसरा कर
बनती नहीं बातें
निकट अतीत कि घटना ने
इस बात के इतिहास को
पुनः दोहराया
कि सत्य परेशान भले ही हो
पर पराजित कभी हो नहीं पाया
बेशक यह कुछ लोगो के लिए
वही होता रहा है जो
उनको है नहीं भाया
पर देर से ही सही अन्ना ने
उनको भी जमीन पर लाया
संभव है आगे भविष्य में
ऐसे और मोर्चे अवश्य ही खोलने होगे
बेशक अन्ना हमारे साथ नहीं होगे
अतः हमें तैयार और जागरूक
इस निमित्त रहना होगा
एक नूतन शंखनाद के लिए
अन्ना से मिली उर्जा को
हमें सुरक्षित रखना होगा
अतीत ने अपनी श्रेष्ठता
वर्तमान पर सिद्ध की
हम काफी दिनों से बात
कर रहे थे भ्रष्टाचार पर प्रहार की
एक दूसरे का मुंह देख रहे थे
कौन करे प्रारंभ बस यही सोच रहे थे
इसी बीच उम्र को चुनौती देते हुए
एक सत्तर साल के युवा ने
हमारे बेचैनी को देखा
एक बार पुनः अतीत की अगुआई
करते हुए वर्तमान को सीख
देने की मुद्रा में मोर्चा खोला
न केवल विजयश्री का
किया वरण
वरन भ्रष्टाचार भी मांगता
दिखा शरण
हाँ इस मुद्दे पर देशव्यापी
समर्थन युवाओं ने भरपूर दिया
ऊब चुके है इस व्यवस्था से
अपनी पुरजोर उपस्थिति से
यह सिद्ध किया
काश इसका आगाज
और पहले हो गया होता
तो देश इक्कीसवी सदी में
नए जोश और जज्बातों के साथ
कब का पहुँच गया होता
निसंदेह आज की तमाम
समस्याओं की जननी है
भ्रष्टाचार की यह विषबेल
निश्चित रूप से अब
समाप्त हो जानी चाहिए
यह नूरा कुश्तियों का खेल
पर सनद रहे
अन्ना हजारे से मिली उर्जा को
हमें संजो कर रखना होगा
इस लगी हुई आग को किसी
कीमत पर बुझने देना नहीं होगा
अन्ना के त्याग ने रखी है
जिस सत्य अहिंसा पर आधारित
लड़ाई की पुनः नीव
लगभग वर्तमान परिवेश में
विलुप्त हो चुके गाँधी की
प्रासंगिकता को किया है पुनः सजीव
तभी इस आन्दोलन की
सार्थकता फलित होगी
वर्ना इन भ्रष्टाचारियों की एक
नयी व्यवस्था के साथ
पुनः विषबेल बढेगी
कर ले हम चाहे
कितनी ही ऊँची बाते
करले कितने ही दौर की मुलाकाते
पर सच्चाई यही है कि
अतीत को बिसरा कर
बनती नहीं बातें
निकट अतीत कि घटना ने
इस बात के इतिहास को
पुनः दोहराया
कि सत्य परेशान भले ही हो
पर पराजित कभी हो नहीं पाया
बेशक यह कुछ लोगो के लिए
वही होता रहा है जो
उनको है नहीं भाया
पर देर से ही सही अन्ना ने
उनको भी जमीन पर लाया
संभव है आगे भविष्य में
ऐसे और मोर्चे अवश्य ही खोलने होगे
बेशक अन्ना हमारे साथ नहीं होगे
अतः हमें तैयार और जागरूक
इस निमित्त रहना होगा
एक नूतन शंखनाद के लिए
अन्ना से मिली उर्जा को
हमें सुरक्षित रखना होगा
बुधवार, 6 अप्रैल 2011
छात्रावास की यादें
विश्वविद्यालय के पूर्व
छात्रो के समागम का पाकर निमंत्रण
बिह्वल हो गया आह्लादित मन
मन में अपार अकथ अव्यक्त विचार
और उदगार की संभावनाएं
लहरों की तरह उठ और गिर रही थी
किस किस से होगी मुलाकात
सोच तन मन सिहरित हो रही थी
कौन अब क्या कर रहा होगा
कौन अब कैसा दीख रहा होगा
कितनो के बाल सर पर होगे
कितनो के सर ख़ाली हो गए होगे
सभी अपने बच्चो को साथ लाये होगे
मिल कर सब मौज और मस्ती करेगे
अतीत की प्यारी बातें करेंगे
मन के किसी कोने में थी यह आस
करेंगे पुरानी यादें
जाकर अपने छात्रावास
निर्धारित तिथि पर मैं
सम्मेलन के लिए चल पड़ा
देखकर शानदार आयोजन
में हतप्रभ था खड़ा
परिसर के एक एक कोने से थी यादें जुडी
पर थी यहाँ किसको किसकी पड़ी
मित्रों से होती रही बस
औपचारिक मुलाकातें
होती रही बस कैरियर
और भविष्य की बातें
किसी को अतीत पर चिंता नहीं चर्चा की
देख सबका प्रोफेसनल व्यवहार
मैंने भी कोई परिचर्चा की नहीं
सब दावतें उड़ाने में व्यस्त
सूरज होने को था अस्त
मैं अकेले ही चल पड़ा
अपने छात्रावास की ओर
वहां भी दीख रहा था काफी शोर
थोड़ी ही देर में था मैं
अपने कमरे के पास
वह कमरा मेरे लिए था खास
बाहर पड़ रहा था पाला
कमरे पर लटक रहा था ताला
बरामदे में खड़ा मैं उसमे
रहने वाले छात्र की राह देख रहा था
खड़ा खड़ा मैं अतीत में खो गया था
इतने अन्तराल के उपरांत भी
छात्रावास परिसर को कुछ परिवर्तन के बाद
भी तक़रीबन जस का तस पा रहा था
कोने वह बरगद का पेड़ आज भी
अविचल खड़ा लहरा रहा था
उस पर आज भी पंछियों का बसेरा
स्पष्ट दिख रहा था
जब भी कभी हम उदास होते
सुकून के लिए उसकी छावं में होते
गाँव से जब माँ बापू की आती
प्यार और सीख भरी पाती
उसी के नीचे बैठ उसे पदते
साथ में भेजे गए मेवे और
आचार का वही बैठ स्वाद चखते
माँ की बार बार की सीख और प्यार देख
जब कभी उसकी याद में आंसू चलते
उसकी छाव को हम माँ का आंचल समझ
उसकी गोद गोद में लेटे होते
माँ से दूर होते हुए भी माँ के करीब होते
यहाँ आकर माँ की याद पुनः ताजी हो गयी थी
जो की अब इस दुनिया में नहीं थी
न चाहते हुए भी आँखों के कोरो से
आंसुओं की बगावत चल रही थी
स्वयं को पुनः संभाल कर देखा
दूसरी और सेमर का विशाल वृक्ष
आज भी झूम रहा था
उससे गिरते हुए नाव प्रतीको को
छात्रावास के फुहारे में चलाना याद आ रहा था
सामने पंछियाना पेडो के समूह
जिसके नीचे कभी हम खेलते थे हु तू तू
उनके लाल लाल फूलो से पूरा
परिसर भरा हुआ था
मानो मेरे स्वागत को मेरा
इंतजार कर रहा था
सामने की क्यारियों में आज भी
गेंदा और गुलाब था खिला हुआ
उसकी खुशबू से सारा
परिसर था गमका हुआ
लान में आज भी मोरो के समूह
निर्भय विचरण कर रहे थे
भौरों के झुण्ड इस समय तक भी
फूलो पर मंडरा रहे थे
पंछियों के झुण्ड भी पेडो पर
स्थित अपने बसेरे पर जा रहे थे
खेल के मैदान से पसीना पोछते हुए छात्र
अपने छात्रावासों को जा रहे थे
दूर सड़क उस पर भगवान भाष्कर भी
क्रमशः अस्त हो रहे थे
सारा दृश्य ही मुझे परिचित लग रहा था
मानो सब मुझे पहचान मेरे
स्वागत को इच्छुक हो रहे थे
लान में पड़े बेंच पर बैठकर
मै आह्लादित था पूरा परिसर देखकर
पर साथ ही सोच रहा था कि
आज के मानव का हो गया है
कितना व्यावसायिक और मशीनीकरण
इमोशन और भावनाओ का हो गया है क्षरण
वह भूल गया है अतीत की समृद्ध
आधारशिला पर खड़ा करना
अपने भविष्य का महल
येन केन करना चाहता है बस
अपनी महत्वाकांछाओं का वरण
भूल चूका है समृद्ध यादों और
छोटी छोटी बातो में करना
खुशियों की तलाश
ढूढता रहता है पागलों की तरह
तीव्र ग्रीष्म में पलाश
झरोखों से आती प्यारी शीतल
पवन को छोड़ कर
समुद्री तुफानो में उड़ना पसंद करता है
लगातार और ऊँचा उड़ने की ख्वाइश में
असमय अपनी मृत्यु को आमंत्रण देता है
इन चलते फिरते बुद्धिजीवी लोगो से
बेहतर इन मूक प्राकृत उपादानो के
स्वागत से मै निरुत्तर और
निर्जीव सा हो गया था
खोकर अतीत की यादों में
इतने सजीवो के बीच में
अपने आप के निर्जीव होने पर
भी इतर रहा था
छात्रो के समागम का पाकर निमंत्रण
बिह्वल हो गया आह्लादित मन
मन में अपार अकथ अव्यक्त विचार
और उदगार की संभावनाएं
लहरों की तरह उठ और गिर रही थी
किस किस से होगी मुलाकात
सोच तन मन सिहरित हो रही थी
कौन अब क्या कर रहा होगा
कौन अब कैसा दीख रहा होगा
कितनो के बाल सर पर होगे
कितनो के सर ख़ाली हो गए होगे
सभी अपने बच्चो को साथ लाये होगे
मिल कर सब मौज और मस्ती करेगे
अतीत की प्यारी बातें करेंगे
मन के किसी कोने में थी यह आस
करेंगे पुरानी यादें
जाकर अपने छात्रावास
निर्धारित तिथि पर मैं
सम्मेलन के लिए चल पड़ा
देखकर शानदार आयोजन
में हतप्रभ था खड़ा
परिसर के एक एक कोने से थी यादें जुडी
पर थी यहाँ किसको किसकी पड़ी
मित्रों से होती रही बस
औपचारिक मुलाकातें
होती रही बस कैरियर
और भविष्य की बातें
किसी को अतीत पर चिंता नहीं चर्चा की
देख सबका प्रोफेसनल व्यवहार
मैंने भी कोई परिचर्चा की नहीं
सब दावतें उड़ाने में व्यस्त
सूरज होने को था अस्त
मैं अकेले ही चल पड़ा
अपने छात्रावास की ओर
वहां भी दीख रहा था काफी शोर
थोड़ी ही देर में था मैं
अपने कमरे के पास
वह कमरा मेरे लिए था खास
बाहर पड़ रहा था पाला
कमरे पर लटक रहा था ताला
बरामदे में खड़ा मैं उसमे
रहने वाले छात्र की राह देख रहा था
खड़ा खड़ा मैं अतीत में खो गया था
इतने अन्तराल के उपरांत भी
छात्रावास परिसर को कुछ परिवर्तन के बाद
भी तक़रीबन जस का तस पा रहा था
कोने वह बरगद का पेड़ आज भी
अविचल खड़ा लहरा रहा था
उस पर आज भी पंछियों का बसेरा
स्पष्ट दिख रहा था
जब भी कभी हम उदास होते
सुकून के लिए उसकी छावं में होते
गाँव से जब माँ बापू की आती
प्यार और सीख भरी पाती
उसी के नीचे बैठ उसे पदते
साथ में भेजे गए मेवे और
आचार का वही बैठ स्वाद चखते
माँ की बार बार की सीख और प्यार देख
जब कभी उसकी याद में आंसू चलते
उसकी छाव को हम माँ का आंचल समझ
उसकी गोद गोद में लेटे होते
माँ से दूर होते हुए भी माँ के करीब होते
यहाँ आकर माँ की याद पुनः ताजी हो गयी थी
जो की अब इस दुनिया में नहीं थी
न चाहते हुए भी आँखों के कोरो से
आंसुओं की बगावत चल रही थी
स्वयं को पुनः संभाल कर देखा
दूसरी और सेमर का विशाल वृक्ष
आज भी झूम रहा था
उससे गिरते हुए नाव प्रतीको को
छात्रावास के फुहारे में चलाना याद आ रहा था
सामने पंछियाना पेडो के समूह
जिसके नीचे कभी हम खेलते थे हु तू तू
उनके लाल लाल फूलो से पूरा
परिसर भरा हुआ था
मानो मेरे स्वागत को मेरा
इंतजार कर रहा था
सामने की क्यारियों में आज भी
गेंदा और गुलाब था खिला हुआ
उसकी खुशबू से सारा
परिसर था गमका हुआ
लान में आज भी मोरो के समूह
निर्भय विचरण कर रहे थे
भौरों के झुण्ड इस समय तक भी
फूलो पर मंडरा रहे थे
पंछियों के झुण्ड भी पेडो पर
स्थित अपने बसेरे पर जा रहे थे
खेल के मैदान से पसीना पोछते हुए छात्र
अपने छात्रावासों को जा रहे थे
दूर सड़क उस पर भगवान भाष्कर भी
क्रमशः अस्त हो रहे थे
सारा दृश्य ही मुझे परिचित लग रहा था
मानो सब मुझे पहचान मेरे
स्वागत को इच्छुक हो रहे थे
लान में पड़े बेंच पर बैठकर
मै आह्लादित था पूरा परिसर देखकर
पर साथ ही सोच रहा था कि
आज के मानव का हो गया है
कितना व्यावसायिक और मशीनीकरण
इमोशन और भावनाओ का हो गया है क्षरण
वह भूल गया है अतीत की समृद्ध
आधारशिला पर खड़ा करना
अपने भविष्य का महल
येन केन करना चाहता है बस
अपनी महत्वाकांछाओं का वरण
भूल चूका है समृद्ध यादों और
छोटी छोटी बातो में करना
खुशियों की तलाश
ढूढता रहता है पागलों की तरह
तीव्र ग्रीष्म में पलाश
झरोखों से आती प्यारी शीतल
पवन को छोड़ कर
समुद्री तुफानो में उड़ना पसंद करता है
लगातार और ऊँचा उड़ने की ख्वाइश में
असमय अपनी मृत्यु को आमंत्रण देता है
इन चलते फिरते बुद्धिजीवी लोगो से
बेहतर इन मूक प्राकृत उपादानो के
स्वागत से मै निरुत्तर और
निर्जीव सा हो गया था
खोकर अतीत की यादों में
इतने सजीवो के बीच में
अपने आप के निर्जीव होने पर
भी इतर रहा था
मंगलवार, 29 मार्च 2011
गंतव्य
कार्यालयी कार्य से मैं
था लोखंवाला मुंबई के प्रवास पर
कार्य समाप्ति के उपरांत
स्थानीय एक मित्र ने बुलाया था
मुझे रात्रि सात बजे डिनर के लिए
अपने आवास पर
औपचारिक अभिवादन के साथ
चाय पीते हुए हो रही थी
बातें अतीत की सारी
पर कहीं भी दिख नहीं रही थी
डिनर की तैयारी
मैंने मेजबान मित्र से कहा
बॉस क्या खिला रहे हो आज डिनर में
मुझे निकलना है
आज की ही रात में
बोला चलते है काकोरी हाउस
जम के खायेंगे काकोरी कबाब
बड़ा उम्दा है उसका स्वाद
मैंने कहा काकोरी कबाब
यह क्या बला है
बोला क्या यार काकोरी हाउस का
काकोरी कबाब नहीं जानते हो
तुम यार हिंदुस्तान को
क्या पहचानते हो
अक्खा मुंबई कहलो या अक्खा हिंदुस्तान
या विदेशों तक में मशहूर है
इसका स्वाद ही तो हमारा गुरुर है
मैंने कहा यार मैं तो
काकोरी कांड के बारे में ही जानता हूँ
लखनऊ के पास एक गाँव है मानता हूँ
इससे अपने स्वतंत्रता का इतिहास पहचानता हूँ
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी आर्यसमाजी
रामप्रसाद बिस्मिल अस्फाकुल्लाह आजाद
आदि के बलिदानों को बस
इससे जुड़ा जानता हूँ
समीप में खड़ा उनका बेटा
आश्चर्य से मुझे देख रहा था
मानो मैं किसी
स्वप्न की बातें कर रहा था
मित्र ने कहा की हाँ हाँ कही पढ़ा है
किसी काकोरी कांड के बारे में
ठीक से मालूम नहीं मेरा नोलेज भी कम है
इतिहास के गलियारे में
छोडो आओ चले
काकोरी कबाब का लज्जत चखे
वहां की रंगीनियत को
जी भर कर देखें
मैं शून्य में ताकता रहा
अतीत में बिस्मिल के साथ
साक्षात्कार करता रहा
बिस्मिल कह रहे थे
क्या यही है हमारी भावी पीढ़ी
जो निसंकोच आगे बढ रही
लगा कर हमारे बलिदानों की सीढ़ी
क्या इन्ही दिनों के लिए हमने
राष्ट्रप्रेम के माले में त्याग और
बलिदानों की मोती पिरोई थी
हर बार इसी धरा पर आने के लिए
फांसी के समय ईश्वर से
अनुशंषा की थी
अपने परिवार की चिंता न कर
पुरे देश को अपना परिवार
समझाने की जुर्रत की थी
सब्र मेरा भी टूट चला था
आंसुओं ने भी आखों का साथ
देना छोड़ दिया था
बिह्वल नतमस्तक हो मैं कह रहा था
मान्यवर आप घबराये नहीं
केवल इन्हें ही अपना पीढ़ी माने नहीं
हाँ बेशक है ये अफ़सोस की बात
पर मानिये है ये अपवाद
आज भी हमारे जैसे बहुत लोग है
जो आप जैसे के
बलिदानों की कदर कर रहें है
आज जिस आबोहवा में हम
खुल कर सास ले रहे है
निसंदेह इसे आप ही की
देन मान रहे है
तैयार होकर मित्र ने
एकाएक हमें हिलाया
उस स्वप्न से मुझे जगाया
मैंने कहा मित्र मैं तो शाकाहारी हूँ
काकोरी कबाब का मेरे लिए
क्या औचित्य
मैं तो खाऊंगा वही
जो खाता हूँ नित्य
मेरा आपसे मिलने का ही
था उपक्रम
जो हो गया पूरा
आप काकोरी कबाब का स्वाद ले
अभी मेरा कुछ काम है अधूरा
कह मैं अपने
गंतव्य को चला
था लोखंवाला मुंबई के प्रवास पर
कार्य समाप्ति के उपरांत
स्थानीय एक मित्र ने बुलाया था
मुझे रात्रि सात बजे डिनर के लिए
अपने आवास पर
औपचारिक अभिवादन के साथ
चाय पीते हुए हो रही थी
बातें अतीत की सारी
पर कहीं भी दिख नहीं रही थी
डिनर की तैयारी
मैंने मेजबान मित्र से कहा
बॉस क्या खिला रहे हो आज डिनर में
मुझे निकलना है
आज की ही रात में
बोला चलते है काकोरी हाउस
जम के खायेंगे काकोरी कबाब
बड़ा उम्दा है उसका स्वाद
मैंने कहा काकोरी कबाब
यह क्या बला है
बोला क्या यार काकोरी हाउस का
काकोरी कबाब नहीं जानते हो
तुम यार हिंदुस्तान को
क्या पहचानते हो
अक्खा मुंबई कहलो या अक्खा हिंदुस्तान
या विदेशों तक में मशहूर है
इसका स्वाद ही तो हमारा गुरुर है
मैंने कहा यार मैं तो
काकोरी कांड के बारे में ही जानता हूँ
लखनऊ के पास एक गाँव है मानता हूँ
इससे अपने स्वतंत्रता का इतिहास पहचानता हूँ
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी आर्यसमाजी
रामप्रसाद बिस्मिल अस्फाकुल्लाह आजाद
आदि के बलिदानों को बस
इससे जुड़ा जानता हूँ
समीप में खड़ा उनका बेटा
आश्चर्य से मुझे देख रहा था
मानो मैं किसी
स्वप्न की बातें कर रहा था
मित्र ने कहा की हाँ हाँ कही पढ़ा है
किसी काकोरी कांड के बारे में
ठीक से मालूम नहीं मेरा नोलेज भी कम है
इतिहास के गलियारे में
छोडो आओ चले
काकोरी कबाब का लज्जत चखे
वहां की रंगीनियत को
जी भर कर देखें
मैं शून्य में ताकता रहा
अतीत में बिस्मिल के साथ
साक्षात्कार करता रहा
बिस्मिल कह रहे थे
क्या यही है हमारी भावी पीढ़ी
जो निसंकोच आगे बढ रही
लगा कर हमारे बलिदानों की सीढ़ी
क्या इन्ही दिनों के लिए हमने
राष्ट्रप्रेम के माले में त्याग और
बलिदानों की मोती पिरोई थी
हर बार इसी धरा पर आने के लिए
फांसी के समय ईश्वर से
अनुशंषा की थी
अपने परिवार की चिंता न कर
पुरे देश को अपना परिवार
समझाने की जुर्रत की थी
सब्र मेरा भी टूट चला था
आंसुओं ने भी आखों का साथ
देना छोड़ दिया था
बिह्वल नतमस्तक हो मैं कह रहा था
मान्यवर आप घबराये नहीं
केवल इन्हें ही अपना पीढ़ी माने नहीं
हाँ बेशक है ये अफ़सोस की बात
पर मानिये है ये अपवाद
आज भी हमारे जैसे बहुत लोग है
जो आप जैसे के
बलिदानों की कदर कर रहें है
आज जिस आबोहवा में हम
खुल कर सास ले रहे है
निसंदेह इसे आप ही की
देन मान रहे है
तैयार होकर मित्र ने
एकाएक हमें हिलाया
उस स्वप्न से मुझे जगाया
मैंने कहा मित्र मैं तो शाकाहारी हूँ
काकोरी कबाब का मेरे लिए
क्या औचित्य
मैं तो खाऊंगा वही
जो खाता हूँ नित्य
मेरा आपसे मिलने का ही
था उपक्रम
जो हो गया पूरा
आप काकोरी कबाब का स्वाद ले
अभी मेरा कुछ काम है अधूरा
कह मैं अपने
गंतव्य को चला
शुक्रवार, 25 मार्च 2011
पाखी जियो हजारों साल...
पाखी जियो हजारों साल.
मस्ती करो और धमाल.
यूँ ही खूब कमाओ नाम.
जन्मदिन पर यही पैगाम।
एस. आर. भारती
मैनेजर- नेशनल स्पीड पोस्ट सेंटर, कानपुर
कानपुर जी.पी.ओ. -208001
लेबल:
आकांक्षा यादव,
एस. आर. भारती,
के.के.यादव,
बधाई,
बाल कविता
मंगलवार, 22 मार्च 2011
दिवास्वप्न
आज धरमू
घर से सुबह सात बजे सुबह ही
काम के लिए निकल गया
तबियत थोड़ी नासाज थी
फिर भी मण्डी पहुच गया
कई दिनों की बीमारी ने उसे
कमजोर इस कदर कर दी थी
बची खुची जमा पूजी भी
दवा के नाम पर होम हो गयी थी
आज सुबह मुनिया के अनुनय ने
उसे व्यथित कर दिया था
न चाहते हुए भी काम पर जाने को
मजबूर कर दिया था
बापू हमके उ बंदूकवाला पिचकारी चाहिए
मोनू के पापा ओका कल्हे लइके दीन है
अउर अबकी हमके औ गुडिया वदे
फ़िराक वाला सुइट लई के दियो
ओमे हम बहुतै अच्छा लागब
उहे पहीन के तोहे अउर
माई के टीका कारब
सोचते सोचते पता ही नहीं चला की
वह मण्डी कब पहुच गया
जाकर मजदूरों की लाइन में
खड़ा हो गया
आज त्यौहार के कारण
वैसे भी मजदूरो की भीड़ बड़ी थी
पर मालिको की कमी भी
साफ दीख रही थी
कुछ आये भी तो उसे कमजोर देख
उसकी तरफ ताके तक नहीं
कुछ ने बातें तो की पर
वाजिब मजदूरी देने को तैयार नहीं
सोचते अउर बातें करते करते
दोपहर होने को आयी
बात कही बन नहीं पाई
अंत में एक ठीकेदार ने
उस पर तरस खाया
आधी मजदूरी पर तय कर
उसे अपनी साईट पर लाया
धरमू लग गया काम पर जी जान से
शाम की मजदूरी के प्लान में
सोच रहा था की आज की मजदूरी से
कुछ खाने के सामान के साथ
मुनिया की पिचकारी जरुर लायेंगे
उसेक चहरे की ख़ुशी को
तबियत से देखेंगे
अगर कल परसों भी काम लग गया
तब उसके अउर गुडिया के
फ्राक के लिए भी सोचेंगे
आगे भी काम पाने की लालसा में
बीमारी से उठे बदन से उसने
भरपूर मेहनत किया
ठीकेदार को खुश करने का
हरसंभव प्रयास किया
साथ में लाये रोटी और अचार को भी
बिसराय कर किनारे कर दिया
कमजोर बदन आखिर
ये कब तक सहता
धरमू साईट पर ही अचानक
बुखार की चपेट में पुनः आ गया
कापते पैरो ने उसका और चलना
मुश्किल कर दिया
एकाएक वह बांस से गिर गया
एक पटरे में फस उसका
पैर भी टूट गया
ठीकेदार चिल्लाया अरे साले
ये तुम्हे क्या हो गया
साले ने एक अटिया सेमेंट
ख़राब कर दिया
चल भाग साले यहाँ से
तुम लोगो पर दया करना बेकार है
थाम ये बीस रुपये
यही तुम्हारी अब तक की पगार है
धरमू बीस का नोट थामे
वही बैठ गया
कभी अपने टूटे पैर को
कभी उस नोट को देखता रहा
सोचता रहा की अब क्या होगा
इससे अब कौन सा
पूरा अरमान होगा
मुनिया और गुडिया के
सपनों का क्या होगा
उनके भाग्य में क्या दिवास्वप्न ही होगा
ईश्वर ने मुझे बचा ही क्यों लिया
मै मर क्यों नहीं गया
कम से कम इस संताप से
तो दूर रहता
परिवार के आंसूं देखने से
बच गया होता
पर वह शायद कैसे मरता
यदि मर जाता
तो दुःख पीड़ा और अवसाद के
नए प्रतिमान फिर
कौन बनता
घर से सुबह सात बजे सुबह ही
काम के लिए निकल गया
तबियत थोड़ी नासाज थी
फिर भी मण्डी पहुच गया
कई दिनों की बीमारी ने उसे
कमजोर इस कदर कर दी थी
बची खुची जमा पूजी भी
दवा के नाम पर होम हो गयी थी
आज सुबह मुनिया के अनुनय ने
उसे व्यथित कर दिया था
न चाहते हुए भी काम पर जाने को
मजबूर कर दिया था
बापू हमके उ बंदूकवाला पिचकारी चाहिए
मोनू के पापा ओका कल्हे लइके दीन है
अउर अबकी हमके औ गुडिया वदे
फ़िराक वाला सुइट लई के दियो
ओमे हम बहुतै अच्छा लागब
उहे पहीन के तोहे अउर
माई के टीका कारब
सोचते सोचते पता ही नहीं चला की
वह मण्डी कब पहुच गया
जाकर मजदूरों की लाइन में
खड़ा हो गया
आज त्यौहार के कारण
वैसे भी मजदूरो की भीड़ बड़ी थी
पर मालिको की कमी भी
साफ दीख रही थी
कुछ आये भी तो उसे कमजोर देख
उसकी तरफ ताके तक नहीं
कुछ ने बातें तो की पर
वाजिब मजदूरी देने को तैयार नहीं
सोचते अउर बातें करते करते
दोपहर होने को आयी
बात कही बन नहीं पाई
अंत में एक ठीकेदार ने
उस पर तरस खाया
आधी मजदूरी पर तय कर
उसे अपनी साईट पर लाया
धरमू लग गया काम पर जी जान से
शाम की मजदूरी के प्लान में
सोच रहा था की आज की मजदूरी से
कुछ खाने के सामान के साथ
मुनिया की पिचकारी जरुर लायेंगे
उसेक चहरे की ख़ुशी को
तबियत से देखेंगे
अगर कल परसों भी काम लग गया
तब उसके अउर गुडिया के
फ्राक के लिए भी सोचेंगे
आगे भी काम पाने की लालसा में
बीमारी से उठे बदन से उसने
भरपूर मेहनत किया
ठीकेदार को खुश करने का
हरसंभव प्रयास किया
साथ में लाये रोटी और अचार को भी
बिसराय कर किनारे कर दिया
कमजोर बदन आखिर
ये कब तक सहता
धरमू साईट पर ही अचानक
बुखार की चपेट में पुनः आ गया
कापते पैरो ने उसका और चलना
मुश्किल कर दिया
एकाएक वह बांस से गिर गया
एक पटरे में फस उसका
पैर भी टूट गया
ठीकेदार चिल्लाया अरे साले
ये तुम्हे क्या हो गया
साले ने एक अटिया सेमेंट
ख़राब कर दिया
चल भाग साले यहाँ से
तुम लोगो पर दया करना बेकार है
थाम ये बीस रुपये
यही तुम्हारी अब तक की पगार है
धरमू बीस का नोट थामे
वही बैठ गया
कभी अपने टूटे पैर को
कभी उस नोट को देखता रहा
सोचता रहा की अब क्या होगा
इससे अब कौन सा
पूरा अरमान होगा
मुनिया और गुडिया के
सपनों का क्या होगा
उनके भाग्य में क्या दिवास्वप्न ही होगा
ईश्वर ने मुझे बचा ही क्यों लिया
मै मर क्यों नहीं गया
कम से कम इस संताप से
तो दूर रहता
परिवार के आंसूं देखने से
बच गया होता
पर वह शायद कैसे मरता
यदि मर जाता
तो दुःख पीड़ा और अवसाद के
नए प्रतिमान फिर
कौन बनता
मंगलवार, 15 मार्च 2011
महिला सशक्तीकरण सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार - आकांक्षा यादव
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ (8 मार्च) पर पोर्टब्लेयर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारम्भ अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाए एवं चर्चित साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने दीप जलाकर किया। श्री यादव ने अपने उदबोधन में कहा कि - ‘‘नारी ही सृजन का आधार है और इसके विभिन्न रूपों को पहचानने की जरूरत है। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस इस तथ्य को उजागर करता है कि विश्व शान्ति और सामाजिक प्रगति को कायम रखने तथा मानवाधिकार और मूलभूत स्वतंत्रता को पूर्णरूप से हासिल करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, समानता और उनके विकास के साथ-साथ महिलाओं के योगदान को मान्यता प्रदान करना भी अपेक्षित है।‘‘
संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं युवा लेखिका सुश्री आकांक्षा यादव ने महिला सशक्तीकरण को सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार बताया। बदलते परिवेश में समाज में महिलाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं आज राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, मीडिया, कला, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, ब्लागिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं।
पोर्टब्लेयर प्रधान डाकघर की पोस्टमास्टर श्रीमती एम. मरियाकुट्टी ने कहा कि-'' संविधान में महिला सशक्तीकरण के अनेक प्रावधान हैं पर दूरदराज और ग्रामीण स्तर तक भी लोगों को उनके बारे में जागरुक करने की जरूरत है। सुश्री सुप्रभा ने इस अवसर पर नारी की भूमिका के अवमूल्यन के लिए विज्ञापनों और चन्द फिल्मों को दोषी ठहराया जो नारी को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सुश्री शांता देब ने कहा कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ भगवान वास करते हैं, फिर भी नारी के प्रति समाज का रवैया दोयम है। सुश्री जयरानी ने उन महिलाओं पर प्रकाश डाला जो उपेक्षा के बावजूद समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल हुईं। इसके अलावा अन्य तमाम लोगों ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन जयरानी ने किया और आभार शांता देब ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में तमाम महिलाएं और प्रबुद्ध-जन उपस्थिति रहे।
लेबल:
आकांक्षा यादव,
के.के.यादव,
नारी-जगत,
नारी-सशक्तिकरण,
विशेष दिवस,
सन्देश,
हलचल
शनिवार, 12 मार्च 2011
दूध का कर्ज
खामोश सुखिया
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी
रक्त की एक बोतल उसे चढ़ चुकी थी
एक और अभी बाकी थी
सोच रही थी
किसने दिया होगा उसे रक्त
उसका मरद तो हो चुका
पहले ही अशक्त
बच्चे कभी झाकने नहीं आते
कभी आते तो करके हज़ार
बहाने वे लौट जाते
छोटू ने हिम्मत की थी
तभी उसके कानो में
बहू की आवाज पड़ी थी
अरे छोड़ा बूढ़ा के ऊ त
मरले दाखिल हई
अभी तोहे बहुत कम करे का है
चला हिला एहन से बहाना बनाय के
मरि जैहन त अभी
क्रिया करम भी है करे के
वह बोल तो नहीं पर
सुन तो थी ही सकती
ऑपरेशन के बाद अचेत
अपलक छत को निहारती
अतीत में चली गयी
डॉक्टर का चेहरा उसे
जाना पहचाना लग रहा था
दिमाग पर जोर देने पर उसे
कुछ धुधला सा याद आया
लक्षमण का चेहरा जेहन में भाया
जिसे जिसकी माँ
बचपन में ही छोड़
पड़ोसन संग इश्क लड़ाई
और भाग गयी थी
पड़ोसन के नाते जिसे उसने
अपना दूध पिला कर बड़ा की थी
फिर उसके बापू के तबादले ने
सबकुछ भुलवा दिया था
कुछ दिनों में ही सब अतीत का
हिस्सा बन गया था
हाँ हाँ ई त वही
लाछमनावा लागत है
पर इहा त सब एका
डॉक्टर एल के सिंह कहत है
छोड़ा कुछो होय हमै का करे का है
दिमाग पर ज्यादा जोर
डाले का हमै का पड़ा है
सोचते सोचते न जाने वह
कब सो गयी
भोर में जगी तो देखा
सुबह हो गयी
डॉक्टर बाबु राउंड पर आये थे
उसके सर पर हाथ रख सहला रहे थे
आज उसे तबियत कल से
बहुत ठीक लग रही थी
सुखिया अम्मा कैसी हो सुन
डॉक्टर के मुख से अपना नाम
वह दंग रह गयी थी
बहुतै दूध पिलवा है हमका
अब हमरी बारी आवा है
एक बोतल खून हम दै चुके
एक अउर देना बाकी है
हम तोहरा बदे आपन
सब खून दै सकत है
तबो माई तोहरे दूध का करज
हम कभों न उतार सकित है
सुन आपन माटी क आवाज
सुखिया सकते में आ गयी
अरे तू त लाछामन्वा ही हवे
कहते सुखिया गदगद हो गयी
पर यहाँ तो सब तोहके
डॉक्टर एल के सिंह कहत है
पर तू त लाछामन्वा ही है
बाबा इ कैसी विपत है
सुखिया की देख निश्छल सोच और हंसी
डॉक्टर बाबू ने सुखिया की गोद में
अपना सर रख दिया
सुखिया ने भी तुरंत अपने आंचल से
उनका मुख ढक दिया
आंचल के दूसरे कोने से मुंह ढाप
सुखिया रो पड़ी थी
दूध के कर्ज को सुखिया
आज बडे मार्मिक ढंग से
समझ रही थी
जिनसे थी अपेक्षा
उन्होंने तो मुंह फेर लिया था
पर आज दूघ के रिश्ते ने
अपने को रक्त के रिश्ते से
बेहतर साबित कर दिया था
पूरे वार्ड में पसरा सन्नाटा
बन गवाह इस बात की
सच्चाई बड़ी सिद्दत से
बयां कर रहा था
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी
रक्त की एक बोतल उसे चढ़ चुकी थी
एक और अभी बाकी थी
सोच रही थी
किसने दिया होगा उसे रक्त
उसका मरद तो हो चुका
पहले ही अशक्त
बच्चे कभी झाकने नहीं आते
कभी आते तो करके हज़ार
बहाने वे लौट जाते
छोटू ने हिम्मत की थी
तभी उसके कानो में
बहू की आवाज पड़ी थी
अरे छोड़ा बूढ़ा के ऊ त
मरले दाखिल हई
अभी तोहे बहुत कम करे का है
चला हिला एहन से बहाना बनाय के
मरि जैहन त अभी
क्रिया करम भी है करे के
वह बोल तो नहीं पर
सुन तो थी ही सकती
ऑपरेशन के बाद अचेत
अपलक छत को निहारती
अतीत में चली गयी
डॉक्टर का चेहरा उसे
जाना पहचाना लग रहा था
दिमाग पर जोर देने पर उसे
कुछ धुधला सा याद आया
लक्षमण का चेहरा जेहन में भाया
जिसे जिसकी माँ
बचपन में ही छोड़
पड़ोसन संग इश्क लड़ाई
और भाग गयी थी
पड़ोसन के नाते जिसे उसने
अपना दूध पिला कर बड़ा की थी
फिर उसके बापू के तबादले ने
सबकुछ भुलवा दिया था
कुछ दिनों में ही सब अतीत का
हिस्सा बन गया था
हाँ हाँ ई त वही
लाछमनावा लागत है
पर इहा त सब एका
डॉक्टर एल के सिंह कहत है
छोड़ा कुछो होय हमै का करे का है
दिमाग पर ज्यादा जोर
डाले का हमै का पड़ा है
सोचते सोचते न जाने वह
कब सो गयी
भोर में जगी तो देखा
सुबह हो गयी
डॉक्टर बाबु राउंड पर आये थे
उसके सर पर हाथ रख सहला रहे थे
आज उसे तबियत कल से
बहुत ठीक लग रही थी
सुखिया अम्मा कैसी हो सुन
डॉक्टर के मुख से अपना नाम
वह दंग रह गयी थी
बहुतै दूध पिलवा है हमका
अब हमरी बारी आवा है
एक बोतल खून हम दै चुके
एक अउर देना बाकी है
हम तोहरा बदे आपन
सब खून दै सकत है
तबो माई तोहरे दूध का करज
हम कभों न उतार सकित है
सुन आपन माटी क आवाज
सुखिया सकते में आ गयी
अरे तू त लाछामन्वा ही हवे
कहते सुखिया गदगद हो गयी
पर यहाँ तो सब तोहके
डॉक्टर एल के सिंह कहत है
पर तू त लाछामन्वा ही है
बाबा इ कैसी विपत है
सुखिया की देख निश्छल सोच और हंसी
डॉक्टर बाबू ने सुखिया की गोद में
अपना सर रख दिया
सुखिया ने भी तुरंत अपने आंचल से
उनका मुख ढक दिया
आंचल के दूसरे कोने से मुंह ढाप
सुखिया रो पड़ी थी
दूध के कर्ज को सुखिया
आज बडे मार्मिक ढंग से
समझ रही थी
जिनसे थी अपेक्षा
उन्होंने तो मुंह फेर लिया था
पर आज दूघ के रिश्ते ने
अपने को रक्त के रिश्ते से
बेहतर साबित कर दिया था
पूरे वार्ड में पसरा सन्नाटा
बन गवाह इस बात की
सच्चाई बड़ी सिद्दत से
बयां कर रहा था
बुधवार, 9 मार्च 2011
अभिशापित जीवन और अरुणा
मृत्यु तो एक शाश्वत सत्य
के रूप में है ही विरासित
पर अब उसका जीवन भी
बन चुका है अभिशापित
दे रहा है उसे कौन सा सुख
अरुणा का अर्थहीन जीवन
ऐसे जीवन से है अच्छा नहीं
क्या करना मृत्यु का वरण
हम एक बार के मृत्यु की
कल्पना से सिहर उठते है
हज़ार बार वह नित्य मरती है
हम भावनाओ में बहा करते है
हर चीज कानून के दायरे में
तय हुआ नहीं करती है
सही और गलत बातें हमारे
विवेक पर निर्भर करती है
निरंतर पिछले सैतीस वर्षों से
जो हमारी भावनाओ को ढो रही
डोलने बोलने में सर्वथा अक्षम
एक्षम्रित्यु जाहिर करने से रही
सार्थक जीवन भी रागिनियो का
एक सार्थक नाम होता है
तमाम उतर चढाओं के साथ
रस प्रसाद माधुर्य से भरा होता है
उसकी निस्वार्थ सेवा कर
हम उसे कौन सा सुख दे रहे
बस भावनाओ में बहकर
उसे दुःख ही दुःख दे रहे है
हमारी सेवा अगर किसी के लिए
बनजाये अंतहीन दुःख का कारण
जीवन के औचित्यहीन दंश से कही
अच्छा है उसका औचित्यपूर्ण मारण
अगर तीस बत्तीस वर्ष पूर्व ही
उसे मिल जाती नारकीय जीवन से मुक्ति
उपरांत पुनर्जीवन के वह होती
आज एक नूतन युवा नारी शक्ति
करती अठखेलियाँ पावन प्रकृति से
बागों और बसंत से होती आनंदित
उसके यौवन की खुशुबुओं से
पावन धरा भी होती दिगंदित
जीवन के एक एक पल का करती
कितनी सिद्दत से रसपान
दे पाए नहीं जो हम उसे करके
अपने हज़ार प्रयास के उपरांत
सम्मान करता हूँ मै दिल से
अरुणा के उन सह्कर्मिओं का
रातदिन एक कर दिया जिन्होंने
लेकर निस्वार्थ सेवाव्रत का
पर क्या कही दिखाती नहीं
इसमे भी स्वार्थ की आहट
भावनाओं के पीछे से आ रही
निरंतर नाम की सरसराहट
कि देखे और सोचे लोग मेरे
इस सेवाव्रत के नूतन आयाम को
पर सार्थक सेवाव्रत ही देती है
एक सुखद अंजाम को
इस सेवा व्रत ने तो लटका दिया है
अधर में किसी के जीवन को
जबकि प्रतीक्षा एक सुखद मौत की
है त्रिशंकु बनी अरुणा रामचंद्र को
वस्तुतः है नहीं यह किसी को जीवन देना
है क्रमशः उसे मौत के करीब ही ले जाना
तो क्यों न उसे मर्सी किलिंग दे दी जाय
अच्छा नहीं है किसी को तिल तिल कर मारना
इस ब्लॉग के माध्यम से सम्मान करता हूँ
जिंदादिल याचिका पिकी वीरानी का
समाप्त हो जिंदगी और मौत का यह खेल
पक्षधर हूँ उनके जज्बे और कद्रदानी का
के रूप में है ही विरासित
पर अब उसका जीवन भी
बन चुका है अभिशापित
दे रहा है उसे कौन सा सुख
अरुणा का अर्थहीन जीवन
ऐसे जीवन से है अच्छा नहीं
क्या करना मृत्यु का वरण
हम एक बार के मृत्यु की
कल्पना से सिहर उठते है
हज़ार बार वह नित्य मरती है
हम भावनाओ में बहा करते है
हर चीज कानून के दायरे में
तय हुआ नहीं करती है
सही और गलत बातें हमारे
विवेक पर निर्भर करती है
निरंतर पिछले सैतीस वर्षों से
जो हमारी भावनाओ को ढो रही
डोलने बोलने में सर्वथा अक्षम
एक्षम्रित्यु जाहिर करने से रही
सार्थक जीवन भी रागिनियो का
एक सार्थक नाम होता है
तमाम उतर चढाओं के साथ
रस प्रसाद माधुर्य से भरा होता है
उसकी निस्वार्थ सेवा कर
हम उसे कौन सा सुख दे रहे
बस भावनाओ में बहकर
उसे दुःख ही दुःख दे रहे है
हमारी सेवा अगर किसी के लिए
बनजाये अंतहीन दुःख का कारण
जीवन के औचित्यहीन दंश से कही
अच्छा है उसका औचित्यपूर्ण मारण
अगर तीस बत्तीस वर्ष पूर्व ही
उसे मिल जाती नारकीय जीवन से मुक्ति
उपरांत पुनर्जीवन के वह होती
आज एक नूतन युवा नारी शक्ति
करती अठखेलियाँ पावन प्रकृति से
बागों और बसंत से होती आनंदित
उसके यौवन की खुशुबुओं से
पावन धरा भी होती दिगंदित
जीवन के एक एक पल का करती
कितनी सिद्दत से रसपान
दे पाए नहीं जो हम उसे करके
अपने हज़ार प्रयास के उपरांत
सम्मान करता हूँ मै दिल से
अरुणा के उन सह्कर्मिओं का
रातदिन एक कर दिया जिन्होंने
लेकर निस्वार्थ सेवाव्रत का
पर क्या कही दिखाती नहीं
इसमे भी स्वार्थ की आहट
भावनाओं के पीछे से आ रही
निरंतर नाम की सरसराहट
कि देखे और सोचे लोग मेरे
इस सेवाव्रत के नूतन आयाम को
पर सार्थक सेवाव्रत ही देती है
एक सुखद अंजाम को
इस सेवा व्रत ने तो लटका दिया है
अधर में किसी के जीवन को
जबकि प्रतीक्षा एक सुखद मौत की
है त्रिशंकु बनी अरुणा रामचंद्र को
वस्तुतः है नहीं यह किसी को जीवन देना
है क्रमशः उसे मौत के करीब ही ले जाना
तो क्यों न उसे मर्सी किलिंग दे दी जाय
अच्छा नहीं है किसी को तिल तिल कर मारना
इस ब्लॉग के माध्यम से सम्मान करता हूँ
जिंदादिल याचिका पिकी वीरानी का
समाप्त हो जिंदगी और मौत का यह खेल
पक्षधर हूँ उनके जज्बे और कद्रदानी का
बुधवार, 2 मार्च 2011
'न्यू ऋतंभरा भारत-भारती साहित्य सम्मान' से सम्मानित हुईं आकांक्षा यादव
आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।
मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता सुश्री आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।
सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि इत्यादि प्रमुख हैं। सुश्री आकांक्षा यादव को इस अलंकरण हेतु हार्दिक बधाईयाँ।
गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)-480001
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