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रविवार, 30 अक्टूबर 2011

रचना आमंत्रित

अपाकी लोकप्रिय पत्रिका आई वर्ल्ड का प्रकाशन लखनउ से विगत चार वर्षों से हो रहा है
आगामी अंक के लिए सुधि लेखकों के आलेख आमंत्रित है।
रचना मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए।
अपना आलेख 15 नवम्बर तक निम्न पते पर भेज सकते हैं।
या फिर ई-मेल कीजिए!

-----

आई वर्ल्ड पत्रिका,
सैनिक चेम्बर, जानकी प्लाजा,
जानकीपुरम, लखनउ-21
उत्तर प्रदेश
फोन- 0522-39191100
eyeworldpatrika@gmail.com

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

फुलवा

आज फुलवा
कुछ ज्यादा ही जोश में

अपना करतब दिखा रही थी

रस्सी पर इठला इठला कर

चल रही थी

उसका चार वर्षीया भाई

जिसका नाम तो हथौड़ा सिंह था

मगर सत्य यह था की वह हड्डियों का

ढांचा ही नजर आ रहा था

खूब उछल उछल कर पूरे उत्साह से

कलाबाजियां खा रहा था


माँ ढोलक बजा रही थी

बीच बीच में पैसे के लिए कटोरा लेकर

लोगो के बीच में जा रही थी

पिता जाजू जोश में नगाड़ा

बजाते बजाते से एकरिंग कर रहा था

साहेबान मेहरबान कदरदान

यदि आज अपने दिल खोलकर

पैसे से हमारा उत्साह बढाया

तो कोई शक नहीं कि

इस दीपावली के उपरांत पूरे साल

लक्ष्मी कि आप पर होगी छाया


फुलवा माँ के

खाली कटोरे को देख

दूने उत्साह से

करतब दिखाने में लग जाती

हर बार पहले से ज्यादा सफाई से

करतब दिखने का प्रयास करती

कि शायद अबकी बार कटोरे में कुछ

और सिक्के पड़ जाये तो

उनकी भी दीपावली कायदे से

मन जाये

हथौड़ा सिंह कटोरे की ओर देख

निराश हो जाता

बापू कि डाट पर पुनः करतब

दिखाने में लग जाता

माँ का दिल भी अपने नन्हे हथौड़ा की

बेबसी देख भर जाता


जिज्ञासवास कहे या

अपने स्वभाव से लाचार

खेल समाप्ति के उपरांत

मै उनके बीच था

पूछने पर पता चला बच्चो को

आज केवल बिना दूध कि चाय

पिला कर लाई थी

अच्छी कमाई पर शाम को

मिठाई खिलौने फुलझडियों और

पटाखे की बात तय कर आयी थी


पर लोगो कि उत्साह हीनता देख

जाजू का दिल भी बैठ गया

बोलते बोलपरते गला रूद्ध गया

किसी तरह तमाशा समाप्त कर

वे अपना सामान समेटने लगे

धीरे धीरे लोग भी जाने लगे

कुछ बच्चों ने पिसान और

चावल घर से लाकर दिया

पर नकद पैसों का तो जैसे

अकाल ही पड़ गया था

बच्चों का ध्यान था कि पास में लगे

मिठाई और पटाखे कि दुकान से

हट ही नहीं रहा था


सामान के साथ चंद फैले सिक्के को समेट

जाजू अपने कुनबे के साथ हताश

डेरे पर जाने लगा

मैंने आवाज देकर उन्हें रोका

अपने जेब में पड़े कुछ सिक्कों और

नोटों को उनको सौपा


उस छड बच्चों के चेहरों पर जो

चमक मैंने देखी

उसके सामने पूरे दीपावली की चमक भी

मुझे लग रही थी फीकी

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

शुभकामनाये





आप सबको दीपावली कि हार्दिक शुभकामनाये





डा- रमेश कुमार निर्मेश





सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

दुधमुहाँ



पांचो ब्रह्मण
समवेत स्वर में सस्वर
मधुर महामृतुन्जय मंत्र का
विधिवत जाप कर रहे थे
नब्बे वर्षीया ठाकुर साहेब
निकट बिस्तर पर पड़े थे
अपनी सलामती और लम्बी उम्र
के लिए मन भर दूध से
भगवान शिव का रुद्राभिषेक
करवा रहे थे

श्यामा जिसका पति
एक माह पूर्व ही टी बी से ग्रस्त
होकर पैसे के अभाव में
दुनिया से असमय अपने परिवार को
बिलखता छोड़ कूच कर गया था
पीछे पत्नी श्यामा हाथ में
दो छोटे बच्चे और
गोद में दुधमुंहा की जिम्मेदारी को
अपनी युवा पत्नी पर
छोड़ गया था

तत्काल में पेट भरने का कोई
vikalp नहीं पाकर वह
talab के किनारे दुधमुंहा को
आंचल में छिपाए
भीख मांग रही थी
पर लोगो कि नजर थी कि
रह रह कर भीख देने के बजे
उसके यौवन पर ही जा रही थी
कुछ चवन्नियां उसके विछाये चादर पर
बेशक पड़ी थी
पर वह इस डायन महगाई के
ज़माने में बच्चे के दूध और
भोजन के लिए कही से भी
पर्याप्त नहीं थी

बसंत एक और जहा
भूख से परेशान बिलख रहा था
मुन्ना दूसरी ऑर बेदम लेटा था
वही दुधमुहाँ माँ के छाती में
सर छुपाये दूध के अभाव में
बुक्का फाड़ फाड़ कर
रोये जा रहा था

उधर मन्त्रों की आवाज क्रमशः
तेज होती जा रही थी
खाटी दूध शिवलिंग से होकर
बनाये पनारे के रस्ते गंदगी को समेटे
तालाब में जा रही थी
इधर दुधमुहाँ कीआवाज क्रमशः
कमोजोर होती जा रही थी
जब कोई रास्ता सूझा नहीं उसे तो
बच्चे को ले उस पनारे पर
गयी झट से
जैसे ही पनारे पर अपने
बर्तन को दूध के लिए लगाया
यजमान दूर से भागता हुआ आया
हट साली ये क्या कर रही है
अपने गंदे हाथो से दूध को
क्यों गन्दा कर रही है
हम बाबूजी की लम्बी उम्र के लिए
रुद्राभिषेक करवा रहे है
और तू व्यर्थ में यमराज बन रही है
अचानक श्यामा ने अपने दुधमुहे को
बेजान होते देखा
उसके सर को एक और लुढकते देखा
चिल्लाकर रोना चाही पर
इसमें भी अपने को असफल पाया
हताश जिगर को अपने पत्थर बनाया
थोड़ी देर सिसकने के बाद
अपने यौवन रूपी धन को एक बार
जी भर के देखा
शेष बच्चों की परवरिश कैसे हो
यह सोच कलेजे को कड़ा किया
नितांत एक निजी मगर
एक कठोर निर्णय लिया
तत्काल में इस भद्र समाज को
उसका असली चेहरा दिखने का
फैसला कर लिया

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

झुमकी



बापू बापू
इस बार दशमी के मेला माँ
हमऊ चलब
दुकान में तुम्हरा हाथ बटाईब
अऊर मेला देखब
हाँ पिछली बार तू नैका सूट
दियावे के कहे रहा
पर बिक्री कमजोर रही
अहिसे दिया नहीं पावा
पर असों हम ऊ जरूर लेइब
झुमकी धूप में खिलौना सुखाते सुखाते
ननकू से कह रही थी
अन्दर उसकी माँ बुधिया
उसकी बात ध्यान से सुन रही थी
हाँ हाँ तुम्हों चला जइयो
पर अभई बतियाव कम
कमवा मन से करयो

पिछले मेले से ननकू ने
सीख लिया था
इस बार कई तरह के
मिटटी के खिलौने को बनाया था
बैग को पीठ पर लादे
स्कूल जा रहा बच्चा
जहाँ सर्वा शिक्षा अभियान का
द्योतक लग रहा था
वहीँ बिटिया को गोद में
प्यार से दुलारती माँ की मूर्ति
कन्या भ्रूण हत्या का
विरोध कर रहा था
मंत्री को हथकड़ी लगाये सिपाही
अन्ना के लोकपाल की कथा
बहुतखूब कह रहा था
वही टैंक पर खड़ा सैनिक
शत्रुओं को ललकारता
राष्ट्रप्रेम की सीख दे रहा था
ननकू सोच रहा था
इस बार मेला में तो बस
वही छाया रहेगा
कायदे से जो कमाई होई गयी तो
इस बार खपरैल बदल कर रहेगा
पूरी बरसात को किसी तरह
रात रात भीगते हुए बिताया है
पूर्व कि बरसातों ने भी
कम नहीं रुलाया है

नए उत्साह से लबरेज
ननकू झुमकी के साथ
मेले में पहुँच गया
पर वहां पुलिस का नया रंग देख
वह दंग रह गया
किसी तरह पचास कि एक पत्ती देने पर
मेले में जगह तो मिल गयी
थोड़ी देर में उसकी
दुकान सज गयी
चारो ओर भीड़ और तमाम तरह की
दुकाने सजावट झूले आदि देख
झुमकी मचल गयी
खुशी के मारे वह निहाल हो गयी
दुकान सजाकर नया फ्राक पहन कर
वह दुकान पर कुछ इस तरह बैठी
मानो वह जगह हो
उसके बाप की बपौती

दोपहर होने को आयी
ननकू की बोहनी तक नहीं भई
झुमकी चिल्ला चिल्ला कर
ग्राहक बुला रही थी
पर भीड़ सामनेवाले चाइनीज
खिलौने वाली दुकान पर ही जा रही थी
झुमकी थक थक कर बैठ जाती
सुस्ताकर फिर नए उत्साह से लग जाती
मेला देखना तो वह भूल ही गयी
दूर मोरनीवाली झूला
उसे चिढाती रही

किसी तरह शाम तक
कुछ सस्ते खिलौने ही बिक पाए थे
उदास ननकू की आँखों में
आंसू भर आये थे
रात होने पर ननकू
दुकान समेटने लगा
चिल्लाते चिल्लाते कोने में
सो चुकी झुमकी को घर
चलने के लिए जगाने लगा
सोच रहा था कि
कितने अरमानो से झुमकी को
झूला झुलाने लाया था
बुधिया के साथ उसे भी नए कपडे
दिलाने का वादा कर आया था
झूला तो दूर उसे मेला तक
नही दिखा पाया था
झुमकी ने तो खूब औकात भर
उसका साथ दिया था
पर उसने एक बार फिर
झुमकी को रुला दिया था

अपनी हाथगाड़ी में एक ओर
बचे खिलौने और दूसरी ओर झुमकी को
सुला ननकू घर लौट चला
आने वाले बरसात से
कैसे वह पुनः निपटेगा
रस्ते भर सोचता रहा
और तो और इस बार फिर
वह खपरैल छवाने से रहा

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

अभागा



पापा पापा
आज दादा इतने उदास क्यों है
हमसे दूर दूर ही है
पास क्यों नहीं है
पापा ये आप किसके लिए
पैकिंग कर रहे है
क्या दादा के साथ
तीरथ करने जा रहे है

नहीं बेटा आज मेरे पापा
यानि तुम्हारे दादा का
वृद्धाश्रम में बड़े प्रयास और
सिफारिश के उपरांत
दाखिला हो गया है
कितने दिन से नम्बर लगाया था
आज हमारा भाग्योदय हो गया है

पर पापा दादा वहां
हम लोगो के बिना कैसे रहेंगे
इस उम्र में अब वो क्या पढेगे
और तो और अपने दमे की
बीमारी को कैसे सहेंगे

बेटा है नहीं वहां
पढ़ने का प्रावधान
बुड्ढों के रहने का है वहां
बहुत बढ़िया इंतजाम
खाने पिने के साथ दवा आदि की
व्यवस्था है आम
इनको वहां इनकी उम्र के
तमाम दोस्त मिल जायेगें
आपस में बैठ सब
अपने पुराने दिन गुन्गुनायेगे
आपस में सुख दुःख बाटेंगे
आनंद और आजादी से
इनके दिन कटेंगे

पापा तब तो ई
बड़ी अच्छी बात है
पर आसानी से दाखिला मिलने में
बड़ी मुश्किलात है
ऐसा करो पापा आप भी
अपना आवेदन वहां के लिए
अभी से कर दो
पता नहीं कल जगह न मिले तो

स्तब्ध शर्माजी बेटे चिंटू को
घूरती निगाहों से देख रहे थे
उनके आँखों से शोले बरस रहे थे
कोने में खड़े दादाजी
जो अभी तक मन ही मन में
मानस की चौपाई
सकल पदार्थ यही जग माहीं
करम हीन नर पावत नहीं
को दोहरा रहे थे
इस अकस्मात् बदलते
घटनाक्रम से मिली
आंशिक ख़ुशी से इतरा रहे थे

साथ ही अभी तक
इस आजादी की परिभाषा को
समझाने में अक्षम थे
संतोष से आह भरी यह देख की
अपनी जिम्मेदारी को
उनकी नई बेल कितनी तन्मयता से
पूरी करने में सक्षम है

विकास की सततशीलता पर
अपने अतीत से ये कितने आगे है
यह अलग बात है कि
सब कुछ रहते हुए भी
सच में हम कितने अभागे है
हमने जब अपने अतीत से खेला है
तो वो भी तो अपने अतीत से
निरन्तर खेल रहे है
विकास की प्रक्रिया
अवरुद्ध न हो
इस बात को सिद्ध कर रहे है

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

वर्तमान पर अतीत की वरीयता







आज प्रातः भोर से ही
प्रकृति के तीव्र वर्षणका प्रकोप
अनवरत जारी था
बारिस की तीव्रता का
यह आलम था कि
नीचे बगीचे में आम पर
नीम के पेड़ों का
घर्षण भारी था

अभी तक युवा आम जो
कल शाम तक अपनी
तरुणाई पर इठला रहा था
पुरवैये के मस्त झोकों में
मस्ती से झूम रहा था
किसी अन्य को कुछ नहीं
समझ रहा था
आज मौन नतमस्तक होकर
मानो वयस्क नीम से
पनाह मांग रहा था
नीम के तीव्र घर्षण से जब
एक ओर वह ज्यादा ही
झुक जाता था
लगता कि अब गिरा तब गिरा
तभी नीम की दूसरी डालों का
पाकर सहारा वह
किसी तरह संभल जाता था

जैसे एक पिता अपने
रो रहे बच्चे को दुलारने का
प्रयास करता
हवा में उछल कर खुशी
जाहिर करता
उसे गिरने से पहले ही गोद में
ले बलैया खूब लेता
इसी बीच बच्चा कभी हँसता
कभी रोता
पर अंत में निश्चिन्त हो
पिता के कंधे से लग
आराम से सो जाता

कुछ ऐसा ही इन सजीवों
मगर बेजुबानों का खेल चल रहा था
छत पर बाने किचेन गार्डेन में
में पौधों के बीच विचारमग्न बैठा था
प्रकृति के इस अनुपम नैसर्गिक
खेल का आनंद ले रहा था
साथ ही प्रकृति अपने इन
उपादानों के माध्यम से
जो हमें सन्देश दे रही थी
उस पर मेरे अंतर्मन में
बहस चल रही थी

उड़ ले पंख लगा कर चाहे
कितनी भी आज की युवा पीढ़ी
अनुभव रत अतित से
खेल ले चाहे कितना भी

खेल साप सीढ़ी

पर आज भी उसके पास

जवाब नहीं है

अतीत की सम्पन्नता का

साधनों के अभाव में भी

कालजयी ऐतिहासिक इमारतों के

निर्माण की गाथा का

कैसे अतीत के लोगो ने

विशाल पहाड़ों पर किले बनवाने हेतु

विशाल शिलाखंडो को

शीर्ष तक पहुचाया होगा

आज तक अभेद बने है वे

आखिर कौन सा जोड़

लगाया होगा

किन क्रेनो से उन्हें ऊपर

पहुचाया होगा

दक्षिण के मंदिरों में विशालतम

प्रस्तर प्रखंडो का उपयोग

जिसके परिवहन पर ही आज
पूरी तन्मयता से शोध जारी है

है नहीं केवल एक संयोग

आदि ऐसे कितने नमूने

अतीत कि वरीयता वर्तमान पर

सिद्ध करते है

फिर भी हम अज्ञात और

अज्ञान बने फिरते है

हर दृष्टिकोण से अपने

समृद्ध और संपन्न अतीत पर

गर्व करने के बजाय

हम उस पर भरोसा

नहीं करते है

शनिवार, 24 सितंबर 2011

ब्लागिंग का 'युवा-मन': अमित कुमार यादव

हिंदी-ब्लागिंग जगत में कुछेक नाम ऐसे हैं, जो बिना किसी शोर-शराबे के हिंदी साहित्य और हिंदी ब्लागिंग को समृद्ध करने में जुटे हुए हैं. इन्हीं में से एक नाम है- सामुदायिक ब्लॉग "युवा-मन" के माडरेटर अमित कुमार यादव का. संयोगवश आज उनका जन्मदिन भी है. अत: जन्म-दिन की बधाइयों के साथं आज की यह पोस्ट उन्हीं के व्यक्तित्व के बारे में-



अमित कुमार यादव : 24 सितम्बर, 1986 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ.प्र.) के एक प्रतिष्ठित परिवार में श्री राम शिव मूर्ति यादव एवं श्रीमती बिमला यादव के सुपुत्र-रूप में जन्म। आरंभिक शिक्षा बाल विद्या मंदिर, तहबरपुर-आजमगढ़, आदर्श जूनियर हाई स्कूल, तहबरपुर-आजमगढ़, राष्ट्रीय इंटर कालेज, तहबरपुर-आजमगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद वि.वि. से 2007में स्नातक और इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से 2010 में लोक प्रशासन में एम.ए.। फ़िलहाल अध्ययन के क्रम में इलाहाबाद और प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी।

अध्ययन और लेखन अभिरुचियों में शामिल. सामाजिक-साहित्यिक-सामयिक विषयों पर लिखी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं पढने का शगल, फिर वह चाहे प्रिंटेड हो या अंतर्जाल पर। तमाम पत्र-पत्रिकाओं , पुस्तकों/संकलनों एवं वेब-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं और ब्लॉग पर रचनाएँ प्रकाशित। वर्ष 2005 में 'आउटलुक साप्ताहिक पाठक मंच' का इलाहाबाद में गठन और इसकी गतिविधियों के माध्यम से सक्रिय। जुलाई-2006 में प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका 'आउटलुक' द्वारा एक प्रतियोगिता में पुरस्कृत, जो कि शैक्षणिक गतिविधियों से परे जीवन का प्रथम पुरस्कार। ब्लागिंग में भी सक्रियता और सामुदायिक ब्लॉग "युवा-मन" (http://yuva-jagat.blogspot.com) के माडरेटर। 21 दिसंबर 2008 को आरंभ इस ब्लॉग पर 250 के करीब पोस्ट प्रकाशित और 110 से ज्यादा फालोवर।
अपने बारे में स्वयं अमित कुमार एक जगह लिखते हैं, मूलत: आजमगढ़ का ...जी हाँ वही आजमगढ़ जिसकी पहचान राहुल सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध", शिबली नोमानी, कैफी आज़मी जैसे लोगों से रही है। पर इस संक्रमण काल में इस पहचान के बारे में न ही पूछिये तो बेहतर है। आजकल आजमगढ़ की चर्चा दूसरे मुद्दों को लेकर है। फ़िलहाल हमने अभी तो जीवन के रंग देखने आरम्भ किये हैं, आगे-आगे देखिये होता क्या है। नौजवानी है सो जोश है, हौसला है और विचार हैं।

ई-मेलः amitky86@rediffmail.com
ब्लॉग : http://yuva-jagat.blogspot.com/ (युवा-मन)



(चित्र में : हिंदी भवन, दिल्ली में 'हिंदी साहित्य निकेतन', परिकल्पना डाट काम, और नुक्कड़ डाट काम द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) की तरफ से उत्तरांचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक', वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामदरश मिश्र, डा. अशोक चक्रधर इत्यादि द्वारा सम्मान ग्रहण करते अमित कुमार यादव)

प्रस्तुति : रत्नेश कुमार मौर्य : 'शब्द-साहित्य'

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

सम्मान



काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में विगत दिनों हिंदी पखवारा बड़े ही हर्रोल्लास से मनाया गया उक्त अवसर पर डा रमेश कुमार निर्मेश को उनके हिंदी के प्रति उल्लेखनीय योगदान के लिए आधुनिक कविता के ध्वजवाहक श्री ज्ञानेन्द्रपति जी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रोफेसर लालजी सिंह जी द्वारा संयुक्त रूप से प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया

शनिवार, 17 सितंबर 2011

भगवन के ही बनाये इन जिन्दा बुतों में ..........


दादा टिकट
टिकट
रामदीन ने हाँ बाबु कहते हुए
कमर की धोती में खोसें
टिकट को निकला
जिसे देखते ही टीटी महोदय
का चढ़ गया पारा
चालू टिकट ले कर
शयनयान में सफ़र करते हो
शर्म नहीं आती तुम लोगों को
अरे कम से कम
भगवन से क्यों नहीं डरते हो

मै सामने वाली सीट पर
खिड़की के पास बैठा
अभी तक तेजी से भागते
बियाबान जंगल को देख रहा था
इस खटपट से तन्द्रा भंग हो उ
नकी तरफ मुखातिब हो गया था
रामदीन और उसकी कृशकाय वृद्धा पत्नी
दोनों हाथ जोड़े खड़े हो गए थे
टीटी से विनम्रता से विनती कर रहे थे

भैया तबियत ठीक ना रहा
केमै बैठा जावे हमन के
ठीक से पता ना रहा
हम जनित कि टिकट लई के
बस के माफिक पूरा गाड़ी में
कहियों बैठ सकित है
बाबू तनी दया करी के हमे बतईत
त अगला टेशन पर उतर हम
ओम बैठ जाईत

चुप बुढ़िया
बहुत नौटंकी आवत है
हमका बेवकूफ बनावत है
नव सौ रुपया पहिले
जुरमाना का निकालो
नहीं तो चलो जेल काटो

रामदीन गिरगिदा पड़ा
बाबू जब से हमरा बेटवा समुआ
दिल्ली बम कांड में गुजर गवा
एक साथ इतना पैसा देखे
न जाने कितना दिन गुजर गवा
अब कौउनो सहारा नहिनी
यहि वदे हम बिटिया के यहाँ जात रहा
हमका माफ़ कर देईब
अगला टेशन पर हम
जरूर उतर लेईब

बुढहू ढँर चालक बने का
कोशिश जिन करो
चलो अच्छा जो कुछ है
उसी को निकालो
कोई रास्ता न देख रामदीन ने
धोती के दूसरे कोने से
कुछ मुड़े हुए नोटों को निकाला
जिसे टीटी ने लपक कर
अपने जेब में डाला
शीघ्रता से आगे बढ़ गया

मन मेरा विचलित हो गया
इधर रामदीन अपने गंदे अंगोछे से
अपने आंसुओं को पोछने लगा
आगे सफ़र कैसे कटेगा
अपनी पत्नी से कह सिहर गया

सारे घटनाक्रम ने
एकबार पुनः मुझको हिला दिया
मेरी संवेदनशीलता ने मुझे
भीतर तक झकझोर कर रख दिया
तभी मैंने एक फैसला किया
डिब्बे में बैठे यात्रियों से चंदा लेकर
कुछ रूपये इकठ्ठा कर
उस वृद्धा दंपत्ति को
भेट कर दिया

अश्रुपूरित नेत्रों से
रुपये लेते समय रामदीन कृतज्ञता से
विह्वल हो गया
अचानक से बोल पड़ा
बाबू ये आज के इंसानों को
क्या हो गया है
भगवन के ही बनाये
इन जिन्दा बुतों में
कैसे और क्यों इतना अंतर
हो गया है

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

अंडमान में कृष्ण कुमार यादव ने किया हिंदी-पखवाडा का शुभारम्भ

सुदूर समुद्र-पर स्थित पोर्टब्लेयर पर भी चढ़ा हिंदी-दिवस का रंग. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक डाक सेवा कार्यालय में हिन्दी-दिवस का आयोजन किया गया। चर्चित साहित्यकार और निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और पारंपरिक द्वीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। कार्यक्रम के आरंभ में अपने स्वागत भाषण में सहायक डाक अधीक्षक श्री ए. के़. प्रशान्त ने इस बात पर प्रसन्नता जाहिर किया कि निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव स्वयं हिन्दी के सम्मानित लेखक और साहित्यकार हैं, ऐसे में द्वीप-समूह में राजभाषा हिन्दी के प्रति लोगों को प्रवृत्त करने में उनका पूरा मार्गदर्शन मिल रहा है। हिन्दी की कार्य-योजना पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था, तब से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर जोर दिया गया कि राजभाषा हिंदी अपनी मातृभाषा है, इसलिए इसका सम्मान करना चाहिए और बहुतायत में प्रयोग करना चाहिए। इस अवसर पर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए निदेशक डाक सेवाएँ और चर्चित साहित्यकार साहित्यकार व ब्लागर श्री कृष्ण कुमार यादव ने हिन्दी को जन-जन की भाषा बनाने पर जोर दिया। अंडमान-निकोबार में हिन्दी के बढ़ते कदमों को भी उन्होंने रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हमें हिन्दी से जुड़े आयोजनों को उनकी मूल भावना के साथ स्वीकार करना चाहिए। स्वयं डाक-विभाग में साहित्य सृजन की एक दीर्घ परम्परा रही है और यही कारण है कि तमाम मशहूर साहित्यकार इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहे हें। इनमें प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी, सुविख्यात उर्दू समीक्षक शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर जैसे तमाम मूर्धन्य नाम शामिल रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल भी डाक विभाग में ही क्लर्क रहे।

निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने अपने उद्बोधन में बदलते परिवेश में हिन्दी की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और कहा कि- भूमण्डलीकरण के दौर में दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र, सर्वाधिक जनसंख्या वाले राष्ट्र और सबसे बडे़ उपभोक्ता बाजार की भाषा हिन्दी को नजर अंदाज करना अब सम्भव नहीं रहा। आज की हिन्दी ने बदलती परिस्थितियों में अपने को काफी परिवर्तित किया है। विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर तमाम विषयों पर हिन्दी की किताबें अब उपलब्ध हैं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रचलन बढ़ा है, इण्टरनेट पर हिन्दी की बेबसाइटों और ब्लॉग में बढ़ोत्तरी हो रही है, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई कम्पनियों ने हिन्दी भाषा में परियोजनाएं आरम्भ की हैं। निश्चिततः इससे हिन्दी भाषा को एक नवीन प्रतिष्ठा मिली है। मनोरंजन और समाचार उद्योग पर हिन्दी की मजबूत पकड़ ने इस भाषा में सम्प्रेषणीयता की नई शक्ति पैदा की है पर वक्त के साथ हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में विकसित करने हेतु हमें भाषाई शुद्धता और कठोर व्याकरणिक अनुशासन का मोह छोड़ते हुए उसका नया विशिष्ट स्वरूप विकसित करना होगा अन्यथा यह भी संस्कृत की तरह विशिष्ट वर्ग तक ही सिमट जाएगी। श्री यादव ने जोर देकर कहा कि साहित्य का सम्बन्ध सदैव संस्कृति से रहा है और हिन्दी भारतीय संस्कृति की अस्मिता की पहचान है। निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषन को मूल......आज वाकई इस बात को अपनाने की जरूरत है।इस अवसर पर निदेशक डाक सेवा कार्यालय के कार्यालय सहायक श्री किशोर वर्मा ने कहा कि आज हिन्दी भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में अपनी पताका फहरा रही है और इस क्षेत्र में सभी से रचनात्मक कदमों की आशा की जाती है। इस अवसर पर डाकघर के कर्मचारियों में हिंदी के प्रति सुरुचि जाग्रति करने के लिए दिनांक 14.9.11 से 28.9.11 तक विभिन्न प्रतियोगिताएं की जा रही हैं जैसे, श्रुतलेख, भाषण, हिन्दी टंकण, पत्र लेखन,हिन्दी निबंध, परिचर्चा। इस कार्यक्रम में प्रायः डाक विभाग के सभी कर्मचारी भाग ले रहें है।


(पोर्टब्लेयर से ए. के़. प्रशान्त, सहायक डाक अधीक्षक की रिपोर्ट)

प्रस्तुति : रत्नेश कुमार मौर्य




गुरुवार, 8 सितंबर 2011

शहीदों को पैदा करने का ठेका



मम्मी देखों
क्या गजब हो गया
गुड्डू का सेकेण्ड लेफ्टिनेंट में
चयन हो गया
उसे परसों जाना है
घर में प्रवेश करते हुए आशु ने कहा

चलो अच्छा हुआ
बेचारा बहुत दिनों से रोजगार के लिए
प्रयासरत और परेशान था
देश की सेवा करने का पुण्य फल
अंततः उसे प्राप्त हो गया
निरापद यदि सीमा की रक्षा करते हुए
शहीद भी हो गया
तो इतिहास में अमर हो जायेगा
अमर जवान ज्योति का
हिस्सा बन जायेगा
साथ ही कुल कुल खानदानका नाम भी
रोशन कर जायेगा
सम्प्रति आज देश को आवश्यकता है
जहाँ अन्ना जैसे कर्तव्यपरायण
निःस्वार्थ एकनिष्ठ
सामाजिक कार्यकर्ता की
वही आवश्यकता है
ऐसे ही वीर कर्तव्यनिष्ठा
साहसी युवावों की
जो अपनी वीरता से अपना नाम
स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगें
मरने के उपरांत भी पूरे सम्मान से
याद किये जायेगें

चलो जल्दी से फ्रेश हो लो
चलके उसे और उसके परिवार को
उसकी इस सफलता पर
बधाई तो दे दे

अपने आप को संभालते हुए
आशु ने पुनः कहा
माँ मेरा भी उसके साथ ही
चयन हो गया है
मुझे भी परसों उसके साथ जाना है
क्या कहा गरजते हुए माँ ने कहा
एकाएक पूरा परिदृश्य बदल जाता है
माहौल ग़मगीन और
एकपक्षीय हो जाता है
तो तुम सेना में जाओगे
तुम्हे कोई और काम नहीं मिला है
तेरा दिमाग ख़राब हो गया है
क्या इसी दिन के लिए तुम्हे
पैदा किया था
पाल पोस कर इतना बड़ा किया था
कि जब हमें सहारा देने का
वक़्त आएगा
तो तुम हमें इतनी
निष्ठुरता से भूल जायेगा
अरे इश्वर न करे कही तुम
सीमा पर शहीद हो गए
तो हम तो कहीं के न राह जायेगें
जीते जी मर जायेंगे
केवल तेरी यादों के सहारे
जिन्दगी कैसे काटेंगे
अरे कुछ तो सोचा होता
अपने इस माँ बाप का
ध्यान तो किया होता
जिनके तुम एकमात्र सहारे हो
फिर हमसे करते क्यों किनारे हो

पर माँ अभी तो तुम
गुड्डू के चयन पर इतनी
प्रसन्नता व्यक्त कर रही हो
तो मेरे चयन पर इतना
अवसादित क्यों हो रही हो
वह भी तो अपनी माँ क
एकमात्र संतान है
जबकि मेरी तो अभी एक
बहन भी विराजमान है
उसके शहादत पर यदि उसके
कुल खानदान का गौरव बढेगा
तो मेरी शहादत से मेरे खानदान का
गौरव क्यों घटेगा
चुप रहों ज्यादा बढ़ बढ़ कर
बातें मत किया करों
अपने बड़ो से जबान
मत लड़ाया करो
आज तक जो तुम्हे नीति धर्म
दर्शन ज्ञान और विज्ञानं की
जो शिक्षा दी गयी है
उसके मर्यादा भंग मत करों
अपनी मर्यादा में रहना सीखों
तुम्हे लेकर अपने भविष्य के
कितने सपने हमने बुन रखा है
ये सब बेकर की बातें
क्या शहीदों को पैदा करने का
हमने ही ठेका ले रखा है

चलो जल्दी से तैयार हो जाओ
चलकर उसे बधाई दे आयें
साथ ही तुम्हारे न जाने का
तर्कसंगत कारण उसे बता आयें

आशु बेमन से तैयार होने लगा
वह निर्मेश की उस पक्ति को
गुनगुनाने लगा
हाथ अपना कटे तो अहसास होता है
दुसरे का कटा हाथ तो बस
एक समाचार होता है
ऐसी स्वार्थयुक्त सोचों से
संकीर्णता का दीवाल खड़ा होता है
मरते तो बहुत लोग
नित्य दुर्घटनाओं में भी
फिर देश की सीमा का नाम ही
क्यों बदनाम होता है

शनिवार, 3 सितंबर 2011

अहसानों का कर्ज



प्रबल बेग से
वरुण देव बरस रहे थे
सावन से भादों दुब्बर नहीं है को
सिद्ध कर रहे थे
लग रहा था कि आज
पूरे बनारस को डुबो कर
ही दम लेगे

खेतों की निगरानी कर
में सीवान से लौट रहा था
वर्षा का आनंद लेते हुए एक
पारंपरिक बनारसी कजरी की
धुन गा रहा था कि
मिर्जापुर कईला गुलजार
कचौड़ी गल्ली सून कईला बलमू
दूर दूर तक कोई भी पशु पक्षी
दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था
सहसा खेत के मेड़ के किनारे
मेरा निगाह गया था
एक कबूतर अपने पंखों को फैलाये
लगा जैसे मरणासन्न पड़ा था
घायल समझ कर मैंने
उसे हाथ लगाया
मेरी सहायता लेने के बजाय
वह और घबराया
मैंने प्रयास कर जब उसे उठाया
उसके पंखों के नीचे
उसके दो बच्चों को पाया
अवाक् रह गया मै
हृदय दग्ध हो हाहाकार कर उठा
एक बेजुबान मां की विशाल ममता देख
मेरा कलेजा भर गया
उसके प्रतिरोध के बावजूद भी
किसी तरह उनको अपने गमछे में लपेट
मै घर लौट आया
दालान में मचान के ऊपर एक
कृत्रिम घोसला बना कर
उस पर मैंने उन्हें ठहराया

दिन बीतते गए
बच्चे शिशु से क्रमशः युवा होने लगे
पर मेरे प्रयास के उपरांत भी
मेरा आवास छोड़ने को वे सब
किसी कीमत पर तैयार नहीं थे
मैंने भी उनसे समझौता कर लिया
उनसे एक अंजना रिश्ता बना लिया
जब भी मै भोजन करता
निडर मेरे पास वो चले आते
मेरे भोजन से वे निःसंकोच
अपन हिस्सा पाते

भादों की स्याह रात
मै दालान में चारपाई पर लेटा था
विविध भारती के गानों को
अपने रेडियो पर सुनते हुए सो गया था
एकाएक उन कबूतरों की आवाज से
नीद मेरा भंग हो गया
बैठ कर सिरहाने देखा
दंग रह गया
एक सर्प मेरे तकिये के पास
करीब पहुँच ही गया था
निकट पास में ही लाश
मादा कबूतर का पड़ा था
चीत्कार कर उठा मन मेरा
मौत को इतने करीब देख
झंकृत हो गया तन
सारा खेल देख

तभी निकट उपलों के ढेर में
वह सर्प ओझल हो गया था
बेशक उस माँ कबूतर ने
मेरे प्राणों की रक्षा के लिए
अपने प्राणों को सहर्ष न्योछावर कर दिया था
मेरे उपकारों का पूर्ण समर्पण से
बदला चुका दिया था
अपने को इस सृष्टि की श्रेष्ठतम
योनिओं से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया था
बेशक उसे पूर्ण विश्वास के साथ
गुमान होगा इस बात का
अपने बच्चों की सम्पूर्ण सुरक्षा
और उनके सुरक्षित भविष्य का
निसंदेह वह अपने परिवार को
मेरे सानिध्य में अत्यधिक ही सुरक्षित
पा रहा था
पर उसके बलिदान ने मुझे
बुरी तरह मंथित कर
अन्दर तक हिला दिया था
उसका इस तरह मेरे अहसानों का
कर्ज चुकाना मुझे भीतर तक
साल रहा था

सोमवार, 29 अगस्त 2011

याद रखना किसी कफ़न में जेब नहीं होती






दीपू आज तो स्कूल बंद है
फिर इतना सुबह क्यों नहा रहे हो
स्कूल के लिए क्यों तैयार हो रहे हो
नहीं मम्मी आज अन्ना हजारे सर का
एक लम्बा जुलूस हमरे स्कूल से निकलना है
और मुझे उसमे तिरंगा लेकर
सबसे आगे चलना है

भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय फलक पर
एक विस्मयकारी आन्दोलन छिड़ चुकाहै
स्वतंत्रता आन्दोलन की एक झलक से
पूरा बदन सिहर गया है
पूरी अवाम एक सैलाब के रूप में
सडकों पर उतर चुकी है
बस रैलिया ही रैलिया दिखती है
एकजुटता के विराट और विहंगम नजरें
जिधर देखों उधर बस जुलूस की
शक्ल में मानवीय कतारें
आकंठ भ्रष्टाचार से सब ऊब चुके है
इसे जड़ से उखाड़ फेकने को
सभी व्यग्र दीख रहे है
पर अफ़सोस उसमे भी कुछ लोग
अपनी रोटियां सेक रहे है
तबियत से अपने बैनर संस्था और
स्कूल के प्रचार में लगे हुए है
वरना जुलूसों से क्या वास्ता
अपने विकास हेतु इन्हें बनाते क्यों रास्ता
प्रतिबन्ध के बावजूद भी इन मासूमों को
भीड़ जुटाने के लिए
घंटों धूप में दौड़ाया जाता है
बेहोश होने पर घर वालों को बुलाकर
चीनी नमक पानी का घोल देने की
नसीहत देकर अभिवाहकों को
सौप दिया जाता है
वजह भ्रष्टाचार के खिलाफ की लड़ाई में
अन्ना का हाथ बटाया जाना
बताया जाता है

मुझे अच्छी तरह याद है जब
पहली बार पिताजी मुझे मेरा नाम
लिखवाने स्कूल ले गए थे
प्रवेश शुल्क के नाम पर बस पांच रुपये
कक्षा एक में दिए थे
उसके बाद पूरे आठ वर्षों तक
कोई ऐसा शुल्क स्कूल द्वारा लिया गया नहीं
मैंने भी प्रवेश शुल्क के नाम पर कुछ
दिया हो याद नहीं
अभी कुछ वर्षों पहले तक भी
प्रवेश शुल्क किसी स्कूल में बस एक बार
प्रवेश के समय लिया जाता रहा है
पर अब तो हर कक्षा में हर बार
प्रवेश शुल्क माँगा जाता है
विकास शुल्क अभिवाहकों से लेकर
स्कूल का भवन बनवाया जाता है
बेचारा अभिवाहक इनका
चारा बना फिरता है
कोई विकल्प न पाकर अपना दुःख
किसी से नहीं कहता है

क्या यह भ्रष्टाचार कि श्रेणी में नहीं आता है
इस तरह अभिवाहकों का शोषण क्या
नहीं किया जाता है
वस्तुतः जहाँ से इस लड़ाई का
आगाज होना चाहिए था
वही आकंठ में डूबा भ्रष्टाचार
पहरेदार बना बैठा है
कौन समझाएं इन छद्म अन्नावादियों को
कि कमा ले चाहे जितने भी
हीरे और मोती
पर याद रखना किसी कफ़न में
जेब नहीं होती

बुधवार, 24 अगस्त 2011

अन्ना के शोर में शांत ४१ समाधियाँ


जिनके कंधे को
मजबूत होने की प्रतीक्षा
करते तरस गयी बूढ़ी ऑंखें
आज उनके लाशो को
अपने कमजोर हाथो में
ढोने को विवश बाहें
टेलीविजन पर देखता
आँखों से आसुओं के जेहाद को रोकता
सोचता बेशक कसूर नहीं
उन अबोधों का कुछ भी
पर नियति का खेल है कुछ और ही
दिल से क्या क्या सपने लेकर
सत्ती माई के दर्शन के लिए
निकले होगे वो घर से
पर उन्हें क्या पता कि
जिस रास्ते वो जा रहे है
मौत का दरवाजा खटखटा रहे है
यह उनकी अंतिम यात्रा होगी
फिर अपनों से भेट न होगी
१८ महिलाएं २३ बच्चों के साथ
जिन्दी समाधि में परवर्तित हो जाएगी

भीतर तक भेद गया
उनकी अंतिम यात्रा का कारुणिक दृश्य
आँखों के सामने नाचता
पूरा मरघट का परिदृश्य
घाघरा की लहरे एक और जहाँ
उफान मार रही थी
बार बार अपने थपेड़ों से
किनारों को छूने का प्रयास कर रही थी
मानो उन अबोधों को अपने
बाँहों में लेकर चूमना चाह रही है
अंतिम बार उन्हें
अंगीकार करना चाह रही है
असफल होने पर उनकी भीषण गर्जना
मानों इस असफलता पर
जार जार रो रही थी
वही कतार से लगी महिलाओं की
चिताएं धूं धूं कर जल रही थी
ऊँची ऊँची उठ रही लपटें
हा हाकार कर रही थी
उस हृदयविदारक मंजर पर
मरघट भी चीत्कार कर रहा था
लपटों के उस पार श्मसान का
जर्रा जर्रा मानों काप रहा था
परंपरानुसार २३ बच्चों के शव जब
घाघरा में बहाए जा रहे थे
बादल गडगडाहट के साथ
तेजी से दहाड़ मार कर बरस रहे थे
मानो इस अनहोनी पर
बेकल विवश रो रहे थे
बीच बीच में उनकी निरापद शांति
ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो
मानो ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे
प्रकृति के इस प्रकोप पर
एक और जहाँ हर स्थानीय आमोखास
अन्दर तक हिल चुका था
पर अफ़सोस अन्ना की आंधी में
अधिकांश लोगों के पास
उन्हें श्रद्धांजली देने का
कहाँ वक़्त था

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

प्रकृति का अनुपम अनुराग



मध्याह्न
भोजनावकास का समय था
मित्रो के साथ पास के कैंटीन में
मै विराजित था
छोले के साथ समोसे कट रहे थे
साथ ही वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य पर
जम कर बहस हो रहे थे
जहाँ एक और अन्ना के पक्ष में
कसीदे पढ़े जा रहे थे
वही बाबा कि असफलता पर
एक्सपर्ट कमेंट्स कसे जा रहे थे
मै चाय कि चुसकिया लेता हुआ
खामोश बहस से दूर
सामने के नयनाभिराम दृश्य पर
ध्यानस्थ हो गया था
करीब में ही नल के पास पड़े
जुठनो पर कौओं का एक झुण्ड रमा था
उनके पास ही चिड़ियों का एक
समूह भी जमा था
जो शायद अपनी पारी का
इंतजार कर रही थी
पर कौवों कि भीड़ थी कि
हटने का नाम ही नहीं ले रही थी
बड़े चाव वे डटे थे
मस्त दावत उड़ा रहे थे
उसी बीच में एक छोटा कौवा
जिसका एक पैर काम नहीं कर रहा था
संभवतः वह बीमार भी था
एक ही पैर का सहारे उस जूठन में से
अपने लिए कुछ पाने का कई बार
प्रयास करता रहा
पर हर बार अपने झुण्ड के असहयोग से
असफल रहा
शायद निराश हो चला था

अपनी क्षुदा को तृप्त कर
एक एक कर जब वो जाने लगे
चिड़ियों के समूह तब
क्रमशः करीब आने लगे
बचे जूठनो पर अपना अधिकार
ज़माने कि चेष्टा करने लगे
तभी वह कौवा घिसटा हुआ
कुछ पाने कि उम्मीद में
पुनः आगे आ गया था
पर तमाम प्रयास के उपरांत भी
स्वतः से कुछ ग्रहण नहीं कर पा रहा था
हर बार प्रयास करने के उपरांत भी
वह अपने को सम्भाल नहीं पा रहा था
रह रह कर गिर जा रहा था
चिड़ियों के झुण्ड में से एक को शायद
आ गयी उस पर दया
उसने अपनी चोंच में
समोसे का एक टुकड़ा लिया
उसे उस कौवे के मुंह में पकडाया
एक बरगी तो कौवा घबराया
पर किसी तरह उसने उस टुकड़े को
अपने मुंह में सरकाया
इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया गया
उस घायल कौवे कि क्षुदा
क्रमशः तृप्त हो रही थी
इसी बीच जूठन भी समाप्त हो गयी थी
बेचारी वह चिड़िया स्वयं शायद
भूखी ही रह गयी थी
मानवीय प्रेम से परे
प्रकृति के इस अनुपम अनुराग को
देख मेरी ऑंखें श्रद्धा से भर गयी थी
मौन में इन बेजुबानो की भाषा को
समझाने का प्रयास कर रहा था
अपने भोजनावकाश का सार्थक
उपयोग कर रहा था
अपने को जहाँ अभी तक इस श्रृष्टि की
एक सबसे अनुपम सभ्य और सुसंस्कृत
कृति समझ रहा था
वही अब अपनी भूल पर तरस खा रहा था
निरपेक्ष भाव से मूर्तिवत
मै उस दृश्य से शिक्षा
ले रहा था

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

१६ अगस्त ०० सच्चे सुराज की नीव





सुधी पाठकों इधर कई दिनों की छुट्टियाँ होने को हैं ऐसे में आपसे मुलाकात चार पाँच दिनों बाद ही हो पायेगी ऐसे में मेरी यह रचना रक्षाबंधन और १५ अगस्त को ध्यान में रख कर आपको समर्पित है आशा है आप सबका स्नेह पहले की तरह प्राप्त होगा एक बार पुनः आप सब को रक्षाबंधन और स्वतंत्रता की ढेर सारी बधाई के साथ आपका निर्मेश


ए मेरे देश के लोगो
क्यों रक्त हो चुका ठंडा
क्यों पड़ता नहीं असर है
चाहे खा ले कितने ही डंडा

पिछले दिनों की घटनाये
जिसमे क्या क्या न हुआ था
शर्मशार भई मर्यादा
खोना अब कुछ शेष न था

चलते जो तीर शब्दों के
भावों को भेद नहीं पाते है
अब अर्थ खो चुके अपने
नाहक संसद को सताते है

अच्छो को श्रेय ले बढ़ाते है
गलतियाँ दूसरे पर मढ़ते है
आदत है पड़ चुकी इनकी
पानी में आग लगाते है

आज़ाद परिंदे हम बेशक
है कभी हुआ करते थे
अब पंख तोड़ कर मेरे
उड़ने को हमसे कहते है

भौतिक दस्ता से मुक्त हुए
वर्षों हमको है बीत गए
मानसिक दंश गुलामी का
पर आज भी हम है झेल रहे

अन्ना लेकर आयें जब
तीव्र सत्यता की आधीं
प्रयास कर लिए जीभर कर
पर बन न पाए वो गाँधी

संतोष एक ही है हमको
हम आजाद हो चुके है
पीर कहे पर किससे अपनी
बस लाज ढो रहे रहे है

है साहस बचा है कितनो में
सच का साथ देने की
झुनझुना थमा कर हाथों में
कहतें है बात निभाने की

हो स्वतंत्र अपने ही देश में
दासता का जीवन जी ही रहे
पाते है जख्म रोज ही हम
दुखड़ा अपना कहने से रहे

पा चुके बेशक स्वराज है
पाना सुराज बाकी है अभी
इस बार चूक गए जो हम
मिले न वांछित लक्ष्य कभी

बना रहे पंद्रह अगस्त ही
बेशक पर्याय अपने स्वराज का
सोलह अगस्त को पड़ जाये
मजबूत नीव सच्चे सुराज का

आ मिले अन्ना से हाथ हम
रक्षा बांध शंखनाद करते है
दूसरी स्वतंत्रता की रणभेरी
हम आज ही से बजाते है

बुधवार, 10 अगस्त 2011

कृष्ण कुमार यादव जी को जन्मदिन पर हार्दिक बधाई

कृष्ण कुमार यादव सर को उनके जन्मदिन 10 अगस्त पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें. आप एक अच्छे प्रशासक और साहित्यकार के साथ-साथ अच्छे व्यक्ति भी हैं, आपका सान्निध्य हम सब को प्राप्त है. आपके सान्निध्य में हम लोगों को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ है. आपके जन्मदिन पर आपके सुखी, समृद्ध एवं यशस्वी जीवन की कामना करते हैं.


सुहृदय, मिलनसार और साहित्य प्रेमी
सबसे अन्तर्मन से वह जुड़ जाते हैं
एक बार जब बने निकटता आपसे
सब जन के.के. जी के सादर गुण गाते हैं !!

सोमवार, 8 अगस्त 2011

फिर कहाँ मिलेंगे...

चली गयीं कोटला साहब...

मौत जिंदगी का वक्फा है

यानी आगे चलेंगे दम लेकर।

आज सुबह के वक्त हमारा पूरा परिवार जब सेहरी की तैयारी में था कि अचानक सालों से बीमार हमारी नानी जाहिरून निशा इस फानी दुनियां से भोर के तीन बजकर पांच मिनट पर कभी ना खत्म होने वाली दुनियां में चली गयीं। मौत जोकि शश्वत सत्य है। इस पर किसी का जोर नहींए क्या राजा क्या रंक सब एक समान। नानी कैंसर से पिछले दस सालों से बीमार थी मगर उसने कभी तकलीफ को जाहिर नहीं किया।

मैं अक्सर उसे कोटला साहब कहके पुकारता था वो खुश हो जाती। पूछने पर की ऐनी प्राब्लम तो कहती नो प्राब्लम। जिंदगी की तमाम तल्खियें से गुजरने के बाद भी नानी ने कभी दुख का इजहार तक नहीं किया। आज हम उन्हे सुपुर्दे खाक कर आयें। सुपुर्दे खाक किया अपने अरमानों को, अपनी खुशियों को। मैं अभी सोच रहा हूं अब कहां मिलेंगी कोटला साहब। किससे कहूंगा कि आज मुझे कुत्ते ने सींग मार दिया। किससे पूछूंगा कि खजूरिया साहब कहां है। आज दिल रो दिया कोटला साहब को याद कर के। आखिर मौत ही सच है बाकी सब झूठ। अब तो यादें ही बाकी हैं कोटला साहब की। कोटला सहब माफ करीयेगा अगर मुझे कुछ खता हुई होगी।

अल्लाह हाफिज कोटला साहब।

शायद अब कभी ना मिल सकुं की पूछुं जर्मन साहब कैसे हैं?

खुदा आपको जन्नत में जगह दे।

मुठठीयों में खाक लेकर दोस्त आए वक्त-ए-दफन

जिन्दगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

आपकी राय हमारी सोच पर सादर आमंत्रित है




मारो साले को
और मारो की तेज आवाज सुन
मै घर से बाहर आया
वहां के हालात देख घबराया
एक अधेड़ व्यक्ति को सब
मिल कर बुरी तरह पीट रहे थे
आपस में बहादुरी की मिसाल
देते नहीं थक रहे थे
जो भी कोई कहीं से आता
तबियत से अपना हाथ साफ कर जाता
घेलुए में माँ बहन कि गाली
सौगात में दे जाता
मैंने बीच बचाव कर उसे
किसी तरह बचाया
उसे निकट के कुएं की
जगत पर लाया
हाथ मुंह धुलाकर घाओं को
डीटल से साफ कर
उस पर मलहम लगाया
गुड के साथ पानी पिलाकर
थोडा शांत होने पर पूछा
क्यों करते हो आखिर ऐसा काम
मै अगर समय से न आता तो
हो गया होता तुम्हारा काम तमाम

मेरी अपनत्व भरी बातें सुन
ऑंखें उसकी कृज्ञता से भरभरा गयी
चाहकर भी गले से उसके
आवाज नहीं निकल पा रही थी
एक अजीब नजरों से वह
मेरी तरफ देख रहा था
शायद मेरे होने के बारे में
वह सोच रहा था
कि क्या आज भी ऐसे लोग है
जो दूसरे के मर्म को पहचान लेते है
उसके दर्द को अपना लेते है
किसी तरह प्रयास कर वह बोला
भैया क्या करें चार दिनन से
घर मा चूल्हा नहीं जला है
पिछले कई दिनन के माफिक
आज भी हम काम से
खाली हाथ लौटा है
ऊपर से गुडिया दू दिनन से
बुखार मा ताप रही है
घर मा खाने को जहर भी नहीं है
जीवन बचाने का कोई
रास्ता नहीं सूझ रहा था
ऐसा सोच पहली बार बड़ी हिम्मत कर
ई साईकिल चोरी के लिए निकला
और पहली बार ही पकड़ा गया

सर मुड़ते ही ओले पड़े
जम कर लात और घूंसे पड़े
भैया आपका बहुत बहुत धन्यवाद्
अब घर चलते है
सब मिलकर सामूहिक
आत्महत्या ही कर लेते है
रोज घुट घुट कर मरने से अच्छा है
एक बार में इस सफ़र को
समाप्त कर देते है

सन्न राह गया मै
जब उसने अपना आखिरी विकल्प सुनाया
मैंने उसे फिर प्रेम से
अपने पास बिठाया
पुनः तबियत से उसे समझाया
फिर चोरी न करने कि शर्त पर
कच्चे अनाज के कुछ थैले के साथ
कुछ रुपये और दवा देकर
बाद में कुछ काम अवश्य दिलाने के
नाम पर मिलने की राय देकर
उसे तत्काल विदा किया
उसकी वेदना देख मन
एकदम से भर गया

उपरांत अपने बैठक में बैठ
उसे दूर तक जाते देख रहा था
मैंने सही या गलत किया
यही सोच रहा था
एकबारगी मुझे लगा
कि कहीं वह पेशेवर चोर होकर
मेरी भावनाओं का शोषण तो नहीं कर रहा था
या कि सचमुच जरूरतमंद था

इस ब्लाग पर सादर आप
इस मुद्दे पर अपनी
सोच के साथ निमंत्रित है
आपकी स्वस्थ्य सकारात्मक राय
हमारी सोच पर
सादर आमंत्रित है

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

एक गिलास पानी



आज सुबह से ही
भयंकर उमस थी
गर्मी भी बेजार बरस रही थी
एक गवाही के चक्कर में
मुझे कचहरी जाना था
तैयार होकर ऑटोरिक्शा कि प्रतीक्षा
बेसब्री से कर रहा था
तभी एक
कृशकाय बूढ़े जर्जर व्यक्ति
को कंधे पर लादे एक युवक आया
साथ में उसकी पत्नी
बनी हुई थी हमसाया
बोली अरे जल्दी करो
नहीं तो कही यहीं मर गया
तो समझो सब गुड गोबर हो गया
मै आश्चर्य से उन्हें देख रहा था
चाह कर भी उनकी परेशानियों को
नहीं भाप पा रहा था

एक ऑटोरिक्शा आता दिखा
दौड़ कर उसकी भार्या ने उसे रोका
किराया तय किये बिना ही
सब उस पर सवार हो गए
उसे कचहरी चलने का
आदेश दे दिया
में भी दौड़ कर उसी ऑटो में
सवार हो गया

गाड़ी आगे बढ़ी
मेरी भी वेदना बढ़ने लगी
मुझे तो लग रहा था कि
ये सब अस्पताल जाना है चाहते
पर कचहरी जाने कि बातें
मेरे समझ के बाहर हो गयी
खैर बात आयी गयी

कचहरी पहुँच कर मैंने
अपना काम निपटाया
पुनः वही से अपने कार्यालय
मुझे जाना भाया
तभी रजिस्ट्री कार्यालय के बाहर
मेरी नजर पड़ी
देखा तो वह महिला वही थी खड़ी
निकट उसके वह वृद्ध
मरणासन्न था पड़ा
मैंने उत्सुकतावश
उस महिला से कहा
मैडम कौन है ये इन्हें यहाँ के बजाय
अस्पताल क्यों नहीं ले जाते
बोली पाहिले रजिस्ट्री तो करवा ले
पेपर सब तैयार होई रहा
एक घंटे में सब काम होई जाइये
तब बड़का बाबु के हम आराम से
अस्पताल ले जइबे
नहीं तअस्पताल के चक्कर में
हमरा सब काज अजिहे
बिगड़ जाइये

मै स्तब्ध हो गया
खेल अब सारा समझ में आ गया
मैंने कार्यालय जाना
स्थगित कर दिया था
पता करने पर उन्हें उस
वृद्ध का भतीजा पाया था
उस वृद्ध कि अपनी कोई
संतान नहीं थी
पत्नी दस वर्ष पूर्व ही भगवन को
प्यारी हो गयी थी
पिछले दो सप्ताह से उसकी भी
तबियत ख़राब चल रही थी
चाचा भातीचे के बीच संपत्ति को लेकर
रस्साकस्सी चल रही थी
पहले संपत्ति उसके नाम
करने कि शर्त पर ही
इलाज और आगे के सेवा की
बात तय हुई थी
इसी निमित्त उनसबका यहाँ आगमन था
मै विस्मृत सारा दृश्य
किसी सिनेमा की तरह देख रहा था
तभी वृद्ध के मुख से
एक गिलास पानी की आवाज आयी
बहू बोली तनिको मत घबराई
बस थोरिके देर मा
सब काम होई जाइये
तब तुमका हम पानी के बजाय
समोसा अउर लस्सी खियेबे

मैंने कहा भद्रे कम से कम
उन्हें पानी तो पिला दीजिये
उसने कहा की आप
बीच में ना ही पड़िए
अब सब काम होई गवा है
तोहे इतना चिंता काहे है
मैंने अफ़सोस से अपना गर्दन हिलाया
उसके लिए एक गिलास पानी के
इंतजाम में चला गया
लौटने पर उसकी गर्दन को बेलाग
एक और झुका देखा
मेरा माथा ठनका
तभी उसका bhateeja कागज लेकर
उसकी और हस्ताक्षर के लिए दौड़ा था
पर वह तो निढाल हो
शायद अपनी सहचरी के पास
चल दिया था

उन दोनों के कलेजे में
एक हूक सी उठती दिखी
उसे वही बेमुरवत छोड़
उन्होंने अपने घर की raah की थी

में शांत हो
एक गिलास पानी की
कीमत देख रहा था
भावनाओं पर आकांछाओं की
विजय को स्पष्ट
देख रहा था

शनिवार, 30 जुलाई 2011

रचनाधर्मिता के विविध आयामों को सहेजतीं : आकांक्षा यादव

ब्लागिंग-जगत में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो एक साथ ही प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भी निरंतर छप रहे हैं. इन्हीं में से एक नाम है-आकांक्षा यादव जी का. आकांक्षा जी कॉलेज में प्रवक्ता के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी उतनी ही प्रवृत्त हैं।


इण्डिया टुडे, कादम्बिनी, नवनीत, साहित्य अमृत, वर्तमान साहित्य, अक्षर पर्व, अक्षर शिल्पी, युगतेवर, आजकल, उत्तर प्रदेश, मधुमती, हरिगंधा, पंजाब सौरभ, हिमप्रस्थ, दैनिक जागरण, जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, स्वतंत्र भारत, राजस्थान पत्रिका, वीणा, अलाव, परती पलार, हिन्दी चेतना (कनाडा), भारत-एशियाई साहित्य, शुभ तारिका, राष्ट्रधर्म, पांडुलिपि, नारी अस्मिता, चेतांशी, बाल भारती, बाल वाटिका, गुप्त गंगा, संकल्य, प्रसंगम, पुष्पक, गोलकोंडा दर्पण इत्यादि शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आकांक्षा यादव अंतर्जाल पर भी उतनी ही सक्रिय हैं. विभिन्न वेब पत्रिकाओं- अनुभूति, सृजनगाथा, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, वेब दुनिया हिंदी, रचनाकार, ह्रिन्द युग्म, हिंदीनेस्ट, हिंदी मीडिया, हिंदी गौरव, लघुकथा डाट काम, उदंती डाट काम, कलायन, स्वर्गविभा, हमारी वाणी, स्वतंत्र आवाज डाट काम, कवि मंच, इत्यादि पर आपकी रचनाओं का प्रकाशन निरंतर होता रहता है. विकिपीडिया पर भी आपकी तमाम रचनाओं के लिंक उपलब्ध हैं।


अपने व्यक्तिगत ब्लॉग 'शब्द-शिखर' के साथ-साथ पतिदेव कृष्ण कुमार जी के साथ युगल रूप में बाल-दुनिया, सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग ब्लॉगों का सञ्चालन उन्हें अग्रणी महिला ब्लागरों की पंक्ति में खड़ा करता है. इसके अलावा भी वे तमाम ब्लॉगों से जुडी हुयी हैं.

30 जुलाई, 1982 को सैदपुर, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मीं और सम्प्रति भारत के सुदूर अंडमान में हिंदी ब्लागिंग की पताका फहरा रहीं आकांक्षा जी न सिर्फ हिंदी को लेकर सचेत हैं बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी भूमिका निभा रही हैं. दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/ संकलनों में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं तो आकाशवाणी से भी रचनाएँ तरंगित होती रहती हैं. नारी विमर्श, बाल विमर्श और सामाजिक मुद्दों से सम्बंधित विषयों पर आप प्रमुखता से लेखन कर रही हैं. कृष्ण कुमार जी के साथ "क्रांति-यज्ञ:1857-1947 की गाथा" पुस्तक का संपादन कर चुकीं आकांक्षा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चित बाल-साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु द्वारा सम्पादित "बाल साहित्य समीक्षा (कानपुर)" पत्रिका ने विशेषांक भी जारी किया है।


विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु उन्हें दर्जनाधिक सम्मान, पुरस्कार और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं. भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार सहित तमाम सम्मान शामिल हैं. आकांक्षा जी के पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव भी चर्चित साहित्यकार और ब्लागर हैं, वहीँ इस दंपत्ति की पुत्री अक्षिता (पाखी) भी 'पाखी की दुनिया' के माध्यम से अभिव्यक्त होती रहती है. सहजता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति आकांक्षा यादव अपनी रचनाधर्मिता के बारे में कहती हैं कि-'' मैंने एक रचनाधर्मी के रूप में रचनाओं को जीवंतता के साथ सामाजिक संस्कार देने का प्रयास किया है. बिना लाग-लपेट के सुलभ भाव-भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें, यही मेरी लेखनी की शक्ति है.''

आशा की जानी चाहिए कि आकांक्षा जी यूँ ही अपने लेखन में धार बनाये रखें, निरंतर लिखती-छपती रहें और हिंदी साहित्य और ब्लागिंग को समृद्ध करती रहें.

जन्म-दिन पर असीम शुभकामनाओं सहित...!!
_______________________________________________________
रत्नेश कुमार मौर्य :
जन्म- 14 जुलाई, 1977 को. मूलत: उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के निवासी. आरंभिक शिक्षा-दीक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ और तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में परास्नातक. सम्प्रति उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन कौशाम्बी जनपद में अध्यापन पेशे में संलग्न. अध्ययन, लेखन का शौक. फ़िलहाल इलाहाबाद में निवास. दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी होने के चलते कई बार यह जीवन भी दर्शन ही लगने लगता है.अंतर्जाल पर ‘शब्द-साहित्य’ ब्लॉग के माध्यम से सक्रियता !!

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

सुक्खू चाचा की अंतिम थाली








माँ के बुलावे पर


पिछले दिनों मै गाँव गया था


सुबह अपनी बखरी में बैठा


चाय पी रहा था


बबलू दादी दादी चिल्लाते हुए


घर के अन्दर गया


मुझे लगा कि इसे क्या हो गया


तभी देखा पीछे से सुक्खू चचा


अपने कंधे पर झोला डाले


धीरे धीरे आ रहे थे


मुझे अपने बचपन में लिए जा रहे थे




हाँ तक़रीबन हर इतवार को ही


वह सिल बट्टे को कूटने


गाँव में चले आते थे


पैसे के साथ ही भरपेट भोजन पाते थे


एक गाँव कि खबर को


दूसरे गाँव पहुचाते थे


एक बेफिक्र अलमस्त जीवन के साक्षी बने


जो कुछ भी कमाते थे


उसी से संतोष कर ठीकठाक


परिवार चलाते थे


पर इधर काफी महीनो बाद


उनसे मुलाकात हुई


पास बैठने पर हाल चाल के साथ


तमाम तरह की बात भई


कहने लगे बिटवा तू त


द्विज क चाँद होई गवा


अइसन पढ़ लिख लिया कि हमन के


एकदमे भूल गवा


कहा दद्दा इ दाल रोटी क मजबूरी हौ


वरना इ कौन दूरिये हौ


शहर में तो हमरो दम घुटत है


यहाँ तो फिर भी साफ ताज़ी हवा मिलत है




तभी अम्मा बाहर निकली


बोली सुक्खू अब तोहर जरूरत नइखे


बडका बेटवा नॉएडा वाला


एक मिक्सी दीन है लाइके


उ बिजली से चलत है


सिलबट्टा से बढ़िया कम करत है


सब कम फटाफट समेटत है


अब तो सिल बट्टा वैसे ही पड़ा है


रुका आइल हौवा त खाना


कम से कमखायके जैया


आगे से तू भले ही मत आइय





सुन सुक्खू चचा को लगा कि जैसे


काठ मार गया


गिरते गिरते उन्होंने दीवाल थाम लिया


बोले सहूईन एहे त दू चार घर बचा रहा


जेकर हमका असरा रहा


जिनगी हत गयल ई पिसे वाली मशिनिया से


कैसे जियल जाई हमअन से


लगत आ कि इहो गाँव अब छूटिये जाई


कैसे जिनगी कटी हो माई


मेरी और देख बोले बेटवा


हमरे जिम्मे दस गाँव रहा


एक एक कर सब छुट रहा


ई मशीन त मारसकि पाहिले


खेत खलिहान क मजदूरी छुड़वा


थोड़ा जौन ई सब बचा रहा


ओहून में आग लगावा
कहते हुए सुक्खू चाचा


बैठ गए धम्म से जमीन पर


तभी माँ अन्दर से ले आयी दाल रोटी


और प्याज थाली में परोसकर



अनमने मन से सुखु ने


थाली को थाम लिया


कोरो से आंसुओं को रोकने कि


असफल चेष्टा करता रहा


अपने गंदे गमछे से उन्हें पोछता हुए


बेमन से खाना शुरू कर दिया


मै मौन पूरे घटना चक्र को


यंत्रवत देख रहा था


चूँकि मुझे भी आज शहर निकलना था


अतः माँ ने भोजन कि एक थाली मुझे


भी परोस दिया था


मै कभी सुखु चाचा को


कभी अपने घर में उनकी


इस अंतिम थाली को देख रहा था


उनकी भावनाओं में


उनके साथ बह रहा था


भोजन में तो जैसे मन ही


नहीं रम रहा था


किसी तरह उदरपूर्ति का प्रयास कर रहा था




साथ ही देख रहा था


मरते हुए इन गरीब


भारतीय कामगारों को


बाजारवाद के प्रभाव से


जो मार रहा था इन्हें बेभाव से


सोचता बेशक बाजारवाद ने जहाँ दिया


हमें बहुत कुछ है


पर बदले में छीना भी


हमसे काफी कुछ है






सोमवार, 25 जुलाई 2011

संवेदनशून्यता



किनारे सड़क के
पड़ा वह कराह रहा था
चोट इस कदर था कि
रह रह कर बिलबिला रहा था
संवेदना शून्य लोगो का
आवागमन अबाध जारी था
सबका हृदय मानो
पाषाण वत हो गया था
कुछ हिम्मत करके रुकते
देख आहें भरते
हमदर्दी जाहिर कर कुछ सोच
पुनः आगे बढते

एक आवश्यक कार्य से निकला
मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बना
रुक गए मेरे कदम
देख उसे बेदम
आरजू कितनो से की कि रुके
उसे अस्पताल पहुचाने में
मेरी सहायता करे
पर किसी के कान पर
देखा नहीं जू रेगते
तभी दो भिक्छुक यात्रियों ने
मेरा हाथ बटाया
उसे समय से अस्पताल पहुँचाकर
मेरे काम को आसान बनाया

उसकी जेब से मिले
डायरी कीसहायता से मैंने
उसके घर वालों को खबर कर दिया था
स्वयं इमरजेंसी के बाहर बैठ
उनकी प्रतीक्षा कर रहा था रहा
इस मूल्यहीनता का कारण खोजता रहा
कभी देवदत्त द्वारा एक पक्षी को
घायल करने व पुनः सिद्धार्थ द्वारा
उसे बचाने के इतिहास के निहितार्थ को
वर्तमान परिवेश से जोड़ता रहा
कभी एक भयाक्रांत आवाज पर
जहाँ रहबरों के भी पांव
ठिठक जाते रहे
आज वही राहगीरों के
कदम भी रुकने से रहे
मुंह में पान का दे नेवाला
कानूनी दांव पेच का दे हवाला
अपने नैतिक कर्तव्यों और
सामाजिक दायित्वों से
कर लिया किनारा

थामे विकास का दामन
आज मानव वैश्विक व्यावसायिक करण का
शिकार बन चुका है
निज स्वार्थ में इस कदर रम चुका है
कि उस विकास के नेपथ्य से दिखती
मानवीय मूल्यों की विनाशलीला
उसे दिखाई नहीं देती
ऐसी किसी भी घटना या दुर्घटना का
पड़ता नहीं उस पर कोई असर
सीना ताने विकास कि राह पर
चलता वह बेखबर
ऐसी घटनाओं या इनकी पुनरावृत्ति पर
निश्चित ही यह महानगरों की
भागती जीवनशैली का प्रभाव है
जहाँ येन केन एक दूसरे के सर पर
रख कर पैर आगे बढ़ना ही
मानव का स्वभाव है
छोडो कौन पड़े झमेले में के
जुमले का अनुगामी बनता है
सोचता नहीं कि कभी वह भी
ऐसी घटनाओ का पात्र बन सकता है
तब ऐसे जुमले कि आवृति के कारण
अपने परिवार को
अनाथ छोड़ सकता है
उपरांत इसके हमें आदत पड़ गयी है
हर मूल्यहीनता को मानते
पश्चिम कि देन
जबकि सच्चाई पश्चिम आज भी
हमारे संपन्न अतीत के कारण को
जानने को है बेचैन
जिसे हम त्याग करते है
विकसित होने का दावा
कवल गट्टेको त्याग
कमल डंडियों का कर चयन
देते स्वयं को छलावा

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

आज कि सावित्री


अपने मित्र सुमित के
डेल्ही बेल्ली देखने के आमंत्रण पर
शहर के एक मल्टी प्लेक्स के
भूतल पर
हम टिकट के लिए लाइन में थे
भाई साहेब प्लीज
दो टिकट हमारी भी ले ले
संबोधन सुन मै अचकचा गया
पास में एक नौजवान को
ह्वील चेयर पर पाया
साथ में निर्विकार भाव से
चेयर को संभालते हुए
उसके बालों को सवारते एक
सभ्य सुगढ़ युवती दिखी
सहानुभूति वस मैंने
उनकी टिकट लेली
इसी बीच कई अज्ञात आंखे
हमें घूरती रही

औपचारिक धन्यवाद् प्राप्त कर
हम दोनों हाल की ओर चल दिए
चाह कर भी आगे उनकी
सहायता करने से बचते रहे
पुनः भाई साहेब की आवाज आयी
उसने एक बार और
सहायता कि गुहार लगाई
विचलित पुनः मन यह देख कि
वह दोनों पैर से पंगु था
स्वयं से उठ तक नहीं पा रहा था
किसी तरह हमने उक्त युवक को
सहारा दे उसे उसकी
सीट पर बिठाया

इसी बीच पिक्चर
प्रारंभ हो गया था
पर मेरा चिंतनशील और खोजी मन
रह रह कर उन्ही पर जा रहा था
उनके बीच पति पत्नी का सम्बन्ध
उनके आपसी वार्तालाप से
स्पष्ट हो गया था
बड़े ही जतन से एक दूसरे के हाथो को
अपने हाथ में लिए
वे पिक्चर देखते
बड़े प्रेम से आपस में
परिचर्चा करते
परदे पर दी जा रही तथाकथित
हर गालीयों पर अपनी
प्रतिक्रिया व्यक्त करते
बीच बीच में पत्नी उसे
कोल्डड्रिंक और स्नेक्स बड़े प्यार से
अपने हाथों से सर्व करती
रह रह कर उसके बालों में
उंगलिया फिराते हुए
बालों को बुहारती
कहीं से भी बनावटी नहीं
लग रही थी
साक्षात् सत्यवान की
आधुनिक सावित्री दिख रही थी

एकबारगी तो मुझे भी लगा
कि कहीं मै स्वप्न तो नहीं देख रहा
आज के परिवेश में ऐसे पति के साथ
ऐसा सामंजस्य एक कल्पना ही तो रहा

मै भावुक हो पिक्चर कम
उन्हें ज्यादा देख रहा था
शुन्य में ताकता निमग्न सोच रहा था
क्या ये आधुनिका कल्पित
भारतीय नारी है
विकलांग पति पर लुटा रही
खुशियाँ सारी है
आखिर यह इसे कौन सा भौतिक
या दैहिक सुख दे रहा होगा
इसे तो बस कष्ट ही कष्ट
हो रहा होगा
तभी लगा कि अगर यह
मेरे द्वारा कल्पित कष्ट पा रही होती
तो घर में ही सीडी पर पति को
वांछित पिक्चर दिखा दी होती
न कि इतने समर्पित ढंग से
पति के बड़े परदे पर
पिक्चर देखने कि इक्षा को
साकार कर रही होती

मेरे सामने सागर सा शांत
धीर निश्छल निस्वार्थ अप्नत्वा से भरा
सच्चा प्यार आकार लेने लगता है
जो इन सब से कहीं दूर
केवल मन की ही बात सुनता है
व स्थापित मानको और मापदंडो से
ऊपर का अहसास होता है
जो किसी किसी को ही
नसीब होता है

बेशक है इतिहास का सत्यवान तो
फिर भी सर्वांगसुंदर था
आधुनिक सत्यवान विकलांग
मगर भाग्यवान बन
मेरे सामने विराजित था
इस आधुनिक सावत्री का आचरण
इतिहास कि सावित्री पर भारी था
अभी तक तो मै वर्तमान परिवेश में
आधुनिकता के नाम पर
वैभव विलास और स्वार्थ में
आकंठ डूबे रिश्तों को जहाँ
तार तार होते देख रहा था
पर आज उन्ही रिश्तों के मध्य
तपती रेत के बीच
वारिस कि फुहारों कि मानिंद
प्रोफेश्न्लिस्म मानसिकता के ज़माने के मध्य
उस आधुनिक नारी के भावों को देख
श्रद्धा से नतमस्तक हो गया था

इतने पश्चिमी विप्लव के उपरांत भी
अपने अतीत की बची हुई
संस्कृति पर एक बार
पुनः मुझे गर्व हुआ था