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शनिवार, 17 दिसंबर 2011

भैयालाल

रत के बारह बज रहे थे
लच्छू चाचा दरवाजे पर खड़े
अपने मंद बुद्धि बच्चे
भैयालाल की
बड़े बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे थे
कोरो से बहते आंसुओं को
रह रह कर पोछ रहे थे

आज चार दिन हो गए
जाने वह कहा चला गया
कही बहुत दूर तो नहीं निकल गया
शायद रास्ता भटक गया
इसीलिए घर नहीं पाया
जाने कैसे और कहाँ होगा
कैसे अपना ख्याल रख कर
क्या खता पीता होगा
समय तो नित्य सुबह
नाश्ते के बाद वह घर से निकल जाता
बाजार में जाकर इनके उनके यहाँ बैठ
दोपहर में खाने घर जाता
सोच सोच चाचा का कलेजा
मुह को जाता
चाची के देहावसान के उपरांत
पिता के साथ वही थे उसके माता
शेष भाइयों या बच्चों को
उसकी कोई खास चिंता नहीं थी
बड़ी बहुओं को तो बस
उसके मौत की ही प्रतीक्षा थी
उनकी बेचैनिओं ने मुझे
इस कदर बेचैन कर दिया
जा तो रहा था मै बड़े ही जरूरी काम से
पर उनके मौन आग्रह पर
छोटे को लेकर भैया लाल को
खोजने चल दिया
मन तमाम अनिष्ट कि आशंका से
आहत हो रहा था
साथ ही एक दूसरे से पूछते टोह लेते
उसको खोजने का उपक्रम जारी था
अचानक घर से लगभग पच्चीस मील दूर
सड़क के किनारे उसे लेटे देखा
ऐसा लगा कही किसी ट्रक से
दब तो नहीं गया
घबड़ाकर मन काप गया
लच्छू चाचा कि दशा सोच
तन सिहर गया
मैंने रुक कर उसे आवाज दिया
एक ही आवाज में वह उठ गया
उसकी दीन हीन दशा देख
भगवान के फैसले पर अफ़सोस होने लगा
शारीर पर तमाम चोटों के
निशान से वह बेचैन था
घावों से अनवरत रक्त बह रहा था
पता नहीं बच्चों ने उसे पागल समझ
कितना पत्थर बरसाया होगा
इसी बीच कितने ऐसे जुल्म
इस बेचारे ने सहा होगा

मैंने तुरंत उसे अपनी
मोटर साइकिल पर बैठाया
छोटे ने मोबाइल से घर पर
उसेक पाने कि सूचना तुरन्त ही पहुचाया
अज्ञात खुशी से आह्लादित
उसे ले मै घर आया
सिसक कर चाचा ने उसे
विह्वल हो गले लगा लिया

पिता पुत्र के इस मिलन को
भीगी पलकों से मैं
जीभर कर निहारता रहा
टूटते परिवार
और छीजते घर
बारके दौर में
रक्त के मजबूत रिश्तों की
गाथा कहता रहा
मेरा कविहृदय इन रिश्तो को
एक नूतन आयाम देता रहा
वस्तुतः मै एक बार पुनः
रिश्तों कि इस अबूझ पहेली को
हल करने में विफल रहा
सबसे अक्षम बेटे के लिए भी
पिता के सामान्य से भी बहुत ज्यादा
प्यार के बिपुलता की दासता
कहता रहा

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

आकांक्षा यादव को भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2011'

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं चर्चित ब्लागर आकांक्षा यादव को ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2011‘‘ से सम्मानित किया है। आकांक्षा यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। उक्त सम्मान भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा 11-12 दिसंबर को दिल्ली में आयोजित 27 वें राष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मलेन में केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला द्वारा प्रदान किया गया.

गौरतलब है कि आकांक्षा यादव की रचनाएँ देश-विदेश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं. नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनो / पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं. पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं. व्यक्तिगत रूप से ‘शब्द-शिखर’ और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ , ‘सप्तरंगी प्रेम’ ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉग का संचालन करने वाली आकांक्षा यादव न सिर्फ एक साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, बल्कि सक्रिय ब्लागर के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है. 'क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा‘ पुस्तक का कृष्ण कुमार यादव के साथ संपादन करने वाली आकांक्षा यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु जी ने ‘बाल साहित्य समीक्षा‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गाजीपुर जनपद की निवासी आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहां रहकर भी हिंदी को समृद्ध कर रही हैं. श्री यादव भी हिंदी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं. एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

इससे पूर्व भी आकांक्षा यादव को विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’ , अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि. जीवी प्रकाशन, जालंधर द्वारा 'राष्ट्रीय भाषा रत्न' इत्यादि शामिल हैं.

आकांक्षा यादव को इस सम्मान-उपलब्धि पर हार्दिक बधाइयाँ !!

प्रस्तुति - शब्द साहित्य : रत्नेश कुमार मौर्य

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

भरतुआ

पड़ोस में देख
एक विवाह का आयोजन
भरतुआ को लग रहा था कि
आज अवश्य ही पूरा होगा
उसका प्रयोजन

पिछले कई दिनों से
बापू की तबीयत ठीक नहीं थी
किसी तरह माँ बिना दाल और
सब्जी के बस अचार के साथ ही
रोटी दे पा रही थी
कभी कभी तो वह भी
मयस्सर नहीं हो पा रहा थी
पर आज एक अच्छे भोजन की
उम्मीद जग गयी थी

सबेरे ही भरतुआ जुट गया
अपने कपड़ो को साफ करने में
बिन बुलाये मेहमान की तर्ज पर
बीच बीच में
मेजबान के यहाँ भी जाकर
कुछ कम कर जाता
अपनी अनचाही उपस्थिति
दर्ज करा आता

तमाम पकवानों कि खुशबुओं से
गमक रहा था पूरा वातावरण
शाम को रोशनी से जगमगा उठा था
पूरा आयोजन स्थल
कट नहीं रहा था बस तो
भरतुआ से इंतजार का
एक एक पल

मेजबान के आहवाहन पर
जैसे ही लोग बाग
सुस्वादु व्यंजनों की और बढे
भरतुआ ने भी कदम
अन्दर रखा धीरे से
गृहस्वामी गरजा चिल्लाया
अरे देखो साला फालतू
कहाँ से घुस आया
पीट कर भगाओ स्साले को
इसको है किसने बुलाया
चलने लगे उस अबोध पर
थप्पड़ो की बौछारें
अंत में एक ने उसके हाथ को ऐठ
पकड़ कान कर दिया किनारे

अनवरत थप्पड़ों की मार से
उसका गाल सूज आया
अंत में अधमरा हो वह
बिना कुछ खाए पिए
घर लौट गया

माँ ने पूछा
भरतुआ तू कियन गई रहा
हम कब से तुम्हार रोटी बनाय
इंतजार कई रहा
बाबू आज रोटी के साथ
आलू झोल भी बनावा है
तोहे बबुआ बहुते भावा है
का बात है तुम्हारी तबीयत
आज ठीक रउए
आव आज तोहे
अपने हाथ से खियाबे

भरतुआ बड़े प्रेम से
अपनी माँ के हाथो से खा रहा था
एक एक कौर से उसका
एक एक रोम तृप्त हो रहा था
आज भरतुआ को रोटी और झोल
बेहद स्वादिष्ट लग रही थी
बेशक उसमे माँ की ममता
जो मिली हुए थी
वह सोच रहा था कि
रोज ही तो वह माँ के हाथ का
बना भोजन खा रहा था
मगर आज उसी खाने का स्वाद
आज बेहतर क्यों
नजर रहा था
शायद इस खाने में सम्मान और
स्वाभिमान जो मिला था

भरपेट खाकर भरतुआ
माँ की लोरी सुनते हुए
कब सो गया पता ही नहीं चला
सुबह होने पर देखा तो
सूरज सर पर चढ़ आया

सामने विवाह स्थल पर
बचे भोजन बाहर फेके जा रहे थे
कुछ बची हुई सब्जी और पूड़ी लेकर
मेजबान के लड़के
उसे देने उसके घर आये थे
भरतुआ चिल्लाया
मत लेना माँ इस खाने को
हमीं है क्या इन
खैरात को खपाने को
क्या हमीं है इनके इकठ्ठे
गए पापों को बटाने को
बच गया तो साले आये है
पुण्य कमाने को