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शनिवार, 20 नवंबर 2010

हिंदी ब्लागिंग से लोगों का मोहभंग

आजकल हिंदी ब्लागिंग खतरे में हैं. पहले तो लोग बड़े जोर-शोर से ब्लॉगों से जुड़े, पर अब उत्साह ठंडा हो गया है. किसी की शिकायत है कि अब लिखने के लिए समय ही नहीं मिलता तो कोई मात्र पब्लिसिटी और चेहरा दिखाने के लिए तमाम ब्लॉगों से जुड़ता गया. कई लोग सामुदायिक ब्लॉग तो खोल बैठे हैं, पर अन्य ब्लॉगों पर झाँकने की फुर्सत ही नहीं. कई सामुदायिक ब्लॉगों पर तो महीने भर तक पोस्ट ही नहीं आती, आई भी तो 1-2, मात्र खानापूर्ति के लिए कि हम भी जिन्दा हैं. कुछ की शिकायत है कि कितना भी धारदार लिखो, कोई पढता ही नहीं या फिर टिपण्णी ही नहीं करता. लोग एक साथ कई ब्लॉगों से जुड़े हुए हैं, कईयों को फालो कर रहे हैं...पर संजीदगी से कोई भी ब्लॉग-धर्म का निर्वाह नहीं कर रहा है.

पोस्टें आती हैं, जाती हैं, पर कोई असर नहीं डालतीं. पढने के नाम पर इतना बड़ा मजाक कि टिप्पणियां उसकी गवाही देनी लगती हैं. इन टिप्पणियों पर कोई गौर करे तो अपने को दुनिया का सबसे बड़ा रचनाकार मानने की भूल कर बैठे. एक ही टिप्पणियां हर ब्लॉग पर विराजती हैं, फिर कहाँ से हिंदी ब्लोगिंग का विकास होगा. हिंदी ब्लागिंग के नाम पर लोग संगठन बनाकर और सम्मलेन कराकर अपनी मठैती चमका रहे हैं. यही कारण है कि कई पत्र-पत्रिकाओं ने बड़े मन से ब्लॉगों की चर्चा आरंभ की, पर फिर इसे बंद ही कर दिया. कई अच्छे ब्लॉग सरेआम पोस्ट लगाकर पूछ रहे हैं की क्या पोस्ट
न आने के कारण ब्लॉग बंद कर दिया जाय.


आज जरुरत हिंदी-ब्लागरों के आत्म विश्लेषण की है. हिंदी ब्लागिंग में अभी भी गंभीरता से देखें तो कुछ ही ब्लॉग हैं, जो नियमित अप-डेट होते हैं. ब्लॉग के नाम पर अराजकता ज्यादा फ़ैल रही है. यहाँ किसी पोस्ट का कंटेंट नहीं, बल्कि जान-पहचान ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, फिर गंभीर लोग इससे क्यों जुड़ना चाहेंगें. सुबह उठकर ही पचासों ब्लॉग पर बढ़िया है, लाजवाब है, बहुत खूब जैसी टिप्पणियां देकर लोगों को भरमाने वाले अपने ब्लॉग पर उसके एवज में टिप्पणियां जरुर बटोर रहे हैं, पर इससे ब्लागिंग का कोई भला नहीं होने वाला. ब्लोगों पर जाति, क्षेत्र, रिश्तेदारी, संगठन, सम्मलेन, राजनीति, विवाद सब कुछ फ़ैल रही है, बस नहीं है तो गंभीर लेखन और रचनात्मकता. कहीं यह ब्लागिंग से लोगों का मोह भंग होने का संकेत तो नहीं ??

अमित कुमार यादव
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