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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

गोधूलि आज की शान्त दीखती

गोधूलि  आज की शान्त दीखती
विषम वेदना बनी अतीत अहि
ले नूतन संकल्पो को हिय में
नूतन वर्ष आगमनित प्रतीत है

नभचर युवा और उनके शिशु
खुली हवा में लेंगे साँस
नूतन बल अब होगा संचारित
जिनके चलते थे स्वाँस प्रस्वास

ओंस बिंदु कल के प्रभात के
कोमल पत्तों पर ढुलकेगे
समनित सीप बिंदु मोती बन
हमको भ्रम में फिर डालेंगे

भये भोर जो कमल पुंज
थे मूंद लिया करते नयन
आतुर स्वागत कर नए वर्ष का
तभी करेंगे कल वो शयन

वर्ष पर्यन्त सफ़र कर सूरज
थक कर हो गया है अस्त
खग समूह उड़ चले नीड़ को
कल के स्वप्न में है वो मस्त

मलय पवन से सरोबार
पनघट फिर से होगे गुलजार
नूतन परिधानो में सजी
प्रकृति धरा का करे श्रृंगार

मृग शावक सरपट दौड़ चले
व्याघ्र साथ करता प्रस्थान
नए भास्कर की किरणो ने
दिया उन्हें है अभयदान

प्रकटी जीवरूप में आत्मा
कहलाता है यही वो जीवन
रूठ जीव से त्याग तनो को
प्रारूप आत्मा का है मारण

असत अहंकार और पाखंड का
जीवन से कर सदा त्याग
सुबरन सरिस इस पावन तन का
लक्ष्य नहीं है भोग विलास

इस तन में तप कि ऊर्जा भर
आओं ले एक नया संकल्प
सुर दुर्लभ इस तन का प्यारे
है और नहीं कोई विकल्प

सत्य धर्म कर्त्तव्य परायणता
ये दूर हो चुके हमसे आदर्श
पुनः प्रतिष्ठित करना होगा
यदी धरा को बनना स्वर्ग

बैठ गगन में ऋषिमंडल
करते है सामूहिक विमर्श
आसन्न सभी  विभीषिकाओं पर
दे रहे है अपने परामर्श

जब दस्तक देती पल में मौत
तब जीवन मूल्य समझ में आता
नूतन रवि की कोमल किरणे
सच कहो किसे है नहि भाता

संकट इस  युग का भीषण
निज आकांक्षाओं की त्वरित पूर्ति
आदर्श त्याग हम रामकृष्ण की
उनकी बैठाते नित नई मूर्ति

अति आकाँक्षाओं की मृगतृष्णा से
आओं विलग करे अपने को
अपने अतीत के आदर्शों से
पूर्ण करे निज सपने को

नव वर्ष मंगलमय हो

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

चचा

सहसा
ताड़ ताड़ की आवाज ने
भोर के सन्नाटे को चीर दिया था
मैं मॉर्निंग वाक हेतु
बी एच यू  गेट पर लगभग
पहुच चुका था

हाँ हाँ करते
जैसे ही करीब पहुँचा
तब तक हाथ के साथ
दस पाँच लात भी उस
रिक्शेवाले को पड़ चुके थे
उनमे से एक युवक
अपनी कमीज की बांह चढ़ाते हुए
मेरी ओर  देखते बोला
पापा की असपताल से छुट्टी होइ चुकी है
उनका घर ले जायेका है
जल्दी से दवा चालू करेका है
साले को कब से दूर से
ही आवाज दे रहे है
रोक रोक ही नहीं रहा है
अरे सवारी नाही ढोये का है तो
काहे रिक्शा निकाले है

रिक्शावाला
कुहनी में मुँह  छिपाये
अपना रिक्शा छोड़
जमीन पर बैठ चुका था
फटे शाल से बह रहे खून को
पोछने का असफल
प्रयास कर रहा था
मैंने उन नवयुवको को
धैर्य की नसीहत देते हुए
ऐसा करने से डाँटते हुए रोका
साथ ही निराला के उस पात्र को
उठाने में लग गया

लगभग सत्तर साल का
वह एक कृशकाय वृद्ध था
विवश बेशक विशेष
परिस्थितियों में ही वह
रिक्शा चला रहा होगा
वरना इस पूस की ठण्ड में
वह भी तमाम कुलीनों की तरह
रजाई में पड़ा
गरम चाय के साथ चुडा मटर  का
आनंद ले रहा होता

इतना तो समझ इन युवकों में
होनी ही चाहिए थी
हो सकता है सवारी ढोते ढोते
वह थक गया होगा
याकि उम्र के इस पड़ाव पर
निकला तो होगा कमाने
पर ठण्ड व कमजोरी से निराश
घर वापस जा रहा होगा

पर धैर्यहीन आज की पीढ़ी
जो न्यूनतम व्यय पर
अधिकतम  सुविधा की आदी
होती जा रही है
कम समय में ही सब कुछ
पा लेने की जिजीविषिका
पाले जा रही है
फलस्वरूप
मानवीय मूल्यों से दूर होकर
अनवरत खोखली होती जा रही है
उनके पास इतना समय कहाँ
इतना सोचने का
पारिवारिक और सामाजिक
विवेक का

मैंने पूछा
क्या बात है चचा
अवाक्  शून्य में देखते हुए पुनः
वह मेरी ओर देख रहा था
जैसे उसे कुछ सुनाई
नहीं दे रहा था
पुनः मैंने जरा जोर से  पूछा
पुनः उसे अवाक् पाया
कोई प्रतिक्रिया न देख
उसके करीब गया
एकबारगी मुझे अपने पास
आता देख वह डर गया
शायद उन युवको का करीबी जान
भय से सिहर गया

पर शीघ्र जैसे ही उसने
दया के साथ सहानुभूति की
कोमल स्पर्श पायी
मुहँ से रक्त के साथ
उसकी बूढी आँखे बह आयी

बोला भइया उमर होइ गवा है
पिछले छह महीना से
हमका तनी कम सुनावत है
पर परसोईयां से लागत आ
कि बहुते कम सुनाता
एहि पाछे हमका न सुनावा
नाही त भइया कमवही वदे न ई
ठण्ड मा निकलल हई

छोड़ी
चली आयी कहाँ चली

चचा हमका नाही
उन सबका जायेका है
कहते जैसे ही
पलट कर देखा
संवेदनहीन उन देश के पुरोधों को
बहरे रिक्शेवाले चचा को छोड़
अपने पिता के साथ
गायब पाया
निर्मेष

रविवार, 22 दिसंबर 2013

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने लेखिका और ब्लागर आकांक्षा यादव को किया सम्मानित

अपनी रचनाओं में नारी सशक्तीकरण  की  अलख जगाने वाली  युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं अग्रणी महिला  ब्लागर आकांक्षा यादव को दिल्ली में 12-13 दिसम्बर, 2013 को आयोजित 29वें राष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मेलन में सामाजिक समरसता सम्बन्धी लेखन, विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना और सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने ‘’भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013‘‘ से सम्मानित किया। आकांक्षा यादव को इससे पूर्व विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु दर्जनाधिक  सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं। 

गौरतलब है कि नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली आकांक्षा यादव साहित्य, लेखन, ब्लागिंग व सोशल मीडिया के क्षेत्र में एक लम्बे समय से सक्रिय हैं। देश-विदेश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और इंटरनेट पर वेब पत्रिकाओं व ब्लॉग पर आकांक्षा यादव की विभिन्न विधाओं में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित होती रहती है। आकांक्षा यादव की 2 कृतियाँ ”चाँद पर पानी” (बालगीत संग्रह) एवं ”क्रांतियज्ञ: 1857-1947 की गाथा” प्रकाशित हैं।

भारतीय दलित साहित्य अकादमी की स्थापनावर्ष 1984 में बाबू जगजीवन राम द्वारा दलित साहित्य के संवर्धन  और प्रोत्साहन हेतु  की गयी थी। 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

कृष्ण कुमार यादव यादव भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित


एक और सम्मान …… भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ एवं युवा साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव को दिल्ली में 12-13 दिसम्बर, 2013 को आयोजित 29वें राष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मेलन में सामाजिक समरसता सम्बन्धी लेखन, विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना और सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान हेतु ‘’भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013‘‘ से सम्मानित किया। इससे पूर्व श्री यादव को विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं। 

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन, ब्लागिंग व सोशल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय 36 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की अब तक कुल 6 पुस्तकें- ”अभिलाषा” (काव्य संग्रह), ”अभिव्यक्तियों के बहाने” व ”अनुभूतियाँ और विमर्श” (निबंध संग्रह), इण्डिया पोस्ट: 150 ग्लोरियस ईयर्ज (2006) एवं ”क्रांतियज्ञ: 1857-1947 की गाथा” (2007), ”जंगल में क्रिकेट” (बालगीत संग्रह) प्रकाशित हैं। इनकी रचनाधर्मिता को देश-विदेश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, इंटरनेट पर वेब पत्रिकाओं व ब्लॉग पर निरंतर देखा-पढा जा सकता हैं। 


मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

बारात


मैंने देखा उसे
एक बारात में ज्योति कलश
ढोते हुए
साथ ही बाये हाथ में
अपने नवजात बच्चे को भी
सम्भाले हुए

उसके पीछे शायद
उसकी दस वर्षीया बेटी
ज्योतिकलश सर पर लिए
कदम  से कदम मिला कर
बारात में चल रही थी
बड़े ही हसरत से
पूरे बारात को निहार रही थी
शायद अपने भी प्रियतम के
बारात के बारे में ही
सोच रही थी
बगल
की लाइन में
उसका पति भी एक हाथ से
ज्योति कलश को थामे
दूसरे से अपने छोटे बच्चे को सम्भाले
पैदल चल रहा था

बारात से  ध्यान हटा
मैं  अनवरत उनकी गतिविधियों का
अवलोकन करने लगा
उनके साथ ही साथ चलने का
प्रयास करने लगा

आपस में उनकी
बातचीत भी लगातार जारी थी
कल महाजन के आने की तैयारी  थी
आज की इस कमाई से
छुटका के बीमारी के समय
उधार लिए गए कर्ज के
मासिक ब्याज को चुकाने
की बारी  थी

मेरी भाव भंगिमा से
शायद उन्हें पता चल गया
कि मै उन्हें वाच कर रहा था
इसीलिए उनका बातचीत  अब
क्रमशः कम हो रहा था

बस इतना ही पता चला कि
इस बारात के बाद
उन्हें एक और बारात के लिए जाना है
उसके बाद ही खाने के लिए
अपने घर रवाना होना है

बारात लगते ही
उन बच्चों का ध्यान
सामने के सुस्वाद व्यंजनो
की ओर गयी
थीं
जिन्हे उनकी नज़ारे
एक चाहत के साथ
निहार रही थी

छुटके ने नजर बचा कर
अंदर जाने  का साहस किया
अबे मत जाओ
नाही त बहुत मार पड़ी
कहते
हुए   दूसरे ने उसे
डाट कर बाहर किया 
बाबू बतावत रहे कि
अब पाहिले वाला
जमाना नाही रहा
जब खाये पिये में
केउ
कुछ बोलत ना  रहा
अब लोगन के पल्ले
इतना पैसा त बढ़ि गवा है
पर पता नाही काहे
इन सबका दिल इतना
छोटा कइसे होइ गवा है

चल
कौनो बात नाही 
हमरो  घरै आज
कहत रहल माई
कि ऊ आलू के झोल के साथ 
ऊ पराठा बनाई

दूर से मै उनकी
बातचीत सुन रहा था
तभी मेजबान कुछ खास
व्यंजनो के साथ
सामने से गुजर रहा था
मैंने कहा भइया अगर
आप अन्यथा न ले
हम  भोजन के बदले में
चार प्लेट इसी को ले ले
उसने  हॅसते हुए हमें
मौन स्वीकृति दिया
मैं  उन्हें  लेकर
शीघ्रता से बाहर  आया

बड़े ही  हिम्मत के साथ
उन्होंने उसे किसी तरह लिया
खाते हुए उनका ज
हाँ
एक एक रोम तृप्त
होता दीख रहा था
मेरा मन भी एक
अज्ञात आनंद से
पूरित हो रहा था
समाज के एक वर्ग विशेष का
नेतृत्व करने के कारण
मै
भी  एक अपराधबोध से
अपने को
मुक्त पा  रहा था

निर्मेष




 

सोमवार, 25 नवंबर 2013

कउने दिशा में

कउने दिशा में 
लेके चला रे बटोहिआ 
गाते गाते आठवर्षिया 
बच्ची का गला 
रह रह कर फॅस रहा था
उसका दसवर्षीय भाई 
साथ में बैठा ढोलक 
बजा रहा था  

यह दृश्य रामनगर की  
कोट विदाई रामलीला के दौरान 
सजे बाज़ार के एक
कोने का था 

लोगो का हुज़ूम 
सतत आ जा रहा था 
उनकी संवेदनाओ का 
किसी पर कोई प्रभाव 
नहीं पड़ रहा था 

ठण्ड भी आहिस्ता से 
दस्तक दे चुकी थी 
कृशकाय 
एक फटे  बनियान और एक फ्रॉक में 
उन दोनों कि दुकान
सजी थी 

कोई दयालू 
आते जाते जैसे ही 
कुछ सिक्के उनके 
कटोरे में डालता 
उनके सुरों में एकाएक 
कुछ पलों  के लिए 
तेजी आ जाता 
पुनः किसी दूसरे दयावान 
की प्रतीक्षा में उनका स्वर 
क्रमशः मद्धम हो जाता 

उधर रामलीला को ओर 
भगवान राम सबको 
एक एक वस्त्र देकर 
अश्रु पूरित नेत्रों से 
कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए 
विदा कर रहे थे 
वो दोनों भी टकटकी लगाये 
उस दृश्य को अनवरत 
देख रहे थे 
साथ ही भोर कि ठण्ड से 
चिहुक भी रहे थे 
सम्भवतः वे सोच रहे थे 
कि काश  भगवान कि नजर 
उनकी तरफ भी 
पड़ जाय 
तो शायद वे भी 
तर जाये 

निर्मेष 

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

मन्नू क बालदिवस

मन्नू क  बालदिवस

मन्नू के दोनों हाथ 
चाक पर तेजी से चल रहे थे 
एक एक कुल्हड़ अपने 
आकार ले रहे थे 
मन्नू को आज अपना 
कम समाप्त करने की कुछ 
ज्यादा ही जल्दी थी 
स्कूल के बल दिवस में 
शिरकत करने  की उसकी 
तीव्र मंशा थी 

सुना था कुछ लोग 
तमाम उपहार लेकर आयेंगे 
उसे उसके जैसे गरीब बच्चो के बीच 
वितरित कर जायेगे 

मन्नू के बापू 
पिछले साल टी बी से 
पीड़ित ईलाज के अभाव में 
असमय ही चल बसे 
मन्नू के साथ पूरे परिवार को 
बेसहारा छोड़ गए 

माँ के प्रयास से मन्नू ने 
कुल्हड़ गढ़ना सीख लिया 
किसी तरह रोजी रोटी का 
एक जरिया निकाल लिया 
साथ ही पढ़ लिख कर 
कुछ करने की तीव्र चाह ने 
मन्नू पर बारह की उम्र में ही 
दोहरी जिम्मेदारियो को 
असमय ही लाद  दिया था 
उसे समय से पूर्व ही 
समझदार बना दिया था 

जल्दी से कम समाप्त कर 
मन्नू तैयार होकर 
स्कूल की ओर  भागा 
पर उपहारों की लाइन से 
तुरत निकाला गया वह अभागा 
कि स्कूल ड्रेस में नहीं 
आया था 
जिसके लिए पिछले कई दिनों से 
माँ से वह लगातार मिन्नतें 
कर रहा था 
पर माँ ने कभी पानी के टैक्स 
कभी मकान टैक्स 
तो कभी बिजली के बिल का 
देकर हवाला 
हर बार उसके  ड्रेस की 
मांग को टाला 

लाइन से दूर खड़ा 
मन्नू स्कूटी और कार से 
आये  स्कूल ड्रेस में सजे 
बच्चों को  तमाम 
सुन्दर सुन्दर उपहार लेकर 
जाते हुए 
हसरत भरी निगाहों से 
अनवरत देख रहा था 
उन उपहारों की सार्थकता के साथ 
बालदिवस के निहितार्थ को 
तलाश रहा था 
साथ ही अपनी किस्मत  और 
भाविष्य के बारे में आशंकित 
कुछ सोच रहा था 

निर्मेष 


बुधवार, 6 नवंबर 2013

गमछा

पिछले 
एकमाह से 
रामेदव जी तोड़ 
मेहनत  कर रहा था 
दीपावली के रंग रोगन के 
बाजार का भरपूर 
फायदा  उठाने में 
लगा था 

दिन में मजदूरी 
रात में डिस्टेंपर पेन्ट का काम 
कर रहा था एक के बाद 
एक का काम तमाम 
कमाए गए पैसो को 
गमछे में बाध  कर 
कमर के फेटे में रखता जाता
साथ ही गाँव में अपने सपने को 
सजोता जाता 

इस बार तो वह 
पत्नी के गहने छोड़वा कर ही रहेगा 
जिसे बापू कि तेरहवी के लिये 
मजबूरन गिरवी रखा था 
बच्चो के किस्म किस्म के 
पटाखों कि मांग को 
याद  करता जाता  
पत्नी व बच्चो के लिए 
कपड़ो एके बारे में भी सोचता जाता 
तल्लीनता से अपने काम को 
अंजाम दे रहा था 
हालाकि घर से कई बार 
बुलावा आता  रहा 
सेहत को ध्यान में रख 
काम करने का सुझाव 
माँ और पत्नी से 
लगातार पाता रहा 
वह अपने काम में मगन 
खुद को समझाता 
दीपावली के एक दिन पूर्व  तक 
काम करने का मन बनाता रहा 

दीपावली के एक दिन पहले 
आरिफ मियां के घर 
बालू गिर रहा था 
वह घर जाने  के लिए तैयार 
लगभग मुझसे मिलने आया था 
सहसा कह बैठा कि 
भैया एका भी ठीका दिला  दो 
तो हमरा घर जाये का भाड़ा 
भी निकल जाइये 
भले ही शाम कि गाड़ी से 
हम घर चला जइबे 

हमने उसे 
झिड़कते हुए समझाया 
पर उसके कोमल तर्कों पर विवश 
आरिफ से कह उसे उस बालू को 
ढोने का ठीका दिलवाया 

सर पर गमछा बांध 
उसने शाम तक उस काम को 
फुर्ती से निपटाया 
अपनी मजदूरीको पुनः 
गमछे के साथ फेटे में बांध 
स्टेशन को ओर ख़ुशी से 
चल दिया 

गाड़ी के चार घंटे 
लेट का एलान हुआ 
उसने पास कि बेंच पर 
आराम करने का सहसा 
मन बना लिया 
चाय और बिस्कुट का डिनर ले 
थका रामेदव 
स्टेशन की बेंच पर लेट गया 
थोड़ी ही देर में 
बेसुध सपने देखते 
नीद के आगोश में हो गया 

तभी चारो और 
चोर चोर पकड़ो पकड़ो  की 
तेज आवाज सुन 
वह अधकचरी नीद से जागा 
अपनी जगह से उठकर 
भयवश वह तेजी से भागा 
वर्दीधारियों में से एक ने 
उसे ही दौड़ कर पकड़ा 
वह कुछ कहता 
उसके पूर्व हे एक 
जोर का तमाचा जड़ा 
साले  चोरी कर 
कहा है भागता 

वह लाख समझाता रहा 
पर उनके तर्कों को 
दरकिनार कर 
तलाशी के नाम पर 
उसके फेटे का सब 
रकम जाता रहा 
ऊपर से चाँद थप्पड़ो के साथ 
गाली घेलुए में पाता रहा 

अंत में सुबह की 
समाचार का वह न्यूज बना 
चोर सिपाही का वास्तविक 
खेल खेलते हुए रामदेव  
अपने गमच्छे से ही 
स्टेशन कि रेलिंग पर 
सदा के लिए लटक कर 
खामोश होगया 

साथ ही वर्त्तमान 
व्यवस्था पर 
एक ओर जहाँ वह एक 
प्रश्नचिह्न छोड़ गया 
वही अपनी पत्नी और बच्चो को 
व्यवस्था से प्रतिशोध लेते हुए 
अनाथ कर गया 

निर्मेष 

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

लक्ष्मी और गणेश का पूजन

दिहाड़ी सुजीत 
ने लगभग  सुबकते हुए 
ऑफिस में प्रवेश किया 
उसके हालत दे ख 
मन मेरा एक अज्ञात आशंका 
से कॉप  गया 

सर मेरी साइकिल 
कार्यालय  गेट के सामने  से 
अचानक से खो गयी 
मैं घबराया  अरे 
अभी परसो तो ही 
खरीदी थी तुमने नयी 

क्या  ताला नहीं लगाया था 
सर एक लगाया था 
अरे भाई समय ख़राब है 
सीकड़ मार कर रखना चाहिए था 
मेरा दुर्भाग्य है सर 
अब क्या कहियेगा 
किसी तरह एक मित्र से 
उधार लेकर ख़रीदा था 
पहली तन्ख्वाह पर पैसा वापस 
करने का वादा किया था 
अब कैसे क्या होगा 
कहते हुए वह 
कार्यालय के स्टूल पर बैठ गया 
हर एक कि ओर याचना की 
नजरो से देख रहा 

कोई एफ आई आर 
कराने को कह रहा था 
कोई बड़े साहब से मिलने की 
बात कह रहा था 
सभी लोग कुछ न कुछ 
अपनी ओर से राय दे रहे थे 
पर उसके घाव को 
भर नहीं पा  रहे थे 

फा इ लो  में तल्लीन होने का 
अभिनय करते हुए 
मै भी उससे नजर मिलाने का 
साहस नहीं कर पा रहा था 
वह बड़े ही मासूमियत और 
आशा के साथ मुझे 
अनवरत निहार रहा था 
शायद वह मुझमे 
किसी सम्भावना और 
एक हल को तलाश रहा था 

अभी पंद्रह दिन 
पहले ही तो 
उसने किसी तरह जुगाड़ से 
दिहाड़ी पर मेरे कार्यालयमे 
अनुसेवक के पद पर 
ज्वाइन किया था 
कुछ ही दिनों में अपनी 
समर्पण और सेवा से 
हम सभी का दिल जीत लिया था 

नित्य कि सत्तर किमी की 
उसके घर से कार्यालय की दूरी 
ऊपर से उधारी साइकिल कि मजबूरी 
से व्यथित होकर 
किसी तरह उक्त साइकिल का 
जुगाड़ किया था 
बड़े ही परिश्रम से 
अपने जीवन की गाड़ी को 
पटरी पर लाने  का प्रयास कर रहा था 
एक पैसे की  अभी तक आय नहीं 
ऊपर से उधारी नयी 
साइकिल भी चली गयी 
इतनी दूरी कि यात्रा अब 
वह कैसे करेगा 
खाली हाथ पत्नी और परिवार का 
सामना कैसे करेगा 

यही सब सोचते  अचानक 
मेरी चेतना ने मुझे 
एकदम से झकझोर कर जगाया 
मैंने एक सफल उम्मीद से 
तुरंत घर का फोन घनघनाया 
पत्नी सीमा से 
रिक्की कि साइकिल के
बारे में बात की 
जो उसके दिल्ली प्रवास से 
पिछले दो माह से अच्छी 
हालत में खाली थी पड़ी 
सकारात्मक स्वीकृत पाकर 
मैंने अपने सहयोगी बिरेन्द्र के साथ 
सुजीत को घर पठाया 
उसे अपनी उस साइकिल को 
एकदम से दिलवाया 

वर्त्तमान परिवेश में 
कल्पना से परे एक 
त्वरित समाधान देख 
उसने कृतज्ञता से मेरी ओर 
भरी आँखों से देखा 
कुछ न कह पाने कि स्थिति में भी 
उसकी आँखों में मैंने एक 
उपकृत सैलाब देखा 
साइकिल खोने कि उसकी व्यथा 
उसके वृहत्तर प्रभाव व 
प्रस्तुत तात्कालिक समाधान के मध्य 
विचरित मै कवी ह्रदय 
शून्य में खो गया 
मुझे लगा कि मैंने 
लक्ष्मी और गणेश का 
दीपावली के शुभावसर पर 
विधिवत पूजन 
कर लिया 

निर्मेष 

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

युवाओं में अभिरुचियों का विकास जरुरी - कृष्ण कुमार यादव

शिक्षा साहित्य, कला और संस्कृति किसी भी राष्ट्र को अग्रगामी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। ऐसे में जरुरत है कि युवा पीढ़ी इनसे अपने को जोड़े और राष्ट्र की प्रगति में अपना योगदान स्थापित करे। उक्त उद्गार इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने नवोदय विद्यालय समिति, लखनऊ सम्भाग द्वारा 21 अक्टूबर 2013 को लखनऊ में गोमती नगर स्थित संगीत नाटक अकादमी के प्रेक्षागार में आयोजित ”प्रज्ञानम-2013” में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि किताबी शिक्षा को व्यवहारिक ज्ञान से जोड़ना बहुत जरूरी है और इसके लिए जरूरी है अभिरुचियाँ विकसित की जाये।

नवोदय विद्यालय समिति द्वारा आयोजित ”प्रज्ञानम-2013” कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं ने सृजनात्मक और रचनात्मक प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। प्रज्ञानम में छात्र-छात्राओं की एक से बढ़कर एक प्रतिभा उभरकर सामने आयी। जहां एक ओर छात्राओं ने मंच पर आकर्षण नृत्य प्रस्तुत कर ’प्रज्ञानम-2013’ को यादगार बनाया, वहीं अपने हाथों से बनायी मूर्तियों, फ्लावर पाट एवं अन्य सजावटी समानों से शिल्पकारी का भी बखूबी परिचय दिया। इसके अलावा छात्र-छात्राओं ने कविता पाठ, वाद-विवाद, गायन, वादन, निबंध लेखन, आन द स्पाट पेंटिंग जैसी अन्य कलात्मक प्रतियोगिताओं में भी जमकर हाथ आजमाया। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के 19 जवाहर नवोदय विद्यालयों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में विजयी छात्रों को अगले महीने दिल्ली में होने वाली राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिलेगा। 

    इस अवसर पर नवोदय विद्यालय समिति, लखनऊ संभाग द्वारा आयोजित चित्र प्रदर्शनी का फीता काटकर इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं, कृष्ण कुमार यादव ने उद्घाटन किया। इस दौरान छात्र-छात्राओं ने रंगारंग कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। इससे पूर्व श्री यादव ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर और दीप प्रज्वलित कर ’प्रज्ञानम-2013’ कार्यक्रम का औपचारिक रूप से उद्घाटन किया। गौरतलब है कि कृष्ण कुमार यादव जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आज़मगढ़ के पूर्व छात्र रहे हैं, ऐसे में उनकी उपस्थिति प्रेरणास्पद रही। 

   नवोदय विद्यालय समिति, लखनऊ सम्भाग की ओर से इस अवसर पर इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं, कृष्ण कुमार यादव को सम्मानित किया गया। सम्मान प्रदान करते हुए नवोदय विद्यालय समिति, लखनऊ सम्भाग के उपायुक्त श्री अशोक कुमार शुक्ला ने कहा कि बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न कृष्ण कुमार यादव जवाहर नवोदय विद्यालय से सिविल सेवाओं में सफल होने वाले प्रथम व्यक्ति हैं, वहीं प्रशासन के साथ-साथ अपनी साहित्यिक व लेखन अभिरुचियों के चलते भी उन्होंने कई उपलब्धियाँ अपने खाते में दर्ज की हैं । उन्होंने श्री यादव को तमाम विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बताया और इस बात पर हर्ष जताया कि मुख्य अतिथि के रूप में नवोदय के ही एक पूर्व विद्यार्थी को पाकर हम सब अभिभूत हैं । इस अवसर पर श्री यादव ने जहाँ नवोदय में बिताए गए दिनों को लोगों के साथ साझा किया, वहीं जीवन में प्रगति के लिए विद्यार्थियों को तमाम टिप्स भी दिए।

इस अवसर पर नवोदय विद्यालय समिति, लखनऊ सम्भाग के उपायुक्त श्री अशोक कुमार शुक्ला ने कहा कि प्रज्ञानम के माध्यम से बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ सशक्त सांस्कृतिक, तत्वपूर्ण एवं मूल्यपरक शिक्षा पर्यावरण और शारीरिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा प्रदान करना ध्येय है। कार्यक्रम का संचालन जवाहर नवोदय विद्यालय, फिरोजाबाद की प्रधानाचार्या श्रीमती सुमनलता द्विवेदी ने किया। इस अवसर पर तमाम विद्यालयों के प्रधानाचार्य, अध्यापकगण, शिक्षाविद, इत्यादि मौजूद थे। 

(पंकज मौर्य, सी-4 पोस्टल स्टाफ कालोनी, एल्गिन रोड इलाहाबाद-211001)

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

ननकू

ननकू काफी देर से 
सब्जी की दुकान पर 
एक कोने में खड़ा 
मुझे लगा कि 
कुछ खास खरीदने की हिम्मत 
जूटा  रहा था 
मै  भी नित्य की भांति 
राजू की दुकान पर 
सब्जी के लिए खड़ा था 

भीड़ कुछ कम होने पर 
ननकू ने धीरे से पूछा 
भैया ई गोभी कितने का 
दुकानदार ने उसकी ओर 
हिकारत से देखा 
फिर बोल चालीस का 
और ई नया आलू 
तीस का 
ठिठक कर ननकू ने पूछा  टमाटर 
साठ का 
पुनः हिम्मत जूटा  कर 
प्याज का भाव पूछा 
भय्वास अपेक्षित उत्तर की
प्रतीक्षा किया बिना 
लौकी पर लौट आया 
दुकानदार ने जब उसे भी 
तीस का बताया 
ननकू का तो जैसे 
गला ही रूद्ध आया 

राजू बोल का यार 
बहुत दिनन बाद सब्जी 
खरीदे निकलल  हौआ  का 
नाही  भैया 
आज बिटियवा का जन्मदिन रहा 
ऊ  बिनहिये  से गोभी अउर 
नया आलू के सब्जी के साथ 
पूड़ी खाये का जिद्द कियस बा 
इधर कई दिनन से 
कम धंधा  भी ठीक से 
नहीं चालत बा 
यही पीछे पूरान  आलू के झोल से 
कम चलत रहा 

पिछले महिनवे  त 
सट्टी से इकट्ठे  कीन के लावा  रहा 
आज बड़े अरमान से 
एक पचास का नोट ले 
बाज़ार आवा रहा 
मन मा कुछ नया अउर 
बढ़िया खाये   का भावा  
परअफ़सोस उसकी कीमत 
तो पाँच रूपया पावा 

अपनी बिटिया के हम 
हम कितना सब्जबाग दिखावा है 
पर अपनी हाड़तोड़ म्हणत की कमाई 
ऊपर से ई महगाई से 
अपनी कमर तो टूटी पावा है 
अपनी बिटिया कै 
एक इतनी छोटी सी इच्छा 
भी पूरी नहीं कर पावा है 
अपने जीवन का हम
व्यर्थ  पावा है 
निर्मेष 

निर्मेष 

बुधवार, 25 सितंबर 2013

इम्तिहान

निडर  
निसंकोच वह 
मां के सामने ढल बन कर 
खड़ा हो गया 
दहशतगर्दो को चुनौती 
देने की मुद्रा में आ गया 
नैरोबी के उस मॉल में 
नन्हा प्रम्सु उन 
दहश्गर्दो की संवेदनाओ का 
इम्तिहान लेने का दुस्साहस 
करने लगा 

पर उसे शायद पता नहीं की 
वह धूर में जेउर 
पूराने का प्रयास कर रहा 
वे वीर नहीं 
जो उसके इस कदम पर 
ठहर जायेगे 
उसके इस असीम साहस का 
इस्तकबाल करेंगे 

यह तो उन कायरो की जमात है 
जो अपने झूठी शानो की 
नुमेंदगी  हेतु 
निहत्थो पर हथियार 
चलने वाली कौम की भरमार है 
अपने से मजबूत के सामने तो ये 
पानी भरते नजर आते है 
अपने से  कमजोरों पर
 जुल्म ढहाने  में 
जरा भिनाही हिचकिचाते है 
महिलाओं और बच्चो पर भी 
तरस इन्हें नहीं आता  है 
पता नहीं इनके खुदा  ने इन्हें 
किस मिट्टी से बनाया है 

अरे बहादुर इतने तो 
अमेरिका पर कूच करो 
अपने मंसूबे का 
अंजाम मुकम्मिल हासिल करो 

पर ऐसा क्यों करेंगे 
इन्हें तो आशय शिकारों की 
तलाश रहती है 
अपने हथियारों पर सिर्फ 
धर लगाने की जरूरत रहती है 

अपनी कौम को मुर्ख 
और अपने में झूठा दंभ 
भरना चाहते है 
बदले माँ असहाय  अबलाओं  और 
मासूमो की बलि चाहते है 

पता नहीं इनके  सीने  में 
कैसा  दिल  था 
जिसने शायद पसीजना 
नहीं सीखा था 
उस मासूम के सीने को 
तत्काल गोलियों से छलनी 
कर दिया था 
इशान और इन्शानियत को 
शर्म से ज्यादा भी शर्मशार 
कर दिया था 

माँ  मुक्ता  ने उसे भीच कर 
सीने से लगा लिया 
उसके कलेजे के टुकडे  ने 
उसके सामने ही दम 
तोड़ दिया था 

माँ की  ममता चीत्कार 
कर उठी 
जाना था जिसके कंधो पर 
आज उसीकी लाश 
बेबस वह  ढो  रही 
वह सोच रही थी की 
उसके बच्चे ने शायद 
अपने दूध का कर्ज 
तो अदा कर दिया 
पर भगवन ने उसे 
अपने माँ का फर्ज 
पूरा करने का मौका ही 
नहीं दिया
काश वह समय से 
एक त्वरित  निर्णय ले पाती 
गोली लगाने से पहले 
अपने बच्चो को 
अपने अंक में समां लेती 
अपने को कुर्बान कर 
अपने बच्चे को 
 काश  बचा लेती 

निर्मेश