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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

गोधूलि आज की शान्त दीखती

गोधूलि  आज की शान्त दीखती
विषम वेदना बनी अतीत अहि
ले नूतन संकल्पो को हिय में
नूतन वर्ष आगमनित प्रतीत है

नभचर युवा और उनके शिशु
खुली हवा में लेंगे साँस
नूतन बल अब होगा संचारित
जिनके चलते थे स्वाँस प्रस्वास

ओंस बिंदु कल के प्रभात के
कोमल पत्तों पर ढुलकेगे
समनित सीप बिंदु मोती बन
हमको भ्रम में फिर डालेंगे

भये भोर जो कमल पुंज
थे मूंद लिया करते नयन
आतुर स्वागत कर नए वर्ष का
तभी करेंगे कल वो शयन

वर्ष पर्यन्त सफ़र कर सूरज
थक कर हो गया है अस्त
खग समूह उड़ चले नीड़ को
कल के स्वप्न में है वो मस्त

मलय पवन से सरोबार
पनघट फिर से होगे गुलजार
नूतन परिधानो में सजी
प्रकृति धरा का करे श्रृंगार

मृग शावक सरपट दौड़ चले
व्याघ्र साथ करता प्रस्थान
नए भास्कर की किरणो ने
दिया उन्हें है अभयदान

प्रकटी जीवरूप में आत्मा
कहलाता है यही वो जीवन
रूठ जीव से त्याग तनो को
प्रारूप आत्मा का है मारण

असत अहंकार और पाखंड का
जीवन से कर सदा त्याग
सुबरन सरिस इस पावन तन का
लक्ष्य नहीं है भोग विलास

इस तन में तप कि ऊर्जा भर
आओं ले एक नया संकल्प
सुर दुर्लभ इस तन का प्यारे
है और नहीं कोई विकल्प

सत्य धर्म कर्त्तव्य परायणता
ये दूर हो चुके हमसे आदर्श
पुनः प्रतिष्ठित करना होगा
यदी धरा को बनना स्वर्ग

बैठ गगन में ऋषिमंडल
करते है सामूहिक विमर्श
आसन्न सभी  विभीषिकाओं पर
दे रहे है अपने परामर्श

जब दस्तक देती पल में मौत
तब जीवन मूल्य समझ में आता
नूतन रवि की कोमल किरणे
सच कहो किसे है नहि भाता

संकट इस  युग का भीषण
निज आकांक्षाओं की त्वरित पूर्ति
आदर्श त्याग हम रामकृष्ण की
उनकी बैठाते नित नई मूर्ति

अति आकाँक्षाओं की मृगतृष्णा से
आओं विलग करे अपने को
अपने अतीत के आदर्शों से
पूर्ण करे निज सपने को

नव वर्ष मंगलमय हो
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