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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

रिश्तों की नीव

आधुनिक
भारतीय समाज में सुदूर
विदेशों कि तमाम सोसल नेट्वोर्किंग
सैएटों को बड़े ही जोशो खारोशों से
अपनाने का उपक्रम
बड़े ही तेजी से चल रहा है
पर अपने ही नीचे की
जमीन खिसक रही है
इसका पता हमें क्या लग रहा है

विर्चुवल वर्ल्ड के स्वागत को
तत्पर दिखते है
रियल वर्ल्ड से कोसों दूर हो रहे है
अपनो की ही नेट्वोर्किंग से
अंजान और क्रमशः दूर हो गए है
एकाकी जीवन में इस कदर खो गए है
टूटते घर और छीजते परिवार
इस व्यथा को चीख कर कह रहे है

फेसबुक पर तो सिस्टर वीक को
उद्यमता से सेलेब्रेट कर रहे है
पर अपनी सगी बहनों की
खबर से अंजान हो रहे है

अपने जीवन के न जाने
कितने मूल्यवान बसंत को जिसने
अजीज भाई के लिए बड़े ही
तत्परता से बलिदान कर डाला
भाई को युवा करने के लिए
अपने यौवन का गला घोट डाला
उस भाई ने इस मर्यादा को ही
बड़े ही सिद्दत से धो डाला

रहे होंगे उन बहनों के
भी कितने अरमान
कभी कम नहीं थे सोसाइटी में
उनके भी मान सम्मान
जब एक अज्ञात अनिष्ट कि
आशंका ने उन्हें स्वयं घर में
कैद के लिए विवश कर दिया था
क्या उस दशा में उस भाई का
कोई फर्ज नहीं था

उस भाई ने अपने को
अपने सपनों कि दुनिया में ही सिमटा लिया
जिनकी बिना पर वह सपने देख रहा था
उन्ही को ठुकरा दिया

न जाने कितनी फ़िल्मी और
गैरफिल्मी गीत भाई बहन के
रिश्ते पर लिखी गयी होगी
जिन्हें पढ़ लिख कर कितनी बार
हमारी आंखे नम हो गयी होगी
पर नम क्यों नहीं होती इन
रियल भाइयों कि आंखे
क्या रह जाएँगी ये सिर्फ
किताब कि बातें
जिन्हें जब चाह पढ़ा और
आंसूं गिरा आँखों को धो लिया
दिल के बोझ को इक्छानुसार
जब चाह कम कर लिया
फिर उन भावनाओं को
पन्नो में दफ़न कर दिया

दूर करना होगा हमें
इन विसंगतियों को
गहराई से समझना होगा
इन रक्त के रिश्तो को
जीवन में एक दिन ऐसा
हर किसी के जीवन में आता है
जीवन के सबसे करीबी और कीमती
रिश्तों के रूप में
माँ बापू का साया
सर से उठ जाता है
ऐसे में मात्र एक बहन ही
रक्त के रिश्ते के रूप में शेष रहती है
बाकी रिश्ते तो बस
रिश्तों के अवशेष सी दिखती है
बहन अगर बड़ी है तो
माँ का प्यार देती है
छोटी बहन का क्या कहना
वह तो बेटियों सी होती है
आंगन का सृंगार होती है
जो कितनी भी आपदा से घिरी हो
पर पापा पर अपने जान को
बेहिचक न्योछावर करती है

आइये सुदृढ़ करे इन
रिश्तों के जीव को
सजीव करे पुनः निर्जीव हो चुके
रिश्तों की नीव को
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