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बुधवार, 25 मई 2011

भयाक्रांत स्वंतंत्रता

भीषण जेठ कि तपन
समाप्त हो रही थी
मानसून दस्तक ने चुकी थी
घर से स्कूल के लिए
यह सोच कर निकला कि
आज तो रेनी डे हो ही जायेगा
स्कूल से निकल कर
दूर सीवान के तालाब पर
दोस्तों संग होगी बैठक
खायेगे भूजा आपस में बाटकर
साथ ही कागजी नावों की
होगी दमदार टक्कर
पर जैसे ही तालाब पर पंहुचा
किनारे पर एक तोते के बच्चे की
कराह से मन बिलखा
दो कौवों के आक्रमण से आक्रांत
मेरी ओर कातर देखता भयाक्रांत
मानसून कि प्रस्तावित मस्ती भूलकर
उसे घर ले आया बस्ते में डालकर
काफी दिनों से घर में
एक पिजड़ा खाली पड़ा था
उसके घावों को धो डीटोल से
उसे मैंने उस पिजड़े में डाला था
सुबह शाम पढाई के साथ
उसकी देखभाल और दानापानी
बन गयी मेरी दिनचर्या
उस अनाम रिश्ते पर मेरा
पॉकेट मनी होने लगा खरचा

दिन पर दिन नूतन आयामों के बीच
उसके हमारे संबंधों में
प्रगाढ़ता बढती गयी
एक बेनाम रिश्ते को जन्म देती गयी
समय अपनी अबाध गति से चलता रहा
वह बच्चे से व्यस्क तोता
बनता गया
स्वतंत्र विचारों की प्रगतिशील
मानसिकता मेरी
मुझे रोज धिक्कारती
कि इसके अन्दर अपनी जिन्दगी
अपने ढंग से जीने का जज्बा आ गया है
इसे कैद से मुक्त करने का
समय आ गया है
इस बेनाम रिश्ते को यही
समाप्त कर देना चाहिए
इसके प्रति अपनी अंतिम
जिम्मेदारियों को पूरी कर देनी चाहिए

पर मन में था कही यह भी मलाल
कि पहले यह ले अपने को
सम्पूर्णता से संभाल
अपना अस्तित्व बचाने में
हो जाये यह सक्षम
वास्तविकता पर भावना का
दूर हो यह भ्रम
कलेजे पर रख पत्थर
इस सम्बन्ध को यही समाप्त कर दूगा
उसी दिन इस अनाम रिश्ते से
सदा के लिए मुक्त हो जाऊंगा

वह दिन भी आ गया
बेटू को पिजड़े में होने लगी दिक्कत
देख उसकी मशक्कत
छत पर ले जाकर पिजड़ा
छिपाकर उससे अपना अवसादित मुखड़ा
भीगे आंसुओं से मुक्त कर
कर दिया उसे विदा
उपरांत भारी मन से
स्कूल चला गया

पूरा दिन बेचैनी और
अवसाद का बना साक्षी
बेशक था वह एक पक्षी
पर उस अनाम से रिश्ते ने
आज पूरा दिन ही मुझे रुलाया था
पढाई आज मुझे
तनिक भी नहीं भाया था

शाम तनिक देर से घर लौटा
छत पर बेटू की आवाज सुनकर चौका
भागता हुआ छत पर पहुंचा
देखा बेटू मजे से पिजड़े में
आराम फरमा रहा था
मै आश्चर्य से कभी उसे कभी
उस पिजड़े को देख रहा था
लगा शायद कही मेरे आने का
इन्तजार तो नहीं कर रहा था
पास पीपल के पेड़ पर
बैठे दो गीध
उस पर नजर गडाए थे
मुझे पुराने दिन याद आये थे

आज भी मानो बेटू मुझसे कह रहा था
बचा लो मुझे इन भेड़ियों से
हमारे अनाम रिश्ते की दुहाई दे रहा था
मुझे अब जाना नहीं है यहाँ से
उस आजादी से
यह कैद है बेहतर
जहा आप जैसो का
सानिध्य है सुन्दर
इस कैद का जीवन उस
स्वतंत्रता से है अच्छा
जहाँ मिलती है प्यार दुलार और
नसीहत के साथ भरपूर सुरक्षा

मुझे अभी और
बहुत कुछ है जानना
आदर्श जीवन दर्शन को है पहचानना
कैद में भी रहकर उसकी आँखों में
सुख और संतोष का
आंसू भर आया

उस अज्ञात और असीमित
ख़ुशी को मन में दबाया
पिजड़े को नीचे आंगन में लाया
उसे दाना पानी देकर
उसके पास बैठ कर सोचते हुए
वर्तमान सामाजिक परिवेश में
मै प्रवेश कर गया
एक नए बहस को जन्म दे गया
कि कैसे बेहतर है
भयमुक्त गुलामी एक
भयाक्रांत स्वंतंत्रता से
आज भी हमारे बूढ़े जो कहते है
क्या सच में
अतीत की परतंत्रता बेहतर थी
वर्तमान स्वतंत्रता से
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