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मंगलवार, 29 मार्च 2011

गंतव्य

कार्यालयी कार्य से मैं
था लोखंवाला मुंबई के प्रवास पर
कार्य समाप्ति के उपरांत
स्थानीय एक मित्र ने बुलाया था
मुझे रात्रि सात बजे डिनर के लिए
अपने आवास पर

औपचारिक अभिवादन के साथ
चाय पीते हुए हो रही थी
बातें अतीत की सारी
पर कहीं भी दिख नहीं रही थी
डिनर की तैयारी

मैंने मेजबान मित्र से कहा
बॉस क्या खिला रहे हो आज डिनर में
मुझे निकलना है
आज की ही रात में

बोला चलते है काकोरी हाउस
जम के खायेंगे काकोरी कबाब
बड़ा उम्दा है उसका स्वाद
मैंने कहा काकोरी कबाब
यह क्या बला है
बोला क्या यार काकोरी हाउस का
काकोरी कबाब नहीं जानते हो
तुम यार हिंदुस्तान को
क्या पहचानते हो
अक्खा मुंबई कहलो या अक्खा हिंदुस्तान
या विदेशों तक में मशहूर है
इसका स्वाद ही तो हमारा गुरुर है

मैंने कहा यार मैं तो
काकोरी कांड के बारे में ही जानता हूँ
लखनऊ के पास एक गाँव है मानता हूँ
इससे अपने स्वतंत्रता का इतिहास पहचानता हूँ
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी आर्यसमाजी
रामप्रसाद बिस्मिल अस्फाकुल्लाह आजाद
आदि के बलिदानों को बस
इससे जुड़ा जानता हूँ

समीप में खड़ा उनका बेटा
आश्चर्य से मुझे देख रहा था
मानो मैं किसी
स्वप्न की बातें कर रहा था
मित्र ने कहा की हाँ हाँ कही पढ़ा है
किसी काकोरी कांड के बारे में
ठीक से मालूम नहीं मेरा नोलेज भी कम है
इतिहास के गलियारे में
छोडो आओ चले
काकोरी कबाब का लज्जत चखे
वहां की रंगीनियत को
जी भर कर देखें

मैं शून्य में ताकता रहा
अतीत में बिस्मिल के साथ
साक्षात्कार करता रहा
बिस्मिल कह रहे थे
क्या यही है हमारी भावी पीढ़ी
जो निसंकोच आगे बढ रही
लगा कर हमारे बलिदानों की सीढ़ी
क्या इन्ही दिनों के लिए हमने
राष्ट्रप्रेम के माले में त्याग और
बलिदानों की मोती पिरोई थी
हर बार इसी धरा पर आने के लिए
फांसी के समय ईश्वर से
अनुशंषा की थी
अपने परिवार की चिंता न कर
पुरे देश को अपना परिवार
समझाने की जुर्रत की थी

सब्र मेरा भी टूट चला था
आंसुओं ने भी आखों का साथ
देना छोड़ दिया था
बिह्वल नतमस्तक हो मैं कह रहा था
मान्यवर आप घबराये नहीं
केवल इन्हें ही अपना पीढ़ी माने नहीं
हाँ बेशक है ये अफ़सोस की बात
पर मानिये है ये अपवाद
आज भी हमारे जैसे बहुत लोग है
जो आप जैसे के
बलिदानों की कदर कर रहें है
आज जिस आबोहवा में हम
खुल कर सास ले रहे है
निसंदेह इसे आप ही की
देन मान रहे है

तैयार होकर मित्र ने
एकाएक हमें हिलाया
उस स्वप्न से मुझे जगाया
मैंने कहा मित्र मैं तो शाकाहारी हूँ
काकोरी कबाब का मेरे लिए
क्या औचित्य
मैं तो खाऊंगा वही
जो खाता हूँ नित्य
मेरा आपसे मिलने का ही
था उपक्रम
जो हो गया पूरा
आप काकोरी कबाब का स्वाद ले
अभी मेरा कुछ काम है अधूरा
कह मैं अपने
गंतव्य को चला

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

पाखी जियो हजारों साल...


पाखी लगती सबसे प्यारी.
सबकी है वो राजदुलारी.
आज उसका जन्मदिन आया.
यह देख है मन हर्षाया।

पाखी जियो हजारों साल.
मस्ती करो और धमाल.
यूँ ही खूब कमाओ नाम.
जन्मदिन पर यही पैगाम।


एस. आर. भारती
मैनेजर- नेशनल स्पीड पोस्ट सेंटर, कानपुर
कानपुर जी.पी.ओ. -208001

मंगलवार, 22 मार्च 2011

दिवास्वप्न

आज धरमू
घर से सुबह सात बजे सुबह ही
काम के लिए निकल गया
तबियत थोड़ी नासाज थी
फिर भी मण्डी पहुच गया
कई दिनों की बीमारी ने उसे
कमजोर इस कदर कर दी थी
बची खुची जमा पूजी भी
दवा के नाम पर होम हो गयी थी

आज सुबह मुनिया के अनुनय ने
उसे व्यथित कर दिया था
न चाहते हुए भी काम पर जाने को
मजबूर कर दिया था
बापू हमके उ बंदूकवाला पिचकारी चाहिए
मोनू के पापा ओका कल्हे लइके दीन है
अउर अबकी हमके औ गुडिया वदे
फ़िराक वाला सुइट लई के दियो
ओमे हम बहुतै अच्छा लागब
उहे पहीन के तोहे अउर
माई के टीका कारब

सोचते सोचते पता ही नहीं चला की
वह मण्डी कब पहुच गया
जाकर मजदूरों की लाइन में
खड़ा हो गया
आज त्यौहार के कारण
वैसे भी मजदूरो की भीड़ बड़ी थी
पर मालिको की कमी भी
साफ दीख रही थी
कुछ आये भी तो उसे कमजोर देख
उसकी तरफ ताके तक नहीं
कुछ ने बातें तो की पर
वाजिब मजदूरी देने को तैयार नहीं
सोचते अउर बातें करते करते
दोपहर होने को आयी
बात कही बन नहीं पाई
अंत में एक ठीकेदार ने
उस पर तरस खाया
आधी मजदूरी पर तय कर
उसे अपनी साईट पर लाया
धरमू लग गया काम पर जी जान से
शाम की मजदूरी के प्लान में
सोच रहा था की आज की मजदूरी से
कुछ खाने के सामान के साथ
मुनिया की पिचकारी जरुर लायेंगे
उसेक चहरे की ख़ुशी को
तबियत से देखेंगे
अगर कल परसों भी काम लग गया
तब उसके अउर गुडिया के
फ्राक के लिए भी सोचेंगे

आगे भी काम पाने की लालसा में
बीमारी से उठे बदन से उसने
भरपूर मेहनत किया
ठीकेदार को खुश करने का
हरसंभव प्रयास किया
साथ में लाये रोटी और अचार को भी
बिसराय कर किनारे कर दिया
कमजोर बदन आखिर
ये कब तक सहता
धरमू साईट पर ही अचानक
बुखार की चपेट में पुनः आ गया
कापते पैरो ने उसका और चलना
मुश्किल कर दिया
एकाएक वह बांस से गिर गया
एक पटरे में फस उसका
पैर भी टूट गया

ठीकेदार चिल्लाया अरे साले
ये तुम्हे क्या हो गया
साले ने एक अटिया सेमेंट
ख़राब कर दिया
चल भाग साले यहाँ से
तुम लोगो पर दया करना बेकार है
थाम ये बीस रुपये
यही तुम्हारी अब तक की पगार है
धरमू बीस का नोट थामे
वही बैठ गया
कभी अपने टूटे पैर को
कभी उस नोट को देखता रहा
सोचता रहा की अब क्या होगा
इससे अब कौन सा
पूरा अरमान होगा
मुनिया और गुडिया के
सपनों का क्या होगा
उनके भाग्य में क्या दिवास्वप्न ही होगा
ईश्वर ने मुझे बचा ही क्यों लिया
मै मर क्यों नहीं गया
कम से कम इस संताप से
तो दूर रहता
परिवार के आंसूं देखने से
बच गया होता

पर वह शायद कैसे मरता
यदि मर जाता
तो दुःख पीड़ा और अवसाद के
नए प्रतिमान फिर
कौन बनता

मंगलवार, 15 मार्च 2011

महिला सशक्तीकरण सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार - आकांक्षा यादव

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ (8 मार्च) पर पोर्टब्लेयर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारम्भ अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाए एवं चर्चित साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने दीप जलाकर किया। श्री यादव ने अपने उदबोधन में कहा कि - ‘‘नारी ही सृजन का आधार है और इसके विभिन्न रूपों को पहचानने की जरूरत है। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस इस तथ्य को उजागर करता है कि विश्व शान्ति और सामाजिक प्रगति को कायम रखने तथा मानवाधिकार और मूलभूत स्वतंत्रता को पूर्णरूप से हासिल करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी, समानता और उनके विकास के साथ-साथ महिलाओं के योगदान को मान्यता प्रदान करना भी अपेक्षित है।‘‘
संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं युवा लेखिका सुश्री आकांक्षा यादव ने महिला सशक्तीकरण को सिर्फ उपमान नहीं बल्कि एक धारदार हथियार बताया। बदलते परिवेश में समाज में महिलाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं आज राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, मीडिया, कला, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, ब्लागिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है। सदियों से समाज ने नारी को पूज्या बनाकर उसकी देह को आभूषणों से लाद कर एवं आदर्शों की परंपरागत घुट्टी पिलाकर उसके दिमाग को कुंद करने का कार्य किया, पर नारी की शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास के क्षितिज दिनों-ब-दिन खुलते जा रहे हैं, जिससे तमाम नए-नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं।
पोर्टब्लेयर प्रधान डाकघर की पोस्टमास्टर श्रीमती एम. मरियाकुट्टी ने कहा कि-'' संविधान में महिला सशक्तीकरण के अनेक प्रावधान हैं पर दूरदराज और ग्रामीण स्तर तक भी लोगों को उनके बारे में जागरुक करने की जरूरत है। सुश्री सुप्रभा ने इस अवसर पर नारी की भूमिका के अवमूल्यन के लिए विज्ञापनों और चन्द फिल्मों को दोषी ठहराया जो नारी को एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सुश्री शांता देब ने कहा कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ भगवान वास करते हैं, फिर भी नारी के प्रति समाज का रवैया दोयम है। सुश्री जयरानी ने उन महिलाओं पर प्रकाश डाला जो उपेक्षा के बावजूद समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल हुईं। इसके अलावा अन्य तमाम लोगों ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन जयरानी ने किया और आभार शांता देब ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में तमाम महिलाएं और प्रबुद्ध-जन उपस्थिति रहे।

शनिवार, 12 मार्च 2011

दूध का कर्ज

खामोश सुखिया
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी
रक्त की एक बोतल उसे चढ़ चुकी थी
एक और अभी बाकी थी

सोच रही थी
किसने दिया होगा उसे रक्त
उसका मरद तो हो चुका
पहले ही अशक्त
बच्चे कभी झाकने नहीं आते
कभी आते तो करके हज़ार
बहाने वे लौट जाते
छोटू ने हिम्मत की थी
तभी उसके कानो में
बहू की आवाज पड़ी थी
अरे छोड़ा बूढ़ा के ऊ त
मरले दाखिल हई
अभी तोहे बहुत कम करे का है
चला हिला एहन से बहाना बनाय के
मरि जैहन त अभी
क्रिया करम भी है करे के

वह बोल तो नहीं पर
सुन तो थी ही सकती
ऑपरेशन के बाद अचेत
अपलक छत को निहारती
अतीत में चली गयी
डॉक्टर का चेहरा उसे
जाना पहचाना लग रहा था
दिमाग पर जोर देने पर उसे
कुछ धुधला सा याद आया
लक्षमण का चेहरा जेहन में भाया

जिसे जिसकी माँ
बचपन में ही छोड़
पड़ोसन संग इश्क लड़ाई
और भाग गयी थी
पड़ोसन के नाते जिसे उसने
अपना दूध पिला कर बड़ा की थी
फिर उसके बापू के तबादले ने
सबकुछ भुलवा दिया था
कुछ दिनों में ही सब अतीत का
हिस्सा बन गया था

हाँ हाँ ई त वही
लाछमनावा लागत है
पर इहा त सब एका
डॉक्टर एल के सिंह कहत है

छोड़ा कुछो होय हमै का करे का है
दिमाग पर ज्यादा जोर
डाले का हमै का पड़ा है
सोचते सोचते न जाने वह
कब सो गयी
भोर में जगी तो देखा
सुबह हो गयी
डॉक्टर बाबु राउंड पर आये थे
उसके सर पर हाथ रख सहला रहे थे
आज उसे तबियत कल से
बहुत ठीक लग रही थी
सुखिया अम्मा कैसी हो सुन
डॉक्टर के मुख से अपना नाम
वह दंग रह गयी थी

बहुतै दूध पिलवा है हमका
अब हमरी बारी आवा है
एक बोतल खून हम दै चुके
एक अउर देना बाकी है
हम तोहरा बदे आपन
सब खून दै सकत है
तबो माई तोहरे दूध का करज
हम कभों न उतार सकित है

सुन आपन माटी क आवाज
सुखिया सकते में आ गयी
अरे तू त लाछामन्वा ही हवे
कहते सुखिया गदगद हो गयी
पर यहाँ तो सब तोहके
डॉक्टर एल के सिंह कहत है
पर तू त लाछामन्वा ही है
बाबा इ कैसी विपत है

सुखिया की देख निश्छल सोच और हंसी
डॉक्टर बाबू ने सुखिया की गोद में
अपना सर रख दिया
सुखिया ने भी तुरंत अपने आंचल से
उनका मुख ढक दिया
आंचल के दूसरे कोने से मुंह ढाप
सुखिया रो पड़ी थी
दूध के कर्ज को सुखिया
आज बडे मार्मिक ढंग से
समझ रही थी

जिनसे थी अपेक्षा
उन्होंने तो मुंह फेर लिया था
पर आज दूघ के रिश्ते ने
अपने को रक्त के रिश्ते से
बेहतर साबित कर दिया था
पूरे वार्ड में पसरा सन्नाटा
बन गवाह इस बात की
सच्चाई बड़ी सिद्दत से
बयां कर रहा था

बुधवार, 9 मार्च 2011

अभिशापित जीवन और अरुणा

मृत्यु तो एक शाश्वत सत्य
के रूप में है ही विरासित
पर अब उसका जीवन भी
बन चुका है अभिशापित

दे रहा है उसे कौन सा सुख
अरुणा का अर्थहीन जीवन
ऐसे जीवन से है अच्छा नहीं
क्या करना मृत्यु का वरण

हम एक बार के मृत्यु की
कल्पना से सिहर उठते है
हज़ार बार वह नित्य मरती है
हम भावनाओ में बहा करते है

हर चीज कानून के दायरे में
तय हुआ नहीं करती है
सही और गलत बातें हमारे
विवेक पर निर्भर करती है

निरंतर पिछले सैतीस वर्षों से
जो हमारी भावनाओ को ढो रही
डोलने बोलने में सर्वथा अक्षम
एक्षम्रित्यु जाहिर करने से रही

सार्थक जीवन भी रागिनियो का
एक सार्थक नाम होता है
तमाम उतर चढाओं के साथ
रस प्रसाद माधुर्य से भरा होता है

उसकी निस्वार्थ सेवा कर
हम उसे कौन सा सुख दे रहे
बस भावनाओ में बहकर
उसे दुःख ही दुःख दे रहे है

हमारी सेवा अगर किसी के लिए
बनजाये अंतहीन दुःख का कारण
जीवन के औचित्यहीन दंश से कही
अच्छा है उसका औचित्यपूर्ण मारण

अगर तीस बत्तीस वर्ष पूर्व ही
उसे मिल जाती नारकीय जीवन से मुक्ति
उपरांत पुनर्जीवन के वह होती
आज एक नूतन युवा नारी शक्ति

करती अठखेलियाँ पावन प्रकृति से
बागों और बसंत से होती आनंदित
उसके यौवन की खुशुबुओं से
पावन धरा भी होती दिगंदित

जीवन के एक एक पल का करती
कितनी सिद्दत से रसपान
दे पाए नहीं जो हम उसे करके
अपने हज़ार प्रयास के उपरांत

सम्मान करता हूँ मै दिल से
अरुणा के उन सह्कर्मिओं का
रातदिन एक कर दिया जिन्होंने
लेकर निस्वार्थ सेवाव्रत का

पर क्या कही दिखाती नहीं
इसमे भी स्वार्थ की आहट
भावनाओं के पीछे से आ रही
निरंतर नाम की सरसराहट

कि देखे और सोचे लोग मेरे
इस सेवाव्रत के नूतन आयाम को
पर सार्थक सेवाव्रत ही देती है
एक सुखद अंजाम को

इस सेवा व्रत ने तो लटका दिया है
अधर में किसी के जीवन को
जबकि प्रतीक्षा एक सुखद मौत की
है त्रिशंकु बनी अरुणा रामचंद्र को

वस्तुतः है नहीं यह किसी को जीवन देना
है क्रमशः उसे मौत के करीब ही ले जाना
तो क्यों न उसे मर्सी किलिंग दे दी जाय
अच्छा नहीं है किसी को तिल तिल कर मारना

इस ब्लॉग के माध्यम से सम्मान करता हूँ
जिंदादिल याचिका पिकी वीरानी का
समाप्त हो जिंदगी और मौत का यह खेल
पक्षधर हूँ उनके जज्बे और कद्रदानी का

बुधवार, 2 मार्च 2011

'न्यू ऋतंभरा भारत-भारती साहित्य सम्मान' से सम्मानित हुईं आकांक्षा यादव

युवा कवयित्री एवँ साहित्यकार सुश्री आकांक्षा यादव को हिन्दी साहित्य में प्रखर रचनात्मकता एवँ अनुपम कृतित्व के लिए छत्तीसगढ़ की प्रमुख साहित्यिक संस्था न्यू ऋतंभरा साहित्य मंच, दुर्ग द्वारा ''भारत-भारती साहित्य सम्मान-2010'' से सम्मानित किया गया है। गौरतलब है कि सुश्री आकांक्षा यादव की आरंभिक रचनाएँ दैनिक जागरण और कादम्बिनी में प्रकाशित हुई और फ़िलहाल वे देश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवँ सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली सुश्री आकांक्षा यादव के लेख, कवितायेँ और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों/पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीँ आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ अंतर्जाल पर भी सक्रिय सुश्री आकांक्षा यादव की रचनाएँ इंटरनेट पर तमाम वेब/ ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं।

आपकी तमाम रचनाओं के लिंक विकिपीडिया पर भी दिए गए हैं। 'शब्द-शिखर', 'सप्तरंगी-प्रेम', 'बाल-दुनिया' और 'उत्सव के रंग' ब्लॉग आप द्वारा संचालित/सम्पादित हैं। 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' पुस्तक का संपादन करने वाली सुश्री आकांक्षा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के एक कॉलेज में प्रवक्ता सुश्री आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहाँ रहकर भी हिन्दी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिन्दी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो सुश्री आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

सुश्री आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती ज्योति‘‘, ‘‘एस0एम0एस0‘‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘ व ‘‘भाषा भारती रत्न‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवँ कला परिषद द्वारा ‘‘शब्द माधुरी‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘‘आसरा‘‘ द्वारा ‘‘ब्रज-शिरोमणि‘‘ सम्मान, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘‘भारत गौरव‘‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘काव्य-कुमुद‘‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘‘सरस्वती रत्न‘‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा श्रेष्ठ कवयित्री की मानद उपाधि इत्यादि प्रमुख हैं। सुश्री आकांक्षा यादव को इस अलंकरण हेतु हार्दिक बधाईयाँ।

गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिन्दवाड़ा
103 कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)-480001