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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

कचकच

अउर बचवा 
का हाल बा 
तोहरे महतारी के 
घर अउर गॉव के 
प्रेम को देख 
दीनानाथ ने उसे
इस बार 
अच्छे से पहचान
लिया था 
पर वह था कि 
अपने ठीक हो चुके 
पिता को देख 
घबरा रहा था 

ठीक है बाबूजी 
सब ठीके जा रहे है 
धीरज रखे 
हम आपके छुट्टी का 
कागज बनवा कर 
बस दो मिनट में 
रहे है 
कहते हुए प्रेम 
जो गया 
तो आज दो साल 
बाद भी पलट कर 
नहीं आया 

वर्षों पहले 
पत्नी की एकाएक 
मौत के बाद 
दीनानाथ का मानसिक 
संतुलन बिगड़ गया था 
उसकी पत्नी नहीं रही 
उसका मन यह 
मानने को तैयार ही 
नहीं था 

पत्नी की सलाह पर 
प्रेम ने पिता को 
मानसिक अस्पताल में 
करा दिया था 
बीच बीच में 
पिता के ठीक होने की 
अपने इष्ट से 
दुआ करते हुए 
पिता से भेंट मुलाकात का
फर्ज निभाता रहा

माँ तो 
जा ही चुकी थी  
बाबू के पागलखाने 
पहुँचाने के बाद से 
सुनीति के जीवन में 
रौनक चुका था 
नित्य ही डिनर के लिए 
पूरा परिवार 
कैफे जा रहा था 

कोइ हाय 
कोई कचकच 
दूर हो चुका था 
उनके जीवन से 
तथाकथित हर 
चकचक 

उधर ठीक हो चुका
दीनानाथ 
पुनः सदमे में 
गया था 
नित्य ही वह अपनी 
पैकिंग करता 
और खोलता 
घर जाने के रंगीन 
सपने देखता था 
अपने साथियों से 
अपने पोते पोतियों की 
जुड़ी यादें 
शेयर करता
उनसे पुनः  
मिलने की बात करता
नहीं अघाता  
और उनसे मिलने की 
अंतहीन प्रतीक्षा
करता 


निर्मेष 
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