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रविवार, 1 फ़रवरी 2009

युवा शक्ति को नमन की जरुरत: BHU में चरण छूने पर प्रतिबन्ध

बनारस अपनी वैदिक परम्पराओं, पांडित्य एवं कर्मकाण्डों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यही कारण है कि महात्मा बुद्ध ने भी वैदिक कर्मकांडो के विरूद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तन से पहले बनारस में अवस्थित सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया। बनारस में स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शिष्यों द्वारा गुरू के चरण छूने की लम्बी परंपरा है। वैसे भी पूर्वांचल में नया अनाज पैदा होने पर जब उसका नेवान किया जाता है तो लोग मुहल्ले भर में घूम कर बड़ों का चरण छूते हैं। इसी प्रकार कभी दान देते समय दाता दान स्वीकार करने वाले का चरण छूता था। इसके पीछे मकसद था कि लेने वाले के मन में याचक का भाव न जगे। पहली नजर में यह अटपटा भी नहीं लगता, पर बदलते दौर में किसी के प्रति आदर प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं। चरण छूना आदर का सूचक हो सकता है लेकिन यह दूसरों के अहं को ठेस भी पहुंचाता है। समाजशास्त्रियों की नजर में आज चरण छूना कई मायनों में अच्छा नहीं है क्योंकि चरण छूने की प्रथा छद्म व्यवहार का परिचायक हो रही है। इसके पीछे कुछ लोग दूसरों को भी भ्रम में रखने की कोशिश करते हैं। इसी के मद्देनजर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने चरण छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके लिए बकायदा विभाग में नोटिस तक जारी की गई है।

वस्तुतः इस सोच के पीछे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. एम0के0 चतुर्वेदी एक संस्मरण भी बताते हैं। प्रयाग में कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर आए थे। सब उनका चरण छू रहे थे। एक दृढ़ व्यक्तित्व का धनी सुदर्शन युवक आया। उसने नमस्ते किया और भीतर चला गया। इस घटना ने विश्वकवि को झकझोर कर रख दिया था। वह बहुत देर तक संयत नहीं हो पाए। युवक भी कोई नहीं बल्कि हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। प्रो. एम0के0 चतुर्वेदी जे0पी0 आंदोलन के दौरान अज्ञेय से मिलने दिल्ली गए। जैसे ही वह आए, उनके साथ गए लोग अज्ञेय के चरण की ओर लपके। पर अज्ञेय ने कहा कि- ‘‘नहीं! चरण छूने की जरूरत नहीं। युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ।‘‘ यह बात प्रो0 एम0के0 चतुर्वेदी के मन को अन्दर तक छू गई। अब उन्होंने इससे प्रेरणा लेते हुए अपने समाजशास्त्र विभाग में चरण छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। उनका तर्क है कि दिल की भाषा को दिल समझ लेता है। आदरणीय को अपने मन के भाव को समझाने के लिए चरण छूना जरूरी नहीं है।
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