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शनिवार, 28 मार्च 2009

किसका चुनाव और किसके लिए चुनाव ??

चुनाव की चारों तरफ़ बहार है। क्या युवा..क्या बूढे सभी चुनावी रंग में रंगे हुए हैं। हर किसी को लगता है कि वह जिस दल को वोट देगा वही सत्ता में आयेगा। राजनीति में युवा चेहरों की इस बार ज्यादा पूछ है। राहुल गाँधी से लेकर वरुण गाँधी तक चर्चा में हैं तो प्रिया दत्त से लेकर तमाम युवा महिलाएं चुनाव में अपना भाग्य अजमा रही हैं। कहीं फिल्मी सितारे तो कहीं क्रिकेट सितारे मानो चुनाव नहीं मेला चल रहा हो। हर प्रत्याशी को अपनी जीत का भरोसा है तो हर मतदाता को अपने मत पर। इन सबसे परे एक ऐसा भी वर्ग है जो लम्बी-लम्बी बातें तो करता है, पर मतदान में उसकी कोई रूचि नहीं है। उसे लगता है की वह लोकतंत्र रूपी पायदान के सबसे शीर्ष पर है , जहाँ से वह या तो बौधिक बहस करता है या फतवे जारी करता है। इस चुनावी लोकतंत्र में हर किसी की अपनी भूमिका है और हर किसी का अपना मूल्य (?) भी। व्यक्ति से बड़े जाति-धर्म हो गए हैं, तभी तो ऐन वक्त तक प्रत्याशी बदले जा रहे हैं। अब इन राजनेताओं को कौन समझाए कि यह पब्लिक है, जो सब कुछ जानती है। चुनाव आयोग ने दीवालों पर नारे लिखना मन कर दिया तो अख़बारों की चाँदी हो गई। यहाँ हर कुछ मैनेज होता है, बस आपको ढंग आना चाहिए। एक वो है जो दिखता है, तो एक वो है जो दीखता नहीं, आखिर चुनाव आयोग भी क्या-क्या देखे ? बस यूँ समझिये कि चुनाव है और फ़िर पॉँच साल के लिए भूल जाना है। आप मत किसी को देते हैं, सरकार किसी की बनती है। सत्ता के लिए सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं, फ़िर किसका चुनाव और किसके लिए चुनाव....विचार करें ???
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