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शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

जीवन सजीव !

ले स्वछंदता का आचार व विचार
नित टूट रहे संयुक्त परिवार
लगने लगे है बेमानी
पैत्रिक घर द्वार
मायने खोते जा रहे सिवान
बीमार हो रहे बखरी
और खलिहान
पप्पू तो उड़ चले अमेरिका
बबलू भी चले ब्रिटेन
अम्मा और बाबु को पूछता है कौन
बेबस वो चल पड़े गाँव की ओर
ले दादी की चटाई और दद्दा का लालटेन
ज्यादा चाहने की लालच मेंहै कुछ टूट रहा
मानवीय संवेदनाओ से साथ
पीछे छूट रहा
लुप्त हो रही क्रमशः रिस्तो की मिठास
वो गाँव के चौपालों के rasile अहसास
सहानुभूति परोपकार प्यार व मस्ती
अपनापन कही गूम हो गया
पश्चिम का प्रभाव हमारे समाज पर है
इस कदर हावी हो गया
की दम तोड़ते ओ गढ़ते नित
रिश्तो की नयी परिभाषा
जिनके बचने की दिखती
अब नहीं कोई आशा
संस्कारयुक्त शिछा के अभाव में
ये युवा नैतिक लछ्य से भटक जाते
अपने जनको को छोड़
देसी बिदेशी मेमो के साथ उड़ जाते
ऐश और भोग को जीवन का आदर्श बनाते
मनो अपने माँ बाप से
अपने खो चुके बचपन का बदला चुकाते
जिन्होंने बाजारवाद का दे वास्ता
छीन कर उनका बचपन
उनको दिखाया विकास का रास्ता
अपनी वन्छ्नाओ को उन पर लद्दा
सिखाया उनको कमाना ज्यादा
अस्तु अब हमारे दोनों ही
hatho में है जल भरा
कब तलक वो संभलेगा भला
आज हमें भी इस दिशा में सोचना होगा
नए सिरे से पुनः मंथन करना होगा
ऐसी स्थिति के लिए
हम भी कम नहीं जिम्मेदार
अपने बच्चे में पलते सपने हज़ार
और उन्हें किसी भी कीमत पर
पूरा करना चाहते है
बदले में उनके बचपन का बलिदान मागते hai
आज विज्ञानं भी इस बात को मानता
की प्रकृति किसी के साथ अन्याय नहीं करती
सबके अन्दर वो कोई एकगुण विशेष भारती
उन गुणों को विकसित करने के jagah
हम उन पर चलते है अपनी
जिसके बदले में वो हमें देते है सजा
बदल देते है एक सुसंगठित समाज की फिजा
अतःशिछा ही नहीं संस्कार भी
चाहियेविकास की इस अंधी दौड़में
नैतिक मूल्यों की पतवार चाहिए
निर्मेश तभी रख पायेगे हम
एक मजबूत समाज की नीव
बेशक वो भी जी पायेगे
हमारे साथ जीवन सजीव !
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