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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

हे नूतन वर्ष तू ठहर जरा

परम आदरणीय सुधि पाठक वन्धुओं पिछले काफी दिनों से आप मुझे युवामन पर देख रहे है और सराह रहे है जिससे मुझे सदा कुछ नया करने की प्रेरणा मिलती रहती है पहले तो मै आपका आभारी हूँ और नूतन वर्ष पूर्व संध्या पर हृदय से धन्यवाद् देना चाहता हूँ आप सबको नए वर्ष की ढेर सारी शुभ कामनाओ के साथ मेरी ये रचना उस आतंकी घटना पर आधारित है जिसने पिछलो दिनों वाराणसी को न केवल हिला दिया बल्कि दहला दिया था और ऐसे परिवेश में स्थानीय अवाम में एक नया जोश व जूनून भरने का एक छोटा सा प्रयास है मेरा आशा है सदा की भाति आपको पसंद आयेगा
पुनः धन्यवाद् के साथ सादर

निर्मेश

हे नूतन वर्ष तू ठहर जरा
क्यों ठिठक रहे है पावँ तिहारे
क्यों उदास तुम आज लग रहे
निर्भय आओ तुम पावँ पसारे

भरी आज क्यों आंख तिहारी
तन तेरा निस्तेज है क्यों
मस्तक पर चिंता की लहरे
मुख मंडल खामोश है क्यों

बेशक असुरों की बढ़ी बाढ़ है
आसुरी प्रवृतियाँ है हमें डराती
निसंदेह सहमती आज धरा भी
पर तुम मानवता की हो थाती

ये असुर भटकते अधियारों में
हो चुके कर्म मर्यादाहीन
लक्ष्य दीखता इन असुरों का
बने धरा सौन्दर्यविहींन

देखे कितने विनाश है तुमने
कितनो युद्धहों के तुम गवाह हो
साक्षी रहे प्रलय के तुम भी
नई श्रृष्टि के तुम प्रवाह हो

पनप रही दैवी प्रवृतियाँ भी
लिए हाथ में इनकी गर्दन
होगी अतीत की पुनरावृत्ती
होगा इनका मान मर्दन

सदा रही विनाश से दूर धरा
आजीवन इसने वरदान दिया
हर तन का अवसाद छीन
हर चेहरे पर मुस्कान दिया

ये स्वयं रही अनभिज्ञ मधु से
जीवनभर विषपान किया
इस माँ ने झेले लाखो कष्ट
अविरल श्रृष्टि को पनाह दिया

शश्य श्यामला आर्य भूमि पर
होगा तेरा शत शत वंदन
नई श्रृष्टि की चादर तान
प्रकृति करे तेरा अभिनन्दन

होगा पुनः अमृत का वर्षण
हे नूतन वर्ष तेरे नेतृत्व में
मुखरित होगी पावन प्रकृति
हम अर्याजानो के कृतित्व से

निर्भय आओ तुम सौगात लिए
होती नहीं अब और प्रतीक्षा
करो दानवों का तुम नाश
पूरित मानव की हर इक्क्षा

पथ में बिछा दूब चांदनी
कर युवाशक्ति का आह्वाहन
दूर क्षितिज तक बूंद ओंस की
नयनाभिराम दर्शन पावन

ले अतीत से नूतन सीख
कर पावन भविष्य का निर्माण
नहीं चाहिए और किसी
अपनी जीवन्तता का प्रमाण

अभिनन्दन शत शत वंदन
हे पावन प्रकृति हे वसुंधरा
लिए अंक में चारो पुरुषार्थ
है नमन तुम्हे पावन धरा
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