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शनिवार, 11 दिसंबर 2010

नया जीवन

ख़ुदकुशी की असफल
कोशिश के बाद अस्पताल के
विस्तर पर मै पड़ा था
बगल में ही एक और मरीज
गंभीर रोग से पीड़ित था
असाध्य रोग से ग्रस्त
पर देखा उसके अन्दर
जीने की प्रबल लालसा
एक मै था की स्वस्थ होकर भी
स्वयं को काल के गाल में
भेजने को उद्यत था

एक खिडकी थी
ठीक उसके पीछे
रोज उसके पास बैठता था
वो आंखे मीचे
मै अक्सर कई बार उससे
बिस्तर बदलने को कहता
करके नए बहाने
वो हर बार टाल जाता

मै उदास उससे ही
बाहर के हाल चाल पूछता
वो हर बार मुझे
कुछ सुन्दर बताता
मेरे अन्दर जीने की
एक नई इच्छा भरता

प्रकृति के तमाम
सौंदर्य का दे हवाला
मेरी इक्षाशक्ति बढाकर उसने
मेरी मृत्यु को लगभग टाला
मुझे ठीक होते देख उसकी
खुशियों का नहीं था पारावार
जबकि उसकी तबियत
बिगड़ रही थी लगातार

एक दिन सुबह उठकर मैंने
आवाज सुनी नहीं उसकी
मेरे नीचे से जमीन सरकी
जिग्यासवास धीरे से उठकर
गया जब उसके बिस्तर
पर उसे मौन पाया
उसके खिड़की के पीछे
बस एक सख्त दीवाल पाया

हतप्रभ मैं कभी उसे
कभी उस दीवाल को देखता
सोचता
बेशक वो जीवन की जंग
भले ही हार गया
पर जाते जाते
अनजाने में ही सही
मुझे नया जीवन
वो दे गया
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