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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

अधूरा घोंसला

अपने
घोसले का निर्माण
करने में तल्लीन नर
एक एक तिनका चुन चुन कर लाता
मादा गौरैया के चोच में थमाता
पुनः और तिनके की तलाश में
सुदूर जंगलों में चला जाता
मादा उन तिनको को
घोसले में सजाती

अपने प्रियतम को प्यार से निहारती
सुखद भविष्य की कल्पना से ओत प्रोत
प्यार से उसकी बलैया लेती
अनवरत श्रम से थकने पर
उसे अपने नाजुक पंखों से हवा कर
एक मादक अदा से इठलाती
पुनः आने वाले जीव के
बारे में सोच सपनों में खो जाती
कुछ तिनका इस प्रक्रिया में
नीचे गिर गया था
घोसला बनाने के ही करीब था
मादा ने कहा प्रियतम तुम थक गए हो
इतना दूर न जाकर
क्यों नहीं इन गिरे तिनके को लाते हो
व्यर्थ में पसीना अब क्यों बहाते हो
अब तो घोसला भी तैयार है
देखो कितनी अच्छी बसंती बयार है
आओ जल्दी से इसे पूरा करे
फिर आराम से बैठ अपने
घोसले में भोजन करें

थक चुके नर ने
पुनः साहस जुटाया
अपनी मादा को प्यार से पुचकाया
उन गिरे तिनको को
एक एक कर लाने लगा
निर्मम कल भी वहां धीरे से
आहट देने लगा
एक बिल्ली की निगाह उस
बेसुध सपने में खोये नर पर पड़ी
उसके बांछे खिल गयी
पंजे में दबोच वह उसे ले चली
मादा पूरे दम से चिल्लाते
उसके पीछे दौड़ पड़ी

पल में ही देख
सारे सपने धूसरित
आकान्छाये अपूरित
बेदम नर ने उसे समझाया
उस होनी को कौन रोक सकता है
जो ईश्वर को है भाया
गर्भ में पल रहे हमारे
भविष्य को बचाओ
उसी के सहारे अब जीवन सजाओ
मुझे बचाने की चेष्टा
मत करो अनायास
जानती ही हो बेकार होंगे
तुम्हारे सभी प्रयास
तुम्हारे बचने से कम से कम
हमारा अस्तित्व तो बचेगा
बाकी न्याय इसका तो ईश्वर ही करेगा
प्रिये अब मेरी मौत तो करीब है
क्या करे शायद यही हमारा नसीब है
कहते हुए नर ने
वही तोड़ दिया दम
यह देख मादा के
हताश रुक गए कदम
अपने आपको समझाते
अपने पति की याद और पहचान को
अपने गर्भ में छिपाते
न चाहते हुए भी अज्ञात भविष्य के
नए ताने बाने बुनते
अस्थियों के नाम पर उसे
जो कुछ मिला वहां
ले चल पड़ी अपने अधूरे घोसले को
उसके प्रियतम की
यादे शेष थी जहाँ
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