आये झंडा फहराए
खाए मिठाई और चल दिए
घर द्वार कि दो चार बाते किये और चल दिए
गणतंत्र खड़ा किनारे अपनी
बेबसी पर रो रहा
औचित्य अपना पूछता
फिर रहा
कहता रहा कि
दिल के अरमा आंसुओं में बह गए
सफ़र किया था जहा से शुरू
फिर वही पहुँच गए
ज्ञान की जर्जर काया
1 दिन पहले

1 टिप्पणियाँ:
काश, हर बार कुछ निश्चय लेकर जायें हम..
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