समर्थक

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

वोटर यानि सौ सुनार की एक लोहार की

जाग वोटर अब तेरी बारी आई है । दिखा दे अपना जलवा, बता दे अपनी ताकत। बता दे अपनी हैसियत दिखा दे अगले को उसकी औकात। वोटर तू लोकतंत्र के सागर का मोती है, पहचान अपनी कीमत। तुझे वोट के बीज से खुशहाली के फूल उगाने है। ये समय तेरा है । इस समय के महत्व को समझना होगा। वोट देना हसी खेल नही है । अपने को इतना नासमझ मत बना कि कोई भी ऐरा-गैरा आकर तुझसे तेरा वोट चुरा ले। वोटर यही समय तेरा है । तू जज बनकर फैसला सुना दे, अम्पायर बनकर उंगली उठा दे । अभी ड़मरू तेरे हाथ में है । इस खेल मे तेरी भूमिका मदारी की होनी चाहिये बंदर की नही । वोटर भाई एक बात तो तू अच्छे से जान ले कि जैसी वोटर की औकात होती है वैसी ही उसकी सरकार होती है , उससे ज़रा भी अच्छी नही । भय्या अपने अंदर के सारे विवेक का एकत्रित कर ले, अपनी सारी सोच को सामने रख दे , अपनी सुंदर सोच से संसद को सजा दे। ध्यान रहे तेरी एक गलती से संसद गंदी हो सकती है । लोकतंत्र के इस मंदिर में तेरा चढावा ज़बरदस्त होना चाहिये ।

जब हम इन्टरव्यू देने जाते , जब लड़की देखने जाते है , जब मकान खरीदने जाते है , जब बच्चे के लिये खिलौना लेने जाते है , यहां तक कि जब धनिया मिर्ची भी खरीदने जाते है तो तैयारी कर के जाते है , लेकिन वोट देने जाते समय हमारी कोई खास तैयारी नही होती । हम अपने प्रत्याशी को अच्छे से ठोक बजाकर चैक क्यो नही करते है ? वोट देने से पहले उससे पचास सवाल क्यो नही करते ? उसको वोट देने या नही देने का आधार क्या होता है हमारे पास ? वोट को लेकर हमारी कोई पुख्ता सोच नही है , हम आगामी पांच साल तक अपने द्धारा चुने गये प्रत्याशी को गलियां देते रहते है , उसके निकम्मेपन पर कोसते रहते है , उसके द्धारा भुला दिये गये वादो को याद करते रहते है .......ये सब करना हमको अच्छे से आता है लेकिन वोट देते समय उसको ठेंगा दिखाना नही आता । हम अपने दरवाज़े वोट मांगने आये नेता को मुंह पर क्यो नही कहते कि हम तुमको वोट नही देंगे क्योकि तुम इस योग्य नही हो। वह मुस्कुराकर हाथ जोड़ता है हम भी मुस्कुरा कर हाथ जोड़ देते है । हाथ से हाथ जोड़ो पर दोना हाथ तुम्हारे ही नही होने चाहिये । एक हाथ नेता का और एक हाथ नागरिक का होना चाहिये । वोट के मामले मे वोटर का कर्तव्य होता है कि वह एक दम मुंह फट हो जाये , इसमें ज़रा भी संकोच और शर्म नही होनी चाहिये । याद रखिये दुनियाॅ मे हां उसी की होती है जिसको न बोलना आता है । उम्मीदवार हमारे दरवाज़े आता है तो हम गदगद हो जाते है , समर्पित हो जाते है , भूल जाते है कि इससे तो पुराना हिसाब किताब ठीक करना है । पिछले चुनाव के समय किये गये वादो का लेखा जोखा पूछना है । फलाने फलाने मामले मे इसके समर्थन या विरोध का कारण ज्ञात करना है । संसद में हमारे प्रतिनिधी की हैसियत से इसने कब कब क्या बोला ? स्थानीयत मुद्धो को इसने किस ढंग से उठाया ? जीतने के बाद इसने देशहित में क्या किया ? वोटर को चाहिये कि वह उम्मीदवार के सामने सवालो की बारिश कर दे । साथियो राजनीति की इस महफिल में तबला नही नगाड़ा बजाना होगा ।

लोकतंत्र के दर्पण के सामने खड़े होकर हमको अपनी ही ऐसी की तैसी कर देनी चाहिये । खुद को कटघरे में खड़े कर खुद पर आरोप लगाने चाहिये , खुद से सफाई मांगनी चाहिये और खुद ही खुद का फैसला करना चाहिये । इन दिनो हमें चाहिये कि कल्पना की कक्षा में खुद शिक्षक बन खुद का मार्ग दर्शन करे, खुद ही खुद से सवाल करे और खुद ही उसका जवाब भी दे, और गलत जवाब देने पर खुद ही खुद को दंड़ दे। अपना प्रतिनिधी चुनते समय हमें उतना ही चौकन्ना रहना पड़ेगा जितना हम दामाद चुनते समय रहते है । अगर गलत दामाद चुन लिये तो बिटिया का भविष्य बर्बाद हो जायेगा उसी प्रकार यदि हमारे द्धारा गलत प्रतिनिधी चुन लिया गया तो देश का भविष्य बर्बाद हो जायेगा । याद रखिये देश सर्वोपरि होता है, देश के लिये बड़ी से बड़ी कुर्बानी भी मामूली से बात होनी चाहिये । वोट देना किसी निशान पर बटन दबाना मात्र नही है बल्कि इस प्रक्रिया के द्धारा देश का भविष्य तय करना है । यह कोई छोटी मोटी ज़िम्मेदारी नही है , अगर एक बार आपने किसी को अपना वोट दे दिया तो फिर उसके किये गये हर अच्छे बुरे कार्य के जिम्मेदार हम खुद होंगे।अगर वह अयोग्य साबित होता है तो यह उसकी नही हमारी अयोग्यता मानी जायेगी कि हमे ढंग का आदमी चुनना तक नही आता । गलत आदमी को वोट देकर जिताने से बड़ा और कोई पाप नही हो सकता। अगर कोई सांसद या विधायक अपने कार्यकाल मे असफल साबित होता है तो इस बात का पता लगाना चाहिये कि यह किन किन के वोटो से जीता था , फिर उन सभी से वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिये । उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिये । ऐसे नासमझो के साथ कोई रियायत नही बरतनी चाहिये।

हम विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के नागरिक है । हम ऐसे देश के नागरिक है जहां दो चीज़े बहुत होती है , एक त्योहार और दूसरा चुनाव । आये दिन हमें कोई न कोई चुनाव का सामना करना ही पड़ता है । इसलिये यह अत्यंत आवश्यक है कि हम वोट देने के कुछ कड़क नियम स्वयं के लिये बना ले । पहला नियम तो यह होना चाहिये कि हम दिल से यह स्वीकार करे कि चुनाव में आस्था जैसी कोई चीज़ नही होनी चाहिये । आस्था धार्मिक मामलो में होनी चाहिये राजनीतिक मामलो मे नही । अक्सर वोटरो के मुंह से सुना जाता है कि हमारी फला -फला पार्टी पर आस्था है , या हम तो बाप दादाओ के ज़माने से कांग्रेसी , भाजपाई या कम्युनिस्ट है । इस तरह की कोई मान्यता हमारे मन में नही होना चाहिये । हर बार समय के साथ स्थितियां बदल जाया करती है , लिहाज़ा हमें भी अपना निर्णय बदलने पर विचार करना चाहिये । दूसरा नियम यह होना चाहिये कि हम हर वोट मांगने आने वाले को शक की नज़र से देखे । उस पर सहसा विश्वास करे ही नही । हमारी नज़र में हर प्रत्याशी संदिग्ध होना चाहिये । हमें हमेशा एक ही राग अलापना चाहिये कि अगर ये ऐसा बोल रहा है तो क्यो बोल रहा है , अगर ये ऐसा कर रहा है तो क्यो कर रहा है , अगर यह उससे मिल रहा है तो क्यो मिल रहा है , अगर इसने ये वादा किया है तो इसे पूरा क्यो करेगा , कब करेगा , कैसे करेगा ? अगर इसने फलाॅ फलाॅ वादो पर अमल नही किया तो हम इसका क्या कर लेगे ? हम कुछ नही कर सकेगे हमको एक बार वोट देने का मौका मिलता है अगर उसे नादानी में गवां दिये तो अगले पांच साल तक हमारे पास सिवाय आंसू बहाने और हाथ मसलने के आलावा और कुछ नही है । इसलिये भाईयो खुदा का शुक्र अदा करो कि तुम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हो जहां तुम्हे वोट देने की नैमत हासिल हुई है । अपने इस अधिकार से तूफान मचा दो , प्रगति के समंदर में देश की नाव के नाखुदा हो तुम । निर्माता हो तुम सरकार के । मतदान की कलम से देश का भविष्य लिख दो । कुछ ऐसा धमाल करो इस वोट से कि कमाल हो जाये । वोट वोट न रहे अलादीन का चिराग हो जाये , ज़रा अपनी सोच को संवारो , तुम्हारा वोट वोट नही एक शस्त्र है इसे ढंग से चलाना सीखो । इस बार ज़िद मे आ जाओ कि तुम्हे चाहिये सिर्फ योग्य योग्य और योग्य नुमाइंदा ।

योग्यता का मापदंड़ क्या होगा ? किसी प्रमाण पत्र से योग्यता का आंकलन नही किया जा सकता । किसी लैब की रिपोर्ट नही बताती कि प्रत्याशी मे कितने प्रतिशत ईमानदारी , कितने प्रतिशत जिम्मेदारी , कितने प्रतिशत देशप्रेम और कितने प्रतिशत लालच, मौकापरस्ती,, धोखाधड़ी है । योग्य प्रत्याशी को तो तुम्हे अपने विवेक से तलाशना होगा , सजग निगाहो से ढूंढ़ना होगा , अनुभवी हाथो से टटोलना होगा । एक बात तय है कि योग्यता को किसी प्रमाण पत्र की ,किसी रिपोर्ट की आवश्यकता नही होती । अयोग्यता की इतनी औकात नही है कि वह योग्यता को दबा दे । अयोग्यता के शोर मे इतनी आवाज़ नही होती कि उसमें योग्यता का गीत दब जाये । ए वोटरो तुम अयोग्यता के शोर के खिलाफ़ समूह गीत बन जाओ । लोकतंत्र के आकाश पर वोट के बादल बन कर गरजो , बिजली बन कर कड़को , बारिश बन कर बरसो और मौकापरस्ती के कचरे को बहा दो । प्रत्याशी के बैनर पोस्टर नही देखो , उसका घोषणा पत्र देखो । बांचो की उस में कुछ ज़मीनी सच्चाई भी है या सब कुछ हवा हवाई ही है । वोट के खौफ को इतना उभारो कि किसी नेता में इतना साहस ही न हो कि वह तुम्हारी भावनाओ के साथ खिलवाड़ करने का सोच भी सके । हमेशा उसके दिमाग में यही भय समाया रहना चाहिये कि अगर कुछ ऐसा वैसा किया तो अभी वोट का ड़ंड़ा पड़ेगा । ये ऐसी चोट है जिसकी कोई मरहम पट्टी नही होती । ये ऐसा नासूर है जो पूरा कैरियर गला देता है । तुम अपनी क्षमता पहचानो , वोट के तवे पर अच्छे अच्छो का भेजा फ्राई कर दो । एक कुशल खिलाड़ी की तरह वोट का पासा फेको और खुशहाली की बाज़ी जीत लो । चुनावी पिच तुम्हारे अनुकूल है अगर संभल कर बल्लेबाजी किये तो तुम्हारी जीत निश्चित है। चुनावी अखाड़े में हार और जीत सिर्फ उम्मीदवारो की ही नही होती बल्कि वोटर की हार जीत भी इसमें शामिल रहती है । गलत प्रत्याशी की जीत वोटर की हार है । वोट बेचने से बड़ा कोई देशद्रोह नही और देशद्रोह से बड़ा कोई पाप नही । तुम इस पाप में कभी भागीदार नही बनना ।

हर वोटर की खास कर युवा वोटरों की यह नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वोट देने के पहले इस बात का अच्छी तरह अनुमान लगा ले कि कही कोई ड़ेढ़ होशियार तुम्हारे हाथो मे घोषणा पत्र का छुनछुना तो नही पकड़ा रहा है । नामांकन दाखिल करने से लेकर मतदान के दिन तक हर वोटर को इतना समय मिलता है कि वह अपने प्रत्याशियो का तरीके से चरित्र चित्रण कर ले । इस बात पर ध्यान दो कि प्रत्याशी की शैक्षणिक योग्यता क्या है लेकिन अनुभव के महत्व को भी नज़र अंदाज़ नही किया जा सकता है । अनुभवी आदमी का अपना अलग महत्व होता है लेकिन युवा प्रतिभा भी किसी से कम नही होती । मेरा तो यह मानना है कि आप अपने मन की प्रयोगशाला में इस बात की जांच करो कि आप के प्रत्याशी की विशेषता क्या है ? वह किस क्षेत्र से है ? राजनीज्ञ ही सत्ता संभाले तो ठीक है । प्रसिद्ध अभिनेता , प्रतिभावान खिलाड़ी या सफल उद्योगपति की जगह अपने अपने क्षेत्र मे महत्वपूर्ण हो सकती है लेकिन राजनीति में उनकी क्या आावश्यकता ? अभिनेता को जीता कर क्या देश की संसद में ठुमके लगवाना है ? वोट देने की वजह उम्मीदवार की सिर्फ लोकप्रियता ही हो यह उचित नही है । कम लोकप्रिय आदमी भी ज्यादा काबिल हो सकता है । परिवर्तन भी वोटर का मुद्धा हो सकता है । वोट इतना सोच विचार कर दो कि वोट देने के बाद जीते हुए उम्मीदवार का हर निर्णय हर कदम तुम्हे स्वीकार होना चाहिये । तुम्हारे अंदर इतना सब्र होना चाहिये कि आगामी पांच साल तक पुनः इंतजार कर सको । उम्मीदवार के सारे वादे, आश्वासन, पर तुम्हारा एक वोट इतना भारी होना चाहिये कि वोट के संबंध में यह कहावत लागू हो जाये कि सौ सुनार की एक लोहार की.......!!!
अखतर अली, आमानाका , रायपुर
akhterspritwala@yahoo.co.in
एक टिप्पणी भेजें