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गुरुवार, 14 जनवरी 2010

भारत के पहले मुस्लिम देहदानीः अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’

दान से पुण्य कोई कार्य नहीं होता। दान जहाँ मनुष्य की उदारता का परिचायक है, वहीं यह दूसरों की आजीविका चलाने या किसी सामूहिक कार्य में संकल्पबद्ध होकर अपना योगदान देने की मानवीय प्रवृति को दर्शाता है। राजा हरिश्चन्द्र को उनकी दानवीरता के लिए ही जाना जाता है। महर्षि दधीचि जैसे ऋषिवर ने तो अपनी अस्थियाँ ही मानव के कल्याण हेतु दान कर दीं। महर्षि दधीचि ने मानवता को जो रास्ता दिखाया आज उस पर चलकर तमाम लोग समाज एवं मानव की सेवा में जुटे हुए हैं। देहदान के पवित्र संकल्प द्वारा दूसरों को जीवन देने का जज्बा विरले लोगों में ही देखने को मिलता है। चूँकि मनुष्य के देहान्त पश्चात की परिस्थितियां मानवीय हाथ में नहीं होती, अतः विभिन्न धर्मों में इसे अलग-अलग रूप में व्याख्यायित किया गया है। धर्मों की परिभाषा से परे एक मानव धर्म भी है जो सिखाता है कि जिन्दा होकर किसी व्यक्ति के काम आये तो उत्तम है और यदि मृत्यु के बाद भी आप किसी के काम आये तो अतिउत्तम है।

हाल ही में विष्णु प्रभाकर एवं प्रतीक मिश्र जैसे वरेण्य साहित्यकारों ने जिस प्रकार मृत्यु के बाद भी देहदान द्वारा लोगों को शिक्षित एवं जागरुक किया है, वह स्तुत्य है। वस्तुतः आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान व नेत्रदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है। हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है। इसी परम्परा में भारतवर्ष में तमाम लोग नेत्रदान-देहदान की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मरने के बाद हाथी के दांँतांे से कामोत्तेजक औषधियाँ एवं खिलौने, जानवरों की खाल से चमड़ा बनता है, उसी प्रकार से इन्सान भी मृत्यु के बाद 4 नेत्रहीनों को नेत्रज्योति, 14 लोगो को अस्थियाँ व हजारों मेडिकल छात्रों को चिकित्सा शिक्षा दे सकता है। दान की हुई आँखें तीन पीढ़ी तक काम आती हैं। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-
हाथी के दाँत से खिलौने बने भाँति-भाँति
बकरी की खाल भी पानी भर लाई
मगर इंसान की खाल किसी काम न आई


आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है, फिर चाहे वह किसी भी जाति या धर्म के हों। इसी परिपाटी में एक ऐसा युवक उभर कर सामने आया है, जिसने रूढ़ियों को तोड़कर समाज को नई राह दिखाई है। अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’ नामक यह 23 वर्षीय युवक भारत का प्रथम मुस्लिम देहदानी है। मूलतः कायमगंज, जिला फर्रूखाबाद (उ0प्र0) के इस होनहार युवक ने लीक से हटकर धार्मिक मान्यताओं के विपरीत दूसरों के लिए देहदान (नेत्रदान, रक्तदान, अस्थिदान भी) करके इंसानियत की एक नई मिसाल कायम की है। बकौल अरशद मंसूरी-‘‘परम्परागत रूढ़ियों से परे मेरे इस ऐतिहासिक कारनामे से तमाम उलेमा, धार्मिक नेता व कट्टरपंथी वर्ग नाराज हो गये और मेरे इस कार्य का पुरजोर विरोध करने लगे। यही नहीं मेरे खिलाफ फतवा जारी करने की धमकी दे डाली तथा देहदान करने के निर्णय को वापस लेकर माफी मांगने को कहा, किन्तु मैं अपने संकल्प पर दृढ़ रहा और मानव धर्म को सर्वोपरि धर्म बताते हुए इन तथाकथित विरोधियों से भी नेत्रदान व देहदान की मार्मिक अपील कर डाली।‘‘

कानपुर विश्वविद्यालय में बी0फार्मा0 तृतीय वर्ष के मेडिकल छात्र एवं विगत 6 वर्षो से समाजसेवा में समर्पित अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट‘ के देहदान व नेत्रदान कार्यो से उनके रिश्तेदार यहाँ तक कि घर वाले भी खिलाफ हो गये। इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल इण्डिया टीवी का एक प्रेस रिपोर्टर अनिल वर्मा शेखर, जब अरशद मंसूरी का इंटरव्यू लेने उनके घर कायमगंज(फर्रूखाबाद) पहुँचा, तो अरशद के पिता अल्लाहदीन ने उस प्रेस रिपोर्टर को ही अपमानित करके घर से भगा दिया। उन्हें यह डर था कि मीडिया में यह प्रकरण आ जाने से पूरे देश में उनका विराध होने लगेगा और उनके खिलाफ फतवा जारी होने में देर न लगेगी।

फिलहाल अरशद मंसूरी अपने इस नेक कार्य से प्रसन्न हैं एवं मानते हैं कि यह कार्य उन्होंने लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं किया बल्कि इसलिए किया कि लोग (मुस्लिम सम्प्रदाय के व्यक्ति भी) उनसे प्रेरित होकर नेत्रदान व देहदान जैसे पुण्य कार्यो में आगे आयें। आंकड़ों की बदौलत धारदार तर्क देते हुए जब यह नवयुवक कहता है कि- ‘‘हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है और मैंने इसी परिस्थित को देखकर अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर लोगों के हक में देहदान व नेत्रदान का यह फैसला लिया।‘‘ लोगों से मिल रहे प्रोत्साहन से यह नवयुवक अभिभूत है और 'दृष्टि- एक प्रयास' नामक पुस्तक भी लिख रहा है। लोगो के अन्दर खत्म होती इंसानियत को देखकर यह नवयुवक व्यथित हो जाता हैं और कहता है कि डाॅक्टर, इंजीनियर बनने की तरह इंसान को इंसान बनाने के लिए भी शिक्षा देनी चाहिए। अरशद की कर्तव्यनिष्ठा देखकर किसी शायर के शब्द याद आते हैं-

'एक ऐसा मजहब चलाना होगा.
जिसमें इंसान को इंसान बनाना होगा।।'
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