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गुरुवार, 21 जून 2012

दूसरे गाँधी


तपती जेठ की

दोपहरी थी

अपने शीर्षतम बिंदु पर

गरम हवा चल रही थी

सूरज क़ी तीव्रतम तपिश से

बदन तप रहा था

तन का एक एक

रोम झुलसा जा रहा था



परशान परिसर में

एक वृक्ष क़ी छाया पकड़

मै आराम फरमाने को

उत्सुक और व्यग्र



देख रहा था

अपनी अतिरेक हरियाली से

पूरे शहर को

जो कभी देती थी पोषण

बनाये रखती थी

पर्यावरण का संतुलन

परिसर क़ी उस हरियाली का

हो रहा था तेजी से शोषण



देख रहा था

नित एक नए भवन क़ी

नीव पड़ते हुए

महामना क़ी बगिया को

कंक्रीट के जंगल में

बदलते हुए

सामने ही खेल के एक मैदान में

एक नूतन भवन सम्पूर्ण

साकारता क़ी और अग्रसर था

तेजी से वह काम

चल रहा था



बेदम कर देने वाली

इस जलती धूप में

दो तीन आधुनिक विशाल और

विकासशील भारत क़ी स्यामवार्ण

मगर सुगढ़ ललनाये

गोद में इस आर्यावर्त के

भविष्य को छिपाए

नंगे पाव ईट ढो रही थी

शिक्षा के मंदिर में

बरबस शिक्षविदो के सर्व शिक्षा

अभियान के दावे क़ी

हसी उड़ा रही थी



साथ ही बड़े हसरत से

स्कूटी पर सवार

पूरे बदन को ढके

जींस पैंट के साथ

शानदार काला चश्मा चढ़ाये

इसी आधुनिक भारत क़ी ही

आधुनिक ललनाएं

एक मोहक खुशबू बिखेरते हुए

एक एक कर

उनके पास से गुजरती जा रही थी



स्वयं को कोसते हुए

गर्मी से निढाल हो कभी

वह बैठ जाती

कभी ठीकेदारों के डर से

बिना सुस्तायें काम पर

पुनः लग जाती



संभवतः

उन्हें इंतजार किसी तरह

दिन ढले

गर्मी से रहत मिले

साथ ही पूरी मजदूरी क़ी चाह

पेट भरने के आस लिए वह भी

इसी आधुनिक आर्यावर्त क़ी ललनाये थी

मगर भारतीय वांग्मय और

सनातनी संस्कृति के दृष्टिकोण से

एक और दूसरे गाँधी को अपने उद्धार हेतु

अपने आंचल में छिपाए

शायद अपने पिछले जन्मो के

कर्मो का फल ही तो

भोग रही थी

डा रमेश कुमार निर्मेश

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