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सोमवार, 12 नवंबर 2012

सागर उवाच






कलम पकडने के बाद सिर्फ एक काम रह जाता है कागज काला करना।
कलम पकडना बन्दूक पकडने से ज्यादा खतरनाक हुनर है क्योकि इनकाउंटर करके बच सकते हैं मगर कलम से वार करके बचना मुकिल है। सो समहल के चलाना पडता है।लिखास और छपास के बीच संतुलन रखना बडा मुश्किल होता है इसलिए हर कुछ एक धार से कह पाना भी मुम्किन नहीं इस लिए मैंने बनाया एक नया ब्लाग सागर उवाच!  सागर उवाच माध्यम होगा गम्भीर व कठोर शब्दों को हल्के-फुल्के में कह के निकल जाने का। क्योंकि सेंसरशिप से भी सामना करना है!

एक अदद प्रतिक्रिया के इंतजार में....

http://sagaruwaach.blogspot.in/


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