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सोमवार, 13 जून 2011

कैद नहीं हो सकती रचनात्मकता

सच मानिए, रचनात्मकता किसी खास-समय और स्थान की मोहताज नहीं होती, आजमगढ़ जेल के एक कैदी हैं- फिरोज अहमद, जिले के ही ठेकमा इलाके के सरायमोहन में चौकीदार थे, हंसी-खुशी जिंदगी चल रही थी। साल भर पहले, एक रात दोस्तों के उकसावे में निकल गए। कुछ 'ऊँच-नीच' करने, नतीजा जेल, बच्चों के साथ बीवी मायके चली गई। झाडुओं की सिंक और दूसरे कागज-गत्तों से कुछ तो भी बनाना शुरू कर दिया। पेंसिल हाथ में आई तो दीवारों का रूख लिया। हर ओर उभरने लगे फिरोज के चित्र। एक दिन जेल अधीक्षकअवधेश मिश्र की निगाह पड़ गई। उसके इन कारनामों पर उन्होंने बाजार से शिल्प कला और चित्रकारी के औजार मंगा कर थमा दिए। देखते ही देखते वह खास बन गया, दूसरे कैदियों की नजर में। मिश्र को बंगलुरू में कैदियों की राष्ट्रीय पेन्सिल ड्राइंग प्रतियोगिता की खबर मिली तो फिरोज के चित्र भी भेजे गए। उन चित्रों को 'ए' ग्रेड के दर्ज वाले सर्टिफिकेट हाल ही जब जेल पहुँचा तो कैदियों में हलचल मच गई, अब काफी खुश है फिरोज।

-सुधीर सिंह
(साभार : इण्डिया टुडे, 18 मई 2011)

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

महिलाओं ने बदला पानपाट

घूंघट में रहने वाली महिलाओं ने देवास जिले के कन्नौद ब्लाक के गाँव ‘पानपाट’ की तस्वीर ही बदल दी है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया है कि – कमजोर व अबला समझी जाने वाली महिलाएं यदि ठान लें तो कुछ भी कर सकती हैं। उन्हीं के अथक परिश्रम का परिणाम है कि आज पानपाट का मनोवैज्ञानिक, आर्थिक व सामाजिक स्वरुप ही बदल गया है। जो अन्य गाँवो के लिए प्रेरणादायक साबित हो रहा है।

पानपाट गाँव का 35 वर्षीय युवक ऊदल कभी अपने गांव के पानी संकट को भुला नहीं पाएगा। पानी की कमी के चलते गांव वाले दो-दो, तीन-तीन किमी दूर से बैलगाड़ियों पर ड्रम बांध कर लाते हैं। एक दिन ड्रम उतारते समय पानी से भरा लोहे का (200 लीटर वाला) ड्रम उसके पैर पर गिर गया और उसका दाहिना पैर काटना पड़ा। ऊदल अपाहिज हो गया। हर साल गर्मियों में गांव का पानी संकट उसके जख्म हरे कर जाता। मध्यप्रदेश के अन्य कई गांवों की तरह यह गांव भी आजादी के पहले से ही पानी का संकट साल दर साल भोगने को अभिशप्त है। यहां सरकारी भाषा में कहें तो डार्क जोन (यानी जलस्तर बहुत नीचे) है, हर साल गर्मियों में परिवहन से यहां पानी भेजा जाता है। ताकि यहां के लोग और मवेशी जिन्दा रह सकें। औरतें दो-दो तीन-तीन किमी दूर से सिर पर घड़े उठाकर लाती है। जिन घरों में बैलगाड़ियां हैं, वहाँ एक जोड़ी बैल हर साल गर्मियों में ड्रम खींच-खींचकर ‘डोबा’ (बिना काम का, थका हुआ बैल) हो जाते है। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं। नेता और अफसर भी पानी की जगह आश्वासन पिलाकर चले जाते पर समस्या जस की तस बनी रही।

इस समस्या का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता था औरतों को। आखिर वे ही तो परिवार की रीढ़ हैं। आखिर एक दिन वे खुद उठीं और बदलने चल दीं अपने गांव की किस्मत को गांव के तमाम मर्दों ने उनकी हंसी उड़ाई ‘आखर जो काम सरकार इत्ता साल में नी करी सकी उके ई घाघरा पल्टन करने चली है’ पर साल भर से भी कम समय में ही वे लोग दांतो तले उंगली दबा रहें हैं। इस कथित घाघरा पल्टन ने ही उनके गांव की दशा और दिशा बदल दी है। यह कोई कपोल कल्पित कहानी या अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि हकीकत है। देवास जिले के कन्नौद ब्लॉक के गांव पानपाट की।

इन औरतों के बीच काम करने पहुंची स्वंयसेवी संस्था ‘विभावरी’ ने उनमें वो आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति पैदा की कि सदियों से पर्दानशीन मानी जाने वाली ये बंजारा औरतें दहलीजों से निकलकर गेती-फावड़ा उठाकर तालाब खोदने में जुट गईं। दो महीनें मे ही तैयार हो गया इनका तालाब। जैसे-जैसे तालाब का आकार बढ़ता गया इनका उत्साह और हौंसला बढ़ता गया। उन्हें खुशी है कि अब इस गांव में पानी के लिए कोई अपाहिज नहीं होगा और कोई बहन-बेटी पानी के लिए भटकेगी नहीं। सत्तर वर्षीय दादी रेशमीबाई खुद आगे बढ़ीं और फिर तो देखते ही देखते पूरे गांव की औरतें पानी की बात पर एकजुट हो गईं। उन्होंने पानी रोकने की तकनीकें सीखी, समझी और गुनी। पठारी क्षेत्र और नीचे काली चट्टान होने से पानी रोकना या भूजल स्तर बढ़ाना इतना आसान नहीं था। पर ‘पर जहां चाह-वहा राह’ की तर्ज पर विभावरी को राजीव गांधी जलग्रहण मिशन से सहायता मिली।

बात पड़ोसी गांव तक भी पहुंची और वहां की औरतें भी उत्साहित हो उठीं- इस बीमारी की जड़सली (दवाई) पाने के लिए। यहां से शुरुआत हुई पानी आंदोलन की। अनपढ़ और गंवई समझी जाने वाली इन औरतों ने पड़ोसी गांवों की औरतों का दर्द भी समझा। गांव का पानी गांव में ही रोकने के गुर सीखाने निकलीं ये औरतें। बैसाख की तेज गर्मी, चरख धूप और शरीर से चूते पसीने की फिक्र से दूर। नाम दिया जलयात्रा। 20 से 25 मई 2001 तक यह जलयात्रा भाटबड़ली, झिरन्या, टिपरास, नरायणपुरा, निमनपुर, गोला, बांई, जगवाड़, फतहुर जैसे गांवो से गुजरी उद्देश्य यही था कि-जो मंत्र उन्होंने अपनाया वह दूसरे गांव के लोग भी करें।

जलयात्रा के बाद तो इस क्षेत्र में पानी आंदोलन एक सशक्त जन आन्दोलन की तरह उभरा अब तो मर्दों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर चलना तय कर लिया। आज क्षेत्र में सेकड़ों जल संरचनाएं दिखाई देती हैं। इससे भविष्य में यह क्षेत्र पानी की जद्दोजहद से दो-चार नहीं होगा। पानी को लेकर शुरु हुआ यह आंदोलन अब पानी से आगे बढ़कर क्षेत्र की समाजार्थिक स्थिति में बदलाव जैसे मुद्दों को भी छू रहा है क्षेत्र में सफाई, स्वास्थ्य, कुरीतियों से निपटने, शिक्षा, पंचायती संस्थाओं में भागीदारी, छोटी बचत व स्वरोजगार से अपनी व पारिवारिक आमदनी बढ़ाने जैसे मुद्दे भी इन औरतों के एजेंडो में शामिल हैं।

पिछले एक साल में यहां इन्होंने तालाब, निजी खेतों में तलईयां, गेबियन स्ट्रक्चर, मैशनरी चेकडेम, लूज बोल्डर श्रृंखलाबद्ध चेकडेम व मेड़बंदी जैसी कई संरचनाएं बनाई हैं। पर इससे महत्वपूर्ण देखने वाली बात यह कि – यहां के समाज में इन सबसे एक विशेष प्रकार का विश्वास और जागरुकता आई। अब ये लोग अपने अधिकारों को लेने के लिए लड़ना सीख गए हैं। ये अब नेताओं और अफसरों के सामने घिघियाते नहीं हैं, बल्कि नजर उठाकर नम्रता के साथ बात करते हैं।

नारायणपुरा में 5वीं कक्षा पास शारदा बाई गांव की ही ड्राप ऑउट 12 बालिकाओं को पढ़ा रही है। इन गांवो में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। निस्तारी पानी के लिए 56 सोख्ता गडढ़े व लगभग दो दर्जन घूड़ों में नाडेप तरीके से खाद बनाई जा रही है। क्षेत्र के युवकों को रोजगारमूलक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है तथा किशोरों, औरतों के लिए लायब्रेरी बनाई गई है। क्षेत्र में लगातार स्वास्थ्य फॉलोअप शिविर लग रहे हैं। इन गांवो के लगभग ढ़ाई सौ साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि खुद यहां कि औरतों ने यहां की तस्वीर बदल दी है। इन गांवो में मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व आर्थिक बदलाव को आसानी से देखा, समझा जा सकता है। ‘विभावरी’ के सुनील चतूर्वेदी इस पूरे आंदोलन से खासे उत्साहित हैं। वे कहते हैं “एक अनजान धरती पर नकारात्मक माहौल में काम करना आसान नहीं था। व्यवस्था के प्रति पुराना अविश्वास और नेताओं के आश्वासन ने यहां के ग्रामीणों को निराश कर दिया था। पर क्षेत्र की महिलाओं ने हमारे काम को आगे बढ़ाया”। क्षेत्र की औरतों के बीच जुनूनी आत्मविश्वास जगाने वाली विभावरी की एक दुबली-पतली लड़की को देख कर सहसा विश्वास नहीं होता कि यह वह लड़की है जिसने इन औरतों की जिन्दगी के मायने बदल दिये। सोनल कहती हैं। “गांव में तालाब निर्माण काकाम ही सामाजिक समरूपता का माध्यम बना। मैंने इसमें कुछ भी नहीं किया मैंने तो सिर्फ उन्हें अपनी ताकत का अहसास कराया।

झिरन्या के बाबूलाल कहते हैं हम तो इन्हें भी रुपया खाने वाले सरकारी आदमी समझते थे पर इन्होंने तो हमारी सात पुश्तें (पीढ़ियां) तारने जैसे काम कर दिया। काली बाई बताती हैं कि अब उनके काम को सामाजिक मान्यता मिल गई है। देवास, इन्दौर भोपाल तक के लोग उनके काम को देखने व बात करने आ रहे हैं। इससे बड़ी खुशी की बात हमारे लिए क्या हो सकती है?

लेखक: मनीष वैद्य

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

भारत के पहले मुस्लिम देहदानीः अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’

दान से पुण्य कोई कार्य नहीं होता। दान जहाँ मनुष्य की उदारता का परिचायक है, वहीं यह दूसरों की आजीविका चलाने या किसी सामूहिक कार्य में संकल्पबद्ध होकर अपना योगदान देने की मानवीय प्रवृति को दर्शाता है। राजा हरिश्चन्द्र को उनकी दानवीरता के लिए ही जाना जाता है। महर्षि दधीचि जैसे ऋषिवर ने तो अपनी अस्थियाँ ही मानव के कल्याण हेतु दान कर दीं। महर्षि दधीचि ने मानवता को जो रास्ता दिखाया आज उस पर चलकर तमाम लोग समाज एवं मानव की सेवा में जुटे हुए हैं। देहदान के पवित्र संकल्प द्वारा दूसरों को जीवन देने का जज्बा विरले लोगों में ही देखने को मिलता है। चूँकि मनुष्य के देहान्त पश्चात की परिस्थितियां मानवीय हाथ में नहीं होती, अतः विभिन्न धर्मों में इसे अलग-अलग रूप में व्याख्यायित किया गया है। धर्मों की परिभाषा से परे एक मानव धर्म भी है जो सिखाता है कि जिन्दा होकर किसी व्यक्ति के काम आये तो उत्तम है और यदि मृत्यु के बाद भी आप किसी के काम आये तो अतिउत्तम है।

हाल ही में विष्णु प्रभाकर एवं प्रतीक मिश्र जैसे वरेण्य साहित्यकारों ने जिस प्रकार मृत्यु के बाद भी देहदान द्वारा लोगों को शिक्षित एवं जागरुक किया है, वह स्तुत्य है। वस्तुतः आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान व नेत्रदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है। हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है। इसी परम्परा में भारतवर्ष में तमाम लोग नेत्रदान-देहदान की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मरने के बाद हाथी के दांँतांे से कामोत्तेजक औषधियाँ एवं खिलौने, जानवरों की खाल से चमड़ा बनता है, उसी प्रकार से इन्सान भी मृत्यु के बाद 4 नेत्रहीनों को नेत्रज्योति, 14 लोगो को अस्थियाँ व हजारों मेडिकल छात्रों को चिकित्सा शिक्षा दे सकता है। दान की हुई आँखें तीन पीढ़ी तक काम आती हैं। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-
हाथी के दाँत से खिलौने बने भाँति-भाँति
बकरी की खाल भी पानी भर लाई
मगर इंसान की खाल किसी काम न आई


आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है, फिर चाहे वह किसी भी जाति या धर्म के हों। इसी परिपाटी में एक ऐसा युवक उभर कर सामने आया है, जिसने रूढ़ियों को तोड़कर समाज को नई राह दिखाई है। अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’ नामक यह 23 वर्षीय युवक भारत का प्रथम मुस्लिम देहदानी है। मूलतः कायमगंज, जिला फर्रूखाबाद (उ0प्र0) के इस होनहार युवक ने लीक से हटकर धार्मिक मान्यताओं के विपरीत दूसरों के लिए देहदान (नेत्रदान, रक्तदान, अस्थिदान भी) करके इंसानियत की एक नई मिसाल कायम की है। बकौल अरशद मंसूरी-‘‘परम्परागत रूढ़ियों से परे मेरे इस ऐतिहासिक कारनामे से तमाम उलेमा, धार्मिक नेता व कट्टरपंथी वर्ग नाराज हो गये और मेरे इस कार्य का पुरजोर विरोध करने लगे। यही नहीं मेरे खिलाफ फतवा जारी करने की धमकी दे डाली तथा देहदान करने के निर्णय को वापस लेकर माफी मांगने को कहा, किन्तु मैं अपने संकल्प पर दृढ़ रहा और मानव धर्म को सर्वोपरि धर्म बताते हुए इन तथाकथित विरोधियों से भी नेत्रदान व देहदान की मार्मिक अपील कर डाली।‘‘

कानपुर विश्वविद्यालय में बी0फार्मा0 तृतीय वर्ष के मेडिकल छात्र एवं विगत 6 वर्षो से समाजसेवा में समर्पित अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट‘ के देहदान व नेत्रदान कार्यो से उनके रिश्तेदार यहाँ तक कि घर वाले भी खिलाफ हो गये। इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल इण्डिया टीवी का एक प्रेस रिपोर्टर अनिल वर्मा शेखर, जब अरशद मंसूरी का इंटरव्यू लेने उनके घर कायमगंज(फर्रूखाबाद) पहुँचा, तो अरशद के पिता अल्लाहदीन ने उस प्रेस रिपोर्टर को ही अपमानित करके घर से भगा दिया। उन्हें यह डर था कि मीडिया में यह प्रकरण आ जाने से पूरे देश में उनका विराध होने लगेगा और उनके खिलाफ फतवा जारी होने में देर न लगेगी।

फिलहाल अरशद मंसूरी अपने इस नेक कार्य से प्रसन्न हैं एवं मानते हैं कि यह कार्य उन्होंने लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं किया बल्कि इसलिए किया कि लोग (मुस्लिम सम्प्रदाय के व्यक्ति भी) उनसे प्रेरित होकर नेत्रदान व देहदान जैसे पुण्य कार्यो में आगे आयें। आंकड़ों की बदौलत धारदार तर्क देते हुए जब यह नवयुवक कहता है कि- ‘‘हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है और मैंने इसी परिस्थित को देखकर अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर लोगों के हक में देहदान व नेत्रदान का यह फैसला लिया।‘‘ लोगों से मिल रहे प्रोत्साहन से यह नवयुवक अभिभूत है और 'दृष्टि- एक प्रयास' नामक पुस्तक भी लिख रहा है। लोगो के अन्दर खत्म होती इंसानियत को देखकर यह नवयुवक व्यथित हो जाता हैं और कहता है कि डाॅक्टर, इंजीनियर बनने की तरह इंसान को इंसान बनाने के लिए भी शिक्षा देनी चाहिए। अरशद की कर्तव्यनिष्ठा देखकर किसी शायर के शब्द याद आते हैं-

'एक ऐसा मजहब चलाना होगा.
जिसमें इंसान को इंसान बनाना होगा।।'

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

आप कालू को जानते हैं ??

आप कालू को जानते हैं। ...अब आप कहेंगे कि वही कालू (कलुआ) जो ढाबे पर या अन्य किसी जगह बालश्रम की चक्की में पिस रहा है। आपका उत्तर गलत नहीं है, हम आज ऐसे ही एक कालू की बात करेंगे। कहते हैं प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। कमल कीचड़ में ही खिलता है। बिहार में मधेपुरा के मूढ़ो गाँव का कालू इसी तर्ज पर अब समाजसेवियों का अगुवा बन गया है। जर्मनी की संख्या ‘ब्रेड फार द वर्ल्ड‘ ने अपने 50वें स्थापना दिवस समारोह में कालू को न्यौता देकर बुलाया है। वहां मौजूद रहने वाले 50 देशों के समाजसेवियों से वह बालश्रम उन्मूलन के लिए सहयोग मांगेगा। कालू 4 जुलाई 2009 की रात नई दिल्ली से जर्मनी के लिए रवाना हो गया। ग्यारह साल पहले बचपन बचाओ आन्दोलन के अध्यक्ष कैलाश सत्यार्थी ने उसे वाराणसी के कालीन उद्योग से मुक्त कराया था। तभी से वह एक एक्टिविस्ट के रूप में बच्चों के लिए काम कर रहा है। अपनी दूसरी विदेश यात्रा पर जर्मनी गया कालू वहाँ भारत में बाल श्रम मिटाने के लिए सहयोग मागेगा। फिलहाल इस कार्यक्रम में भाग लेने वाला कालू भारत का इकलौता एक्टिविस्ट है। गौरतलब है कि कालू पांच साल पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से भी मिल चुका है !!

बुधवार, 1 जुलाई 2009

एक पत्रकार की इच्छाशक्ति ने बदली मुगल शासक के वंशज की जिंदगी

देश को आजादी प्राप्त किए एक लम्बा समय बीत गया पर अभी भी तमाम ऐसे वाकये देखने को मिलते हैं कि दंग रह जाएं। तमाम रजवाड़ों के वंशज आज उपेक्षित एवं गरीबी की हालत में जीवन जी रहे हैं। अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर की वंशज सुल्ताना बेगम के बारे में अक्सर अखबारों में पढ़ने को मिलता रहता है। वे पश्चिम बंगाल के हावड़ा जनपद में फोरशोर रोड के पास कावीज घाट बस्ती में चाय का स्टाल चलाती हैं। उनकी इस दुर्दशा पर कईयों ने कलम चलाई पर किया कुछ भी नहीं। फिलहाल एक पत्रकार सुल्ताना बेगम की मद्द के लिए सामने आया है और उन्हें बतौर मद्द दो लाख रूपए की राशि प्रदान की है।

वस्तुतः जर्नलिस्ट शिवनाथ झा ने अपनी पत्नी नीना के साथ मिलकर 14 प्राइम मिनिस्टर्स पर एक पुस्तक ’प्राइम मिनस्टर्स आॅफ इण्डियाः भारत भाग्य विधाता’ लिखी है। यह पुस्तक एक आन्दोलन है। शिवनाथ झा ने अपनी पत्नी नीना के साथ मिलकर ’आन्दोलन एक पुस्तक से’ चलाया है। इसके तहत हर एक साल पुस्तक प्रकाशित की जायेगी और इससे मिली राशि से भारत को गौरवान्वित करने वाले परिवारों के वंशजों को सम्मानित किया जाएगा। इसी क्रम में सुल्ताना बेगम को दो लाख रूपए की मद्द दी गई। अब इस राशि से सुल्ताना बेगम अपनी बेटी मधु की शादी भी कर सकेंगी।

आज समाज में जहाँ हर कोई बड़ी-बड़ी बातें करता है, वहाँ पर एक पत्रकार दम्पत्ति का यह अद्भुत अभियान उन तमाम राजनेताओं, प्रशासकों, समाजसेवकों एवं मीडियाकर्मियों को अद्भुत सीख है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति से लोगों का जीवन बदल सकता है।
राम शिव मूर्ति यादव

मंगलवार, 5 मई 2009

आई0ए0एस0 टॉपर्स में लड़कियाँ काबिज

समाज बदल रहा है, सोच बदल रही है और इसी के साथ महिलाओं का दायरा बढ़ रहा है। अभी तक लोग कहते थे कि राजनीति, प्रशासन और बिजनेस में महिलायें शीर्ष स्थानों पर मुकाम बना रही हैं। पर इस बार के आई0ए0एस0 रिजल्ट ने साबित कर दिया है कि महिलायें वाकई अब शीर्ष पर हैं। अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि आई0ए0एस0 के रिजल्ट ने प्रथम तीन स्थान पर लड़कियाँ ही काबिज हैं। इनके नाम क्रमशः शुभ्रा सक्सेना, शरणदीप कौर एवं किरन कौशल हैं। शादी के 6 वर्ष बाद सफलता पाने वाली 30 वर्षीया टाॅपर शुभ्रा सक्सेना आई0आई0टी0 रूड़की से बीटेक हैं और यह उनका दूसरा प्रयास था। मूलताः बरेली की रहने वाली शुभ्रा फिलहाल गाजियाबाद में इंदिरापुरम् के विन्डसर पार्क सोसाइटी में रहती हैं। कभी बी0पी0ओ0 में नौकरी करने वाली शुभ्रा ने मनोविज्ञान विषय से यह सफलता प्राप्त की है। दूसरी टाॅपर शरणदीप कौर पंजाब विश्वविद्यालय से एम0ए0 हैं। गौरतलब है कि कुल घोषित 791 स्थान में टाॅप 25 में 10 लड़कियों ने स्थान बनाया है। शीर्ष 25 सफल उम्मीदवारों में से दो ने हिन्दी और एक ने पंजाबी माध्यम से परीक्षा देकर सफलता प्राप्त की। इनमें 12 उम्मीदवार सोशल साइंस, कामर्स एवं मैनेजमेण्ट से तो 9 इंजीनियर व 4 मेडिकल फील्ड से हैं। पुरूषों में प्रथम स्थान एवं मेरिट में चतुर्थ स्थान प्राप्त वीरेन्द्र कुमार शर्मा शारीरिक रूप से विकलांग हैं। निश्चिततः उनकी सफलता भी युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत का कार्य करेगी। हमारी तरफ से इस सभी होनहारों को ढेरों बधाई और यह विश्वास कि ये समाज को नई ऊचाइयों तक ले जायेंगे।
आकांक्षा

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट होमी व्यारावाला को मिलेगी युवाओं की चहेती पहली ''नैनो"

एक कहावत है कि वक्त मेहरबान तो सब मेहरबान। आज पत्रकारिता के क्षेत्र में तमाम महिलाएं दिखती हैं पर एक दौर ऐसा भी था जब गिनी-चुनी महिलाएं ही पत्रकारिता में जाने का सपना पूरा कर पाती थी। ऐसे में एक नाम तेजी से उभरा- होमी व्यारावाला का। होमी व्यारावाला इस देश की प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट थीं। तमाम जर्नलिस्ट के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहीं होमी व्यारावाला आज 96 वर्ष की हैं और गुजरात के वड़ोदरा में अपना जीवन हँसी-खुशी गुजार रही हैं। अचानक वे चर्चा में है क्योंकि उन्हें प्रथम ग्राहक के रूप में टाटा की बहुचर्चित नैनो कार के लिए चुना गया है। फिलहाल वे अपनी 55 साल पुरानी फिएट कार से ही सफर करना पसन्द करती हैं, पर नैनो ने उनके नयनो में भी एक स्वप्न जगाया कि इस उम्र में एक नई कार पर सफर किया जाय। जहाँ आज की युवा पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी के लोगों को विस्मृत करती जा रही है वहाँ एक ऐसी लीजेण्ड महिला का इस रूप में प्रकटीकरण चैंकाता भी है और आश्वस्त भी करता है कि उनकी काया भले ही वृद्व हो गई हो पर उनका मन अभी भी जवान है। इसीलिए तो वे 96 वर्ष की उम्र में नैनो की सवारी करने को तैयार हैं। टाटा ग्रुप के मालिक रतन टाटा भी खुश होंगे कि इसी बहाने वे देश की प्रथम महिला फोटो जर्नलिस्ट से लोगों को एक बार फिर रूबरू करा सकेंगे।
(होमी व्यारावाला के बारे में और जानें- http://www.boloji.com/people/04019.htm )