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गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

माँ और प्रकृति

 

माँ हर सुबह निकलती है,
आसमान के रंग संग।
एक बोझा लकड़ी का सपना,
एक विश्वास — जीवन का ढंग।

पगडंडियाँ पहचानती हैं उसके पाँव,
झरनों की भाषा समझती है।
वो जंगल से माँगती नहीं कुछ,
बस सूखी टहनी चुनती है।

पहाड़ लाँघती है सहज भाव से,
मानो धरती उसकी सहेली हो।
थकान नहीं, करुणा चलती,
उसके कदमों की रेली हो।

मैं पूछता हूँ — “माँ, क्यों इतना श्रम?”
वो मुस्कुराती, कहती नम्र स्वर में —
“जंगल छानती हूँ,
सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए।
कहीं काट न दूँ कोई ज़िंदा पेड़!”

उस क्षण लगा —
माँ ही तो धरती है,
जो जलती भी है,
पर जीवन बचाती भी है।

✍️- डॉ. सत्यवान सौरभ


गुरुवार, 14 जुलाई 2011

कैसे-कैसे शौक

दिन था इतवार का
आराम के इजहार का
मीठे सपनो संग सो रहे थे
टूटे ख्यालों मे खो रहे थे
तभी ग्रहमंत्री ने झकझोर दिया था
हमको उठने का जोर दिया था

बोली भोर भयी सोते ही रहोगे
क्या सपनो मे खोते ही रहोगे
घर का सारा काम बकाया
दिनकर कितना ऊपर चढ़ आया

जाओ चाहे लौट नहाना
कुछ गेहूं हैं आज पिसाना
हर दिन तो दफतर जाते हो
पर छुट्टी मे घर मे घुस जाते हो
हमको चाहे न ले जाना
पर बच्चों को है आज घुमाना
इतना सुनकर हम उठ जागे
झटपट शौचालय को भागे

दैनिक क्रिया से निपट चुके तब
मीठी वाणी मे हमसे बोले सब
मिलकर जोर बजाओ ताली
अब जायेंगे हम आम्रपाली

यही सोच कर कदम बढ़े
पड़ोसी के घर जा ठहरे
सोचा कुछ उन्हे बता डालें
पर वहां नही दिखे चेहरे

आवाज सुनी आई बाला
जिसे देख पड़ा लब पर ताला
पूंछा उससे सब गये कहां
तुम तड़प रही हो यहां वहां
वह बोली होकर मतवाली
सब गये आज आम्रपाली
कह गये मुझे तुम रूको यहीं
घर की मांजो जूठी थाली

घर लौटे हम बनकर भोले
ग्रहणी से हंस कर बोले
जल्दी भी करो हे भाग्यवान
न छोड़ो चितवन की कमान

ऐसा भी न सिंगार करो
जो दर्पण भी जाये हार
कितने तो छाती पीटेंगे
कितने झट मारेंगे कटार

ग्रहणी मुस्का कर बोली
अब अजी रहो तुम चुपचाप
मेरे मन का तो कर न सके
नित देते नये.- नये संताप
ग्रहणी के ऐसे बचन सुने
झटपट होठों को सी डाला
हम अक्स देख भये मूर्क्षित
जैसे देखी हो “मधुशाला ”

टैम्पो से जैसे ही उतरे
झट से सम्मुख आया माली
चाहे ले लो गलहार पुष्प
चाहे लो कानो की बाली
बाबूजी बीबी यदि पहनेगीं
तो लगेंगी जैसी मधुबाला
“मधुबाला” भी शर्मायेंगी
लगेंगी कोई सुरबाला


यह सुनकर रणचन्डी प्रगटीं
हुंकार भरी ली अंगड़ाई
बोली जा पामर भाग अभी
क्या तेरी है शामत आई
बोली जा पामर भाग-भाग
नही ऐसी खैर बनाऊंगी
निज पावों की ऊँची सैंडिल को
तेरे सिर पर सैर कराऊंगी


आम्रपाली के फाटक पर
दर्शक दीर्घा की भीड़ भयी
लम्बी लाइनो को देख-देख
हमारी गति तो अति क्षीण भयी
मौके का फायदा पा करके
बहती गंगा मे हाथ धुले
दर्शक दीर्घा मे समाय गये
और अन्दर बिना टिकट निकले
अन्दर अचरज मे डूब गये


तेजी से फड़क उठा गुर्दा
पल भर के लिये हम भूल गये
कि हम जिन्दा हैं या मुर्दा
चहुँ ओर रंगीन फौहारे थे
सुर बालायें थीं भीग रहीं
रंगीन नजारा देख देख
थीं श्रीमती जी खीझ रहीं

एक सुन्दर सी बेन्च पर
लिया श्रीमती ने आसन
लगा रहे थे वहीं पर
एक मोटे जी पद्मासन


बोले देवी जी दूर रहो
मैं हूँ ध्यान योग मे डूबा
चंचल चितवन को कैद करो
मुझपर नजर रखे महबूबा
उतार वस्त्र जब तरण ताल मे
सब बच्चे लगे नहाने
उछल-उछल कर कूद-कूद कर
लगे खुद पर ही इठलाने
सोचा कहीं आसन ग्रहण करें
दें दें तन को आराम
स्थान मिला पर कहीं नही
हम खड़े रहें विश्राम


तभी हमारी कमर पर
हुआ जोर से वार
विकराल विकट सम वार से
निज कमर गई थी हार
एक मोटी मोहतरमा ने
किया था एक्सीडेन्ट
कमर के एक ही वार ने
भू पर कर दिया परमानेन्ट

वो बोली क्या अन्धे हो
या सूरदासी औलाद
हम सोच रहे थे खड़े-खड़े
ये कमर है या फौलाद
मै बोला मोहतरमा जी
तुम क्यों खाती हो तैस
दूर से तुम लगती हो हिरनी
और पास से लगती भैंस

मेरी पतली सी कमर पर
तुमने किया अटैक
दिल की धड़कन भी तीव्र हुई
पर हुआ न हार्ट अटैक


वो बोली इस तरह से
हमे न दीजिये गाली
एड़ी चोटी के जतन से
हम पहुंचे आम्रपाली

हमारे घर के कोने मे
जितनी थी फूटी थाली
ढेर लगा कर झटपट ही
कल्लू कबाड़ी को दे डाली

उन थलियों के विक्रय से
जो रकम थी हमने पाई
आम्रपाली घूमने की थी
हमने स्कीम बनायी


इसीलिये सजना के संग
मै पहुंची आम्रपाली
तुमने तो आज बढ़ा डाली
मेरे गालों की लाली


हमने सोचा इस दुनिया मे
हैं कैसे-कैसे शौकीन
”भारती“ कैसा भी समय रहे
पर रहते हैं रंगीन !!

-एस.आर.भारती

सोमवार, 3 जनवरी 2011

रेत : प्रकाश यादव "निर्भीक"

रेत का ढेर है
यह जिन्दगी
जिसमें अनगिनत
सपनों के घरौंदें
रेत से, रेत पर
बनते और ढहते हैं
पलभर में
हकीकत की दुनियां से
बेहद परे
अपनी कल्पना लोक में
सपने सारे
सच ही तो लगते हैं
इस छोटी सी
समय सीमा के भीतर
सच्चाई के सामने आने तक
इन नाजुक सपनों को
क्या पता कि
रेत कभी भी अपना
साकार रुप धारण नहीं करता
बल्कि जितनी ही जतन से
रखों उन्हें समेटकर
मुट्ठी में
वह उतनी ही तेजी से
फिसलता चला जाता है
मुट्ठी से
और कर जाता है खाली
मुट्ठी को
एक बार फिर
टुटे हुए
सपनों के साथ...

प्रकाश यादव "निर्भीक"
अधिकारी, बैंक ऑफ बड़ौदा, तिलहर शाखा,
जिला शाहजहाँपुर, उ0प्र0 मो. 09935734733
E-mail:nirbhik_prakash@yahoo.co.in

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

आज का भारत

है कहाँ-कहाँ न प्रगति हुई
चहुँ ओर प्रगति दिखलाई पड़े
अथाह-प्रगति के सागर में
अविराम प्रगति के खम्ब जडे

है लुटेरों का राज यहाँ
पग-पग फैला भ्रष्टाचार
अपराधों की प्रगति हो रही
हर दिन होता अत्याचार

कुछ वर्ष पूर्व हम जीते थे
व्यवस्थित मतवाली लहरों संग
है अस्त-व्यस्त जीवन अब तो
होती भोर अभावों संग

सब कुछ कागज पर होता है
सड़क नालियों का निर्माण
लूट-लूट सरकारी पैसा
रचते नित ’’भ्रष्टाचार-पुराण’’


गुलाम समय में ‘चालीस’ थे
आजादी में सौ आजाद हुए
अब अर्धशतक के पहले ही
एक सौ दस ‘आबाद’ हुए

सरेआम लुटती है अबला
जीवन की गूंजे चित्कार
निशदिन ऐसा फैल रहा है
मानवता पर अत्याचार

जनसंख्या में उन्नति जारी है
अवनति ने कदम बढ़ाये हैं
अभावों की भीषणता ने
पग-पग ध्वज फहराये हैं

फिर भी भाषण में होता है
प्रखर-प्रगति का ही गुणगान
पाश्चत्य सभ्यता में खोकर के
‘‘कहते मेरा भारत महान’’

नेता के भाषण-प्रवाह में
जन-मानस यूँ बह जाता है
मिथ्या वादों की गम्भीर मार से
सारे दुःख सह जाता है

भारत की सोयी जनता जागे
गद्दारों का हो प्रतिकार
तभी देश का भाग्य जगेगा
माँ-‘भारती’ का हो सत्कार

कहीं-कहीं पर अन्न नही है
कहीं-कहीं मिलता न पानी
कहीं-कहीं न घर रहने को
कहीं सदा तड़पी जिन्दगानी !!

एस. आर. भारती

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

बचपन का जमाना

बचपन का जमाना होता था
खुशियों का खजाना होता था,
चाहत चाँद को पाने की
दिल तितली का दीवाना होता था,

खबर न थी कुछ सुबह की
न शामों का ठिकाना होता था,
थक-हार के आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना होता था,

दादी की कहानी होती थीं
परियों का फसाना होता था,
बारिश में कागज की कसती थी
हर मौसम सुहाना होता था,

हर खेल में साथी होते थे
हर रिश्ता निभाना होता था,
पापा की वो डांटें गलती पर
माँ का मनाना होता था,

कैरियर की टेंशन न होती थी
ना ऑफिस को जाना होता था,
रोने की वजह ना होती थी
ना हंसने का बहाना होता था,

अब नहीं रही वो जिन्दगी
जैसा बचपन का जमाना होता था

बुधवार, 29 सितंबर 2010

विचलित है मन

कृष्ण कराओ पुनः
अपने विराट स्वरुप का दर्शन
विचलित है मन
आसन्न एक परिवर्तन
गीता का भाष्य
पठनीय पाठ्य
पूरित परिपथ
निश्चित दर्शनीय
एक और अग्निपथ
पिटती परंपराओं की लकीरें
क्या खोल पायेगी
उन शहीदों की तकदीरें
जिन्होंने सहर्ष
किया था जीवन अर्पण
उनकी विधवाएं मांजती
आज इन नेताओं के घर बर्तन
बच्चे जिनके चाटते
इनके आज जूठन
सरकारी अनुदानों हेतु
लगाते चक्कर
खाते टक्कर पे टक्कर
भूखे भेड़ियों का बन गयी शिकार
अस्मत हो गई तार -तार
बिक गए घर-द्वार
आज भी जोहती निराला की वह तोड़ती पत्थर
अपना पालनहार !!

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

हिंदी दिवस

हिंदी दिवस की
एक और उत्सव
पूछता पुनः एक बार अपना भावार्थ
विस्मृत युगबोध का यथार्थ
कल्पित
स्तित्वाहिनता का आभास
निरंतर प्रसरित पावन प्रकाश
लक्षित
एक पुनर्जागरण
याकि करना वैराग्य का वरण
जागृत
चेतना की शिखार्यात्रा
यदि हो विवेक की लाघुमात्र
अलाम्बित एक नूतन प्रभात
विलंबित
राग्यमिनी से गुजित
धवल आकाश
होगी रंगीन पुनः
सुरमई शाम
चमकेगा छितिज पर
आर्यावर्त का क्या नाम
याकि छिरेगी
एक और बहस
es यथार्थ पर
सत्य से दूर
मद से चूर
प्रारंभ होगी
एक और नई
यात्रा अंतहीन
pidit दिन और मलिन



शनिवार, 25 सितंबर 2010

माँ की गोद

एक दिन माँ की गोद में

रख कर सर

मैं सो रहा था बाखबर

नीद के आगोश में

हो गया था तन
कल से ही था बेचन ये मन

माँ गुनगुना रही थी प्यारी लोरियां

मेरे सर पे घुमाती अपनी बहिया

एकाएक माँ के लोरियों में से

दर्द की आवाज आई

मैंने कहा क्या हुआ माई

उसने कहा कुछ नहीं बेटा

शायद किसी का है तोता

तभी मने देखा गोद दस निचे से

रक्त की धर

मई हो गया bajar

सोचा वह रे माँ

कैसी है तुम्हारी दुनिया

पर आज के बेटे क्या समझेगे

की क्या होती है पुरनिया

सोमवार, 6 सितंबर 2010

ईश्वर कहाँ मिलेगा... (कविता : एस. आर. भारती)

देखा है लोगो को
मन्दिर, मस्जिद ,गुरूद्वारे एवं गिरजाघर में
"ईश्वर"को खोजते हुए,
मन्नतों के लिए दर-दर भटकते हुए
वे जानते हैं कि "ईश्वर" वहाँ नहीं मिलेगा
’फिर व्यर्थ क्यों खोजते हैं तुष्टि के लिए’
एक यक्ष प्रश्न ने सिर उठाया
फिर ”ईश्वर“ कहाँ मिलेगा ’
सोचते-सोचते चिन्तन आगोश में खो गया
अचानक अन्र्तमन के पट पर
चलचित्र की तरह कुछ पात्र उभरे
मन ने माना कि ये ही ”ईश्वर“ के रूप हैं
किसान ,माँ ,डाक्टर ,
गिरते को उठाने वाला ,
मरते को बचाने वाला ,
सबकी प्यास बुझाने वाला ,
सबकी भूख मिटाने वाला ,
भटके को राह दिखाने वाला ,
बिछडे़ को मिलवाने वाला ,
गुणगान योग्य है ऐसा गुणवान
यही सुपात्र की नजर में ”भगवान“ है ।

शुक्रवार, 18 जून 2010

छेड़ो तराने...

छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...
सूने दिवस थे, सूने रैना,
सूने उर में गहन वेदना,
सूने पल थे सुने नैना,
सूने गात में सुप्त चेतना।

अभिलाषाओं ने करवट ली,
करुणा से पलकें गीलीं ।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

सुप्त भाव थे, सुप्त विराग,
मरु जीवन में सुप्त अनुराग,
तमस विषाद, वंचित रस राग,
नीरव व्यथा, था कैसा अभाग ?

दिग दिगंत आह्लाद निनाद,
दिव्य ज्योति हलचल प्रमाद ।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

मौन क्रंद था, मौन संताप,
मौन पमोद, राग आलाप,
मौन दग्ध दुख मौन प्रलाप,
अंतस्तल में मौन ही व्याप ।

आशा रंजित मंगल संसृति,
हर्षित हृदय, झलक नवज्योति।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

तिमिर टूटा, निद्रा पर्यंत,
सकल वेदना का कर अंत,
पुलकित भाव घनघोर अनंत,
उन्मादित थिरकते पांव बसंत।

स्मृतियां विस्मृत, सजल नयन,
अभिनव परिवर्तन झंकृत जीवन।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

कवि कुलवंत सिंह

सोमवार, 3 मई 2010

युवाओं से...


आकाश में उड़ान लेते वक्त
तेरे मजबूत कंधे पर
आकाश भार ले
तू कल का भविष्य
देश का वर्तमान आधार
कर्तबगार........

तू परिवर्तनशील समाज दायरे का
मध्यबिंदु
तू क्रांति के सपनों का
साध्यबिंदु....

तेरे रग-रग में बहती खून की
गरमी
तेरे रोम-रोम में जवानी जोशीली
सहमी-सहमी....

तुझे असत्यं का पर्दाफाश करना है
सत्यम शिवम् सुंदरम से
तुझे भ्रष्टाचार का तम मिटाना हैं
क्रांति की मशाल से.......
अब तुझे से ही आशा है
तुझे देश की धारा में बहना है !!

मीना खोंड, हैदराबाद

शनिवार, 1 मई 2010

मजदूर (विश्व मजदूर दिवस पर)


जब भी देखता हूँ


किसी महल या मंदिर को


ढूँढने लगता हूँ अनायास ही


उसको बनाने वाले का नाम


पुरातत्व विभाग के बोर्ड को


बारीकी से पढ़ता हूँ


टूरिस्टों की तीमारदारी कर रहे


गाइड से पूछता हूँ


आस-पास के लोगों से भी पूछता हूँ


शायद कोई सुराग मिले


पर हमेशा ही मिला


उन शासकों का नाम


जिनके काल में निर्माण हुआ


लेकिन कभी नहीं मिला


उस मजदूर का नाम


जिसने खड़ी की थी


उस मंदिर या महल की नींव


जिसने शासकों की बेगारी कर


इतना भव्य रूप दिया


जिसकी न जाने कितनी पीढ़ियाँ


ऐसे ही जुटी रहीं महल व मंदिर बनाने में


लेकिन मेरा संघर्ष जारी है


किसी ऐसे मंदिर या महल की तलाश में


जिस पर लिखा हो


उस मजदूर का नाम


जिसने दी उसे इतनी भव्यता !!



कृष्ण कुमार यादव/ KK Yadav

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

कुँवारी किरणें (वेलेंटाइन दिवस पर विशेष)

कुँवारी किरणें
सद्यःस्नात सी लगती हैं
हर रोज सूरज की किरणें।
खिड़कियों के झरोखों से
चुपके से अन्दर आकर
छा जाती हैं पूरे शरीर पर
अठखेलियाँ करते हुये।
आगोश में भर शरीर को
दिखाती हैं अपनी अल्हड़ता के जलवे
और मजबूर कर देती हैं
अंगड़ाईयाँ लेने के लिए
मानो सज धज कर
तैयार बैठी हों
अपना कौमार्यपन लुटाने के लिए।

कृष्ण कुमार यादव

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव !

******आप सभी को नववर्ष-2010 की ढेरों शुभकामनायें******

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।

नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

(हरिवंशराय बच्चन जी के संग्रह सतरंगिनी से साभार)

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

मगर ये जनता चुप है















भ्रष्ट हो गयी दिल्ली की सरकार
मगर ये जनता चुप है।
मजदूरों पर मँहगाई की मार
मगर ये जनता चुप है।

फटी हुई आँखों में कैसे
आयेगें रोटी के सपने,
सत्ता की सीढ़ी पर चढ़कर
भूल गये जनप्रतिनिधि अपने,
राजनीति अब केवल कारोबार
मगर ये जनता चुप है।

भ्रष्टाचार, घोटाले, रिश्वतखोरी,
और वसूली है,
ए0सी0 घर मैं बैठी संसद
जनता का दुःख भूली है,
गँाधी जी के सपने सब बेकार
मगर ये जनता चुप है।

खाद-बीज, पानी की किल्लत
खेतों में पसरा अकाल है,
पंचायत सरपंचों की है।
बिना दवा के अस्पताल है,
नुक्कड़-नुक्कड़ खुलते बीयरबार
मगर ये जनता चुप है।

अंग्रेजों ने जैसे बाँटा
वैसे ही बँटवारा करते,
संविधान की कसमें खाकर
हमको तिल-तिल मारा करते,
बाँट रहे हैं ये मेले-त्योहार
मगर ये जनता चुप है।

सत्ता तो सत्ता, विपक्ष भी
अपनी आँखे खोल रहा क्या?
कलम चलाने वाला कवि भी
दिनकर जैसा बोल रहा क्या?
बता रहे हैं सब कुछ ये अखबार
मगर ये जनता चुप है।

गाँवों का यह देश
मगर गाँवों में निर्धन,
स्विस बैंकों में भरा
दलालों का काला धन
लूट रहे हैं हमको बिग बाजार
मगर ये जनता चुप है।

-जयकृष्ण राय तुषार,63 जी/7, बेली कालोनी,
स्टेनली रोड, इलाहाबाद, मो0- 9415898913

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

आज का सच !!

प्रथम रश्मि का आना
अब किसने है जाना?
पक्षी तो गुम हैं ,
जो हैं,उन्हें आभास नहीं,
दिन चढ़ आया है !
कमरे के अन्दर सुबह खर्राटे लेती है,
१२ बजे आँखें खोलती है,
आधी रात को गुड नाईट करती है!
सारे जोड़-घटाव ,
उल्टे बहाव में हैं ,
जीवन की भागदौड़ में,
सबकुछ उल्टा हो चला है !!

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

अंतर

सारी रात

आँखों की बारिश में

दर्द के ओले गिरते गए ...

उन्हें फोटोग्राफी का जूनून है

लेते गए तस्वीर.....

तस्वीर की बेबस मुस्कान

शर्मीली मुस्कान बनी

लाल आँखें हया का आइना बनी

सब्ज़ ओले बर्फ हो गए.............

हकीकत और चित्र में कितना अंतर होता है

बुधवार, 10 जून 2009

है कोई जवाब तो बताना .....!!

सुनो, खुद को सेकुलर कहने वालों !
कुकुरमुत्ते कभी सड़े खून पर नहीं उगते
पेड़ लाश लटकने के लिए पैदा नहीं होते
लोहा तलवार बनने के लिए नहीं होता
गुजरात हिंसा के लिए बना नहीं
मगर, क्या एक तरफा नजरिया नहीं तुम्हारा
जो घृणा में जन्मा उसने घृणा भोगा
उसमे प्रेम कहाँ सेकुलरों ?

एकतरफा नजरिया इसलिए कि
क्या दंगों में हिन्दू या मुस्लमान मारे जाते हैं ?
नहीं, दंगों में इंसान मारे जाते हैं.
क्या दंगों में भगवा ही लहराता हैं ?
क्यूँ तुम्हे हरा रंग नजर नही आता है ?
अपनी सेकुलर तहजीब का हवाला देने वाले देश में
मकबूल के नाम पर आर्ट गैलरी बनाया जाता है
पर पूछता हूँ , सलमान रुश्दी और तसलीमा को
क्यूँ गरियाया जाता है ?

है कोई जवाब तो बताना ................!!!

जयराम चौधरी , जामिया मिल्लिया इस्लामिया.M:09210907050

शुक्रवार, 1 मई 2009

मताधिकार

लोकतंत्र की इस चकरघिन्नी में
पिसता जाता है आम आदमी
सुबह से शाम तक
भरी धूप में कतार लगाये
वह बाट जोहता है
अपने मताधिकार का
वह जानता भी नहीं
अपने इस अधिकार का मतलब
बस एक औपचारिकता है
जिसे वह पूरी कर आता है
और इस औपचारिकता के बदले
दे देता है अधिकार
चंद लोगों को
अपने ऊपर
राज करने का
जो अपने हिसाब से
इस मताधिकार का अर्थ निकालते हैं
और फिर छोड़ देते हैं
आम आदमी को
इंतजार करने के लिए
अगले मताधिकार का !!!

कृष्ण कुमार यादव
भारत सरकार की सिविल सेवा में अधिकारी होने के साथ-साथ हिंदी साहित्य में भी जबरदस्त दखलंदाजी रखने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कृष्ण कुमार यादव का जन्म १० अगस्त १९७७ को तहबरपुर आज़मगढ़ (उ. प्र.) में हुआ. जवाहर नवोदय विद्यालय जीयनपुर-आज़मगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९९९ में आप राजनीति-शास्त्र में परास्नातक उपाधि प्राप्त हैं. समकालीन हिंदी साहित्य में नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सरिता, नवनीत, आजकल, वर्तमान साहित्य, उत्तर प्रदेश, अकार, लोकायत, गोलकोण्डा दर्पण, उन्नयन, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, आज, द सण्डे इण्डियन, इण्डिया न्यूज, अक्षर पर्व, युग तेवर इत्यादि सहित 200 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं व सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, रचनाकार, लिटरेचर इंडिया, हिंदीनेस्ट, कलायन इत्यादि वेब-पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में रचनाओं का प्रकाशन. अब तक एक काव्य-संकलन "अभिलाषा" सहित दो निबंध-संकलन "अभिव्यक्तियों के बहाने" तथा "अनुभूतियाँ और विमर्श" एवं एक संपादित कृति "क्रांति-यज्ञ" का प्रकाशन. बाल कविताओं एवं कहानियों के संकलन प्रकाशन हेतु प्रेस में. व्यक्तित्व-कृतित्व पर "बाल साहित्य समीक्षा" व "गुफ्तगू" पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. शोधार्थियों हेतु आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक "बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव" शीघ्र प्रकाश्य. आकाशवाणी पर कविताओं के प्रसारण के साथ दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित काव्य-संकलनों में कवितायेँ प्रकाशित. विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित. अभिरुचियों में रचनात्मक लेखन-अध्ययन-चिंतन के साथ-साथ फिलाटेली, पर्यटन व नेट-सर्फिंग भी शामिल. बकौल साहित्य मर्मज्ञ एवं पद्मभूषण गोपाल दास 'नीरज'- " कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्चपदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरंतर बेचैन रहता है. उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व संतुलन है. वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ साहित्यकार हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षड्यंत्रों और पाखंडों का बड़ी मार्मिकता के साथ उदघाटन करते हैं."
सम्प्रति/सम्पर्क: कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्डल, कानपुर
ई-मेल: kkyadav.y@rediffmail.com ब्लॉग: http://www.kkyadav.blogspot.com/

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

अब भी जागो युवा

जब -जब देश में गलत का फैलाव हुआ
हमारा अपनी जमीर से अलगाव हुआ
बेचा खुद के अहसासों को
चांदी के टुकडों की खातिर
गरीबो के पैसों से शेयर
बेचते बाजार के शातिर
हल्का से एक झटका लगा
बड़ा पेड़ कट कर गिरा
हमारी अर्थ जगत की चूल हिल गई
गुरु की गुरुतई काम न आई
तब चेलो की की कैसी प्रभुताई !

फिर भी हम चिल्लाते
अपना गाल बजाते
देश के चंद अमीरों में
खुद को अमीर जतलाते
सोने को जमीं के लाले
चाँद पे जाने का गौरव गाते
खाने को अन्न नहीं पर
अरबों में नेता चुन कर लाते
धन्य हमारा लोकतंत्र
है धन्य हमारा देश स्वतंत्र
है धन्य हमारी जनता
हैं धन्य हमारे नेता
अब, बस बहुत हो चुका
अब भी जागो युवा
जगाओ अंदर के शिवा को
खोलो मन के द्वार
हो जाने दो
एक बार फिर इस जग का उद्धार !!
जयराम चौधरी
jay.choudhary16@gmail.com