सोमवार, 26 जनवरी 2015
युवा ब्लॉगर कृष्ण कुमार यादव भूटान में “परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान’’ से सम्मानित
बुधवार, 4 सितंबर 2013
देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र से सीखने की जरूरत - कृष्ण कुमार यादव
रविवार, 25 मार्च 2012
नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) का जन्म-दिन आज है..
तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार !!
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नाम-अक्षिता (पाखी)
जन्म- 25 मार्च, 2007 (कानपुर)
मूल निवास - तहबरपुर, आजमगढ़ (यू.पी.)
मम्मी-पापा - श्रीमती आकांक्षा – श्री कृष्ण कुमार यादव
अध्ययनरत - के. जी.-II,
रुचियाँ- ड्राइंग, डांसिंग, प्लेयिंग.
प्रकाशन- इंटरनेट पर ब्लागोत्सव-2010, बाल-दुनिया, नन्हा-मन, सरस पायस, ताऊजी डाट काम, युवा-मन इत्यादि एवं चकमक, टाबर टोली, अनंता, सांवली इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में ड्राइंग/रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रकाशन.
प्रसारण- आकाशवाणी पोर्टब्लेयर से ‘बाल-जगत’ कार्यक्रम में प्रसारण.
ब्लॉग :‘पाखी की दुनिया’ का 24 जून, 2009 को आरंभ. इसमें अक्षिता (पाखी) की ड्राइंग, क्रिएटिविटी, फोटो, परिवार और स्कूल की बातें, घूमना-फिरना, बाल-गीत सहित बहुत कुछ शामिल है. 82 से ज्यादा देशों में अब तक देखे/पढ़े जाने वाली ‘पाखी की दुनिया’ का 200 से ज्यादा लोग अनुसरण करते हैं. 235 से ज्यादा प्रविष्टियों से सुसज्जित इस ब्लॉग को 36,500 से ज्यादा लोगों ने पढ़ा/देखा है. दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के अनुसार-‘अक्षिता की उम्र तो बेहद कम है, लेकिन हिन्दी ब्लागिंग में वो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। अक्षिता का ब्लाग बेहद पापुलर है और फिलहाल हिन्दी के टाॅप 100 ब्लॉगों में से एक है।'
विशेष -राजस्थान के वरिष्ठ बाल-साहित्यकार दीन दयाल शर्मा द्वारा अपनी पुस्तक ‘चूं-चूं’ के कवर-पेज पर अक्षिता (पाखी) की फोटो का अंकन. दीन दयाल शर्मा, रावेन्द्र कुमार ‘रवि’, डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, एस. आर. भारती, डा. दुर्गाचरण मिश्र, द्वारा अक्षिता (पाखी) पर केन्द्रित बाल-गीतों/कविता की रचना.
सम्मान- ब्लागोत्सव -2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर “वर्ष की श्रेष्ठ नन्ही ब्लागर ” के रूप में सम्मानित. हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित अन्तराष्ट्रीय ब्लाॅगर्स सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लाॅगर हेतु उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डा0 रमेश पोखरियाल ”निशंक” द्वारा ”हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010” अवार्ड.
बाल दिवस, 14 नवम्बर, 2011 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में महिला और बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ द्वारा राष्ट्रीय बाल पुरस्कार-2011 से पुरस्कृत किया. अक्षिता इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली सबसे कम उम्र की प्रतिभा है. यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया.
पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा-दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, शुक्रवार, टाबर टोली, नेशनल एक्सप्रेस, नवोदित स्वर, बाल साहित्य समीक्षा, बुलंद इण्डिया, शुभ्र ज्योत्स्ना, सांवली, सत्य चक्र, इसमासो, हिंद क्रांति, दि मारल, अयोध्या संवाद, अंडमान-निकोबार द्वीप समाचार, The Indian Express, The Echo of India, The Daily Telegrams, Andaman Sheekha, Andaman Express, Aspect इत्यादि तमाम पत्र-पत्रिकाओं में अक्षिता और ब्लॉग ‘पाखी की दुनिया’ की चर्चा.
अंतर्जाल पर चर्चा- हिंदी मीडिया.इन, स्वतंत्र आवाज़.काम, परिकल्पना, स्वर्गविभा, क्रिएटिव मंच-Creative Manch, बचपन, सरस पायस, बाल-दुनिया, बचपन, शब्द-साहित्य, रैन बसेरा, यदुकुल, Journalist Today, Akhtar Khan Akela इत्यादि तमाम वेब-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर चर्चा.
संपर्क - पुत्री- श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद-211001
ई-मेल- akshita_06@rediffmail.com
ब्लॉग- http://www.pakhi-akshita.blogspot.com/ (पाखी की दुनिया)
शनिवार, 24 सितंबर 2011
ब्लागिंग का 'युवा-मन': अमित कुमार यादव
अमित कुमार यादव : 24 सितम्बर, 1986 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ.प्र.) के एक प्रतिष्ठित परिवार में श्री राम शिव मूर्ति यादव एवं श्रीमती बिमला यादव के सुपुत्र-रूप में जन्म। आरंभिक शिक्षा बाल विद्या मंदिर, तहबरपुर-आजमगढ़, आदर्श जूनियर हाई स्कूल, तहबरपुर-आजमगढ़, राष्ट्रीय इंटर कालेज, तहबरपुर-आजमगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद वि.वि. से 2007में स्नातक और इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से 2010 में लोक प्रशासन में एम.ए.। फ़िलहाल अध्ययन के क्रम में इलाहाबाद और प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी।अध्ययन और लेखन अभिरुचियों में शामिल. सामाजिक-साहित्यिक-सामयिक विषयों पर लिखी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं पढने का शगल, फिर वह चाहे प्रिंटेड हो या अंतर्जाल पर। तमाम पत्र-पत्रिकाओं , पुस्तकों/संकलनों एवं वेब-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं और ब्लॉग पर रचनाएँ प्रकाशित। वर्ष 2005 में 'आउटलुक साप्ताहिक पाठक मंच' का इलाहाबाद में गठन और इसकी गतिविधियों के माध्यम से सक्रिय। जुलाई-2006 में प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका 'आउटलुक' द्वारा एक प्रतियोगिता में पुरस्कृत, जो कि शैक्षणिक गतिविधियों से परे जीवन का प्रथम पुरस्कार। ब्लागिंग में भी सक्रियता और सामुदायिक ब्लॉग "युवा-मन" (http://yuva-jagat.blogspot.com) के माडरेटर। 21 दिसंबर 2008 को आरंभ इस ब्लॉग पर 250 के करीब पोस्ट प्रकाशित और 110 से ज्यादा फालोवर।
ई-मेलः amitky86@rediffmail.com
ब्लॉग : http://yuva-jagat.blogspot.com/ (युवा-मन)
(चित्र में : हिंदी भवन, दिल्ली में 'हिंदी साहित्य निकेतन', परिकल्पना डाट काम, और नुक्कड़ डाट काम द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) की तरफ से उत्तरांचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक', वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामदरश मिश्र, डा. अशोक चक्रधर इत्यादि द्वारा सम्मान ग्रहण करते अमित कुमार यादव)प्रस्तुति : रत्नेश कुमार मौर्य : 'शब्द-साहित्य'
गुरुवार, 14 जनवरी 2010
भारत के पहले मुस्लिम देहदानीः अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’
दान से पुण्य कोई कार्य नहीं होता। दान जहाँ मनुष्य की उदारता का परिचायक है, वहीं यह दूसरों की आजीविका चलाने या किसी सामूहिक कार्य में संकल्पबद्ध होकर अपना योगदान देने की मानवीय प्रवृति को दर्शाता है। राजा हरिश्चन्द्र को उनकी दानवीरता के लिए ही जाना जाता है। महर्षि दधीचि जैसे ऋषिवर ने तो अपनी अस्थियाँ ही मानव के कल्याण हेतु दान कर दीं। महर्षि दधीचि ने मानवता को जो रास्ता दिखाया आज उस पर चलकर तमाम लोग समाज एवं मानव की सेवा में जुटे हुए हैं। देहदान के पवित्र संकल्प द्वारा दूसरों को जीवन देने का जज्बा विरले लोगों में ही देखने को मिलता है। चूँकि मनुष्य के देहान्त पश्चात की परिस्थितियां मानवीय हाथ में नहीं होती, अतः विभिन्न धर्मों में इसे अलग-अलग रूप में व्याख्यायित किया गया है। धर्मों की परिभाषा से परे एक मानव धर्म भी है जो सिखाता है कि जिन्दा होकर किसी व्यक्ति के काम आये तो उत्तम है और यदि मृत्यु के बाद भी आप किसी के काम आये तो अतिउत्तम है।हाल ही में विष्णु प्रभाकर एवं प्रतीक मिश्र जैसे वरेण्य साहित्यकारों ने जिस प्रकार मृत्यु के बाद भी देहदान द्वारा लोगों को शिक्षित एवं जागरुक किया है, वह स्तुत्य है। वस्तुतः आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान व नेत्रदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है। हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है। इसी परम्परा में भारतवर्ष में तमाम लोग नेत्रदान-देहदान की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मरने के बाद हाथी के दांँतांे से कामोत्तेजक औषधियाँ एवं खिलौने, जानवरों की खाल से चमड़ा बनता है, उसी प्रकार से इन्सान भी मृत्यु के बाद 4 नेत्रहीनों को नेत्रज्योति, 14 लोगो को अस्थियाँ व हजारों मेडिकल छात्रों को चिकित्सा शिक्षा दे सकता है। दान की हुई आँखें तीन पीढ़ी तक काम आती हैं। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-
हाथी के दाँत से खिलौने बने भाँति-भाँति
बकरी की खाल भी पानी भर लाई
मगर इंसान की खाल किसी काम न आई
आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है, फिर चाहे वह किसी भी जाति या धर्म के हों। इसी परिपाटी में एक ऐसा युवक उभर कर सामने आया है, जिसने रूढ़ियों को तोड़कर समाज को नई राह दिखाई है। अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’ नामक यह 23 वर्षीय युवक भारत का प्रथम मुस्लिम देहदानी है। मूलतः कायमगंज, जिला फर्रूखाबाद (उ0प्र0) के इस होनहार युवक ने लीक से हटकर धार्मिक मान्यताओं के विपरीत दूसरों के लिए देहदान (नेत्रदान, रक्तदान, अस्थिदान भी) करके इंसानियत की एक नई मिसाल कायम की है। बकौल अरशद मंसूरी-‘‘परम्परागत रूढ़ियों से परे मेरे इस ऐतिहासिक कारनामे से तमाम उलेमा, धार्मिक नेता व कट्टरपंथी वर्ग नाराज हो गये और मेरे इस कार्य का पुरजोर विरोध करने लगे। यही नहीं मेरे खिलाफ फतवा जारी करने की धमकी दे डाली तथा देहदान करने के निर्णय को वापस लेकर माफी मांगने को कहा, किन्तु मैं अपने संकल्प पर दृढ़ रहा और मानव धर्म को सर्वोपरि धर्म बताते हुए इन तथाकथित विरोधियों से भी नेत्रदान व देहदान की मार्मिक अपील कर डाली।‘‘
कानपुर विश्वविद्यालय में बी0फार्मा0 तृतीय वर्ष के मेडिकल छात्र एवं विगत 6 वर्षो से समाजसेवा में समर्पित अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट‘ के देहदान व नेत्रदान कार्यो से उनके रिश्तेदार यहाँ तक कि घर वाले भी खिलाफ हो गये। इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल इण्डिया टीवी का एक प्रेस रिपोर्टर अनिल वर्मा शेखर, जब अरशद मंसूरी का इंटरव्यू लेने उनके घर कायमगंज(फर्रूखाबाद) पहुँचा, तो अरशद के पिता अल्लाहदीन ने उस प्रेस रिपोर्टर को ही अपमानित करके घर से भगा दिया। उन्हें यह डर था कि मीडिया में यह प्रकरण आ जाने से पूरे देश में उनका विराध होने लगेगा और उनके खिलाफ फतवा जारी होने में देर न लगेगी।
फिलहाल अरशद मंसूरी अपने इस नेक कार्य से प्रसन्न हैं एवं मानते हैं कि यह कार्य उन्होंने लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं किया बल्कि इसलिए किया कि लोग (मुस्लिम सम्प्रदाय के व्यक्ति भी) उनसे प्रेरित होकर नेत्रदान व देहदान जैसे पुण्य कार्यो में आगे आयें। आंकड़ों की बदौलत धारदार तर्क देते हुए जब यह नवयुवक कहता है कि- ‘‘हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है और मैंने इसी परिस्थित को देखकर अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर लोगों के हक में देहदान व नेत्रदान का यह फैसला लिया।‘‘ लोगों से मिल रहे प्रोत्साहन से यह नवयुवक अभिभूत है और 'दृष्टि- एक प्रयास' नामक पुस्तक भी लिख रहा है। लोगो के अन्दर खत्म होती इंसानियत को देखकर यह नवयुवक व्यथित हो जाता हैं और कहता है कि डाॅक्टर, इंजीनियर बनने की तरह इंसान को इंसान बनाने के लिए भी शिक्षा देनी चाहिए। अरशद की कर्तव्यनिष्ठा देखकर किसी शायर के शब्द याद आते हैं-
'एक ऐसा मजहब चलाना होगा.
जिसमें इंसान को इंसान बनाना होगा।।'
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
लजीज व्यंजन के साथ पर्यावरण ज्ञान परोसता रेस्टोरेंट
मुंबई निवासी एक सेवानिवृत्त आर्मी अफसर ब्रिगेडियर एसके त्रिखा की 22 वर्षीया इकलौती बेटी निखिला त्रिखा इस अनूठे रेस्टोरेंट की मालिक भी है और वेटर भी। यहां आने वाले हर ग्राहक को लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाने के साथ-साथ अनिवार्य रूप से उसका लेक्चर भी सुनना पड़ता है। रेस्टोरेंट से हो रही कमाई को वह अपनी जरूरतों पर नहीं, बल्कि पर्यावरण को बचाने में खर्च कर रही है। आपदा प्रबंधन और पहाड़ों से युवाओं का पलायन रोकना भी उसके लेक्चर का हिस्सा रहते हैं।
दरअसल, कुछ वर्ष पूर्व निखिला उत्तराखंड भ्रमण पर आई थी, तो यहां पर्यावरण की बदहाल स्थित देख द्रवित हो उठीं। पहाड़ों से बड़े पैमाने पर हो रहे युवाओं के पलायन ने भी उसे झकझोर कर रख दिया। इसी बीच वह अपने एक स्कूलमेट पुष्पेंद्र सिंह रावत के संपर्क में आई और दोनों ने उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण का बीड़ा उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने वर्ष 2007 में 'पीस ट्रस्ट' नामक संस्था का गठन किया, जिसके तहत पुष्पेंद्र विभिन्न स्कूलों में कार्यक्रम प्रस्तुत कर छात्रों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे हैं, जबकि घर-परिवार से दूर आकर निखिला ने जिला मुख्यालय गोपेश्वर से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित घिंघराण गांव में '4875-दि कैफै' नाम का एक रेस्टोरेंट खोला। घिंघराण गांव में एक छोटे से माल्टा के बगीचे में उसने मात्र 16 हजार की लागत से यह रेस्टोरेंट खोला है, जिसमें सूखे पेड़ों की डाटें फर्नीचर के रूप व्यवस्थित हैं। यहां आने वाले ग्राहकों को निखिला आन डिमांड अपने हाथ से बनाए लजीज व्यंजन परोसती हैं, लेकिन बातों-बातों में वो उन्हें पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाना नहीं भूलती। स्टाइल उनका ऐसा कि ग्राहकों की क्लास भी लग जाती है और उन्हें खलती भी नहीं। निखिला कहती हैं कि यदि हम हिमालय को सुरक्षित रखेंगे, तो ही हिमालय भी हमारी सुरक्षा करेगा।
इतना ही नहीं, उनका यह रेस्टोरेंट रोजगार के नाम पर पहाड़ों से पलायन कर रहे युवाओं के लिए भी नजीर है। दो वर्ष के दौरान निखिला और पुष्पेंद्र सारे गांव के आस-पास पांच हजार फूल और फल के पेड़ लगा चुके हैं। इसके अलावा, सिद्घपीठ तुंगनाथ के मार्ग पर भी वे दर्जनों डस्टबिन भी स्थापित कर चुके हैं।
रविवार, 6 सितंबर 2009
ऐतिहासिक रहे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव
उपाध्यक्ष पर एबीवीपी की कृति वढ़ेरा और सचिव पद पर एनएसयूआई की अर्शदीप कौर ने जीत दर्ज की। कृति वढ़ेरा मिरांडा हाउस की और अर्शदीप कौर विधि संकाय की छात्रा हैं। हंसराज कॉलेज की छात्रा और समाजवादी छात्र सभा की उम्मीदवार अनुप्रिया त्यागी संयुक्त सचिव चुनी गई हैं। समाजवादी छात्र सभा ने पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में कोई विजय दर्ज की है.दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में चार में से तीन पदों पर पहली बार महिलाओं ने ही विजय दर्ज की है. ऐसा 60 साल में पहली बार हुआ है.
शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
ब्लोगिंग से युवाओं को जोडें......

गुरुवार, 29 जनवरी 2009
अख़बारों में भी छाया युवा ब्लॉग
रविवार, 21 दिसंबर 2008
युवा होने का राज
आकांक्षा

