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गुरुवार, 6 अगस्त 2009

आज का सच !!

प्रथम रश्मि का आना
अब किसने है जाना?
पक्षी तो गुम हैं ,
जो हैं,उन्हें आभास नहीं,
दिन चढ़ आया है !
कमरे के अन्दर सुबह खर्राटे लेती है,
१२ बजे आँखें खोलती है,
आधी रात को गुड नाईट करती है!
सारे जोड़-घटाव ,
उल्टे बहाव में हैं ,
जीवन की भागदौड़ में,
सबकुछ उल्टा हो चला है !!

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

अंतर

सारी रात

आँखों की बारिश में

दर्द के ओले गिरते गए ...

उन्हें फोटोग्राफी का जूनून है

लेते गए तस्वीर.....

तस्वीर की बेबस मुस्कान

शर्मीली मुस्कान बनी

लाल आँखें हया का आइना बनी

सब्ज़ ओले बर्फ हो गए.............

हकीकत और चित्र में कितना अंतर होता है

रविवार, 11 जनवरी 2009

आलोचना होती रही है.......



सतयुग हो,द्वापरयुग या कलयुग!

आलोचना होती रही है॥

राम ने राज्य का परित्याग किया,

पिता के वचन को उनकी आज्ञा मान-

कैकेयी का मान रखा,

१४ वर्ष का वनवास लिया..............

सीता के मनुहार में,

स्वर्ण-मृग का पीछा किया,

सीता हरण से व्याकुल रावण का संहार किया,

फिर प्रजा हितबध होकर ,

सारे सुखों का त्याग किया...........................

कृष्ण ने राम से अलग दिखाई नीति,

लीला के संग छल का जवाब दिया छल से

'महाभारत' के पहले-कुरुक्षेत्र का दृश्य दिखाया,

दुर्योधन से संधि-प्रस्ताव रखा,

स्वयं और पूरी सेना का चयन भीउसके हाथ दिया-

दुर्योधन ने जाना इसे कृष्ण की कमजोरी,

ग्वाले को बाँध लेने की ध्रिष्ठता दिखलाई...

कृष्ण ने विराट रूप लिया,

महाभारत के रूप में,

रिश्तों का रक्त तांडव चला...

फिर आया कलयुग!

१०० वर्षों की गुलामी का चक्र चला-

गाँधी का सत्याग्रह ,नेहरू की भक्ति,भगत सिंह का खून शिराओं में दौड़ा ......

एक नहीं,दो नहीं-पूरे १०० वर्ष,

शहीदों की भरमार हो गई,

जाने-अनजाने कितने नाम मिट गए-

'वंदे-मातरम्' की आन पर!

हुए आजाद हम अपने घर में,१०० वर्षों के

बादऔर जन-गण-मन का सम्मान मिला...........

सतयुग गया,गया द्वापर युग,हुए आजादी के ६० साल........

स्वर उभरे-

राम की आलोचना,

कृष्ण की आलोचना,

गाँधी की खामियां...दिखाई देने लगीं-

क्या करना था राम को,या श्री कृष्ण को,या गाँधी को.............

इसकी चर्चा चली!

आलोचकों का क्या है,

आलोचना करते रहेंगे...

आलोचना करने में वक्त नहीं लगता,

राम,कृष्ण,गाँधी बनने को,

जीवन का पल दूसरो को देना होता है,

मर्यादा,सत्य,स्वतन्त्रता कीराहों को सींचना होता है...

गर डरते हो आलोचनाओं से,

देवदार नहीं बन सकते हो,

नहीं संभव है फिर चक्र घुमाना-

सतयुग नहीं ला सकते हो!!!!!!!!!!!!

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

बीती कहानी बंद करो........



इति यानि बीती........

हास यानि कहानी...

बीती कहानी बंद करो!

नहीं जानना -वंदे मातरम् की लहर के बारे में,

नहीं सुनना -'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल....

'नहीं सुनना-'फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल....

'नहीं जानना-ईस्ट इंडिया कंपनी कब आई!

कब अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया!

कहना है तो कहो-आज कौन आतंक बनकर आया है!

और अब कौन गाँधी है?कौन नेहरू?कौन भगत सिंह ?

वंदे मातरम् की गूंजकिनकी रगों में आज है?

अरे यहाँ तो अपने घर सेकोई किसी को देश की खातिर नहीं भेजता

( गिने-चुनों को छोड़कर )

जो भेजते हैंउनसे कहते हैं,'एक बेटा-क्यूँ भेज दिया?

'क्या सोच है!........ऐसे में किसकी राह देख रहे हैं देश के लिए?

देश?जहाँ से विदेश जाने की होड़ है..........

एक सर शर्म से झुका है,'हम अब तक विदेश नहीं जा पाए,

'दूसरी तरफ़ गर्वीला स्वर,'विदेश में नौकरी लग गई है'........

भारत - यानि अपनी माँ को प्रायः सब भूल गए हैं

तो -बीती कहानी बंद करो!!!!!!!!

शनिवार, 3 जनवरी 2009

कहाँ आ गए?????????

अमाँ किस वतन के हो?
किस समाज का ज़िक्र करते हो?
जहाँ समानता के नाम पर,
फैशन की अंधी दौड़ में,
बेटियाँ नग्नता की सीमा पार कर गयीं...
पुरूष की बराबरी में,
औंधे मुंह गिरी पड़ी हैं!
शर्म तो बुजुर्गों को आने लगी है,
और चन्द उन युवाओं को -
जिनके पास मान्यताएं बची हैं.......
कौन बहन है,कौन पत्नी,
कौन प्रेयसी,कौन बहू !
वाकई समानता का परचम लहरा रहा है!
समानता की आड़ में
सबकुछ सरेआम हो गया है!
झुकी पलकों का कोई अर्थ नहीं रहा,
चेहरे की लालिमा बनावटी हो गई!
या खुदा!
ये कहाँ आ गए हम?!?

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

ख़ुद का आह्वान करो

हम किसे आवाज़ देते हैं?
और क्यूँ?
क्या हम में वो दम नहीं,
जो हवाओं के रुख बदल डाले,
सरफरोशी के जज्बातों को नए आयाम दे जाए,
जो -अन्याय की बढती आंधी को मिटा सके...........
अपने हौसले, अपने जज्बे को बाहर लाओ,
भगत सिंह, सुखदेव कहीं और नहीं
तुम सब के दिलों में हैं,
उन्हें बाहर लाओ...........
बम विस्फोट कोई गुफ्तगू नहीं,
दुश्मनों की सोची-समझी चाल है,
उसे निरस्त करो,
ख़ुद का आह्वान करो,
ख़ुद को पहचानो,
भारत की रक्षा करो !...........
रश्मि प्रभा
rasprabha@gmail.com