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गुरुवार, 1 जुलाई 2010

ये पहेली सुलझाइए


जरा आप भी बताइए कि इस चित्र में किन 10 राजनेताओं के चेहरे छुपे हुए हैं।

!! मैं तो कन्फ्युजड हूँ, अब आपकी बारी है !!

सोमवार, 3 मई 2010

युवाओं से...


आकाश में उड़ान लेते वक्त
तेरे मजबूत कंधे पर
आकाश भार ले
तू कल का भविष्य
देश का वर्तमान आधार
कर्तबगार........

तू परिवर्तनशील समाज दायरे का
मध्यबिंदु
तू क्रांति के सपनों का
साध्यबिंदु....

तेरे रग-रग में बहती खून की
गरमी
तेरे रोम-रोम में जवानी जोशीली
सहमी-सहमी....

तुझे असत्यं का पर्दाफाश करना है
सत्यम शिवम् सुंदरम से
तुझे भ्रष्टाचार का तम मिटाना हैं
क्रांति की मशाल से.......
अब तुझे से ही आशा है
तुझे देश की धारा में बहना है !!

मीना खोंड, हैदराबाद

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

प्यार का महीना : फरवरी

क्या आप जानते हैं कि फरवरी महीना प्यार को समर्पित है। ’रोज डे’ से शुरू ’मिसिंग डे’ पर खत्म और बीच में मनभावन 'वैलेंटाइन डे'। वस्तुत : फरवरी में दिवस मनाने की शुरूआत सात तारीख से ही हो जाती है जब ’रोज डे’ :गुलाब दिवस: पड़ता है। इससे आगे 20 फरवरी तक दिवस आयोजन की भरमार होती है।किसी को प्रपोज करने के लिए आठ फरवरी को ’प्रपोज डे’ पड़ता है तो नौ फरवरी को चॉकलेट डे पड़ता है। 10 फरवरी जहां ’टेडी डे’ कहलाती है वहीं 11 फरवरी का दिन किसी से वायदा करने या किसी से वायदा कराने का दिन यानी कि ’प्रॉमिस डे’ कहलाता है।दिवसों की यह सूची यहीं समाप्त नहीं हो जाती। 'प्रामिस डे’ के बाद बारी आती है ’किस डे’ की जो 12 फरवरी को पड़ता है। 13 फरवरी हो ’हग डे’ होता है तो 14 फरवरी को युवाओं के दिलों की धड़कन कहा जाने वाला ’वैलेंटाइन डे’ पड़ता है।

वैलेंटाइन डे जहां प्यार की पींगें बढ़ाने का दिन है वहीं इसके एक दिन बाद यानी कि 15 फरवरी को ’थप्पड़’ मारने का दिन ’स्लैप डे’ होता है।बात यहां से आगे बढ़कर 20 फरवरी तक पहुंच जाती है जब किसी को याद करने के लिए ’मिसिंग डे’ मनाया जाता है।वास्तव में फरवरी माह युवाओं के लिए सबसे पसंदीदा महीना होता है। यह न सिर्फ उन्हें ’वैलेंटाइन डे’ पर प्यार के इजहार का मौका देता है बल्कि इसके अतिरिक्त भी कई और दिवस आयोजनों का मौका प्रदान करता है। तो आप भी इस माह वसंत की बगिया में प्यार की बौछार करते रहें...!!

शनिवार, 19 सितंबर 2009

नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें !!

!! नवरात्र पर नव-सृजन की ओर तत्पर हों !!
***नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें ***

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

बढ़ते चरण शिखर की ओर: एक विहंगावलोकन

साहित्य और साहित्यकार दोनों एक ही नव निर्माण प्रक्रिया के दो पहलू होते हैं। इस दृष्टि से किसी भी साहित्यकार के कृतित्व के अध्ययन के लिए उसके व्यक्तित्व का अध्ययन महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि सर्जक व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक घटनाएँ जैसे पूर्व संस्कार, बचपन के संस्कार, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक इत्यादि का कलाकार एवं सर्जक के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति अगर साहित्यकार हो तो उसके कृतित्व में किसी न किसी रूप में उसके व्यक्तित्व की झलक स्पष्ट दिखाई दे जाती है। इन स्थितियों के लिये तत्कालीन देश, काल एवं वातावरण की अहम् भूमिका होती है। दुर्गाचरण मिश्र द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ को इसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की आवश्यकता है।

32 वर्षीय युवा कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक सेवा के उच्च पदस्थ अधिकारी हैं, कवि हैं, कहानीकार हैं, निबंधकार हैं, बाल साहित्यकार हैं, संपादन कला में भी दक्ष हैं। अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ वह प्रकृति-प्रेमी, पर्यटक, समाजसेवी, स्वाध्याय प्रेमी, संगीत श्रोता, स्नेही मित्र और कुशल प्रशासक भी हैं। उनके लिए साहित्य मात्र उत्सवधर्मिता का परिचायक नहीं बल्कि उसके माध्यम से वे जीवन के रंगों और उसमें व्याप्त आनंद की खोज व अन्वेषण करते हैं। अपने इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण कृष्ण कुमार अपनी जीवन-संगिनी आकांक्षा के वरेण्य बने हुए हैं। बेटी के प्रति वात्सल्य-वर्षण में दम्पति युग्म प्रतिस्पर्धी है। कृष्ण कुमार का व्यक्तित्व पिताश्री की कर्तव्यनिष्ठा, अध्ययन, अभिरुचि, लेखन का अभ्यास, लक्ष्य प्राप्ति हेतु अथक प्रयास तथा सरलमना ममतामयी माँ के उत्सर्ग-परायण अन्तःकरण का सुखद समन्वय प्रतीत होता है। उनका प्रियदर्शन व्यक्तित्व सर्वाधिक आकर्षक एवं सम्मोहक है। प्रसाद जी की पंक्ति याद आती है-
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
एक लम्बी काया उन्मुक्त।

‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘ में कृष्ण कुमार के समग्र साहित्यिक कृतित्व का मूल्यांकन किया गया है। विद्वान समीक्षकों ने विभिन्न विधाओं में सृजित श्री यादव की रचनाओं की मुक्तकण्ठ से सराहना की है। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकारों की प्रतिबद्धता, परिवारिक रिश्तों की मिठास, भारतीय संस्कृति के प्रेरक आदर्श, दलितों-शोषितों के प्रति सहज सहानुभूति, ममतामयी नारी के उदात्त एवं दयनीय जीवन के विविध रूप, बाल-मन की सरलता-तरलता, राष्ट्र की अस्मिता-रक्षा हेतु प्राणोत्सर्ग करने वाले क्रान्तिवीरों के प्रति प्रणति, भ्रष्टाचार को नकारने का उद्दाम आक्रोश, उपलब्धियों की बुलन्दियों पर पहुँचने का अदम्य उत्साह और इन सबसे परे उनका मानवतावादी जीवन-दर्शन यत्र-तत्र-सर्वत्र लक्षित होता है। उनकी कविताएंँ, कहानियाँ, निबन्ध, बाल साहित्य, इतिहास लेखन सभी उनकी संवेदनशीलता, वैचारिक उत्कर्ष, ओजपूर्ण मनस्विता एवं मानवतावादी जीवन-दर्शन का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। पुस्तक के सुधी संपादक साहित्यकार दुर्गा चरण मिश्र के द्वारा कृष्ण कुमार यादव के बहुआयामी व्यक्तित्व पर आधारित मूल्यांकनपरक आलेखों, विद्वतजनों की सार्थक टिप्पणियों एवं श्री यादव की जीवन-गाथा सहेजती अट्ठासी छन्दों में विस्तारित कविता द्वारा इसे पठनीय एवं संग्रहणीय बनाने का प्रयास निःसंदेह सराहनीय है। प्रस्तुत पुस्तक कृष्ण कुमार यादव के प्रति समर्पित महत्वपूर्ण महानुभावों की भाव-सुमनांजलि से सुवासित है।

‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘ में कृष्ण कुमार यादव की रचनाओं के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों की सम्मतियाँ उल्लेखनीय हैं। ये सम्मतियाँ उनकी रचनाधर्मिता के साथ-साथ व्यक्तित्व को भी विस्तार देती हैं। पुस्तक की भूमिका में प्रसिद्ध समालोचक सेवक वात्स्यायन लिखते हैं कि कृष्ण कुमार यादव अपने जीवन के अभी पूरे-पूरे तीन दशक ही देख सके हैं कि उनकी मेधा और निष्ठामय श्रम के उदात्त उदाहरण व्यवहारवादी जीवन-दर्शन से लेकर, सिद्धान्त-भूमियों से लेकर भावमय संसार तक प्रस्थित हो उठे हैं। उन्होंने साहित्य-जगत् में भी विविध आयामों में, विविध सोपानों में अपनी प्रतिभा-राशि का आंशिक और समुच्चयित किरण-विकीर्णन प्रस्तुत कर चमत्कृत भी किया है और भावाभिभूत भी। जानेमाने गीतकार व साहित्यकार गोपालदास ‘नीरज‘, कृष्ण कुमार यादव की रचनाओं में बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व संतुलन महसूस करते हंै तो प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित के मत में कृष्ण कुमार के पास पर्याप्त भाव-सम्पदा है, जागृत संवेदना है, सक्षम काव्य-भाषा है और खुला आकाश है। डाॅ0 रामदरश मिश्र का अभिमत है कि कृष्ण कुमार की कविताएं सहज हैं, पारदर्शी हैं, अपने समय के सवालों और विसंगतियों से रूबरू हैं। चर्चित कवि यश मालवीय श्री यादव को उनके विभाग की भावभूमि से जोड़ते हुए लिखते हैं कि वास्तव में अपने रचना-कर्म में कृष्ण कुमार चिट्ठीरसा ही लगते हैं, जीवन और जगत को भावनाओं कल्पनाओं की रसभीनी चिट्ठी इधर से उधर पहुँचाते हुए। डाॅ0 गणेश दत्त सारस्वत उनकी निबंध-कला पर जोर देते हुए कहते हैं कि- कृष्ण कुमार के निबन्ध अनुभूतिपरक हैं, चिन्तन प्रधान हंै तथा दार्शनिकता का पुट लिए हुए हैं इसलिए सर्वस्पर्शी हैं। इससे परे डाॅ0 रामस्वरूप त्रिपाठी श्री यादव की रचनाओं में विमर्शों को खंगालते हुए व्यक्त करते हैं कि-स्त्री-विमर्श का यथार्थ, दलित चेतना की सोच कृष्ण कुमार की कविताओं में वर्तमान का सत्य बनकर उभरी हैं। वरिष्ठ कथाकार गोवर्धन यादव के मत में कृष्ण कुमार की कहानियों में प्रेम की मासूमियत, अन्तद्र्वन्द्व, व्यवस्था की विसंगतियाँ व समसामयिक घटनाओं के बहाने समकालीन सरोकारों को भी उकेरा गया है। आकांक्षा यादव तो रचनाधर्मिता को श्री यादव के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग रूप में देखती हैं। रविनंदन सिंह इसे आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं कि युवा कवि कृष्ण कुमार यादव ने नारी चेतना को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर ग्रहण किया है। श्री यादव की रचनाओं पर साहित्यकारों की ही नहीं समाजसेवियों और राजनेताओं की भी दृष्टि गयी है। बतौर केन्द्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल-‘क्रान्ति यज्ञ‘ एक पुस्तक नहीं, बल्कि अपने आप में एक शोध ग्रन्थ है।

‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘ में कृष्ण कुमार यादव के जन्म से लेकर आज तक के 32 वर्षीय विकास-क्रम को शब्द-शिल्प से सजाया गया है। कृष्ण कुमार की कलम विद्यार्थी जीवन से ही चलने लगी। ‘हम नवोदय के बच्चे‘ बाल गीत से आरम्भ हुआ उनका काव्य सृजन कब और कैसे बढ़ता गया पता ही नहीं चला। कभी कल्पनाओं में, कभी प्रकृति के सौंदर्य तो कभी जीवन की सच्चाईयों व बहुरंगे अनुभवों से गुजरती हुई कविता इलाहाबाद में अध्ययन के दौरान गद्य की ओर भी उन्मुख हुई। नवोदय विद्यालय का अल्हड़ किशोर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान देश-विदेश की गतिविधियों में रूचि लेने वाला जागरूक युवा छात्र बनकर उभरता है। पिताश्री के सपनों को साकार करने हेतु सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में डूब जाता है और अपने आत्म-विश्वास के अनुरूप प्रथम प्रयास में ही सफलता अर्जित कर भारतीय डाक सेवा का उच्चाधिकारी बनता है। साहित्य-सृजन के लिए कलम उठाता है तो अल्पावधि में ही भारत की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में बहार बनकर छा जाता है। जीवन-संगिनी मिलती है वह भी कलम की सिपहसालार। ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण कुमार ने जो भी सपना देखा, परमात्मा ने उसे अविलम्ब साकार कर दिया। उनकी बतरस की बाँसुरी से ऐसी मधुर एवं सुरीली स्वर लहरी प्रवाहित होती है कि श्रोता के पास रससिक्त होने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं बचता।

कभी-कभी लगता है जैसे कृष्ण कुमार अपने नाम को सार्थक करने की आकांक्षा से प्रतिपल अनुप्राणित हैं। जीवन और जगत की विसंगतियों से टक्कर लेने की संवेदनशील छटपटाहट है। पुस्तक के संपादक दुर्गाचरण मिश्र जी ने कृष्ण कुमार यादव की रचनाओं के पृष्ठ भी इसके साथ संलग्न कर लिए होते, तो एक नयी काव्य-विधा का ‘कुमार कृष्णायन‘ बनकर तैयार हो जाता। खैर, महाभारत जैसी रचनाएं तो शनैः शनैः अपना आकार-विस्तार प्राप्त करती हैं। अन्त में मैं कृष्ण कुमार यादव के कृतित्व को अपनी भाव-सुमनांजलि अर्पित करते हुए एक श्लोक उद्धृत करने की अनुमति चाहता हूँ।
जयन्ति ते सृकृतिनः रससिद्धाः कवीश्वराः।
नास्तियेषां यशःकाये जरामरणजं भयम्।।

कृतिः बढ़ते चरण शिखर की ओर सम्पादकः दुर्गाचरण मिश्र, पृष्ठः 148 मूल्यः रू0 150 संस्करणः 2009 प्रकाशकः उमेश प्रकाशन, 100, लूकरगंज, इलाहाबाद समीक्षकः राजकुमार अवस्थी, प्रधानाचार्य (से0नि0), नरवल, कानपुर-209401

रविवार, 6 सितंबर 2009

ऐतिहासिक रहे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव इस बार ऐतिहासिक रहे. 18 वर्षो के बाद अध्यक्ष पद पर जहाँ निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है, वहीँ चार में से तीन पदों पर पहली बार महिलाओं ने ही विजय दर्ज की है.इसी प्रकार समाजवादी छात्र सभा ने पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में कोई विजय दर्ज की है.अध्यक्ष पद पर बौद्ध अध्ययन विभाग के छात्र मनोज चौधरी चुने गए हैं। उन्होंने ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के बजिंदर सिंह को 11 मतों से हराया। इससे पहले 1991 में निर्दलीय उम्मीदवार राजीव गोस्वामी डूसू से अध्यक्ष बने थे। उन्होंने 1990 में पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के विरोध में आत्मदाह की कोशिश की थी। गौरतलब है की शीर्ष पद के लिए एबीवीपी और एनएसयूआई के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया गया था।

उपाध्यक्ष पर एबीवीपी की कृति वढ़ेरा और सचिव पद पर एनएसयूआई की अर्शदीप कौर ने जीत दर्ज की। कृति वढ़ेरा मिरांडा हाउस की और अर्शदीप कौर विधि संकाय की छात्रा हैं। हंसराज कॉलेज की छात्रा और समाजवादी छात्र सभा की उम्मीदवार अनुप्रिया त्यागी संयुक्त सचिव चुनी गई हैं। समाजवादी छात्र सभा ने पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में कोई विजय दर्ज की है.दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में चार में से तीन पदों पर पहली बार महिलाओं ने ही विजय दर्ज की है. ऐसा 60 साल में पहली बार हुआ है.

रविवार, 21 जून 2009

फादर्स-डे

आज समूचे विश्व में फादर्स-डे मनाया जा रहा है। जून माह के तीसरे रविवार को फादर्स डे के रूप में मनाया जाता है। विश्व भर में देश और भाषा भले ही अलग हों लेकिन पिता का ओहदा सब जगह ऊंचा है। विश्व में 130 भाषाओं में पिता के लिए अलग-अलग शब्द प्रयोग होते हैं। कुछ प्रमुख भाषाओं में पिता के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द इस प्रकार हैं:
हिंदी : पिता जी
संस्कृत : जनक
अफ्रीकन : वदर
अरब : अब्बी
बांग्लादेश : अब्बा
ब्राजील : पाई
डच : पापा, पानी
इंग्लिश : फादर, डैड, डैडी, पॉप
फ्रेंच : पापा
जर्मन : पपी
हंगेरियन : अपा
इंडोनेशिया : बापा, पैब
इटली : बब्बो
जापान : ओटोसान
लैटिन : पटर, अटटा
केन्या : बाबा
नेपाल : बुवा
पर्सियन : बाबा, पितर
पुर्तगाल : पाई
रशियन : पापा
स्पेनिश : टाटा
स्वीडिश : पप्पा
तुर्किश : बाबा

सोमवार, 1 जून 2009

घर बैठे हो सकेगा एचआईवी परीक्षण

युवा वर्ग एचआईवी संक्रमण को लेकर सदैव सशंकित रहता है। ऐसे में उसके लिए एक अच्छी ख़बर यह है कि एचआईवी संक्रमण का परीक्षण अब घर बैठे किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सिस्टम विकसित किया है, जिससे बिना प्रयोगशाला में जाए और कम दामों में एचआईवी संक्रमण का परीक्षण किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों का दावा है कि नए सिस्टम से सिर्फ 30 मिनट में मरीज यह जान सकेंगे कि वे एचआईवी विषाणु से संक्रमित तो नहीं हैं और इसके लिए प्रयोगशाला में जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने सीडी4 रेपिड परीक्षण सिस्टम का विकास किया है, जिससे व्यक्ति के रक्त में सीडी4प्लस टी कोशिकाओं की संख्या की गणना की जा सकेगी। यह कोशिकाएं शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं। एचआईवी संक्रमण के दौरान यह कोशिकाएं बड़ी संख्या में नष्ट होने लगती हैं, जिससे व्यक्ति आसानी से बीमारियों की चपेट में आ जाता है। शोध में कहा गया है कि बड़ी संख्या में एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त मरीज विकासशील देशों के ऐसे लोग हैं, जो प्रयोगशाला में किया जाने वाला महंगा सीडी4 परीक्षण नहीं करा पाते। वहीं इस परीक्षण का परिणाम आने में कई सप्ताह का समय लगता है, जिसके चलते ग्रामीण इलाकों के मरीजों के लिए यह प्रक्रिया आसान नहीं होती। नया सिस्टम इस परेशानी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

सोमवार, 4 मई 2009

युवा धडकनों के लिए अब ‘किस फोन‘

मोबाइल फोन ने लोगों के बीच संचार एवं संवाद आसान कर दिया है। पर मोबाइल तकनीक के ऊपर सदैव यह आरोप लगाया जाता रहा है कि इसने लोगों की संवेदनाओं को खत्म कर दिया है। ऐसे में लोग एक दूसरे से सिर्फ मोबाइल के जरिए ही काल, एस0एम0एस0 और कभी-कभी तो मिस्ड काल करके ही छुट्टी पा लेते हैं। टेक्नालोजी के रहनुमाओं को अब यह बात समझ में आने लगी है कि भावनाओं को भी तकनीक से जोड़ा जाना चाहिए। ऐसे में लोगों के लिए एक दिलचस्प आइडिया है-‘किस फोन‘। जल्द ही प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को ‘किस फोन‘ के जरिए अपना प्यार या ‘लव बाइट‘ भेज सकेंगे। इस फोन का डिजाइन ‘फ्रीलांस निर्माता‘ जाॅर्ज कोसोरोस ने तैयार किया है। हाल ही में उन्होंने ‘किसफोन‘ का प्रोटोटाइप जारी किया। इस कलरफुल मोबाइल में बड़े आकार के होंठ बने हैं, जिन पर किस करने से लाइन के दूसरी तरफ बैठे व्यक्ति तक वही ‘लव बाइट‘ पहुंचेगी।

इस फोन में प्रेमी अपने मुँह के दबाव से ‘लव बाइट‘ देता है, तो वह दूसरी तरफ वाले व्यक्ति के पास ट्रांसमिट हो जाती है। हालांकि इसके लिए दोनों व्यक्तियों के पास यह ‘किस फोन‘ होना चाहिए। यह फोन ऐसे लोगों के लिए ‘लव गिट‘ से कम नहीं है, जो एक-दूसरे से दूर रहते हैं और जिन्हें अपने साथी को आलिंगन करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। ‘किस फोन‘ के फायदे तो हैं पर उस स्थिति की भी सोचिए जब यह रांग नंबर पर लग जाए। फिलहाल इंतजार कीजिए इस फोन के बाजार में उतरने का.........।

मंगलवार, 3 मार्च 2009

२९ वर्ष की आयु में ही ग्राहम बेल ने किया टेलीफोन का अविष्कार

दुनिया में हर खोज के पीछे युवाओं की महती भूमिका रही है। नौजवानी का जज्बा लोगों की कल्पनाशीलता में जहाँ रंग भरता है, वहीँ कुछ कर दिखने का हौसला भी देता है। संचार क्रांति के इस दौर में टेलीफोन अपरिहार्य बन चुका है। जिसे देखो वही फ़ोन से चिपका हुआ है। पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि दुनिया में संचार क्रांति लाने वाले इस क्रन्तिकारी टेलीफोन के आविष्कारक महान वैज्ञानिक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने सिर्फ 29 साल की ही उम्र में ही 1876 में टेलीफोन की खोज कर ली थी। इसके एक साल बाद ही 1877 में उन्होंने बेल टेलीफोन कंपनी की स्थापना की। इसके बाद वह लगातार विभिन्न प्रकार की खोजों में लगे रहे। बेल टेलीफोन की खोज के बाद उसमें सुधार के लिए प्रयासरत रहे और 1915 में पहली बार टेलीफोन के जरिए हजारों किलोमीटर की दूरी से बात की। न्यूयार्क टाइम्स ने इस घटना को काफी प्रमुखता देते हुए इसका ब्यौरा प्रकाशित किया था। इसमें न्यूयार्क में बैठे बेल ने सैनफ्रांसिस्को में बैठे अपने सहयोगी वाटसन से बातचीत की थी। तीन मार्च 1847 को स्काटलैंड में पैदा हुए ग्राहम बेल शुरू से ही जिज्ञासु प्रवृति के थे और अपने विभिन्न प्रकार के विचारों को अमली जामा पहनाने के लिए लगे रहते थे। इसके अलावा उनकी विभिन्न खोजों पर उनके निजी अनुभवों का भी प्रभाव था। उदाहरण के तौर पर जब उनके नवजात पुत्र की सांस की समस्याओं के कारण मौत हो गई तो उन्होंने एक मेटल वैक्यूम जैकेट तैयार किया जिससे सांस लेने में आसानी होती थी। उनका यह उपकरण 1950 तक काफी लोकप्रिय रहा और बाद के दिनों में इसमें और सुधार किया गया। अपने आसपास कई लोगों को बोलने एवं सुनने में कठिनाई होते देख उन्होंने इस दिशा में भी अपना ध्यान दिया और सुनने की समस्या के आकलन के लिए आडियोमीटर की खोज की। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के अलावा वैकल्पिक ऊर्जा और समुद्र के पानी से नमक हटाने की दिशा में भी काम किया।ग्राहम बेल की कई क्षेत्रों में एक साथ दिलचस्पी थी और वह काफी देर तक अध्ययनशील रहते थे। वह देर तक इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका पढ़ते थे। आज ग्राहम बेल के नाम 18 पेटेंट दर्ज हैं। इसके अलावा 12 पेटेंट उनके सहयोगियों के साथ दर्ज हैं। इन पेटेंटों में टेलीफोन, फोटोफोन, फोनोग्राफ और टेलीग्राफ शामिल हैं। उन्होंने आइसबर्ग का पता लगाने वाला एक उपकरण भी बनाया था, जिससे समुद्री यात्रा करने वाले नाविकों खासकर अत्यधिक ठंडे प्रदेशों में को विशेष मदद मिली। यही नहीं ग्राहम बेल ने चिकित्सा के क्षेत्र में भी काफी काम किया। सांस लेने के लिए उपयोगी उपकरण के साथ ही मूक बधिर लोगों की समस्या दूर करने के लिए काम किया। उन्होंने वैमानिकी के क्षेत्र में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है। मेटल डिटेक्टर जो आज आतंकवाद सहित अन्य प्रकार के अपराधों से लड़ने में कारगर उपकरण साबित हो रहा है, का अविष्कार भी ग्राहम बेल की ही देन है।ग्राहम बेल को अपने जीवन में कई पुरस्कार और सम्मान मिले। इन पुरस्कारों में से एक था फ्रांस का वोल्टा सम्मान जो उन्हें टेलीफोन की खोज के लिए दिया गया था। इस पुरस्कार की स्थापना नेपोलियन बोनापार्ट ने भौतिकीविद अलेस्रांद्रो वोल्टा के सम्मान में की थी। वोल्टा ने बैट्री को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी। बेल ने इस पुरस्कार में मिली विशाल राशि का उपयोग वोल्टा फंड, वोल्टा लैबोरेट्रीज और वोल्टा ब्यूरो सहित अन्य संस्थाओं की स्थापना में की ताकि नई खोज के कार्य को गति मिल सके। इस महान वैज्ञानिक का निधन दो अगस्त 1922 को हो गया, पर अपनी महान खोजों से जनमानस में वे सदैव जिन्दा रहेंगें। आज उनकी जयंती पर हम उनका पुण्य-स्मरण करते हैं और उनके युवा जज्बे को सलाम करते हैं !!

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ऋतुराज वसंत का आगमन

ऋतुराज वसंत के आगमन के साथ ही सब कुछ बदला-बदला नज़र आता है. फिजा में रोमांस का जुनून छाने लगता है. मात्र मानव ही नहीं पूरी प्रकृति वसंत के आगोश में समा जानी चाहती है. प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिझाने लगता है, कवि की अभिव्यक्ति परवान चढ़ने लगती है, पेडों पर नए पत्ते दिखने लगते हैं,रंग-बिरंगे फूल खिलने लगते हैं, तितलियाँ उन पर मंडराने लगती हैं, हमारी संवेदनाएं ताजगी से भर उठती हैं. वसंत-पंचमी का आगाज़ सरस्वती जी की आराधना से आरम्भ होता है तो निराला जी की जयंती भी अब इस मस्तमौले वसंत के आगाज़ के साथ ही मनाये जानी लगी है. आज के सबसे प्रसिद्द गीतकार गोपाल दास 'नीरज'' जी की जन्म-तिथि भी इसी दौरान पड़ती है. पाश्चात्य देशों से तैरता-तैरता आया वैलेंटाइन डे की खुमारी भी इन दिनों अपने शवाब पर होती है. यूँ ही वसंत को ऋतुराज नहीं कहा गया है. फ़िलहाल यह मेरा सबसे पसंदीदा मौसम है और शायद आपका भी. तो आइये इसे जी भर कर जी लेते हैं. पता नहीं कब यह ख़त्म हो जाय. जिस तरह से पारिस्थितिक असंतुलन पैदा हो रहा है, उसमें सदैव यह भय बना रहता है कि ऋतुराज कितने दिन के मेहमान हैं !!!

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

दोस्ती बनाम प्रेम

पिछले दिनों कॉलेज कैम्पस में दोस्तों के संग बैठी थी। अचानक एक दोस्त ने बड़ा अजीब सा सवाल उछाल दिया-''क्या लड़कियों से प्रेम ही किया जा सकता है, दोस्ती नहीं ?''....पहले तो यह सवाल अटपटा सा लगा, फिर लगा कि इसमें दम है. आखिर समाज लड़का-लड़की के सम्बन्ध को उसी परम्परागत नजरिये से क्यों देखता है. इक्कीसवीं सदी में आकर हम बड़ी-बड़ी बातें भले ही करने लगे हों, विकास के सारे रस्ते खुल गए हों, पर समाज अभी भी लड़का-लड़की के सम्बन्ध को एक सामान्य बात मानने को तैयार नहीं होता. वह इसमें 'चक्कर' वाला लफड़ा खोजता रहता है. मुझे लगता है कि आधुनिक दौर में जहाँ एक ओर सहशिक्षा है, वहीं लड़के-लड़कियाँ एक ही साथ नौकरी भी कर रहे हैं। ऐसे में विभिन्न क्रियाकलापों में उन्हें एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। जिसके लिये उनमें मित्रता भाव होना जरूरी है। यह जरूरी नहीं कि ऐसे सभी मित्रों से प्रेम ही किया जाय क्योंकि प्रेम एक आत्मीय व भावनात्मक रिश्ता होने के साथ निहायत व्यक्तिगत अनुभूति है जबकि दोस्ती कईयों के साथ हो सकती है....... !!!
रश्मि सिंह