शुक्रवार, 30 मार्च 2012
संस्कृति का परिमार्जित एक स्वरुप
भरा रेल का डिब्बा
दोनों एक दूसरे से
हो रहे थे गुत्थमगुत्था
कहते हुए कुत्ता
एक दूसरे के मध्य माँ बहन की
गालियों का चल रहा था
अबाद्ध आदान प्रदान
मै जडवत डिब्बे के एक कोने में
उन्हें देख रहा था नादान
अपने को रोक पाने में अक्षम
उनके बीच की मध्यस्थता के लिए
मैं सहसा उठा
तभी बगल में बैठे एक वृद्ध ने
मेरा हाथ दाबा अहिस्ता
बोला चुप चाप बैठो
थोड़ी देर में आप ही
समाप्त हो जायेगा सारा किस्सा
मैं मन मसोस कर
अपनी जगह बैठा रहा
रेल अपनी गति से अबाद्ध चलता रहा
मैं आश्चर्य से देख रहा था
झगडा धीरे धीरे क्रमशः
शांत हो रहा था
अब दोनों के मध्य शांति वार्ता का
दौर चल रहा था
परिदृश्य लगभग पूरा ही बदल गया था
इस वार्ता के मध्य अब
हाल चाल का आदान प्रदान होने लगा था
एक दूसरे का साथ
दोनों को ही अब भा रहा था
बीच बीच में हसी की भी
कुछ लडिया दिख रही थी
फिर दोनों ने किसी तरह कुछ
जगह बना कर अपनी अपनी
पोटली खोली थी
सब्जियों के फेर बदल के साथ
किया भोजन जमकर
निश्चिन्त वे दोनों वही सो गए
अपने अपने गमछे विछाकर
बेटा इसीलिए मै तुम्हे
मना कर रहा था
मध्यस्ठ्ता करने पर जानलो
निश्चित ही तुम्हे भी बेशक दो चार
थप्पड़ पड़ना था
मैं तो अक्सर सफ़र में रहते हुए
ऐसे वाकये से पैरचित था
कहकर वह व्यक्ति
मेरी तरफ देखकर मुस्कराया
मुझे अपने इस अबूझ ग्रामीण
संस्कृति से अपरिचित होने के दुःख ने
रास्ते भर सताया
हलाकि यह बात अलग थी कि
अपनी ग्रामीण संस्कृति का यह
परिमार्जित स्वरुप
मुझे अत्यंत ही भाया
रविवार, 25 मार्च 2012
नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) का जन्म-दिन आज है..
तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार !!
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नाम-अक्षिता (पाखी)
जन्म- 25 मार्च, 2007 (कानपुर)
मूल निवास - तहबरपुर, आजमगढ़ (यू.पी.)
मम्मी-पापा - श्रीमती आकांक्षा – श्री कृष्ण कुमार यादव
अध्ययनरत - के. जी.-II,
रुचियाँ- ड्राइंग, डांसिंग, प्लेयिंग.
प्रकाशन- इंटरनेट पर ब्लागोत्सव-2010, बाल-दुनिया, नन्हा-मन, सरस पायस, ताऊजी डाट काम, युवा-मन इत्यादि एवं चकमक, टाबर टोली, अनंता, सांवली इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में ड्राइंग/रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रकाशन.
प्रसारण- आकाशवाणी पोर्टब्लेयर से ‘बाल-जगत’ कार्यक्रम में प्रसारण.
ब्लॉग :‘पाखी की दुनिया’ का 24 जून, 2009 को आरंभ. इसमें अक्षिता (पाखी) की ड्राइंग, क्रिएटिविटी, फोटो, परिवार और स्कूल की बातें, घूमना-फिरना, बाल-गीत सहित बहुत कुछ शामिल है. 82 से ज्यादा देशों में अब तक देखे/पढ़े जाने वाली ‘पाखी की दुनिया’ का 200 से ज्यादा लोग अनुसरण करते हैं. 235 से ज्यादा प्रविष्टियों से सुसज्जित इस ब्लॉग को 36,500 से ज्यादा लोगों ने पढ़ा/देखा है. दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के अनुसार-‘अक्षिता की उम्र तो बेहद कम है, लेकिन हिन्दी ब्लागिंग में वो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। अक्षिता का ब्लाग बेहद पापुलर है और फिलहाल हिन्दी के टाॅप 100 ब्लॉगों में से एक है।'
विशेष -राजस्थान के वरिष्ठ बाल-साहित्यकार दीन दयाल शर्मा द्वारा अपनी पुस्तक ‘चूं-चूं’ के कवर-पेज पर अक्षिता (पाखी) की फोटो का अंकन. दीन दयाल शर्मा, रावेन्द्र कुमार ‘रवि’, डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, एस. आर. भारती, डा. दुर्गाचरण मिश्र, द्वारा अक्षिता (पाखी) पर केन्द्रित बाल-गीतों/कविता की रचना.
सम्मान- ब्लागोत्सव -2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर “वर्ष की श्रेष्ठ नन्ही ब्लागर ” के रूप में सम्मानित. हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित अन्तराष्ट्रीय ब्लाॅगर्स सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लाॅगर हेतु उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डा0 रमेश पोखरियाल ”निशंक” द्वारा ”हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010” अवार्ड.
बाल दिवस, 14 नवम्बर, 2011 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में महिला और बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ द्वारा राष्ट्रीय बाल पुरस्कार-2011 से पुरस्कृत किया. अक्षिता इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली सबसे कम उम्र की प्रतिभा है. यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया.
पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा-दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, शुक्रवार, टाबर टोली, नेशनल एक्सप्रेस, नवोदित स्वर, बाल साहित्य समीक्षा, बुलंद इण्डिया, शुभ्र ज्योत्स्ना, सांवली, सत्य चक्र, इसमासो, हिंद क्रांति, दि मारल, अयोध्या संवाद, अंडमान-निकोबार द्वीप समाचार, The Indian Express, The Echo of India, The Daily Telegrams, Andaman Sheekha, Andaman Express, Aspect इत्यादि तमाम पत्र-पत्रिकाओं में अक्षिता और ब्लॉग ‘पाखी की दुनिया’ की चर्चा.
अंतर्जाल पर चर्चा- हिंदी मीडिया.इन, स्वतंत्र आवाज़.काम, परिकल्पना, स्वर्गविभा, क्रिएटिव मंच-Creative Manch, बचपन, सरस पायस, बाल-दुनिया, बचपन, शब्द-साहित्य, रैन बसेरा, यदुकुल, Journalist Today, Akhtar Khan Akela इत्यादि तमाम वेब-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर चर्चा.
संपर्क - पुत्री- श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद-211001
ई-मेल- akshita_06@rediffmail.com
ब्लॉग- http://www.pakhi-akshita.blogspot.com/ (पाखी की दुनिया)
शुक्रवार, 23 मार्च 2012
डाक-निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने जारी किया भारतीय स्टेट बैंक पर विशेष-आवरण (डाक-लिफाफा)
शनिवार, 3 मार्च 2012
कृष्ण कुमार यादव ने संभाला इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ का पद

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढ़ा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य-संग्रह-2005), 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह-2006 व 2007), India Post : 150 Glorious Years (2006) एवं 'क्रांति -यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (2007) प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं. डा. दुर्गाचरण मिश्र, 2009) भी प्रकाशित हो चुकी है। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में विभिन्न विधाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं व ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन भी आपने किया है। आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से आपकी कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार इत्यादि का प्रसारण हो चुका हैं।
श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर (www.kkyadav.blogspot.com) व डाकिया डाक लाया (www.dakbabu.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ ,‘सप्तरंगी प्रेम’ व ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉगों के माध्यम से सक्रिय हैं। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, और ब्लॉग पर प्रकाशित होने वाले श्री यादव की इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में भी काव्य-रचनाएँ संकलित हैं।
विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त श्री यादव की इलाहाबाद में नियुक्ति से इलाहाबाद से जुड़े साहित्यकारों और ब्लागरों में भी काफी हर्ष है !!
मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012
क्या हमें भी अपने वजूद खोजने होंगे।
अंतिम पहर
शनै शनै हो रहा था सहर
भर दिन कि व्यस्तता से थका मांदा
आज भीड़ हो गयी थी
और दिनों से कुछ ज्यादा
जम्हाई लेते हुए मै जैसे ही
काउंटर बंद करने चला
एक कातर असहाय आवाज
एकाएक कानो में पड़ा
बचवा
तनी देर और रुक जा
बीस रुपया क भाडा खर्च
कई बड़ी दूर से आवत हिजा
सामने दिखा
एक कृशकाय वृद्धा का आगमन
पता चला साथ मे
उसका पुत्र भी था मदन
मैंने कहा माताजी जल्दी आकर
अपने फॅमिली पेंशन का फारम भरो
अपने पेंशन का पैसा लेकर
जल्दी से चलते बनो
वर्ना मुझे खजाना बंद करने मै
आज फिर देर हो जाएगी
त्यौहार के मद्देजनर
आज फिर मार्केटिंग नहीं हो पायेगी
पत्नी कल कि तरह आज भी
नाराज हो जाएगी
सुनते ही पुत्र मदन ने फटाफट
उसका फार्म भरा
झट से प्राप्त रुपये को फुर्ती से गिन
अपने जेब मै धरा
उसकी माँ बोली बचवा
तनी हमूं के पइसवा ता दिखैते
कम से कम दवईया वदे त हमका
पांच सौ रुपया दी देते
वर्ना घर गैला पर एको रुपया
तोहार दुल्हिन से न पाइब
त बचवा बतावा
हमार दवईया कैसे किनैब
माई ई तोहरा से
पैसा कैसे गिनल जाई
तोहरा से ई कबहू न सभल पाई
चला घर त देखल जाई
वृद्धा दबी जबान से बुदबुदाने लगी
वाह रे बचवा हम तोहके बचपन मै
पैसवे से गिनती सिख्वाले रहली
नाक बहाय के जब तू घूमत रहला
तो पोछे क सलीके भी हमे सिखौले रहली
आज तू हमके सलीका सिखैबा
पाथर पर दूब जमइबा
ढेर बतियाव जिन
एहिजे हमरे इज्जत क कबाड़
बनाव जिन
देखत है को त्यौहार सर पे आयी बा
बब्लुआ के मम्मी के धोती कपडा और
लइकन के कपड़ा कीने के बाकि बा
तोहरा त दवैये के सूझल बा
पता नहीं अब जी के का कियल जाई
चला काढ़ा पानी पी के अभही कम चली
अगले महिना कुछ देखल जाई
सरबौला हमही के मुवात हौ
देखा एके बड़े बाबू तनी
बूझत नइखे कि हमारे मुवला पर कैसे ई
केकरा भरोसे एहिजे नोटिया गिनी
वृद्धा अश्रुपूरित नेत्रों से कभी हमें
कभी मदन को देख रही थी
हर महिनवे मै कुछ न कुछ
बहाना बनाय कुल पैसवे हड़पने की
बात हमसे कह रही थी
दमे के प्रकोप के कारण
डाक्टर के बताये कुछ जाँच को
कई महीने से कराने को सोच रही थी
एक महिना और कैसे बीती
सोंच के काप रही थी
अपनी असमर्थता पर
आंसुओं को आँख के कोरो में
रोके रो रही थी
मरते समय मदन के बाबू द्वारा
मदन को दी जाने वाली सीख के बारे मै
ही वह शायद सोच रही थी
तभी मेरे पियन पुन्वासी की आवाज ने
मेरे ध्यान को भंग किया
साहब समय होई गवा कहकर
उसने काउंटर बंद कर दिया
मै निर्विकरवत मौन
पत्नी की नाराजगी से भयमुक्त
बंद खिड़की के पल्ले को
एकाग्र देख रहा था
चाह कर भी मदन को उसके इस
कुकृत्य को न रोक पाने का
दंश झेल रहा था
सोंच रहा था की क्या
ऐसे दिन हमें भी देखने होगे
तेजी से विलुप्त हो रहे
मानवीय मूल्यों के बीच
क्या हमें भी अपने वजूद
खोजने होंगे।
गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012
राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोती है हिन्दी
प्रथम दिवस के उद्घाटन सत्र में गुरुद्वारा हजूर साहिब सचखंड के मुख्यग्रन्थी प्रतापसिंह की उपस्थिति में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य एवं पूर्व सांसद लेखक स. हरविंदर सिंह हंसपाल, कालेज अध्यक्ष डा. व्यंकटेश काब्दे, हिन्दी अकादमी के उपसचिव डा. हरिसुमन बिष्ट, प्राचार्य डा. जी.एम.कलमसे तथा संस्था के अध्यक्ष डॉ. हरमहेन्दर सिंह बेदी ने दीप प्रज्वलित कर सम्मेलन का शुभारम्भ किया। स्थानीय संयोजिका सायन्स कालेज हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. अरुणा राजेन्द्र शुक्ल ने गुरु गोविंद सिंह के साथ निजाम के अत्याचारी शासन के विरूद्ध संघर्ष करने वाले, क्षेत्र के मुक्तिदाता के रूप में स्थापित स्वामी रामानंद तीर्थ को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया। हजूर साहिब सचखंड के मुख्यग्रन्थी ने गुरुजी की अंतिम कर्मभूमि नांदेड़ के विषय में अनेक ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी दी वहीं स. हंसपाल एवं अन्य सभी वक्ताओं ने हिन्दी और गुरुगोविंद सिंह के साहित्य दर्शन को राष्ट्रीय एकता का पर्याय बताया। संयोजक सुरजीत सिंह जोबन ने देश के विभिन्न भागों से पधारे साहित्यकारों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।
चायकाल के बाद जानेमाने कवि महेन्द्र शर्मा द्वारा संचालित कवि सम्मेलन का आगाज देवबंद के डा. महेन्द्रपाल काम्बोज के ओजस्वी स्वर में गुरुजी की यशोगान से हुआ। देर रात तक चले कवि सम्मेलन में सर्वश्री हर्षकुमार, नरेन्द्रसिंह होशियार पुरी, मनोहर देहलवी, किशोर श्रीवास्तव, विनोद बब्बर, डा. रामनिवास मानव, डा.कीर्तिवर्द्धन, अतुल त्रिपाठी, ओमप्रकाश हयारण दर्द, डा.अहिल्या मिश्र, डा. अरुणा शुक्ल, संतोष टेलवीकर, ज्योति मुंगल, संगमलाल भंवर, डा. हरिसुमन बिष्ट ने राष्ट्रीय एकता के विभिन्न रंगं बिखेरे।
द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में हजूर साहिब के मुख्य कथाकार ज्ञानी अमरसिंह की उपस्थिति में ‘गुरु गोविंदसिंह और उनका साहित्य साहित्य’ विषय पर परिचर्चा के दौरान अमृतसर के नानकदेव विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. हरमहेन्दर सिंह बेदी ने गुरुजी रचित ‘विचित्र नाटक’ को प्रथम आत्मकथा बताया। डा. बेदी के अनुसार गुरुजी ने अपने जन्म स्थान पटना से आनंदपुर और फिर दक्षिण भारत तक के सम्पूर्ण क्षेत्र को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए तलवार उठाई वहीं साहित्यिक समृद्धि के लिए कलम का सहारा भी लिया। अपने अल्प जीवन में ही महान कार्य करने वाले गुरुजी जुझारू योद्धा ही नहीं अनेक भाषाओं के विद्वान भी थे। अन्य वक्ताओं में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी शिक्षण केन्द्र शिमला की अध्यक्षा प्रो.जोगेश कौर, इन्दौर के डॉ. प्रताप सिंह सोढ़ी, हैदराबाद की अहिल्या मिश्र, नांदेड़ की एम.ए. की छात्रा श्रीमती पूनम शुक्ल तथा डा. परमेन्दर कौर भी शामिल थे। इसी सत्र में स. सुरजीत सिंह जोबन के अभिनंदन ग्रन्थ ‘खुश्बु बन कर जिऊंगा’ की प्रथम प्रति संपादक डा. रामनिवास मानव ने मंच पर विराजमान अतिथियों को भेंट कर लोकार्पण करने का आग्रह किया। तत्पश्चात डा. अरुणा राजेन्द्र शुक्ल के शोधग्रन्थ ‘नरेश मेहता के उपन्यासों में व्यक्त अवदान’ का लोकार्पण किया गया। इस सत्र का संचालन राष्ट्र-किंकर के संपादक श्री विनोद बब्बर ने किया।
भोजनोपरान्त द्वितीय सत्र में ‘अहिन्दीभाषी प्रदेशों का हिन्दी लेखन’ विषय पर परिचर्चा में मुख्य वक्ता विनोद बब्बर ने हिन्दुस्तान की आजादी के 65 वर्ष बाद भी यहाँ अहिन्दीभाषी शब्द के प्रयोग को अपमानजनक और दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इसके लिए सरकारों की ढुलमुल नीति को जिम्मेवार ठहराया। उन्होंने मातृभाषा और राष्ट्रभाषा को दोनों आंखें बताते हुए इनमें संतुलन की आवश्यकता बताई लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इन दोनों आँखों पर पट्टी बांधने तथा तीसरी आँख (अंग्रेजी) को प्रभावी बनाने केे प्रयास हो रहे हैं जबकि तीसरा नेत्र विनाश का सूचक है। इस सत्र में डा.हरि सिंह पाल, डा.शहाबुद्दीन शेख, डा.रेखा मोरे, डा.ज्योति टेलवेकर ने भी अपने विचार प्रस्तुत किये। चायपान के बाद के सत्र में कवि सम्मेलन में विभिन्न राज्यों से आये कवियों ने अपनी श्रेष्ठ रचनाओं से वातावरण को हिन्दी कवितामय बनाया।
तीसरे दिन के प्रथम सत्र में क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक श्री ओमप्रकाश पोकार्णा ने नांदेड की पवित्र भूमि पर सभी का स्वागत करते हुए सम्मेलन को राष्ट्रीय एकता का महाकुम्भ घोषित किया। विधायक महोदय ने हिन्दी के प्रति समर्पण के लिए स. सुरजीत सिंह जोबन तथा विनोद बब्बर को सम्मानित करते हुए उनके साहित्यिक अवदान की प्रशंसा की। इसी सत्र में ‘अंतर्राज्यीय भाषायी संवाद’ विषय पर हिन्दी अकादमी के उपसचिव डा. हरिसुमन बिष्ट ने मुख्य वक्ता के रूप में आदिकाल से आधुनिक काल तक के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम व बाद में राष्ट्रभाषा बनने तक हिन्दी की राष्ट्रीय पहचान को रेखांकित करते हुए आज के वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी को सम्पूर्ण राष्ट्र की आवश्यकता बताया। डा. बिष्ट के अनुसार राष्ट्रभाषा, सम्पर्क भाषा, आम बोलचाल की भाषा हिन्दी ही है इसीलिए यह हम सभी को एकसूत्रता में पिरोती है। डा. रामनिवास मानव की अध्यक्षता एवं डा. अरूणा के संचालन में डॉ. बेदी, आकाशवाणी दिल्ली के पुर्व राजभाषा निदेशक डा.कृष्ण नारायण पाण्डेय, डा. मान, डा. रमा येवले प्रमुख वक्ता थे।
अंतिम सत्र में स. हंसपाल, डा. बेदी नांदेड़ एजुकेशन सो. के उपाध्यक्ष श्र सदाशिवराव पाटिल, प्राचार्य डा. कलमसे ने विद्वानों को ‘भाषा रत्न’ सम्मान प्रदान कर उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। समारोह की समाप्ति के पश्चात स्थानीय संयोजिका डा. अरुणा राजेन्द्र शुक्ल द्वारा आयोजित प्रीतिभोज में सभी प्रतिभागियों के अतिरिक्त स्थानीय अधिकारियों, गणमान्य नागरिक भी उपस्थित थे। इस विदाई समारोह मंे सभी ने सुंदर आयोजन, श्रेष्ठ आतिथ्य एवं स्नेहिल व्यवहार से सभी का दिल जीतने वाली डा. अरुणा राजेन्द्र शुक्ल तथा उनके प्राचार्य डा. कलमसे की कण्ठमुक्त प्रशंसा की।
नांदेड़ से दिल्ली लौटते हुए सचखंड एक्सप्रेस के वातानुकुलित डिब्बे में कविगोष्ठी तथा डा. हरिसुमन विष्ट के उपन्यास अछनी-बछनी के कुछ अंशों का वाचन तथा समीक्षा संवाद आयोजित किये गये। इस नवप्रयोग की संकल्पना डा. रामनिवास मानव ने प्रस्तुत की जिसमें 25 से अधिक साहित्यकारों ने भाग लिया।
बुधवार, 8 फ़रवरी 2012
कृष्ण कुमार यादव की अंडमान से इलाहाबाद के लिए भावभीनी विदाई
कार्यक्रम कि अध्यक्षता करते हुए जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर में राजनीति शास्त्र विभागाध्यक्ष डा. आर. एन. रथ ने कहा कि प्रशासन के साथ-साथ साहित्यिक दायित्वों का निर्वहन बेहद जटिल कार्य है पर श्री कृष्ण कुमार यादव ने अल्प समय में ही अंडमान में अपने कार्य-कलापों से विशिष्ट पहचान बनाई है. उन्होंने अपने रचनात्मक अवदान से द्वीपों में चल रही गतिविधियों को मुख्य भूमि से जोड़ा और यहाँ के ऐतिहासिक व प्राकृतिक परिवेश, सेलुलर जेल, आदिवासी, द्वीपों में समृद्ध होती हिंदी इत्यादि तमाम विषयों पर न सिर्फ प्रखरता से लेखनी चलाई बल्कि उसे तमाम राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं और इंटरनेट पर प्रसारित कर यहाँ के सम्बन्ध में लोगों को रु-ब-रु कराया. श्री यादव के साथ-साथ जिस तरह से इनकी पत्नी श्रीमती आकांक्षा यादव ने नारी-विमर्श को लेकर कलम चलाई है, ऐसा युगल विरले ही देखने को मिलता है. आकाशवाणी के पूर्व निदेशक श्री एम्.एच. खान ने अपने संबोधन में कहा कि जिस प्रकार से बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्री यादव अपनी प्रशासनिक व्यस्तताओं के मध्य साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं, वह नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है. आकाशवाणी, पोर्टब्लेयर के उप निदेशक (समाचार) श्री दुर्गा विजय सिंह 'दीप' ने उन तमाम गतिविधियों को रेखांकित किया, जो श्री यादव ने द्वीपों में निदेशक के पद पर अधीन रहने के दौरान किया. डाकघरों का कम्प्यूटरीकरण और उन्हें प्रोजेक्ट एरो के अधीन लाना, डाक-कर्मियों हेतु प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना, डाकघर से 'आधार' के तहत नामांकन, अंडमान के साथ-साथ सुदूर निकोबार में आदिवासियों के बीच जाकर उन्हें बचत और बीमा सेवाओं के प्रति जागरूक करना और उनके खाते खुलवाना, स्कूली बच्चों को पत्र-लेखन से जोड़ने के लिए तमाम रचनात्मक पहल और उन्हें डाक-टिकटों के प्रति आकर्षित करने के लिए तमाम कार्यशालों का आयोजन इत्यादि ऐसे तमाम पहलू रहे, जहाँ निदेशक के रूप में श्री यादव के प्रयास को न सिर्फ आम-जन ने सराहा बल्कि मीडिया ने भी नोटिस लिया. उन्होंने श्री यादव के सपरिवार साहित्यिक जगत में सक्रिय होने और आकाशवाणी पर निरंतर कार्यक्रमों की प्रस्तुति देने के लिए भी सराहा. 'चेतना' संस्था के महासचिव श्री घनश्याम सिंह ने श्री कृष्ण कुमार यादव के 'चेतना' सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था से लगाव पर सुखद हर्ष व्यक्त किया और कहा कि उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण से हमारे कार्यक्रमों को नई दिशा मिली. चर्चित कवयित्री और प्रशासन में सहायक निदेशक श्रीमती डी. एम. सावित्री ने श्री कृष्ण कुमार यादव को एक संवेदनशील व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि वे अधिकारी से पहले एक अच्छे व्यक्ति हैं और यही उन्हें विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु प्रेरित भी करती है. यह एक सुखद संयोग है कि उनके पीछे विदुषी पत्नी आकांक्षा यादव जी का सहयोग सदा बना रहता है.
अपने भावभीनी विदाई समारोह से अभिभूत श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस अवसर पर कहा कि अंडमान में उनका यह कार्यकाल बहुत खूबसूरत रहा, इसके बहाने ऐसी तमाम बातों और पहलुओं से रु-ब-रु होने का अवसर मिला, जिनके बारे में मात्र पढ़ा ही था. इस दौरान यहाँ से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। श्री यादव ने कहा कि यहाँ के परिवेश में न सिर्फ मेरी सृजनात्मकता में वृद्धि की बल्कि उन्नति की राह भी दिखाई। उन्होंने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अपने अनुभवों और यहाँ के जन-जीवन पर एक पुस्तक लिखने की भी इच्छा जताई. श्री यादव ने कहा कि वे विभागीय रूप में भले ही यहाँ से जा रहे हैं पर यहाँ के लोगों और अंडमान से उनका भावनात्मक संबंध हमेशा बना रहेगा।
इस अवसर पर एक काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गया, जिसमें सर्वश्री घनश्याम सिंह, मकसूद आलम, अनिरुद्ध पांडे, अरविंद त्रिपाठी, श्रीमती डी.एम. सावित्री, श्री दुर्ग विजय सिंह ‘दीप’ इत्यादि ने अपनी अपनी कविताएं पढ़ी। श्री कृष्ण कुमार यादव ने भी अपनी कविताओं और हाइकु से लोगों का मन मोहा. अंडमान के आदिवासियों पर आधारित उनकी कविता ने लोगों को बड़ा प्रभावित किया ।
कार्यक्रम का सञ्चालन श्री अशोक सिंह और आभार-ज्ञापन श्री नीरज बैद्य द्वारा किया गया.
- दुर्ग विजय सिंह 'दीप'
उप निदेशक- आकाशवाणी (समाचार)
पोर्टब्लेयर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह.
शनिवार, 4 फ़रवरी 2012
बेटे का कफ़न
देखती नहीं पुलिस केस है
कल से हम राजनवा के बारे में
तुमसे पूछ रहे है
अभी तक तो कहती रही कि
तुम्हे उसका पता नहीं
आज जब उसका डकैती के दौरान
इनकौन्टर हो गया
तो क्यों चिल्ला रही
अभी तक तो डकैती का
मॉल दकारती रही
अब मुंह देख कर क्या करोगी
उसे अब देखने से क्या फायदा
क्या तुम अब उसे जिन्दा करोगी
नाही भईया हमार बबुआ
अइसन कबहू ना रहा
जरूर तू सभे के कौनो
ग़लतफ़हमी होई रहा
हाँ एका संगत बीच में
कछु गलत होई गवा रहा
स्कूल से भाग के
सनेमा वनेमा देखन लगा रहा
पर हमरी समझ से इतना भी नाही
कि ओके साथ हमका भी
ई दिन देखे के पड़ा
अब बाबू केकरा उम्मीद पर
बाकि जिनगी कटी
एक बबुआ का त हम
बचपन्वे मा खो दी रही
अनहि पर सगरो उम्मीद रही
कहते बुधिया विलाप करते हुए
दहाड़ मार कर गिर पड़ी
ओंठों के बीच अनवरत बुदबुदाती रही
बाबू फिर से विनती करत तानी
तनी हमरे बाबू क चेहरवा त दिखा दिहित
होई सकित है अभी जिन्दा होखब
हे भगवन अब हम का करब
दीना भगत उसको
संभालने में लग गया
अपने कलेजे पर पत्थर रख कर
गमछे के एक कोर से कभी
अपने आंसुओं को पोछता
कभी राजन की माँ को संभालता
उसके बेहोश चेहरे पर कभी
पास के सरकारी नल में
गमछे को भिगोकर जल डालता
अतीत में चला गया
कितनी मनौतियों के उपरांत
पहले बेटे के चेचक में गुजरने के बाद
राजन का जन्म हुआ था
याद नहीं न जाने कितनी बार
रिक्शा चला कर आने पर
थके होने के उपरांत भी
अपने बबुआ के लिए वह
कितनी बार घोडा बना था
अपने पसीने की एक एक बूँद से
उसने उसे बड़े ही हसरतो से पाला था
बुधिया और उसके जीवन का
वही तो एकमात्र सहारा था
उसे पूर विश्वास था कि
ऐसा राजन के साथ कुछ भी नहीं था
कि उसका इस तरह
इनकौन्टर किया जाता
हाँ रसूखवालों की चमचागिरी ने
अपना कोटा पूरा करने के लिए
उसे असमय समाप्त कर डाला था
बीती रात से ही रोते रोते
उसके आँखों के आंसू तो
लगभग सूख ही चले थे
पर पत्नी के साथ बेटे के पहचान
और अंतिम दर्शन की लालसा में
वे दोनों सुबह से वहा
बिना खाए पिए पड़े थे
बेटे से हाथ धो चुके रामदीन को
अब बुधिया की चिंता सता रही थी
तभी उसके दिमाक में
एक बात आ गयी थी
उसने अपने फटे कमीज से
एक बीस का मुड़ा मैला नोट निकला
उसे पुलिसवाले के जेब में डाला
तब उसने पसीजते हुए कहा
बड़े देर से तुम लोग समझते हो
जाओ उधर जाकर उसका मुंह देख लो
ससंकित मन व कापते पैरो से
बुधिया को लेकर वह आगे बढा
भगवन करे वह राजन न हो सोचता रहा
जैसे ही उसने कफ़न को हटाया
उसे देखने को बुधिया आगे बढ़ी
दहाड़ मार कर उसके लाश पर गिर पड़ी
रामदीन उसको उठाने के लिए
तेजी से आगे बढ़ा
तभी एक और मौत से
उसका पाला पड़ा
बुधिया भी उसे छोड़ अपनी
अंतिम यात्रा पर जा चुकी थी
रामदीन की झरझर अवसादग्रस्त आंखे
किंकर्तव्य विमूढ़
असहाय शून्य में ताकती रही
गुरुवार, 26 जनवरी 2012
गणतंत्र दिवस
खाए मिठाई और चल दिए
घर द्वार कि दो चार बाते किये और चल दिए
गणतंत्र खड़ा किनारे अपनी
बेबसी पर रो रहा
औचित्य अपना पूछता
फिर रहा
कहता रहा कि
दिल के अरमा आंसुओं में बह गए
सफ़र किया था जहा से शुरू
फिर वही पहुँच गए
मंगलवार, 17 जनवरी 2012
आकांक्षा यादव को विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा मानद डाक्टरेट
गौरतलब है कि आकांक्षा यादव की रचनाएँ देश-विदेश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली आकांक्षा यादव के लेख, कवितायें और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों /पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीं आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ इंटरनेट पर भी सक्रिय आकांक्षा यादव की रचनाएँ तमाम वेब/ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं। व्यक्तिगत रूप से ‘शब्द-शिखर’(http://shabdshikhar.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ (http://balduniya.blogspot.com),‘सप्तरंगी प्रेम’ (http://saptrangiprem.blogspot.com) व ‘उत्सव के रंग’ (http://utsavkerang.blogspot.com) ब्लॉग का संचालन करने वाली आकांक्षा यादव न सिर्फ एक साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, बल्कि सक्रिय ब्लागर के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। ’क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा‘ पुस्तक का कृष्ण कुमार यादव के साथ संपादन करने वाली आकांक्षा यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु ने ‘बाल साहित्य समीक्षा‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।
मूलतः उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गाजीपुर जनपद की निवासी आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहां रहकर भी हिंदी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिंदी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।
इससे पूर्व भी आकांक्षा यादव को विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘एस0एम0एस0‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘साहित्य गौरव‘ व ‘काव्य मर्मज्ञ‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘साहित्य श्री सम्मान‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘आसरा‘ द्वारा ‘ब्रज-शिरोमणि‘ सम्मान, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘साहित्य मनीषी सम्मान‘ व ‘भाषा भारती रत्न‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘साहित्य सेवा सम्मान‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘देवभूमि साहित्य रत्न‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘उजास सम्मान‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘भारत गौरव‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘काव्य-कुमुद‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘शब्द माधुरी‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था,ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘सरस्वती रत्न‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा ’श्रेष्ठ कवयित्री’ की मानद उपाधि, जीवी प्रकाशन, जालंधर द्वारा ’राष्ट्रीय भाषा रत्न’ इत्यादि शामिल हैं।
विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हिन्दी सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वान, शिक्षक-साहित्यकार, पुरातत्वविद्, इतिहासकार, पत्रकार और जन-प्रतिनिधि शामिल थे। उक्त जानकारी विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ के कुल सचिव डा. देवेंद्र नाथ साह ने दी।
सोमवार, 16 जनवरी 2012
एक विमान परिचारिका कि व्यथा
बरजोरी हंसी को लाते
अपनी दिल्ली की विमान यात्रा के दौरान
मैंने देखा उसे बड़ी सिद्दत से
अपने दर्द को छिपाते
आँखों की भाषा से अधरों का
कोई तालमेल नहीं था
दर्द का सैलाब आँखों में छिपाए
जुबान से उसका कोई मेल जोल नहीं था
हाँ वह भावनाओं पर कर्त्तव्य के
वरीयता की प्रतिमूर्ति ही तो थी
पर साथ ही चेहरे के नूर पर
चिंता की लकीर भी दृष्टिगत थी
यात्रिओं के हर बार
काल बल्ब जलाने पर
हसने का असफल प्रयास करते हुए
उनके दृष्टि वाणों को झेलती
हमें मंथित कर रही थी
उनका खैरमकदम करती
वो एक विमान परिचारिक ही थी
विमान की पिछली सीट पर होने से
मैंने अपने कानों को उसकी
उसके क्रू मेम्बरों से हो हो रही
बातचीत पर केन्द्रित किया
जो कुछ ह्रदय ग्राही हुआ
उससे मन एकदम से द्रवित हो गया
घर की एकमात्र संतान
लकवाग्रस्त पिता के ह्रदयघात की खबर ने
उसे विचलित कर दिया था
विदुर पिता की एक मात्र उम्मीद
पर लाचार उन्हें एक नौकर के सहारे
उसने छोड़ दिया था
पिता के देखभाल के लिए ही उसने
अभी तक विवाह भी नहीं किया था
नौकरी भी ऐसी की बस
हवा से बात ही करना था
चाह कर भी पापा की सेवा
करना आसान नहीं था
बेशक पापा की देखभाल व
इलाज के लिए पैसे की भी
दरकार कम नहीं थी
वरना पापा की सेवा के लिए
इस नौकरी को छोड़ने का फैसला
वह पिछले सप्ताह ही कर चुकी थी
साथ ही अजेंसी की संविदा में
भी वह बधी थी
किसी तरह उसके आग्रह पर
उसकी छुट्टी कल से मंजूर हो गयी थी
पापा के करीब होने की ख़ुशी भी
उसके वार्तालाप में
रह रह कर दिख रही थी
बचपन में ही माँ की अ सामयिक मौत ने
पापा को तोड़ दिया था
लाख प्रयास करने के उपरांत
कैंसर के क्रूर हाथो ने माँ को
उनसे छीन लिया था
पापा कितना बिलख बिलख कर रोये थे
वह अबोध माँ को मृत्श्य्या पर लेटे देखती
घटना की गंभीरता से अनजान
माँ को सोता समझ
पापा के आंसुओं को अपने
नन्हे हाथो से पोछती
अतीत की घटनाओं से दो चार होते
समय अपनी अबाध गति से
अनवरत चलता रहा
अवसाद व खुशियों के मध्य
जीवन कटता रहा
वह कब अनजान बच्ची से एक
युवती बन गयी पता ही नहीं चला
इसी बीच पापा ने कभी उसे
माँ की कमी खलने नहीं दिया
उसकी एक छोटी से इक्षा पर भी
पापा इतना बेचैन हो जाते
जब तक उसे पूरा नहीं कर लेते
चैन नहीं पाते
बुखार में तपते हुए अच्छी तरह
याद था उसे पूस की वह बात
पापा ने जागते पट्टी रखते काट दी थी
किस तरह रोते सुबकते पूरी रात
ऐसे कितने ही संस्मरणों और यादों ने
उसे झकझोर दिया था
पर पापा के प्रिवेट नौकरी से छुट्टी ने
उसे असमय ही बाहर निकलने को
मजबूर कर दिया था
कामयाबी की एक एक सीढिया चढ़ते
वह आज इस मुकाम तक पहुंची थी
पापा की एक एक इक्षा पर
अपनी हज़ार खुशियाँ अर्पित
करने को तत्पर थी
इसी बीच मेरी फ्लेट गंतव्य पर
पहुच चुकी थी
बाहर निकलते निकलते उसने हमारा
हर्ष विषाद मिश्रित अभिवादन से धन्यवाद् किया
तभी एक क्रू मेंबर ने उसे
रूचि रूचि पुकारते हुए आकर
उसके हाथों में एक टेली ग्राम दिया
मैंने जिज्ञासवस पलट कर पीछे देखा
एक अनिष्ट की आशंका से सिहर
उसके पास गया
टेलीग्राम की भाषा ने उसे पत्थर
और हमें अवाक् कर दिया
योगदान देने वाला व्यक्ति
लेखा-जोखा
कुल पेज दृश्य
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हाशिए उलांधती औरत कहानी के पांच खंडों पर संगोष्ठी और लोकार्पण - *रमणिका फाउंडेशन की परियोजना* नई दिल्ली: आज दिनांक 28 मार्च 2014 को स्कूल आॅफ इंटरनेशनल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज के कम...12 वर्ष पहले
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पत्रिका साहित्य परिक्रमा का राष्ट्रीय अधिवेशन विशेषांक - पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: जनवरी मार्च, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: जी सिंह जीत, श्रीमती क्रांति कनाटे, आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, पृष्ठ: 9...12 वर्ष पहले
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होली के रंग कुछ कहते हैं - रंग हमारे जीवन में बड़े महत्वपूर्ण हैं। ये हमारे स्वास्थ्य और मूड को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। हमारे आसपास यूं तो कई रंग हैं, पर ये चाहे-अनचाहे हम...12 वर्ष पहले
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मैं ‘आप’ को पसंद क्यों करता हूँ- मटुकनाथ - बहुत दिनों के बाद फेसबुक पर बैठा, तो मित्रों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी कि आपने ‘आप’ में क्या देखा जो शामिल होने का मन बना लिया ? अलग अलग कितना जवाब दूँ। ...12 वर्ष पहले
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खाकी में इंसान – पुस्तक समीक्षा(श्रीमती चित्रा मुदगल द्वारा) - पुलिस व्यवस्था प्राचीनकाल से ही भारतीय राजव्यवस्था का प्रमुख अंग रहा है । इस विषय को आधार बनाकर अनेक लेखकों ने समय-समय पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। इस श...12 वर्ष पहले
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Sanjay Pal: Researcher and Link Writer - हर अगला कदम पीछे होता है,और पीछेवाला आगे आता है ..... पिछले कदम की यह अनवरत यात्रा है, स्वाभाविक दृढ़ प्रयास ! हिमालय हो या कैलाश पर्वत ..... ऊँचाई विनम...13 वर्ष पहले
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सांस्कृतिक उग्रभक्ति और साहित्यः सत्य पी. मोहंती - प्रो. सत्य पी. मोहंती से रश्मि दुबे भटनागर और राजेन्द्र कौर की बातचीत मूल अंग्रेजी से अनुवाद: राजशेखर पाण्डेय यह साक्षात्कार अक्टूबर-नवंबर २०११में लिया गय...13 वर्ष पहले
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'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के बारे में - आज कुछ ऐसी परिस्थिति है कि हवाई जहाज लखनऊ से दिल्ली आकर रुका है और कुछ देर में मुंबई उड़ान भरेगा। इसी बीच ख्याल आया कि काफी दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं ...13 वर्ष पहले
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प्रकाश सिंह अर्श की दो सुरमयी गज़लें - लगता है जैसे एक ज़माना बीत गया जबसे कोई पोस्ट नहीं लगा पाया.. कारण सुनने में न आपको दिलचस्पी होगी और न ही मेरे बताने से कोई बात बनने-बिगड़ने वाली है, इसल...13 वर्ष पहले
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दलित मुद्दों पर मासिक पत्रिका "दलित दस्तक" 27 मई से आपके बीच - बहुत सहा, कुछ ना कहा; अब कहने की बारी है! दुनिया में अब ‘दलित दस्तक’ की हुई तैयारी है!! मित्रों, दरकिनार कर दिए गए लोगों के लिए अब फटकार कर सच बोलने का वक्...14 वर्ष पहले
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तेरी याद में -सतीश सक्सेना - *हम जी न सकेंगे दुनियां में * *माँ जन्मे कोख तुम्हारी से * *जो दूध पिलाया बचपन में ,* *यह शक्ति उसी से पायी है * *जबसे तेरा आँचल छूटा,**हम हँसना अम्मा भूल ...14 वर्ष पहले
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आज अविनाश वाचस्पति का जनमदिन है - आज, 14 दिसम्बर को नुक्कड़, तेताला, बगीची, पिताजी वाले अविनाश वाचस्पति का जनमदिन है। बधाई व शुभकामनाएँ14 वर्ष पहले
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मेरा सवाल 168 - नमस्कार . बहुत दिनों के बाद फ़ुर्सत मिली है आज .दरअसल पिछले कुछ महीनों से व्यस्त था. स्कूल सर्विस कमीशन की परीक्षा थी . इंटरव्यु था. सेलेक्शन हुआ और एक...14 वर्ष पहले
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वन्देमातरम की स्वर लहरियाँ बिखेरतीं 6 सगी मुस्लिम बहनें - पिछले दिनों मुस्लिमों द्वारा वन्देमातरम् न गाने के दारूउलम के फतवे पर निगाह गई तो उसी के साथ ऐसे लोगों पर भी समाज में निगाह गई जो इस वन्देमातरम् को धर्म स...15 वर्ष पहले
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कुण्डलियाँ : अरविन्द कुमार झा - १- मना लो तुम भी होली *होली में बढ़ती सदा इन चीजों की मांग* *कपडे खोया साथ में दारू, गांजा, भांग* *दारू, गांजा,भांग,छान मस्ती में सब ज...15 वर्ष पहले
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हिंदी ई-पुस्तकों के कुछ उपयोगी लिंक्स - *ई-बुक्स * हिन्दीकुंज ई पुस्तकें - http://www.hindiebook.co.cc/ रचनाकार ब्लॉग - http://rachanakar.blogspot.com/2007/02/hindi-sahitya-e-book.html हिंदी सम...15 वर्ष पहले
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Blog - Hi friend,.......... i am Dr. Sushila Gupta , I blog in hindi and english. The following is the list of my blogs:- . http://drsushilaguptaa.blockspot.c...15 वर्ष पहले
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" 19 दिसम्बर की वह सुबह "------------मिथिलेश दुबे - रोज की तरह उस दिन भी सुबह होती है, लेकिन वह ऐसी सुबह थी जो सदियों तक लोगों के जेहन में रहेगी । दिसंबर का वह दिंन तारीख 19 , फांसी दी जानी थी पंडित रामप्रसा...15 वर्ष पहले
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किन्नर,किन्नर,किन्नर....अरे हम किन्नर नहीं लैंगिक विकलाँग हैं जिन्हें तुम हिजड़ा कहते हो - प्रेम, आदर, सहानुभूति जैसे भावों के चलते ही सही पर हमें किन्नर कह कर संबोधित करा जाता है जो कि किसी भी तरह से हमारी स्थिति की व्याख्या नहीं करता। न ही यह श...15 वर्ष पहले
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क्या वर्धा सम्मेलन में सिर्फ़ अपनों को ही रेवडी बांटी गई? - ए राजा बिटवा हमरे तीन सवालन का जवाब तो दे तनि हां त बच्चा लोग आवो आवो...अम्माजी का बिलागवा पर तुम्हरा सबहिका स्वागत है। हम आप सबसे कुछ सवाल पूछा चाहती हैं...15 वर्ष पहले
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Akhilesh ji ko patr - 27. 9. 10 प्रिय अखिलेश जी, आपका पत्र संख्या 2, दिनांक 21. 9 10 का पत्र मिला। धन्यवाद। आपने पुस्तकें वापिस करने वाले प्रश्न पर जवाब सोच समझकर ही दिया होगा तभ...15 वर्ष पहले
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गजरौला टाईम्स में 'देशनामा' - 12 जून 2010 को उत्तरप्रदेश से साप्ताहिक गजरौला टाईम्स में देशनामा का क्रोध अनलिमिटेड15 वर्ष पहले
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सीता की दुविधा, रामकथा का नया रूप - फिल्म समीक्षा: रावणनिर्देशक मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ दो घंटे बीस मिनट चलने वाला एक ड्रामा है, जिसकी कहानी के कुछ हिस्सों से आप परिचित हैं, कुछ नए हैं। लाल ...15 वर्ष पहले
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अक्सर ये पानी से निकल कर और मुँह खोलकर धूप सेंकते हैं - मछली, कछुआ, जल-पक्षी और यहाँ तक कि छोटे हिरण और जंगली सुअर इनके आहार हैं। जाड़े के मौसम में जब तापमान काफी गिरा रहता है तब ये ज्यादा सक्रिय नहीं रहते हैं, ...15 वर्ष पहले
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मीडिया का अछूत गांधी - इस गांधी की चर्चा मीडिया में अकसर ना के बराबर होती है और अगर होती भी है तो, सिर्फ और सिर्फ गलत वजहों से। मीडिया और इस गांधी की रिश्ता कुछ अजीब सा है। न तो ...15 वर्ष पहले
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सार्थक सृजन ( मार्च 2010 ) - सम्पादकीय ‘सार्थक सृजन’ को अच्छे पाठक और सशक्त रचनाकार मिले, यह गौरव की बात है। पिछ्ले अंकों को पढ़कर सार्थक टिप्पणियों के लिए सुधी पाठकों का आभारी ...16 वर्ष पहले
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पॉंच अंकों में पहुँची चिट्ठों की तादाद - ये छोटी सी पोस्ट इस बात की बधाई बजाने के लिए हुई है कि चिट्ठाजगत पर दर्ज हिन्दी चिट्ठों की तादाद ने अब पॉंच अंको को छू लिया है। ये स्क्रीनशॉट देखें- ...16 वर्ष पहले
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सुधा भार्गव का जीवन परिचय - * नाम - सुधा भार्गवजन्म तिथि - 8 मार्च 1942जन्म स्थान - अनूपशहर जिला-बुलन्दशहर (उ0प्र0)माता - स्व0 श्रीमती तारा देवी भार्गवपिता - स्व0 डा0 ज...16 वर्ष पहले
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बेटियाँ - *बेटियाँ-* *शीतल हवाएँ हैं * *जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं* *ये तरल जल की परातें हैं* *लाज़ की उज़ली कनातें हैं* *है पिता का घर हृदय-जैसा* *ये हृदय की...19 वर्ष पहले
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