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शुक्रवार, 10 जून 2011

अन्नदाता का आक्रोश

जागत रहीया भाय किसान,जायल चाहत बा सीवान

इतिहास गवाह है कि जमीन के लिए जाने कितने जंग हुए हैं। किसान के लिए जमीन मां का दर्जा रखती है। अगर उसकी मां पर आंच आता है तो वह मर-मिटने को तैयार रहता है। जमीन की जंग सिंगुर, भट्टा परसौल, ग्रेटर नोएडा से होते हुए चन्दौली के कटेसर गांव तक पहुंची है। हालांकि किसानो ने प्रशासन को एक माह की मोहलत जरूर दिया है मगर जंग खत्म होने के पूरे आसार नहीं हैं। बकौल रामलखन यादव, अध्यक्ष, किसान संघर्ष समिति कटेसर ‘‘अगर प्रशासन ने तय एक माह के अन्दर धारा- 4 6 का प्रकाशन नहीं रोका तथ पुनः भूमि अधिग्रहण चालू किया तो हम संघर्ष के लिए बाध्य होंगे। जान भले दे देंगे मगर एक इंच जमीन नहीं देंगें।’’ तकरीबन तीन माह पहले छिड़ी जमीन की जंग परवान चढ़ चुकी है तभी तो भूमि अधिग्रहण सीवान बेचैन किसान गांव में घूम कर आवाज देते हैंजागत रहीया भाय किसान, जायल चाहत बा सीवान
अन्नदाता पर संकट के बादल उस वक्त मण्डराना शुरू हुए जब वाराणसी विकास प्राधिकरण ने 16 अप्रैल 2011 को जारी फरमान में कहा कि कटेसर डोमरी गांव की 121 हेक्टेयर जमीन सांस्कृतिक नगरी (नई काशी) का निर्माण होगा जिसकी वजह से यहां जमीन की खरीद फरोख्त पर रोक लगाया जाता है। इस फरमान के बाद तो मानो अन्नदाता का आक्रोश चरम पर जा पहुंचा। विगत 24 अप्रैल से धरना-प्रदर्शन का जो दौर शुरू हुआ वो 29 मई को जर, जोरू और जमीन के पुराने फलसफे की तरफ जा पहुंचा। जमीन नहीं जान देंगे के उद्घोष के बाद किसान लामबन्द होकर 30 मई को आत्मदाह के लिए चिता सजाने लगे। अब बारी किसानों का था, किसान संघर्ष समिति, कटेसर ने जिला प्रशासन को अल्टिमेट जारी किया कि अगर 01 जून तक भूमि अधिग्रहण नहीं रूकता है तो किसान आत्मदाह करेंगे। फिर किसान आन्दोलन भट्टा परसौल की राह अख्तियार किया। आन्दोलन पर धीरे-धीरे सियासी रंग चढ़ना शुरू हुआ। सपा, भाजपा, कांग्रेस, भारतीय किसान यूनियन, भकपा माले, मजदूर किसान मजदूर संघ के नेता कटेसर पहुंचे।

जमीन के जंग का आगाज......
उत्तर प्रदेश का चन्दौली जनपद नक्सल प्रभावित जिले में शुमार किया जाता है। यहां लोगों के जीवन का सहारा कृषि है। जपनद को कभी धान का कटोरा कहा जाता था मगर प्राकृतिक संसाधनों में बदलाव प्रशासनिक उपेक्षा के चलते यहां के किसान दाने-दाने को मोहताज होते गये। नक्सलवाद यहां बढ़ा और अनेकों नक्सली वारदात हुए। अगर नक्सलवाद के जड़ में जाया जाए तो कहीं कहीं भूखा, पीडि़त प्रताडि़त किसान मजदूर राह भटके। कटेसर गांव की 121.935 एकड़ कास्त की जमीन पर अधिग्रहण का साया पिछले साल 16 जून को धारा-4 के प्रकाशन के बाद मण्डराना शुरू हुआ। इससे पुर्व गजट के प्रकाशन के अलावा भूमि अधिग्रहण की मुनादी करायी गयी। प्रक्रिया पूरा होने के बाद 30 जनवरी 2011 को भूमि अध्याप्ति अधिकारी को 10 करोड़ रूपये मुहैया कराया गया। भूमि अध्याप्ति विभाग ने 26 मार्च 2011 को धारा- 6 के प्रकाशन के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा। शासन ने धारा- 6 के प्रशासन से पहले किसानों को मुआवजा देने के लिए 39 करोड़ रूपये की डिमाण्ड की। इसके लिए भूमि अध्याप्ति अधिकारी ने 02 फरवरी 2011 को वाराणसी विकास प्राधिकरण उपाध्यक्ष को पत्र भेजा। सांस्कृतिक नगरी के निर्माण लिए कटेसर के 550 किसानों की जमीन का अधिग्रहण होना है। तमाम निवेद फरियाद के बाद मामला नहीं बना तो किसान संर्घष समिति, कटेसर के बैनर तले किसान आन्दोलन के लिए लामबन्द हुए।

आरहा प्रशासनिक अमला धरनारत किसानों को मनाने कटेसर पहुंचा मगर नतीजा शिफर। 30 मई को जब जिलाधिकारी पहुंचे तो मामला गंभीर होता दिखा। लोगों के जेहन में भट्टा परसौल का मंजर ताजा हो गया। हालांकि भट्टा परसौल से नसीहत लेकर प्रशासन ने सुरक्षा का माकूल इंतजाम कर रखा था। जवान पहले पहुंचे, हुक्मरान बाद में। एकबारगी तो जवान और किसान आमने-सामने हो गये। किसानों के हाथ में हसिया, खुरपी, लाठी-फावड़ा जो जवान असलहों से लैस। किसनों ने जिलाधिकारी की एक सुनी और नारे लगाते रहे- जमीन नहीं जान देंगे। जिला प्रशासन अन्ततः मायूस वापस लौट गया। अब किसान आर-पार की लडाई के मूड में पहुंच गये। चितायें सज चुकी थीं, जमीन के लिए जान देना किसानों के लिए मामूली बात थी। बस इंतजार 01 जून का था। प्रशासन के हाथ-पांव फूलने लगे। पिछले तीन माह से लुका-छिपी खेल रहे प्रशासन को अंततः कटेसर के संघर्षरत किसानों के आगे झूकना पड़ा। पूर्व घोषण के मुताबिक सैकडो की संख्या में पुरूष, महिलाये बच्चे लाठी-डंडा, फावडा-कुदाल लेकर धरना स्थल पर अल्सुबह पहुंच गये। महिलाओं का जोश पुरूषों से कहीं कम था। दूसरी जानिब जिले के थानों से भारी मात्रा में फोर्स भी पहुंचने लगी। किसान आर-पार की जंग के लिए तैयार थें। जमीन बचाने का जज्बा, मौत से कहीं ज्यादा था। सजी चिता पर 60 साल के रामलखन तैयार बैठे। दूसरी जानिब युवा तैयार। बस इंतजार था तो अगली सुबह का। जय जवान, जय किसान। जागत रहा भाय किसान, जायल चाहत बा सीवान। के नारे फिजां में मुंजाए मान थें। मानों आज अन्नदाता एक नया इतिहास लिखने को अमादा था। आठ बजे एसडीएम राआसरे सीओ धरना स्थल पर पहुंच कर जिलाधिकारी चन्दौली विजय कुमार त्रिपाठी द्वारा प्रमुख सचिव आवास शहरी नियोजन को लिखे पत्र की प्रतिलिपी किसानों को सौंपा। पत्र में जिलाधिकारी ने घटनाक्रम का हवाला देते हुए धारा- 4 6 के प्रकाशन को निरस्त करने की संतुति की गयी। इसपर भी किसान मानने को तैयार नहीं थे फिर एसडीएम ने कहा कि एक माह के अन्दर र्कावाही पूरी हो जाएगी। चेतावनी देते हुए किसानों ने कहा कि भूमि अधिग्रहण समाप्त हुई तो आन्दोलन दोबारा शुरू होगा। चितााओं की लकड़ीया प्रशासन ने अपनी गाडी में भरकर वापस गये। किसान एकता जिन्दाबाद के नारे चारो जानिब गूंज उठे।

भट्टा परसौल की नसीहत और कटेसर की जंग....

शाख के वो पत्ते नहीं जो हवा से टूट जाए हम,
और आंधियों से कह दो कि अपनी औकात में रहे।
कटेसर के किसानों ने इसी जज्बे से संघर्ष की एक नई इबारत लिख दी। इबारत एकजुटता की, संघर्षशीलता की और इबारत लिखी सिर उठा के जीने की। आप चाहे इसे भट्टा परसौल की नसीहत कहें, ग्रेटर नोएडा में अधिग्रहण रद्द करने के कोर्ट के फैसले से मिली प्ररणा या फिर जीवन-मरण से जुड़े सवालों से जुझने कर जज्बा। शायद इसी जज्बे ने प्रशासन को बैकफुट पर ला दिया। आनन-फानन में सरकार ने नयी भूमी अधिग्रहण नीति का एलान किया।

अगर देखा जाए तो कटेसर गांव की कुल आबादी दस हजार है तथा यहां के लोगों की जरिया--मास खेती है। अन्य जगहों की तरह यहां के लोगों में भी मतभेद हैं। पट्टीदारी का विवाद तो राजनीतिक प्रतिद्वंदिता भी। मगर जमीन के मुद्दे पर जान देने के लिए सब एकजुट हैं। क्या हिन्दु क्या मुसलमान। वर्तमान प्रधान रामफल तो पूर्व प्रधान रामलखन में चुनावी प्रतिद्वंदिता जरूर है मगर आन्दोलन में हमराह। क्या विजय यादव क्या सोहराब मियां सबका मकसद एक कैसे बचे जमीन। पुलिस लाठी-गोली चलाएगी तो चलाए हम तैयार हैं। आन्दोलन का जुनून लोगों में ऐसा था कि पौ फटते ही बड़ी संख्या में पुरूष, महिलाएं बच्चे धरना स्थल पर डट जाते। जंग का आगाज जीत से भले हो मगर बिना शोर शराबा के। जमीन बचाने और फांकाकशी की आशंका के बादल छटने के आसार ने गांव के लोगों में एक नई उर्जा का संचार कर दिया। संगठन की शक्ति का मुजाहिरा कहें या भट्टा परसौली की नसीहत, कटेसर की जंग के आगे प्रशासन बैकफुट पर आगया।

राख की ढ़ेर में अभी चिंगारी बाकी है...


कटेसर के किसानों ने प्रशासन को भले ही एक माह का मोहलत दे दिया हो मगर जब तक भूमि अधिग्रहण का मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता वे चैन से रहने वाले नहीं हैं। किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष रामलखन बताते हैं कि किसान किसी भी कीमत पर जमीन नहीं देंगे चाहे जान भी देना पड़े। एक सवाल के जवाब में उन्होने कहा कि कोई अधिग्रहण नीति आवे और कितना भी मुआवजा मिले एक इंच जमीन नही दिया जाएगा।
हमारी सिर्फ एक मांग है, धारा-4 6 का प्रकाशन निरस्त हो। रामलखन बताते हैं कि अगर प्रशासन एक माह मे अधिग्रहण रद्द नहीं करता है तो किसान पुनः चिता सजा कर आत्मदाह करने पर मजबूर होंगे। सोहराब बचउ, राबृक्ष, संग्राम सिंह सहित सैकडों किसानों के सामने भूमिहीन होने का संकट था जो फिलहाल टल गया है। अगर सरकार कटेसर में सांस्कृतिक नगरी बनाने के फैसले से पीछे नहीं हटती है तो किसान जान की किमत पर जीमन बचाने के लिए तैयार हैं।

मंगलवार, 7 जून 2011

संवेदनाओ के सौदागर


मानवीय संवेदनाओं को
बेचने का अनवरत क्रम
बड़ी सिद्दत से फैला रहा
अपना उपक्रम
तमाम चैनलों के बीच मची है
टी आर पी की मारा मारी
जैसे ही दीखती है कोई अतीत की
सामाजिक विषमता हलकी या भारी
कूद पडतें है जैसे लकडहारा
पेड़ पर लिए टगारी
हालाँकि इन विषमताओं की चौड़ी खाई
वर्तमान में हो चुकी एकदम ही संकरी
पर पुनः मिर्च मसाला लगाकर
बनाते इसे ये दर्शकों के
गले की फंसरी

कोई समुचित समाधान होता नहीं
उनके पास अपने इस एजेंडे में
तुरंत लग जाते है ये इसको
किसी तरह बस भुनाने में
कर संवेदनाओं और आंसुओं का
अतीव सरोतर मिश्रण
टी आर पी से कर दर्शकों का परिक्षण
मानवीय भावनाओं का करते ये
जी भर कर शोषण
अपनी जेबें ये करते खूब भारी
समस्याएं रह जाती है
जस की तस सारी

सालों साल बालिका बधू बंदिनी जैसे
सीरियल देखने के बाद दर्शक
अपने को ठगा पाता है
मुद्दे की संजीदगी को
जब धूमिल पाता है
अंत में चैनेल बदल देता है
जहाँ दूसरे महोदय भी बैठे है
लगाये अपनी संवेदनाओ की दुकान
संतुष्टि की तलाश में प्रतिज्ञा की ओर
भागता दर्शक तलाशता
वहां अपना मुकाम
पर अफ़सोस वहां भी वह
महीनो ठगा जाता है
तब कुछ कुछ समझ पाता है

तब तक चैनेल ग्रामीण पृष्ठिभूमि पर
आधारित तमाम सीरियल और विलेज गर्ल
जैसे रियल्टी शो को नए
कलेवर के साथ लिए आते है
ग्रामीण पृष्ठिभूमि का भरपूर मजाक उड़ाते है
जब तक शो समाप्त होता है
गाँव अपनी संस्कृति को
लुटा देखता है

पुनः ये लेकर आते है
राखी का स्वयंवर
जहा खूब होती है नौटंकी जी भर कर
अतीत के दर्शन कि लिए इच्छा
दर्शक महीनो तक करता प्रतीक्षा
अपनी कोमल भावनाओ का
भरपूर शोषण कराता
पुनः अपने को निराश
खाली हाथ पाता

हद तो तब हो जाती है
जब तमाम सामाजिक स्टंट से घिरी
इटम नायिका को
इंसाफ की देवी बना दिया जाता है
तमाम रियल्टी शो के जरिये
मासूमो का मजाक उड़ाया जाता है
अपने क्षेत्र के फ्लाप हस्तियों को
जज बनाकर अवाम को छला जाता है

हा कामेडी पर आधारित कुछ
सीरियल दर्शको का भरपूर
मनोरंजन करने का प्रयास करते है
मगर इस प्रयास में ये भी
द्विअर्थी और फुअड संवादों से
मर्यादा की सीमा लांघते दीखते है
फिर भी आजकी व्यस्तमम जीवनशैली में
जहाँ एक व्यक्ति हंसी को
लगभग भूल चुका है
उन्हें ये सीरियल कुछ हद तक
सुकून देते है

पर जब कभी ये माँ बाप को
बदलने का मसौदा परोसते है
कभी बच्चे को बदलने का
असामाजिक प्रयोग ये करते है
सास और बहुओं को एक दूसरे को
तंग करने के नए नए हत्कंडे सिखाते
नाजायज संबंधो को जायज ठहराते है
स्वयं को हास्यास्पद बनाते है
धन का भरपूर दोहन करते हुए
अपने स्वार्थ के लिए
एक सीधे सादे दर्शको की
भावनाओं पर प्रहार करते हुए
सिर्फ और सिर्फ इमोसनल
अत्याचार ही तो करते है

सोमवार, 6 जून 2011

पर्यावरण

भौतिकता पर्यावरण के लिए घातक
भौतिकता की वजह से हम पर्यावरण से काफी दूर होते गये हैं। पर्यावरण मनुष्य के जीवन को संतुलित रखता है। वृक्षों की अंधाधुंध काटाई तथा पानी की बर्बादी कर हम प्रकृति के साथ खिलवाड कर रहे हैं जिसका परिणाम हमें भीष्ण गर्मी कम वर्षा के रूप में भोगना पड रहा है। उक्त बातें डा0 अरविन्द मिश्र ने संकल्प सेवा समिति द्वारा आयेजित पर्यावरण संरक्षण विषयक संगोष्ठि में कहा। उन्होने कहा कि जंगल सिकुड रहे हैं तथा जीव-जन्तु समाप्त होने के कगार पर हैं। भूगर्भीय जल के लगातार दोहन से पानी मुश्किल होता जा रहा है। यही कारण है कि पर्यावरण असंतुलित होने लगा है।

संस्था के अध्यक्ष एम. अफसर खां सागर ने कहा कि वृक्षों की कमी से जलवायु परिवर्तन का दौर खडा हो गया है जिसके लिए वन क्षेत्रों के संरक्षण की खातिर प्राकृतिक चीजों को संरक्षित करना जरूरी है। हर व्यक्ति ये ठान ले कि वर्ष में कम से कम एक पेड जरूर लगाना है तब जाकर पर्यावरण दिवस मनाना सार्थक हो गया। हमको चाहिए कि ऐसी चीजों का इस्तमाल बन्द कर दें जिससे पर्यावरण को नुक्सान पहुंचता हो। आइए संकल्प लें कि हम पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करेंगें।
इससे पहले संस्था द्वारा धानापुर कस्बा में विभिन्न जगहों पर दर्जन भर पौधे लगाये गये। संगोष्ठि में विवेक यादव, आरिफ खां, असफाक खां, रामनगीना, तबरेज, अच्युतानन्द, इरफान खां, अंकित, हामिद अबरार, प्रिंस कलाम, उमर खां, सर्फराज खां समेत अनेक गणमान्य लोग मौजूद थें।

आपसे निवेदन है कि एक बार ज़रूर संकल्प सेवा समिति के ब्लॉग पर आयें... http://sankalpsewasamiti.blogspot.com

रविवार, 5 जून 2011

आगाज़

संकल्प सेवा समिति


समाज सेवा के संकल्प के साथ सांकल सेवा समिति, धानापुर-चंदौली समाज में देश प्रेम के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए कटिबद्ध है.
एम अफसर खान सागर
अध्यक्ष, संकल्प सेवा समिति
धानापुर-चंदौली

आप सभी से निवेदन है कि अपने विचार हमे....

sankalpsewasamiti@gmail.com

पर भेजें और संकल्प सेवा समिति से जुड़ें।

एक बार ब्लॉग पर जरूर आयें...

http://sankalpsewasamiti.blogspot.com

शुक्रवार, 3 जून 2011

विद्रूपता

हर आतंकी हमले के बाद
हम किसी तरह उबरते है
बमुश्किल सीना तान
कर खड़े होते है
फिर मिडिया और तमाम
मंचो से हमारे जिन्दादिली के
गुण गिनाये जाते है
हमें हर हालत में
मुस्कुराना सिखाये जाते है

क्या यह एक अवांछित
एडजेस्ट मेंट कि नहीं है छद्मता
है यह विद्रूपता
कहते हुए उन्हें गुमराह
चल पड़ता है देश अपनी राह

कहा जाता है जीवन
चलने का नाम है
आखिर क्या इसका निदान है
फुलप्रूफ सिक्यूरिटी के नाम पर
इतना पैसा बहता है
फिर भी यहाँ का संसद भी
सुरक्षित नहीं रहता है
हर दुर्घटना के उपरांत ही
आती है तेजी
निरीह निरीह नागरिको की
होती है पेशी
ऐसी वारदात हो ही न
इसका हो न सका आजतक
कोई पुख्ता इंतजाम
मचा है चारो ओर
बस झाम ही झाम
कही न कही सिस्टम में
दीखता है होल
कौन खोले इनकी पोल
शेर की खाल पहने
सब सियार है यहाँ
करते शेरों से मेल
सच के शेर भी
भूल चुके है अपनी गर्जन
आसन्न एक भीषण परिवर्तन
जब तलक जारी है
अनवरत चोर और सिपाही का
यह सियासती खेल
व्यर्थ है फंसी के फंदे
और बड़ी से बड़ी
जेल

मंगलवार, 31 मई 2011

तीसरा पुरस्कार

पा पा पापा
कहते राधिका ने
धीरे से ऑंखें खोला
रामसिंह ने उसका हाथ
अपने सीने से लगाते हुए
डॉक्टर से बोला
डॉक्टर बाबु बिटिया अब
हमारी होश में आ गयी
रेस में तो वह फर्स्ट
पहले ही आ गयी थी

पूरा स्कूल प्रिंसिपल के साथ
बाहरकर रहे है इसकी प्रतीक्षा
पूरी करने को इसकी इक्षा
बिटिया उठौ चलो
अपना प्रथम पुरस्कार
साइकिल लई लो
सबके संग फूटू खिचवा लेयो
यह सुन राधिका हो गयी उदास
बाहर प्रेसवाले भी
कर रहे थे उसका इन्तजार

मै भी बगल के बेड पर
अपने बीमार बच्चे के साथ था
जिसके स्वास्थ्य में क्रमशः
सुधार हो रहा था

मैंने पूछा बिटिया
तुम क्यों हो गयी हो उदास
बोली अंकल आओ हमरे पास
मै न तीसरे स्थान पर
आना चाहती थी
तीसरे स्थान के पुरस्कार
मिक्सी को मम्मी के लिए
पाना चाहती थी
इसीलिए बुखार होने के बाद भी
पूरे लगन से
इस रेस में दौड़ी थी
काफी दिनों से मम्मी
हाथ के दर्द से कराहती है
पापा कि आय देख कर
मजबूरी में उनसे
कुछ नहीं कहती है

हमारे द्वारा बड़ी पापड़ और अचार
बनाकर बाज़ार में बेचा जाता है
तब किसी तरह घर का खर्च
मेरी पढाई के साथ चल पाता है
सिल बट्टे पर अब
मम्मी के हाथ नहीं चलते है
ज्यादा मेहनत करने से
हाथो में छाले पड़ जाते है

पहली बार प्रथम आने पर
मैंने किसी को उदास पाया
प्रेमचंद के इदगाह का हामिद
बरबस याद आया
मन ही मन मैंने
यह सोच लिया था
अस्पताल से फुर्सत पाने के बाद
प्रथम के साथ तीसरे स्थान का
पुरस्कार भी राधिका को
देने को ठान लिया था

शनिवार, 28 मई 2011

राजनीति

समाजवादी पार्टी में घमासान

चंदौली के सय्यदराजा विधानसभा में सपाई नाराज चल रहे हैं, वजह है यहाँ से बहरी उम्मीदवार को उतरना
पेश है इंडिया न्यूज़ हिंदी साप्ताहिक पत्रिका के 03 जून 2011 के अंक में छपा रिपोर्ट...

बुधवार, 25 मई 2011

भयाक्रांत स्वंतंत्रता

भीषण जेठ कि तपन
समाप्त हो रही थी
मानसून दस्तक ने चुकी थी
घर से स्कूल के लिए
यह सोच कर निकला कि
आज तो रेनी डे हो ही जायेगा
स्कूल से निकल कर
दूर सीवान के तालाब पर
दोस्तों संग होगी बैठक
खायेगे भूजा आपस में बाटकर
साथ ही कागजी नावों की
होगी दमदार टक्कर
पर जैसे ही तालाब पर पंहुचा
किनारे पर एक तोते के बच्चे की
कराह से मन बिलखा
दो कौवों के आक्रमण से आक्रांत
मेरी ओर कातर देखता भयाक्रांत
मानसून कि प्रस्तावित मस्ती भूलकर
उसे घर ले आया बस्ते में डालकर
काफी दिनों से घर में
एक पिजड़ा खाली पड़ा था
उसके घावों को धो डीटोल से
उसे मैंने उस पिजड़े में डाला था
सुबह शाम पढाई के साथ
उसकी देखभाल और दानापानी
बन गयी मेरी दिनचर्या
उस अनाम रिश्ते पर मेरा
पॉकेट मनी होने लगा खरचा

दिन पर दिन नूतन आयामों के बीच
उसके हमारे संबंधों में
प्रगाढ़ता बढती गयी
एक बेनाम रिश्ते को जन्म देती गयी
समय अपनी अबाध गति से चलता रहा
वह बच्चे से व्यस्क तोता
बनता गया
स्वतंत्र विचारों की प्रगतिशील
मानसिकता मेरी
मुझे रोज धिक्कारती
कि इसके अन्दर अपनी जिन्दगी
अपने ढंग से जीने का जज्बा आ गया है
इसे कैद से मुक्त करने का
समय आ गया है
इस बेनाम रिश्ते को यही
समाप्त कर देना चाहिए
इसके प्रति अपनी अंतिम
जिम्मेदारियों को पूरी कर देनी चाहिए

पर मन में था कही यह भी मलाल
कि पहले यह ले अपने को
सम्पूर्णता से संभाल
अपना अस्तित्व बचाने में
हो जाये यह सक्षम
वास्तविकता पर भावना का
दूर हो यह भ्रम
कलेजे पर रख पत्थर
इस सम्बन्ध को यही समाप्त कर दूगा
उसी दिन इस अनाम रिश्ते से
सदा के लिए मुक्त हो जाऊंगा

वह दिन भी आ गया
बेटू को पिजड़े में होने लगी दिक्कत
देख उसकी मशक्कत
छत पर ले जाकर पिजड़ा
छिपाकर उससे अपना अवसादित मुखड़ा
भीगे आंसुओं से मुक्त कर
कर दिया उसे विदा
उपरांत भारी मन से
स्कूल चला गया

पूरा दिन बेचैनी और
अवसाद का बना साक्षी
बेशक था वह एक पक्षी
पर उस अनाम से रिश्ते ने
आज पूरा दिन ही मुझे रुलाया था
पढाई आज मुझे
तनिक भी नहीं भाया था

शाम तनिक देर से घर लौटा
छत पर बेटू की आवाज सुनकर चौका
भागता हुआ छत पर पहुंचा
देखा बेटू मजे से पिजड़े में
आराम फरमा रहा था
मै आश्चर्य से कभी उसे कभी
उस पिजड़े को देख रहा था
लगा शायद कही मेरे आने का
इन्तजार तो नहीं कर रहा था
पास पीपल के पेड़ पर
बैठे दो गीध
उस पर नजर गडाए थे
मुझे पुराने दिन याद आये थे

आज भी मानो बेटू मुझसे कह रहा था
बचा लो मुझे इन भेड़ियों से
हमारे अनाम रिश्ते की दुहाई दे रहा था
मुझे अब जाना नहीं है यहाँ से
उस आजादी से
यह कैद है बेहतर
जहा आप जैसो का
सानिध्य है सुन्दर
इस कैद का जीवन उस
स्वतंत्रता से है अच्छा
जहाँ मिलती है प्यार दुलार और
नसीहत के साथ भरपूर सुरक्षा

मुझे अभी और
बहुत कुछ है जानना
आदर्श जीवन दर्शन को है पहचानना
कैद में भी रहकर उसकी आँखों में
सुख और संतोष का
आंसू भर आया

उस अज्ञात और असीमित
ख़ुशी को मन में दबाया
पिजड़े को नीचे आंगन में लाया
उसे दाना पानी देकर
उसके पास बैठ कर सोचते हुए
वर्तमान सामाजिक परिवेश में
मै प्रवेश कर गया
एक नए बहस को जन्म दे गया
कि कैसे बेहतर है
भयमुक्त गुलामी एक
भयाक्रांत स्वंतंत्रता से
आज भी हमारे बूढ़े जो कहते है
क्या सच में
अतीत की परतंत्रता बेहतर थी
वर्तमान स्वतंत्रता से

सोमवार, 23 मई 2011

मुद्दा

बेमकसद एक शिक्षा...
उत्तर प्रदेश सरकार का एक प्रोग्राम जिससे फायदा की जगह नुकसान ही हो रहा हैमुस्लिम समाज के कल्याण की खातिर एक पहल जो ज़रूर हुयी मगर नाकामयाबइंडिया न्यूज़ साप्ताहिक पत्रिका के 27 मई 2011 के अंक में प्रकाशित यह रिपोर्टआपके हवाले...
एम अफसर खान सागर
09889807838



आद्यांत

पिछले पंद्रह दिनों से
बेटे के यहाँ स्टोर रूम में पड़ी थी
दो रूम का फ्लैट और
उस पर गर्मी सड़ी थी
बेटे के बड़े आग्रह पर
गाँव से शहर अपने दमे के
इलाज के लिए आयी थी
पर यहाँ के आबोहवा में
गाँव कि बात कहाँ थी
पूरी कायनात वायु जल
ध्वनी प्रदुषण से बजबजा रही थी
पर बेटे बहू और पोते के
सानिध्य और सुख कि चाहत ने
बेटे के बेमन से ही सही
किये गए आग्रह से वह
यहाँ आ तो गयी
पर ठीक होने से रही

जेठ की दोपहरी में
आराम फरमा रहे थे
बेटे बहू सब अपने कमरे में
बच्चो के साथ कूलर कि शीतल हवा में
वह खोमोश एक फालतू
वस्तु की तरह स्टोर में लेटी थी
एकाएक खांसी ऐसी आयी की
रोके न रुक रही थी

बाहर निकल कर आंगन में
जैसे ही शीशे के ग्लास को
पानी के लिए हाथ लगाया
उम्र का तकाजा पैर लडखडाया
किसी तरह अपने को
गिरने से बचाया
पर बचा नहीं सकी उस
दो रुपल्ली के गिलास को
जिससे बुझाने चली थी
अपनी प्यास को

छन् की आवाज के साथ
चकनाचूर हो पूरे आंगन में
शीशा फ़ैल गया
बहू तो बहू बेटे न भी
उसे आड़ो हाथ लिया
कब तोहे अम्मा समझ आइये
मुनिया क मम्मी तोहे का का बताइए
दुई घड़ी चैन न रहि सकित हो
अकल कहाँ बेच दई हो
कई बेर कहा की तनिक
देख कर चला कर
आखिर संतोष होई गवा न
गिलास तोड्वा कर

बहू भी साथ में बरसती रही
माँ बस सोचती रही
बचपन में केतना गिलास
अउर केतना बर्तन लल्ला तोड़ चुका हयन
कबौ एका मार त दूर
डटो न पड़ा रहेन
कितनी परेशानियाँ अउर प्यार से
एका हम पाला रहा
आज उहे बबुआ हमका नसीहत दै रहा
बचपन में जेका हसी आंसू अउर
हाव भाव से हम ओका जरूरत
भरपूर मजे मा भापत रही
उहे बबुआ आज हमरी समझ में
खोट अउर कमी निकलत हई
सोचते सोचते माँ की आंखे
आंसुओं से भर गयी
पर उसे देखने की फुर्सत किसे थी

सच उस माँ न न जाने
कितने जतन से उसे पाला था
अपनेआप को उस पर
कुर्बान कर डाला था
आह्लादित मनसे अनवरत
शैशवावस्था से बालपन तक
करती रही थी जिसके मलमूत्र का
खुशी से विसर्जन
उसके एक एक आंसू पर करती रही
अपनी सौ सौ खुशियाँ अर्पण
बलैया लेते जिसकी थकती
नहीं थी दिन रात
उसे पता ही नहीं चला कि
अचानक कब आ गया
युवा रात्रि के उपरांत वृद्ध यह प्रभात

कृश हो चुके हाथो से
फर्श बुहार कर साफ करती रही
बहू कि आवाज थी कि
बंद होने से रही

आद्यांत
उसे लग रहा था कि वह भी
स्टोर की एक फालतू वस्तु बन चुकी थी
जिसकी जरूरत यहाँ किसी को नहीं थी
जबकि गाँव के खेत खलिहानों में
खेलते बच्चे और
पनघट पर पानी भरती बहुए
कल तक हर सुख दुःख में
साथ रहती थी
उसे दादी अम्मा कहते नहीं थकती थी
मन ही मन
कल सुबह ही वह भारी मन से
शहर छोड़ने का फैसला
कर चुकी थी

शुक्रवार, 20 मई 2011

प्यार

मेरे पास माँ है...




माँ ज़िन्दगी की ख्वाब, माँ दुनिया की सबसे बड़ी नेमत।
इन मुर्गी के बच्चों को जरा गौर से देखिये...
अपनी माँ से कैसे लिपटे हुए हैं। और इस माँ ने अपने बच्चों को कैसे अपने ऊपर, अपने परों में छिपा रक्खा है।
यही है माँ का अनूठा प्यार। सरे जहाँ की नेमतों में सबसे बड़ी नेमत है माँ का प्यार, इसी लिए लोग कहते हैं कि
मेरे पास माँ है, माँ...

मुनव्वर राना के शब्दों में...
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में जाती है,
माँ दुआ करती हुयी ख्वाब में आजाती है

मुसीबत के दिनों में माँ हमेशा साथ रहती है,
पयम्बर क्या परेशानी में हिम्मत छोड़ सकता है

एम अफसर खान सागर

गुरुवार, 12 मई 2011

अपनी संस्कृति

अअरे रामकुमर
देख ऊ आवत आ
जवन कलिहा तोहे अस तोरान तोड़े रहा
तबियत से तोहे पीटे रहा
चल ओके बतावा जाये
तब न ओके समझ में आइये
कि तोडाय पर कैसा दर्द होइए
नाही त ऊ हम गाँव वालन के
बौचट समझिये

सुन ठिठक गए मेरे कदम
टूटने वाला ही था मेरा भरम
देखा तो बगल कि गली में
कुछ बच्चे कंचे खेलने में मस्त थे
तन्मयता से अपने खेल में
तबियत से व्यस्त थे
उसी में वह लड़का भी था
जिसे कल मैंने मुखियाजी के
बारात में पीटा था

वस्तुतः वह थोडा ज्यादा ही चंचल था
बालसुलभ चंचलता में मस्त था
अपनी ही धुन में पस्त
वह तेजी से मुखियाजी के दरवाजे पर
पहुँच चुकी बारात के मध्य
हमें चीरते हुए भागा
उसी चक्कर में पूरा दही
मेरे ऊपर गिर गया अभागा
क्रोध से लाल मैं कभी अपने
नए सूट को कभी उस लडके को देखता
क्रोध को शांत करने के एवज में
पकड़ उस लडके को रहा पीटता
कुछ लोगो ने उसे हमसे छुड़ाया
डांट कर उसे भगाया
खैर बात आयी गयी
सुबह जब हो रही थी
बारात कि विदाई
समय से ऑफिस पहुचने के लिए
मैं और मेरे एक साथी
गाँव से धीरे से निकले
तभी उक्त आवाज सुन कर सिहरे
मुझे देख रामकुमार मेरे करीब आया
बोला बाबू आप जिन घबराया
आप आराम से जाही
आप जो काल किये रहा
ऊ कौनों गलत नाही रहा
गलती त हमरे रहा
तोहरे जगह अगर हमऊ रहित
त ऊहे करित जौन तू किये रहा
अरे समुआ पिअरवा और धनुआ रुके रहा
केहू जिन आगे बढ़ा
तू सबै के मालूम होए के चाही
कि इ मुखियाजी क मेहमान हउवन
यानि सारे गाँव क मेहमान भइलन

दद्दा हमरे कहत रहिन कि
मेहमान त भगवान सामान होलें
इनके नाराज भइलें पर राम नाराज होलें
इनका हमें सम्मान करे का चाही
आयी चली बाबू हम तोहका
छोड़ देई पाही

मौन
मुझे तो मानो काठ मर गया
शिक्षित होने का गरूर झुझला कर
हमें शर्मशार कर गया
उस गवई बालक को जहाँ अभी तक मैं
अनाड़ी संस्कारहीन और
दुष्ट समझ रहा था
वह मुझे अच्छी तरह नैतिकता
और अपनी संस्कृति का पाठ
सरोतर पढ़ा गया था

शनिवार, 7 मई 2011

अकीदत के फूल


विजय मिश्र बुद्धिहीन पेशे से रेलवे में अधिशासी इंजीनियर हैं। इंजीनियर का काम होता है लोहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को समेट कर उसको रेलवे लाइनों पर चलाना, या यूं मान लें कि निर्जीव लोहे के टुकड़ों में जान भरकर उसको दौड़ाना। मगर 28 फरवरी 2010 को उनके जीवन गाड़ी मानो थम सी गयी। कहावत है कि अच्छे लोगों को ईश्वर जल्द अपने पस बुला लेता है। मैट की परीक्षा सर्वोच्च अंक से पास होने के बावजूद इनका सबसे दुलारा व सबसे बड़ा पुत्र आलोक इस फानी दुनियां को अल्विदा कह गया। उसे क्या मालूम कि उसके जाने के बाद लोहों में जान पैदा करने वाला इंजीनियर निर्जीव सा हो जायेगा। वह क्या जानता है कि किसके सहारे जिन्दा रहेगा उसका परिवार? मृत्यु सत्य है क्योंकि मरने के बाद फिर जिन्दा होना है। बकौल एक शायर.....
मौत जिन्दगी का वक्फा है
यानि आगे चलेंगे दम लेकर।
इस नश्वर शरीर को त्यागने के बाद नया जीवन जरूर मिलेगा आलोक को मगर उस नवजीवन से इस बुद्धिहीन का क्या सरोकार। सब उजड़ने के बाद आलोक तुम्हारी यादें ही सहारा हैं वरना अब कौन हमारा है। तुम्हे याद करते हुए.....



चाहा जिसे हरदम रहे मेरे नजर के पास
दूर
वह इतना गया न लौटने की आस।

जिसकी
खुशी मेरे लिए की संजीवनी की काम

हाय
मेरी जिन्दगी आई ना उसके काम।

आरजू मिन्नत इबादत हर जगह सज्दा किया
नयन जल भर अंजलि आराध्य पद प्रच्छालन किया।
पुष्प श्रद्धा के शिवशक्ति पर अर्पित किया
मौन रह मैं स्नेह सरिता किनारे था खड़ा
पर तोड़ कर बंधन सभी हमसे किनारा कर लिया।

विकट है यह जिन्दगी
पर है काटना
दुःख छिपा अंतस्थली में
केवल
खुशी ही बांटना।

बोलना है अगर तो
बोलना
मीठे
या फिर रहकर मौन
कर प्रभु आराधना।

जो
स्मृति है शेष
ना तू उसका धारण कर
हो रहा जो घटित उस सत्य का वरण कर।
समय
के आगे नहीं चलती हमारी ना तुम्हारी

मोह
के बंधन बंधे हम सभी प्राणी अनाड़ी।

भोग अपना भोगना है हम सभी को अकेले
इसलिए अब तोड़ बंधन और दुनियां के झमेले।

कुछ भी मनुज का सोचना काम है आता नहीं
चाहे हम जितना वापस कोई आता नहीं।



चाह थी आखों में उसके ना कभी आंसू
ऐसा दिया कि अश्रू अब रूकते नहीं।
हर जगह मैं ढूढ़ता उसके सभी पदचिन्ह को
जगह
तो दिखाते सभी पर वह कहीं दिखता नहीं।


हर
कदम के आहटों पर आ रहा है नित कोई
सुन रहा पदचाप उसका पर अब तो वह आता नहीं।
छोड़कर
स्थूल अंग अनन्त में है खोगया

नीद
से मतभेद कल था, अब चीर निद्र सो गया।



विजय मिश्र बुद्धिहीन


असीम दुःख की इस घड़ी में विजय मिश्र बुद्धिहीन जो कि मेरी प्रेरण के श्रोत हैं, इनके तिल-तिल जलते मन के साथ संवेदना की गहराइयों से मैं इनके साथ हूं। ईश्वर से प्रार्थना और दुआ है कि इनको जिन्दगी की तल्खियों से महफूज रखे।
एम. अफसर खां सागर

गुरुवार, 5 मई 2011

सम्मान




हिंदी साहित्य निकेतन, परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्कड़ डॉट कॉम की त्रिवेणी द्वारा हिंदी भवन, नई दिल्ली में 30 अप्रैल, 2011 को आयोजित भव्य अन्तराष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मलेन में अक्षिता यादव (पाखी) को श्रेष्ठ नन्हीं ब्लॉगर हेतुहिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010” अवार्ड दिया गया। यह पुरस्कार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री रमेश पोखरियालनिशंकद्वारा चर्चित साहित्यकार अशोक चक्रधर, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे गणमान्य साहित्यकारों की गौरवमयी उपस्थिति में दिया गया।

गौरतलब है कि इस अवसर पर हिन्दी ब्लॉगिंग के उत्थान में अविस्मरणीय योगदान हेतु 51 हिंदी ब्लॉगरों कोहिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-2010” से सम्मानित किया गया, जिसके अंतर्गत स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र, पुस्तकें और एक निश्चित धनराशि भी दी गई। इस सूची में सर्वप्रथम नाम अक्षिता का था। सम्मान पाने वालों में अक्षिता सबसे कम उम्र की थी। 25 मार्च 2007 को कानपुर में जन्मीं अक्षिता वर्तमान में कार्मेल स्कूल, पोर्टब्लेयर में के.जी.-प् में पढ़ती है। अक्षिता का ब्लॉग 24 जून 2009 कोपाखी की दुनिया
नाम से अस्तित्व में आया। इस ब्लॉग पर अंडमान के बारे में भी काफी जानकारियां और फोटोग्राफ हैं, जिसे पाठक काफी उत्सुकता से पढ़ते और सराहते हैं। आज इस ब्लॉग पर 150 से भी ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं और 140 से ज्यादा लोग इसका अनुसरण करते हैं। इस ब्लॉग का संचालन अक्षिता के मम्मी-पापा द्वारा किया जाता है। अक्षिता के पिता श्री कृष्ण कुमार यादव अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएं पद पर पदस्थ हैं मम्मी श्रीमती आकांक्षा यादव 0प्र0 के एक कॉलेज में प्रवक्ता हैं। दिल्ली से प्रकाशित प्रतिष्ठित राष्ट्रीय हिंदी दैनिकहिन्दुस्तानने अक्षिता के लिए लिखा कि- ‘‘अक्षिता की उम्र तो बेहद कम है, लेकिन हिन्दी ब्लॉगिंग में वो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। अक्षिता का ब्लॉग बेहद पापुलर है और फिलहाल हिन्दी के टॉप 100 ब्लॉगों में से एक है। अक्षिता की तस्वीर बच्चों की एक पुस्तक के कवर पर भी छप चुकी है।

इससे पूर्व अक्षिता (पाखी) को लोकसंघर्ष-परिकल्पना द्वारा आयोजित और लखनऊ ब्लॉगर्स एसोसिएशन द्वारा सहप्रयोजित ब्लॉगोत्सव-2010 में प्रकाशित रचनाओं की श्रेष्ठता के आधार पर वर्ष 2010 के लिए श्रेष्ठ नन्हीं ब्लॉगर का खिताब भी मिल चुका है।

दुर्भाग्यवश पायलटों की हताल के चलते ऐनवक्त पर फ्लाईट कैंसिल हो जाने के चलते अक्षिता पोर्टब्लेयर से सम्मान ग्रहण करने नहीं जा सकीं, अत उनकी अनुपस्थिति में यह सम्मान उनके चाचा श्री अमित कुमार यादव, जो की युवा-मन ब्लॉग के संयोजक भी हैं; ने ग्रहण किया।

आपको बताता चलूँ कि मैं भी अक्षिता से ब्लोगिंग सीखता रहता हूँ। इस सम्मान पर अक्षिता को ढेरों बधाई और प्यार।
एम अफसर खान सागर

बुधवार, 4 मई 2011

अपनो कि विश्वास

शरद जरा
फ़ैल कर लेट रहो और
डब्बू तू भी ऊपर वाली बर्थ पर
जाकर फ़ैल रहो
हियन हम नीचे लेटा है
पता नहीं कहाँ कहाँ से
बिना रिजेर्वेशन के
सब चले आते है
थोड़ी सी जगह देखी नहीं कि
घुसक आते है
एक आधुनिक सी दिखनेवाली
महिला कि कर्कश आवाज दिल में
पिघलते शीशे कि तरह समाते है

दोपहर के दो बज रहे थे
कम्पार्टमेंट में भीड़ बहुत था
में अपने घर कानपुर
मम्मी को देखने जा रहा था
अचानक उनकी तबियत ख़राब होने से
नन्नू का बुलावा आया था

मै वही खड़े खड़े सब
तमाशा देख रहा था
पर्याप्त जगह होने के उपरांत भी
में खड़ा था
ऑफिस से सीधे स्टेशन के
लिए भागा था
लाइन में लग कर
किसी तरह टिकट पाया था
इस प्रक्रिया में
थक कर चूर हो गया था
इधर कुछ दिनों से ब्लड यूरिया
बढे होने से पैर भी सूज गया था
खड़े होने में अक्षम होने के कारण
वहीँ जमीन पर बैठ गया था
सामने कि बर्थ पर
उन तीनो को अकारण ही
दिन में लेटे हुए देख रहा था
कोई खाए बिना मरे कोई
खाय खाय कर मरे के
बारे में सोच रहा था
किसी तरह दोपहर के बाद
शाम भी ढलने लगी थी
ट्रेन भी काफी लेट हो चुकी थी
अब थकन के कारण कमर
सीधी करने कि इक्षा हो रही थी

मुझे जमीन पर ही लेटने दे
उक्त आशय का मैंने
उस महिला से अनुरोध किया
मगर उसने बिना किसी लाग लपेट के
सीधे मना कर दिया
बोली रिजेर्वेशन करवाया है
कोई हराम का बर्थ नहीं मिला है
तुम्हारे जैसे लोगो को मै
खूब पहचानती हूँ
हाथ पकड़ कर पंहुचा पकड़ने के
बारे में भी जानती हूँ
मै निराश एक हाथ में चादर
और एक हाथ में बैग लिए
दरवाजे की ओर बढ़ा
तभी एक वृद्ध व्यक्ति का
आवाज कानो में पड़ा
बेटा हिएन आ जाओ
अहिजे लेट जाओ
इस उमर में वैसे भी
नीद कहाँ आवत है
लेटे लेटे भी दिन कहाँ कटत है
काफी देर से हम तुमका देख रहे
तुम्हरी तबियत ठीक ना लगत है
तुम हमरी बर्थ पर हिएन लेट जाओ
हम किनारे पर बैठा है

कृतज्ञता से मै उस
वृद्ध को देख रहा था
अपने पिता की छबि
उसमे पा रहा था
पास बैठने पर उस वृद्ध ने कहा
बेटा क्या करोगे
तुम्हरी पीढ़ी की ही यह देन है
कोई किसी पर विश्वास नहीं करता
किसी कि मुसीबत में
कोई साथ नहीं देता
वह महिला भी कही से नहीं गलत है
आये दिने तो हम अख़बार में पढ़त है
बाकी हमार अनुभव से हम जानत है
सही और गलत को पहिचानत है

उस वृद्ध कि सुन बाते
मन हो गया उदास
मैंने भी ली एक गहरी साँस
सोच रहा था कि क्या हम
इसी को इक्कीसवी सदी कह रहे है
इस कदर विकसित और आधुनिक हो रहे है
कि अपनों का ही विश्वास खो रहे है
ऐसे विकास का क्या है दावा
वस्तुतः यह तो स्वयं को
देना है एक छलावा
ऐसा विकास तो सिर्फ
अब लगता है एक दिखावा