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बुधवार, 14 जनवरी 2009

प्रशासन और साहित्य के ध्वजवाहक : कृष्ण कुमार यादव

एक समय ऐसा भी था जब सभी क्षेत्रों-वर्गों में साहित्यकारों-रचनाकारों की बड़ी संख्या होती थी। वर्तमान समाज में दूरदर्शनी संस्कृति के चलते पठन-पाठन से दूर मात्र येनकेन धनोपार्जन मुख्य उद्देश्य बन चुका है। रायबरेली के दौलतपुर ग्राम में जन्मे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी झाँसी में रेलवे विभाग में सेवारत होते हुए भी अनवरत् साहित्यिक लेखन करते रहे और अन्ततः हिन्दी साहित्य में ‘द्विवेदी युग‘ नाम से मील के पत्थर बने। साहित्य की ऐतिहासिक पत्रिका ‘सरस्वती‘ का सम्पादन उन्होंने कानपुर के जूही मोहल्ले में किया।

इसी संदर्भ में दो घटनाओं की चर्चा बिना यह बात अपूर्ण रहेगी। हिन्दी साहित्य के भीष्म पितामह तथा तमाम साहित्यकारों के निर्माता पद्मविभूषण पं0 श्री नारायण चतुर्वेदी ने लंदन में प्राचीन इतिहास से एम0ए0 किया। उनकी पहली कृति-'महात्मा टाल्सटाय' सन् 1917 में प्रकाशित हुई। इनके पिता पं0 द्वारिका प्रसाद चतुर्वेदी ने भी विदेशी शासन काल में राजकीय सेवा में रहते हुए गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा भारतीयों के साथ चालाकी से किये गये योजनापूर्वक षडयन्त्र का यथार्थ चित्रण करते हुए एक ग्रंथ लिखा। नतीजन, अंग्रेजी शासन ने बौखला कर उन्हें माफी माँगने पर बाध्य किया पर ऐसे समय में उन्होंने इस्तीफा देकर अपनी देशभक्ति का प्रमाण दिया। उनके सुपुत्र जीवनपर्यन्त शिक्षा विभाग, सूचना विभाग तथा उपनिदेशक आकाशवाणी के उच्च प्रशासनिक पदों पर रहते हुए अनेकों पुस्तकों की रचना के अलावा अवकाश ग्रहण पश्चात भी लगभग चार दशकों तक विभिन्न प्रकार से हिन्दी की सेवा एवं ‘सरस्वती‘ का सम्पादन आदि सक्रिय रूप से करते रहे। उन्होंने अपने सेवाकाल में हिन्दी के अनेक शलाका-पुरूष निर्माण किये जो साहित्य की विभिन्न विधाओं के प्रकाश स्तम्भ बने। इसी प्रकार उच्चतर प्रशासनिक सेवा आई0सी0एस0 (अब परिवर्तित होकर आई0ए0एस0) उत्तीर्ण करके उत्तर प्रदेश कैडर के अन्तिम अधिकारी डा0 जे0डी0 शुक्ल प्रदेश के अनेक शीर्षस्थ पदों पर सफल प्रशासनिक अधिकारी होते हुए भी हिन्दी तथा तुलसीदास के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थे। उनके ऊपर लेख, अन्त्याक्षरी तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलनों में वे सक्रिय होकर भाग लेते रहे।

हिन्दी साहित्य के प्रति दीवानगी विदेशियों में भी रही है। इटली के डा0 लुइजि पियो तैस्सीतोरी ने लोरेंस विश्वविद्यालय से सन् 1911 में सर्वप्रथम ‘तुलसी रामायण और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन‘ पर शोध करके हिन्दी में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वे इटली की सेना में भी सेवारत रहे। तत्पश्चात भारत में जीवनपर्यन्त रहकर इस विदेशी शंकराचार्य ने अनेक कृतियाँ लिखीं जिसमें ‘शंकराचार्य और रामानुजाचार्य का तुलसी पर प्रभाव‘ ‘वैसवाड़ी व्याकरण का तुलसी पर प्रभाव‘ प्रमुख हैं। यहाँ रहकर वह हिन्दी में बोलते और पत्र-व्यवहार भी भारत में हिन्दी में ही करते थे। डा0 तैस्सीतोरी पुरातत्व के प्रति भी लगाव होने से राजस्थान में ऊँट की सवारी करके जानकारी अर्जित करते रहे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि हिन्दी का यह विदेशी निष्पृह सेवक मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में ‘बीकानेर‘ में स्वर्ग सिधार गया। उसकी समाधि बीकानेर में तथा विश्व में सर्वप्रथम इनकी प्रतिमा की स्थापना ‘तुलसी उपवन‘ मोतीझील, कानपुर में करने इटली के सांस्कृतिक दूत प्रो0 फरनान्दो बरतोलनी आये। उन्होंने प्रतिमा स्थापना के समय आश्चर्यमिश्रित शब्दों में कहा कि हमारे देश में भी नहीं मालूम है कि हमारे देश का यह युवा इण्डिया की राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रथम शोधार्थी है। डा0 तैस्सीतोरी ने विश्वकवि तुलसीदास को वाल्मीकि रामायण का अनुवादक न मानते हुए सर्वप्रथम उनको स्वतन्त्र रचनाकार के रूप में सिद्ध किया।

(डा० बद्रीनारायण तिवारी संग कृष्ण कुमार यादव)

(वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर संग कृष्ण कुमार यादव)

तीस वर्षीय युवा अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव पर लिखते समय उपरोक्त घटनाक्रम स्मरण हो आये। वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों से तद्विषयक चर्चा करने पर वह ‘समयाभाव‘ कहते हुए साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यों के प्रति अभिरुचि नहीं रखते हैं। जिन कंधों के ऊपर राष्ट्र का नेतृत्व टिका हुआ है, यदि वे ही समयाभाव की आड़ में साहित्य-संस्कृति की अपनी सुदृढ़ परम्पराओं की उपेक्षा करने लगें तो राष्ट्र की आगामी पीढ़ियाँ भला उनसे क्या सबक लेंगीं? पर सौभाग्यवश अभी भी प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ ऐसे अधिकारी हैं जो अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी समझते हैं और इसे अपने दायित्वों का ही एक अंग मानकर क्रियाशील हैं। ऐसे अधिकारियों के लिए पद की जिम्मेदारियां सिर्फ कुर्सी से नहीं जुड़ी हुई हैं बल्कि वे इसे व्यापक आयामों, मानवीय संवेदनाओं और अनुभूतियों के साथ जोड़कर देखते हैं। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव ऐसे ही अधिकारियों में से हैं। प्रशासन में बैठकर भी आम आदमी के मर्म और उसके जीवन की जद्दोजहद को जिस गहराई से श्री यादव छूते हैं, वह उन्हें अन्य अधिकारियों से अलग करती है। जीवन तो सभी लोग जीते हैं, पर सार्थक जीवन कम ही लोग जीते हैं। नई स्फूर्ति, नई ऊर्जा, नई शक्ति से आच्छादित श्री यादव प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन की इस उक्ति के सार्थक उदाहरण हैं कि-‘‘सिर्फ सफल होने की कोशिश न करें, बल्कि मूल्य-आधारित जीवन जीने वाला मनुष्य बनने की कोशिश कीजिए।‘‘ आपके सम्बन्ध में काव्य-मर्मज्ञ एवं पद्मभूषण श्री गोपाल दास ‘नीरज‘ जी के शब्द गौर करने लायक हैं- ‘‘कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं, किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ साहित्यकार हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।’’

प्रशासन के साथ साहित्य में अभिरुचि रखने वाले श्री कृष्ण कुमार युवा पीढ़ी के अत्यन्त सक्रिय रचनाकार हैं। पदीय दायित्वों का निर्वाहन करते हुए और लोगों से नियमित सम्पर्क-संवाद स्थापित करते हुए जो बिंब उनके मन-मस्तिष्क पर बनते हैं, उनकी कलात्मक अभिव्यंजना उनकी साहित्यिक रचनाओं में स्पष्ट देखी जा सकती है। इन विलक्षण रचनाओं के गढ़ने में उनकी संवेदनशीलता, सतत् काव्य-साधना, गहन अध्ययन, चिंतन-अवचिंतन, अवलोकन, अनुभूतियों आदि की महत्वपूर्ण भूमिका है। बकौल प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित- ’’कृष्ण कुमार यादव न किसी वैचारिक आग्रह से प्रतिबद्ध हैं और न किसी कलात्मक फैशन से ग्रस्त हैं। उनका आग्रह है- सहज स्वाभाविक जीवन के प्रति और रचनाओं में उसी के यथावत अकृत्रिम उद्घाटन के प्रति।’’ यही कारण है कि मुख्यधारा के साथ-साथ बाल साहित्य से भी रचनात्मक जुड़ाव रखने वाले श्री यादव की अल्प समय में ही दो निबन्ध संग्रह ’’अभिव्यक्तियों के बहाने’’ व ’’अनुभूतियाँ और विमर्श’’, एक काव्य संग्रह ’’अभिलाषा’’, 1857-1947 की क्रान्ति गाथा को सहेजती ’’क्रान्ति-यज्ञ’’ एवं भारतीय डाक के इतिहास को कालानुक्रम में समेटती ’’इण्डिया पोस्ट: 150 ग्लोरियस ईयर्स’’ सहित कुल पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अपने व्यस्ततम शासकीय कार्यों में साहित्य या रचना-सृजन को बाधक नहीं मानने वाले श्री यादव की रचनाएँ देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और सूचना-संजाल के इस दौर में तमाम अन्तर्जाल पत्रिकाओं- सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट इत्यादि में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। आकाशवाणी से कविताओं के प्रसारण के साथ-साथ दो दर्ज़न से अधिक प्रतिष्ठित काव्य संकलनों में उनकी सशक्त रचनाधर्मिता के दर्शन होते हैं। अल्पायु में ही प्रशासन के साथ-साथ उनकी विलक्षण रचनाधर्मिता के मद्देनजर कानपुर से प्रकाशित ’’बाल साहित्य समीक्षा’’ एवं इलाहाबाद से प्रकाशित ’’गुफ्तगू'' पत्रिकाओं ने उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर विशेषांक जारी किये हैं। यही नहीं उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को समेटती और एक साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में उनके योगदान को परिलक्षित करती पुस्तक ’’बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव’’ शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। निश्चिततः ऐसे में उनकी रचनाधर्मिता ऐतिहासिक महत्व की अधिकारी है। प्रशासनिक पद पर रहने के कारण वे जीवन के यथार्थ को बहुत बारीकी से महसूस करते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति चित्रण और जीवन के श्रृंगार के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सरोकारों से भरपूर जीवन का यथार्थ और भी मन को गुदगुदाता है। प्रसिद्ध साहित्यकार डा0 रामदरश मिश्र लिखते हैं कि- ’’कृष्ण कुमार की कविताएं सहज हैं, पारदर्शी हैं, अपने समय के सवालों और विसंगतियों से रूबरू हैं। इनकी संवेदनशीलता अपने भीतर से एक मूल्यवादी स्वर उभारती है।’’ वस्तुतः एक प्रतिभासम्पन्न, उदीयमान् नवयुवक रचनाकार में भावों की जो मादकता, मोहकता, आशा और महत्वाकांक्षा की जो उत्तेजना एवं कल्पना की जो आकाशव्यापी उड़ान होती है, उससे कृष्ण कुमार जी का व्यक्तित्व-कृतित्व ओत-प्रोत है। ‘क्लब कल्चर‘ एवं अपसंस्कृति के इस दौर में एक युवा प्रशासनिक अधिकारी की हिन्दी-साहित्य के प्रति ऐसी अटूट निष्ठा व समर्पण शुभ एवं स्वागत योग्य है। ऐसा अनुभव होता है कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन के जनपद आज़मगढ़ की माटी का प्रभाव श्री यादव पर पड़ा है।

श्री कृष्ण कुमार यादव अपनी कर्तव्यनिष्ठा में ऊपर से जितने कठोर दिखाई पड़ते हैं, वह अन्तर्मन से उतने ही कवि-हृदय के कोमल व्यक्तित्व वाले हैं। स्पष्ट सोच, पारखी दृष्टिकोण एवम् दृढ़ इच्छाशक्ति से भरपूर श्री यादव जी की जीवन संगिनी श्रीमती आकांक्षा यादव भी संस्कृत विषय की प्रखर प्रवक्ता एवं विदुषी कवयित्री व लेखिका हैं, सो सोने में सुहागा की लोकोक्ति स्वतः साकार हो उठती है। सुविख्यात समालोचक श्री सेवक वात्स्यायन इस साहित्यकार दम्पत्ति को पारस्परिक सम्पूर्णता की उदाहृति प्रस्तुत करने वाला मानते हुए लिखते हैं - ’’जैसे पंडितराज जगन्नाथ की जीवन-संगिनी अवन्ति-सुन्दरी के बारे में कहा जाता है कि वह पंडितराज से अधिक योग्यता रखने वाली थीं, उसी प्रकार श्रीमती आकांक्षा और श्री कृष्ण कुमार यादव का युग्म ऐसा है जिसमें अपने-अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कारण यह कहना कठिन होगा कि इन दोनों में कौन दूसरा एक से अधिक अग्रणी है।’’

श्री यादव की कृतियों पर समीक्षक ही अपने विचार व्यक्त करने की क्षमता रखते हैं पर इतने कम समय में उन्होंने साहित्यिक एवं प्रशासनिक रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, जो विरले ही देखने को मिलती हैं। प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती, अस्तु प्रशासकीय व्यस्तताओं के मध्य विराम समय में उनकी सरस्वती की लेखनी सतत् चलती रहती है। यही नहीं, वह दूसरों को भी उत्साहित करने में सक्रिय योगदान देते रहते हैं। उनकी पुस्तक ’’अनुभूतियाँ और विमर्श’’ के कानपुर में विमोचन के दौरान पद्मश्री गिरिराज किशोर जी के शब्द याद आते हैं- ’’आज जब हर लेखक पुस्तक के माध्यम से सिर्फ आपने बारे में बताना चाहता है, ऐसे में कृष्ण कुमार जी की पुस्तक में तमाम साहित्यकारों व मनीषियों के बारे में पढ़कर सुकून मिलता है और इस प्रकार युवा पीढ़ी को भी इनसे जोड़ने का प्रयास किया गया है।’’ मुझे ऐसा अनुभव होता है कि ऐसे लगनशील व कर्मठ व्यक्तित्व वाले श्री कृष्ण कुमार यादव पर साहित्य मनीषी कविवर डा0 अम्बा प्रसाद ‘सुमन’ की पंक्तियाँ उनके कृतित्व की सार्थकता को उजागर करती हैं-चरित्र की ध्वनि शब्द से ऊँची होती है/कल्पना कर्म से सदा नीचे होती है/प्रेम जिहृI में नहीं नेत्रों में है/नेत्रों की वाणी की व्याख्या कठिन है/मौन रूप प्रेम की परिभाषा कठिन है /चरित्र करने में है कहने में नहीं/चरित्र की ध्वनि शब्द से ऊँची होती है।
डा0 बद्री नारायण तिवारी, संयोजक
- राष्ट्रभाषा प्रचार समिति-वर्धा, उत्तर प्रदेश
पूर्व अध्यक्ष-उ0प्र0 हिन्दी साहित्य सम्मेलन, संयोजक-मानस संगम
38/24, शिवाला, कानपुर (उ0प्र0)-208001

37 टिप्‍पणियां:

Ratnesh ने कहा…

अति सुन्दर लेख...के.के.यादव जी ने जिस तरह अल्पायु में ही प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच हिंदी साहित्य को समृध्द किया है, वह अनुकरणीय है. बद्री नारायण तिवारी जी इस लेख के लिए बधाई के पात्र हैं.

Rashmi Singh ने कहा…

जहाँ तक मेरी जानकारी है इतनी कम उम्र में भी कुछ लोगों ने कृष्ण कुमार जी के कृतित्व पर PHD के लिए भी आवेदन किया है. ऐसे युवा व्यक्तित्व को सराहा जाना चाहिए. यह आलेख उनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगता है.

Bhanwar Singh ने कहा…

वर्तमान समाज में दूरदर्शनी संस्कृति के चलते पठन-पाठन से दूर मात्र येनकेन धनोपार्जन जहाँ लोगों का मुख्य उद्देश्य बन चुका है.....वहाँ कृष्ण कुमार यादव जैसे युवा प्रशासक अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को ज्योतिपुंज की तरह राह दिखा रहे हैं.....साधुवाद इस प्रस्तुति हेतु !!!

बेनामी ने कहा…

जानकर आश्चर्य भी हुआ और प्रसन्नता भी कि मात्र ३० वर्ष की आयु में कोई व्यक्ति सरकारी सेवा के बीच इतनी तन्मयता से साहित्य सेवा में जुटा हुआ है.हमारी शुभकामनायें सदैव आपके साथ हैं.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत ही रोचक लेख .बहुत कुछ जाना इसके माध्यम से

पुनीत ओमर ने कहा…

शुभकामनाएं.

नीरज कुमार दुबे ने कहा…

Wah! Yuvaon par Kendrit yeh blog nishay hi sarahniya hai. Swami Vivekanand ki kavita atyant prabhashali hai. net par yeh sab cheezen aasani se nahi milti isey uplabdh karakar aapne bahut accha karya kiya. Uttam prayas ke liye aapko punah bahut-bahut badhaiyan or shubhkamnayen.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

इस सारगर्भित लेख द्वारा बेहद सुन्दर जानकारी मिली. आपका बहुत आभार एवम शुभकामनाएं.

रामराम.

प्रदीप कांत ने कहा…

गतिविधियां चलती रहे - इसके लिये शुभकामनाएँ

jayram ने कहा…

wah aapke is yuva prayatna se lagta hai ki aap sabhi man ,wachan aur karm se yuva hain. yuva ke jariye naujawano main alakh jagane ka aapki muhim bilkul anukaraniy hai.
yuvaon ko jagane ka aur sakriy rup se kuchh karne hetu hamara ek pahel delhi main shuru ho chuka hai. "yuva" a movement of youth unity for vibrant action ...... janne ke liye logon to www.youthunityforvibrantaction.blogspot.com

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

इस लेख द्वारा बेहद सुन्दर जानकारी मिली. आप इस लेख के लिए बधाई के पात्र हैं.

Rahul kundra ने कहा…

मेरे दोस्त इस नचिज को आपने जो मान दिया पता नही मै उसके लायक हू भी या नही. खैर आपका बहुत बहुत शुक्रिया. आपका ब्लोग देखा पसन्द आया. खुदा आपको कामयाबी दे.

Dr. Chandra Kumar Jain ने कहा…

आप बहुत सार्थक सेवा कर रहे हैं
राष्ट्र भाषा की.
और
आपकी प्रस्तुति शैली भी उत्तम है.
जानकारी और उनके स्रोतों का विवरण
सटीक व श्लाघनीय है....प्रस्तुत पोस्ट
प्रभावी है...यादव जी का कार्य स्तुत्य है.
===============================
बधाई
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

’’जैसे पंडितराज जगन्नाथ की जीवन-संगिनी अवन्ति-सुन्दरी के बारे में कहा जाता है कि वह पंडितराज से अधिक योग्यता रखने वाली थीं, उसी प्रकार श्रीमती आकांक्षा और श्री कृष्ण कुमार यादव का युग्म ऐसा है जिसमें अपने-अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कारण यह कहना कठिन होगा कि इन दोनों में कौन दूसरा एक से अधिक अग्रणी है।’’....कृष्ण कुमार और आकांक्षा जी जिस तरह से हिंदी साहित्य में नित नए पायदान चढ़ रहें हैं, उसमें समालोचक श्री सेवक वात्स्यायन द्वारा साहित्यकार दम्पत्ति को पारस्परिक सम्पूर्णता की उदाहृति प्रस्तुत करने वाला मानते हुए लिखे गए शब्द बड़े सार्थक और प्रभावी दिखते हैं.कृष्ण कुमार और आकांक्षा जी को ढेरों बधाई.

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

अतीत के सदर्भों को जिस तरह बद्रीनारायण तिवारी जी ने इस लेख में उद्धरित करते हुए समकालीन परिवेश और कृष्ण कुमार की रचनाधर्मिता से जोड़ा है, उससे यह लेख सारगर्भित बन गया है.

डाकिया बाबू ने कहा…

दुनिया की तमाम नामी-गिरामी हस्तियों का किसी न किसी रूप में डाक विभाग से जुड़ाव रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। सुविख्यात उर्दू समीक्षक शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग से जुड़ी रहीं। स्पष्ट है कि डाक विभाग सदैव से एक समृद्ध विभाग रहा है और तमाम मशहूर शख्सियतें इस विशाल विभाग की गोद में अपनी काया का विस्तार पाने में सफल रहीं। इन मशहूर नामों की सूची में श्री कृष्ण कुमार यादव का नाम भी अब जगमगा रहा है।

COMMON MAN ने कहा…

पहली बार ब्लाग पर आया, उत्तम व्यक्ति के बारे में उत्तम रचना. पढ़कर बहुत आनन्द आया.

राज ने कहा…

Aapki Vichaaratmak, Shahityik Kriti bahut hi sunder hai, ucchkoti ke lekhan ke liye aapko badhai...

'Yuva' ने कहा…

मित्रों ! आप सभी लोगों का यहाँ आने और उदारता के साथ टिप्पणियां देने के लिए आभार.बस यूँ ही अपना प्रोत्साहन रूपी प्यार देते रहें !!

डॉ .अनुराग ने कहा…

लचस्प व्यक्तित्व !इश्वर उनमे यही उर्जा बनाए रखे

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

...बेहद सुन्दर वैचारिक आलेख. इसे यहाँ देखकर प्रसन्नता हुयी.

रौशन ने कहा…

पढ़ के अच्छा लगा

आनंदकृष्ण ने कहा…

श्री कृष्ण कुमार यादव के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में जानकर हर्ष हुआ और आश्वस्ति भी- कि नए युग की बागडोर समर्थ युवाओं के हाथ में है.....
सद्भाव सहित-
आनंद कृष्ण, जबलपुर
मोबाइल : 09425800818
http://www.hindi-nikash.blogspot.com

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया रोचक आलेख.

"अर्श" ने कहा…

bahot hi badhiya lekh ,janab K.K.Yadav ji ko dhero badhai prashasnik karya ke sath sath sahitya ki seva karne ke liye ...dhero badhai aapko....


arsh

रश्मि प्रभा ने कहा…

nihsandeh is karya ke liye aap badhaai ke yogya hain......

Nirmla Kapila ने कहा…

ेआपके सहित्यसम्राट बलोग को देख कर मन प्रसन्न हो गया बहुत बहुत धन्य्वाद इस रोचक जान्कारी के लिये भि शुक्रिया आपका ये लेख ही नहीं बल्कि ब्लोग ही साहित्य का ध्वजवाहक है बधाई

Dev ने कहा…

आपको लोहडी और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ....

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut rochak lekh jankari dene ke liye shukriya....

RAJIV MAHESHWARI ने कहा…

पहली बार आना हुआ . उत्तम अतिउत्तम .....
अच्छी जानकारी के लिए धन्यबाद !

राजीव महेश्वरी

rajesh ranjan ने कहा…

wakai sundar aur sarthak prayash hai. jari rakhen.

Vidhu ने कहा…

प्रशासनिक सेवा मैं रहते हुए श्री के.के यादव जी ने कम उम्र में हिन्दी के लिए जो कार्य किया .बिरले ही ऐसे होते हैं..दिलचस्प जानकारी ,जो मुझे तो कमसकम नही थी ,धन्यवाद..आपको और श्री यादव जी दोनों को

नवीन शर्मा ने कहा…

आपकी टिप्पणी का शुक्रिया.. मुझसे जो बन पडता है वही लिख देता हूं...
आपके प्रोत्साहन का बेहद शुक्रिया !
आप मुझे रास्ता दिखाइये कि इस ब्लाग में क्या मदद कर सकता हूं वैसे तो आपकी उपलब्धियों के आगे मैं कीट मात्र भी कहीं हूं...

आदर सहित

Dileepraaj Nagpal ने कहा…

good work. sahitya premiyon ko aapka blog jaroor pasand aayega. shukriya

Vivek Gupta ने कहा…

अति सुन्दर लेख

Rashmi Singh ने कहा…

भारतीय डाक सेवा के युवा अधिकारी और साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव जी पर 'युवा' ब्लॉग पर प्रकाशित यह आलेख देहरादून से प्रकाशित ''नवोदित स्वर'' के 19 january अंक में प्रकाशित हुआ है..कृष्ण कुमार जी को इसके लिए ढेरों बधाई !!

Ghanshyam ने कहा…

सरकारी सेवा में उच्च पद पर रहकर लेखन कार्य करने वाले युवा साथी कृष्ण कुमार जी को शुभकामनायें कि वो निरंतर ऊँचाइयों पर अग्रसर हों.