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रविवार, 11 जनवरी 2009

आलोचना होती रही है.......



सतयुग हो,द्वापरयुग या कलयुग!

आलोचना होती रही है॥

राम ने राज्य का परित्याग किया,

पिता के वचन को उनकी आज्ञा मान-

कैकेयी का मान रखा,

१४ वर्ष का वनवास लिया..............

सीता के मनुहार में,

स्वर्ण-मृग का पीछा किया,

सीता हरण से व्याकुल रावण का संहार किया,

फिर प्रजा हितबध होकर ,

सारे सुखों का त्याग किया...........................

कृष्ण ने राम से अलग दिखाई नीति,

लीला के संग छल का जवाब दिया छल से

'महाभारत' के पहले-कुरुक्षेत्र का दृश्य दिखाया,

दुर्योधन से संधि-प्रस्ताव रखा,

स्वयं और पूरी सेना का चयन भीउसके हाथ दिया-

दुर्योधन ने जाना इसे कृष्ण की कमजोरी,

ग्वाले को बाँध लेने की ध्रिष्ठता दिखलाई...

कृष्ण ने विराट रूप लिया,

महाभारत के रूप में,

रिश्तों का रक्त तांडव चला...

फिर आया कलयुग!

१०० वर्षों की गुलामी का चक्र चला-

गाँधी का सत्याग्रह ,नेहरू की भक्ति,भगत सिंह का खून शिराओं में दौड़ा ......

एक नहीं,दो नहीं-पूरे १०० वर्ष,

शहीदों की भरमार हो गई,

जाने-अनजाने कितने नाम मिट गए-

'वंदे-मातरम्' की आन पर!

हुए आजाद हम अपने घर में,१०० वर्षों के

बादऔर जन-गण-मन का सम्मान मिला...........

सतयुग गया,गया द्वापर युग,हुए आजादी के ६० साल........

स्वर उभरे-

राम की आलोचना,

कृष्ण की आलोचना,

गाँधी की खामियां...दिखाई देने लगीं-

क्या करना था राम को,या श्री कृष्ण को,या गाँधी को.............

इसकी चर्चा चली!

आलोचकों का क्या है,

आलोचना करते रहेंगे...

आलोचना करने में वक्त नहीं लगता,

राम,कृष्ण,गाँधी बनने को,

जीवन का पल दूसरो को देना होता है,

मर्यादा,सत्य,स्वतन्त्रता कीराहों को सींचना होता है...

गर डरते हो आलोचनाओं से,

देवदार नहीं बन सकते हो,

नहीं संभव है फिर चक्र घुमाना-

सतयुग नहीं ला सकते हो!!!!!!!!!!!!

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