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शनिवार, 3 जनवरी 2009

कहाँ आ गए?????????

अमाँ किस वतन के हो?
किस समाज का ज़िक्र करते हो?
जहाँ समानता के नाम पर,
फैशन की अंधी दौड़ में,
बेटियाँ नग्नता की सीमा पार कर गयीं...
पुरूष की बराबरी में,
औंधे मुंह गिरी पड़ी हैं!
शर्म तो बुजुर्गों को आने लगी है,
और चन्द उन युवाओं को -
जिनके पास मान्यताएं बची हैं.......
कौन बहन है,कौन पत्नी,
कौन प्रेयसी,कौन बहू !
वाकई समानता का परचम लहरा रहा है!
समानता की आड़ में
सबकुछ सरेआम हो गया है!
झुकी पलकों का कोई अर्थ नहीं रहा,
चेहरे की लालिमा बनावटी हो गई!
या खुदा!
ये कहाँ आ गए हम?!?
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