गुरुवार, 15 नवंबर 2012
ब्रेनवाश
ब्रेनवाश
बस के लिए
लाइन में खड़े खड़े
इधर कुछ दिनों से
उसे मैं उसके दुधमुंहे
बच्चे के साथ
फटी साडी में किसी तरह
अपने युवा तन को समेटे
सड़क के उस पार
बरगद के पेड़ के नीचे
हाथ से बने मिटटी के
कुछ देहाती खिलौने के साथ
दिये और कुल्हड़
बेचते देखता था
उसके अतीत से अज्न्जन
मगर पता नहीं क्यों
उसके भविष्य के बारे में
भी अक्सर मै सोचता था
कभी कभी
उसके पति के साथ
उससे होती बहस पर भी
मेरी नजर पड़ जाती थी
दोनों के बीच बाते बढ़ते बढ़ते
मर पीट पर उतर जाती थी
बड़ी मुश्किल से बिक्री से प्राप्त
सारे पैसे को जबरन छीन
वह चम्पत हो जाता
बच्चे के साथ उसे
बिलखते छोड़ जाता
सिलसिला यह लगभग
अनवरत था
आज एकाएक
वह मुझे खामोश
नजर आ रही थी
बच्चे पर नजर पड़ी तो
उसमे भी कोई
हलचल नहीं दीख रही थी
थक कर सो रहा होगा
मई सोचता रहा
बस के आने की
प्रतीक्षा करता रहा
तभी लाइन में आगे खड़े
व्यक्ति से पता चला
जेड की अंगड़ाई को
शायद वह नवजात
सही नहीं पाया था
आज सुबह ही भगवान को
प्यारा हो गया था
तभी अचानक
उसका पति गिरते भाहराते
नशे में धुत आ गया
उससे पैसे की अपनी मांग को
एक बार पुनः दोहरा गया
उसकी पथरीली बेबस
और लाचार आँखों ने
आंसुओं का साथ छोड़ दिया था
नैन के कोरो से
आंसुओ ने पथ अपन
बना लिया था
संग्याशून्य उसने
बच्चे की और हाथ से
पैसे के अभाव में
उसके मर जाने का ईशारा किया
सामान बन बिक पाने के कारन उसे पैसा देने में अपनी
असमर्थता
जताया बदले में एक लत के साथ
गलिओयों के सौगात पाया
बच्चे के समय
अवसान से पीड़ित
उसका थका और कमजोर शरीर
कुल्हड़ और दिया पर
आशियाना बनाते हुए
कटे पेड़ की तरह
भहरा गया
इस दिशा में
तमाम चल रहे
प्रयासे के उपरांत आज भी
एक लाचार ट्रडिशनल
भारतीय नारी के
इतिहास को दोहरा गया
पान का पीक उसके ऊपर
थूकते वह बोला
साली कल शाम से
धंधा कर रही है
उसमे से मैंने कुछ मांग लिया तो
पंगा और नाटक कर रही है
मुझे उसके पान के
रक्त सी पीक में
उस बच्चे को
लहूलुहान अक्स दिखा
मै विचलित हो गया था
निसंदेह आगामी एक
सप्ताह के लिए
मेरा ब्रेनवाश हो गया था
निर्मेष
सोमवार, 12 नवंबर 2012
सागर उवाच
कलम पकडने के बाद सिर्फ एक काम रह जाता है कागज काला करना।
कलम पकडना
बन्दूक पकडने से ज्यादा खतरनाक हुनर है क्योकि इनकाउंटर करके बच सकते हैं मगर कलम से
वार करके बचना मुकिल है। सो समहल के चलाना पडता है।लिखास और छपास के बीच संतुलन रखना
बडा मुश्किल होता है इसलिए हर कुछ एक धार से कह पाना भी मुम्किन नहीं इस लिए मैंने
बनाया एक नया ब्लाग सागर उवाच! सागर उवाच माध्यम
होगा गम्भीर व कठोर शब्दों को हल्के-फुल्के में कह के निकल जाने का। क्योंकि सेंसरशिप
से भी सामना करना है!
एक अदद प्रतिक्रिया के इंतजार में....
http://sagaruwaach.blogspot.in/
शनिवार, 3 नवंबर 2012
ब्लागर दम्पति आकांक्षा-कृष्ण कुमार यादव को उ. प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा 'अवध सम्मान'
(हिंदी-ब्लागिंग को कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा जी ने कई नए
आयाम दिए हैं..उसी कड़ी में ब्लागिंग के प्रति समर्पित दम्पति कृष्ण कुमार और
आकांक्षा जी को उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा 'अवध सम्मान' से अलंकृत करने पर
हार्दिक बधाइयाँ.)
जीवन में कुछ करने की चाह हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन
जाते हैं। हिन्दी-ब्लागिंग के क्षेत्र में ऐसा ही रास्ता अखि़्तयार किया दम्पति
कृष्ण कुमार यादव व आकांक्षा यादव ने। उनके इस जूनून के कारण ही आज हिंदी ब्लागिंग
को आधिकारिक तौर पर भी विधा के रूप में मान्यता मिलने लगी है. इसी क्रम में उत्तर
प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने 1 नवम्बर, 2012 को इलाहाबाद परिक्षेत्र
के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा यादव को ‘न्यू
मीडिया एवं ब्लागिंग’ में उत्कृष्टता के लिए एक भव्य कार्यक्रम में ‘अवध सम्मान’ से
सम्मानित किया गया. जी न्यूज़ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन ताज होटल, लखनऊ
में किया गया था, जिसमें विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित
किया गया, पर यह पहली बार हुआ जब किसी दम्पति को युगल रूप में यह प्रतिष्ठित सम्मान
दिया गया. ब्लागर दम्पति को सम्मानित करते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जहाँ
न्यू मीडिया के रूप में ब्लागिंग की सराहना की, वहीँ कृष्ण कुमार यादव ने अपने
संबोधन में उनसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए जा रहे सम्मानों में
‘ब्लागिंग’ को भी शामिल करने का अनुरोध किया. आकांक्षा यादव ने न्यू मीडिया और
ब्लागिंग के माध्यम से भ्रूण-हत्या, नारी-उत्पीडन जैसे मुद्दों के प्रति सचेत करने
की बात कही. अन्य सम्मानित लोगों में वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी, चर्चित
लोकगायिका मालिनी अवस्थी, ज्योतिषाचार्य पं. के. ए. दुबे पद्मेश, वरिष्ठ आई.एस.
अधिकारी जय शंकर श्रीवास्तव इत्यादि प्रमुख रहे.
जीवन में एक-दूसरे का साथ निभाने की कसमें खा चुके
कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव, साहित्य और ब्लागिंग में भी हमजोली बनकर उभरे
हैं. कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग और हिन्दी-साहित्य में एक चर्चित नाम हैं, जिनकी 6
पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनके जीवन पर एक पुस्तक ’बढ़ते चरण शिखर की ओर’ भी
प्रकाशित हो चुकी है। आकांक्षा यादव भी नारी-सशक्तीकरण को लेकर प्रखरता से लिखती
हैं और उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव ने वर्ष
2008 में ब्लाग जगत में कदम रखा और 5 साल के भीतर ही सपरिवार विभिन्न विषयों पर
आधारित दसियों ब्लाग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लागिंग की तरफ प्रवृत्त
किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लागिंग को भी नये आयाम दिये।
कृष्ण कुमार यादव का ब्लॉग ‘शब्द-सृजन की ओर’ (http://www.kkyadav.blogspot.in/) जहाँ उनकी
साहित्यिक रचनात्मकता और अन्य तमाम गतिविधियों से रूबरू करता है, वहीँ ‘डाकिया डाक
लाया’ (http://dakbabu.blogspot.in/) के माध्यम से वे
डाक-सेवाओं के अनूठे पहलुओं और अन्य तमाम जानकारियों को सहेजते हैं. आकांक्षा यादव
अपने व्यक्तिगत ब्लॉग ‘शब्द-शिखर’ (http://shabdshikhar.blogspot.in/) पर साहित्यिक
रचनाओं के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों और विशेषत: नारी-सशक्तिकरण को लेकर काफी मुखर
हैं. इस दम्पति के ब्लागों को सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भरपूर सराहना
मिली। कृष्ण कुमार यादव के ब्लाग ’डाकिया डाक लाया’ को 98 देशों, ’शब्द सृजन की ओर’
को 75 देशों, आकांक्षा यादव के ब्लाग ’शब्द शिखर’ को 68 देशों में देखा-पढ़ा जा
चुका है. सबसे रोचक तथ्य यह है कि यादव दम्पति ने अभी से अपनी सुपुत्री अक्षिता
(पाखी) में भी ब्लागिंग को लेकर जूनून पैदा कर दिया है. पिछले वर्ष ब्लागिंग हेतु
भारत सरकार द्वारा ’’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’’ से सम्मानित अक्षिता (पाखी) का ब्लाग
’पाखी की दुनिया’ (http://pakhi-akshita.blogspot.in/) बच्चों के
साथ-साथ बड़ों में भी काफी लोकप्रिय है और इसे 98 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है।
इसके अलावा इस ब्लागर दम्पति द्वारा ‘उत्सव के रंग’, ‘बाल-दुनिया’, ‘सप्तरंगी
प्रेम’ इत्यादि ब्लॉगों का भी सञ्चालन किया जाता है.
इस अवसर पर उ.प्र. विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय, रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, केबिनेट मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव, अनुप्रिया पटेल, मेयर दिनेश शर्मा सहित मंत्रिपरिषद के कई सदस्य, विधायक, कार्पोरेट और मीडिया से जुडी हस्तियाँ, प्रशासनिक अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकर्मी व खिलाडी इत्यादि उपस्थित रहे. आभार ज्ञापन जी न्यूज उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के संपादक वाशिन्द्र मिश्र ने किया.
-डा. विनय कुमार शर्मा
प्रधान संपादक-संचार बुलेटिन (अंतराष्ट्रीय शोध
जर्नल)
448/119/76, कल्याणपुरी,
ठाकुरगंज, चैक, लखनऊ-226003
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012
राम शिव मूर्ति यादव को 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा द्वारा 'हिंदी भाषा-भूषण' की मानद उपाधि
उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की ‘सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण‘ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। यदुवंशियों पर आधारित प्रथम हिंदी ब्लॉग ”यदुकुल” (http://www.yadukul.blogspot.in/) का भी आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है। दुनिया भर के लगभग 65 देशों में पढ़े जाने वाले इस ब्लॉग को 293 से ज्यादा लोग नियमित रूप से अनुसरण करते हैं, वहीँ इस ब्लॉग पर अब तक 315 से ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं। इस ब्लॉग की लोकप्रियता का अंदाजा इसे से लगाया जा सकता है कि आज इस ब्लॉग को करीब 65,000 से ज्यादा लोग पढ़ चुके हैं।
इससे पूर्व श्री राम शिव मूर्ति यादव जी को भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए 'ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान' (2007), 'डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान' (2011), अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु रिपब्लिकन पार्टी के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले द्वारा ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011', राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद द्वारा विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु ‘भारती ज्योति’ सम्मान, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘बृज गौरव‘, म.प्र. की प्रतिष्ठित संस्था ‘समग्रता‘ शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी द्वारा 'भारत-भूषण' (2010) की मानद उपाधि से अलंकृत किया जा चूका है। श्री राम शिव मूर्ति यादव को उनके सृजनात्मक एवं मंगलमयी जीवन के लिए अनंत शुभकामनाएं।
-प्रस्तुति : श्री गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिंदवाडा, मध्य प्रदेश.
शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
लत
लत
अबे रुक कहाँ जा रहा है
चल निकल पैसा
ठीक अभी चलना है
कहते एक ने
दूसरे का गला पकड़ लिया था
दूसरा बड़े ही कातर स्वर में
रिरिया रहा था
झगड़े के मध्य हो रही
बातचीत से पता चला
एक का नाम था धन्नू
दूसरे का शीतला
काल रात धन्नू ने
शीतला के साथ
शीतला के पैसे से
भदैनी के देशी ठीके पर
छक कर दारू पिया था
जीवन का असीम
आनंद लिया था
आज सबेरे ही
पुनः शीतला से धन्नू का
अमन सामना हो गया था
मै भी अपनी लम्बी वाक से
वापस आ रहा था
धन्नू बिलबिला रहा था
भैया पैसा नहीं हौ
रहेन देब
कौनो और दिन
तोहके पिया देब
ई जेब में तो पैसा
दिख रहा है
साले हमको बेवकूफ
बना रहा है
चल चल कहते शीतला ने
अपने मजबूत हाथो से
जबरन धन्नू के हाथों को
रख दिया ऐठ कर
दम लेकर ही माना
पूरा पैसा निकाल कर
शीताला भैया
ई माई के इन्हालेर क पैसा हौ
काल रतिए से माई का साँस
बड़ी तेज फूलत हौ
आपण त काल कामे न लागल
एही वदे काल तोहर पीयल
चच्चा से उधार लैके
दवाई वदे जात हई
भैया दै द पइसवा
माई जोहत होई
चलबे क़ी नाही
साले बेवकूफ बनावत हौवे
नाही त हम जात हई
अकेल्वे पिये
कहते शीतला
उसके पैसे को लिए
अकेले ही ठीके क़ी ओर
निकल गया
बलिष्ठ शीतला के मुकाबले
कमजोर धन्नू
बेदम और हताश
घर क़ी ओर चल पड़ा
घर में कदम रखते ही
माँ क़ी आवाज
उसके कानो में पड़ी
बगल में उसकी अन्व्याहता बहन
माँ को थामे थी खड़ी
आ गईला बचवा
जल्दी से इन्हेलरवा खोला
दम घुटत आ
हमारे मुंहवा में लगावा
धन्नू संज्ञाशून्य
अपने खाली हाथो के साथ
माँ को निहार रहा था
माँ क़ी आशा से भरी निगाहों में
उसके खाली हाथो को देख
आयी हताशा को
पहचान रहा था
माँ क़ी बेचैनी के साथ
क्रमशः उखड़ती साँस को
किंकर्तव्य विमूढ़
असहाय देख रहा था
मन ही मन एक
दृढसंकल्प के साथ
पश्चाताप के औसुओं से
स्वयं को कोस और
भिगो रहा था
डा-रमेश कुमार निर्मेश
बुधवार, 3 अक्टूबर 2012
गुरुवार, 20 सितंबर 2012
गंगा
गंगा का निर्जीव शरीर
सफ़ेद कफ़न में लपेटा जा रहा था
मै भी उसकी शवयात्रा में
जाने के निमित्त वहां पहुच चुका था
उसकी पत्नी बच्चों के साथ
दहाड़ मार कर रो रही थी
लोगो के बीच में तरह तरह क़ी
बाते हो रही थी
एक कह रहा था
बेचारा रात भर तो रिक्शा चलाता
दिनभर ऊ सहबवा के बंगला में
सरकारी नौकरी के लालच में खटता
आखिर एक गरीब का
शरीर कितना सहता
यही से एका ई हाल भवा
और हार्टफेल होई गवा
मौन मेरे जेहन में
सप्ताह पूर्व क़ी बाते
एकाएक पुनः ताजी हो गयी थी
मेरे अशांत मन को
एकदम मंथित कर रही थी
जब भीषण गर्मी और उमस में
नंगे बदन गंगा
एक मैला गमछा लपेटे था
अपने साहब के बगीचे में
तेजी से फावड़ा चलाये जा रहा था
जबकि बंगले के अन्दर
ए सी धुआंधार चल रहा था
यह देख में हैरान था
क़ी अभी कल ही तो वह
तीव्र बुखार के साथ
मेरे पास दावा के लिए आया था
फिर आज इस भीषण तपिश में
क्यों इस तरह कार्यरत था
मेरे पूछने पर उसने बताया कि
भैया साहेब कहिन है कि
प्याज के रोपाई का समय
निकला जा रहा
गंगा जल्दी से खेतवा तैयार कर
बेहन का जुगाड़ करा
बेहन भी जुगाड़ करने के
उसके साहेब के फैसले पर
पता नहीं क्यों और क्या
में सोच रहा था
अंत में निरुत्तर
आगे बढ़ गया था
पिछले आठ सालों से
उस साहेब के सरकारी
नौकरी के आश्वासन पर
गंगा दिन भर अपने
उस तथाकथित साहेब के
बंगले पर खटता रहा
अपने परिवार के भरण पोषण के लिए
रात में रिक्शा चलाता रहा
अपनी संभावनाओं से
भरी जवानी को
सुखद बुढ़ापे कि चाह में
तबियत से खोता रहा
क्रमशः अधेड़ हो रहे
उस मुर्ख को शायद अपनी
मूल्यवान जवानी कि कीमत का
अहसास नहीं था
कल यदि बुढ़ापे में
माना कुछ पा ही लिया तो
क्या उसके जवानी के दिन
वापस आ जायेंगे
यह भी सोचा नहीं था
अक्सर तबियत
उन्नीस बीस होने पर
मेरे घर के बाहर
मेरे आने कि प्रतीक्षा करता
आने पर मेरा उससे
हाल चाल होता
हर बार मुख्य बीमारी के दवा के साथ
ताकत के गोलियों क़ी
उसकी मांग होती
मेरे पैसा न लेने के कारण
मेरे लिए खटने क़ी
उसकी चाह हमेशा होती
जो कभी पूरी नहीं होती
जब कभी बाहर उससे
उसके रिक्शे के साथ
मेरी मुलाकात होती
भैया आवा कहाँ चली
बस यही उसकी
आवाज होती
एकदिन आखिर मैंने
उससे पूछ ही लिया था
गंगा आखिर कब तलक
वांछित नौकरी के लिए
इस तरह जीवन से
जद्दोजहद जारी रहेगी
सुखमय भविष्य के लिए
आशाओं और संभावनाओं से भरी
वर्तमान पीड़ित और
अपमानित होती रहेगी
बोला भैया
आप ही के बताये
कर्मन्येवा अधिकारेस्तु
मन फलेषु कदचिना के
रास्ते पर ही तो चल रहा था
निरुत्तर आज में
उसके गीता श्लोक क़ी
उक्त भौतिक व्याख्या का
एक ओर जहाँ दुखद परिणाम
देख रहा था
वही दूसरी ओर
उसके साथ अपने आप पर भी
खीज रहा था
डा. रमेश कुमार निर्मेश
गुरुवार, 6 सितंबर 2012
आज का युधिष्ठर
आज का युधिष्ठर
घाट क़ी सीढियों पर
उदास बैठे राजू के सामने
सारा अतीत घूम रहा था
बापू क़ी मौत के बाद
या बापू के रहते हुए भी
मामा ने किस तरह
पूरे परिवार को संभाला था
उसके सभी बहनों का
विवाह करते करते
बापू तो चल बसे थे
राजू के लिए कुछ खास
नहीं छोड़ गए थे
दिन बीतते गए
राजू भी विवाह के योग्य हुआ
विवाह के पूर्व मामा ने
उसके टूटे फूटे घर को बनवाने का
फैसला लिया
सीमेंट लेन के लिए
हजार रूपये राजू को दिया
स्वयं ईट लेन के लिए
भत्ते का रुख किया
बीच में पुराने यारों ने हाथ पकड़
राजू को न चाहते हुए
फड पर बैठा लिया
महाभारत के युधिष्ठर के निति का
दुहाई दिया
उसकी लगभग छूट चुकी
जुए क़ी आदत ने भी जोर मारा
राजू फड पर बैठा
शीघ्र ही हार चुका था रुपया सारा
उसके पाव तले का जमीन खिसक गया था
जितने वाला रुपया लेकर
आगे चल दिया था
हताश राजू भी उसके
पीछे पीछे चल दिया था
बिना परिश्रम
अपने रुपये को बढ़ने के चाह ने
राजू को आज कितना
दीन और हीन बना दिया था
यहाँ तक क़ी उसे जुए क़ी फड तक
एक बार पुनः पंहुचा दिया था
कैसे करेगा वह देवता समान
अपने मामा का सामना
यह सोच वह एकदम से
घबरा गया था
मामा के विश्वास को
एक बार पुनः चोट पहुचाने का गम
उसे भीतर तक साल रहा था
सोच रहा था कि
किसी तरह यह पैसा इस बार
वापस आ गया कही
तो हे भगवन आपकी कसम
अब जुए कि ओर कभी
वह ताकेगा नहीं
चलते चलते आखिर मयखाने में
उससे मुलाकात हुई
राजी कि बाछें खिल गयी
राजू अपने पैसे कि वापसी कि उम्मेद्मे
उससे एक बार और खेलने कि
बार बार अपील कि
अबे खेल ले भैया खेल ले भैया
कि अनेक विनती कि
अंततः नशे में टुन्न होने पर
वह खेलने के लिए पुनः
तैयार हो गया था
शायद भाग्य को भी
राजू कि दशा पर तरस आ गया था
ईस बार
राजू के पत्ते पड़ने लगे थे
एक एक कर उसके रुपये
वापस आने लगे थे
पाँच सौ रूपये ऊपर से
और भी आ गे थे
धीरे धीरे लोग घर जाने लगे थे
उसमे से दो सौ राजू ने उसे और दिया
साथ ही वापस जाकर और
पीने का सलाह दिया
बाकी पैसे लेकर उसने स्वयं
बाजार का रुख किया
रास्ते में राजू
सोचता जा रहा था
कैसी मूर्खता और कैसी विडम्बना है कि
अपने पैसा जब अपने पास था
उसके वेलू और उसकी अस्मत का
उसे अहसास नहीं था
उसकी कीमत का
उसे भास हुआ था
जीता तो कई बार था वह
मगर इस जीत पर
आज का वह युधिष्ठर
बहुत ही इतरा रहा था
महाभारत के युधिष्ठर का
सम्मान बचा रहा था
उसने तो अपने सम्मान को बस
चुटकियों में ही वापस
हासिल कर लिया था
तुलना करने पर वह अपने आप को
द्वापर के युधिष्ठर से श्रेष्ट पा रहा था
आज के बाद उसने फड पर
न बैठने कि कसम ली
हमेशा के लिए जुए को
जैरामजी की कही
घाट क़ी सीढियों पर
उदास बैठे राजू के सामने
सारा अतीत घूम रहा था
बापू क़ी मौत के बाद
या बापू के रहते हुए भी
मामा ने किस तरह
पूरे परिवार को संभाला था
उसके सभी बहनों का
विवाह करते करते
बापू तो चल बसे थे
राजू के लिए कुछ खास
नहीं छोड़ गए थे
दिन बीतते गए
राजू भी विवाह के योग्य हुआ
विवाह के पूर्व मामा ने
उसके टूटे फूटे घर को बनवाने का
फैसला लिया
सीमेंट लेन के लिए
हजार रूपये राजू को दिया
स्वयं ईट लेन के लिए
भत्ते का रुख किया
बीच में पुराने यारों ने हाथ पकड़
राजू को न चाहते हुए
फड पर बैठा लिया
महाभारत के युधिष्ठर के निति का
दुहाई दिया
उसकी लगभग छूट चुकी
जुए क़ी आदत ने भी जोर मारा
राजू फड पर बैठा
शीघ्र ही हार चुका था रुपया सारा
उसके पाव तले का जमीन खिसक गया था
जितने वाला रुपया लेकर
आगे चल दिया था
हताश राजू भी उसके
पीछे पीछे चल दिया था
बिना परिश्रम
अपने रुपये को बढ़ने के चाह ने
राजू को आज कितना
दीन और हीन बना दिया था
यहाँ तक क़ी उसे जुए क़ी फड तक
एक बार पुनः पंहुचा दिया था
कैसे करेगा वह देवता समान
अपने मामा का सामना
यह सोच वह एकदम से
घबरा गया था
मामा के विश्वास को
एक बार पुनः चोट पहुचाने का गम
उसे भीतर तक साल रहा था
सोच रहा था कि
किसी तरह यह पैसा इस बार
वापस आ गया कही
तो हे भगवन आपकी कसम
अब जुए कि ओर कभी
वह ताकेगा नहीं
चलते चलते आखिर मयखाने में
उससे मुलाकात हुई
राजी कि बाछें खिल गयी
राजू अपने पैसे कि वापसी कि उम्मेद्मे
उससे एक बार और खेलने कि
बार बार अपील कि
अबे खेल ले भैया खेल ले भैया
कि अनेक विनती कि
अंततः नशे में टुन्न होने पर
वह खेलने के लिए पुनः
तैयार हो गया था
शायद भाग्य को भी
राजू कि दशा पर तरस आ गया था
ईस बार
राजू के पत्ते पड़ने लगे थे
एक एक कर उसके रुपये
वापस आने लगे थे
पाँच सौ रूपये ऊपर से
और भी आ गे थे
धीरे धीरे लोग घर जाने लगे थे
उसमे से दो सौ राजू ने उसे और दिया
साथ ही वापस जाकर और
पीने का सलाह दिया
बाकी पैसे लेकर उसने स्वयं
बाजार का रुख किया
रास्ते में राजू
सोचता जा रहा था
कैसी मूर्खता और कैसी विडम्बना है कि
अपने पैसा जब अपने पास था
उसके वेलू और उसकी अस्मत का
उसे अहसास नहीं था
देखते ही देखते जब वह
दूसरे कि जेब में जाने लगा था
उसे भास हुआ था
जीता तो कई बार था वह
मगर इस जीत पर
आज का वह युधिष्ठर
बहुत ही इतरा रहा था
मूर्ख अपने ही पैसे क़ी वापसी पर
आज जश्न मना रहा था
सोच रहा था कि
कितनी मारकाट के बाद
महाभारत के युधिष्ठर का
उसने तो अपने सम्मान को बस
चुटकियों में ही वापस
हासिल कर लिया था
तुलना करने पर वह अपने आप को
द्वापर के युधिष्ठर से श्रेष्ट पा रहा था
आज के बाद उसने फड पर
न बैठने कि कसम ली
हमेशा के लिए जुए को
जैरामजी की कही
बुधवार, 29 अगस्त 2012
निःशुल्क चिकित्सा शिविर
निःशुल्क चिकित्सा शिविर
बड़े हर्ष के साथ सूचित किया जा रहा है कि दिनांक- 09 सितंबर 2012, दिन- रविवार को अमर वीर इण्टर कालेज, धानापुर में अदनान वेलफेयर सोसाइटी के तत्वाधान में निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया है।
चिकित्सा शिविर में अति विशिष्ट चिकित्सकों की टीम द्वारा मरीजों का निःशुल्क परीक्षण किया जाएगा। शिविर में जनरल फिजिशियन, अस्थि रोग, नेत्र रोग, स्त्री व प्रसूत रोग, बाल रोग एवं दंत व मुख कैंसर रोग विषेषज्ञ चिकित्सक मौजूद रहेंगे।
आप समस्त क्षेत्रवासयिों से अपील की जाती है कि भारी संख्या में पहुंच कर चिकित्सा शिविर का लाभ उठायें।
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें-
08896653900, 9807765879
सोमवार, 13 अगस्त 2012
सामान्य सी मांग
पापा पापा
पिछली बार आपने वो
बिजलीवाली रेलगाड़ी हमको
दिलाने को कहा था
कहते कहते सोनू पापा को
एक खिलौने क़ी दुकान पर
बड़ी आशा से लेकर
खड़ा हो गया था
में भी जमाष्ट्मी क़ी कुछ
खरीददारी हेतु
बाजार गया था
नहीं बेटा
यह बिजलीवाली रेलगाड़ी
बड़ी खतरनाक होती है
जरा सी चूक पर
जान खतरे में पड़ सकती है
तब पापा वो बैटरी वाली ही
दिला दो
बिरजू सामू और गुड्डू
सबके पास है वो
सब उसे चला कर इतराते है
दिखा दिखा कर
बहुर भाव खाते है
मेरे पास रेलगाड़ी न होने से
मेरा सब बहुत उपहास उड़ाते है
बेटा वो भी बेकार है
अभी देखे नहीं उस दिन टी वी में
दिखा रहा था
की बैटरी फटने से एक बालक
किस तरह मौत क़ी गोद में
समा गया था
अपने प्यारे सोनू को
कैसे जानबूझ कर
मौत में मुंह में धकेल सकता था
हाँ देखो प्लास्टिक की यह
रेलगाड़ी ले लो
प्लास्टिक से भी तो पापा
सब बताते है बहुत प्रदुषण फैलता है
नहीं पापा वह भी रहने दो
सोनू को एकाएक
घर से चलते समय
पापा की माँ से पैसे को लेकर
हो रही जिकजिक का
ध्यान आ गया था
पापा की विपन्न आर्थिक स्थिति ने
सोनू को अब और
मजबूत कर दिया था
पुनः स्थिति को सोनू ने ही सम्हाला
बाल सुलभ चंचलता से
रेलगाड़ी की बात को टाला
पापा छोडो व्यर्थ में पैसा
बर्बाद करने से क्या फायदा
तीन चार साल ही तो
और है बचपन के
कट जायेगा बाकायदा
सच पापा आप मुझे
कितना प्यार करते है
मेरी जान का आप
कितना ख्याल रखते है
औरो के पापा तो बस लगता है
प्यार का नाटक करते है
महेश इस अवांछित स्थिति से
कम्पित हो गया था
अपनी विपन्नता पर मन ही मन
स्वयं को कोस रहा था
उसे यह आभास हो चला था कि
सोनू भी उसकी माली हालत से
अब वाकिफ होकर
अपने अरमानो को तिलांजलि देकर
अपने बचपन को नकारते
उलट उसे ही सांत्वना दे रहा था
महेश अभी तक जहाँ
उसकी मांग को टालने में
आपने आप को सफल समझ रहा था
सोनू के विश्लेषण से
अब वह व्यथित हो रहा था
उसने विकल्प के रूप में
जितने भी प्रस्ताव
सोनू को सुझाया
सबका समुचित निकास
सोनू से पाया
मध्यवर्गीय परिवार का
मुखिया महेश
बच्चे कि इस अप्रत्याशित सोच पर
स्तब्ध हो गया था
जुलाई के महीने में वैसे ही
हाथ तंगी में हो रहा था
ऊपर से दिन पर दिन
बढ़ती मंहगाई ने
कमर तोड़ कर रख दिया था
नव धनाड्यों के बच्चों में
एक ओर जहाँ
मंहगे से मंहगे खिलौने के लिए
आपस में प्रतियोगिता चल रही थी
वही अपने बच्चे की एक
सामान्य सी मांग भी
पूरी न कर पाने की कसक
उसके सामने
अपराधबोध बन डटी थी
डा-रमेश कुमार निर्मेश Attachments may be unavailable. Learn more papa.jpg
पिछली बार आपने वो
बिजलीवाली रेलगाड़ी हमको
दिलाने को कहा था
कहते कहते सोनू पापा को
एक खिलौने क़ी दुकान पर
बड़ी आशा से लेकर
खड़ा हो गया था
में भी जमाष्ट्मी क़ी कुछ
खरीददारी हेतु
बाजार गया था
नहीं बेटा
यह बिजलीवाली रेलगाड़ी
बड़ी खतरनाक होती है
जरा सी चूक पर
जान खतरे में पड़ सकती है
तब पापा वो बैटरी वाली ही
दिला दो
बिरजू सामू और गुड्डू
सबके पास है वो
सब उसे चला कर इतराते है
दिखा दिखा कर
बहुर भाव खाते है
मेरे पास रेलगाड़ी न होने से
मेरा सब बहुत उपहास उड़ाते है
बेटा वो भी बेकार है
अभी देखे नहीं उस दिन टी वी में
दिखा रहा था
की बैटरी फटने से एक बालक
किस तरह मौत क़ी गोद में
समा गया था
अपने प्यारे सोनू को
कैसे जानबूझ कर
मौत में मुंह में धकेल सकता था
हाँ देखो प्लास्टिक की यह
रेलगाड़ी ले लो
प्लास्टिक से भी तो पापा
सब बताते है बहुत प्रदुषण फैलता है
नहीं पापा वह भी रहने दो
सोनू को एकाएक
घर से चलते समय
पापा की माँ से पैसे को लेकर
हो रही जिकजिक का
ध्यान आ गया था
पापा की विपन्न आर्थिक स्थिति ने
सोनू को अब और
मजबूत कर दिया था
पुनः स्थिति को सोनू ने ही सम्हाला
बाल सुलभ चंचलता से
रेलगाड़ी की बात को टाला
पापा छोडो व्यर्थ में पैसा
बर्बाद करने से क्या फायदा
तीन चार साल ही तो
और है बचपन के
कट जायेगा बाकायदा
सच पापा आप मुझे
कितना प्यार करते है
मेरी जान का आप
कितना ख्याल रखते है
औरो के पापा तो बस लगता है
प्यार का नाटक करते है
महेश इस अवांछित स्थिति से
कम्पित हो गया था
अपनी विपन्नता पर मन ही मन
स्वयं को कोस रहा था
उसे यह आभास हो चला था कि
सोनू भी उसकी माली हालत से
अब वाकिफ होकर
अपने अरमानो को तिलांजलि देकर
अपने बचपन को नकारते
उलट उसे ही सांत्वना दे रहा था
महेश अभी तक जहाँ
उसकी मांग को टालने में
आपने आप को सफल समझ रहा था
सोनू के विश्लेषण से
अब वह व्यथित हो रहा था
उसने विकल्प के रूप में
जितने भी प्रस्ताव
सोनू को सुझाया
सबका समुचित निकास
सोनू से पाया
मध्यवर्गीय परिवार का
मुखिया महेश
बच्चे कि इस अप्रत्याशित सोच पर
स्तब्ध हो गया था
जुलाई के महीने में वैसे ही
हाथ तंगी में हो रहा था
ऊपर से दिन पर दिन
बढ़ती मंहगाई ने
कमर तोड़ कर रख दिया था
नव धनाड्यों के बच्चों में
एक ओर जहाँ
मंहगे से मंहगे खिलौने के लिए
आपस में प्रतियोगिता चल रही थी
वही अपने बच्चे की एक
सामान्य सी मांग भी
पूरी न कर पाने की कसक
उसके सामने
अपराधबोध बन डटी थी
डा-रमेश कुमार निर्मेश Attachments may be unavailable. Learn more papa.jpg
गुरुवार, 9 अगस्त 2012
'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' चुने गए कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव
ब्लागिंग के क्षेत्र को निरंतर समृद्ध करने के मद्देनजर चर्चित साहित्यकार और ब्लागर कृष्ण कुमार यादव एवं आकांक्षा यादव को 'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' का सम्मान प्रदान किए जाने हेतु चयनित किया गया है। परिकल्पना समूह की तरफ से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले इस सम्मान के तहत हिंदी ब्लोगिंग में दशक के सर्वाधिक चर्चित पाँच ब्लागर और पाँच ब्लॉग के साथ-साथ दशक के श्रेष्ठ चर्चित ब्लोगर दंपत्ति के रूप में कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव का चयन किया गया है. मूलत: आजमगढ़ जनपद निवासी श्री यादव वर्तमान में इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं. गौरतलब है कि परिकल्पना के माध्यम से चर्चित ब्लागर रवीन्द्र प्रभात जहाँ तमाम ब्लॉगों का सम्यक विश्लेषण कर रहे हैं,वही पिछले वर्ष से ही उन्होंने वर्ष के श्रेष्ट ब्लागरों को सम्मानित भी करना आरंभ किया है. इसी कड़ी में इस बार 'दशक' की उपलब्धियों वाले ब्लागर भी सम्मानित किये जा रहे हैं, जो कि ब्लागिंग के क्षेत्र में एक नायब और अनूठा प्रयोग होया.
'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु चयनित कृष्ण कुमार यादव जहाँ 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं, वहीँ आकांक्षा यादव 'शब्द-शिखर' ब्लॉग के माध्यम से. इसके अलावा इस युगल-दंपत्ति द्वारा सप्तरंगी प्रेम, बाल-दुनिया और उत्सव के रंग ब्लॉगों का भी युगल सञ्चालन किया जाता है. उपरोक्त सम्मान की घोषणा करते हुए संयोजकों ने लिखा कि- ''कृष्ण कुमार यादव ने 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से डाक विभाग की सुखद अनुभूतियों से पाठकों को रूबरू कराने का बीड़ा उठाया तो आकांक्षा यादव ने 'शब्द-शिखर' के माध्यम से साहित्य के विभिन्न आयामों से रूबरू कराने का। एक स्वर है तो दूसरी साधना। हिन्दी ब्लोगजगत में जूनून की हद तक सक्रिय इस ब्लॉगर दंपति ने हिंदी ब्लागिंग को कई नए आयाम दिए हैं.''
गौरतलब है कि यादव दम्पति की सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को पिछले साल हिंदी भवन, नई दिल्ली में 'श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर' सम्मान से सम्मानित किया गया था तो 14 नवम्बर, 2012 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में भारत सरकार द्वारा अक्षिता को आर्ट और ब्लागिंग के लिए 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' भी प्रदान किया गया. मात्र साढ़े चार साल की उम्र में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्त कर अक्षिता ने जहाँ भारत की सबसे कम उम्र की बाल पुरस्कार विजेता होने का सौभाग्य प्राप्त किया, वहीँ पहली बार भारत सरकार द्वारा किसी ब्लागर को कोई राजकीय सम्मान दिया गया. फ़िलहाल अक्षिता गर्ल्स हाई स्कूल, इलाहाबाद में प्रेप में पढ़ती है. अक्षिता के ब्लॉग का नाम है- पाखी की दुनिया.
'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु चयनित कृष्ण कुमार यादव जहाँ 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं, वहीँ आकांक्षा यादव 'शब्द-शिखर' ब्लॉग के माध्यम से. इसके अलावा इस युगल-दंपत्ति द्वारा सप्तरंगी प्रेम, बाल-दुनिया और उत्सव के रंग ब्लॉगों का भी युगल सञ्चालन किया जाता है. उपरोक्त सम्मान की घोषणा करते हुए संयोजकों ने लिखा कि- ''कृष्ण कुमार यादव ने 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से डाक विभाग की सुखद अनुभूतियों से पाठकों को रूबरू कराने का बीड़ा उठाया तो आकांक्षा यादव ने 'शब्द-शिखर' के माध्यम से साहित्य के विभिन्न आयामों से रूबरू कराने का। एक स्वर है तो दूसरी साधना। हिन्दी ब्लोगजगत में जूनून की हद तक सक्रिय इस ब्लॉगर दंपति ने हिंदी ब्लागिंग को कई नए आयाम दिए हैं.''
गौरतलब है कि यादव दम्पति की सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को पिछले साल हिंदी भवन, नई दिल्ली में 'श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर' सम्मान से सम्मानित किया गया था तो 14 नवम्बर, 2012 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में भारत सरकार द्वारा अक्षिता को आर्ट और ब्लागिंग के लिए 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' भी प्रदान किया गया. मात्र साढ़े चार साल की उम्र में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्त कर अक्षिता ने जहाँ भारत की सबसे कम उम्र की बाल पुरस्कार विजेता होने का सौभाग्य प्राप्त किया, वहीँ पहली बार भारत सरकार द्वारा किसी ब्लागर को कोई राजकीय सम्मान दिया गया. फ़िलहाल अक्षिता गर्ल्स हाई स्कूल, इलाहाबाद में प्रेप में पढ़ती है. अक्षिता के ब्लॉग का नाम है- पाखी की दुनिया.
परिकल्पना दशक का ब्लॉगर सम्मान के तहत सम्मानित होने वाले ब्लागर हैं - पूर्णिमा वर्मन(शरजाह, यू ए ई), समीर लाल समीर(ओटरियों, कनाडा), रवि रतलामी (भोपाल, म.प्र.), रश्मि प्रभा (पुणे, महाराष्ट्र), एवं अविनाश वाचस्पति (नयी दिल्ली). इसके अलावा पञ्च चयनित श्रेष्ठ ब्लॉगों के संचालकों को भी सम्मानित किया जायेगा.(परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान-2012 की पूरी सूची हेतु क्लिक करें)
उपरोक्त सम्मान दिनांक 27 अगस्त 2012 को लखनऊ के क़ैसर बाग स्थित राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन मे प्रदान किया जायेगा. इस अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन तस्लीम व परिकल्पना समूह कर रहा है । इस समारोह में देश व विदेश के तमाम चर्चित ब्लॉगर जुटेंगे और नए मीडिया जैसे कि ब्लॉग, वेबसाईट, वेब पोर्टल,सोशल नेटवर्किंग साइट इत्यादि के सामाजिक सरोकार पर भी बात करेंगे ।
*****************************************************************************************
(विभिन्न समाचार-पत्रों में कृष्ण कुमार यादव-आकांक्षा यादव को 'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु चयनित किये जाने पर प्रमुखता से समाचार प्रकाशित हुए हैं, उनकी एक झलक)
बुधवार, 18 जुलाई 2012
मेरी अमरनाथ यात्रा
राजकुमारजी के अहवाहन पर
छोटू और रामजी के साथ
मै निकल पड़ा
बाबा अमरनाथ क़ी यात्रा पर
देखने आस्था का सैलाब
जहाँ भक्ति क़ी गंगा का
बह रहा था प्रवाह अविरल अबाध
कशी से जम्मू व पुनः
जम्मू से पहलगाम
जहाँ जमीं को छू रहा था
निर्मल साफ असमान
बर्फ क़ी श्वेत चादर लपेटे
प्रकृति कर रही थी मानो
हमारा अभिनन्दन
वर्ष बिन्दुओं को अंचल में भरे
बादलो के समूह कर रहे थे
हमारा स्वागतम
क़ानूनी औपचारिकताओं के
उपरांत बाबा धाम तक क़ी
३६ किमी क़ी चढ़ाई
चंदंबदी से जब हुई प्रारंभ
चरो और गूँज रहा था
बाबा का जयघोष बम बम
हिल गया था तन का रोम रोम
देख पिस्सू टॉप क़ी चढ़ाई दुर्गम
पर वह ऋ आस्था क्या दृश्य था मनोरम
कही दीखता था व्यक्ति का विश्वास
तो कही जय भोले के उदघोष से
ही किसी का चल रहा था
स्वास प्रश्वास
अकस्मात हो गाये हम
स्तब्ध ऊपर से आती देख दो लाश
मगर भक्तो के अविचल समूह
करते बम बम भोले का जयघोष
आगे बढ़ रहा था अनिमेष
इस दुरूह चढ़ाई के बाद
एक स्वर्ग सा दृश्य दिखा मनोरम
पाता चला यही है शेषनाग स्वर्गाश्रम
विशालतम पर्वत श्रृखलाओं के मध्य
गहरे हरे रंग का सरोवर
दूर तक फैली शेषनाग
झील झर झर
लगा जैसे प्रकृति ने रख दी है
अपनी सुन्दरता यहाँ निचोड़कर
भाव विभोर मन वह
कुछ पल ठहर जनि को व्यग्र
दिखा पर साथियों के साथ को मै
वचन वद्ध था
आगे शिविर में लेकर रात्रि विश्राम
दूसरे दिन पंचतरणी क़ी ओर
चल पड़ा बीच बीच में
करते हुए आराम
आगे बर्फ के विशालतम
ढलुआ ग्लेशियरों पर चलते हुए
पल पल मृत्यु से साक्षात्कार करते हुए
दृढ विश्वास और असीम
आस्था के वशीभूत
अधीर मन आगे बढ़ता रहा
आखिर पञ्चतरणी के जल से
आचामनित हो किया तन में
एक नयी उर्जा का अहसास लगा
सफल हो रहा था
हमारा ये प्रवास
बीच बीच में लंगर तमाम चल रहे थे
जो यात्रियों क़ी सेवा कर
अपने ही ढंग से पुण्य कमा रहे थे
हमने भी वह नाश्ता कर
एक चाय पिया
पञ्च तरणी से विदा लेकर
मुख्य बाबा धाम को चल दिया
दो दो फुट के गहरे
संकरे कंकरीले और पथरीले
ऊंची पहाड़ी रास्ते पर
रखते हुए डग
कट रहे थे एक एक पग
उसीमे एक ओर जहाँ
चल रही थी घुड़सवारों क़ी
दो दो लडिया
वही निर्बाध पैदल के साथ
चल रही थी तमाम पालकियां
एक ओर जहाँ पर्वतों क़ी
विशाल ऊंचाइया
दूसरी ओर मृत्य का अहवाहन
करती गहरी खाइयाँ
खैर किसी तरह बाबा बर्फानी का
करते हुए जयकारा
धाम में पहुँच गया
मेरा समूह सारा
धाम का विहंगम दृश्य देखकर
लगा इश्वर ने रख दी है
अपनी सर्वोत्तम कृतियाँ
यहाँ निचोड़कर
चारो ओर हिम्ग्लेशियर और
उसके मध्य हिमाच्छादित धाम
जहाँ हिम शिवलिंग के दर्शन हेतु
लगा हुआ था जाम
पूजन सामग्री और वक्ती टेंट से
पाता हुआ था धाम सारा
भीषण सर्दी को मात दे रही थी
बाबा का जयकारा
जैसे ही स्नान कर
दर्शन के निमित्त तैयार हुआ
एक अजीब शक्ति तन में
संचारित हुआ
लाइन में लगते ही हम पा गए
पवित्र चिरपरिचित कबूतरों के दर्शन
बाग बाग हो गया मन
प्रफुल्लित हो चला सारा तन
बाबा बर्फानी के दिव्य
दर्शन के उपरांत
क्रमशः शाम ढल रहा था
पर ८ बजे भी बाबा के दरबार में
सूर्य दर्शन दे रहा था
जब मौसम का मिजाज बिगड़ते देखा
हमने बाबा धाम में ही
रात्रि विश्राम का निर्णय लिया
साथ में लाये कुछ नाश्ते के बाद
सोने के निमित्त बर्फ पर ही बने
एक टेंट को हायर किया
दूसरी सुबह तैयार होकर
१४ किमी बालताल के
दुर्गमतम रास्ते से
बाबा को पुनः प्रणाम कर
विदा लिया
इस रास्ते क़ी भी
असंख्य कठिनाइयों और पीडाओं से
हमारा साक्षात्कार हुआ
पल पल पर मौत का
अहसास हुआ
मौत और जिन्दगी के इस
प्रायोजित खेल से सच मानिये
मेरा दिल बाग बाग हो गया
जिंदगी कितनी कीमती है
इस बात का अहसास हो गया
आज भी भोला मेरा मन
समझ नाही पाता
इतनी परेशानियों के बीच भी
हमें यह धाम क्यों है भाता
शायद इसका कारण
विज्ञानं पर आधारित हमारी
संस्कृत क़ी गहरी जड़े हो
जिस पर आस्था क़ी विजय हो
विज्ञानं पर आस्था का
अटल विश्वास हो
या राष्ट्रीयता से जोड़ता
विज्ञानं पर आस्था का प्रभाव हो
जिसे बस और केवल बस
प्रत्यक्ष ही महसूस किया जा सकता है
कंक्रीट के जंगलो में बैठ कर
प्राकृत के इस अनूठे उपवन
भय और भक्ति के संगम का
विश्लेषण नहीं किया
जा सकता है
मंगलवार, 26 जून 2012
टुनटुन
नन्हे नन्हे हाथो से
अपनी ही धुन में मगन
कालोनी क़ी सख्त सड़को पर
झाड़ू लगाये जा रहा था
मुन्नी बदनाम हुई के गाने को
रेंग रेंग कर
गाये जा रहा था
उसके कदम भी आज
पता नहीं क्यों थके थके से
प्रतीत हो रहे थे
मुझे ऐसा लग रहा था कि
उस गाने क़ी एनेर्जी से ही
शायद उसके पाव
चल रहे थे.
पर आज उसके गाने में
पहले जैसी बात नहीं थी
वरना और दिनों में तो
जितना झूम कर
उसके हाथ चलते थे
उससे कही ज्यादा उसके
सुर और ताल चला करते थे
शायद उसी से वह स्वयं
के लिए उत्साह पाता था
तभी तो कालोनी के एक सड़क को
साफ करने के उपरांत
वह दूसरी सड़क पर
एक नयी उर्जा से तुरंत
लग जाता था
पिछले काफी दिनों से
जहरीले शराब कांड में उसके पापा क़ी
मृत्यु के बाद उसकी माँ
अपने साथ उसे काम पर ले आती
मैंने कई बार उससे
इस बात क़ी शिकायत भी क़ी
पढाई के बात पर
गरीबी का देकर हवाला
उसने मेरी बात को
हर बार ही टाला
कई बार मैंने पैसा देकर
टुनटुन को पढ़ाने के लिए
उससे कहता रहा
पर हर बार उसका एक नया
बहाना सहता रहा
इसी क्रम में टुनटुन
मेरे करीब होता गया
मै उस बच्चे कि तक़दीर पर
अफ़सोस जाहिर करते हुए
उसे अपनी बात समझाने के लिए
क्रमशः उसके और बड़े होने क़ी
प्रतीक्षा करता रहा
मैंने मंदिर से लौटते हुए पूछा
क्या बात है टुनटुन
पिछले तीन चार दिनों से
तुम्ही अकेले ही आ रहे हो
कैसे तुम पूरा काम कर पा रहे हो
टुनटुन ने झाड़ू किनारे रख
अपने मैले पैंट से हाथ साफ कर
मेरी और हमेशा क़ी तरह
हाथ बढ़ा दिया
मैंने भी प्रसाद के पड़े को
उसके हाथ में रख दिया
प्रसाद खाकर
करीब के सरकारी नाले में
पानी पीकर
टुनटुन बोला
माई के कई दिना से
बुखार आवत आ
मौलवी साहेब से झरवा के
पानी पिलवा रहा पर
बुखार उतरते नाही बा
माई कहीं कि
टुनटुन तुही चला जा
अकेल झाड़ू मार आ
नाही ता ठिकेदरवा नागा लगा देही
हमनी के जौन थोड़ बहुत
ओकरा कमीशन कटला के
बाद मिलत आ
उहौ जाना डूब जाई
यही वादे हम अकेल आवत आई
पर साहेब माई बिना
मन लागत नाही
ठीक से खानवो मिलत नाही
कहते कहते टुनटुन की
आंखे भर आई
मैंने काम के बाद उसे
अपने घर आने का इशारा किया
स्वयं की बेबसी पर
खीजते हुए
यह सोचते हुए
घर की और रूख किया
कि हम बनाकर हवाई किले
सतरंगी सपनो क़ी देते रहेंगे नजीर
राजनीति की बिसात पर
बिछा ले हमारे ये रहनुमा
चाहे कितने भी वजीर
आँखों में रंग रंग के सपने लिए
बूढ़े हो जायेंगे
खाक जी पाएंगे.
डा. रमेश कुमार निर्मेश
गुरुवार, 21 जून 2012
दूसरे गाँधी
दोपहरी थी
अपने शीर्षतम बिंदु पर
गरम हवा चल रही थी
सूरज क़ी तीव्रतम तपिश से
बदन तप रहा था
तन का एक एक
रोम झुलसा जा रहा था
परशान परिसर में
एक वृक्ष क़ी छाया पकड़
मै आराम फरमाने को
उत्सुक और व्यग्र
देख रहा था
अपनी अतिरेक हरियाली से
पूरे शहर को
जो कभी देती थी पोषण
बनाये रखती थी
पर्यावरण का संतुलन
परिसर क़ी उस हरियाली का
हो रहा था तेजी से शोषण
देख रहा था
नित एक नए भवन क़ी
नीव पड़ते हुए
महामना क़ी बगिया को
कंक्रीट के जंगल में
बदलते हुए
सामने ही खेल के एक मैदान में
एक नूतन भवन सम्पूर्ण
साकारता क़ी और अग्रसर था
तेजी से वह काम
चल रहा था
बेदम कर देने वाली
इस जलती धूप में
दो तीन आधुनिक विशाल और
विकासशील भारत क़ी स्यामवार्ण
मगर सुगढ़ ललनाये
गोद में इस आर्यावर्त के
भविष्य को छिपाए
नंगे पाव ईट ढो रही थी
शिक्षा के मंदिर में
बरबस शिक्षविदो के सर्व शिक्षा
अभियान के दावे क़ी
हसी उड़ा रही थी
साथ ही बड़े हसरत से
स्कूटी पर सवार
पूरे बदन को ढके
जींस पैंट के साथ
शानदार काला चश्मा चढ़ाये
इसी आधुनिक भारत क़ी ही
आधुनिक ललनाएं
एक मोहक खुशबू बिखेरते हुए
एक एक कर
उनके पास से गुजरती जा रही थी
स्वयं को कोसते हुए
गर्मी से निढाल हो कभी
वह बैठ जाती
कभी ठीकेदारों के डर से
बिना सुस्तायें काम पर
पुनः लग जाती
संभवतः
उन्हें इंतजार किसी तरह
दिन ढले
गर्मी से रहत मिले
साथ ही पूरी मजदूरी क़ी चाह
पेट भरने के आस लिए वह भी
इसी आधुनिक आर्यावर्त क़ी ललनाये थी
सनातनी संस्कृति के दृष्टिकोण से
एक और दूसरे गाँधी को अपने उद्धार हेतु
अपने आंचल में छिपाए
शायद अपने पिछले जन्मो के
कर्मो का फल ही तो
भोग रही थी
डा रमेश कुमार निर्मेश
सोमवार, 11 जून 2012
शूल
एक एक कर खेत के
एक एक टुकड़े बिकते जा रहे थे
खेतों की जगह
कालोनी बसते जा रहे थे
अभी पिछले साल तक रम्भू
जिसे सीवान कहता था
आज उदास नजरो से उसी में अपना
बाग ढूड रहा था
काल ही तो वह अपने
बीच में फसे अंतिम खेत क़ी
रजिस्ट्री कर आया था
रास्ता उसका बन्द कर
गाँव के विकास के नाम पर
औने पौने दम पर
भूमाफियाओं ने हड़का कर
उस बची जमीन को
उससे लिखवाया था
हताश रम्भू
अपने एकमात्र बचे
कच्चे मकान के सामने बैठा
अपने खेत खलिहान और सीवान को
तेजी से कंक्रीट के जंगलो में
बदलते देख रहा था
इन आधुनिक जंगलो को ही
विकास कहते है
शायद यही सोच रहा था
रह रह कर उसे अपने
बचपन और जवानी के
दिन याद आ रहे थे
किस तरह गाँव के बच्चे
दूर खेत खलिहान बाग बगीचों
और सीवानो में इतराते थे
कुछ समय के बाद
गाँव का नामो निशान मिट गया
उसकी जगह एक कंक्रीट का जंगल
अशोकपुरम के नाम से बस गया
रम्भू अब बूढ़ा हो चला था
जमीन बेचने के एवज में
मिले पैसो से बच्चों का समय
दारू मुर्गे में जम कर कट रहा था
गाँव निठल्लों और कामचोरों से
भर गया था
जीवन यापन का
कोई और तरीका नहीं देख
आज रम्भू क़ी पत्नी रामरती
अपनी बहू के साथ
कभी जिसकी मालकिन थी
आज उसी कालोनी में
घूम घूम कर
कही बर्तन माज रही थी तो
कही झाड़ू पोछा लगा रही थी
किसी तरह उन घरो से मिले
जूठे खानों और तुक्ष पैसों से
अपने परिवार का
भरण पोषण कर रही थी
विकास क़ी इस विडंबना पर
रामरती हताश सोचती
कि कल तलक उसके यहाँ
ताजे साग सब्जीयों के लिए
जो लाइन लगाते थे
आज उन्ही के झूठे बचे भोजन से
उसके पेट भरते है
थोड़ी सी देर हो जाने पर
उनकी बीबियों के ताने
शूल बन ह्रदय में चुभते थे
बुधवार, 16 मई 2012
रिश्ते कि सच्चाई
निशंक के
असमय देहावसान के उपरांत
आज श्रद्धा पहली बार
मायके जाने के लिए
तैयार हो रही थी
बच्चो को स्कूल भेज कर
रह रह कर रो रही थी
अभी कितने ही दिन हुए थे
उसे इस घर में आये
पराये हो गए थे अपने
अपनों को हुए पराये
निशंक के अथाह
प्रेम के सागर में
पाँच वर्ष तक वह
डूबती उतराई रही
दो दो प्यारे बच्चो क़ी माँ
बन स्वाभिमान से
इतराई रही
काल ने कब दबे पाव
पता ही नहीं चला
घर में प्रवेश किया
एक वर्ष के भीतर ही
सास और ससुर का
उठ गया था साया
किसी तरह निशंक के साथ
अपनी गृहस्थी को सभाले
वह अहिस्ता आगे बढ़ती रही
तभी एक सड़क हादसे में
निशंक भी चल बसा
पता नहीं किस मनहूस क़ी नजर
उसके खेलते खाते बगिया में
आग लगा गया
किसी तरह बच्चो को देख
वह जीने का एक और हौसला
पालने लगी थी
वरना वक़्त ने उसको तोड़ने में
कोई कसर ही नहीं छोड़ी थी
याद था किस तरह भैया ने
उसे सीने से लगाते हुए
विह्वल हो उसे शीघ्र घर
आने के लिए बोला था
दिलासा देते हुए भाभी ने भी
उसे पैर फिराने के लिए
कहा था
उसी रस्म को पूरा करने हेतु
वह किसी तरह जैसे ही मायके पहुंची
काल बेल दबाने के लिए
जैसे ही उद्यत हुई
घर के अन्दर से
भाभी कि आवाज आई
आज ही मुझे भी अपनी मम्मी को
देखने घर जाना था
तो इसी दिन इन महारानी को भी
मायके आना था
अपना तो सब कुछ लुटवा ही चुकी है
भैया ने भी आगे जोड़ा कि
अब पता नहीं हमारा क्या
करने पर तुली है
कितने दिनों से अपनी कार
बदलना चाह रहे है
पर सफल नहीं हो पा रहे है
हम तो वैसे ही इस कदर
तंगहाली में चल रहे है
पता नहीं कुछ मांग बैठी तो
हम क्या कहेगे
इसके बाद श्रद्धा कुछ और
सुनने का सहस नहीं कर पाई
भ्रम में ही सही
टूटते रिश्ते को बचाने हेतु
अपने घर वापस चली आयी
भरभराते आंसुओं को
पलकों में ही रोका
भैया को फोन कर बोला
आपने कितने प्रेम से बुलाया था
पर क्या करे मेरी भी तबियत
अभी ठीक नहीं है
सोनू भी बीमार चल रहा
उसको भी कल से आंव पड़ रही है
वैसे आपको परेशान
होने क़ी जरूरत नहीं
देखती हू जैसे ही समय मिलेगा
मै दो मिनट के लिए ही सही
आप सबकी मर्यादा हेतु
घर आ जाउंगी
उस दिन भाभी भी काफी दुखी थी
उनसे भी कहियेगा
मेरे लिए कदापि परेशान न हो
इन रिश्ते कि सच्चाई के बीच
जो भी हो इस जहर को
मै ही पीउंगी
अपने बच्चो कि खातिर
मै तो जीऊँगी ही
जीऊँगी
शुक्रवार, 11 मई 2012
दसदस के नोट
बैंड क़ी धुन पर बरती
जम कर नाच रहे थे
शायद मदिरा में मस्त
अपने यार क़ी शादी पर
कस कर झूम रहे थे
कुछ नव धनाड्य
गड्डियों से दसदस के नोट
खीच खीच कर
हवा में उछाल रहे थे
बेशक सात या आठ साल का
दीपू अपने सर पर
रोशनी का गमला लिए
बारात के साथ चल रहा था
उन उड़ते नोटों को
बड़े ही हसरत से देख रहा था
सर पर बोझ होने के कारण
बेबस और लाचार
मन मसोस कर रह जा रहा था
अचानक एक दस का नोट
उसके पाव तले आ गया
उसने किसी तरह झुक कर
उसे उठा लिया
सोच रहा था उसका टूटा चप्पल
जो काफी दिनों से उसे
बेहद दर्द दे रहा था
उसमे से गिट्टक फाड़कर
पैर में रह रह कर
चुभ जा रहा था
किसी तरह काश
एक और दस का नोट
अगर लह जाता
उसका यह चप्पल
एक नए चप्पल से
बदल जाता
मजदूरी का पैसा तो
सूदखोर की रोजही में ही
चला जाता है
फिर भी दो साल पहले
बापू की बीमारी पर
सूद पर लिया गया पैसा
भरने का नाम ही नहीं लेता
तभी अचानक
एक दस का नोट
उसके तरफ लहराता हुआ
आने लगा
वह उसे छोड़ने का लोभ सवरण
नहीं कर पाया
उसे पाने के प्रयास में
दुर्भाग्य से फिसला
और रोशनी का गमला लिए
नीचे गिर पड़ा
ठीकेदार
दौड़ा चिल्लाते हुए
गमले को उसने उठाया
दीपू को खीचकर एक
झन्नाटेदार थप्पड़ लगाते हुए
ठीकेदार पुनः गरजा
भाग साले इसका दाड तो
तुम्हारे इस सीजन की मजदूरी से
वसूल ही लूँगा
तुम्हारे बाप ने अगर
कुछ कहा तो उसे भी
जम कर तोडूंगा
गमला गिर कर
चकना चूर हो चुका था
बारातियों को किसकी फिकर
बारात आगे बढ़ चुका था
दीपू कभी उसे कभी अपने
गाल को सहला रहा था
दस के नोट को मुट्ठी में
कस कर छिपाते हुए
एक अज्ञात और
आनेवाले भय और संकट
के बारे में सोच
रो रहा था
मंगलवार, 8 मई 2012
'जंगल में क्रिकेट' और 'चाँद पर पानी' : कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह लोकार्पित
युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.
इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.
कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.
- रत्नेश कुमार मौर्या
संयोजक- 'शब्द-साहित्य'
म्योराबाद, इलाहाबाद.
mauryark@indiatimes.com
http://shabdasahitya.blogspot.in/
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
















