साथी,
पत्रकार बंधुओं,
देश में नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद के नाम पर चल रहे सरकारी दमन के बीच मीडिया और आप सभी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सत्ता जब मीडिया को अपना हथियार व पुलिस पत्रकारों को अपने बंदूक की गोली की भूमिका में इस्तेमाल करे तो ऐसे समय में हमे ज्यादा सर्तक रहने की जरूरत है। पुलिस की ही तरह हमारे कलम से निकलने वाली गोली से भी एक निर्दोष के मारे जाने की भी उतनी ही सम्भावना होती है, जितनी की एक अपराधी की। हमें यहां यह बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं क्योंकि नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद जैसे मुददों पर रिपोर्टिंग करते समय हमारे ज्यादातर पत्रकार साथी न केवल पुलिस के प्रवक्ता नजर आते हैं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा वह उन पत्रकारीय मूल्यों को भी ताक पर रख देते हैं, जिसके बल पर उनकी विश्वसनियता बनी है।
हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हाल ही में इलाहाबाद में पत्रकार सीमा आजाद व कुछ अन्य लोगों की गिरफ़्तारी के बाद भी मीडिया व पत्रकारों का यही रूख देखने को मिला। सीमा आजाद इलाहाबाद में करीब 12 सालों से एक पत्रकार, सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता के बतौर सक्रिय रही हैं। इलाहाबाद में कोई भी सामाजिक व्यक्ति या पत्रकार उन्हें आसानी से पहचानता होगा। कुछ नहीं तो वैचारिक-साहित्यिक सेमिनार/गोष्ठियां कवर करने वाले पत्रकार उन्हें बखूबी जानते होंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि जब पुलिस ने उन्हीं सीमा आजाद को माओवादी बताया तो किसी पत्रकार ने आगे बढ़कर इस पर सवाल नहीं उठाया। आखिर क्यो? क्यों अपने ही बीच के एक व्यक्ति या महिला को पुलिस के नक्सली/माओवादी बताए जाने पर हम मौन रहे? पत्रकार के तौर पर हम एक स्वाभाविक सा सवाल क्यों नहीं पूछ सके कि किस आधार पर एक पत्रकार को नक्सली/माओवादी बताया जा रहा है? क्या कुछ किताबें या किसी के बयान के आधार पर किसी को राष्ट्रद्रोही करार दिया जा सकता है? और अगर पुलिस ऐसा करती है तो एक सजग पत्रकार के बतौर क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?
पत्रकार साथियों को ध्यान हो, तो यह अक्सर देखा जाता है कि किसी गैर नक्सली/माओवादी की गिरफ्तारी दिखाते समय पुलिस एक रटा-रटाया सा आरोप उन पर लगाती है। मसलन यह फलां क्षेत्र में फलां संगठन की जमीन तैयार कर रहा था/रही थी, या कि वह इस संगठन का वैचारिक लीडर था/थी, या कि उसके पास से बड़ी मात्रा में नक्सली/माओवादी साहित्य (मानो वह कोई गोला बारूद हो) बरामद हुआ है। आखिर पुलिस को इस भाषा में बात करने की जरूरत क्यों महसूस होती है? क्या पुलिस के ऐसे आरोप किसी गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं? किसी राजनैतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना या किसी खास राजनैतिक विचारधारा (भले ही वो नक्सली/माओवादी ही क्यों न हो) से प्रेरित साहित्य पढ़ना कोई अपराध है? अगर नहीं तो पुलिस द्वारा ऐसे आरोप लगाते समय हम चुप क्यों रहते हैं? क्यों हम वही लिखते हैं,जो पुलिस या उसके प्रतिनिधि बताते हैं। यहां तक की पुलिस किसी को नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी बताती है और हम उसके आगे ‘कथित’ लगाने की जरूरत भी महसूस नहीं करते। क्यों ?
हम जानते हैं कि हमारे वो पत्रकार साथी जो किसी खास दुराग्रह या पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होते, वह भी खबरें लिखते समय ऐसी ‘भूल’ कर जाते हैं। शायद उन्हें ऐसी ‘भूल’ के परिणाम का अंदाजा न हो। उन्हें नहीं मालूम की ऐसी 'भूल' किसी की जिंदगी और सत्ता-पुलिसतंत्र की क्रूरता की गति को तय करते हैं।
जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) सभी पत्रकार बंधुओं से अपील करती हैं कि नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग करते समय कुछ मूलभूत बातों का ध्यान अवश्य रखें.
* साथियों, नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद तीनों अलग-अलग विचार हैं। नक्सलवाद/माओवाद राजनैतिक विचारधाराएं हैं तो आतंकवाद किसी खास समय, काल व परिस्थियों से उपजे असंतोष का परिणाम है। यह कई बार हिंसक व विवेकहीन कार्रवाई होती है जो जन समुदाय को भयाक्रांत करती है. इन सभी घटनाओं को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। नक्सलवादी/माओवादी विचारधारा का समर्थक होना कहीं से भी अपराध नहीं है। इस विचारधारा को मानने वाले कुछ संगठन खुले रूप में आंदोलन चलाते हैं और चुनाव लड़ते हैं तो कुछ भूमिगत रूप से संघर्ष में विश्वाश करते हैं। कुछ भूमिगत नक्सलवादी/माओवादी संगठनों को सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा है। लेकिन यहीं यह ध्यान रखने योग्य बात है कि इन संगठनों की विचारधारा को मानने पर कोई मनाही नहीं है। इसीलिए पुलिस किसी को नक्सलवादी/माओवादी विचारधारा का समर्थक बताकर गिरफ्तार नहीं कर सकती है, जैसा की पुलिस अक्सर करती है.। हमें विचारधारा व संगठन के अंतर को समझना होगा।
* इसी प्रकार पुलिस जब यह कहती है कि उसने नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य (कई बार धार्मिक साहित्य को भी इसमें शामिल कर लिया जाता है) पकड़ा है तो उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिये कि आखिर कौन-कौन सी किताबें इसमें शामिल हैं। मित्रों, लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी खास तरह की विचारधारा से प्रेरित होकर लिखी गई किताबें रखना/पढ़ना कोई अपराध नहीं है। पुलिस द्वारा अक्सर ऐसी बरामदगियों में कार्ल मार्क्स/लेनिन/माओत्से तुंग/स्टेलिन/भगत सिंह/चेग्वेरा/फिदेल कास्त्रो/चारू मजूमदार/किसी संगठन के राजनैतिक कार्यक्रम या धार्मिक पुस्तकें शामिल होती हैं। ऐसे समय में पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि कालेजों/विश्वविद्यलयों में पढ़ाई जा रही इन राजनैतिक विचारकों की किताबें भी नक्सली/माओवादी/आतंकी साहित्य हैं? क्या उसको पढ़ाने वाला शिक्षक/प्रोफेसर या पढ़ने वाले बच्चे भी नक्सली/माओवादी/आतंकी हैं? पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि प्रतिबंधित साहित्य का क्राइटेरिया क्या है, या कौन सा वह मीटर/मापक है जिससे पुलिस यह तय करती है कि यह नक्सली/माओवादी/आतंकी साहित्य है।
यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है की अक्सर देखा जाता है की पुलिस जब कोई हथियार, गोला-बारूद बरामद करती है तो मीडिया के सामने खुले रूप में (कई बार बड़े करीने से सजा कर) पेश की जाती है, लेकिन वही पुलिस जब नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य बरामद करती है तो उसे सीलबंद लिफाफों में पेश करती है. इन लिफाफों में क्या है हमें नहीं पता होता है लेकिन हमारे सामने इसके लिए कुछ 'अपराधी' हमारे सामने होते हैं. आप पुलिस से यह भी मांग करे कीबरामद नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य को खुले रूप में सार्वजनिक किया जाए.
* मित्रों, नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तारियों के पीछे किसी खास क्षेत्र में चल रहे राजनैतिक/सामाजिक व लोकतांत्रिक आन्दोलनों को तोड़ने/दबाने या किसी खास समुदाय को आतंकित करने जैसे राजनैतिक लोभ छिपे होते हैं। ऐसे समय में यह हमें तय करना होता है कि हम किसके साथ खड़े होंगे। सत्ता की क्रूर राजनीति का सहभागी बनेंगे या न्यूनतम जरूरतों के लिए चल रहे जनआंदोलनों के साथ चलेंगे।
* हम उन तमाम संपादकों/स्थानीय संपादकों/मुख्य संवाददातों से भी अपील करते हैं , की वह अपने क्षेत्र में नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी अपराध संवाददाता (क्राइम रिपोर्टर) को न दें. यहाँ ऐसा सुझाव देने के पीछे इन संवाददाताओं की भूमिका को कमतर करके आंकना हमारा कत्तई उद्देश्य नहीं है. हम केवल इतना कहना चाहते हैं की यह संवाददाता रोजाना चोर, उच्चकों, डकैतों और अपराधों की रिपोर्टिंग करते-करते अपने दिमाग में खबरों को लिखने का एक खांचा तैयार कर लेते हैं और सारी घटनाओं की रिपोर्ट तयशुदा खांचे में रहकर लिखते है. नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग हम तभी सही कर सकते हैं जब हम इस तयशुदा खांचे से बहार आयेगे. नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद कोई महज आपराधिक घटनाएँ नहीं है, यह शुद्ध रूप से राजनैतिक मामला है.
* हमे पुलिस द्वारा किसी पर भी नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी होने के लगाए जा रहे आरोपों के सत्यता की पुख्ता जांच करनी चाहिये। पुलिस से उन आरोपों के संबंध में ठोस सबूत मांगे जाने चाहिये। पुलिस से ऐसे कथित नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी के पकड़े जाने के आधार की जानकारी जरूर लें।
* हमें पुलिस के सुबूत के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी सत्यता की जांच करने की कोशिश करना चाहिये। मसलन अभियुक्त के परिजनों से बातचीत करना चाहिये। परिजनों से बातचीत करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस के आरोपों के बाद ही हम उस व्यक्ति को अपराधी मान बैठते हैं और उसके बाद उसके परिजनों से भी ऐसे सवाल पूछते हैं जो हमारी स्टोरी व पुलिस के दावों को सत्य सिद्ध करने के लिए जरूरी हों। ऐसे समय में हमें अपने पूर्वाग्रह को कुछ समय के लिए किनारे रखकर, परिजनों के दर्द को सुनने/समझने की कोशिश करनी चाहिए। शायद वहां से कोई नयी जानकारी निकल कर आए जो पुलिस के आरोपों को फर्जी सिद्ध करे।
* मित्रों, कोई भी अभियुक्त तब तक अपराधी नहीं है, जब तक कि उस पर लगे आरोप किसी सक्षम न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाते या न्यायालय उसे दोषी नहीं करार देती। हमें केवल पुलिस के नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी बताने के आधार पर ही इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे शब्द लिखते समय ‘कथित’ या ‘पुलिस के अनुसार’ जरूर लिखना चाहिये। अपनी तरफ से कोई जस्टिफिकेशन नहीं देना चाहिये।
बंधुओं,
यहां इस तरह के सुझाव देने के पीछे हमारा यह कत्तई उद्देश्य नहीं है कि आप किसी नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी का साथ दें। हम यहां कोई ज्ञान भी नहीं देना चाहते। हमारा उद्देश्य केवल इतना सा है कि ऐसे मसलों की रिपोर्टिंग करते समय हम जाने/अनजाने में सरकारी प्रवक्ता या उनका हथियार न बन जाए। ऐसे में जब हम खुद को लोकतंत्र का चौथा-खम्भा या वाच डाग कहते हैं तो जिम्मेदारी व सजगता की मांग और ज्यादा बढ़ जाती है। जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) आपको केवल इसी जिम्मेदारी का एहसास करना चाहती है।
उम्मीद है कि आपकी लेखनी शोषित/उत्पीड़ित समाज की मुखर अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकेगी !!
- निवेदक
आपके साथी,
विजय प्रताप, राजीव यादव, अवनीश राय, ऋषि कुमार सिंह, चन्द्रिका, शाहनवाज आलम, अनिल, लक्ष्मण प्रसाद, अरूण उरांव, देवाशीष प्रसून, दिलीप, शालिनी वाजपेयी, पंकज उपाध्याय, विवेक मिश्रा, तारिक शफीक, विनय जायसवाल, सौम्या झा, नवीन कुमार सिंह, प्रबुद़ध गौतम, पूर्णिमा उरांव, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, अर्चना मेहतो, राकेश कुमार।
जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) की ओर से जनहित में जारी
--
भवदीय
अवनीश कुमार राय
दिल्ली
9910638355
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
सोमवार, 15 फ़रवरी 2010
प्यार का महीना : फरवरी
क्या आप जानते हैं कि फरवरी महीना प्यार को समर्पित है। ’रोज डे’ से शुरू ’मिसिंग डे’ पर खत्म और बीच में मनभावन 'वैलेंटाइन डे'। वस्तुत : फरवरी में दिवस मनाने की शुरूआत सात तारीख से ही हो जाती है जब ’रोज डे’ :गुलाब दिवस: पड़ता है। इससे आगे 20 फरवरी तक दिवस आयोजन की भरमार होती है।किसी को प्रपोज करने के लिए आठ फरवरी को ’प्रपोज डे’ पड़ता है तो नौ फरवरी को चॉकलेट डे पड़ता है। 10 फरवरी जहां ’टेडी डे’ कहलाती है वहीं 11 फरवरी का दिन किसी से वायदा करने या किसी से वायदा कराने का दिन यानी कि ’प्रॉमिस डे’ कहलाता है।दिवसों की यह सूची यहीं समाप्त नहीं हो जाती। 'प्रामिस डे’ के बाद बारी आती है ’किस डे’ की जो 12 फरवरी को पड़ता है। 13 फरवरी हो ’हग डे’ होता है तो 14 फरवरी को युवाओं के दिलों की धड़कन कहा जाने वाला ’वैलेंटाइन डे’ पड़ता है।
वैलेंटाइन डे जहां प्यार की पींगें बढ़ाने का दिन है वहीं इसके एक दिन बाद यानी कि 15 फरवरी को ’थप्पड़’ मारने का दिन ’स्लैप डे’ होता है।बात यहां से आगे बढ़कर 20 फरवरी तक पहुंच जाती है जब किसी को याद करने के लिए ’मिसिंग डे’ मनाया जाता है।वास्तव में फरवरी माह युवाओं के लिए सबसे पसंदीदा महीना होता है। यह न सिर्फ उन्हें ’वैलेंटाइन डे’ पर प्यार के इजहार का मौका देता है बल्कि इसके अतिरिक्त भी कई और दिवस आयोजनों का मौका प्रदान करता है। तो आप भी इस माह वसंत की बगिया में प्यार की बौछार करते रहें...!!
लेबल:
पर्व-त्यौहार,
रश्मि सिंह,
विशेष दिवस,
हलचल
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
कुँवारी किरणें (वेलेंटाइन दिवस पर विशेष)
कुँवारी किरणें
सद्यःस्नात सी लगती हैं
हर रोज सूरज की किरणें।
खिड़कियों के झरोखों से
चुपके से अन्दर आकर
छा जाती हैं पूरे शरीर पर
अठखेलियाँ करते हुये।
आगोश में भर शरीर को
दिखाती हैं अपनी अल्हड़ता के जलवे
और मजबूर कर देती हैं
अंगड़ाईयाँ लेने के लिए
मानो सज धज कर
तैयार बैठी हों
अपना कौमार्यपन लुटाने के लिए।
कृष्ण कुमार यादव
सद्यःस्नात सी लगती हैं
हर रोज सूरज की किरणें।
खिड़कियों के झरोखों से
चुपके से अन्दर आकर
छा जाती हैं पूरे शरीर पर
अठखेलियाँ करते हुये।
आगोश में भर शरीर को
दिखाती हैं अपनी अल्हड़ता के जलवे
और मजबूर कर देती हैं
अंगड़ाईयाँ लेने के लिए
मानो सज धज कर
तैयार बैठी हों
अपना कौमार्यपन लुटाने के लिए।
कृष्ण कुमार यादव
लेबल:
कविता,
के.के.यादव,
पर्व-त्यौहार
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
ब्लागर, साहित्यकार, प्रशासक के.के. यादव के निदेशक बनने पर ससम्मान विदाई
डर्बी रेस्टोरेंट में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर ने कहा कि प्रशासन के साथ-साथ साहित्यिक दायित्वों का निर्वहन बेहद जटिल कार्य है पर श्री कृष्ण कुमार यादव ने इसका भलीभांति निर्वहन कर रचनात्मकता को बढ़ावा दिया। गिरिराज किशोर ने इस बात पर जोर दिया कि आज समाज व राष्ट्र को ऐसे ही अधिकारी की जरूरत है जो पदीय दायित्वों के कुशल निर्वहन के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं से भी अपने को जोड़ सके। जीवन में लोग इन पदों पर आते-जाते हैं, पर मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसकी विराटता का परिचायक होता है। मानस संगम के संयोजक डॉ0 बद्री नारायण तिवारी ने कहा कि बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, रचनाशीलता के पर्याय एवं सरस्वती साधक श्री यादव जिस बखूबी से अपने अधीनस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों से कार्य लेते हैं, सराहनीय है। अपने निष्पक्ष, स्पष्टवादी, साहसी व निर्भीक स्वभाव के कारण प्रसिध्द श्री यादव जहाँ कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार अधिकारी की भूमिका अदा कर रहे हैं, वहीं एक साहित्य साधक एवं सशक्त रचनाधर्मी के रूप में भी अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। विशिष्ट अतिथि के रुप में उपस्थित टी0आर0 यादव, संयुक्त निदेशक कोषागार, कानपुर मण्डल ने एक कहावत के माध्यम से श्री यादव को इंगित करते हुए कहा कि कोई भी पद महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि उसे धारण करने वाला व्यक्ति अपने गुणों से महत्वपूर्ण बनाता है। एक ही पद को विभिन्न समयावधियों में कई लोग धारण करते हैं पर उनमें से कुछ पद व पद से परे कार्य करते हुए समाज में अपनी अमिट छाप छोड़ देते हैं, के0के0 यादव इसी के प्रतीक हैं। समाजसेवी एवं व्यवसायी सुशील कनोडिया ने कहा कि यह कानपुर का गौरव है कि श्री यादव जैसे अधिकारियों ने न सिर्फ यहां से बहुत कुछ सीखा बल्कि यहां लोगों के प्रेरणास्त्रोत भी बने।
वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ0 राष्टबन्धु ने अपने अनुभवों को बांटते हुए कहा कि वे स्वयं डाक विभाग से जुड़े रहे हैं, ऐसे में के0के0 यादव जैसे गरिमामयी व्यक्तित्व को देखकर हर्ष की अनुभूति होती है। सामर्थ्य की संयोजिका गीता सिंह ने कहा कि बहुआयामी प्रतिभा सम्पन्न श्री यादव अपने कार्यों और रचनाओं में प्रगतिवादी हैं तथा जमीन से जुडे हुए व्यक्ति हैं। उत्कर्ष अकादमी के निदेशक डॉ0 प्रदीप दीक्षित ने कहा कि श्री के0के0 यादव इस बात के प्रतीक हैं कि साहित्य हमारे जाने-पहचाने संसार के समानांतर एक दूसरे संसार की रचना करता है और हमारे समय में हस्तक्षेप भी करता है। जे0के0 किड्स स्कूल के प्रबन्धक इन्द्रपाल सिंह सेंगर ने श्री यादव को युवाओं का प्रेरणास्त्रोत बताया।
के0के0 यादव पर संपादित पुस्तक ''बढ़ते चरण शिखर की ओर'' के संपादक दुर्गाचरण मिश्र ने कहा कि उनकी नजर में श्री यादव डाक विभाग के पहले ऐसे अधिकारी हैं, जिन्होंने नगर में रहकर नये कीर्तिमान स्थापित किये। इसी कारण उन पर पुस्तक भी संपादित की गई। चार साल के कार्यकाल में श्री यादव ने न सिर्फ तमाम नई योजनाएं क्रियान्वित की बल्कि डाकघरों के प्रति लोगों का रूझान भी बढ़ाया। प्रेस इन्फारमेशन ब्यूरो इंचार्ज एम0एस0 यादव ने आशा व्यक्त की कि श्री यादव जैसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों के चलते लोगों का साहित्य प्रेम बना रहेगा। नगर हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ0 एस0पी0 शुक्ल ने श्री यादव को भावभीनी विदाई देते हुए कहा कि कम समय में ज्यादा उपलब्धियों को समेटे श्री यादव न सिर्फ एक चर्चित अधिकारी हैं बल्कि साहित्य-कला को समाज में उचित स्थान दिलाने के लिए कटिबध्द भी दिखते हैं। चर्चित कवयित्री गीता सिंह चौहान ने श्री यादव की संवेदनात्मक अनुभूति की प्रशंसा की।
सहायक निदेशक बचत राजेश वत्स ने श्री यादव के सम्मान में कहा कि आप डाक विभाग जैसे बड़े उपक्रम में जो अपने कठोर अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा व ईमानदारी के लिए प्रसिध्द है, में एक महत्वपूर्ण तथा जिम्मेदार-सजग अधिकारी के रूप में अपनी योग्यता, कुशाग्र बुध्दि और दक्षता के चलते प्रशासकीय क्षमता के दायित्वों का कुशलता से निर्वहन कर रहे हैं। जिला बचत अधिकारी विमल गौतम ने श्री यादव के कार्यकाल के दौरान महत्वपूर्ण उपलब्धियों को इंगित किया तो सेवानिवृत्त अपर जिलाधिकारी श्यामलाल यादव ने श्री यादव को एक लोकप्रिय अधिकारी बताते हुए कहा कि प्रशासन में अभिनव प्रयोग करने में सिध्दस्त श्री यादव बाधाओं को भी चुनौतियों के रूप में स्वीकारते हैं और अपना आत्म्विश्वास नहीं खोते।
अपने भावभीनी विदाई समारोह से अभिभूत के0के0 यादव ने इस अवसर पर कहा कि अब तक कानपुर में उनका सबसे लम्बा कार्यकाल रहा है और इस दौरान उन्हें यहाँ से बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। यहाँ के परिवेश में न सिर्फ मेरी सृजनात्मकता में वृध्दि की बल्कि उन्नति की राह भी दिखाई। श्री यादव ने कहा कि वे विभागीय रूप में भले ही यहाँ से जा रहे हैं पर कानपुर से उनका भावनात्मक संबंध हमेशा बना रहेगा।
श्री के0के0 यादव की प्रोन्नति के अवसर पर नगर की तमाम साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं द्वारा अभिनन्दन एवं सम्मान किया गया। इसमें मानस संगम, उ0प्र0 हिन्दी साहित्य सम्मेलन युवा प्रकोष्ठ, विधि प्रकोष्ठ, सामर्थ्य, उत्कर्ष अकादमी, मानस मण्डल जैसी तमाम चर्चित संस्थाएं शामिल थीं। कार्यक्रम की शुरूआत अनवरी बहनों द्वारा स्वागत गान से हुई। स्वागत-भाषण शैलेन्द्र दीक्षित, संचालन सियाराम पाण्डेय एवं संयोजन सुनील शर्मा द्वारा किया गया।
लेबल:
के.के.यादव,
सम्मान-उपलब्धि
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
सरस्वती न सही लक्ष्मी तो मेहरबान है!
(एक दैनिक पत्र के ऑन-लाइन संसकरण में प्रकाशित इस वैचारिक-समाचार को पढ़ें और सोचें कि क्या ऐसे लोग ही इस देश का उद्धार कर सकेंगें ?)
शुरुआत करते हैं अक्षय प्रताप सिंह से। एक राजघराने से ताल्लुक रखते हैं। प्रतापगढ़ के सांसद भी रहे हैं और बुधवार को वह राज्य के उच्च सदन के लिए निर्वाचित हुए हैं। कई महंगी कारें उनके पास हैं, जिसमें पजेरो, बैलेनो, टाटा सफारी, स्विफ्ट शामिल हैं। हाथ में वह जो अंगूठी और गले में जो सोने की चेन पहनते हैं, उसकी कीमत भी पौने तीन लाख रुपये है। पत्नी के जेवर और उनके नाम तमाम-दूसरी जमीन जायदाद की कीमत जोड़ी जाए तो वह करोड़पतियों की सूची में आते हैं। उनकी हैसियत जानकर लोगों को उतना आश्चर्य नहीं होगा, जितना यह जानकार कि वह सिर्फ कक्षा नौ पास हैं। बस्ती-सिद्धार्थनगर से जीते मनीष जायसवाल को आप अरबपति मान सकते हैं। वह एक बड़े व्यवसाई हैं। जिस रोज उन्होंने नामांकन दाखिल किया था, उनके पास कैश इन हैण्ड 50 लाख रुपये था। पत्नी के पास 30 लाख रुपये। पत्नी के पास जेवर ही एक करोड़ रुपये का है। लगभग 30 करोड़ रुपये के तो उनके पास शेयर हैं। बस्ती में दो बड़े होटल हैं, जिनकी कीमत एक करोड़ रुपये है। लखनऊ में 25 लाख रुपये की कीमत का एक प्लाट है। 30 लाख रुपये कीमत का एक फ्लैट है। बस्ती में 30 लाख रुपये की जमीन है। दस लाख रुपये का एक मकान है। एलआईसी पालिसी, एफडी, पांच-पांच महंगी गाड़िया। अब आप उनकी हैसियत का अंदाजा खुद लगा सकते हैं लेकिन इतने बड़े व्यवसाई की शैक्षिक योग्यता सिर्फ हाईस्कूल है।
वाराणसी से चुनाव जीती हैं अन्नपूर्णा सिंह। कक्षा नौ पास हैं। उनकी शैक्षिक योग्यता देखकर आप कह सकते हैं कि वह बहुत घरेलू महिला होंगी लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि वह शेयर में भी पैसे लगाती हैं और सम्पत्तियों की खरीद-फरोख्त में भी। यह भी बताते चलें कि वह डान बृजेश सिंह की पत्नी हैं। छह लाख रुपये उनके पास कैश इन हैण्ड है। बैंक में उनके नाम से दस लाख रुपये के आस पास जमा है। जेवर, शेयर और उनके नाम जमीन-जायदाद है, उसकी कीमत उन्हें करोड़पति की श्रेणी में रखती है। अब जैसे मुबंई, वाराणसी और इलाहाबाद में उनके तीन फ्लैट ही हैं। मुंबई वाला फ्लैट 41 लाख का है। वाराणसी वाले की कीमत 20 लाख है तो इलाहाबाद वाले की 32 लाख। दो करोड़ रुपये की उनके पास कृषि योग्य भूमि है। 35 लाख के उनके पास जेवर हैं और 50 लाख रुपये की एलआईसी स्कीम चल रही है।
बांदा-हमीरपुर से चुनाव जीती हुस्ना सिद्दीकी प्रदेश सरकार के लोक निर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी हैं। उनके बैंक एकाउंट में ही लगभग साठ लाख रुपये जमा हैं। उनके पास जो सोने के जेवर हैं, उनकी कीमत भी 64 लाख रुपये के करीब है। 19 किलो तो चांदी ही उनके पास है। 20 लाख रुपये एनएससी वगैरह में लगे हैं। तमाम दूसरी सम्पत्तियों की कीमत उन्हें कई करोड़ का मालिक बनाती है लेकिन वह सिर्फ आठवीं तक पढ़ी हैं। मुजफ्फरनगर से चुनाव जीते मुहम्मद इकबाल के बैंक एकाउंट में सवा करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हैं। 12 लाख रुपये तो कैश इन हैण्ड हैं। जिस गाड़ी से चलते हैं, उसकी कीमत 30 लाख रुपये से ऊपर की है। उनके देनदार एक करोड़ 30 लाख रुपये के हैं। 90 लाख रुपये की तो उनके पास गैर कृषि योग्य भूमि और 80 लाख रुपये की कृषि योग्य भूमि है। 65 लाख रुपये की कीमत के उनके मकान और दुकान हैं। 26 लाख रुपये शेयर में लगे हैं और 28 लाख रुपये की एलआईसी पालिसी है। इतने पैसे वाले मुहम्मद इकबाल की शैक्षिक योग्यता सिर्फ जूनियर हाईस्कूल है।
कानपुर-फतेहपुर से जीते अशोक कटियार भी करोड़पति हैं। फोर्ड, इनोवा, वर्ना जैसी महंगी गाड़िया उनके पास हैं। लखनऊ, देहरादून सहित कई शहरों में उनके नाम सम्पत्ति है। लखनऊ में गोमतीनगर में जो प्लाट है, उसकी कीमत 31 लाख रुपये है लेकिन अशोक कटियार की शैक्षिक योग्यता सिर्फ कक्षा आठ है। मुरादाबाद-बिजनौर सीट से चुनाव जीतने वाले परमेश्वर लाल का भी कुछ ऐसा ही हाल है। वह सिर्फ कक्षा पांच पास हैं।
मथुरा-एटा-मैनपुरी से चुनाव जीतने वाले लेखराज, उनकी पत्नी और पुत्रों के नाम सम्पत्ति की कीमत को अगर जोड़ा जाए तो वह करोड़पति हैं लेकिन सिर्फ हाई स्कूल पास हैं। बहराइच से चुनाव जीतने वाले माधुरी वर्मा सिर्फ साक्षर हैं। यानी कि वह सिर्फ वह अपने हस्ताक्षर कर सकती हैं। उनके पति बहराइच से पूर्व विधायक हैं। माधुरी वर्मा के नाम लखनऊ में एक प्लाट है, जिसकी कीमत सात लाख रुपये है। नानपारा में उनके नाम जो खेत हैं, उसकी कीमत छह लाख रुपये हैं। अलीगढ़ से चुनाव जीतने वाले मुकुल उपाध्याय काबीना मंत्री रामवीर उपाध्याय के भाई हैं। वह सिर्फ हाईस्कूल तक पढ़े हैं। आजमगढ़ से चुनाव जीते कैलाश भी करोड़पति हैं लेकिन वह भी सिर्फ हाईस्कूल पास हैं।
शुरुआत करते हैं अक्षय प्रताप सिंह से। एक राजघराने से ताल्लुक रखते हैं। प्रतापगढ़ के सांसद भी रहे हैं और बुधवार को वह राज्य के उच्च सदन के लिए निर्वाचित हुए हैं। कई महंगी कारें उनके पास हैं, जिसमें पजेरो, बैलेनो, टाटा सफारी, स्विफ्ट शामिल हैं। हाथ में वह जो अंगूठी और गले में जो सोने की चेन पहनते हैं, उसकी कीमत भी पौने तीन लाख रुपये है। पत्नी के जेवर और उनके नाम तमाम-दूसरी जमीन जायदाद की कीमत जोड़ी जाए तो वह करोड़पतियों की सूची में आते हैं। उनकी हैसियत जानकर लोगों को उतना आश्चर्य नहीं होगा, जितना यह जानकार कि वह सिर्फ कक्षा नौ पास हैं। बस्ती-सिद्धार्थनगर से जीते मनीष जायसवाल को आप अरबपति मान सकते हैं। वह एक बड़े व्यवसाई हैं। जिस रोज उन्होंने नामांकन दाखिल किया था, उनके पास कैश इन हैण्ड 50 लाख रुपये था। पत्नी के पास 30 लाख रुपये। पत्नी के पास जेवर ही एक करोड़ रुपये का है। लगभग 30 करोड़ रुपये के तो उनके पास शेयर हैं। बस्ती में दो बड़े होटल हैं, जिनकी कीमत एक करोड़ रुपये है। लखनऊ में 25 लाख रुपये की कीमत का एक प्लाट है। 30 लाख रुपये कीमत का एक फ्लैट है। बस्ती में 30 लाख रुपये की जमीन है। दस लाख रुपये का एक मकान है। एलआईसी पालिसी, एफडी, पांच-पांच महंगी गाड़िया। अब आप उनकी हैसियत का अंदाजा खुद लगा सकते हैं लेकिन इतने बड़े व्यवसाई की शैक्षिक योग्यता सिर्फ हाईस्कूल है।
वाराणसी से चुनाव जीती हैं अन्नपूर्णा सिंह। कक्षा नौ पास हैं। उनकी शैक्षिक योग्यता देखकर आप कह सकते हैं कि वह बहुत घरेलू महिला होंगी लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि वह शेयर में भी पैसे लगाती हैं और सम्पत्तियों की खरीद-फरोख्त में भी। यह भी बताते चलें कि वह डान बृजेश सिंह की पत्नी हैं। छह लाख रुपये उनके पास कैश इन हैण्ड है। बैंक में उनके नाम से दस लाख रुपये के आस पास जमा है। जेवर, शेयर और उनके नाम जमीन-जायदाद है, उसकी कीमत उन्हें करोड़पति की श्रेणी में रखती है। अब जैसे मुबंई, वाराणसी और इलाहाबाद में उनके तीन फ्लैट ही हैं। मुंबई वाला फ्लैट 41 लाख का है। वाराणसी वाले की कीमत 20 लाख है तो इलाहाबाद वाले की 32 लाख। दो करोड़ रुपये की उनके पास कृषि योग्य भूमि है। 35 लाख के उनके पास जेवर हैं और 50 लाख रुपये की एलआईसी स्कीम चल रही है।
बांदा-हमीरपुर से चुनाव जीती हुस्ना सिद्दीकी प्रदेश सरकार के लोक निर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी हैं। उनके बैंक एकाउंट में ही लगभग साठ लाख रुपये जमा हैं। उनके पास जो सोने के जेवर हैं, उनकी कीमत भी 64 लाख रुपये के करीब है। 19 किलो तो चांदी ही उनके पास है। 20 लाख रुपये एनएससी वगैरह में लगे हैं। तमाम दूसरी सम्पत्तियों की कीमत उन्हें कई करोड़ का मालिक बनाती है लेकिन वह सिर्फ आठवीं तक पढ़ी हैं। मुजफ्फरनगर से चुनाव जीते मुहम्मद इकबाल के बैंक एकाउंट में सवा करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हैं। 12 लाख रुपये तो कैश इन हैण्ड हैं। जिस गाड़ी से चलते हैं, उसकी कीमत 30 लाख रुपये से ऊपर की है। उनके देनदार एक करोड़ 30 लाख रुपये के हैं। 90 लाख रुपये की तो उनके पास गैर कृषि योग्य भूमि और 80 लाख रुपये की कृषि योग्य भूमि है। 65 लाख रुपये की कीमत के उनके मकान और दुकान हैं। 26 लाख रुपये शेयर में लगे हैं और 28 लाख रुपये की एलआईसी पालिसी है। इतने पैसे वाले मुहम्मद इकबाल की शैक्षिक योग्यता सिर्फ जूनियर हाईस्कूल है।
कानपुर-फतेहपुर से जीते अशोक कटियार भी करोड़पति हैं। फोर्ड, इनोवा, वर्ना जैसी महंगी गाड़िया उनके पास हैं। लखनऊ, देहरादून सहित कई शहरों में उनके नाम सम्पत्ति है। लखनऊ में गोमतीनगर में जो प्लाट है, उसकी कीमत 31 लाख रुपये है लेकिन अशोक कटियार की शैक्षिक योग्यता सिर्फ कक्षा आठ है। मुरादाबाद-बिजनौर सीट से चुनाव जीतने वाले परमेश्वर लाल का भी कुछ ऐसा ही हाल है। वह सिर्फ कक्षा पांच पास हैं।
मथुरा-एटा-मैनपुरी से चुनाव जीतने वाले लेखराज, उनकी पत्नी और पुत्रों के नाम सम्पत्ति की कीमत को अगर जोड़ा जाए तो वह करोड़पति हैं लेकिन सिर्फ हाई स्कूल पास हैं। बहराइच से चुनाव जीतने वाले माधुरी वर्मा सिर्फ साक्षर हैं। यानी कि वह सिर्फ वह अपने हस्ताक्षर कर सकती हैं। उनके पति बहराइच से पूर्व विधायक हैं। माधुरी वर्मा के नाम लखनऊ में एक प्लाट है, जिसकी कीमत सात लाख रुपये है। नानपारा में उनके नाम जो खेत हैं, उसकी कीमत छह लाख रुपये हैं। अलीगढ़ से चुनाव जीतने वाले मुकुल उपाध्याय काबीना मंत्री रामवीर उपाध्याय के भाई हैं। वह सिर्फ हाईस्कूल तक पढ़े हैं। आजमगढ़ से चुनाव जीते कैलाश भी करोड़पति हैं लेकिन वह भी सिर्फ हाईस्कूल पास हैं।
लेबल:
अब तो जागो,
चुनावी-चर्चा,
नेता,
राजनीति की बात
गुरुवार, 14 जनवरी 2010
भारत के पहले मुस्लिम देहदानीः अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’
दान से पुण्य कोई कार्य नहीं होता। दान जहाँ मनुष्य की उदारता का परिचायक है, वहीं यह दूसरों की आजीविका चलाने या किसी सामूहिक कार्य में संकल्पबद्ध होकर अपना योगदान देने की मानवीय प्रवृति को दर्शाता है। राजा हरिश्चन्द्र को उनकी दानवीरता के लिए ही जाना जाता है। महर्षि दधीचि जैसे ऋषिवर ने तो अपनी अस्थियाँ ही मानव के कल्याण हेतु दान कर दीं। महर्षि दधीचि ने मानवता को जो रास्ता दिखाया आज उस पर चलकर तमाम लोग समाज एवं मानव की सेवा में जुटे हुए हैं। देहदान के पवित्र संकल्प द्वारा दूसरों को जीवन देने का जज्बा विरले लोगों में ही देखने को मिलता है। चूँकि मनुष्य के देहान्त पश्चात की परिस्थितियां मानवीय हाथ में नहीं होती, अतः विभिन्न धर्मों में इसे अलग-अलग रूप में व्याख्यायित किया गया है। धर्मों की परिभाषा से परे एक मानव धर्म भी है जो सिखाता है कि जिन्दा होकर किसी व्यक्ति के काम आये तो उत्तम है और यदि मृत्यु के बाद भी आप किसी के काम आये तो अतिउत्तम है।हाल ही में विष्णु प्रभाकर एवं प्रतीक मिश्र जैसे वरेण्य साहित्यकारों ने जिस प्रकार मृत्यु के बाद भी देहदान द्वारा लोगों को शिक्षित एवं जागरुक किया है, वह स्तुत्य है। वस्तुतः आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान व नेत्रदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है। हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है। इसी परम्परा में भारतवर्ष में तमाम लोग नेत्रदान-देहदान की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मरने के बाद हाथी के दांँतांे से कामोत्तेजक औषधियाँ एवं खिलौने, जानवरों की खाल से चमड़ा बनता है, उसी प्रकार से इन्सान भी मृत्यु के बाद 4 नेत्रहीनों को नेत्रज्योति, 14 लोगो को अस्थियाँ व हजारों मेडिकल छात्रों को चिकित्सा शिक्षा दे सकता है। दान की हुई आँखें तीन पीढ़ी तक काम आती हैं। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-
हाथी के दाँत से खिलौने बने भाँति-भाँति
बकरी की खाल भी पानी भर लाई
मगर इंसान की खाल किसी काम न आई
आज सबसे ज्यादा जरूरत युवा पीढ़ी को देहदान जैसे संकल्पबद्ध अभियान से जोड़ने की है, फिर चाहे वह किसी भी जाति या धर्म के हों। इसी परिपाटी में एक ऐसा युवक उभर कर सामने आया है, जिसने रूढ़ियों को तोड़कर समाज को नई राह दिखाई है। अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट’ नामक यह 23 वर्षीय युवक भारत का प्रथम मुस्लिम देहदानी है। मूलतः कायमगंज, जिला फर्रूखाबाद (उ0प्र0) के इस होनहार युवक ने लीक से हटकर धार्मिक मान्यताओं के विपरीत दूसरों के लिए देहदान (नेत्रदान, रक्तदान, अस्थिदान भी) करके इंसानियत की एक नई मिसाल कायम की है। बकौल अरशद मंसूरी-‘‘परम्परागत रूढ़ियों से परे मेरे इस ऐतिहासिक कारनामे से तमाम उलेमा, धार्मिक नेता व कट्टरपंथी वर्ग नाराज हो गये और मेरे इस कार्य का पुरजोर विरोध करने लगे। यही नहीं मेरे खिलाफ फतवा जारी करने की धमकी दे डाली तथा देहदान करने के निर्णय को वापस लेकर माफी मांगने को कहा, किन्तु मैं अपने संकल्प पर दृढ़ रहा और मानव धर्म को सर्वोपरि धर्म बताते हुए इन तथाकथित विरोधियों से भी नेत्रदान व देहदान की मार्मिक अपील कर डाली।‘‘
कानपुर विश्वविद्यालय में बी0फार्मा0 तृतीय वर्ष के मेडिकल छात्र एवं विगत 6 वर्षो से समाजसेवा में समर्पित अरशद मंसूरी ‘नेचुरलिस्ट‘ के देहदान व नेत्रदान कार्यो से उनके रिश्तेदार यहाँ तक कि घर वाले भी खिलाफ हो गये। इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल इण्डिया टीवी का एक प्रेस रिपोर्टर अनिल वर्मा शेखर, जब अरशद मंसूरी का इंटरव्यू लेने उनके घर कायमगंज(फर्रूखाबाद) पहुँचा, तो अरशद के पिता अल्लाहदीन ने उस प्रेस रिपोर्टर को ही अपमानित करके घर से भगा दिया। उन्हें यह डर था कि मीडिया में यह प्रकरण आ जाने से पूरे देश में उनका विराध होने लगेगा और उनके खिलाफ फतवा जारी होने में देर न लगेगी।
फिलहाल अरशद मंसूरी अपने इस नेक कार्य से प्रसन्न हैं एवं मानते हैं कि यह कार्य उन्होंने लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं किया बल्कि इसलिए किया कि लोग (मुस्लिम सम्प्रदाय के व्यक्ति भी) उनसे प्रेरित होकर नेत्रदान व देहदान जैसे पुण्य कार्यो में आगे आयें। आंकड़ों की बदौलत धारदार तर्क देते हुए जब यह नवयुवक कहता है कि- ‘‘हिन्दुस्तान में मौजूद 1 करोड 20 लाख नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति प्रदान करने एवं अन्धता निवारण के लिए नेत्रदान करना बहुत जरूरी है और मैंने इसी परिस्थित को देखकर अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर लोगों के हक में देहदान व नेत्रदान का यह फैसला लिया।‘‘ लोगों से मिल रहे प्रोत्साहन से यह नवयुवक अभिभूत है और 'दृष्टि- एक प्रयास' नामक पुस्तक भी लिख रहा है। लोगो के अन्दर खत्म होती इंसानियत को देखकर यह नवयुवक व्यथित हो जाता हैं और कहता है कि डाॅक्टर, इंजीनियर बनने की तरह इंसान को इंसान बनाने के लिए भी शिक्षा देनी चाहिए। अरशद की कर्तव्यनिष्ठा देखकर किसी शायर के शब्द याद आते हैं-
'एक ऐसा मजहब चलाना होगा.
जिसमें इंसान को इंसान बनाना होगा।।'
लेबल:
जुनून,
पहल,
युवा-जगत,
व्यक्तित्व
बुधवार, 13 जनवरी 2010
युवा दिवस :सिर्फ मनाने को ??
विवेकानंद जी के जन्म दिन को पूरे देश में युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है !पर सिर्फ नाम को!अब देखिये न हॉकी के युवा खिलाडी अपने पैसे को लेकर हड़ताल कर रहे है और सरकार उन्हें निकलने की धमकी दे रही है!देश के राष्ट्रीय खेल 'हॉकी" को शीर्ष पर पहुँचाने वाले खिलाडियों की राष्ट्र भावना पर सवाल खड़े किये जा रहें है!हमें तो इन युवा खिलाडियों पर गर्व होना चाहिए जिन्होंने क्रिकेट के इस युग में हॉकी को चुना! क्रिकेट में बरस रहा धन हर किसी को आकर्षित करता है,पर ये युवा उसी को चुनते है!तो क्या हमारा,सरकार का या किसी का भी कोई कर्त्तव्य नहीं की हम इनका समर्थन करें?ये आर्थिक भी हो सकता है और नैतिक भी!यदि देश में हॉकी को बचाना है तो कुछ करना ही होगा! विवेकानंद जयंती पर हमें संकल्प लेना चाहिए की हम हॉकी को,राष्ट्रीय खेल को बचने का दिल से प्रयास करेंगे..!
हॉकी को यदि बचाना है तो हमें स्कूल स्तर पर ही शुरुआत करनी होगी!इसके लिए क्रिकेट की तरह ही खेल आयोजन करने चाहिए,जिसमे विभिन्न देशों की टीमों को बुलाया जाये!हॉकी से अच्छे प्रायोजकों को भी जोड़ना होगा ताकि धन की कमी ना आये!युवाओं को भी क्रिकेट का आकर्षण छोड़ हॉकी को अपनाना चाहिए!तभी हॉकी बचेगी...
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
लजीज व्यंजन के साथ पर्यावरण ज्ञान परोसता रेस्टोरेंट
क्या आपने कभी किसी ऐसे रेस्टोरेंट के बारे में सुना या पढ़ा है, जहां खाना तो लजीज मिलता ही है लेकिन इसके बाद एक अनूठी स्वीट डिश भी फ्री आफ कास्ट स्वयं होटल मालिक द्वारा परोसी जाती है। स्वीट डिश भी ऐसी कि इससे पेट नहीं ज्ञान की भूख शांत होती है। यह अनूठी स्वीट डिश है पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां, जिन्हें ग्रहण करना प्रत्येक कस्टमर के लिए आवश्यक है। उत्तराखंड केगोपेश्वर, चमोली में स्थित इस अनूठे रेस्टोरेंट का नाम है 4875-दि कैफे, जिसे खोलने का मकसद व्यवसाय नहीं, बल्कि लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है।
मुंबई निवासी एक सेवानिवृत्त आर्मी अफसर ब्रिगेडियर एसके त्रिखा की 22 वर्षीया इकलौती बेटी निखिला त्रिखा इस अनूठे रेस्टोरेंट की मालिक भी है और वेटर भी। यहां आने वाले हर ग्राहक को लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाने के साथ-साथ अनिवार्य रूप से उसका लेक्चर भी सुनना पड़ता है। रेस्टोरेंट से हो रही कमाई को वह अपनी जरूरतों पर नहीं, बल्कि पर्यावरण को बचाने में खर्च कर रही है। आपदा प्रबंधन और पहाड़ों से युवाओं का पलायन रोकना भी उसके लेक्चर का हिस्सा रहते हैं।
दरअसल, कुछ वर्ष पूर्व निखिला उत्तराखंड भ्रमण पर आई थी, तो यहां पर्यावरण की बदहाल स्थित देख द्रवित हो उठीं। पहाड़ों से बड़े पैमाने पर हो रहे युवाओं के पलायन ने भी उसे झकझोर कर रख दिया। इसी बीच वह अपने एक स्कूलमेट पुष्पेंद्र सिंह रावत के संपर्क में आई और दोनों ने उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण का बीड़ा उठाने का निर्णय लिया। उन्होंने वर्ष 2007 में 'पीस ट्रस्ट' नामक संस्था का गठन किया, जिसके तहत पुष्पेंद्र विभिन्न स्कूलों में कार्यक्रम प्रस्तुत कर छात्रों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे हैं, जबकि घर-परिवार से दूर आकर निखिला ने जिला मुख्यालय गोपेश्वर से सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित घिंघराण गांव में '4875-दि कैफै' नाम का एक रेस्टोरेंट खोला। घिंघराण गांव में एक छोटे से माल्टा के बगीचे में उसने मात्र 16 हजार की लागत से यह रेस्टोरेंट खोला है, जिसमें सूखे पेड़ों की डाटें फर्नीचर के रूप व्यवस्थित हैं। यहां आने वाले ग्राहकों को निखिला आन डिमांड अपने हाथ से बनाए लजीज व्यंजन परोसती हैं, लेकिन बातों-बातों में वो उन्हें पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाना नहीं भूलती। स्टाइल उनका ऐसा कि ग्राहकों की क्लास भी लग जाती है और उन्हें खलती भी नहीं। निखिला कहती हैं कि यदि हम हिमालय को सुरक्षित रखेंगे, तो ही हिमालय भी हमारी सुरक्षा करेगा।
इतना ही नहीं, उनका यह रेस्टोरेंट रोजगार के नाम पर पहाड़ों से पलायन कर रहे युवाओं के लिए भी नजीर है। दो वर्ष के दौरान निखिला और पुष्पेंद्र सारे गांव के आस-पास पांच हजार फूल और फल के पेड़ लगा चुके हैं। इसके अलावा, सिद्घपीठ तुंगनाथ के मार्ग पर भी वे दर्जनों डस्टबिन भी स्थापित कर चुके हैं।
सोमवार, 4 जनवरी 2010
भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा कृष्ण कुमार यादव को ‘’ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2009‘‘
भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को अपने रजत जयंती वर्ष में ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान-2009‘‘ से सम्मानित किया है। श्री यादव को यह सम्मान साहित्य सेवा एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। इसके अलावा आल इण्डिया नवोदय परिवार के इलाहाबाद में सम्पन्न हुए कार्यक्रम में श्री यादव को अखिल भारतीय स्तर पर साहित्यिक योगदान हेतु भी सम्मानित किया गया है। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में कानपुर मण्डल के वरिष्ठ रेलवे डाक अधीक्षक पद पर कार्यरत हैं एवं तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रखरता से लेखन के साथ-साथ उनकी विभिन्न विधाओं में 5 पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। साहित्य के क्षेत्र में नई बुलन्दियों को छू रहे 32 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री कृष्ण कुमार यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य संग्रह), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह), अनुभूतियां और विमर्श (निबन्ध संग्रह) और इण्डिया पोस्टः 150 ग्लोरियस ईयर्स, क्रान्ति यज्ञः 1857 से 1947 की गाथा प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ0 राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुतगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। शोधार्थियों हेतु हाल ही में आपके जीवन पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर कृष्ण कुमार यादव‘‘ भी प्रकाशित हुई है। श्री यादव की रचनायें तमाम संकलनों में उपस्थिति दर्ज करा रहीं हैं और आकाशवाणी से भी उनकी कविताएं तरंगित होती रहती हैं।
ऐसे विलक्षण व सशक्त, सारस्वत सुषमा के संवाहक श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व श्री कृष्ण कुमार यादव को नगर निगम डिग्री कालेज, अमीनाबाद, लखनऊ द्वारा ‘‘सोहनलाल द्विवेदी सम्मान‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘ व ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानोपाधि संस्थान, कुशीनगर द्वारा ‘‘राष्ट्रभाषा आचार्य‘‘ व ‘‘काव्य गौरव‘‘, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ व ‘‘काव्य मर्मज्ञ‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘‘साहित्य मनीषी सम्मान‘‘, दृष्टि संस्था, गुना द्वारा ‘‘अभिव्यक्ति सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘साहित्य सेवा सम्मान‘‘, आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘‘ब्रज गौरव‘‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘‘साहित्य श्री सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘,ं खानाकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, ठाणे द्वारा ‘‘साहित्य विद्यावाचस्पति‘‘, उत्तराखण्ड की साहित्यिक संस्था देवभूमि साहित्यकार मंच द्वारा ‘‘देवभूमि साहित्य रत्न‘‘, सृजनदीप कला मंच पिथौरागढ़ द्वारा ‘‘सृजनदीप सम्मान‘‘ मानस मण्डल कानपुर द्वारा ‘‘ मानस मण्डल विशिष्ट सम्मान‘‘, नवयुग पत्रकार विकास एसोसियेशन, लखनऊ द्वारा ‘‘ साहित्य का रत्न, महिमा प्रकाशन छत्तीसगढ़ द्वारा ‘‘महिमा साहित्य सम्मान‘‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘‘उजास सम्मान‘‘, न्यू ऋतम्भरा साहित्यिक मंच, दुर्ग द्वारा ‘‘ न्यू ऋतम्भरा विश्व शांति अलंकरण‘‘, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा काव्य शिरोमणि-2009 एवं महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी, प्रतापगढ द्वारा श्विवेकानन्द सम्मानश्, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा श्महिमा साहित्य भूषण सम्मानश् इत्यादि तमाम सम्मानों से से अलंकृत किया गया है। ऐसे युवा प्रशासक एवं साहित्य मनीषी कृष्ण कुमार यादव को इस सम्मान हेतु बधाईयाँ।
लेबल:
के.के.यादव,
सम्मान-उपलब्धि
शनिवार, 2 जनवरी 2010
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र को कनाडा का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
कनाडा में भारतीय मूल के वैज्ञानिक श्रवण कुमार को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा गया है। इस सम्मान को 'द आर्डर ऑफ कनाडा' कहा जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1967 में की गई थी। गत 40 वर्षो में यह पुरस्कार 5,000 से अधिक लोगों को दिया जा चुका है। यूनीवर्सिटी ऑफ अलबर्टा में तीन दशकों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय शोध कार्य के लिए श्रवण कुमार को गुरुवार को सम्मानित किया गया।
श्रवण कुमार का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की थी। श्रवण कुमार वर्ष 1971 से 1973 तक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से जुड़े रहे। श्रवण कुमार वर्ष 1977 में यूनीवर्सिटी ऑफ अलबर्टा से जुड़े। उन्होंने दो वर्ष पूर्व इस विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण किया। फिलहाल वह नार्थ टेक्सास विश्वविद्यालय से जुड़े है। कनाडा के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हासिल करने से श्रवण कुमार काफी खुश है।
श्रवण कुमार का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की थी। श्रवण कुमार वर्ष 1971 से 1973 तक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से जुड़े रहे। श्रवण कुमार वर्ष 1977 में यूनीवर्सिटी ऑफ अलबर्टा से जुड़े। उन्होंने दो वर्ष पूर्व इस विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण किया। फिलहाल वह नार्थ टेक्सास विश्वविद्यालय से जुड़े है। कनाडा के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हासिल करने से श्रवण कुमार काफी खुश है।
लेबल:
व्यक्तित्व,
सम्मान-उपलब्धि
शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
वर्ष नव, हर्ष नव, जीवन उत्कर्ष नव !
******आप सभी को नववर्ष-2010 की ढेरों शुभकामनायें******
वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।
नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।
नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।
गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!
(हरिवंशराय बच्चन जी के संग्रह सतरंगिनी से साभार)
वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।
नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।
नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।
गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!
(हरिवंशराय बच्चन जी के संग्रह सतरंगिनी से साभार)
लेबल:
आकांक्षा यादव,
कविता,
पर्व-त्यौहार,
बधाई
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009
हिन्दी के भगीरथ : महामना मदन मोहन मालवीय
इतिहास जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित कराने का श्रेय किसी को देगा तो पहला नाम महामना पं. मदन मोहन मालवीय का होगा। १९वीं शताब्दी तक उत्तर प्रदेश की राजभाषा के रूप में हिन्दी का कोई स्थान नहीं था। परन्तु २० वीं सदी के मध्यकाल तक वह भारत की राष्ट्रभाषा बन गई, उसके पीछे महामना मालवीयजी के ही प्रयास थे जो उस आन्दोलन के आधार बने। काशी नागरी प्रचारिणी सभा की सदस्यता मालवीयजी ने सभा की स्थापना के प्रथम वर्ष से ही ले ली थी। उसी समय से उन्होंने प्रयाग में वकालत आरम्भ की परन्तु सभा के कार्य कलापों से उन्होंने कभी भी अपने को अलग नहीं रखा। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी भाषा के प्रचार- प्रसार तथा उसे समुचित स्थान दिलाने के लिए किये जाने वाले संघर्ष को जन आन्दोलन का रूप दिया तथा सभा की सम्पदा तथा आर्थिक स्रोतों के विकास के लिये महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। युगपुरुष महामना पं. मदनमोहन मालवीय का जन्म २५ दिसम्बर १८६१ ई. में प्रयाग में हुआ था। जब बंगाल, उड़ीसा, गुजरात तथा महाराष्ट्र में राजकाज तथा अदालतों की भाषा बन चुकी थी उस समय भी उत्तर प्रदेश की भाषा हिन्दुस्तानी थी और उर्दू को ही हिन्दुस्तानी माना जाता था जो फारसी लिपि में लिखी जाती थी। सन् १८८५ के विधान में यह व्यवस्था थी कि सम्मन आदि अदालती कार्यों में हिन्दी और उर्दू दोनों का प्रयोग हो परन्तु व्यावहारिक रूप में उर्दू का प्रयोग जारी रहा। गवर्नर ने अपने काशी आगमन पर नागरी प्रचारिणी सभा के प्रतिनिधि मण्डल को मिलने का भी समय नहीं दिया और दूसरी ओर रोमन को राष्ट्र की लिपि बनाने का आन्दोलन चला।
इससे पूर्व मालवीयजी बालकृष्ण भट्ट के साथ हिन्दी का कार्य आरम्भ कर चुके थे। भट्ट जी हिन्दी के लिए समर्पित थे और उनके मन में हिन्दी को एक प्रतिष्ठित रूप में देखने की व्यग्रता थी। उस समय प्रयाग में केवल एक ही पुस्तकालय थार्नहिल मैमोरियल लाइब्रेरी के नाम से था जिसमें योरोपियन भाषाओं की पुस्तकों का बाहुल्य था तथा जनरुचि की पुस्तकों का अभाव था। मालवीयजी के प्रयास से उनके निवास स्थान के पास ही भारती भवन पुस्तकालय की स्थापना हुई। पुस्तकालय के नियम के अनुसार यहाँ केवल हिन्दी तथा संस्कृत की ही पुस्तकें खरीदी जा सकती थीं तथा योरोपियन भाषाओं की पुस्तकें केवल दान में प्राप्त की जा सकती थीं। मालवीयजी भारती भवन के ट्रस्टी चुने गये तथा वे जीवनपर्यन्त उसके अध्यक्ष रहे।
काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना सन् १८९३ ई. में हुई थी। इससे लगभग १ दशक पहले सन् १८८४ में प्रयाग में मालवीयजी के प्रयास से हिन्दी हितकारिणी सभा की स्थापना की गई थी। सर्वश्री माघव प्रसाद शुक्ल, रासबिहारी शुक्ल तथा पुरुषोत्तमदास टण्डन उनके सहयोगी थे। इस संस्था के माध्यम से भारतेन्दु की मान्यता `निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कै मूल' को बल मिला और भारतेन्दु ने जो हिन्दी का सपना देखा था वह मालवीयजी तथा उनके सहयोगियों के हाथों स्वरूप लेने लगा।
सन् १८९४ में मेरठ के दुर्गादत्त ने न्यायालयों में देवनागरी लिपि के प्रयोग के लिए ज्ञापन दिया जो अस्वीकृत हो गया। इस सन्दर्भ में नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने लैफ्टीनेन्ट गवर्नर को काशी आमंत्रित किया जिसका सकारात्मक उत्तर मिला। मालवीयजी के ऐतिहासिक प्रयास यहीं से आरम्भ होते हैं।
मालवीयजी ने लैफ्टीनेन्ट गवर्नर से भेंट की तथा हिन्दी न्यायालयों की भाषा बने इसका पक्ष दृढ़ता से प्रस्तुत किया। वे वकालत का काम छोड़ कर इसी कार्य में जुट गए। उच्च न्यायालय के एक कक्ष में लोग उन्हें कानून की पुस्तकों से नहीं वरन् सन्दर्भ पुस्तकों तथा अन्य साहित्यिक पुस्तकों से घिरा हुआ देखते थे। अनेक स्थानों का दौरा करके उन्होंने आंकड़े एकत्र किये तथा एक सौ पृष्ठों का ऐतिहासिक ज्ञापन शासन को देने के लिए तैयार किया। सन् १८९७ में यह दस्तावेज इंडियन प्रेस से प्रकाशित हुआ।
इस कार्य को और गति देने के लिए नागरी प्रचारिणी सभा ने १७ व्यक्तियों की एक समिति का गठन किया। समिति के एक मात्र प्रतिनिधि मालवीयजी थे। प्रतिवेदन में ६० हजार व्यक्तियों के हस्ताक्षर थे जिनका मत था कि देवनागरी लिपि को ही न्यायालयों की भाषा होने का अधिकार है। यह हिन्दी के लिए पहली सुनियोजित एवं व्यूह बद्ध लड़ाई थी जिसने जनमानस में हिन्दी के प्रति अपराजेय लालसा को जन्म दिया। मालवीयजी के परामर्श से बाबू श्यामसुन्दर दास ने कार्यक्रम को आन्दोलन के रूप में चलाने के लिए नगरों में समितियाँ गठित कीं। जनता के साथ बुद्धिजीवी तथा पत्र पत्रिकाएँ भी इस अभियान से जुड़ गईं।
२० अगस्त सन् १८९६ में राजस्व परिषद ने एक प्रस्ताव पास किया कि सम्मन आदि की भाषा एवं लिपि हिन्दी होगी परन्तु यह व्यवस्था कार्य रूप में परिणित नहीं हो सकी। १५ अगस्त सन् १९०० को शासन ने निर्णय लिया कि उर्दू के अतिरिक्त नागरी लिपि को भी अतिरिक्त भाषा के रूप में व्यवहृत किया जाये। यह मालवीयजी के नेतृत्व में चल रहे प्रयासों की विजय थी परन्तु उर्दू भाषी तथा योरोपियन समुदाय पर इसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई। लैफ्टीनेन्ट गवर्नर ने मालवीयजी को बात करने के लिए आमंत्रित किया। मालवीयजी उस समय तेज बुखार में थे परन्तु दवाओं का ढेर लेकर वे गवर्नर के पास पहुँचे उसी स्थिति में उन्होंने गवर्नर से दो घण्टे बात की और उन्हें आश्वस्त किया कि वे आन्दोलन की चिन्ता न करें तथा किसी स्थिति में आदेश वापस न लें। यह कार्य मालवीयजी ही कर सकते थे।
हिन्दी प्रदेश की भाषा बन गई थी परन्तु मालवीयजी उसे राष्ट्र की भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने के लिए चिन्तित थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रारूप प्रस्तुत किया तथा सन् १९१० में काशी में आयोजित प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की। सम्मेलन में देश भर से ३०० प्रतिनिधि तथा विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों के ४२ सम्पादक सम्मिलित हुए। इस अवसर पर अदालतों में नागरी लिपि का प्रचार, उच्च कक्षाओं में हिन्दी का शिक्षण, हिन्दी पाठ्यपुस्तकों का प्रणयन, राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी और नागरी का प्रयोग तथा स्टाम्पों पर हिन्दी का प्रयोग आदि प्रस्ताव पारित किए गये।
सम्मेलन में मालवीयजी ने अत्यन्त मार्मिक अध्यक्षीय भाषण दिया। एक कोष की स्थापना की गयी जिसमें तुरन्त ३५२४ रुपये संग्रहीत हो गये। स्वयं मालवीयजी ने अपने अंशदान के रूप में ११ हजार रुपये देने की घोषणा की। सभा पर ६ हजार रुपये का ऋण था उसे अदा करने का आश्वासन मिला। पं. श्यामबिहारी मिश्र ने मालवीयजी के संबन्ध में कहा था ``हिन्दी की जो उन्नति आज दिखाई देती है उसमें मालवीयजी का उद्योग मुख्य कहना चाहिए। इस अवसर पर हमें दूसरा सभापति इनसे बढ़कर नहीं मिल सकता था।
अपने अध्यक्षीय भाषण में मालवीयजी ने हिन्दी अपनाने, सरल हिन्दी का प्रयोग करने तथा अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्द ग्रहण करने की अपील की। उनका कहना था कि संस्कृत की पुत्री होने के कारण हिन्दी प्राचीनतम भाषा है।
सन् १९१९ से बम्बई में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए मालवीयजी ने कहा कि सभी भारतीय भाषाएँ आपस में बहने हैं तथा हिन्दी उनमें बड़ी बहन है। अन्य प्रादेशिक भाषाओं की अपेक्षा हिन्दी बोलने वालों की संख्या अधिक है। ३२ करोड़ भारत वासियों में ही साढ़े तेरह करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं। अत: देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा का स्थान दिया जाना चाहिए। उन्होंने हिन्दी को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाने पर भी बल दिया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि कोई दिन आएगा जब अंग्रेजी की तरह हिन्दी भी विश्व भाषा बनेगी। सन् १९३९ में काशी में पुन: आयोजित १८ वें हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वे स्वागताध्यक्ष थे। इसी हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने बाद में मालवीयजी के आदर्शों के उत्तराधिकारी पुरुषोत्तमदास टण्डन के नेतृत्व में भारतीय संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अभिहित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर हिन्दी को एक विषय के रूप में उन्होंने स्थान दिया। कलकत्ता विश्वविद्यालय के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ही था जहाँ सबसे पहले हिन्दी में स्नातकोत्तर कक्षाओं में शिक्षा प्रारम्भ हुई। हिन्दी साहित्य में प्रथम शोध भी यहीं प्रस्तुत हुआ था। विश्वविद्यालय की स्थापना के मूल में मालवीयजी के मन में एक ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित करने की परिकल्पना थी जहाँ मातृभाषा में सभी विद्याओं के शिक्षण की व्यवस्था हो। विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में उन्होंने बाबू श्यामसुन्दर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, अयोध्या सिंह उपाध्याय ``हरिऔध तथा लाला भगवानदीन जैसे विद्वानों की नियुक्ति की। उनकी इच्छा थी कि विश्वविद्यालय में हिन्दी माध्यम से शिक्षा दी जाये परन्तु शिक्षा सचिव बटलर के विरोध के कारण तब ऐसा संभव नहीं हो सका। फिर भी विश्वविद्यालय की रजत जयन्ती के अवसर पर महात्मागांधी की उपस्थिति में मालवीयजी ने विश्वास दिलाया था कि जैसे - जैसे हिन्दी में पुस्तकों की रचना होती जायेगी हिन्दी माध्यम को विस्तार दिया जाता रहेगा। दुर्भाग्य से अंग्रेजों के भारत छोड़ने से पहले वे इस लोक से चले गए अन्यथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिन्दी माध्यम का विश्वविद्यालय होता। यह दायित्व वह दूसरी पीढ़ी पर छोड़ गये हैं। काश! मालवीयजी की इस महान् संस्था के वेतनभोगी उनकी भावना को महसूस कर सकते।
नागरी प्रचारिणी सभा से वे अन्त तक जुड़ कर हिन्दी के लिए कार्य करते रहे। हिन्दी शब्द सागर की पूर्ति पर उन्होंने सभा के नये भवन का शिलान्यास किया था। प्रस्तर मंजूषा में ताम्र पर मालवीयजी के संबन्ध मे लिखा गया -
इस स्थल पर नागरी प्रचारिणी सभा काशी के नवीन भवन का शिलान्यास संस्कार माघ शुक्ल ५ सं. १९८५ विक्रमी को महामना पं मदन मोहन मालवीय के कर कमलों से संपन्न हुआ।
हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मालवीयजी का अवदान अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने कालाकांकर जैसे ग्रामीण अंचल में रहकर हिन्दी के प्रथम दैनिक हिन्दोस्थान का सम्पादन किया तथा अपने सम्पादन से देश में एक नयी वैचारिक क्रान्ति को जन्म दिया। उन्होंने ``अभ्युदय जैसे कई पत्रों का भी सम्पादन किया जिसमें पहली बार राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त की रचना प्रकाशित हुयी थी। यदि मालवीयजी न होते तो मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवि प्रेरणा विहीन रहते और उनकी साधना भी शायद इतनी प्रखर न होती।
मालवीयजी स्वयं भी रचनाकार थे। बाल्यकाल से ही वे `मकरन्द' नाम से लिखते थे तथा उनकी रचनाओं का प्रकाशन बाल कृष्ण भट्ट के हिन्दी प्रदीप में होता था। बी.ए. पास करने के बाद ही उन्होंने इलाहाबाद में साहित्य समाज की स्थापना की थी जहाँ साहित्य चर्चा तथा हिन्दी प्रचार का कार्य होता था।
इस प्रकार महामना मालवीय ने बाल्यकाल से जीवन के अन्तिम क्षण तक हिन्दी के लिये अथक कार्य किया। उनके अनवरत प्रयास और संघर्ष केवल भगीरथ की तपस्या के पर्याय हो सकते हैं जिसके फलस्वरूप हम एक गंगा के दर्शन कर सके जिसका नाम राष्ट्र भाषा हिन्दी है।
-जगत प्रकाश चतुर्वेदी
शनिवार, 19 दिसंबर 2009
मगर ये जनता चुप है

भ्रष्ट हो गयी दिल्ली की सरकार
मगर ये जनता चुप है।
मजदूरों पर मँहगाई की मार
मगर ये जनता चुप है।
फटी हुई आँखों में कैसे
आयेगें रोटी के सपने,
सत्ता की सीढ़ी पर चढ़कर
भूल गये जनप्रतिनिधि अपने,
राजनीति अब केवल कारोबार
मगर ये जनता चुप है।
भ्रष्टाचार, घोटाले, रिश्वतखोरी,
और वसूली है,
ए0सी0 घर मैं बैठी संसद
जनता का दुःख भूली है,
गँाधी जी के सपने सब बेकार
मगर ये जनता चुप है।
खाद-बीज, पानी की किल्लत
खेतों में पसरा अकाल है,
पंचायत सरपंचों की है।
बिना दवा के अस्पताल है,
नुक्कड़-नुक्कड़ खुलते बीयरबार
मगर ये जनता चुप है।
अंग्रेजों ने जैसे बाँटा
वैसे ही बँटवारा करते,
संविधान की कसमें खाकर
हमको तिल-तिल मारा करते,
बाँट रहे हैं ये मेले-त्योहार
मगर ये जनता चुप है।
सत्ता तो सत्ता, विपक्ष भी
अपनी आँखे खोल रहा क्या?
कलम चलाने वाला कवि भी
दिनकर जैसा बोल रहा क्या?
बता रहे हैं सब कुछ ये अखबार
मगर ये जनता चुप है।
गाँवों का यह देश
मगर गाँवों में निर्धन,
स्विस बैंकों में भरा
दलालों का काला धन
लूट रहे हैं हमको बिग बाजार
मगर ये जनता चुप है।
-जयकृष्ण राय तुषार,63 जी/7, बेली कालोनी,
स्टेनली रोड, इलाहाबाद, मो0- 9415898913
मंगलवार, 8 दिसंबर 2009
बाल साहित्य की आशा : आकांक्षा यादव
बच्चों के समग्र विकास में बाल साहित्य की सदैव से प्रमुख भूमिका रही है। बाल साहित्य बच्चों से सीधा संवाद स्थापित करने की विधा है। बाल साहित्य बच्चों की एक भरी-पूरी, जीती-जागती दुनिया की समर्थ प्रस्तुति और बालमन की सूक्ष्म संवेदना की अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि बाल साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण व विषय की गम्भीरता के साथ-साथ रोचकता व मनोरंजकता का भी ध्यान रखना होता है। समकालीन बाल साहित्य केवल बच्चों पर ही केन्द्रित नहीं है अपितु उनकी सोच में आये परिवर्तन को भी बखूबी रेखाकित करता है। सोहन लाल द्विवेदी जी ने अपनी कविता ‘बड़ों का संग’ में बाल प्रवृत्ति पर लिखा है कि-''खेलोगे तुम अगर फूल से तो सुगंध फैलाओगे।/खेलोगे तुम अगर धूल से तो गन्दे हो जाओगे/कौवे से यदि साथ करोगे, तो बोलोगे कडुए बोल/कोयल से यदि साथ करोगे, तो दोगे तुम मिश्री घोल/जैसा भी रंग रंगना चाहो, घोलो वैसा ही ले रंग/अगर बडे़ तुम बनना चाहो, तो फिर रहो बड़ों के संग।'' आकांक्षा जी बाल साहित्य में भी उतनी ही सक्रिय हैं, जितनी अन्य विधाओं में। बाल साहित्य बच्चों को उनके परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन मूल्य, आचार-विचार और व्यवहार के प्रति सतत् चेतन बनाने में अपनी भूमिका निभाता आया है। बाल साहित्यकार के रूप में आकांक्षा जी की दृष्टि कितनी व्यापक है, इसका अंदाजा उनकी कविताओं में देखने को मिलता है। इसी के मद्देनजर कानपुर से डा0 राष्ट्रबन्धु द्वारा सम्पादित-प्रकाशित ’बाल साहित्य समीक्षा’ ने नवम्बर 2009 अंक आकांक्षा यादव जी पर विशेषांक रूप में केन्द्रित किया है। 30 पृष्ठों की बाल साहित्य को समर्पित इस मासिक पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर बाल साहित्य की आशा को दृष्टांकित करता आकांक्षा यादव जी का सुन्दर चित्र सुशोभित है। इस विशेषांक में आकांक्षा जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर कुल 9 रचनाएं संकलित हैं।
’’सांस्कृतिक टाइम्स’’ की विद्वान सम्पादिका निशा वर्मा ने ’’संवेदना के धरातल पर विस्तृत होती रचनाधर्मिता’’ के तहत आकांक्षा जी के जीवन और उनकी रचनाधर्मिता पर विस्तृत प्रकाश डाला है तो उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन से जुडे दुर्गाचरण मिश्र ने आकांक्षा जी के जीवन को काव्य पंक्तियों में बखूबी गूंथा है। प्रसि़द्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु जी ने आकांक्षा जी के बाल रचना संसार को शब्दों में भरा है तो बाल-मन को विस्तार देती आकांक्षा यादव की कविताओं पर चर्चित समालोचक गोवर्धन यादव जी ने भी कलम चलाई है। डा0 कामना सिंह, आकांक्षा यादव की बाल कविताओं में जीवन-निर्माण का संदेश देखती हैं तो कविवर जवाहर लाल ’जलज’ उनकी कविताओं में प्रेरक तत्वों को परिलक्षित करते हैं।
वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 शकुन्तला कालरा, आकांक्षा जी की रचनाओं में बच्चों और उनके आस-पास की भाव सम्पदा को चित्रित करती हैं, वहीं चर्चित साहित्यकार प्रो0 उषा यादव भी आकांक्षा यादव के उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य के लिए अशेष शुभकामनाएं देती हैं। राष्ट्भाषा प्रचार समिति-उ0प्र0 के संयोजक डा0 बद्री नारायण तिवारी, आकांक्षा यादव के बाल साहित्य पर चर्चा के साथ दूर-दर्शनी संस्कृति से परे बाल साहित्य को समृद्ध करने पर जोर देते हैं, जो कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बेहद प्रासंगिक भी है। साहित्य साधना में सक्रिय सर्जिका आकांक्षा यादव के बहुआयामी व्यक्तित्व को युवा लेखिका डा0 सुनीता यदुवंशी बखूबी रेखांकित करती हैं। बचपन और बचपन की मनोदशा पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत आकांक्षा जी का आलेख ’’खो रहा है बचपन’’ बेहद प्रभावी व समयानुकूल है।
आकांक्षा जी बाल साहित्य में नवोदित रचनाकार हैं, पर उनका सशक्त लेखन भविष्य के प्रति आश्वस्त करता हैं। तभी तो अपने संपादकीय में डा0 राष्ट्रबन्धु लिखते हैं-’’बाल साहित्य की आशा के रूप में आकांक्षा यादव का स्वागत कीजिए, उन जैसी प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का रास्ता दीजिए। फूलों की यही नियति है।’’ निश्चिततः ’बाल साहित्य समीक्षा’ द्वारा आकांक्षा यादव पर जारी यह विशेषांक बेहतरीन रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक साथ स्थापित व नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहन देना डा0 राष्ट्रबन्धु जी का विलक्षण गुण हैं और इसके लिए डा0 राष्ट्रबन्धु जी साधुवाद के पात्र हैं।
समीक्ष्य पत्रिका-बाल साहित्य समीक्षा (मा0) सम्पादक-डा0 राष्ट्रबन्धु,, मूल्य 15 रू0, पता-109/309, रामकृष्ण नगर, कानपुर-208012
समीक्षक- जवाहर लाल ‘जलज‘, ‘जलज निकुंज‘ शंकर नगर, बांदा (उ0प्र0)
लेबल:
आकांक्षा यादव,
पत्रिकाएं,
सम्मान-उपलब्धि
रविवार, 6 दिसंबर 2009
जाति व्यवस्था : डा0 अम्बेडकर बनाम गाँधी
डाॅ0 अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि राजनैतिक स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक एवं आर्थिक समानता जरूरी है। महात्मा गाँधी और डाॅ0 अम्बेडकर दोनों ने ही जाति व्यवस्था की कुरीतियों को समाप्त करने की बात कही पर जहाँ डाॅ0 अम्बेडकर का मानना था कि सम्पूर्ण जाति व्यवस्था को समाप्त करके ही बुराइयों को दूर किया जा सकता है वहीं महात्मा गाँधी के मत में शरीर में एक घाव मात्र हो जाने से पूरे शरीर को नष्ट कर देना उचित नहीं अर्थात पूरी जाति व्यवस्था को खत्म करने की बजाय उसकी बुराईयों मात्र को खत्म करना उचित होता। डाॅ0 अम्बेडकर के मत में मनुस्मृति से पूर्व भी जाति प्रथा थी। मनुस्मृति ने तो मात्र इसे संहिताबद्ध किया और दलितों पर राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक दासता लाद दी।
डाॅ0 अम्बेडकर चातुर्वर्ण व्यवस्था को संकीर्ण सिद्धान्त मानते थे जो कि विकृत रूप में सतहबद्ध गैरबराबरी का रूप है। उन्होंने शूद्रों को आर्यों का ही अंग मानते हुए प्रतिपादित किया कि इण्डो-आर्यन समाज में ब्राह्मणों ने दण्डात्मक विधान द्वारा कुछ लोगों को शूद्र घोषित कर दिया और उन्हें घृणित सामाजिक जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया। नतीजन, शूद्र चातुर्वर्ण की अन्तिम जाति न रहकर नीची जातियाँ घोषित हो र्गइं। इसीलिए वे हिन्दू समाज के उत्थान हेतु दो तत्व आवश्यक मानते थे- प्रथम, समानता और द्वितीय, जातीयता का विनाश। इसी के अनुरूप उन्होंने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में सुझाव दिया कि अछूतों को गैर जातीय हिन्दू अथवा प्रोटेस्टेण्ट हिन्दू के रूप में मान्यता दी जाय। उनका कहना था कि - ‘‘अछूत हिन्दुओं के तत्व नहीं हैं बल्कि भारत की राष्ट्रीय व्यवस्था में एक पृथक तत्व हैं जैसे मुसलमान।’’
डाॅ0 अम्बेडकर गाँधी जी के ‘हरिजन’ शब्द से नफरत करते थे क्योंकि दलितों की स्थिति सुधारे बिना धर्म की चाशनी में उन्हें ईश्वर के बन्दे कहकर मूल समस्याओं की ओर से ध्यान मोड़ने का गाँधी जी का यह नापाक नुस्खा उन्हें कभी नहीं भाया। उन्होंने गाँधी जी के इस कदम पर सवाल भी उठाया कि- ‘‘सिर्फ अछूत या शूद्र या अवर्ण ही हरिजन हुए, अन्य वर्णों के लोग हरिजन क्यों नहीं हुए? क्या अछूत हरिजन घोषित करने से अछूत नहीं रहेगा? क्या मैला नहीं उठायेगा? क्या झाडू़ नहीं लगाएगा? क्या अन्य वर्ण वाले उसे गले लगा लेंगे? क्या हिन्दू समाज उसे सवर्ण मान लेगा? क्या उसे सामाजिक समता का अधिकार मिल जायेगा? हरिजन तो सभी हैं, लेकिन गाँधी ने हरिजन को भी भंगी बना डाला। क्या किसी सवर्ण ने अछूतों को हरिजन माना? सभी ने भंगी, मेहतर माना। जिस प्रकार कोई राष्ट्र अपनी स्वाधीनता खोकर धन्यवाद नहीं दे सकता, कोई नारी अपना शील भंग होने पर धन्यवाद नहीं देती फिर अछूत कैसे केवल नाम के लिए हरिजन कहलाने पर गाँधी को धन्यवाद कर सकता है। यह सोचना फरेब है कि ओस की बूंदों से किसी की प्यास बुझ सकती है।’’ अम्बेडकर का मानना था कि वर्ण व्यवस्था का सीधा दुष्प्रभाव भले ही दलितों व पिछड़ों मात्र पर दिखता है पर जब इसी सामाजिक विघटन के कारण देश गुलाम हुआ तो सवर्ण भी बिना प्रभावित हुए नहीं रह सके।
शनिवार, 7 नवंबर 2009
युवाओं को आगे आना होगा....

आज जिस तेजी से देश के हालात बदल रहे है,वो चिंता का विषय है!चारों और अनिश्चितता और अराजकता .का वातावरण है!देश .विकास पथ पर अग्रसर है .किंतु लोग पुन:आदिम काल की और जा रहें है!कहीं पर दूसरी जाति में तो कहीं पर अपनी ही जाति में शादी करने पर युवा जोडों को मौत के घाट उतार दिया जाता है !कहीं पर महिला को ..डायन बता कर तो कहीं पर प्रेत बता कर मार दिया जाता है!नेता एक दूसरे की टांग खीचने में लगें है और नित नए नए मुद्दे उठा रहे है !!पूरे देश में एकता और अखंडता की बजाय ..क्षेत्रीय वाद हावी होता जा रहा है !ऐसे में युवाओं की जिम्मेवारी बनती है कि वे आगे आयें और देश को एक नई दिशा दें!!
युवा उर्जावान है ,नई सोच रखते है और सबसे बड़ी बात ज्यादा योग्य है ,बनिस्पत उन पुराने नेताओं के ,तो उन्हें आगे आना ही चाहिए !आज देश को युवा .सोच कि ही आवश्यकता है...!देश को आगे विकसित देश बनने में ये युवा ही एक बड़ी भूमिका निभा सकते है !तो आइये युवाओं आपका स्वागत है.....
शनिवार, 24 अक्टूबर 2009
साहसी पर्वतारोही को सहायता चाहिए...

राजस्थान के महान पर्वतारोही मगन बिस्सा ,जिन्होंने तीन बार एवरेस्ट पर विजय पाई है!१९८४ में पहली बार उन्होंने बछेंद्री पाल के साथ एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया था !इसके लिए उन्हें सेना मैडल भी दिया गया!किंतु आज ये पर्वतारोही अस्पताल में जिंदगी की ज़ंग लड़ रहा है !पिछली मई में चौथी बार एवरेस्ट जीतने की धुन में ये घायल हो गए थे ,तभी से अस्पताल के आई सी यूं में अकेले ही मौत से लड़ रहें है!अभी तक राज्य और केन्द्र सरकार ने इनकी कोई .सुध नहीं ली है!किसी भी नेता को इनसे मिलने समय नहीं है !ऐसी विकट घड़ी में इनके कुछ .मित्रों और शुभचिंतकों ने सहायता का बीडा उठाया है !इन्होने उनकी सहायता हेतु एक वेबसाईट बनाई है जिस पर सारा विवरण उपलब्ध है !इस वेबसाईट पर जाने हेतु यहाँ क्लिक करें...!अपने साहसिक कारनामो से देश का नाम ऊँचा करने वाले पर्वतारोही हेतु हम सभी ब्लोगेर साथियों को भी अपना योगदान देना चाहिए!मगन बिस्सा राजस्थान एडवेंचर फाउन्देशन के अध्यक्ष और नेशनल ..फाउन्देशन .एडवेंचर के निदेशक .भी है....
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
दीवाली में क्यों होती है लक्ष्मी-गणेश की पूजा
दीपावली को दीपों का पर्व कहा जाता है और इस दिन ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक के देवता व विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि दीपावली मूलतः यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते। दीपावली पर रंग-बिरंगी आतिशबाजी, लजीज पकवान एवं मनोरंजन के जो विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं। सभ्यता के विकास के साथ यह त्यौहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मी जी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है। गणेश जी को दीपावली पूजा में मंचासीन करने में शैव-सम्प्रदाय का काफी योगदान है। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेश जी को प्रतिष्ठित किया। यदि तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन् ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अतः कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा। दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णु जी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया हैै। ऐसा नहीं है कि दीपावली का सम्बन्ध सिर्फ हिन्दुओं से ही रहा है वरन् दीपावली के दिन ही भगवान महावीर के निर्वाण प्राप्ति के चलते जैन समाज दीपावली को निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है तो सिक्खों के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर की स्थापना एवं गुरू हरगोविंद सिंह की रिहाई दीपावली के दिन होने के कारण इसका महत्व सिक्खों के लिए भी बढ़ जाता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को आज ही के दिन माँ काली ने दर्शन दिए थे, अतः इस दिन बंगाली समाज में काली पूजा का विधान है। यह महत्वपूर्ण है कि दशहरा-दीपावली के दौरान पूर्वी भारत के क्षेत्रों में जहाँ देवी के रौद्र रूपों को पूजा जाता है, वहीं उत्तरी व दक्षिण भारत में देवी के सौम्य रूपों अर्थात लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा माँ की पूजा की जाती है।
लेबल:
आकांक्षा यादव,
पर्व-त्यौहार
रविवार, 11 अक्टूबर 2009
Gandhiji writes a postcard प्रतियोगिता का आयोजन
गांधी जी को पत्रों से बहुत प्यार था। वे अक्सर अपने साथ पोस्टकार्ड लेकर चलते थे और जहाँ भी रूकते थे, लोगों को पोस्टकार्ड लिखा करते थे। डाक विभाग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की इस खासियत के मद्देनजर राष्ट्रीय स्तर पर 'Gandhiji writes a postcard' प्रतियोगिता आयोजित कर रहा है। इसके अन्तर्गत बच्चे प्रतियोगिता पोस्टकार्ड पर एक पत्र लिखेंगे। इस हेतु वह अपने को गांधी जी मानकर पत्र लिखेंगे और यह पत्र किसी ज्वलंत तात्कालिक मुद्दे पर होना चाहिए।
प्रतियोगिता दो श्रेणियों में होगी। प्रथम, कक्षा 3 से कक्षा 5 तक और द्वितीय, कक्षा 6 से कक्षा 8 तक। इस हेतु किसी भी प्रकार का प्रवेश शुल्क नहीं देना होगा। मात्र 10 रूपये का प्रतियोगिता पोस्टकार्ड डाकघर से खरीद कर, उस पर हाथ से निबंध लिखना होगा। निबंध हिन्दी/अंग्रेजी में लिखा जा सकता है। शब्द सीमा न्यूनतम 25 शब्दों की होगी। इसके साथ प्रेषक अपना नाम, उम्र, कक्षा, स्कूल, पता व निबंध लेखन की तिथि, प्रतियोगिता पोस्टकार्ड के पीछे पते वाले भाग के बगल में लिखेगा। निबंध लिखकर पोस्टकार्ड को चीफ पोस्टमास्टर जनरल के चिन्हित पोस्ट बाक्स (उत्तर प्रदेश हेतु-पोस्ट बाक्स सं0-101,लखनऊ जी0पी0ओ0) के पते पर भेजना होगा। इस हेतु अंतिम तिथि 30 अक्टूबर 2009 है। राष्ट्रीय स्तर पर एक जनवरी 2010 को रिजल्ट घोषित कर दिये जायेंगे।
सर्वश्रेष्ठ निबंध को पुरस्कृत भी किया जायेगा। परिमण्डलीय स्तर पर प्रथम श्रेणी (कक्षा 3-5) हेतु क्रमशः आईपाड, डिजिटल कैमरा व सी0डी0 के साथ इन्साइक्लोपीडिया सेट एवं द्वितीय श्रेणी (कक्षा 6-8) हेतु क्रमशः लैपटाप, आईपाड व डिजिटल कैमरा क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार के रूप में दिये जायेंगे। इसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम श्रेणी (कक्षा 3-5) हेतु लैपटाप व सी0डी0, डिजिटल कैमरा एवं सिन्थसाइजर तथा द्वितीय श्रेणी (कक्षा 6-8) हेतु पर्सनल कम्प्यूटर, प्रिन्टर, यू0पी0एस0 व सी0डी0, हैण्डीकैम तथा म्यूजिक सिस्टम क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार के रूप में दिये जायेंगे।
सोमवार, 28 सितंबर 2009
विजय का पर्व : दशहरा
दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन "दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप मंे राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं- क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में मांँ दुर्गा की लगातार नौ दिनांे तक पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में माँ दुर्गा की उपासना की थी और मांँ ने उन्हें युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया था। इसके अगले ही दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और आज भी प्रतीकात्मक रूप में रावण-पुतला का दहन कर अन्याय पर न्याय के विजय की उद्घोषणा की जाती हेै।भारत विविधताओं का देश है, अतः उत्सवों और त्यौहारों को मनाने में भी इस विविधता के दर्शन होते हैं। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा काफी लोकप्रिय है। एक हते तक चलने वाले इस पर्व पर आसपास के बने पहाड़ी मंदिरों से भगवान रघुनाथ जी की मूर्तियाँ एक जुलूस के रूप में लाकर कुल्लू के मैदान में रखी जाती हैं और श्रद्धालु नृत्य-संगीत के द्वारा अपना उल्लास प्रकट करते हैं। मैसूर (कर्नाटक) का दशहरा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है। वाड्यार राजाओं के काल में आरंभ इस दशहरे को अभी भी शाही अंदाज में मनाया जाता है और लगातार दस दिन तक चलने वाले इस उत्सव में राजाओं का स्वर्ण -सिंहासन प्रदर्शित किया जाता है। सुसज्जित तेरह हाथियों का शाही काफिला इस दशहरे की शान है। आंध्र प्रदेश के तिरूपति (बालाजी मंदिर) में शारदीय नवरात्र को ब्रह्मेत्सवम् के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन नौ दिनों के दौरान सात पर्वतों के राजा पृथक-पृथक बारह वाहनों की सवारी करते हैं तथा हर दिन एक नया अवतार लेते हैं। इस दृश्य के मंचन और साथ ही ष्चक्रस्नानष् (भगवान के सुदर्शन चक्र की पुष्करणी में डुबकी) के साथ आंध्र में दशहरा सम्पन्न होता है। केरल में दशहरे की धूम दुर्गा अष्टमी से पूजा वैपू के साथ आरंभ होती है। इसमें कमरे के मध्य में सरस्वती माँ की प्रतिमा सुसज्जित कर आसपास पवित्र पुस्तकें रखी जाती हैं और कमरे को अस्त्रों से सजाया जाता है। उत्सव का अंत विजयदशमी के दिन ष्पूजा इदप्पुष् के साथ होता है। महाराज स्वाथिथिरूनाल द्वारा आरंभ शास्त्रीय संगीत गायन की परंपरा यहाँ आज भी जीवित है। तमिलनाडु में मुरगन मंदिर में होने वाली नवरात्र की गतिविधयाँ प्रसिद्ध हंै। गुजरात मंे दशहरा के दौरान गरबा व डांडिया-रास की झूम रहती है। मिट्टी के घडे़ में दीयों की रोशनी से प्रज्वलित ष्गरबोष् के इर्द-गिर्द गरबा करती महिलायें इस नृत्य के माध्यम से देवी का आह्मन करती हैं। गरबा के बाद डांडिया-रास का खेल खेला जाता है। ऐसी मान्यता है कि माँ दुर्गा व राक्षस महिषासुर के मध्य हुए युद्ध में माँ ने डांडिया की डंडियों के जरिए महिषासुर का सामना किया था। डांडिया-रास के माध्यम से इस युद्ध को प्रतीकात्मक रूप मे दर्शाया जाता है।
भारत त्यौहारों का देश है और हर त्यौहार कुछ न कुछ संदेश देता है-बन्धुत्व भावना, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक तारतम्य, सभ्यताओं की खोज एवं अपने अतीत से जुडे़ रहने का सुखद अहसास। त्यौहार का मतलब ही होता है सारे गिले-शिकवे भूलकर एक नए सिरे से दिन का आगाज। त्यौहारों को मनाने के तरीके अलग हो सकते हैं पर उद्देश्य अंततः मेल-जोल एवं बंधुत्व की भावना को बढ़ाना ही है। त्यौहार सामाजिक सदाशयता के परिचायक हैं न कि हैसियत दर्शाने के। त्यौहार हमें जीवन के राग-द्वेष से ऊपर उठाकर एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद करते हैं। समाज के हर वर्ग के लोगों को एक साथ मेल-जोल और भाईचारे के साथ बिठाने हेतु ही त्यौहारों का आरम्भ हुआ। यह एक अलग तथ्य है कि हर त्यौहार के पीछे कुछ न कुछ धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं होती हैं पर अंततः इनका उद््देश्य मानव-कल्याण ही होता है।
रविवार, 27 सितंबर 2009
इकोनोमी क्लास की यात्रा का ढोंग..किसलिए?
लो जी थरूर साहब भी केटल[इकोनोमी]क्लास में सफर को राजी हो गए!होते भी क्यूँ नहीं महारानी और युवराज़ जो ऐसा चाहते है!लेकिन इससे क्या होगा ?विमान तो अपने गंतव्य तक जाएगा ही ...!फ़िर किसके और कैसे .paise... बचेंगे ?ऊपर से सुरक्षा बलों ने कुछ सीटें और खाली करवा ली!सोनिया जी और राहुल के ऐसा चाहने से किसी का भला होने वाला नहीं है!अगर वास्तव में ही खर्चा कम करना है तो जनता के गाढे पैसे की बर्बादी रूकनी चाहिए!आज कोसा विधायक,मंत्री या कोई नेता ऐसा है जो अपने वेतन से काम चला रहा है?आज एक अदना सा आदमी अपने मासिक वेतन से घर नहीं चला सकता,उसे तो जैसे तैसे जीने की आदत पड़ चुकी है !और एक ये नेता जी है जो अपने वेतन से इतना कमा लेते है कि इन्हे किसी चीज़ कि कमी नहीं....!बस इसी बात में .सारा रहस्य छिपा है!आपने किसी नेता को भीख मांगते देखा है?मैंने बहुत से राष्ट्रीय खिलाड़ियों,पुरुस्कृत शिक्षकों और सवतंत्रता सेनानियों को रोज़ी रोटी के लिए संघर्ष करते देखा है!वे पूरी जिंदगी में इतना नही कमा सके कि अपना पेट भर सके और एक छोटा सा नेता पाँच साल में इतना कैसे कमा लेता है?इस प्रशन में ही सारे उत्तर .छिपे है!
शनिवार, 26 सितंबर 2009
रक्तदान के सम्बन्ध में जागरूक करने की जरुरत
क्या आपने कभी रक्तदान किया है ? यह सवाल अक्सर लोग पूछते हैं। रक्तदान वास्तव में किसी को जीवन दान ही है। आधा लीटर रक्त तीन लोगों का जीवन बचा सकता है और एक यूनिट ब्लड में 450 मि0ली0 रक्त होता है। जानकर आश्चर्य होगा कि विश्व में प्रतिवर्ष 8 करोड़ यूनिट से ज्यादा रक्त, रक्तदान से जमा होता है। इसमें विकासशील देशों का योगदान 38 प्रतिशत होता है, जबकि यहाँ दुनिया कि 82 प्रतिशत आबादी रहती है.पर दुर्भाग्यवश अपना भारत इसमें काफी पिछड़ा हुआ है या यूँ कहें कि लोग जागरूक नहीं हैं। हर वर्ष भारत को 90 लाख यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, पर जमा मात्र 60 लाख यूनिट की हो पाता है। राज्यवार गौर करें तो सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला राज्य उ0प्र0 स्वैच्छिक रक्तदान के मामले में पिछडे़ राज्यों में शामिल है, जहाँ मात्र 16 प्रतिशत लोग स्वैच्छिक रक्तदान में रूचि दिखाते हैं।
मेघालय में 10, मणिपुर में 10.08, उ0प्र0 में 16 व पंजाब 19.04 प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदान के साथ निचले पायदान पर तो पश्चिम बंगाल (87.6), त्रिपुरा (84), तमिलनाडु (83), महाराष्ट्र (78), चण्डीगढ़ (75) की गिनती बेहतर राज्यों में की जाती है। 2433 ब्लड बैंक भी हमारी जरूरत को नहीं पूरा कर पाते। नतीजन कहीं नकली खून का कारोबार बढ़ रहा है तो कहीं रक्तदान के नाम पर गोरखध्ंधा चल रहा है।
जरूरत है इस संबंध में लोगों को जागरूक करने की और स्वयं पहल करने की ताकि स्वैच्छिक रक्तदान की प्रक्रिया को बढ़ाया जा सके और रक्त के अभाव में किसी को जीवन का दामन न छोड़ना पड़े। याद आती हैं कवि दिनेश रघुवंशी की कुछ पंक्तियाँ-
मैं हूँ इंसान और इंसानियत का मान करता हूँ,
किसी की टूटती सांसों में हो फिर से नया जीवन
मैं बस यह जानकर अक्सर 'लहू' का दान करता हूँ !!
आकांक्षा यादव
मेघालय में 10, मणिपुर में 10.08, उ0प्र0 में 16 व पंजाब 19.04 प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदान के साथ निचले पायदान पर तो पश्चिम बंगाल (87.6), त्रिपुरा (84), तमिलनाडु (83), महाराष्ट्र (78), चण्डीगढ़ (75) की गिनती बेहतर राज्यों में की जाती है। 2433 ब्लड बैंक भी हमारी जरूरत को नहीं पूरा कर पाते। नतीजन कहीं नकली खून का कारोबार बढ़ रहा है तो कहीं रक्तदान के नाम पर गोरखध्ंधा चल रहा है।
जरूरत है इस संबंध में लोगों को जागरूक करने की और स्वयं पहल करने की ताकि स्वैच्छिक रक्तदान की प्रक्रिया को बढ़ाया जा सके और रक्त के अभाव में किसी को जीवन का दामन न छोड़ना पड़े। याद आती हैं कवि दिनेश रघुवंशी की कुछ पंक्तियाँ-
मैं हूँ इंसान और इंसानियत का मान करता हूँ,
किसी की टूटती सांसों में हो फिर से नया जीवन
मैं बस यह जानकर अक्सर 'लहू' का दान करता हूँ !!
आकांक्षा यादव
लेबल:
अब तो जागो,
आकांक्षा यादव
शनिवार, 19 सितंबर 2009
बुधवार, 16 सितंबर 2009
लोक संस्कृति की प्रतीक मड़ई
मड़ई का 2008 का अंक, उस श्रृंखला की नवीनतम कड़ी है जिसका आरंभ 14 नवंबर, 1987 को हुआ था। छत्तीसगढ़ में यदुवंशी लोग कार्तिक मास की एकादशी (जिस दिन देव जागते हैं और तुलसी विवाह का पर्व भी मनाया जाता है) से आगामी पंद्रह दिवसों तक अतिविशिष्ट लोक नृत्य करते हैं जो ‘राउत नाचा‘ के नाम से विख्यात है। ‘मड़ई‘ के संपादक डाॅ0 कालीचरण यादव सन् 1978 से कोतवाली के प्रांगण में राउत नाचा को व्यवस्थत रूप से आयोजित करने का कार्य अपने संयोजकत्व में कर रहे थे ताकि यादवों की ऊर्जा का रचनात्मक उन्नयन हो सके। सन् 1987 में जब इस आयोजन को वृहत्तर रूप देने की आवश्यकता अनुमत हुई और आयोजन स्थल लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय के प्रांगण को बनाया गया तभी ‘स्मारिका‘ के रूप में ‘मड़ई‘ का प्रकाशन भी आरंभ हुआ। पहले अंक में कुल 35 लेख थे जिनमें से 31 लेख रावत नाच पर केंद्रित थे। आरंभ में रावत नाच का सांगोपांग निरूपण करना ही ‘मड़ई‘ का उद्देश्य था जो कि आगामी कुछ वर्षों तक बना रहा। फिर जल्दी ही इस पत्रिका ने स्वयं को आश्चर्यजनक गहराई और विस्तार देना आरंभ किया। यदुवंशियों की संस्कृति के ‘लोक पक्ष‘ का परिचय देने के बाद छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करते हुए ‘मड़ई‘ पूरे देश की लोक संस्कृति संबंधी ज्ञान का कोश बन गयी। देश के विभिन्न लोकांचलों के लोक साहित्य, लोक कला और लोक संस्कृति पर अधिकारी विद्वानों और लेखकों के लिखे सरस और तथ्यपूर्ण लेखों का हिंदी में प्रकाशन कर ‘मड़ई‘ने सामासिक लोक संस्कृति का विकास किया है और हर तरफ से राष्ट्र एवं राष्ट्रभाषा की अनूठी उपासना की है।
आज का समय एक ऐसा समय है जब लोक ही लोक के विरूद्ध युद्धरत है। लोक मानस में ‘प्रेय‘ निरंतर ‘श्रेय‘ को विस्थापित कर रहा है। ‘लोकतत्व‘, ‘लोकप्रिय‘ के द्वारा प्रतिदिन नष्ट और पराभूत किया जा रहा है। ‘लोक-समाज‘ का स्थान ‘जन-समाज‘ ने लगभग ले लिया है। जन-समाज की विडंबनाओं का चित्रण करते हुए टाॅक्केविले ने लिखा है- ‘सभी समान और सदृश्य असंख्य व्यक्तियों की एक ऐसी भीड़ जो छोटे और तुच्छ आनंद की प्राप्ति के लिये सतत प्रयासरत है..... इनमें से प्रत्येक एक-दूसरे से अलग रहता है और सभी एक-दूसरे के भाग्य से अनभिज्ञ होते हैं। उनके समस्त मानव संसार की कल्पना उनकी संतानों और निजी मित्रों तक सीमित होती है। जहां तक अन्य नागरिकों का प्रश्न है वे उनके नजदीक अवश्य हैं पर उन्हें जानते नहीं, वे परस्पर स्पर्श करते हैं पर एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील नहीं हंै।‘
वैश्वीकरण का हिरण्याक्ष पृथ्वी का अपहरण कर विष्ठा के परकोटे के भीतर उसे रखने हेतु लिये जा रहा है। ‘मड़ई‘ इस अपहृत होती हुई पृथ्वी के लोक जीवन के नैसर्गिक-सामाजिक सौंदर्य की गाथा है। वह वराह-अवतार को संभव करने वाला मुकम्मल आह्नान भले न हो पर एक पवित्र और सुंदर अभिलाषा तो जरूर है। हमारी स्मृतियों में तो नहीं, पर ‘मड़ई‘ जैसी विरल पत्रिकाओं में यह लोक जीवन दर्ज रहेगा। ऐसा इसलिए कि लोकसंस्कृति से दूर जाना ही स्मृतिविहीन होना है। ‘मड़ई‘ के ‘स्मारिका‘ होने का शायद यही संदर्भ है। मड़ई सर्वथा निःशुल्क वितरण के लिए है। इसका मूल्य आंका नहीं जा सकता।
लेबल:
पत्रिकाएं,
राम शिव मूर्ति यादव
सदस्यता लें
संदेश (Atom)


