बुधवार, 29 सितंबर 2010
विचलित है मन
अपने विराट स्वरुप का दर्शन
विचलित है मन
आसन्न एक परिवर्तन
गीता का भाष्य
पठनीय पाठ्य
पूरित परिपथ
निश्चित दर्शनीय
एक और अग्निपथ
पिटती परंपराओं की लकीरें
क्या खोल पायेगी
उन शहीदों की तकदीरें
जिन्होंने सहर्ष
किया था जीवन अर्पण
उनकी विधवाएं मांजती
आज इन नेताओं के घर बर्तन
बच्चे जिनके चाटते
इनके आज जूठन
सरकारी अनुदानों हेतु
लगाते चक्कर
खाते टक्कर पे टक्कर
भूखे भेड़ियों का बन गयी शिकार
अस्मत हो गई तार -तार
बिक गए घर-द्वार
आज भी जोहती निराला की वह तोड़ती पत्थर
अपना पालनहार !!
मंगलवार, 28 सितंबर 2010
हिंदी दिवस
एक और उत्सव
पूछता पुनः एक बार अपना भावार्थ
विस्मृत युगबोध का यथार्थ
कल्पित
स्तित्वाहिनता का आभास
निरंतर प्रसरित पावन प्रकाश
लक्षित
एक पुनर्जागरण
याकि करना वैराग्य का वरण
जागृत
चेतना की शिखार्यात्रा
यदि हो विवेक की लाघुमात्र
अलाम्बित एक नूतन प्रभात
विलंबित
राग्यमिनी से गुजित
धवल आकाश
होगी रंगीन पुनः
सुरमई शाम
चमकेगा छितिज पर
आर्यावर्त का क्या नाम
याकि छिरेगी
एक और बहस
es यथार्थ पर
सत्य से दूर
मद से चूर
प्रारंभ होगी
एक और नई
यात्रा अंतहीन
pidit दिन और मलिन
सोमवार, 27 सितंबर 2010
आज भी धन्नी नहीं बिक सका
सुबह से शाम हो गयी
दिन तक़रीबन ढल गयी
पर आज भी धन्नी नहीं बिका
एक भी पैसा नहीं वो कमा सका
सामने मुनिया का
बुखार से तपता चेहरा हूम रहा था
जिससे सुबह hi उसने कहा था
आज वो जरुर दावा लेकर आयेगा
और पपू की फ़ीस भी दे पायेगा
ताकि वो पढ़ कर बड़ा आदमी बनेगा
हमरे दुखो को वो हारेगा
सोचते सोचते उसकी अखे भर आई
wah रे किस्मत की माई
काम के तलश में साथ लायी
रोटिय भी सुख चुकी थी
शाम एकदम ढल चुकी थी
थका हरा वो चल pada घर की और
तन में तनिक भी नहीं था जोर
सूखे pero की माफिक वो
रस्ते से बेखबर चला जा रहा था
उधर से एक ट्रक तेजी से आ रहा था
उसने समाप्त कर दिया धन्नी का जीवन
उसके बच्चो को कर गया
अनाथ आजीवन
शनिवार, 25 सितंबर 2010
माँ की गोद
एक दिन माँ की गोद में
रख कर सर
मैं सो रहा था बाखबर
नीद के आगोश में
हो गया था तन
कल से ही था बेचन ये मन
माँ गुनगुना रही थी प्यारी लोरियां
मेरे सर पे घुमाती अपनी बहिया
एकाएक माँ के लोरियों में से
दर्द की आवाज आई
मैंने कहा क्या हुआ माई
उसने कहा कुछ नहीं बेटा
शायद किसी का है तोता
तभी मने देखा गोद दस निचे से
रक्त की धर
मई हो गया bajar
सोचा वह रे माँ
कैसी है तुम्हारी दुनिया
पर आज के बेटे क्या समझेगे
की क्या होती है पुरनिया
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
सृजनात्मक लेखन कार्यशाला हेतु ब्लॉगरों से प्रविष्टि आमंत्रित
संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-
प्रतिभागियों को 20 अक्टूबर, 2010 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा । पंजीयन फ़ार्म संलग्न है ।
प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।
प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 40 वर्ष से अधिक ना हो ।
प्रतिभागियों में 5 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।
प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।
प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।
कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।
प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं ।
प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था संस्थान द्वारा किया जायेगा ।
प्रतिभागियों को कार्यशाला में संदर्भ सामग्री दी जायेगी ।
प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।
प्रतिभागियों को 12 नवंबर, 2010 शाम 5 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल - बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा । पंजीकृत/चयनित प्रतिभागी लेखकों को कार्यशाला स्थल (होटल) की जानकारी, संपर्क सूत्र आदि की सम्यक जानकारी पंजीयन पश्चात दी जायेगी ।
प्रस्तावित/संभावित विषय एवं विशेषज्ञ लेखक
दिनाँक 13 नवंबर, 2010
रचना की दुनिया – दुनिया की रचना – श्री चंद्रकांत देवताले – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी – प्रभाकर श्रोत्रिय
रचना में यथार्थ और कल्पना – श्री राजेन्द्र यादव – नीलाभ – केदारनाथ सिंह
रचना और प्रजातंत्र – श्री अखिलेश – रघुवंशमणि – परमानंद श्रीवास्तव
रचना और भारतीयता – श्री नंदकिशोर आचार्य – श्री अरविंद त्रिपाठी – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
रचना : महिला, दलित और आदिवासी –– सुश्री अनामिका - कात्यायनी - मोहनदास नैमिशारण्य
रचना और मनुष्यता के नये संकट - श्री विनोद शाही- श्रीप्रकाश मिश्र – सीताकांत महापात्र
दिनाँक 14 नवंबर, 2010
रचना और संप्रेषण – श्री कृष्ण मोहन – ज्योतिष जोशी – मधुरेश
शब्द, समय और संवेदना – श्री नंद भारद्वाज - श्रीभगवान सिंह – ए.अरविंदाक्षन
कविता की अद्यतन यात्रा – श्री वीरेन्द्र डंगवाल – ओम भारती - अशोक बाजपेयी
कविता - छंद और लय – श्री दिनेश शुक्ल – राजेन्द्र गौतम – डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
कैसा गीत कैसे पाठक ? - श्री राजगोपाल सिंह – यश मालवीय – माहेश्वर तिवारी
कहानी-विषयवस्तु, भाषा, शिल्प – श्री शशांक – डॉ. परदेशीराम वर्मा – गोविन्द मिश्र
दिनाँक 15 नवंबर, 2010
कहानी की पहचान – सुश्री उर्मिला शिरीष - सूरज प्रकाश – सतीश जायसवाल
लघुकथा क्या ? लघुकथा क्या नहीं ? – श्री अशोक भाटिया – फ़ज़ल इमाम मल्लिक - बलराम
आलोचना क्यों, आलोचना कैसी? श्री शंभुनाथ – डॉ. रोहिताश्व - विजय बहादुर सिंह
ललित निबंध : कितना ललित-कितना निबंध – श्री नर्मदा प्रसाद उपा.-अष्टभुजा शुक्ल – डॉ.श्रीराम परिहार
(अंतिम नाम निर्धारण स्वीकृति/अस्वीकृति उपरांत)
संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664
बिलासपुर
श्री सुरेन्द्र वर्मा, मो.-94255-70751
श्री राजेश सोंथलिया, 9893048220
पंजीयन हेतु आवेदन पत्र फार्म नमूना
01. नाम -
02. जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03. शैक्षणिक योग्यता –
04. वर्तमान व्यवसाय -
05. प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06. प्रकाशित कृति का नाम –
07. ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08. अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09. पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता (ई-मेल सहित) –
हस्ताक्षर
(जयप्रकाश मानस द्वारा प्रेषित प्रेस-विज्ञप्ति)
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
हिंदी दिवस पर एक सन्देश...
रविवार, 12 सितंबर 2010
अंध विश्वाश और उसका प्रचार
एस. आर. भारती
शनिवार, 11 सितंबर 2010
नशे में डूबा युवा वर्ग...
भारतीय समाज हमेशा से ही पूरे विश्व के लिए एक आदर्श और कौतुहल रहा है !सयुइंक्त परिवार में रहने वाले बच्चे बहुत ही संस्कारशील होते है !इसी करण हमारे युवा काफी समय तक कुरीतियों से दूर रहे और अपने आप को नशे से बचाए रखा....परन्तु अब ऐसा नही रहा!सयुंक्त परिवार टूटने लगे है..बच्चे पढने और करियर बनाने बड़े शहरों में जाने लगे है !इन महानगरों में वे अपना सामजस्य नही बना सके,यहाँ की व्यस्त जीवन शैली ने उन्हें तोड़ के रख दिया!
ऐसे में वे विभिन्न प्रकार के नशों के जाल में उलझ कर रह गए !अनुभव की कमी और पहले के कड़े अनुशासन में रहे ये युवा अब अचानक आज़ाद हो गए!शहर की एकल जीवन शैली ने भी इन्हें बढ़ावा दिया जिसके चलते ये नशे की गिरफ्त में फंसते चले गए !अपने व्यस्त कार्यालय समय के बाद वे नशे को ही आराम समझने लगे !आज का युवा परम्परागत नशे नही करता...क्यूंकि शराब बीयर आदि की महक इनकी पोल खोल देती है,इसलिए इन्होने नए नशे तलाश लिए जो आसानी से उपलब्ध है और जिनके सेवन का किसी को पता भी नही चलता....जैसे-आयोडेक्स ,विक्स वेपोरब,व्हाइटनर,दीवारों के पेंट और कफ सिरप! ये नशे हर जगह और कम कीमत में मिल जाते है !इसके बाद नंबर आता है दुकानों पर मिलने वाली विभिन्न टेबलेट्स जो कई नामों से बेचीं जाती है !ये गोलियां बिना डाक्टर की पर्ची के सब जगह मिल जाती है !केमिस्ट भी कभी तनाव दूर करने तो कभी एकाग्रता बढ़ने के नाम पर इन्हें बेचते है !मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले अधिकांश बच्चे इन्हें इस्तेमाल करते है !
इन छोटे मोटे नशों को करते करते ये नशे की उस अंधी दुनिया में पहुँच जाते है जहाँ से वापिस आना नामुमकिन है !शहर वसे दूर फार्म हॉउस में होने वाली रेव और कोकटेल पार्टियाँ इनकी मनपसंद जगह बन जाती है !शौक शौक में शुरू हुआ ये खेल अब इनकी आदत बन जाता है !नशे का बढ़ता प्रभाव आखिर एक दिन जान लेकर छोड़ता है !
इन सब से बचने का एकमात्र रास्ता है बच्चों को शुरू से ही नशे के दुष्प्रभाव बताये जाएँ ,टी वी पर नशे से सम्बंधित दृश्य और विज्ञापन प्रतिबंधित किये जाएँ !लगभग सभी शराब कम्पनियां सोडे के नाम पर शराब बेचती है !स्कूलों और कालेज में नशों की जानकारी के बारे में शिक्षा दी जाए तथा जरूरत पड़ने पर नशा मुक्ति केंद्र की भी व्यवस्था हो.......वरना युवाओं को नशे से बचाना मुश्किल हो जायेगा.....!
सोमवार, 6 सितंबर 2010
संपादक की ओर से
सब जन कहत कागज की लेखी । हम हैँ कहत आँखिन की देखी - महान संत कवि कबीर दास का यह कथन हमारा आदर्श है ।इस साइट को प्रारम्भ करने का उद्देश्य साहित्य . संस्कृति . कला . विज्ञान और अन्यान्य विधाओं के साम्प्रतिक रूप से पाठकों को अवगत कराना ही नही अपितु उनकी साझेदारी भी सुनिश्चित कराना है ।इन्कलाब एक खुला मंच है . इसमे प्रत्येक विधा और क्षेत्र के रचनाधर्मियों एवं समीक्षकों के लेखकीय सहयोग का स्वागत है । यह हमारा . आपका , सबका मंच है - जो जहाँ . जैसा . जिस तरह है . प्रस्तुत करने के लिए . और अच्छा बनाने के लिए ।
ईश्वर कहाँ मिलेगा... (कविता : एस. आर. भारती)
मन्दिर, मस्जिद ,गुरूद्वारे एवं गिरजाघर में
"ईश्वर"को खोजते हुए,
मन्नतों के लिए दर-दर भटकते हुए
वे जानते हैं कि "ईश्वर" वहाँ नहीं मिलेगा
’फिर व्यर्थ क्यों खोजते हैं तुष्टि के लिए’
एक यक्ष प्रश्न ने सिर उठाया
फिर ”ईश्वर“ कहाँ मिलेगा ’
सोचते-सोचते चिन्तन आगोश में खो गया
अचानक अन्र्तमन के पट पर
चलचित्र की तरह कुछ पात्र उभरे
मन ने माना कि ये ही ”ईश्वर“ के रूप हैं
किसान ,माँ ,डाक्टर ,
गिरते को उठाने वाला ,
मरते को बचाने वाला ,
सबकी प्यास बुझाने वाला ,
सबकी भूख मिटाने वाला ,
भटके को राह दिखाने वाला ,
बिछडे़ को मिलवाने वाला ,
गुणगान योग्य है ऐसा गुणवान
यही सुपात्र की नजर में ”भगवान“ है ।
रविवार, 5 सितंबर 2010
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
गाँधी जी पर आधारित हिन्दी फिल्म का शुभारम्भ पोर्टब्लेयर में
निर्देशक नरेश चंद्र लाल ने बताया कि सेलुलर जेल के बाद महाराष्ट्र के वर्धा स्थित गाँधी आश्रम सेवा ग्राम में भी इस फिल्म की शूटिंग होगी और यह फिल्म दिसम्बर, 2010 में रिलीज होगी।
नरेश चन्द्र लाल, निदेशक - अंडमान पीपुल थिएटर एसोसिएशन, पोर्टब्लेयर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
बुधवार, 1 सितंबर 2010
अब टचस्क्रीन 3डी टीवी ...
मंगलवार, 24 अगस्त 2010
रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें

रक्षाबंधन पर्व बहन की, समाज की, राष्ट्र की रक्षा हेतु बंधन से जुड़ने का प्रतीक त्यौहार है. यह धार्मिक स्वाध्याय के प्रचार का, विद्या विस्तार का पर्व भी है इस दिन यज्ञोपवीत बदला जाता है और द्विजत्व को धारण किया जाता है, वेद मंत्रों से मंत्रित किया जाता है. नारी जाति पर कोई कष्ट न आए, इसके लिये संकल्पित होने, संस्कृति की शालीनता को बचाए रखने हेतु संकल्पबद्ध होने का भी यह अनूठा पर्व है. इस पर्व को इसकी मूल भावना के साथ मनाएं... !! रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें !!
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
सेलुलर जेल भी पहुँची क्वींस बैटन रिले
19 अगस्त 2010 को राष्ट्रमंडल खेलों की क्वींस बैटन रिले भारत के दक्षिणतम क्षोर अण्डमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में भी चेन्नई से पहुंची, जहाँ सवेरे 7.45 बजे पोर्टब्लेयर हवाई अड्डे पर बैटन रिले का भव्य स्वागत किया गया. रिले औपचारिक रूप से शाम को 3 बजे ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल परिसर से आरंभ हुई, जहाँ उपराज्यपाल (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) भूपेंद्र सिंह द्वारा इसका शुभारम्भ किया गया. सेलुलर जेल में बैटन का आगमन एक तरह से उन तमाम क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि भी थी, जिन्होंने इन्हीं चहारदीवारियों में रहकर आजाद भारत और उसकी तरक्की का सपना देखा था. अंडमान-निकोबार ओलम्पिक असोसिअशन के अध्यक्ष जी. भास्कर ने राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अतिरिक्त महानिदेशक (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) राज कड़ियान से क्वींस बैटन को प्राप्त कर इसे उपराज्यपाल को सौंपा और इसी के साथ विश्व-प्रसिद्ध ऐतिहासिक सेलुलर जेल और यहाँ एकत्र तमाम सैन्य व सिविल अधिकारी, खिलाडी और गणमान्य नागरिक इस पल के जीवंत गवाह बने. उपराज्यपाल ने प्रतीकात्मक रूप से कुछ देर दौड़ लगाकर इसे प्रथम धावक के रूप में मुख्य सचिव विवेक रे को सौंपा और फिर तो बढ़ते क़दमों के साथ कड़ियाँ जुडती ही गईं. वाकई इसे नजदीक से देखना एक सुखद अनुभव था. राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल से शुरू होकर क्वींस बैटन रिले पोर्टब्लेयर के विभिन्न प्रमुख भागों - घंटाघर, माडल स्कूल, बंगाली क्लब, गोलघर, दिलानिपुर, फिनिक्स बे, लाइट हाउस सिनेमा, गाँधी प्रतिमा, अबरदीन बाजार, घंटाघर से होते हुए ऐतिहासिक नेताजी स्टेडियम पहुँचकर सम्पन्न हुई, जहाँ सांसद श्री विष्णुपद राय ने क्वींस बैटन को प्राप्त कर सक्षम अधिकारियों को सौंपा. इस शानदार अवसर पर बैटन रिले को यादगार बनाने के लिए जहाँ प्रमुख स्थलों पर तोरण द्वार स्थापित किये गए, वहीँ पोर्टब्लेयर के डा0 बी. आर. अम्बेडकर सभागार में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया . यही नहीं अबर्दीन जेटी और रास द्वीपों के बीच जहाजों को रोशनियों से सजाया भी गया और पूरा पोर्टब्लेयर मानो रंगायमान हो उठा. रिले के दौरान भारी संख्या में स्कूली विद्यार्थी और नागरिक जन इसका स्वागत करते दिखे. रिले के दौरान द्वीपों के राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त खिलाड़ियों और अधिकारीयों के अलावा करीब 30 लोग बैटन धारक के रूप में इसे लेकर आगे बढ़ते रहे. पोर्टब्लेयर में क्वींस बैटन रिले का आगमन भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाता है, क्योंकि यहाँ देश के प्राय: सभी प्रान्तों के लोग बसे हुए हैं और इसका लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया. इसे नजदीक से देखना वाकई एक यादगार अनुभव रहा. क्वींस बैटन रिले के इस परिभ्रमण के साथ ही द्वीपवासियों और देशवासियों की शुभकामनायें भी इससे जुडती जा रही हैं और आशा की जानी चाहिए की 3 अक्तूबर, 2010 से दिल्ली में आरंभ होने वाले कामनवेल्थ गेम्स भी ऐतिहासिक होंगें और विश्व-पटल पर भारत को एक नई पहचान देंगें !!
मंगलवार, 10 अगस्त 2010
कृष्ण कुमार यादव जी को जन्मदिन पर हार्दिक बधाई
कृष्ण कुमार यादव सर को उनके जन्मदिन 10 अगस्त पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें. आप एक अच्छे प्रशासक और साहित्यकार के साथ-साथ अच्छे व्यक्ति भी हैं, आपका सान्निध्य हम सब को प्राप्त है. आपके सान्निध्य में हम लोगों को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ है. आपके जन्मदिन पर आपके सुखी, समृद्ध एवं यशस्वी जीवन की कामना करते हैं. 
रविवार, 1 अगस्त 2010
शनिवार, 31 जुलाई 2010
अग्नि मान
नारी जीवन को कबतक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे
पुरुष और लड़कियों की मानसिकता में बहुत अंतर होता है ! पुरुष अपनी भड़ास को औरतो पर चिल्ला कर निकाल लेता है! क्योंकि उसका काम है औरत के विचारो को दबाना ! पर एक लड़की अपनी सारी भड़ास अपने अन्तःकरण में समा लेती है, और अग्नि की तरह जलती रहती है ! हो सकता है सारे लोग इस विचार से इतफ़ाक रखते हो। पर यदि यह मत गलत होता तो आज के परिवेश में महिला आत्महत्या दर निरन्तर नहीं बढ़ता। आंकड़ों का सत्य कहता है महिला आत्महत्या दर पुरषों की अपेक्षा 10 गुना अधिक है ! यदि आंकड़ों पर द्रष्टि डालें तो देखेंगे की बहार काम करने वाली लड़कियां जो आत्मनिर्भर हैं तथा समाज में उनका अपना मुकाम है और वो अपने जीवन के सारे फैसले स्वयं ले सकती हैं! इसके बावजूद भी उन महिलाओं की आत्महत्या दर अधिक है चाहे वो आम लड़की हो या सेलेब्रिटी जब उन्हें प्यार में धोखा मिलता है तो वो धोखे का आघात बर्दाश्त नही कर पाती है ! तब वे अपने जीवन को समाप्त करना ही एक आसान रास्ता मानती है ! अभी हाल ही में प्रसिद्ध माडॅल विवेका बाबा ने आत्महत्या कर ली , कारण अपने प्रेमी का धोखा और तिरस्कार बर्दाश्त नही कर सकी तो उन्होंने आत्महत्या कर ली वाही मिसइण्डिया रही नफीसा जोसेफ ने भी अपने प्रेमी से धोखा खाकर कुछ समय पूर्व आत्महत्या कर ली थी। ऐसे ही यदि आंकड़ों पे दृष्टि डालें तो देखेंगे की रोजाना कोई न कोई लड़की प्रेम में आघात पाकर अपनी जीवन लीला समाप्त करती जा रही है ! मनोविज्ञानिको का मत्त है ‘आज के परिवेश में जहाँ लोगों को अपने जीवन निर्वहन के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ रहा है घर और बाहर अत्यंत मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है वही प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनीय होता है और उनके लिए जीवन समाप्त करना एक आसान उपाय लोगों को दिखता है ’ चाहे कोई औरत पूरी तरह स्वतंत्र या आत्मनिर्भर क्यों न हो प्यार का धोखा उसके लिए असहनीय होता है क्योकि स्त्रियों में संवेदनशीलता एवेम भावुकता अधिक होती है। पुरुषमानसिकता स्त्रियों की मानसिकता से बिलकुल विपरीत होती है! पुरुष का आकर्षण स्त्रियों के शारीरिक सौन्दर्य पर केन्द्रति होता है ! उसका प्रेम शरीर से शुरू होकर उसी शरीर पे समाप्त हो जाता है और वो आसानी से एक को छोड़ कर दूसरे से जुड़ जाता है! उसके लिए प्रेम प्यार की बातें आम होती हैृ! परन्तु एक लड़की किसी भी पुरुष से आत्मा तथा मन से जुडती है और जब उसे आत्मिक आघात होता है , तो वो अघात उसके लिए असहनीय होता है और तब उसके सामने सबसे आसान विकल्प बचता है अपनी जीवन लीला को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर दें ! स्त्री मानसिकता मतलब समय से पहले अपने आप को उम्र से बड़ा मान लेना ! इसका बड़ा कारण ईश्वरी बेइंसाफी भी है ! एक पुरुष 60 वर्ष की आयु में भी पिता बन सकता है पर एक स्त्री का 3५ से 3७ वर्ष की आयु के बाद उसका माँ बनना कठिन होता है! और आज जहाँ लोग अपना कैरियर बनाने के लिए 30 का आंकड़ा पार कर जाते हैं तो उस उम्र में प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनिय हो जाता ह। और उनका सारा आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है! तब या तो अपनी पूरी उर्जा को इन्साफ की गुहार के लिए लगा देती हैं! तब उन पर दूसरा आघात उनके चरित्र पर होता है जो उनकी आत्मा पर असहनीय प्रहार होता है! क्या किसी ने सोचा है कभी भी महिला हो या लड़की उनमे संवीदनशीलता होती है! क्या वो ऐसे ही मरती जाएँगी ? उन्हें भी जीने का हक्क है ! इन नपुंसक व का-पुरुषों को किसने हक्क दिया है रोज रोज लड़कियों एवम महिलाओं को ऐसे ही मारते जा रहे हैं!
उन्हें किसने हक दिया है कि झूठे प्रेम जाल में फंसाओ और जब सच सामने आता है तो वो इंसान भाग खड़ा हो ता है और जब उसका सच समाज के लोगों और उसके परिजनो व प्रियजनो को बताया जाए तो वे नारी चरित्र पर प्रहार करते है जान से मारने की भी धमकी देते है ! तब लड़की के पास दो रास्ते होते हैं या तो अपने सम्मान के लिए लड़ाई लड़े और अपने चरित्र पर प्रहार करने वाले को सबके सामने लज्जित करे और अपने स्वाभिमान की रक्षा करे। पर मै जानती हूँ की कोई भी लड़की किसी भी परुष का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती और वो जिस भी पुरुष से अपने इन्साफ की गुहार करेगी वो उसे इन्साफ नहीं दिला सकते क्यूंकि वो भी स्वयं पुरुष है तब लड़की मजबूर हो जाती है क्यूंकि उसका एक कदम उसके माता पिता के नाम पर सवालिया निशाँ लगा देता हैै। उसके लिए तीसरा रास्ता बचता है अपने आपको अनंत अँधेरे में झोंक दे जिसमे वो तिल तिल मरती है पर उसको मरता हुआ कोई नही देख पाता आज मेरा प्रश्न ईश्वर और समाज से है ऐसे नपुंसक पुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे और नारी को कब तक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे।
बुधवार, 21 जुलाई 2010
'बाल-दुनिया' हेतु रचनाएँ आमंत्रित
बचपन भला किसे नहीं भाता. हम कितने भी बड़े हो जाएँ, पर बचपन की यादें कभी नहीं भूलतीं. हमारे अंतर्मन में एक बच्चा सदैव जीवंत रहता है, जरुरत बस उसे खोजने की है. कई बार जब हम उदासी के दरमियाँ होते हैं, तो अचानक बचपन से जुडी कोई याद हमें गुदगुदा जाती है. आजकल के बच्चे भी तो काफी फास्ट हो गए हैं. ब्लॉग जगत में उनके बनाये चित्र दिखने लगे हैं तो उनकी प्यारी-प्यारी अभिव्यक्तियाँ भी रंग बिखेरनी लगी हैं. 'बाल-दुनिया' में बच्चों की बातें होंगी, बच्चों के बनाये चित्र और रचनाएँ होंगीं, उनके ब्लॉगों की बातें होगीं, बाल-मन को सहेजती बड़ों की रचनाएँ होंगीं और भी बहुत कुछ....पर यह सब हम अकेले नहीं कर सकते, इसलिए हमें आप सभी के सहयोग की भी जरुरत पड़ेगी। 'बाल-दुनिया' हेतु बच्चों से जुडी रचनाएँ, चित्र और बच्चों के बारे में जानकारियां आमंत्रित हैं. आशा है आप सभी का सहयोग हमें मिलेगा.आप इसे hindi.literature@yahoo.com पर भेज सकते हैं. सोमवार, 12 जुलाई 2010
ज्ञान की जर्जर काया
मनु मंजू शुक्ल
।agnijivan.blog.com/">http://www।agnijivan.blog.com/
कल ’शाम की बात है। मै अपनेआप से बात कर रही थी। और जीवन के हजारों तानेबाने बुन रही थी कि अचानक एक कोलाहल सा सुनाई पडा। पकडो-पकडो मारो-मारो का ’शोर सुनकर मै दौडकर दरवाजे पर आ गई। देखा तो स्तम्भ सी देखती ही रह गई। एक जर्जर काया छीड शरीर मानो मृतशरीरढॉचा सा, ना हड्रडी ना रक्त संचार बस नेत्र खुले ले दयनीयभाव, थी आशा दया की नेत्रों मे, मन रो उठा देख यह मायाजाल। आयी दया घर ले आयी।
मैंने पूछा ,“ अय सात्यआत्मा हो कौन क्यों विवश हो धराशाई सी भटक रही हो राहों मे। किसे खोज रही इस भ्रमित समाज के पगचिन्हों में। है कैसी मृगतृष्णा?”
पूछा तो जान पडा, यह है एक सत्य की परछाई, यह तो है, “ ज्ञान की जर्जर काया” लिए अस्थी कंकाल दरदर खोज रहा सत्य’िाक्षा का द्वार।
वो बोली द्र्रवित भाव से , “हे प्राणमित्र कहने को है मंजूसंसार, पर सच पूछो तो अब बन गया भोग का द्वार। हर कोई है ’शिक्षित, पर मूढ अभिमानी ना दया, ना ज्ञान, ना नेत्रों मे लाज, लालच कर रही है हर घर-घर में वास। ममता तो है बस तमस द्वार। ना लाज है श्रंगार में ना दया है अत्मसम्मान पर। है रुधिर का रंग अब नही लाल। कहने को सब है ज्ञानी पर है सच पूर्ण भ्रमित अभिमान। नही स्वंय को स्वंय का ज्ञान। मै तो बस खोजू एक सत्यद्वार। जो सच पूछो वो है एक अतिश्रुक्ति, ना कोई है भाव प्रधान, ना किसी में स्वाभिमान।
इतना कहकर वो ज्ञानछाया खो गयी कोहरे की घुपत राहों में। नेत्रपटल खुले मेरे खोजते रहे उसे अंध राहों को। शायद वो रुक जाती शायद पलठ कर फिर आती शायद वो कुछ और कह पाती पर सच पूछो तो है यह सपना। यहॉ ज्ञानी दर-दर फिर रहे अज्ञानी का होता सतकार । ये जीवन की है सच्ची विडम्बन ना कोई अतिसुक्ति पा कोई अभिप्रेणा।
मेरे भाव
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
गणतंत्र दिवस पर बहादुरी पुरस्कार के लिए बच्चों से आवेदन आमंत्रित
भारतीय बाल कल्याण परिषद द्वारा हर वर्ष बच्चों को उनकी बहादुरी के अनुकरणीय कार्यों के लिए पुरस्कार प्रदान किया जाता है। ये पुरस्कार भारत के प्रधानमंत्री द्वारा गणतंत्र दिवस से ठीक पहले भेंट किया जाता है। पुरस्कार प्राप्त बच्चे राजधानी दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में भी हिस्सा लेते हैं।उम्मीदवारों के चयन के लिए मुख्य मानदंडों में जीवन के खतरों से मुकाबला करते हुए घायल होना, सामाजिक बुराई अथवा अपराध के खिलाफ बहादुरी तथा साहसिकता, बाल्यकाल में जोखिमपूर्ण कार्य आदि को ध्यान में रखा जाएगा। आवेदन की सिफारिश से पहले प्रत्येक मामले की मौके पर जाँच अनिवार्य होगी। प्रत्येक आवेदन के साथ मामले की जांच रिपोर्ट भी होनी चाहिए। सभी संबंधों में पूर्ण सिफारिश के साथ आवेदन 30 सितम्बर, 2010 तक भारतीय बाल कल्याण परिषद, 4 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली- 110002 पर पहँचना अनिवार्य है।
गुरुवार, 1 जुलाई 2010
ये पहेली सुलझाइए

शुक्रवार, 18 जून 2010
छेड़ो तराने...
सूने दिवस थे, सूने रैना,
सूने उर में गहन वेदना,
सूने पल थे सुने नैना,
सूने गात में सुप्त चेतना।
अभिलाषाओं ने करवट ली,
करुणा से पलकें गीलीं ।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...
सुप्त भाव थे, सुप्त विराग,
मरु जीवन में सुप्त अनुराग,
तमस विषाद, वंचित रस राग,
नीरव व्यथा, था कैसा अभाग ?
दिग दिगंत आह्लाद निनाद,
दिव्य ज्योति हलचल प्रमाद ।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...
मौन क्रंद था, मौन संताप,
मौन पमोद, राग आलाप,
मौन दग्ध दुख मौन प्रलाप,
अंतस्तल में मौन ही व्याप ।
आशा रंजित मंगल संसृति,
हर्षित हृदय, झलक नवज्योति।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...
तिमिर टूटा, निद्रा पर्यंत,
सकल वेदना का कर अंत,
पुलकित भाव घनघोर अनंत,
उन्मादित थिरकते पांव बसंत।
स्मृतियां विस्मृत, सजल नयन,
अभिनव परिवर्तन झंकृत जीवन।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...
कवि कुलवंत सिंह




