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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

राम शिव मूर्ति यादव को 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा द्वारा 'हिंदी भाषा-भूषण' की मानद उपाधि


देश-विदेश में प्रतिष्ठित साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संस्था 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा ( राजस्थान) ने प्रखर लेखक श्री राम शिव मूर्ति यादव को उनकी हिंदी सेवा के लिए हिंदी दिवस (14 सितम्बर, 2012 ) पर आयोजित दो दिवसीय सम्मलेन में "हिंदी भाषा-भूषण" की मानद उपाधि से अलंकृत किया | हिंदी के विकास को समर्पित इस सम्मलेन में देश-विदेश के तमाम साहित्यकारों और लेखकों ने भाग लिया | गौरतलब है कि 'साहित्य-मंडल', श्रीनाथद्वारा की स्थापना आजादी से पूर्व वर्ष 1937 में हुई थी और तभी से यह प्रतिष्ठित संस्था हिंदी को समृद्ध करने और हिंदी-सेवियों को उनके योगदान के आधार पर सम्मानित कर अपनी गौरव-गाथा में वृद्धि कर रही है. इस वर्ष श्री राम शिव मूर्ति यादव को उनकी विशिष्ट हिंदी सेवा के लिए साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा के अध्यक्ष श्री नरहरि ठाकर एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग व साहित्य-मण्डल, श्रीनाथद्वारा के सभापति श्री भगवती प्रसाद देवपुरा ने सारस्वत सम्मान करते हुए उपाधि-पत्र, भगवान श्रीनाथ जी की भव्य स्वर्ण जल से हस्तनिर्मित सुशोभित चित्र एवं अन्य मानद वस्तुएं भेंट किया। इस अवसर पर आयोजित सम्मलेन में विचार गोष्ठी,सम्मान समारोह व साहित्यकारों द्वारा बैंड बाजों के साथ नगर भ्रमण द्वारा हिंदी का प्रचार -प्रसार व जागरूकता का आयोजन भी किया गया |

उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात तहबरपुर-आजमगढ़ जनपद निवासी श्री राम शिव मूर्ति यादव एक लम्बे समय से तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक विषयों पर प्रखरता से लेखन कर रहे हैं। श्री यादव की सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षणनाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। आपके तमाम लेख विभिन्न स्तरीय संकलनों में भी प्रकाशित हैं। इसके अलावा आपके लेख इंटरनेट पर भी तमाम चर्चित वेब/ई/ऑनलाइन पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाग्स पर पढ़े-देखे जा सकते हैं। यदुवंशियों पर आधारित प्रथम हिंदी ब्लॉग यदुकुल” (http://www.yadukul.blogspot.in/) का भी आप द्वारा 10 नवम्बर 2008 से सतत संचालन किया जा रहा है। दुनिया भर के लगभग 65 देशों में पढ़े जाने वाले इस ब्लॉग को 293 से ज्यादा लोग नियमित रूप से अनुसरण करते हैं, वहीँ इस ब्लॉग पर अब तक 315 से ज्यादा पोस्ट प्रकाशित हो चुकी हैं। इस ब्लॉग की लोकप्रियता का अंदाजा इसे से लगाया जा सकता है कि आज इस ब्लॉग को करीब 65,000 से ज्यादा लोग पढ़ चुके हैं।

इससे पूर्व श्री राम शिव मूर्ति यादव जी को भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन एवं समाज सेवा के लिए 'ज्योतिबाफुले फेलोशिप सम्मान' (2007), 'डा. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान' (2011), अम्बेडकरवादी साहित्य को प्रोत्साहित करने एवं तत्संबंधी लेखन हेतु रिपब्लिकन पार्टी के अध्यक्ष श्री रामदास आठवले द्वारा अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011', राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद द्वारा विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु भारती ज्योतिसम्मान, आसरा समिति, मथुरा द्वारा बृज गौरव‘, म.प्र. की प्रतिष्ठित संस्था समग्रताशिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी द्वारा 'भारत-भूषण' (2010) की मानद उपाधि से अलंकृत किया जा चूका है। श्री राम शिव मूर्ति यादव को उनके सृजनात्मक एवं मंगलमयी जीवन के लिए अनंत शुभकामनाएं।

-प्रस्तुति : श्री गोवर्धन यादव, संयोजक-राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, छिंदवाडा, मध्य प्रदेश.


 

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

लत

लत अबे रुक कहाँ जा रहा है चल निकल पैसा ठीक अभी चलना है कहते एक ने दूसरे का गला पकड़ लिया था दूसरा बड़े ही कातर स्वर में रिरिया रहा था झगड़े के मध्य हो रही बातचीत से पता चला एक का नाम था धन्नू दूसरे का शीतला काल रात धन्नू ने शीतला के साथ शीतला के पैसे से भदैनी के देशी ठीके पर छक कर दारू पिया था जीवन का असीम आनंद लिया था आज सबेरे ही पुनः शीतला से धन्नू का अमन सामना हो गया था मै भी अपनी लम्बी वाक से वापस आ रहा था धन्नू बिलबिला रहा था भैया पैसा नहीं हौ रहेन देब कौनो और दिन तोहके पिया देब ई जेब में तो पैसा दिख रहा है साले हमको बेवकूफ बना रहा है चल चल कहते शीतला ने अपने मजबूत हाथो से जबरन धन्नू के हाथों को रख दिया ऐठ कर दम लेकर ही माना पूरा पैसा निकाल कर शीताला भैया ई माई के इन्हालेर क पैसा हौ काल रतिए से माई का साँस बड़ी तेज फूलत हौ आपण त काल कामे न लागल एही वदे काल तोहर पीयल चच्चा से उधार लैके दवाई वदे जात हई भैया दै द पइसवा माई जोहत होई चलबे क़ी नाही साले बेवकूफ बनावत हौवे नाही त हम जात हई अकेल्वे पिये कहते शीतला उसके पैसे को लिए अकेले ही ठीके क़ी ओर निकल गया बलिष्ठ शीतला के मुकाबले कमजोर धन्नू बेदम और हताश घर क़ी ओर चल पड़ा घर में कदम रखते ही माँ क़ी आवाज उसके कानो में पड़ी बगल में उसकी अन्व्याहता बहन माँ को थामे थी खड़ी आ गईला बचवा जल्दी से इन्हेलरवा खोला दम घुटत आ हमारे मुंहवा में लगावा धन्नू संज्ञाशून्य अपने खाली हाथो के साथ माँ को निहार रहा था माँ क़ी आशा से भरी निगाहों में उसके खाली हाथो को देख आयी हताशा को पहचान रहा था माँ क़ी बेचैनी के साथ क्रमशः उखड़ती साँस को किंकर्तव्य विमूढ़ असहाय देख रहा था मन ही मन एक दृढसंकल्प के साथ पश्चाताप के औसुओं से स्वयं को कोस और भिगो रहा था डा-रमेश कुमार निर्मेश

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

सम्मान डा- रमेश कुमार निर्मेश को उनके कार्यालयी हिंदी में योगदान के लिए केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय के कुलपति पद्मश्री प्रो-गेशे नेवांग सामातें द्वारा कुलसचिव कशी हिंदी विश्वविद्यालय क़ी उपस्थिति में सम्मानित किया गया

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

गंगा



गंगा का निर्जीव शरीर

सफ़ेद कफ़न में लपेटा जा रहा था

मै भी उसकी शवयात्रा में

जाने के निमित्त वहां पहुच चुका था

उसकी पत्नी बच्चों के साथ

दहाड़ मार कर रो रही थी

लोगो के बीच में तरह तरह क़ी

बाते हो रही थी



एक कह रहा था

बेचारा रात भर तो रिक्शा चलाता

दिनभर ऊ सहबवा के बंगला में

सरकारी नौकरी के लालच में खटता

आखिर एक गरीब का

शरीर कितना सहता

यही से एका ई हाल भवा

और हार्टफेल होई गवा



मौन मेरे जेहन में

सप्ताह पूर्व क़ी बाते

एकाएक पुनः ताजी हो गयी थी

मेरे अशांत मन को

एकदम मंथित कर रही थी

जब भीषण गर्मी और उमस में

नंगे बदन गंगा

एक मैला गमछा लपेटे था

अपने साहब के बगीचे में

तेजी से फावड़ा चलाये जा रहा था

जबकि बंगले के अन्दर

ए सी धुआंधार चल रहा था

यह देख में हैरान था

क़ी अभी कल ही तो वह

तीव्र बुखार के साथ

मेरे पास दावा के लिए आया था

फिर आज इस भीषण तपिश में

क्यों इस तरह कार्यरत था

मेरे पूछने पर उसने बताया कि

भैया साहेब कहिन है कि

प्याज के रोपाई का समय

निकला जा रहा

गंगा जल्दी से खेतवा तैयार कर

बेहन का जुगाड़ करा



बेहन भी जुगाड़ करने के

उसके साहेब के फैसले पर

पता नहीं क्यों और क्या

में सोच रहा था

अंत में निरुत्तर

आगे बढ़ गया था



पिछले आठ सालों से

उस साहेब के सरकारी

नौकरी के आश्वासन पर

गंगा दिन भर अपने

उस तथाकथित साहेब के

बंगले पर खटता रहा

अपने परिवार के भरण पोषण के लिए

रात में रिक्शा चलाता रहा

अपनी संभावनाओं से

भरी जवानी को

सुखद बुढ़ापे कि चाह में

तबियत से खोता रहा



क्रमशः अधेड़ हो रहे

उस मुर्ख को शायद अपनी

मूल्यवान जवानी कि कीमत का

अहसास नहीं था

कल यदि बुढ़ापे में

माना कुछ पा ही लिया तो

क्या उसके जवानी के दिन

वापस आ जायेंगे

यह भी सोचा नहीं था



अक्सर तबियत

उन्नीस बीस होने पर

मेरे घर के बाहर

मेरे आने कि प्रतीक्षा करता

आने पर मेरा उससे

हाल चाल होता

हर बार मुख्य बीमारी के दवा के साथ

ताकत के गोलियों क़ी

उसकी मांग होती

मेरे पैसा न लेने के कारण

मेरे लिए खटने क़ी

उसकी चाह हमेशा होती

जो कभी पूरी नहीं होती



जब कभी बाहर उससे

उसके रिक्शे के साथ

मेरी मुलाकात होती

भैया आवा कहाँ चली

बस यही उसकी

आवाज होती



एकदिन आखिर मैंने

उससे पूछ ही लिया था

गंगा आखिर कब तलक

वांछित नौकरी के लिए

इस तरह जीवन से

जद्दोजहद जारी रहेगी

सुखमय भविष्य के लिए

आशाओं और संभावनाओं से भरी

वर्तमान पीड़ित और

अपमानित होती रहेगी



बोला भैया

आप ही के बताये

कर्मन्येवा अधिकारेस्तु

मन फलेषु कदचिना के

रास्ते पर ही तो चल रहा था

निरुत्तर आज में

उसके गीता श्लोक क़ी

उक्त भौतिक व्याख्या का

एक ओर जहाँ दुखद परिणाम

देख रहा था

वही दूसरी ओर

उसके साथ अपने आप पर भी

खीज रहा था



डा. रमेश कुमार निर्मेश

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

आज का युधिष्ठर

आज का युधिष्ठर



घाट क़ी सीढियों पर

उदास बैठे राजू के सामने

सारा अतीत घूम रहा था

बापू क़ी मौत के बाद

या बापू के रहते हुए भी

मामा ने किस तरह

पूरे परिवार को संभाला था

उसके सभी बहनों का

विवाह करते करते

बापू तो चल बसे थे

राजू के लिए कुछ खास

नहीं छोड़ गए थे



दिन बीतते गए

राजू भी विवाह के योग्य हुआ

विवाह के पूर्व मामा ने

उसके टूटे फूटे घर को बनवाने का

फैसला लिया



सीमेंट लेन के लिए

हजार रूपये राजू को दिया

स्वयं ईट लेन के लिए

भत्ते का रुख किया

बीच में पुराने यारों ने हाथ पकड़

राजू को न चाहते हुए

फड पर बैठा लिया

महाभारत के युधिष्ठर के निति का

दुहाई दिया

उसकी लगभग छूट चुकी

जुए क़ी आदत ने भी जोर मारा

राजू फड पर बैठा

शीघ्र ही हार चुका था रुपया सारा

उसके पाव तले का जमीन खिसक गया था

जितने वाला रुपया लेकर

आगे चल दिया था

हताश राजू भी उसके

पीछे पीछे चल दिया था



बिना परिश्रम

अपने रुपये को बढ़ने के चाह ने

राजू को आज कितना

दीन और हीन बना दिया था

यहाँ तक क़ी उसे जुए क़ी फड तक

एक बार पुनः पंहुचा दिया था

कैसे करेगा वह देवता समान

अपने मामा का सामना

यह सोच वह एकदम से

घबरा गया था

मामा के विश्वास को

एक बार पुनः चोट पहुचाने का गम

उसे भीतर तक साल रहा था

सोच रहा था कि

किसी तरह यह पैसा इस बार

वापस आ गया कही

तो हे भगवन आपकी कसम

अब जुए कि ओर कभी

वह ताकेगा नहीं

चलते चलते आखिर मयखाने में

उससे मुलाकात हुई

राजी कि बाछें खिल गयी

राजू अपने पैसे कि वापसी कि उम्मेद्मे

उससे एक बार और खेलने कि

बार बार अपील कि

अबे खेल ले भैया खेल ले भैया

कि अनेक विनती कि

अंततः नशे में टुन्न होने पर

वह खेलने के लिए पुनः

तैयार हो गया था

शायद भाग्य को भी

राजू कि दशा पर तरस आ गया था

ईस बार

राजू के पत्ते पड़ने लगे थे

एक एक कर उसके रुपये

वापस आने लगे थे



पाँच सौ रूपये ऊपर से

और भी आ गे थे

धीरे धीरे लोग घर जाने लगे थे

उसमे से दो सौ राजू ने उसे और दिया

साथ ही वापस जाकर और

पीने का सलाह दिया

बाकी पैसे लेकर उसने स्वयं

बाजार का रुख किया



रास्ते में राजू

सोचता जा रहा था

कैसी मूर्खता और कैसी विडम्बना है कि

अपने पैसा जब अपने पास था

उसके वेलू और उसकी अस्मत का

उसे अहसास नहीं था

देखते ही देखते जब वह

दूसरे कि जेब में जाने लगा था

उसकी कीमत का

उसे भास हुआ था



जीता तो कई बार था वह

मगर इस जीत पर

आज का वह युधिष्ठर

बहुत ही इतरा रहा था

 
मूर्ख अपने ही पैसे क़ी वापसी पर

आज जश्न मना रहा था

सोच रहा था कि

कितनी मारकाट के बाद

महाभारत के युधिष्ठर का

सम्मान बचा रहा था

उसने तो अपने सम्मान को बस

चुटकियों में ही वापस

हासिल कर लिया था

तुलना करने पर वह अपने आप को

द्वापर के युधिष्ठर से श्रेष्ट पा रहा था

आज के बाद उसने फड पर

न बैठने कि कसम ली

हमेशा के लिए जुए को

जैरामजी की कही

बुधवार, 29 अगस्त 2012

निःशुल्क चिकित्सा शिविर

निःशुल्क चिकित्सा शिविर


बड़े हर्ष के साथ सूचित किया जा रहा है कि दिनांक- 09 सितंबर 2012, दिन- रविवार को अमर वीर इण्टर कालेज, धानापुर में अदनान वेलफेयर सोसाइटी के तत्वाधान में निःशुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया है।
चिकित्सा शिविर में अति विशिष्ट चिकित्सकों की टीम द्वारा मरीजों का निःशुल्क परीक्षण किया जाएगा। शिविर में जनरल फिजिशियन, अस्थि रोग, नेत्र रोग, स्त्री व प्रसूत रोग, बाल रोग एवं दंत व मुख कैंसर रोग विषेषज्ञ चिकित्सक मौजूद रहेंगे।
आप समस्त क्षेत्रवासयिों से अपील की जाती है कि भारी संख्या में पहुंच कर चिकित्सा शिविर का लाभ उठायें।

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें-
08896653900, 9807765879

सोमवार, 13 अगस्त 2012

सामान्य सी मांग

पापा पापा
पिछली बार आपने वो
बिजलीवाली रेलगाड़ी हमको
दिलाने को कहा था
कहते कहते सोनू पापा को
एक खिलौने क़ी दुकान पर
बड़ी आशा से लेकर
खड़ा हो गया था
में भी जमाष्ट्मी क़ी कुछ
खरीददारी हेतु
बाजार गया था

नहीं बेटा
यह बिजलीवाली रेलगाड़ी
बड़ी खतरनाक होती है
जरा सी चूक पर
जान खतरे में पड़ सकती है
तब पापा वो बैटरी वाली ही
दिला दो
बिरजू सामू और गुड्डू
सबके पास है वो
सब उसे चला कर इतराते है
दिखा दिखा कर
बहुर भाव खाते है
मेरे पास रेलगाड़ी न होने से
मेरा सब बहुत उपहास उड़ाते है

बेटा वो भी बेकार है
अभी देखे नहीं उस दिन टी वी में
दिखा रहा था
की बैटरी फटने से एक बालक
किस तरह मौत क़ी गोद में
समा गया था
अपने प्यारे सोनू को
कैसे जानबूझ कर
मौत में मुंह में धकेल सकता था
हाँ देखो प्लास्टिक की यह
रेलगाड़ी ले लो
प्लास्टिक से भी तो पापा
सब बताते है बहुत प्रदुषण फैलता है
नहीं पापा वह भी रहने दो

सोनू को एकाएक
घर से चलते समय
पापा की माँ से पैसे को लेकर
हो रही जिकजिक का
ध्यान आ गया था
पापा की विपन्न आर्थिक स्थिति ने
सोनू को अब और
मजबूत कर दिया था
पुनः स्थिति को सोनू ने ही सम्हाला
बाल सुलभ चंचलता से
रेलगाड़ी की बात को टाला
पापा छोडो व्यर्थ में पैसा
बर्बाद करने से क्या फायदा
तीन चार साल ही तो
और है बचपन के
कट जायेगा बाकायदा
सच पापा आप मुझे
कितना प्यार करते है
मेरी जान का आप
कितना ख्याल रखते है
औरो के पापा तो बस लगता है
प्यार का नाटक करते है

महेश इस अवांछित स्थिति से
कम्पित हो गया था
अपनी विपन्नता पर मन ही मन
स्वयं को कोस रहा था
उसे यह आभास हो चला था कि
सोनू भी उसकी माली हालत से
अब वाकिफ होकर
अपने अरमानो को तिलांजलि देकर
अपने बचपन को नकारते
उलट उसे ही सांत्वना दे रहा था

महेश अभी तक जहाँ
उसकी मांग को टालने में
आपने आप को सफल समझ रहा था
सोनू के विश्लेषण से
अब वह व्यथित हो रहा था
उसने विकल्प के रूप में
जितने भी प्रस्ताव
सोनू को सुझाया
सबका समुचित निकास
सोनू से पाया

मध्यवर्गीय परिवार का
मुखिया महेश
बच्चे कि इस अप्रत्याशित सोच पर
स्तब्ध हो गया था
जुलाई के महीने में वैसे ही
हाथ तंगी में हो रहा था
ऊपर से दिन पर दिन
बढ़ती मंहगाई ने
कमर तोड़ कर रख दिया था

नव धनाड्यों के बच्चों में
एक ओर जहाँ
मंहगे से मंहगे खिलौने के लिए
आपस में प्रतियोगिता चल रही थी
वही अपने बच्चे की एक
सामान्य सी मांग भी
पूरी न कर पाने की कसक
उसके सामने
अपराधबोध बन डटी थी

डा-रमेश कुमार निर्मेश Attachments may be unavailable. Learn more papa.jpg

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' चुने गए कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव


ब्लागिंग के क्षेत्र को निरंतर समृद्ध करने के मद्देनजर चर्चित साहित्यकार और ब्लागर कृष्ण कुमार यादव एवं आकांक्षा यादव को 'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' का सम्मान प्रदान किए जाने हेतु चयनित किया गया है। परिकल्पना समूह की तरफ से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले इस सम्मान के तहत हिंदी ब्लोगिंग में दशक के सर्वाधिक चर्चित पाँच ब्लागर और पाँच ब्लॉग के साथ-साथ दशक के श्रेष्ठ चर्चित ब्लोगर दंपत्ति के रूप में कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव का चयन किया गया है. मूलत: आजमगढ़ जनपद निवासी श्री यादव वर्तमान में इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं. गौरतलब है कि परिकल्पना के माध्यम से चर्चित ब्लागर रवीन्द्र प्रभात जहाँ तमाम ब्लॉगों का सम्यक विश्लेषण कर रहे हैं,वही पिछले वर्ष से ही उन्होंने वर्ष के श्रेष्ट ब्लागरों को सम्मानित भी करना आरंभ किया है. इसी कड़ी में इस बार 'दशक' की उपलब्धियों वाले ब्लागर भी सम्मानित किये जा रहे हैं, जो कि ब्लागिंग के क्षेत्र में एक नायब और अनूठा प्रयोग होया.

'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु चयनित कृष्ण कुमार यादव जहाँ 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं, वहीँ आकांक्षा यादव 'शब्द-शिखर' ब्लॉग के माध्यम से. इसके अलावा इस युगल-दंपत्ति द्वारा सप्तरंगी प्रेम, बाल-दुनिया और उत्सव के रंग ब्लॉगों का भी युगल सञ्चालन किया जाता है. उपरोक्त सम्मान की घोषणा करते हुए संयोजकों ने लिखा कि- ''कृष्ण कुमार यादव ने 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग के माध्यम से डाक विभाग की सुखद अनुभूतियों से पाठकों को रूबरू कराने का बीड़ा उठाया तो आकांक्षा यादव ने 'शब्द-शिखर' के माध्यम से साहित्य के विभिन्न आयामों से रूबरू कराने का। एक स्वर है तो दूसरी साधना। हिन्दी ब्लोगजगत में जूनून की हद तक सक्रिय इस ब्लॉगर दंपति ने हिंदी ब्लागिंग को कई नए आयाम दिए हैं.''

गौरतलब है कि यादव दम्पति की सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को पिछले साल हिंदी भवन, नई दिल्ली में 'श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर' सम्मान से सम्मानित किया गया था तो 14 नवम्बर, 2012 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में भारत सरकार द्वारा अक्षिता को आर्ट और ब्लागिंग के लिए 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' भी प्रदान किया गया. मात्र साढ़े चार साल की उम्र में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार प्राप्त कर अक्षिता ने जहाँ भारत की सबसे कम उम्र की बाल पुरस्कार विजेता होने का सौभाग्य प्राप्त किया, वहीँ पहली बार भारत सरकार द्वारा किसी ब्लागर को कोई राजकीय सम्मान दिया गया. फ़िलहाल अक्षिता गर्ल्स हाई स्कूल, इलाहाबाद में प्रेप में पढ़ती है. अक्षिता के ब्लॉग का नाम है- पाखी की दुनिया.


परिकल्पना दशक का ब्लॉगर सम्मान के तहत सम्मानित होने वाले ब्लागर हैं - पूर्णिमा वर्मन(शरजाह, यू ए ई), समीर लाल समीर(ओटरियों, कनाडा), रवि रतलामी (भोपाल, म.प्र.), रश्मि प्रभा (पुणे, महाराष्ट्र), एवं अविनाश वाचस्पति (नयी दिल्ली). इसके अलावा पञ्च चयनित श्रेष्ठ ब्लॉगों के संचालकों को भी सम्मानित किया जायेगा.(परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान-2012 की पूरी सूची हेतु क्लिक करें)


उपरोक्त सम्मान दिनांक 27 अगस्त 2012 को लखनऊ के क़ैसर बाग स्थित राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन मे प्रदान किया जायेगा. इस अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन तस्लीम व परिकल्पना समूह कर रहा है । इस समारोह में देश व विदेश के तमाम चर्चित ब्लॉगर जुटेंगे और नए मीडिया जैसे कि ब्लॉग, वेबसाईट, वेब पोर्टल,सोशल नेटवर्किंग साइट इत्यादि के सामाजिक सरोकार पर भी बात करेंगे ।
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(विभिन्न समाचार-पत्रों में कृष्ण कुमार यादव-आकांक्षा यादव को 'दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दंपति' हेतु चयनित किये जाने पर प्रमुखता से समाचार प्रकाशित हुए हैं, उनकी एक झलक)










































बुधवार, 18 जुलाई 2012

मेरी अमरनाथ यात्रा

अपने परमप्रिय
राजकुमारजी के अहवाहन पर
छोटू और रामजी के साथ
मै निकल पड़ा
बाबा अमरनाथ क़ी यात्रा पर
देखने आस्था का सैलाब
जहाँ भक्ति क़ी गंगा का
बह रहा था प्रवाह अविरल अबाध
कशी से जम्मू व पुनः
जम्मू से पहलगाम
जहाँ जमीं को छू रहा था
निर्मल साफ असमान
बर्फ क़ी श्वेत चादर लपेटे
प्रकृति कर रही थी मानो
हमारा अभिनन्दन
वर्ष बिन्दुओं को अंचल में भरे
बादलो के समूह कर रहे थे
हमारा स्वागतम

क़ानूनी औपचारिकताओं के
उपरांत  बाबा धाम तक क़ी
३६ किमी क़ी चढ़ाई
चंदंबदी से जब हुई प्रारंभ
चरो और गूँज रहा था
बाबा का जयघोष बम बम
हिल गया था तन का रोम रोम
देख पिस्सू टॉप क़ी चढ़ाई दुर्गम
पर वह ऋ आस्था क्या दृश्य था मनोरम
कही दीखता था व्यक्ति का विश्वास
तो कही जय भोले के उदघोष से
ही किसी का चल रहा था
स्वास प्रश्वास

अकस्मात हो गाये हम
स्तब्ध ऊपर से आती देख दो लाश
मगर भक्तो के अविचल समूह
करते बम बम भोले का जयघोष
आगे बढ़ रहा था अनिमेष
इस दुरूह चढ़ाई के बाद
एक स्वर्ग सा दृश्य दिखा मनोरम
पाता चला यही है शेषनाग स्वर्गाश्रम
विशालतम पर्वत श्रृखलाओं के मध्य
गहरे हरे रंग का सरोवर
दूर तक फैली शेषनाग
झील झर झर
लगा जैसे प्रकृति ने रख दी है
अपनी  सुन्दरता यहाँ निचोड़कर

भाव विभोर मन वह
कुछ पल ठहर जनि को व्यग्र
दिखा पर साथियों के साथ को मै
वचन वद्ध था
आगे शिविर में लेकर रात्रि विश्राम
दूसरे दिन पंचतरणी क़ी ओर
चल पड़ा बीच बीच में
करते हुए आराम

आगे बर्फ के विशालतम
ढलुआ ग्लेशियरों पर चलते हुए
पल पल मृत्यु से साक्षात्कार करते हुए
दृढ विश्वास और असीम
आस्था के वशीभूत
अधीर मन आगे बढ़ता रहा
आखिर पञ्चतरणी के जल से
आचामनित हो किया तन में
एक नयी उर्जा का अहसास लगा

सफल हो रहा था
हमारा ये प्रवास
बीच बीच में लंगर तमाम चल रहे थे
जो यात्रियों क़ी सेवा कर
अपने ही ढंग से पुण्य कमा रहे थे
हमने भी वह नाश्ता कर
एक चाय पिया
पञ्च तरणी से विदा लेकर
मुख्य बाबा धाम को चल दिया
दो दो फुट के गहरे
संकरे कंकरीले और पथरीले
ऊंची पहाड़ी रास्ते पर
रखते हुए डग
कट रहे थे एक एक पग
उसीमे एक ओर जहाँ
चल रही थी घुड़सवारों क़ी
दो दो लडिया
वही निर्बाध पैदल के साथ
चल रही थी तमाम पालकियां
एक ओर जहाँ पर्वतों क़ी
विशाल ऊंचाइया
दूसरी ओर मृत्य का अहवाहन
करती गहरी खाइयाँ

खैर किसी तरह बाबा बर्फानी का
करते हुए जयकारा
धाम में पहुँच गया
मेरा समूह सारा
धाम का विहंगम दृश्य देखकर
लगा इश्वर ने रख दी है
अपनी सर्वोत्तम कृतियाँ
यहाँ निचोड़कर

चारो ओर हिम्ग्लेशियर और
उसके मध्य हिमाच्छादित धाम
जहाँ हिम शिवलिंग के दर्शन हेतु
लगा हुआ था जाम
पूजन सामग्री और वक्ती टेंट से
पाता हुआ था धाम सारा
भीषण सर्दी को मात दे रही थी
बाबा का जयकारा
जैसे ही स्नान कर
दर्शन के निमित्त तैयार हुआ
एक अजीब शक्ति तन में
संचारित हुआ
लाइन में लगते ही हम पा गए
पवित्र चिरपरिचित कबूतरों के दर्शन
बाग बाग हो गया मन
प्रफुल्लित हो चला सारा तन
बाबा बर्फानी के दिव्य
दर्शन के उपरांत
क्रमशः शाम ढल रहा था
पर ८ बजे भी बाबा के दरबार में
सूर्य दर्शन दे रहा था
जब मौसम का मिजाज बिगड़ते देखा
हमने बाबा धाम में ही
रात्रि विश्राम का निर्णय लिया

साथ में लाये कुछ नाश्ते के बाद
सोने के निमित्त बर्फ पर ही बने
एक टेंट को हायर किया
दूसरी सुबह तैयार होकर
१४ किमी बालताल के
दुर्गमतम रास्ते से
बाबा को पुनः प्रणाम कर
विदा लिया

इस रास्ते क़ी भी
असंख्य कठिनाइयों और पीडाओं से
हमारा साक्षात्कार हुआ
पल पल पर मौत का
अहसास हुआ
मौत और जिन्दगी के इस
प्रायोजित खेल से सच मानिये
मेरा दिल बाग बाग हो गया
जिंदगी कितनी कीमती है
इस बात का अहसास हो गया

आज भी भोला मेरा मन
समझ नाही पाता
इतनी परेशानियों के बीच भी
हमें यह धाम क्यों है भाता
शायद इसका कारण
विज्ञानं पर आधारित हमारी
संस्कृत क़ी गहरी जड़े हो
जिस पर आस्था क़ी विजय हो
विज्ञानं पर आस्था का
अटल विश्वास हो
या राष्ट्रीयता से जोड़ता
विज्ञानं पर आस्था का प्रभाव हो
जिसे बस और केवल बस
प्रत्यक्ष ही महसूस किया जा सकता है
कंक्रीट के जंगलो में बैठ कर
प्राकृत के इस अनूठे उपवन
भय और भक्ति के संगम का
विश्लेषण नहीं किया
जा सकता है

मंगलवार, 26 जून 2012

टुनटुन

टुनटुन अपने

नन्हे नन्हे हाथो से

अपनी ही धुन में मगन

कालोनी क़ी सख्त सड़को पर

झाड़ू लगाये जा रहा था

मुन्नी बदनाम हुई के गाने को

रेंग रेंग कर

गाये जा रहा था

उसके कदम भी आज

पता नहीं क्यों थके थके से

प्रतीत हो रहे थे

मुझे ऐसा लग रहा था कि

उस गाने क़ी एनेर्जी से ही

शायद उसके पाव

चल रहे थे.



पर आज उसके गाने में

पहले जैसी बात नहीं थी

वरना और दिनों में तो

जितना झूम कर

उसके हाथ चलते थे

उससे कही ज्यादा उसके

सुर और ताल चला करते थे

शायद उसी से वह स्वयं

के लिए उत्साह पाता था

तभी तो कालोनी के एक सड़क को

साफ करने के उपरांत

वह दूसरी सड़क पर

एक नयी उर्जा से तुरंत

लग जाता था



पिछले काफी दिनों से

जहरीले शराब कांड में उसके पापा क़ी

मृत्यु के बाद उसकी माँ

अपने साथ उसे काम पर ले आती

मैंने कई बार उससे

इस बात क़ी शिकायत भी क़ी

पढाई के बात पर

गरीबी का देकर हवाला

उसने मेरी बात को

हर बार ही टाला

कई बार मैंने पैसा देकर

टुनटुन को पढ़ाने के लिए

उससे कहता रहा

पर हर बार उसका एक नया

बहाना सहता रहा

इसी क्रम में टुनटुन

मेरे करीब होता गया

मै उस बच्चे कि तक़दीर पर

अफ़सोस जाहिर करते हुए

उसे अपनी बात समझाने के लिए

क्रमशः उसके और बड़े होने क़ी

प्रतीक्षा करता रहा



मैंने मंदिर से लौटते हुए पूछा

क्या बात है टुनटुन

पिछले तीन चार दिनों से

तुम्ही अकेले ही आ रहे हो

कैसे तुम पूरा काम कर पा रहे हो

टुनटुन ने झाड़ू किनारे रख

अपने मैले पैंट से हाथ साफ कर

मेरी और हमेशा क़ी तरह

हाथ बढ़ा दिया

मैंने भी प्रसाद के पड़े को

उसके हाथ में रख दिया

प्रसाद खाकर

करीब के सरकारी नाले में

पानी पीकर

टुनटुन बोला

माई के कई दिना से

बुखार आवत आ

मौलवी साहेब से झरवा के

पानी पिलवा रहा पर

बुखार उतरते नाही बा

माई कहीं कि

टुनटुन तुही चला जा

अकेल झाड़ू मार आ

नाही ता ठिकेदरवा नागा लगा देही

हमनी के जौन थोड़ बहुत

ओकरा कमीशन कटला के

बाद मिलत आ

उहौ जाना डूब जाई

यही वादे हम अकेल आवत आई

पर साहेब माई बिना

मन लागत नाही

ठीक से खानवो मिलत नाही

कहते कहते टुनटुन की

आंखे भर आई



मैंने काम के बाद उसे

अपने घर आने का इशारा किया

स्वयं की बेबसी पर

खीजते हुए

यह सोचते हुए

घर की और रूख किया

कि हम बनाकर हवाई किले

सतरंगी सपनो क़ी देते रहेंगे नजीर

राजनीति की बिसात पर

बिछा ले हमारे ये रहनुमा

चाहे कितने भी वजीर

इस तरह के न जाने कितने टुनटुन

बेबस और लाचार

आँखों में रंग रंग के सपने लिए

जवान होने के पूर्व ही

बूढ़े हो जायेंगे

अपनी जिंदगी ये क्या

खाक जी पाएंगे.



डा. रमेश कुमार निर्मेश

गुरुवार, 21 जून 2012

दूसरे गाँधी


तपती जेठ की

दोपहरी थी

अपने शीर्षतम बिंदु पर

गरम हवा चल रही थी

सूरज क़ी तीव्रतम तपिश से

बदन तप रहा था

तन का एक एक

रोम झुलसा जा रहा था



परशान परिसर में

एक वृक्ष क़ी छाया पकड़

मै आराम फरमाने को

उत्सुक और व्यग्र



देख रहा था

अपनी अतिरेक हरियाली से

पूरे शहर को

जो कभी देती थी पोषण

बनाये रखती थी

पर्यावरण का संतुलन

परिसर क़ी उस हरियाली का

हो रहा था तेजी से शोषण



देख रहा था

नित एक नए भवन क़ी

नीव पड़ते हुए

महामना क़ी बगिया को

कंक्रीट के जंगल में

बदलते हुए

सामने ही खेल के एक मैदान में

एक नूतन भवन सम्पूर्ण

साकारता क़ी और अग्रसर था

तेजी से वह काम

चल रहा था



बेदम कर देने वाली

इस जलती धूप में

दो तीन आधुनिक विशाल और

विकासशील भारत क़ी स्यामवार्ण

मगर सुगढ़ ललनाये

गोद में इस आर्यावर्त के

भविष्य को छिपाए

नंगे पाव ईट ढो रही थी

शिक्षा के मंदिर में

बरबस शिक्षविदो के सर्व शिक्षा

अभियान के दावे क़ी

हसी उड़ा रही थी



साथ ही बड़े हसरत से

स्कूटी पर सवार

पूरे बदन को ढके

जींस पैंट के साथ

शानदार काला चश्मा चढ़ाये

इसी आधुनिक भारत क़ी ही

आधुनिक ललनाएं

एक मोहक खुशबू बिखेरते हुए

एक एक कर

उनके पास से गुजरती जा रही थी



स्वयं को कोसते हुए

गर्मी से निढाल हो कभी

वह बैठ जाती

कभी ठीकेदारों के डर से

बिना सुस्तायें काम पर

पुनः लग जाती



संभवतः

उन्हें इंतजार किसी तरह

दिन ढले

गर्मी से रहत मिले

साथ ही पूरी मजदूरी क़ी चाह

पेट भरने के आस लिए वह भी

इसी आधुनिक आर्यावर्त क़ी ललनाये थी

मगर भारतीय वांग्मय और

सनातनी संस्कृति के दृष्टिकोण से

एक और दूसरे गाँधी को अपने उद्धार हेतु

अपने आंचल में छिपाए

शायद अपने पिछले जन्मो के

कर्मो का फल ही तो

भोग रही थी

डा रमेश कुमार निर्मेश

सोमवार, 11 जून 2012

शूल

एक एक कर खेत के एक एक टुकड़े बिकते जा रहे थे खेतों की जगह कालोनी बसते जा रहे थे अभी पिछले साल तक रम्भू जिसे सीवान कहता था आज उदास नजरो से उसी में अपना बाग ढूड रहा था काल ही तो वह अपने बीच में फसे अंतिम खेत क़ी रजिस्ट्री कर आया था रास्ता उसका बन्द कर गाँव के विकास के नाम पर औने पौने दम पर भूमाफियाओं ने हड़का कर उस बची जमीन को उससे लिखवाया था हताश रम्भू अपने एकमात्र बचे कच्चे मकान के सामने बैठा अपने खेत खलिहान और सीवान को तेजी से कंक्रीट के जंगलो में बदलते देख रहा था इन आधुनिक जंगलो को ही विकास कहते है शायद यही सोच रहा था रह रह कर उसे अपने बचपन और जवानी के दिन याद आ रहे थे किस तरह गाँव के बच्चे दूर खेत खलिहान बाग बगीचों और सीवानो में इतराते थे कुछ समय के बाद गाँव का नामो निशान मिट गया उसकी जगह एक कंक्रीट का जंगल अशोकपुरम के नाम से बस गया रम्भू अब बूढ़ा हो चला था जमीन बेचने के एवज में मिले पैसो से बच्चों का समय दारू मुर्गे में जम कर कट रहा था गाँव निठल्लों और कामचोरों से भर गया था जीवन यापन का कोई और तरीका नहीं देख आज रम्भू क़ी पत्नी रामरती अपनी बहू के साथ कभी जिसकी मालकिन थी आज उसी कालोनी में घूम घूम कर कही बर्तन माज रही थी तो कही झाड़ू पोछा लगा रही थी किसी तरह उन घरो से मिले जूठे खानों और तुक्ष पैसों से अपने परिवार का भरण पोषण कर रही थी विकास क़ी इस विडंबना पर रामरती हताश सोचती कि कल तलक उसके यहाँ ताजे साग सब्जीयों के लिए जो लाइन लगाते थे आज उन्ही के झूठे बचे भोजन से उसके पेट भरते है थोड़ी सी देर हो जाने पर उनकी बीबियों के ताने शूल बन ह्रदय में चुभते थे

बुधवार, 16 मई 2012

रिश्ते कि सच्चाई

निशंक के असमय देहावसान के उपरांत आज श्रद्धा पहली बार मायके जाने के लिए तैयार हो रही थी बच्चो को स्कूल भेज कर रह रह कर रो रही थी अभी कितने ही दिन हुए थे उसे इस घर में आये पराये हो गए थे अपने अपनों को हुए पराये निशंक के अथाह प्रेम के सागर में पाँच वर्ष तक वह डूबती उतराई रही दो दो प्यारे बच्चो क़ी माँ बन स्वाभिमान से इतराई रही काल ने कब दबे पाव पता ही नहीं चला घर में प्रवेश किया एक वर्ष के भीतर ही सास और ससुर का उठ गया था साया किसी तरह निशंक के साथ अपनी गृहस्थी को सभाले वह अहिस्ता आगे बढ़ती रही तभी एक सड़क हादसे में निशंक भी चल बसा पता नहीं किस मनहूस क़ी नजर उसके खेलते खाते बगिया में आग लगा गया किसी तरह बच्चो को देख वह जीने का एक और हौसला पालने लगी थी वरना वक़्त ने उसको तोड़ने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी थी याद था किस तरह भैया ने उसे सीने से लगाते हुए विह्वल हो उसे शीघ्र घर आने के लिए बोला था दिलासा देते हुए भाभी ने भी उसे पैर फिराने के लिए कहा था उसी रस्म को पूरा करने हेतु वह किसी तरह जैसे ही मायके पहुंची काल बेल दबाने के लिए जैसे ही उद्यत हुई घर के अन्दर से भाभी कि आवाज आई आज ही मुझे भी अपनी मम्मी को देखने घर जाना था तो इसी दिन इन महारानी को भी मायके आना था अपना तो सब कुछ लुटवा ही चुकी है भैया ने भी आगे जोड़ा कि अब पता नहीं हमारा क्या करने पर तुली है कितने दिनों से अपनी कार बदलना चाह रहे है पर सफल नहीं हो पा रहे है हम तो वैसे ही इस कदर तंगहाली में चल रहे है पता नहीं कुछ मांग बैठी तो हम क्या कहेगे इसके बाद श्रद्धा कुछ और सुनने का सहस नहीं कर पाई भ्रम में ही सही टूटते रिश्ते को बचाने हेतु अपने घर वापस चली आयी भरभराते आंसुओं को पलकों में ही रोका भैया को फोन कर बोला आपने कितने प्रेम से बुलाया था पर क्या करे मेरी भी तबियत अभी ठीक नहीं है सोनू भी बीमार चल रहा उसको भी कल से आंव पड़ रही है वैसे आपको परेशान होने क़ी जरूरत नहीं देखती हू जैसे ही समय मिलेगा मै दो मिनट के लिए ही सही आप सबकी मर्यादा हेतु घर आ जाउंगी उस दिन भाभी भी काफी दुखी थी उनसे भी कहियेगा मेरे लिए कदापि परेशान न हो इन रिश्ते कि सच्चाई के बीच जो भी हो इस जहर को मै ही पीउंगी अपने बच्चो कि खातिर मै तो जीऊँगी ही जीऊँगी

शुक्रवार, 11 मई 2012

दसदस के नोट

बैंड क़ी धुन पर बरती जम कर नाच रहे थे शायद मदिरा में मस्त अपने यार क़ी शादी पर कस कर झूम रहे थे कुछ नव धनाड्य गड्डियों से दसदस के नोट खीच खीच कर हवा में उछाल रहे थे बेशक सात या आठ साल का दीपू अपने सर पर रोशनी का गमला लिए बारात के साथ चल रहा था उन उड़ते नोटों को बड़े ही हसरत से देख रहा था सर पर बोझ होने के कारण बेबस और लाचार मन मसोस कर रह जा रहा था अचानक एक दस का नोट उसके पाव तले आ गया उसने किसी तरह झुक कर उसे उठा लिया सोच रहा था उसका टूटा चप्पल जो काफी दिनों से उसे बेहद दर्द दे रहा था उसमे से गिट्टक फाड़कर पैर में रह रह कर चुभ जा रहा था किसी तरह काश एक और दस का नोट अगर लह जाता उसका यह चप्पल एक नए चप्पल से बदल जाता मजदूरी का पैसा तो सूदखोर की रोजही में ही चला जाता है फिर भी दो साल पहले बापू की बीमारी पर सूद पर लिया गया पैसा भरने का नाम ही नहीं लेता तभी अचानक एक दस का नोट उसके तरफ लहराता हुआ आने लगा वह उसे छोड़ने का लोभ सवरण नहीं कर पाया उसे पाने के प्रयास में दुर्भाग्य से फिसला और रोशनी का गमला लिए नीचे गिर पड़ा ठीकेदार दौड़ा चिल्लाते हुए गमले को उसने उठाया दीपू को खीचकर एक झन्नाटेदार थप्पड़ लगाते हुए ठीकेदार पुनः गरजा भाग साले इसका दाड तो तुम्हारे इस सीजन की मजदूरी से वसूल ही लूँगा तुम्हारे बाप ने अगर कुछ कहा तो उसे भी जम कर तोडूंगा गमला गिर कर चकना चूर हो चुका था बारातियों को किसकी फिकर बारात आगे बढ़ चुका था दीपू कभी उसे कभी अपने गाल को सहला रहा था दस के नोट को मुट्ठी में कस कर छिपाते हुए एक अज्ञात और आनेवाले भय और संकट के बारे में सोच रो रहा था

मंगलवार, 8 मई 2012

'जंगल में क्रिकेट' और 'चाँद पर पानी' : कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह लोकार्पित



युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.


इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.


कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

- रत्नेश कुमार मौर्या
संयोजक- 'शब्द-साहित्य'
म्योराबाद, इलाहाबाद.
mauryark@indiatimes.com
http://shabdasahitya.blogspot.in/

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

तेरहवी का भोज

एक एक कौर के साथ
मृदुभाषी मितलू भैया का चेहरा
सामने नजर आ रहा था
मैं उनकी तेरहवी के भोज में
मुखियाजी के साथ शामिल था
क्रूर कैंसर ने एक बार पुनः
निगल लिया असमय ही एक जिंदगी
कितने अरमानो से रख रहे थे
एक एक ईट अपने भविष्य की
बड़े मनोयोग से घर बनवा रहे थे
शीघ्र ही बहू को लाने के ख्वाब संजो रहे थे
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था
वर्ना उनकी उम्र ही क्या थी
गृहस्थी भी अभी एकदम कच्ची थी
इस कठिन परिस्थिति में
डाक्टर के लाख रुपये के निवेश कि बात
तिस पर भी उनके जीवन की
तनिक भी नहीं आस
हालिया जवान हुए मगर बेबस
अबोध बच्चे कोई निर्णय नहीं ले पा रहे थे
अपने आप को अत्यंत ही बेबस
और भयभीत पा रहे थे
अंत में किंकर्तव्य विमूढ़ हो
पापा को पल पल मौत के करीब जाते हुए
देखने का अनचाहा असीमित
दुःख पा रहे थे
असमय ही अपने सर पर एक
मजबूत साये का अभाव पा रहे थे
चाह कर भी कुछ सकारात्मक
न कर पाने का दंश झेलते हुए
मजबूर हो भाग्य के हाथों की
कठपुतली बने नियति के अधीन
जीवन और मृत्यु का
जीवंत दृश्य झेल रहे थे
साथ ही एक अंतहीन त्रासदी हेतु
अपने आप को मानसिक रूप से
तैयार भी कर रहे थे
जिसकी न चाहते हुए भी हम
प्रतीक्षा कर रहे थे
अंत में वही हुआ और दुर्भाग्य से
आज उनके निमित्त आयोजित
तेरहवी कि भोज में सिरकत करना पड़ा
साहब ऐसे भोज का क्या औचित्य है
क्या इसका नैमित्य
चिंतनशील मुखियाजी के इस
एकाएक बौद्धिकता युक्त आक्रमण से
मैं अचकचा गया
शुन्य में मित्लू भैया को निहारते हुए
धरातल पर आ गया
उन्हें हमेशा से लगता था कि
मेरे पास उनके हर अनसुलझे
प्रश्नों का जवाब होता है
पर मेरे लिए उनके प्रश्नों का उत्तर देना
बस एक प्रयास ही होता है
मैंने कहा मुखियाजी बेशक हम
भाग्य के होठों मजबूर
पर करना पड़ता है हमें यहाँ
सामाजिक मर्यादाओं के तहत
कर्मयोग भी भरपूर
अब तो बस यही मानिये कि
कम से कम इस भोज से तृप्त अत्मानों की
दुआओं से मित्लू भैया को मिलेगी
अगले जनम के लिए शुभ कामनाएं
हा शायद इन्ही सब कर्म कंडों में फसकर
व्यक्ति को अपने प्रिय जनों कि यादों से
दूर करने की भी हमारे पूर्वजों की
रही हो कामनाएं
मैंने उनकी संतुष्टि हेतु बेशक
एक जवाब दे डाला
पर अपने ही तर्कों कि कसौटी पर
स्वयं को असंतुष्ट पाया
मौत को करीब देख मित्लू भैया की
निरीह आँखों में ललक
रह रह कर जीने की
पोते को गोद में लेकर
आगन में टहलने की
उनकी अदम्य इक्षा ने
हमें पुनः व्यथित कर डाला

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

यूथ पेर्सोनालिटी

रीतेश तोमर : भाजपा का युवा चेहरा


रीतेश तोमर भारतीय जनता पार्टी के उभरते हुए युवा नेता हैं। छात्र जीवन से राजनीति में कदम रखने वाले रीतेष अपने जुझारू व्यक्तित्व के बल पर भाजपा में विभिन्न पदों पर रहते हुए आज ह्यूमन राइट सेल में रा0 एक्जीक्यूटिव मेम्बर हैं साथ ही दिल्ली भाजपा के संवाद सेल में सह-संयोजक की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रहे हैं। इनका जन्म 9 अक्टूर 1984 को मेरठ के मुण्डाली गांव में हुआ। शुरूवाती शिक्षा मेरठ में हुई उसके बाद नोएडा से बी. टेक किया। इनका बचपन संघ के गोद में बीता तथा 2004 से भारतीय जनता युवा मोर्चा के सक्रीय सदस्य के रूप में पार्टी के लिए काम किया। फ्रैंस आफ बीजेपी के बैनर तले पूरे भारत में मूहीम चलया गया जिसमें रीतेष ने सम्पूर्ण उत्तर प्रदेष में सम्मेलन कर युवाओं को भाजपा से जोडने का सफल प्रयास किया। उत्तर प्रदेश के विधासभा चुनाव में भी रीतेश ने मेरठ, गाजियाबाद, मुरादाबाद, नोएडा, वाराणसी समेत विभिन्न जगहो पर भाजपा के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया।
रीतेश का मानना है कि जरूरतमन्दों और गरीबों की सेवा सबसे बड़ी सेवा है। इनकी सेवा करने से ईश्वर प्रसन्न होता है तथा मन को शान्ति मिलता है। मेरा प्रयास रहता है कि हर उस व्यक्ति के मदद के लिए पहुंचू जो परेशान और गरीब है। इसीलिए तो इन्होने मेरठ, नोएडा गेटर नोएडा समेत विभिन्न क्षेत्रों में गरीबों में कम्बल, साडी दवा मुफत वितरित करवाया। समय-समय पर ये गरब बस्तियों में मेडिकल कैंप का आयोजन करवातें हैं।
देषभक्ति के जज्बे से लबेरेज रीतेष भ्रष्टाचार के खिलाफ कई मुहीम छेड चुके हैं। भाजपा का उभरता युवा चेहरा रीतेश की सोच भारत को बुनन्दियों पर ले जाने वाली है। तकनीकी शिक्षा में निपुण यह युवा अपने साथ हजारों युवाओं का काफीला लेकर चल रहा है जिसके जीवन का उददेश्य भारत की तस्वीर के साथ तकदीर बदलने वाली है। फिल्वक्त रीतेश दिल्ली एमसीडी चुनाव में भाजपा के लिए धुआंधार प्रचार कर रहे हैं, इनकी सभाओं में युवाओं का रेला उमड रहा है।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

संस्कृति का परिमार्जित एक स्वरुप

यात्रिओं से खचाखच
भरा रेल का डिब्बा
दोनों एक दूसरे से
हो रहे थे गुत्थमगुत्था
कहते हुए कुत्ता
एक दूसरे के मध्य माँ बहन की
गालियों का चल रहा था
अबाद्ध आदान प्रदान
मै जडवत डिब्बे के एक कोने में
उन्हें देख रहा था नादान
अपने को रोक पाने में अक्षम
उनके बीच की मध्यस्थता के लिए
मैं सहसा उठा
तभी बगल में बैठे एक वृद्ध ने
मेरा हाथ दाबा अहिस्ता
बोला चुप चाप बैठो
थोड़ी देर में आप ही
समाप्त हो जायेगा सारा किस्सा
मैं मन मसोस कर
अपनी जगह बैठा रहा
रेल अपनी गति से अबाद्ध चलता रहा
मैं आश्चर्य से देख रहा था
झगडा धीरे धीरे क्रमशः
शांत हो रहा था
अब दोनों के मध्य शांति वार्ता का
दौर चल रहा था
परिदृश्य लगभग पूरा ही बदल गया था
इस वार्ता के मध्य अब
हाल चाल का आदान प्रदान होने लगा था
एक दूसरे का साथ
दोनों को ही अब भा रहा था
बीच बीच में हसी की भी
कुछ लडिया दिख रही थी
फिर दोनों ने किसी तरह कुछ
जगह बना कर अपनी अपनी
पोटली खोली थी
सब्जियों के फेर बदल के साथ
किया भोजन जमकर
निश्चिन्त वे दोनों वही सो गए
अपने अपने गमछे विछाकर

बेटा इसीलिए मै तुम्हे
मना कर रहा था
मध्यस्ठ्ता करने पर जानलो
निश्चित ही तुम्हे भी बेशक दो चार
थप्पड़ पड़ना था
मैं तो अक्सर सफ़र में रहते हुए
ऐसे वाकये से पैरचित था
कहकर वह व्यक्ति
मेरी तरफ देखकर मुस्कराया
मुझे अपने इस अबूझ ग्रामीण
संस्कृति से अपरिचित होने के दुःख ने
रास्ते भर सताया
हलाकि यह बात अलग थी कि
अपनी ग्रामीण संस्कृति का यह
परिमार्जित स्वरुप
मुझे अत्यंत ही भाया