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मंगलवार, 24 अगस्त 2010

रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें



रक्षाबंधन पर्व बहन की, समाज की, राष्ट्र की रक्षा हेतु बंधन से जुड़ने का प्रतीक त्यौहार है. यह धार्मिक स्वाध्याय के प्रचार का, विद्या विस्तार का पर्व भी है इस दिन यज्ञोपवीत बदला जाता है और द्विजत्व को धारण किया जाता है, वेद मंत्रों से मंत्रित किया जाता है. नारी जाति पर कोई कष्ट न आए, इसके लिये संकल्पित होने, संस्कृति की शालीनता को बचाए रखने हेतु संकल्पबद्ध होने का भी यह अनूठा पर्व है. इस पर्व को इसकी मूल भावना के साथ मनाएं... !! रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें !!

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

सेलुलर जेल भी पहुँची क्वींस बैटन रिले

भारत इस वर्ष 19 वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन कर रहा है। परंपरानुसार इसकी शुरूआत 29 अक्तूबर, 2009 को बकिंघम पैलेस, लंदन में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को क्वीन्स बैटन हस्तांतरित करके हुई। इसके बाद ओलम्पिक एयर राइफल चैंपियन, अभिनव बिंद्रा ने क्वीन विक्टोरिया माॅन्युमेंट के चारों ओर रिले करते हुए क्वीन्स बैटन की यात्रा शुरू की। क्वीन्स बैटन सभी 71 राष्ट्रमंडल देशों में घूमने के बाद 25 जून, 2010 को पाकिस्तान से बाघा बार्डर द्वारा भारत में पहुँच गई और उसे पूरे देश में 100 दिनों तक घुमाया जाएगा। इस बीच यह जिस भी शहर से गुजर रही है, वहाँ इसका रंगारंग कार्यक्रमों द्वारा स्वागत किया जा रहा है। गौरतलब है कि आस्ट्रेलिया के बाद भारत दूसरा देश है, जहाँ इसके सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में बैटन रिले ले जाया जा रहा है.

19 अगस्त 2010 को राष्ट्रमंडल खेलों की क्वींस बैटन रिले भारत के दक्षिणतम क्षोर अण्डमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में भी चेन्नई से पहुंची, जहाँ सवेरे 7.45 बजे पोर्टब्लेयर हवाई अड्डे पर बैटन रिले का भव्य स्वागत किया गया. रिले औपचारिक रूप से शाम को 3 बजे ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल परिसर से आरंभ हुई, जहाँ उपराज्यपाल (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) भूपेंद्र सिंह द्वारा इसका शुभारम्भ किया गया. सेलुलर जेल में बैटन का आगमन एक तरह से उन तमाम क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि भी थी, जिन्होंने इन्हीं चहारदीवारियों में रहकर आजाद भारत और उसकी तरक्की का सपना देखा था. अंडमान-निकोबार ओलम्पिक असोसिअशन के अध्यक्ष जी. भास्कर ने राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अतिरिक्त महानिदेशक (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) राज कड़ियान से क्वींस बैटन को प्राप्त कर इसे उपराज्यपाल को सौंपा और इसी के साथ विश्व-प्रसिद्ध ऐतिहासिक सेलुलर जेल और यहाँ एकत्र तमाम सैन्य व सिविल अधिकारी, खिलाडी और गणमान्य नागरिक इस पल के जीवंत गवाह बने. उपराज्यपाल ने प्रतीकात्मक रूप से कुछ देर दौड़ लगाकर इसे प्रथम धावक के रूप में मुख्य सचिव विवेक रे को सौंपा और फिर तो बढ़ते क़दमों के साथ कड़ियाँ जुडती ही गईं. वाकई इसे नजदीक से देखना एक सुखद अनुभव था. राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल से शुरू होकर क्वींस बैटन रिले पोर्टब्लेयर के विभिन्न प्रमुख भागों - घंटाघर, माडल स्कूल, बंगाली क्लब, गोलघर, दिलानिपुर, फिनिक्स बे, लाइट हाउस सिनेमा, गाँधी प्रतिमा, अबरदीन बाजार, घंटाघर से होते हुए ऐतिहासिक नेताजी स्टेडियम पहुँचकर सम्पन्न हुई, जहाँ सांसद श्री विष्णुपद राय ने क्वींस बैटन को प्राप्त कर सक्षम अधिकारियों को सौंपा. इस शानदार अवसर पर बैटन रिले को यादगार बनाने के लिए जहाँ प्रमुख स्थलों पर तोरण द्वार स्थापित किये गए, वहीँ पोर्टब्लेयर के डा0 बी. आर. अम्बेडकर सभागार में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया . यही नहीं अबर्दीन जेटी और रास द्वीपों के बीच जहाजों को रोशनियों से सजाया भी गया और पूरा पोर्टब्लेयर मानो रंगायमान हो उठा. रिले के दौरान भारी संख्या में स्कूली विद्यार्थी और नागरिक जन इसका स्वागत करते दिखे. रिले के दौरान द्वीपों के राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त खिलाड़ियों और अधिकारीयों के अलावा करीब 30 लोग बैटन धारक के रूप में इसे लेकर आगे बढ़ते रहे. पोर्टब्लेयर में क्वींस बैटन रिले का आगमन भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाता है, क्योंकि यहाँ देश के प्राय: सभी प्रान्तों के लोग बसे हुए हैं और इसका लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया. इसे नजदीक से देखना वाकई एक यादगार अनुभव रहा. क्वींस बैटन रिले के इस परिभ्रमण के साथ ही द्वीपवासियों और देशवासियों की शुभकामनायें भी इससे जुडती जा रही हैं और आशा की जानी चाहिए की 3 अक्तूबर, 2010 से दिल्ली में आरंभ होने वाले कामनवेल्थ गेम्स भी ऐतिहासिक होंगें और विश्व-पटल पर भारत को एक नई पहचान देंगें !!

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

कृष्ण कुमार यादव जी को जन्मदिन पर हार्दिक बधाई

कृष्ण कुमार यादव सर को उनके जन्मदिन 10 अगस्त पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें. आप एक अच्छे प्रशासक और साहित्यकार के साथ-साथ अच्छे व्यक्ति भी हैं, आपका सान्निध्य हम सब को प्राप्त है. आपके सान्निध्य में हम लोगों को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ है. आपके जन्मदिन पर आपके सुखी, समृद्ध एवं यशस्वी जीवन की कामना करते हैं.

रविवार, 1 अगस्त 2010

फ्रैंडशिप-डे....ये दोस्ती

****फ्रैंडशिप-डे के अवसर पर बहुत-बहुत बधाइयाँ। इस दिवस के बारे में ज्यादा जानकारी
उत्सव के रंग पर देख सकते हैं. ****

शनिवार, 31 जुलाई 2010

अग्नि मान

ये कापुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे ,
नारी जीवन को कबतक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे


पुरुष और लड़कियों की मानसिकता में बहुत अंतर होता है ! पुरुष अपनी भड़ास को औरतो पर चिल्ला कर निकाल लेता है! क्योंकि उसका काम है औरत के विचारो को दबाना ! पर एक लड़की अपनी सारी भड़ास अपने अन्तःकरण में समा लेती है, और अग्नि की तरह जलती रहती है ! हो सकता है सारे लोग इस विचार से इतफ़ाक रखते हो। पर यदि यह मत गलत होता तो आज के परिवेश में महिला आत्महत्या दर निरन्तर नहीं बढ़ता। आंकड़ों का सत्य कहता है महिला आत्महत्या दर पुरषों की अपेक्षा 10 गुना अधिक है ! यदि आंकड़ों पर द्रष्टि डालें तो देखेंगे की बहार काम करने वाली लड़कियां जो आत्मनिर्भर हैं तथा समाज में उनका अपना मुकाम है और वो अपने जीवन के सारे फैसले स्वयं ले सकती हैं! इसके बावजूद भी उन महिलाओं की आत्महत्या दर अधिक है चाहे वो आम लड़की हो या सेलेब्रिटी जब उन्हें प्यार में धोखा मिलता है तो वो धोखे का आघात बर्दाश्त नही कर पाती है ! तब वे अपने जीवन को समाप्त करना ही एक आसान रास्ता मानती है ! अभी हाल ही में प्रसिद्ध माडॅल विवेका बाबा ने आत्महत्या कर ली , कारण अपने प्रेमी का धोखा और तिरस्कार बर्दाश्त नही कर सकी तो उन्होंने आत्महत्या कर ली वाही मिसइण्डिया रही नफीसा जोसेफ ने भी अपने प्रेमी से धोखा खाकर कुछ समय पूर्व आत्महत्या कर ली थी। ऐसे ही यदि आंकड़ों पे दृष्टि डालें तो देखेंगे की रोजाना कोई न कोई लड़की प्रेम में आघात पाकर अपनी जीवन लीला समाप्त करती जा रही है ! मनोविज्ञानिको का मत्त है ‘आज के परिवेश में जहाँ लोगों को अपने जीवन निर्वहन के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ रहा है घर और बाहर अत्यंत मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है वही प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनीय होता है और उनके लिए जीवन समाप्त करना एक आसान उपाय लोगों को दिखता है ’ चाहे कोई औरत पूरी तरह स्वतंत्र या आत्मनिर्भर क्यों न हो प्यार का धोखा उसके लिए असहनीय होता है क्योकि स्त्रियों में संवेदनशीलता एवेम भावुकता अधिक होती है। पुरुषमानसिकता स्त्रियों की मानसिकता से बिलकुल विपरीत होती है! पुरुष का आकर्षण स्त्रियों के शारीरिक सौन्दर्य पर केन्द्रति होता है ! उसका प्रेम शरीर से शुरू होकर उसी शरीर पे समाप्त हो जाता है और वो आसानी से एक को छोड़ कर दूसरे से जुड़ जाता है! उसके लिए प्रेम प्यार की बातें आम होती हैृ! परन्तु एक लड़की किसी भी पुरुष से आत्मा तथा मन से जुडती है और जब उसे आत्मिक आघात होता है , तो वो अघात उसके लिए असहनीय होता है और तब उसके सामने सबसे आसान विकल्प बचता है अपनी जीवन लीला को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर दें ! स्त्री मानसिकता मतलब समय से पहले अपने आप को उम्र से बड़ा मान लेना ! इसका बड़ा कारण ईश्वरी बेइंसाफी भी है ! एक पुरुष 60 वर्ष की आयु में भी पिता बन सकता है पर एक स्त्री का 3५ से 3७ वर्ष की आयु के बाद उसका माँ बनना कठिन होता है! और आज जहाँ लोग अपना कैरियर बनाने के लिए 30 का आंकड़ा पार कर जाते हैं तो उस उम्र में प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनिय हो जाता ह। और उनका सारा आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है! तब या तो अपनी पूरी उर्जा को इन्साफ की गुहार के लिए लगा देती हैं! तब उन पर दूसरा आघात उनके चरित्र पर होता है जो उनकी आत्मा पर असहनीय प्रहार होता है! क्या किसी ने सोचा है कभी भी महिला हो या लड़की उनमे संवीदनशीलता होती है! क्या वो ऐसे ही मरती जाएँगी ? उन्हें भी जीने का हक्क है ! इन नपुंसक व का-पुरुषों को किसने हक्क दिया है रोज रोज लड़कियों एवम महिलाओं को ऐसे ही मारते जा रहे हैं!
उन्हें किसने हक दिया है कि झूठे प्रेम जाल में फंसाओ और जब सच सामने आता है तो वो इंसान भाग खड़ा हो ता है और जब उसका सच समाज के लोगों और उसके परिजनो व प्रियजनो को बताया जाए तो वे नारी चरित्र पर प्रहार करते है जान से मारने की भी धमकी देते है ! तब लड़की के पास दो रास्ते होते हैं या तो अपने सम्मान के लिए लड़ाई लड़े और अपने चरित्र पर प्रहार करने वाले को सबके सामने लज्जित करे और अपने स्वाभिमान की रक्षा करे। पर मै जानती हूँ की कोई भी लड़की किसी भी परुष का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती और वो जिस भी पुरुष से अपने इन्साफ की गुहार करेगी वो उसे इन्साफ नहीं दिला सकते क्यूंकि वो भी स्वयं पुरुष है तब लड़की मजबूर हो जाती है क्यूंकि उसका एक कदम उसके माता पिता के नाम पर सवालिया निशाँ लगा देता हैै। उसके लिए तीसरा रास्ता बचता है अपने आपको अनंत अँधेरे में झोंक दे जिसमे वो तिल तिल मरती है पर उसको मरता हुआ कोई नही देख पाता आज मेरा प्रश्न ईश्वर और समाज से है ऐसे नपुंसक पुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे और नारी को कब तक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

'बाल-दुनिया' हेतु रचनाएँ आमंत्रित

बचपन भला किसे नहीं भाता. हम कितने भी बड़े हो जाएँ, पर बचपन की यादें कभी नहीं भूलतीं. हमारे अंतर्मन में एक बच्चा सदैव जीवंत रहता है, जरुरत बस उसे खोजने की है. कई बार जब हम उदासी के दरमियाँ होते हैं, तो अचानक बचपन से जुडी कोई याद हमें गुदगुदा जाती है. आजकल के बच्चे भी तो काफी फास्ट हो गए हैं. ब्लॉग जगत में उनके बनाये चित्र दिखने लगे हैं तो उनकी प्यारी-प्यारी अभिव्यक्तियाँ भी रंग बिखेरनी लगी हैं. 'बाल-दुनिया' में बच्चों की बातें होंगी, बच्चों के बनाये चित्र और रचनाएँ होंगीं, उनके ब्लॉगों की बातें होगीं, बाल-मन को सहेजती बड़ों की रचनाएँ होंगीं और भी बहुत कुछ....पर यह सब हम अकेले नहीं कर सकते, इसलिए हमें आप सभी के सहयोग की भी जरुरत पड़ेगी। 'बाल-दुनिया' हेतु बच्चों से जुडी रचनाएँ, चित्र और बच्चों के बारे में जानकारियां आमंत्रित हैं. आशा है आप सभी का सहयोग हमें मिलेगा.आप इसे hindi.literature@yahoo.com पर भेज सकते हैं.

सोमवार, 12 जुलाई 2010

ज्ञान की जर्जर काया



मनु मंजू शुक्ल
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कल ’शाम की बात है। मै अपनेआप से बात कर रही थी। और जीवन के हजारों तानेबाने बुन रही थी कि अचानक एक कोलाहल सा सुनाई पडा। पकडो-पकडो मारो-मारो का ’शोर सुनकर मै दौडकर दरवाजे पर आ गई। देखा तो स्तम्भ सी देखती ही रह गई। एक जर्जर काया छीड शरीर मानो मृतशरीरढॉचा सा, ना हड्रडी ना रक्त संचार बस नेत्र खुले ले दयनीयभाव, थी आशा दया की नेत्रों मे, मन रो उठा देख यह मायाजाल। आयी दया घर ले आयी।
मैंने पूछा ,“ अय सात्यआत्मा हो कौन क्यों विवश हो धराशाई सी भटक रही हो राहों मे। किसे खोज रही इस भ्रमित समाज के पगचिन्हों में। है कैसी मृगतृष्णा?”
पूछा तो जान पडा, यह है एक सत्य की परछाई, यह तो है, “ ज्ञान की जर्जर काया” लिए अस्थी कंकाल दरदर खोज रहा सत्य’िाक्षा का द्वार।
वो बोली द्र्रवित भाव से , “हे प्राणमित्र कहने को है मंजूसंसार, पर सच पूछो तो अब बन गया भोग का द्वार। हर कोई है ’शिक्षित, पर मूढ अभिमानी ना दया, ना ज्ञान, ना नेत्रों मे लाज, लालच कर रही है हर घर-घर में वास। ममता तो है बस तमस द्वार। ना लाज है श्रंगार में ना दया है अत्मसम्मान पर। है रुधिर का रंग अब नही लाल। कहने को सब है ज्ञानी पर है सच पूर्ण भ्रमित अभिमान। नही स्वंय को स्वंय का ज्ञान। मै तो बस खोजू एक सत्यद्वार। जो सच पूछो वो है एक अतिश्रुक्ति, ना कोई है भाव प्रधान, ना किसी में स्वाभिमान।
इतना कहकर वो ज्ञानछाया खो गयी कोहरे की घुपत राहों में। नेत्रपटल खुले मेरे खोजते रहे उसे अंध राहों को। शायद वो रुक जाती शायद पलठ कर फिर आती शायद वो कुछ और कह पाती पर सच पूछो तो है यह सपना। यहॉ ज्ञानी दर-दर फिर रहे अज्ञानी का होता सतकार । ये जीवन की है सच्ची विडम्बन ना कोई अतिसुक्ति पा कोई अभिप्रेणा।


मेरे भाव



गुरुवार, 8 जुलाई 2010

गणतंत्र दिवस पर बहादुरी पुरस्कार के लिए बच्चों से आवेदन आमंत्रित

भारतीय बाल कल्याण परिषद द्वारा हर वर्ष बच्चों को उनकी बहादुरी के अनुकरणीय कार्यों के लिए पुरस्कार प्रदान किया जाता है। ये पुरस्कार भारत के प्रधानमंत्री द्वारा गणतंत्र दिवस से ठीक पहले भेंट किया जाता है। पुरस्कार प्राप्त बच्चे राजधानी दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में भी हिस्सा लेते हैं।

उम्मीदवारों के चयन के लिए मुख्य मानदंडों में जीवन के खतरों से मुकाबला करते हुए घायल होना, सामाजिक बुराई अथवा अपराध के खिलाफ बहादुरी तथा साहसिकता, बाल्यकाल में जोखिमपूर्ण कार्य आदि को ध्यान में रखा जाएगा। आवेदन की सिफारिश से पहले प्रत्येक मामले की मौके पर जाँच अनिवार्य होगी। प्रत्येक आवेदन के साथ मामले की जांच रिपोर्ट भी होनी चाहिए। सभी संबंधों में पूर्ण सिफारिश के साथ आवेदन 30 सितम्बर, 2010 तक भारतीय बाल कल्याण परिषद, 4 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली- 110002 पर पहँचना अनिवार्य है।

आकांक्षा यादव

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

ये पहेली सुलझाइए


जरा आप भी बताइए कि इस चित्र में किन 10 राजनेताओं के चेहरे छुपे हुए हैं।

!! मैं तो कन्फ्युजड हूँ, अब आपकी बारी है !!

शुक्रवार, 18 जून 2010

छेड़ो तराने...

छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...
सूने दिवस थे, सूने रैना,
सूने उर में गहन वेदना,
सूने पल थे सुने नैना,
सूने गात में सुप्त चेतना।

अभिलाषाओं ने करवट ली,
करुणा से पलकें गीलीं ।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

सुप्त भाव थे, सुप्त विराग,
मरु जीवन में सुप्त अनुराग,
तमस विषाद, वंचित रस राग,
नीरव व्यथा, था कैसा अभाग ?

दिग दिगंत आह्लाद निनाद,
दिव्य ज्योति हलचल प्रमाद ।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

मौन क्रंद था, मौन संताप,
मौन पमोद, राग आलाप,
मौन दग्ध दुख मौन प्रलाप,
अंतस्तल में मौन ही व्याप ।

आशा रंजित मंगल संसृति,
हर्षित हृदय, झलक नवज्योति।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

तिमिर टूटा, निद्रा पर्यंत,
सकल वेदना का कर अंत,
पुलकित भाव घनघोर अनंत,
उन्मादित थिरकते पांव बसंत।

स्मृतियां विस्मृत, सजल नयन,
अभिनव परिवर्तन झंकृत जीवन।
छेड़ो तराने आज फिर झूमने का मन कर आया है...

कवि कुलवंत सिंह

रविवार, 6 जून 2010

जाती आधारित जनगणना अनिवार्य

जाति-आधारित जनगणना इस देश में एक व्यापक बहस का मुद्दा बनकर उभरी है। पहले सरकार की हाँ और फिर टालमटोल ने इसे व्यापक बहस का मुद्दा बना दिया है। चारों तरफ इसके विरोध में लोग अपने औजार लेकर खड़े हो गए हैं। जाति आधारित जनगणना के विरोध में प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया तक ने ऐसी भ्रांति फैला रखी है, मानो इसके बाद भारत में जातिवाद का जहर फैल जाएगा और भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया हमें एक पिछड़े राष्ट्र के रुप में दर्ज करेगी। सवर्ण शक्तियाँ जाति आधारित जनगणना को यादव त्रयी मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव एवं शरद यादव की देन बताकर इसे ‘यादवी‘ कूटनीति तक सीमित रखने की कोशिश कर रही है। पर सूचना-संजाल के इस दौर में इस तथ्य को विस्मृत किया जा रहा है जाति भारतीय समाज की रीढ़ है। चंद लोगों के जाति को नक्कारने से सच्चाई नहीं बदल जाती।

जाति-व्यवस्था भारत की प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था की ही देन है, जो कालांतर में कर्म से जन्म आधारित हो गई। जब सवर्ण शक्तियों ने महसूस किया कि इस कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था से उनके प्रभुत्व को खतरा पैदा हो सकता है तो उन्होंने इसे परंपराओं में जन्मना घोषित कर दिया। कभी तप करने पर शंबूक का वध तो कभी गुरुदक्षिणा के बहाने एकलव्य का अंगूठा माँगने की साजिश इसी का अंग है। रामराज के नाम पर तुलसीदास की चैपाई-”ढोल, गँंवार, शूद्र, पशु नारी, ये सब ताड़ना के अधिकारी,’ सवर्ण समाज की सांमती मानसिकता का ही द्योतक है। यह मानसिकता आज के दौर में उस समय भी परिलक्षित होती है जब मंडल व आरक्षण के विरोध में कोई एक सवर्ण आत्मदाह कर लेता है और पूरा सवर्णवादी मीडिया इसे इस रुप में प्रचारित करता है मानो कोई्र राष्ट्रीय त्रासदी हो गई है। रातों-रात ऐसे लोगों को हीरो बनाने का प्रोपगंडा रचा जाता है। काश मीडिया की निगाह उन भूख से बिलबिलाते और दम तोड़ते लोगों पर भी जाती, जो कि देश के किसी सुदूर हिस्से में रह रहे हैं और दलित या पिछड़े होने की कीमत चुकाते हैं। दुर्भाग्यवश जिन लोगों ने जाति की आड़ में सदियों तक राज किया आज उन हितों पर चोट पड़ने की आशंका के चलते जाति को ‘राष्ट्रीय शर्म‘ बता रहे हैं एवं जाति आधारित जनगणना का विरोध कर रहे हैं। जाति आधारित जनगणना के विपक्ष में उठाए जा रहे सवालों पर सिलसिलेवार चर्चा के लिए श्री राम शिव मूर्ति यादव जी द्वारा 'यदुकुल' पर हर सवाल का सिलसिलेवार जवाब दिया गया है. आप भी शामिल हों !!

गुरुवार, 3 जून 2010

सोमवार, 31 मई 2010

'तम्बाकू' की विषबेल


आज विश्व तम्बाकू निषेध दिवस है. इस पर मेरा आलेख पढने के लिए यहाँ क्लिक करें...

बुधवार, 26 मई 2010

जाति आधरित जनगणना क्यूँ???


हमारे देश की सबसे बड़ी विशेषता है अनेकता में एकता !इसीलिए अंग्रेज कभी भी हमें बाँट नही पाए ,लेकिन आखिर में उन्होंने फूट डालो और राज़ करो का सहारा लिया!आज हमारे नेता फिर उसी रास्ते पर चल रहे है!देश में फिर जाति आधारित जनगणना की बात उठाई जा रही है!पूरे विश्व में कहीं भी जाति को इतना महत्त्व नही दिया जाता,जितना की हमारे देश में!हर जाति का एक अलग संगठन बना है....जैसे ब्रह्मण समाज,अग्रवाल समाज,प्रजापत समाज आदि!ये समाज अपनी अपनी जाति के विकास के लिए प्रयत्न करते है ...ठीक है पर क्या समाज को इस तरह बांटे बिना विकास नही हो सकता? जनगणना को जातीय आधार पर करना बिलकुल उचित नही होगा!इससे पहले से ही विभिन्न वर्गों में विभाजित समाज में और दूरियां बढ़ेगी! आज अलग अलग जातियों को लेकर जिस तरह से पंचायतें हो रही है और आरक्षण को लेकर राजनीती हो रही है,वो इस निर्णय से और बढ़ेगी ये सब हमारे एकीकृत समाज के लिए घातक होगा!

राष्ट्रीयता की भावना के विकास के लिए समाज को जातिविहीन करना ही होगा! जनगणना में जाति को शामिल करने से और भी बहुत सी विसंगतियां पैदा हो जाएगी!नेता लोग और खाम्प पंचायतें जातिगत जनगणना का दुरूपयोग करेंगे! देश में पहले ही जाति को लेकर आरक्षण की मांग हो रही है,जो और बढ़ेगी! आज जरूरत इस बात की है क़ि हम समाज की भलाई के लिए इसे जातियों में ना बांटे!विकासशील देश इतना विकास इसी लिए कर पाए क्यूंकि वहां जातिगत राजनीती नहीं है!तो फिर हम क्यूँ अभी भी विभिन्न वर्गों में बँटे रहना चाहते है?!सबको समानता का अधिकार भी सबको समान मानने से ही मिलेगा,विभाजित करने से नही!!जाति आधारित जनगणना किसी भी सूरत में उचित नही है!!

रविवार, 23 मई 2010

दादी का प्यार

दादी मेरी - दादी मेरी,
बहुत प्यार करती थी हमको!
रोज सुबह-सुबह जगाकर,
सैर कराती थी हमको !!

कभी नहीं डाटती हमको,
खूब प्यार जताती थी !
घर में सब लोगों को,
प्यार से समझाती थीं !!

विषम परिस्थितियों में भी,
हिम्मत बहुत बढाती थीं !
कभी न हिम्मत हारो तुम,
ऐसा पाठ पढ़ाती थीं !!

(समर्पित दादी माँ)

रविवार, 9 मई 2010

मदर्स डे पर शुभकामनायें !!



मदर्स डे पर आप सभी को शुभकामनायें। यदि आप माँ के साथ हैं तो उनका दिल ना दुखाएं और यदि माँ से भौतिक रूप से दूर हैं तो आज का दिन माँ को समर्पित कर दें। एक बार फिर से बच्चे बन कर देखिये.....माँ के नाजुक हाथों का स्पर्श स्वमेव अपने ऊपर आशीर्वाद के रूप में पाएंगे !!!

बुधवार, 5 मई 2010

गाँधी : नेक्ड एम्बिशन

कितने अफ़सोस की बात है कि जिन्हें हमारा देश राष्ट्रपिता कहता है और पूरी दुनिया जिन्हें सत्य, अहिंसा और सदाचार का प्रतिक मानती है उन्हीं गांधी जी के बारे में निहायत ही घटिया शब्दों में एक ब्रिटिश इतिहासकार जेड एडम्स ने 'गाँधी : नेक्ड एम्बिशन' नामक अपनी पुस्तक में तथ्यों को तोड़ मरोड़कर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है जिसमें गांधी को युवा नग्न औरतों के साथ नहाने वाला और रात को अपने अनुयायी आदमियों की जवान पत्नियों को अपने बिस्तर पर सुलाने वाला इंसान बताया है.

समझ में नहीं आता है कि विवादस्पद कथनों से सस्ती लोकप्रियता बटोरने वाली किताबें/लेखक क्यों बढ़ते जा रहे हैं ? विदेशी तो विशेषकर हमारे धीरज का इम्तिहान लेते है और वे शायद बर्दाश्त नहीं कर सकते कि हमारे बापू को मानने वालों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है. शायद जेड एडम्स की भी यही मानसिकता रही हो. इन्हें शायद एक बार नए सिरे से गांधी को पढ़ना चाहिए. ऐसा डायना और डोडी अल फय्याद या फिर बिल क्लिंटन जैसे लोग पश्चिम में करते होंगे, यहाँ नहीं. और फिर इस किस्म का घृणास्पद लेखन तो असहनीय है.

मैंने एक बार गांधी जी पर आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार में भाग लिया था जिसमें फरेद्रेग शिगोवोकी, स्वर्गीय निर्मला देशपांडे, महामहिमप्रतिभा पाटिल जैसी हस्तियों ने गांधी जी पर अपने विचार बांटे थे. इन तीन दिनों में गांधी जी को जानने और समझाने का भरपूर मौका मिला था और गांधीजी के काफी अनछुए पहलू भी जानने का मौका मिला, मगर ऐसा न कहीं पढ़ा और न सुना. फिर पता नहीं किस तरह से और कहाँ से जेड एडम्स ने ये सब जुटाया है.क्या यह खिलवाड़ नहीं हमारे आदर्शों पर. हम गांधी जी के सपनों का भारत कितना तैयार कर पाएं हैं यह अलग से चिंता और चिंतन का विषय है मगर क्या राष्ट्रपिता पर इस तरह कोई कलम चलाये,हमें स्वीकार करना चाहिए?

फ़िलहाल तो यह पुस्तक भारत में नहीं आई है, अगर यहाँ पहुंचती है तो क्या छवि प्रस्तुत होगी ?

ऐसी दुष्प्रवृत्तियों का आप सब अपने अपने स्तर पर विरोध करें. पश्चिमी देश के लोग शायद यह भूल गए हैं कि यह गुलाम भारत नहीं अपितु एक तेजी से बढ़ रहा अमनपरस्त मुल्क है और यह सब अब सहन नहीं होगा .

(जिस अखबार में यह छपा है उसका लिंक गाँधी : नेक्ड एम्बिशन )

जितेन्द्र कुमार सोनी
प्रवक्ता - राजनीति विज्ञान

सोमवार, 3 मई 2010

युवाओं से...


आकाश में उड़ान लेते वक्त
तेरे मजबूत कंधे पर
आकाश भार ले
तू कल का भविष्य
देश का वर्तमान आधार
कर्तबगार........

तू परिवर्तनशील समाज दायरे का
मध्यबिंदु
तू क्रांति के सपनों का
साध्यबिंदु....

तेरे रग-रग में बहती खून की
गरमी
तेरे रोम-रोम में जवानी जोशीली
सहमी-सहमी....

तुझे असत्यं का पर्दाफाश करना है
सत्यम शिवम् सुंदरम से
तुझे भ्रष्टाचार का तम मिटाना हैं
क्रांति की मशाल से.......
अब तुझे से ही आशा है
तुझे देश की धारा में बहना है !!

मीना खोंड, हैदराबाद

शनिवार, 1 मई 2010

मजदूर (विश्व मजदूर दिवस पर)


जब भी देखता हूँ


किसी महल या मंदिर को


ढूँढने लगता हूँ अनायास ही


उसको बनाने वाले का नाम


पुरातत्व विभाग के बोर्ड को


बारीकी से पढ़ता हूँ


टूरिस्टों की तीमारदारी कर रहे


गाइड से पूछता हूँ


आस-पास के लोगों से भी पूछता हूँ


शायद कोई सुराग मिले


पर हमेशा ही मिला


उन शासकों का नाम


जिनके काल में निर्माण हुआ


लेकिन कभी नहीं मिला


उस मजदूर का नाम


जिसने खड़ी की थी


उस मंदिर या महल की नींव


जिसने शासकों की बेगारी कर


इतना भव्य रूप दिया


जिसकी न जाने कितनी पीढ़ियाँ


ऐसे ही जुटी रहीं महल व मंदिर बनाने में


लेकिन मेरा संघर्ष जारी है


किसी ऐसे मंदिर या महल की तलाश में


जिस पर लिखा हो


उस मजदूर का नाम


जिसने दी उसे इतनी भव्यता !!



कृष्ण कुमार यादव/ KK Yadav

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

'युवा-मन' के साथ-साथ 'ताका-झाँकी ब्लॉग' पर भी लिखें..


युवा-मन के साथ-साथ अब आप ताका-झाँकी blog पर भी लिख सकते हैं.कुछ अपरिहार्य कारणों से युवा-मन ब्लॉग को हमने बंद करने की घोषणा की थी, पर तमाम सदस्यों के एतराज पर विचार और भावनात्मक सम्बन्ध के चलते यह पूर्व की भाँति यथावत अपनी रचनाओं से आप सभी को सम्मोहित करता रहेगा.आपकी रचनाओं और अभिव्यक्तियों का स्वागत है. हमसे जुड़ने और सदस्य बनने के लिए amitky86@rediffmail पर संपर्क करें !!

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

सदन के हंगामे को देख खिन्‍न हुए बच्‍चे

यह उन बड़ों [नेताओं] के लिए बच्चों की चेतावनी है, जो हंगामा करते हैं। बच्चे अपने राज में उन्हें खारिज कर देंगे। जिस बच्चे को अपनी प्रतीकात्मक विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभानी है, उसका मानना है कि हंगामा तो एक मायने में गड़बड़ियों का संरक्षण है। बच्चों को हंगामा पसंद नहीं है। वे हर स्तर पर बेहद अनुशासन चाहते हैं।

बिहार विधानसभा की दर्शक दीर्घा में मंगलवार को समानातर लोकतात्रिक संसदीय व्यवस्था के किरदार भी बैठे थे। विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मंत्री से लेकर नेता प्रतिपक्ष तक। नीचे वेल में बड़ों के हंगामे, उसकी वजह-यानी सभी सब कुछ देख रहे थे। बच्चे जोरदार नारे की हर नई आवाज पर बुरी तरह चौंकते थे। चेहरे पर इकट्ठे ऐसे भाव, मानों कह रहे हों-राम-राम, ये बड़े लोग कर क्या रहे हैं; क्यों ऐसी नौबत आने दी गई? बच्चे, बड़ों के मुतल्लिक बड़ी ही खराब धारणा लेकर लौटे। कहने को ये बाल संसद के चुनिंदे प्रतिभागी थे मगर उनकी बातें .! खुद सुनिए। मुख्यमंत्री आर्या मिश्रा बोल रही हैं-मैं ऐसी स्थिति ही नहीं आने दूंगी। जब ऐसे किसी मसले की गुंजाइश न रहेगी, तो फिर किसी को कुछ बोलने का मौका नहीं मिलेगा। आर्या, मिलर हाईस्कूल में 9वीं कक्षा की छात्रा है मगर उसे व्यवस्था, तंत्र की बखूबी जानकारी है। बोली-कानून व व्यवस्थाओं की कमी नहीं है, संकट उनके अनुपालन का है। मैं डिलीवरी सिस्टम पर पूरा ध्यान दूंगी।

मुख्यमंत्री जी विपक्ष के हंगामे पर बिफर पड़ीं। उनको तो पता भी न चला कि आज आखिर मुद्दा क्या है? कहा-ये कोई तरीका है? समय की बर्बादी है। जनता की गाढ़ी कमाई को बेकार करने की बात है। विपक्ष सरकार का अभिन्न अंग है। उसे अपनी यह भूमिका नहीं भूलनी चाहिये। सदन का मूल मकसद है-जनता के अरमानों का वाहक बनना। इस कदर हंगामे में यह उद्देश्य पूरा होगा? संयोग से आर्या जी को बड़ा ही सकारात्मक नेता प्रतिपक्ष मिला है। जनाब का नाम कासिफ नजीर है। बोले-मैं अपने लोगों [विपक्षी सदस्यों] को कभी भी इस भूमिका में आने न दूंगा। ऐसे समस्या का समाधान थोड़े ही होगा? बातचीत हर मसले का हल है। तथ्य या सबूत के आगे किसी का भी जोर नहीं चल सकता है। हम तथ्यपरक मसले उठाएंगे। इसी के बूते सरकार को घेरेंगे। सरकार कैसे अपने कारनामे छुपा लेगी? हंगामा तो एक मायने में गड़बड़ियों का संरक्षण है। क्रिया-प्रतिक्रिया में आरोपी के संरक्षित रहने का भी खतरा होता है। पीएन एंग्लो हाईस्कूल के 11वीं का यह छात्र विरोध के गाधीवादी तरीके में हाईस्कूल के 11वीं का यह छात्र विरोध के गाधीवादी तरीके में ज्यादा भरोसा रखता है। फिर हम अध्यक्ष जी के पास थे। ये हैं उच्जवल कुमार। उनका दावा है-मैं गार्जियन की भूमिका में रहूंगा। जब दोनों पक्षों का समान उद्देश्य है, तो फिर तकरार की बात कहा से आती है? मंत्रियों तथा विपक्ष के अन्य सदस्यों की भी कमोवेश यही राय। बहरहाल, बच्चे 6 मार्च को अपने राजकाज के गुणों से बड़ों को अवगत करायेंगे। इस दिन विधानसभा एनेक्सी में उनकी संसद बैठेगी।
साभार : जागरण

आकांक्षा यादव

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

महिलाओं ने बदला पानपाट

घूंघट में रहने वाली महिलाओं ने देवास जिले के कन्नौद ब्लाक के गाँव ‘पानपाट’ की तस्वीर ही बदल दी है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया है कि – कमजोर व अबला समझी जाने वाली महिलाएं यदि ठान लें तो कुछ भी कर सकती हैं। उन्हीं के अथक परिश्रम का परिणाम है कि आज पानपाट का मनोवैज्ञानिक, आर्थिक व सामाजिक स्वरुप ही बदल गया है। जो अन्य गाँवो के लिए प्रेरणादायक साबित हो रहा है।

पानपाट गाँव का 35 वर्षीय युवक ऊदल कभी अपने गांव के पानी संकट को भुला नहीं पाएगा। पानी की कमी के चलते गांव वाले दो-दो, तीन-तीन किमी दूर से बैलगाड़ियों पर ड्रम बांध कर लाते हैं। एक दिन ड्रम उतारते समय पानी से भरा लोहे का (200 लीटर वाला) ड्रम उसके पैर पर गिर गया और उसका दाहिना पैर काटना पड़ा। ऊदल अपाहिज हो गया। हर साल गर्मियों में गांव का पानी संकट उसके जख्म हरे कर जाता। मध्यप्रदेश के अन्य कई गांवों की तरह यह गांव भी आजादी के पहले से ही पानी का संकट साल दर साल भोगने को अभिशप्त है। यहां सरकारी भाषा में कहें तो डार्क जोन (यानी जलस्तर बहुत नीचे) है, हर साल गर्मियों में परिवहन से यहां पानी भेजा जाता है। ताकि यहां के लोग और मवेशी जिन्दा रह सकें। औरतें दो-दो तीन-तीन किमी दूर से सिर पर घड़े उठाकर लाती है। जिन घरों में बैलगाड़ियां हैं, वहाँ एक जोड़ी बैल हर साल गर्मियों में ड्रम खींच-खींचकर ‘डोबा’ (बिना काम का, थका हुआ बैल) हो जाते है। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं। नेता और अफसर भी पानी की जगह आश्वासन पिलाकर चले जाते पर समस्या जस की तस बनी रही।

इस समस्या का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता था औरतों को। आखिर वे ही तो परिवार की रीढ़ हैं। आखिर एक दिन वे खुद उठीं और बदलने चल दीं अपने गांव की किस्मत को गांव के तमाम मर्दों ने उनकी हंसी उड़ाई ‘आखर जो काम सरकार इत्ता साल में नी करी सकी उके ई घाघरा पल्टन करने चली है’ पर साल भर से भी कम समय में ही वे लोग दांतो तले उंगली दबा रहें हैं। इस कथित घाघरा पल्टन ने ही उनके गांव की दशा और दिशा बदल दी है। यह कोई कपोल कल्पित कहानी या अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि हकीकत है। देवास जिले के कन्नौद ब्लॉक के गांव पानपाट की।

इन औरतों के बीच काम करने पहुंची स्वंयसेवी संस्था ‘विभावरी’ ने उनमें वो आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति पैदा की कि सदियों से पर्दानशीन मानी जाने वाली ये बंजारा औरतें दहलीजों से निकलकर गेती-फावड़ा उठाकर तालाब खोदने में जुट गईं। दो महीनें मे ही तैयार हो गया इनका तालाब। जैसे-जैसे तालाब का आकार बढ़ता गया इनका उत्साह और हौंसला बढ़ता गया। उन्हें खुशी है कि अब इस गांव में पानी के लिए कोई अपाहिज नहीं होगा और कोई बहन-बेटी पानी के लिए भटकेगी नहीं। सत्तर वर्षीय दादी रेशमीबाई खुद आगे बढ़ीं और फिर तो देखते ही देखते पूरे गांव की औरतें पानी की बात पर एकजुट हो गईं। उन्होंने पानी रोकने की तकनीकें सीखी, समझी और गुनी। पठारी क्षेत्र और नीचे काली चट्टान होने से पानी रोकना या भूजल स्तर बढ़ाना इतना आसान नहीं था। पर ‘पर जहां चाह-वहा राह’ की तर्ज पर विभावरी को राजीव गांधी जलग्रहण मिशन से सहायता मिली।

बात पड़ोसी गांव तक भी पहुंची और वहां की औरतें भी उत्साहित हो उठीं- इस बीमारी की जड़सली (दवाई) पाने के लिए। यहां से शुरुआत हुई पानी आंदोलन की। अनपढ़ और गंवई समझी जाने वाली इन औरतों ने पड़ोसी गांवों की औरतों का दर्द भी समझा। गांव का पानी गांव में ही रोकने के गुर सीखाने निकलीं ये औरतें। बैसाख की तेज गर्मी, चरख धूप और शरीर से चूते पसीने की फिक्र से दूर। नाम दिया जलयात्रा। 20 से 25 मई 2001 तक यह जलयात्रा भाटबड़ली, झिरन्या, टिपरास, नरायणपुरा, निमनपुर, गोला, बांई, जगवाड़, फतहुर जैसे गांवो से गुजरी उद्देश्य यही था कि-जो मंत्र उन्होंने अपनाया वह दूसरे गांव के लोग भी करें।

जलयात्रा के बाद तो इस क्षेत्र में पानी आंदोलन एक सशक्त जन आन्दोलन की तरह उभरा अब तो मर्दों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर चलना तय कर लिया। आज क्षेत्र में सेकड़ों जल संरचनाएं दिखाई देती हैं। इससे भविष्य में यह क्षेत्र पानी की जद्दोजहद से दो-चार नहीं होगा। पानी को लेकर शुरु हुआ यह आंदोलन अब पानी से आगे बढ़कर क्षेत्र की समाजार्थिक स्थिति में बदलाव जैसे मुद्दों को भी छू रहा है क्षेत्र में सफाई, स्वास्थ्य, कुरीतियों से निपटने, शिक्षा, पंचायती संस्थाओं में भागीदारी, छोटी बचत व स्वरोजगार से अपनी व पारिवारिक आमदनी बढ़ाने जैसे मुद्दे भी इन औरतों के एजेंडो में शामिल हैं।

पिछले एक साल में यहां इन्होंने तालाब, निजी खेतों में तलईयां, गेबियन स्ट्रक्चर, मैशनरी चेकडेम, लूज बोल्डर श्रृंखलाबद्ध चेकडेम व मेड़बंदी जैसी कई संरचनाएं बनाई हैं। पर इससे महत्वपूर्ण देखने वाली बात यह कि – यहां के समाज में इन सबसे एक विशेष प्रकार का विश्वास और जागरुकता आई। अब ये लोग अपने अधिकारों को लेने के लिए लड़ना सीख गए हैं। ये अब नेताओं और अफसरों के सामने घिघियाते नहीं हैं, बल्कि नजर उठाकर नम्रता के साथ बात करते हैं।

नारायणपुरा में 5वीं कक्षा पास शारदा बाई गांव की ही ड्राप ऑउट 12 बालिकाओं को पढ़ा रही है। इन गांवो में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। निस्तारी पानी के लिए 56 सोख्ता गडढ़े व लगभग दो दर्जन घूड़ों में नाडेप तरीके से खाद बनाई जा रही है। क्षेत्र के युवकों को रोजगारमूलक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है तथा किशोरों, औरतों के लिए लायब्रेरी बनाई गई है। क्षेत्र में लगातार स्वास्थ्य फॉलोअप शिविर लग रहे हैं। इन गांवो के लगभग ढ़ाई सौ साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि खुद यहां कि औरतों ने यहां की तस्वीर बदल दी है। इन गांवो में मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व आर्थिक बदलाव को आसानी से देखा, समझा जा सकता है। ‘विभावरी’ के सुनील चतूर्वेदी इस पूरे आंदोलन से खासे उत्साहित हैं। वे कहते हैं “एक अनजान धरती पर नकारात्मक माहौल में काम करना आसान नहीं था। व्यवस्था के प्रति पुराना अविश्वास और नेताओं के आश्वासन ने यहां के ग्रामीणों को निराश कर दिया था। पर क्षेत्र की महिलाओं ने हमारे काम को आगे बढ़ाया”। क्षेत्र की औरतों के बीच जुनूनी आत्मविश्वास जगाने वाली विभावरी की एक दुबली-पतली लड़की को देख कर सहसा विश्वास नहीं होता कि यह वह लड़की है जिसने इन औरतों की जिन्दगी के मायने बदल दिये। सोनल कहती हैं। “गांव में तालाब निर्माण काकाम ही सामाजिक समरूपता का माध्यम बना। मैंने इसमें कुछ भी नहीं किया मैंने तो सिर्फ उन्हें अपनी ताकत का अहसास कराया।

झिरन्या के बाबूलाल कहते हैं हम तो इन्हें भी रुपया खाने वाले सरकारी आदमी समझते थे पर इन्होंने तो हमारी सात पुश्तें (पीढ़ियां) तारने जैसे काम कर दिया। काली बाई बताती हैं कि अब उनके काम को सामाजिक मान्यता मिल गई है। देवास, इन्दौर भोपाल तक के लोग उनके काम को देखने व बात करने आ रहे हैं। इससे बड़ी खुशी की बात हमारे लिए क्या हो सकती है?

लेखक: मनीष वैद्य

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी की और से एक अपील

साथी,
पत्रकार बंधुओं,

देश में नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद के नाम पर चल रहे सरकारी दमन के बीच मीडिया और आप सभी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सत्ता जब मीडिया को अपना हथियार व पुलिस पत्रकारों को अपने बंदूक की गोली की भूमिका में इस्तेमाल करे तो ऐसे समय में हमे ज्यादा सर्तक रहने की जरूरत है। पुलिस की ही तरह हमारे कलम से निकलने वाली गोली से भी एक निर्दोष के मारे जाने की भी उतनी ही सम्भावना होती है, जितनी की एक अपराधी की। हमें यहां यह बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं क्योंकि नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद जैसे मुददों पर रिपोर्टिंग करते समय हमारे ज्यादातर पत्रकार साथी न केवल पुलिस के प्रवक्ता नजर आते हैं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा वह उन पत्रकारीय मूल्यों को भी ताक पर रख देते हैं, जिसके बल पर उनकी विश्वसनियता बनी है।

हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हाल ही में इलाहाबाद में पत्रकार सीमा आजाद व कुछ अन्य लोगों की गिरफ़्तारी के बाद भी मीडिया व पत्रकारों का यही रूख देखने को मिला। सीमा आजाद इलाहाबाद में करीब 12 सालों से एक पत्रकार, सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता के बतौर सक्रिय रही हैं। इलाहाबाद में कोई भी सामाजिक व्यक्ति या पत्रकार उन्हें आसानी से पहचानता होगा। कुछ नहीं तो वैचारिक-साहित्यिक सेमिनार/गोष्ठियां कवर करने वाले पत्रकार उन्हें बखूबी जानते होंगे। लेकिन आश्चर्य की बात है कि जब पुलिस ने उन्हीं सीमा आजाद को माओवादी बताया तो किसी पत्रकार ने आगे बढ़कर इस पर सवाल नहीं उठाया। आखिर क्यो? क्यों अपने ही बीच के एक व्यक्ति या महिला को पुलिस के नक्सली/माओवादी बताए जाने पर हम मौन रहे? पत्रकार के तौर पर हम एक स्वाभाविक सा सवाल क्यों नहीं पूछ सके कि किस आधार पर एक पत्रकार को नक्सली/माओवादी बताया जा रहा है? क्या कुछ किताबें या किसी के बयान के आधार पर किसी को राष्ट्रद्रोही करार दिया जा सकता है? और अगर पुलिस ऐसा करती है तो एक सजग पत्रकार के बतौर क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?

पत्रकार साथियों को ध्यान हो, तो यह अक्सर देखा जाता है कि किसी गैर नक्सली/माओवादी की गिरफ्तारी दिखाते समय पुलिस एक रटा-रटाया सा आरोप उन पर लगाती है। मसलन यह फलां क्षेत्र में फलां संगठन की जमीन तैयार कर रहा था/रही थी, या कि वह इस संगठन का वैचारिक लीडर था/थी, या कि उसके पास से बड़ी मात्रा में नक्सली/माओवादी साहित्य (मानो वह कोई गोला बारूद हो) बरामद हुआ है। आखिर पुलिस को इस भाषा में बात करने की जरूरत क्यों महसूस होती है? क्या पुलिस के ऐसे आरोप किसी गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं? किसी राजनैतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना या किसी खास राजनैतिक विचारधारा (भले ही वो नक्सली/माओवादी ही क्यों न हो) से प्रेरित साहित्य पढ़ना कोई अपराध है? अगर नहीं तो पुलिस द्वारा ऐसे आरोप लगाते समय हम चुप क्यों रहते हैं? क्यों हम वही लिखते हैं,जो पुलिस या उसके प्रतिनिधि बताते हैं। यहां तक की पुलिस किसी को नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी बताती है और हम उसके आगे ‘कथित’ लगाने की जरूरत भी महसूस नहीं करते। क्यों ?

हम जानते हैं कि हमारे वो पत्रकार साथी जो किसी खास दुराग्रह या पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होते, वह भी खबरें लिखते समय ऐसी ‘भूल’ कर जाते हैं। शायद उन्हें ऐसी ‘भूल’ के परिणाम का अंदाजा न हो। उन्हें नहीं मालूम की ऐसी 'भूल' किसी की जिंदगी और सत्ता-पुलिसतंत्र की क्रूरता की गति को तय करते हैं।
जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) सभी पत्रकार बंधुओं से अपील करती हैं कि नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग करते समय कुछ मूलभूत बातों का ध्यान अवश्य रखें.

* साथियों, नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद तीनों अलग-अलग विचार हैं। नक्सलवाद/माओवाद राजनैतिक विचारधाराएं हैं तो आतंकवाद किसी खास समय, काल व परिस्थियों से उपजे असंतोष का परिणाम है। यह कई बार हिंसक व विवेकहीन कार्रवाई होती है जो जन समुदाय को भयाक्रांत करती है. इन सभी घटनाओं को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। नक्सलवादी/माओवादी विचारधारा का समर्थक होना कहीं से भी अपराध नहीं है। इस विचारधारा को मानने वाले कुछ संगठन खुले रूप में आंदोलन चलाते हैं और चुनाव लड़ते हैं तो कुछ भूमिगत रूप से संघर्ष में विश्वाश करते हैं। कुछ भूमिगत नक्सलवादी/माओवादी संगठनों को सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा है। लेकिन यहीं यह ध्यान रखने योग्य बात है कि इन संगठनों की विचारधारा को मानने पर कोई मनाही नहीं है। इसीलिए पुलिस किसी को नक्सलवादी/माओवादी विचारधारा का समर्थक बताकर गिरफ्तार नहीं कर सकती है, जैसा की पुलिस अक्सर करती है.। हमें विचारधारा व संगठन के अंतर को समझना होगा।

* इसी प्रकार पुलिस जब यह कहती है कि उसने नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य (कई बार धार्मिक साहित्य को भी इसमें शामिल कर लिया जाता है) पकड़ा है तो उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिये कि आखिर कौन-कौन सी किताबें इसमें शामिल हैं। मित्रों, लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी खास तरह की विचारधारा से प्रेरित होकर लिखी गई किताबें रखना/पढ़ना कोई अपराध नहीं है। पुलिस द्वारा अक्सर ऐसी बरामदगियों में कार्ल मार्क्स/लेनिन/माओत्से तुंग/स्टेलिन/भगत सिंह/चेग्वेरा/फिदेल कास्त्रो/चारू मजूमदार/किसी संगठन के राजनैतिक कार्यक्रम या धार्मिक पुस्तकें शामिल होती हैं। ऐसे समय में पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि कालेजों/विश्वविद्यलयों में पढ़ाई जा रही इन राजनैतिक विचारकों की किताबें भी नक्सली/माओवादी/आतंकी साहित्य हैं? क्या उसको पढ़ाने वाला शिक्षक/प्रोफेसर या पढ़ने वाले बच्चे भी नक्सली/माओवादी/आतंकी हैं? पुलिस से यह भी पूछा जाना चाहिए कि प्रतिबंधित साहित्य का क्राइटेरिया क्या है, या कौन सा वह मीटर/मापक है जिससे पुलिस यह तय करती है कि यह नक्सली/माओवादी/आतंकी साहित्य है।

यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है की अक्सर देखा जाता है की पुलिस जब कोई हथियार, गोला-बारूद बरामद करती है तो मीडिया के सामने खुले रूप में (कई बार बड़े करीने से सजा कर) पेश की जाती है, लेकिन वही पुलिस जब नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य बरामद करती है तो उसे सीलबंद लिफाफों में पेश करती है. इन लिफाफों में क्या है हमें नहीं पता होता है लेकिन हमारे सामने इसके लिए कुछ 'अपराधी' हमारे सामने होते हैं. आप पुलिस से यह भी मांग करे कीबरामद नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी साहित्य को खुले रूप में सार्वजनिक किया जाए.

* मित्रों, नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तारियों के पीछे किसी खास क्षेत्र में चल रहे राजनैतिक/सामाजिक व लोकतांत्रिक आन्दोलनों को तोड़ने/दबाने या किसी खास समुदाय को आतंकित करने जैसे राजनैतिक लोभ छिपे होते हैं। ऐसे समय में यह हमें तय करना होता है कि हम किसके साथ खड़े होंगे। सत्ता की क्रूर राजनीति का सहभागी बनेंगे या न्यूनतम जरूरतों के लिए चल रहे जनआंदोलनों के साथ चलेंगे।

* हम उन तमाम संपादकों/स्थानीय संपादकों/मुख्य संवाददातों से भी अपील करते हैं , की वह अपने क्षेत्र में नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी अपराध संवाददाता (क्राइम रिपोर्टर) को न दें. यहाँ ऐसा सुझाव देने के पीछे इन संवाददाताओं की भूमिका को कमतर करके आंकना हमारा कत्तई उद्देश्य नहीं है. हम केवल इतना कहना चाहते हैं की यह संवाददाता रोजाना चोर, उच्चकों, डकैतों और अपराधों की रिपोर्टिंग करते-करते अपने दिमाग में खबरों को लिखने का एक खांचा तैयार कर लेते हैं और सारी घटनाओं की रिपोर्ट तयशुदा खांचे में रहकर लिखते है. नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग हम तभी सही कर सकते हैं जब हम इस तयशुदा खांचे से बहार आयेगे. नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद कोई महज आपराधिक घटनाएँ नहीं है, यह शुद्ध रूप से राजनैतिक मामला है.

* हमे पुलिस द्वारा किसी पर भी नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी होने के लगाए जा रहे आरोपों के सत्यता की पुख्ता जांच करनी चाहिये। पुलिस से उन आरोपों के संबंध में ठोस सबूत मांगे जाने चाहिये। पुलिस से ऐसे कथित नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी के पकड़े जाने के आधार की जानकारी जरूर लें।

* हमें पुलिस के सुबूत के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी सत्यता की जांच करने की कोशिश करना चाहिये। मसलन अभियुक्त के परिजनों से बातचीत करना चाहिये। परिजनों से बातचीत करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस के आरोपों के बाद ही हम उस व्यक्ति को अपराधी मान बैठते हैं और उसके बाद उसके परिजनों से भी ऐसे सवाल पूछते हैं जो हमारी स्टोरी व पुलिस के दावों को सत्य सिद्ध करने के लिए जरूरी हों। ऐसे समय में हमें अपने पूर्वाग्रह को कुछ समय के लिए किनारे रखकर, परिजनों के दर्द को सुनने/समझने की कोशिश करनी चाहिए। शायद वहां से कोई नयी जानकारी निकल कर आए जो पुलिस के आरोपों को फर्जी सिद्ध करे।

* मित्रों, कोई भी अभियुक्त तब तक अपराधी नहीं है, जब तक कि उस पर लगे आरोप किसी सक्षम न्यायालय में सिद्ध नहीं हो जाते या न्यायालय उसे दोषी नहीं करार देती। हमें केवल पुलिस के नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी बताने के आधार पर ही इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे शब्द लिखते समय ‘कथित’ या ‘पुलिस के अनुसार’ जरूर लिखना चाहिये। अपनी तरफ से कोई जस्टिफिकेशन नहीं देना चाहिये।

बंधुओं,

यहां इस तरह के सुझाव देने के पीछे हमारा यह कत्तई उद्देश्य नहीं है कि आप किसी नक्सलवादी/माओवादी/आतंकवादी का साथ दें। हम यहां कोई ज्ञान भी नहीं देना चाहते। हमारा उद्देश्य केवल इतना सा है कि ऐसे मसलों की रिपोर्टिंग करते समय हम जाने/अनजाने में सरकारी प्रवक्ता या उनका हथियार न बन जाए। ऐसे में जब हम खुद को लोकतंत्र का चौथा-खम्भा या वाच डाग कहते हैं तो जिम्मेदारी व सजगता की मांग और ज्यादा बढ़ जाती है। जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) आपको केवल इसी जिम्मेदारी का एहसास करना चाहती है।

उम्मीद है कि आपकी लेखनी शोषित/उत्पीड़ित समाज की मुखर अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकेगी !!


- निवेदक
आपके साथी,

विजय प्रताप, राजीव यादव, अवनीश राय, ऋषि कुमार सिंह, चन्द्रिका, शाहनवाज आलम, अनिल, लक्ष्मण प्रसाद, अरूण उरांव, देवाशीष प्रसून, दिलीप, शालिनी वाजपेयी, पंकज उपाध्याय, विवेक मिश्रा, तारिक शफीक, विनय जायसवाल, सौम्या झा, नवीन कुमार सिंह, प्रबुद़ध गौतम, पूर्णिमा उरांव, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, अर्चना मेहतो, राकेश कुमार।

जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) की ओर से जनहित में जारी
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भवदीय
अवनीश कुमार राय
दिल्ली
9910638355

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

प्यार का महीना : फरवरी

क्या आप जानते हैं कि फरवरी महीना प्यार को समर्पित है। ’रोज डे’ से शुरू ’मिसिंग डे’ पर खत्म और बीच में मनभावन 'वैलेंटाइन डे'। वस्तुत : फरवरी में दिवस मनाने की शुरूआत सात तारीख से ही हो जाती है जब ’रोज डे’ :गुलाब दिवस: पड़ता है। इससे आगे 20 फरवरी तक दिवस आयोजन की भरमार होती है।किसी को प्रपोज करने के लिए आठ फरवरी को ’प्रपोज डे’ पड़ता है तो नौ फरवरी को चॉकलेट डे पड़ता है। 10 फरवरी जहां ’टेडी डे’ कहलाती है वहीं 11 फरवरी का दिन किसी से वायदा करने या किसी से वायदा कराने का दिन यानी कि ’प्रॉमिस डे’ कहलाता है।दिवसों की यह सूची यहीं समाप्त नहीं हो जाती। 'प्रामिस डे’ के बाद बारी आती है ’किस डे’ की जो 12 फरवरी को पड़ता है। 13 फरवरी हो ’हग डे’ होता है तो 14 फरवरी को युवाओं के दिलों की धड़कन कहा जाने वाला ’वैलेंटाइन डे’ पड़ता है।

वैलेंटाइन डे जहां प्यार की पींगें बढ़ाने का दिन है वहीं इसके एक दिन बाद यानी कि 15 फरवरी को ’थप्पड़’ मारने का दिन ’स्लैप डे’ होता है।बात यहां से आगे बढ़कर 20 फरवरी तक पहुंच जाती है जब किसी को याद करने के लिए ’मिसिंग डे’ मनाया जाता है।वास्तव में फरवरी माह युवाओं के लिए सबसे पसंदीदा महीना होता है। यह न सिर्फ उन्हें ’वैलेंटाइन डे’ पर प्यार के इजहार का मौका देता है बल्कि इसके अतिरिक्त भी कई और दिवस आयोजनों का मौका प्रदान करता है। तो आप भी इस माह वसंत की बगिया में प्यार की बौछार करते रहें...!!

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

कुँवारी किरणें (वेलेंटाइन दिवस पर विशेष)

कुँवारी किरणें
सद्यःस्नात सी लगती हैं
हर रोज सूरज की किरणें।
खिड़कियों के झरोखों से
चुपके से अन्दर आकर
छा जाती हैं पूरे शरीर पर
अठखेलियाँ करते हुये।
आगोश में भर शरीर को
दिखाती हैं अपनी अल्हड़ता के जलवे
और मजबूर कर देती हैं
अंगड़ाईयाँ लेने के लिए
मानो सज धज कर
तैयार बैठी हों
अपना कौमार्यपन लुटाने के लिए।

कृष्ण कुमार यादव