शुक्रवार, 18 नवंबर 2011
मौलिक बचपन
बधाइयों का ताता
करीब में ही खड़े थे पाँच वर्षीया
अंकुर के दादी दादा
यानि मेरे माता पिता
उपहारों को अंकुर थैंकू के साथ पकडाता
उन्हें अहिस्ता से किनारे रखता
अंत में एक बड़े उपहार की
आशा में बेचैन
मुखातिब थे मेरी ओर उसके नैन
सोच रहा था पापा इस बार अवश्य ही
करेंगे गिफ्ट कुछ खास
जिसकी रही है उसे
पिछले कई दिनों से आस
मैंने इस बार अंकुर के लिए
समय के साथ चलते हुए एक बड़ा सा
टेडी बियर पैक कराया था
सोचा था इसे देख अंकुर
ख़ुशी से झूम उठेगा
उसकी आतुरता और उत्सुकता को
और न बढ़ाते हुए मैंने तत्परता से
अपने पापा के साथ मिलकर
उसे वह पैकेट थमाया
बेचैन अंकुर ने उसे बिना देर किये
जिग्यसवास तुरन्त ही खुलवाया
ह्वाट इस दिस
इस इट द गिफ्ट फार ह्वीच
आई वाज सो एगरली वेटिंग
रियली पापा टू सी इट आई एम्
बीइंग सो डिसअप्वैन्टिंग
मै तो सोच रहा था कि अन्दर
मिनी लैपटॉप या इपोट जैसे
इलेक्ट्रोनिक इटेम होगे
आखिर पापा अप कब मैच्योर होगे
हतप्रभ मै
उसकी बात सुन रहा था
समय से पूर्व उसकी मच्योरिटी पर
मै दंग हो रहा था
डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत का
सतत निरूपण मै देख रहा था
एक फल सीधे बिना फूल बने ही
फल में रूपांतरित हो रहा है
कैसा होगा भविष्य ऐसे फलो का
उसमे वांछित सद्गुणों का
बेशक मेहमानों ने उसकी बात को
हसी में टाल दिया था
वह भी नाराज होकर
अपने कमरे में चला गया था
मेरे माँ बापू ने उसे मनाने हेतु
उसके कमरे की ओर
उसका अनुगमन किया था
इस घटना को नजरंदाज कर
भार्या ने मेहमानों की ओर
अपना रुख किया
इस अनायास अप्रत्याशित आक्रमण से
आक्रांत और आंदोलित मै
घटना के विश्लेषण में लग गया
आज के बच्चे
कितनी तेजी से युवा बनने को
बेचैन दिख रहे है
समय से पूर्व तेजी से मच्योर होकर
क्या अपना मौलिक बचपन
नहीं खो रहे है
माँ के लोरियों की ताकत से अंजान
मिकेल जेक्सन के गीतों पर
ही क्यों सो रहे है
पर सच्चाई यह है कि
जिस बचपन को हमने पूरी सिद्दत से
खेत खालिहोनो से लेकर
गलियों और स्कूलों में भरपूर है जिया
उसे आज का बच्चा है खो रहा
लग रहा था कि समय का चक्र
अपनी निर्धारित गति से काफी
तीव्रतर हो गया है
ऐसा क्यों लग रहा है कि
एक बीज अंकुरित होते ही सीधे
वृक्ष बनाने को व्यग्र दीख रहा है
अगर बन भी गया तो क्या
वह मानसिक और शारीरिक रूप से
इतना सबल होगा कि
अपनी तमाम जिम्मेदारियों को
उठाने में सक्षम होगा
पता नहीं क्यों मुझे तो
बस यही लग रहा था कि
आज का युवा जो अपनी पारिवारिक
और सामाजिक जिम्मेदारियों से
दूर भाग रहा है
वृद्ध आश्रमों कि कल्पना को
साकार कर रहा है
कही वह ऐसे ही कच्चे विकास का
परिणाम तो नहीं है
पूरे देश में चाचा नेहरु का जम्दीन
आज तो मुझे समझ में आ रहा था
पर आज का बच्चा बड़े साफगोई से
निर्मल और निश्छल बाल दिवस कि
नयी परिभाषा बता रहा था
बुधवार, 16 नवंबर 2011
ब्लागिंग ने दिलाया अक्षिता (पाखी) को 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार'
आज के आधुनिक दौर में बच्चों का सृजनात्मक दायरा बढ़ रहा है. वे न सिर्फ देश के भविष्य हैं, बल्कि हमारे देश के विकास और समृद्धि के संवाहक भी. जीवन के हर क्षेत्र में वे अपनी प्रतिभा का डंका बजा रहे हैं. बेटों के साथ-साथ बेटियाँ भी जीवन की हर ऊँचाइयों को छू रही हैं. ऐसे में वर्ष 1996 से हर वर्ष शिक्षा, संस्कृति, कला, खेल-कूद तथा संगीत आदि के क्षेत्रों में उत्कृष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले बच्चों हेतु हेतु महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' आरम्भ किये गए हैं। चार वर्ष से पन्द्रह वर्ष की आयु-वर्ग के बच्चे इस पुरस्कार को प्राप्त करने के पात्र हैं.
वर्ष 2011 के लिए 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' 14 नवम्बर 2011 को विज्ञानं भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीरथ द्वारा प्रदान किये गए. विभिन्न राज्यों से चयनित कुल 27 बच्चों को ये पुरस्कार दिए गए, जिनमें मात्र 4 साल 8 माह की आयु में सबसे कम उम्र में पुरस्कार प्राप्त कर अक्षिता (पाखी) ने एक कीर्तिमान स्थापित किया. गौरतलब है कि इन 27 प्रतिभाओं में से 13 लडकियाँ चुनी गई हैं।
सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भारतीय डाक सेवा के निदेशक और चर्चित लेखक, साहित्यकार, व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव एवं लेखिका व ब्लागर आकांक्षा यादव की सुपुत्री और पोर्टब्लेयर में कारमेल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में के. जी.- प्रथम की छात्रा अक्षिता (पाखी) को यह पुरस्कार कला और ब्लागिंग के क्षेत्र में उसकी विलक्षण उपलब्धि के लिए दिया गया है. इस अवसर पर जारी बुक आफ रिकार्ड्स के अनुसार- ''25 मार्च, 2007 को जन्मी अक्षिता में रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है। ड्राइंग, संगीत, यात्रा इत्यादि से सम्बंधित उनकी गतिविधियाँ उनके ब्लाॅग ’पाखी की दुनिया (http://pakhi-akshita.blogspot.com/) पर उपलब्ध हैं, जो 24 जून, 2009 को आरंभ हुआ था। इस पर उन्हें अकल्पनीय प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं। 175 से अधिक ब्लाॅगर इससे जुडे़ हैं। इनके ब्लाॅग 70 देशों के 27000 से अधिक लोगों द्वारा देखे गए हैं। अक्षिता ने नई दिल्ली में अप्रैल, 2011 में हुए अंतर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन में 2010 का ’हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना का सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार’ भी जीता है।इतनी कम उम्र में अक्षिता के एक कलाकार एवं एक ब्लाॅगर के रूप में असाधारण प्रदर्शन ने उन्हें उत्कृष्ट उपलब्धि हेतु 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार, 2011' दिलाया।''इसके तहत अक्षिता को भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीरथ द्वारा 10,000 रूपये नकद राशि, एक मेडल और प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया.
यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया. अक्षिता का ब्लॉग 'पाखी की दुनिया' (www.pakhi-akshita.blogspot.com/) हिंदी के चर्चित ब्लॉग में से है और इस ब्लॉग का सञ्चालन उनके माता-पिता द्वारा किया जाता है, पर इस पर जिस रूप में अक्षिता द्वारा बनाये चित्र, पेंटिंग्स, फोटोग्राफ और अक्षिता की बातों को प्रस्तुत किया जाता है, वह इस ब्लॉग को रोचक बनता है.
नन्हीं बिटिया अक्षिता (पाखी) को इस गौरवमयी उपलब्धि पर ढेरों प्यार और शुभाशीष व बधाइयाँ !!
********************************************
मंत्री जी भी अक्षिता (पाखी) के प्रति अपना प्यार और स्नेह न छुपा सकीं, कुछ चित्रमय झलकियाँ....





शनिवार, 12 नवंबर 2011
स्वागत
शुक्रवार, 11 नवंबर 2011
शायद माँ को मौत ही मिलनी थी
मेरी आंखे चाहते हुए भी नहीं सो रही थी
डॉक्टर के अनुसार माँ की जीवन ज्योति
धीरे धीरे बुझ रही थी
यमदूत के रूप में अजेय कैंसर
मेरी बबासी पर अट्टहास कर रहा था
गौरांग माँ का उन्नत ललाट
क्रमशः स्याह पड़ रहा था
सिरहाने बैठा मै माँ के निस्तेज
होते चेहरे को बुझते निहार रहा था
चाह कर भी कुछ न कर पाने की
झुंझलाहट झेल रहा था
माँ के साथ बीते ममता के एक एक पल को
याद करते हताश मगर एक
चमत्कार की परीक्षा में उस अजेय बीमारी से
माँ के साथ मै भी लड़ रहा था
पिछले कई दिनों से माँ
वर्जित चीजो को ही मांग रही थी
पर माँ के हित में मेरी पत्नी चाह कर भी
उसे नहीं दे रही थी
खिजलाहट में माँ हमें कोसती
हमारे बेबसी पर भी रोती
दवाइयों को खा खा कर ऊब चुकी माँ
उन्हें हमारी नजर बचाकर फेक देती
आज सुबह चढ़ रहे ड्रिप के साथ
वेन्फ्लन को ही नोचते अनजाने में
असमय ही मौत को दावत देने लगी
सहसा मेरी ध्यान उस पर पड़ा
माँ का बाल सुलभ जिद के कारण
कभी ममता के पर्याय उन हाथों को
मुझे कलेजे पर रख पत्थर बाधाना पड़ा
उस व्यथा से बचाने के लिए मै
अपने बचपन में चला गया
बेशक उन हाथों से कभी चाटें भी पड़े थे
पर वह माँ द्वारा लुटाये गए प्यार दुलार
और ममता के आगे कुछ भी नहीं थे
माँ जब भी मेरी शैतानियों से ऊब जाती
थक कर मुझे इसी तरह बांध कर
निश्चिंत हो भोजन बनाती
उस दौरान हमें दुलारती भी रहती
मै रोता रहता पर वह बबुआ बबुआ कह
हमें पुचकारती रहती
जैसे ही कम समाप्त होता
अपनी गोद में भींच आंचल में ढक
मुझे जी भर कर दुलारती
इस प्रकिर्या में उसकी ऑंखें भी भर जाती
सोचता कितना अंतर था
दोनों बन्धनों में
माँ अपने बंधन के उपरांत मुझे
मिठाइयाँ दूध मेवे और मिश्री देकर
जहाँ हमें तृप्त करती
पर अफ़सोस मेरे बंधन के उपरांत तो
शायद माँ को मौत ही मिलनी थी
कल पड़ोस कि सरला अंटी
माँ को देखने आयी थी
माँ ने उनसे मेरी खूब शिकायत की थी
मुझे किनारे लाकर आंटी बोली
बबुआ देखो हम तुम्हरी भावना समझिते
पर एक बात कही बबुआ बुरा जिन मनियों
ऐसे ही हमरी बडकी बहिन रहीं
सब कुछ किया धवा गवा पर
अंत माँ इ जालिम कैंसरवा
उन्हें लेकर ही गवा
एही से हम त कहिबे कि
इनका घर लई चलो
वही मा रही के इनकी सेवा करयो
जऊँ कुछ कहे बढियां बढ़िया होई सके
इनका खीलाव पिलाव
बाकी सब भगवान पर छोड़ देओ
कम से कम सुकून से अपने परिवार में
रही के साँस तो लई सकिहे
एहनत डॉक्टरवा सब सुई कोच कोच
पाहिले ही मुये दीहें
मैं किंकर्तव्य वीमूद्ध
एक अनिर्णय की स्थिति में बना रहा
कभी माँ के साथ बिताये बचपन में खोता
तो कभी माँ को देख अपनी बेबसी पर रोता
सोचता मरना तो सबको है ही एक दिन
काश अभी माँ ठीक हो जाती तो मै
देखने से बच जाता ऐसे दुर्दिन
चाह थी एक बार पुनः माँ के गोद में
सर रख कर सोने की
पूरी रात चंदामामा की लोरियां सुनने की
हाथ बधने के एवज में माँ को खीर पूड़ी खिलाने की
आहा इन हाथों से खिलाये एक एक
निवाले याद आ रहे थे मुझको
जब मैं खाने से भागता वह
थाली लेकर दौड़ती हमको
आज मुझे उन्हें बाधना पड़ा
अतीत की इन मधुर यादों से विचलित हो
आंसू अनवरत आँखों से चल पड़ा
अचानक गो गो की आवाज सुन
मै माँ की और दौड़ा
तब तक माँ मुझे अनाथ छोड़
अपने अनंत यात्रा पर जा चुकी थी
कटे डाल की तरह मैंने धम्म से
जमीन थम ली थी
चाह कर भी माँ की इक्षित चीजे
न खिलाने की मजबूरी दिल में एक
भयंकर टीस दे गयी थी
शांत अपराधबोध से ग्रस्त निराश मैं
माँ के बन्धनों को खोल रहा था
श्रृष्टि पर प्रकृति की विजय को
ध्यान से देख रहा था
अपने आंसुओं से माँ के चेहरे को बुहारता
स्वयं को धिक्कारता
की इतने प्रयास के उपरांत क्यों नहीं
दे पाया वह सब अपनी माँ को
दिया था जिसने इतना वैभवशाली
जीवन मुझको
बुधवार, 9 नवंबर 2011
नन्हीं अक्षिता (पाखी) को ब्लागिंग हेतु राष्ट्रीय बाल पुरस्कार
प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती. तभी तो पाँच वर्षीया नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) को वर्ष 2011 हेतु राष्ट्रीय बाल पुरस्कार (National Child Award) के लिए चयनित किया गया है. सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भारतीय डाक सेवा के निदेशक और चर्चित लेखक, साहित्यकार, व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव एवं लेखिका व ब्लागर आकांक्षा यादव की सुपुत्री अक्षिता को यह पुरस्कार 'कला और ब्लागिंग' (Excellence in the Field of Art and Blogging) के क्षेत्र में शानदार उपलब्धि के लिए बाल दिवस, 14 नवम्बर 2011 को विज्ञानं भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीर्थ जी द्वारा प्रदान किया जायेगा. इसके तहत अक्षिता को 10,000 रूपये नकद राशि, एक मेडल और प्रमाण-पत्र दिया जायेगा.
यह प्रथम अवसर होगा, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया जायेगा. अक्षिता का ब्लॉग 'पाखी की दुनिया' (www.pakhi-akshita.blogspot.com/) हिंदी के चर्चित ब्लॉग में से है. फ़िलहाल अक्षिता पोर्टब्लेयर में कारमेल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में के. जी.- प्रथम की छात्रा हैं और उनके इस ब्लॉग का सञ्चालन उनके माता-पिता द्वारा किया जाता है, पर इस पर जिस रूप में अक्षिता द्वारा बनाये चित्र, पेंटिंग्स, फोटोग्राफ और अक्षिता की बातों को प्रस्तुत किया जाता है, वह इस ब्लॉग को रोचक बनता है.
नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) को इस गौरवमयी उपलब्धि पर अनेकोंनेक शुभकामनायें और बधाइयाँ !!
.
रविवार, 30 अक्टूबर 2011
रचना आमंत्रित
आगामी अंक के लिए सुधि लेखकों के आलेख आमंत्रित है।
रचना मौलिक व अप्रकाशित होनी चाहिए।
अपना आलेख 15 नवम्बर तक निम्न पते पर भेज सकते हैं।
या फिर ई-मेल कीजिए!
-----
सैनिक चेम्बर, जानकी प्लाजा,
जानकीपुरम, लखनउ-21
उत्तर प्रदेश
फोन- 0522-39191100
eyeworldpatrika@gmail.com
शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011
फुलवा
आज फुलवाकुछ ज्यादा ही जोश में
सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
सोमवार, 17 अक्टूबर 2011
दुधमुहाँ

पांचो ब्रह्मण
समवेत स्वर में सस्वर
मधुर महामृतुन्जय मंत्र का
विधिवत जाप कर रहे थे
नब्बे वर्षीया ठाकुर साहेब
निकट बिस्तर पर पड़े थे
अपनी सलामती और लम्बी उम्र
के लिए मन भर दूध से
भगवान शिव का रुद्राभिषेक
करवा रहे थे
श्यामा जिसका पति
एक माह पूर्व ही टी बी से ग्रस्त
होकर पैसे के अभाव में
दुनिया से असमय अपने परिवार को
बिलखता छोड़ कूच कर गया था
पीछे पत्नी श्यामा हाथ में
दो छोटे बच्चे और
गोद में दुधमुंहा की जिम्मेदारी को
अपनी युवा पत्नी पर
छोड़ गया था
तत्काल में पेट भरने का कोई
vikalp नहीं पाकर वह
talab के किनारे दुधमुंहा को
आंचल में छिपाए
भीख मांग रही थी
पर लोगो कि नजर थी कि
रह रह कर भीख देने के बजे
उसके यौवन पर ही जा रही थी
कुछ चवन्नियां उसके विछाये चादर पर
बेशक पड़ी थी
पर वह इस डायन महगाई के
ज़माने में बच्चे के दूध और
भोजन के लिए कही से भी
पर्याप्त नहीं थी
बसंत एक और जहा
भूख से परेशान बिलख रहा था
मुन्ना दूसरी ऑर बेदम लेटा था
वही दुधमुहाँ माँ के छाती में
सर छुपाये दूध के अभाव में
बुक्का फाड़ फाड़ कर
रोये जा रहा था
उधर मन्त्रों की आवाज क्रमशः
तेज होती जा रही थी
खाटी दूध शिवलिंग से होकर
बनाये पनारे के रस्ते गंदगी को समेटे
तालाब में जा रही थी
इधर दुधमुहाँ कीआवाज क्रमशः
कमोजोर होती जा रही थी
जब कोई रास्ता सूझा नहीं उसे तो
बच्चे को ले उस पनारे पर
गयी झट से
जैसे ही पनारे पर अपने
बर्तन को दूध के लिए लगाया
यजमान दूर से भागता हुआ आया
हट साली ये क्या कर रही है
अपने गंदे हाथो से दूध को
क्यों गन्दा कर रही है
हम बाबूजी की लम्बी उम्र के लिए
रुद्राभिषेक करवा रहे है
और तू व्यर्थ में यमराज बन रही है
अचानक श्यामा ने अपने दुधमुहे को
बेजान होते देखा
उसके सर को एक और लुढकते देखा
चिल्लाकर रोना चाही पर
इसमें भी अपने को असफल पाया
हताश जिगर को अपने पत्थर बनाया
थोड़ी देर सिसकने के बाद
अपने यौवन रूपी धन को एक बार
जी भर के देखा
शेष बच्चों की परवरिश कैसे हो
यह सोच कलेजे को कड़ा किया
नितांत एक निजी मगर
एक कठोर निर्णय लिया
तत्काल में इस भद्र समाज को
उसका असली चेहरा दिखने का
फैसला कर लिया
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
झुमकी

बापू बापू
इस बार दशमी के मेला माँ
हमऊ चलब
दुकान में तुम्हरा हाथ बटाईब
अऊर मेला देखब
हाँ पिछली बार तू नैका सूट
दियावे के कहे रहा
पर बिक्री कमजोर रही
अहिसे दिया नहीं पावा
पर असों हम ऊ जरूर लेइब
झुमकी धूप में खिलौना सुखाते सुखाते
ननकू से कह रही थी
अन्दर उसकी माँ बुधिया
उसकी बात ध्यान से सुन रही थी
हाँ हाँ तुम्हों चला जइयो
पर अभई बतियाव कम
कमवा मन से करयो
पिछले मेले से ननकू ने
सीख लिया था
इस बार कई तरह के
मिटटी के खिलौने को बनाया था
बैग को पीठ पर लादे
स्कूल जा रहा बच्चा
जहाँ सर्वा शिक्षा अभियान का
द्योतक लग रहा था
वहीँ बिटिया को गोद में
प्यार से दुलारती माँ की मूर्ति
कन्या भ्रूण हत्या का
विरोध कर रहा था
मंत्री को हथकड़ी लगाये सिपाही
अन्ना के लोकपाल की कथा
बहुतखूब कह रहा था
वही टैंक पर खड़ा सैनिक
शत्रुओं को ललकारता
राष्ट्रप्रेम की सीख दे रहा था
ननकू सोच रहा था
इस बार मेला में तो बस
वही छाया रहेगा
कायदे से जो कमाई होई गयी तो
इस बार खपरैल बदल कर रहेगा
पूरी बरसात को किसी तरह
रात रात भीगते हुए बिताया है
पूर्व कि बरसातों ने भी
कम नहीं रुलाया है
नए उत्साह से लबरेज
ननकू झुमकी के साथ
मेले में पहुँच गया
पर वहां पुलिस का नया रंग देख
वह दंग रह गया
किसी तरह पचास कि एक पत्ती देने पर
मेले में जगह तो मिल गयी
थोड़ी देर में उसकी
दुकान सज गयी
चारो ओर भीड़ और तमाम तरह की
दुकाने सजावट झूले आदि देख
झुमकी मचल गयी
खुशी के मारे वह निहाल हो गयी
दुकान सजाकर नया फ्राक पहन कर
वह दुकान पर कुछ इस तरह बैठी
मानो वह जगह हो
उसके बाप की बपौती
दोपहर होने को आयी
ननकू की बोहनी तक नहीं भई
झुमकी चिल्ला चिल्ला कर
ग्राहक बुला रही थी
पर भीड़ सामनेवाले चाइनीज
खिलौने वाली दुकान पर ही जा रही थी
झुमकी थक थक कर बैठ जाती
सुस्ताकर फिर नए उत्साह से लग जाती
मेला देखना तो वह भूल ही गयी
दूर मोरनीवाली झूला
उसे चिढाती रही
किसी तरह शाम तक
कुछ सस्ते खिलौने ही बिक पाए थे
उदास ननकू की आँखों में
आंसू भर आये थे
रात होने पर ननकू
दुकान समेटने लगा
चिल्लाते चिल्लाते कोने में
सो चुकी झुमकी को घर
चलने के लिए जगाने लगा
सोच रहा था कि
कितने अरमानो से झुमकी को
झूला झुलाने लाया था
बुधिया के साथ उसे भी नए कपडे
दिलाने का वादा कर आया था
झूला तो दूर उसे मेला तक
नही दिखा पाया था
झुमकी ने तो खूब औकात भर
उसका साथ दिया था
पर उसने एक बार फिर
झुमकी को रुला दिया था
अपनी हाथगाड़ी में एक ओर
बचे खिलौने और दूसरी ओर झुमकी को
सुला ननकू घर लौट चला
आने वाले बरसात से
कैसे वह पुनः निपटेगा
रस्ते भर सोचता रहा
और तो और इस बार फिर
वह खपरैल छवाने से रहा
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011
अभागा


पापा पापा
आज दादा इतने उदास क्यों है
हमसे दूर दूर ही है
पास क्यों नहीं है
पापा ये आप किसके लिए
पैकिंग कर रहे है
क्या दादा के साथ
तीरथ करने जा रहे है
नहीं बेटा आज मेरे पापा
यानि तुम्हारे दादा का
वृद्धाश्रम में बड़े प्रयास और
सिफारिश के उपरांत
दाखिला हो गया है
कितने दिन से नम्बर लगाया था
आज हमारा भाग्योदय हो गया है
पर पापा दादा वहां
हम लोगो के बिना कैसे रहेंगे
इस उम्र में अब वो क्या पढेगे
और तो और अपने दमे की
बीमारी को कैसे सहेंगे
बेटा है नहीं वहां
पढ़ने का प्रावधान
बुड्ढों के रहने का है वहां
बहुत बढ़िया इंतजाम
खाने पिने के साथ दवा आदि की
व्यवस्था है आम
इनको वहां इनकी उम्र के
तमाम दोस्त मिल जायेगें
आपस में बैठ सब
अपने पुराने दिन गुन्गुनायेगे
आपस में सुख दुःख बाटेंगे
आनंद और आजादी से
इनके दिन कटेंगे
पापा तब तो ई
बड़ी अच्छी बात है
पर आसानी से दाखिला मिलने में
बड़ी मुश्किलात है
ऐसा करो पापा आप भी
अपना आवेदन वहां के लिए
अभी से कर दो
पता नहीं कल जगह न मिले तो
स्तब्ध शर्माजी बेटे चिंटू को
घूरती निगाहों से देख रहे थे
उनके आँखों से शोले बरस रहे थे
कोने में खड़े दादाजी
जो अभी तक मन ही मन में
मानस की चौपाई
सकल पदार्थ यही जग माहीं
करम हीन नर पावत नहीं
को दोहरा रहे थे
इस अकस्मात् बदलते
घटनाक्रम से मिली
आंशिक ख़ुशी से इतरा रहे थे
साथ ही अभी तक
इस आजादी की परिभाषा को
समझाने में अक्षम थे
संतोष से आह भरी यह देख की
अपनी जिम्मेदारी को
उनकी नई बेल कितनी तन्मयता से
पूरी करने में सक्षम है
विकास की सततशीलता पर
अपने अतीत से ये कितने आगे है
यह अलग बात है कि
सब कुछ रहते हुए भी
सच में हम कितने अभागे है
हमने जब अपने अतीत से खेला है
तो वो भी तो अपने अतीत से
निरन्तर खेल रहे है
विकास की प्रक्रिया
अवरुद्ध न हो
इस बात को सिद्ध कर रहे है
गुरुवार, 29 सितंबर 2011
वर्तमान पर अतीत की वरीयता

प्रकृति के तीव्र वर्षणका प्रकोप
अनवरत जारी था
बारिस की तीव्रता का
यह आलम था कि
नीचे बगीचे में आम पर
नीम के पेड़ों का
घर्षण भारी था
अभी तक युवा आम जो
कल शाम तक अपनी
तरुणाई पर इठला रहा था
पुरवैये के मस्त झोकों में
मस्ती से झूम रहा था
किसी अन्य को कुछ नहीं
समझ रहा था
आज मौन नतमस्तक होकर
मानो वयस्क नीम से
पनाह मांग रहा था
नीम के तीव्र घर्षण से जब
एक ओर वह ज्यादा ही
झुक जाता था
लगता कि अब गिरा तब गिरा
तभी नीम की दूसरी डालों का
पाकर सहारा वह
किसी तरह संभल जाता था
जैसे एक पिता अपने
रो रहे बच्चे को दुलारने का
प्रयास करता
हवा में उछल कर खुशी
जाहिर करता
उसे गिरने से पहले ही गोद में
ले बलैया खूब लेता
इसी बीच बच्चा कभी हँसता
कभी रोता
पर अंत में निश्चिन्त हो
पिता के कंधे से लग
आराम से सो जाता
कुछ ऐसा ही इन सजीवों
मगर बेजुबानों का खेल चल रहा था
छत पर बाने किचेन गार्डेन में
में पौधों के बीच विचारमग्न बैठा था
प्रकृति के इस अनुपम नैसर्गिक
खेल का आनंद ले रहा था
साथ ही प्रकृति अपने इन
उपादानों के माध्यम से
जो हमें सन्देश दे रही थी
उस पर मेरे अंतर्मन में
बहस चल रही थी
उड़ ले पंख लगा कर चाहे
कितनी भी आज की युवा पीढ़ी
अनुभव रत अतित से
खेल ले चाहे कितना भी
पूरी तन्मयता से शोध जारी है
शनिवार, 24 सितंबर 2011
ब्लागिंग का 'युवा-मन': अमित कुमार यादव
अमित कुमार यादव : 24 सितम्बर, 1986 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ.प्र.) के एक प्रतिष्ठित परिवार में श्री राम शिव मूर्ति यादव एवं श्रीमती बिमला यादव के सुपुत्र-रूप में जन्म। आरंभिक शिक्षा बाल विद्या मंदिर, तहबरपुर-आजमगढ़, आदर्श जूनियर हाई स्कूल, तहबरपुर-आजमगढ़, राष्ट्रीय इंटर कालेज, तहबरपुर-आजमगढ़ एवं तत्पश्चात इलाहाबाद वि.वि. से 2007में स्नातक और इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से 2010 में लोक प्रशासन में एम.ए.। फ़िलहाल अध्ययन के क्रम में इलाहाबाद और प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी।अध्ययन और लेखन अभिरुचियों में शामिल. सामाजिक-साहित्यिक-सामयिक विषयों पर लिखी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं पढने का शगल, फिर वह चाहे प्रिंटेड हो या अंतर्जाल पर। तमाम पत्र-पत्रिकाओं , पुस्तकों/संकलनों एवं वेब-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं और ब्लॉग पर रचनाएँ प्रकाशित। वर्ष 2005 में 'आउटलुक साप्ताहिक पाठक मंच' का इलाहाबाद में गठन और इसकी गतिविधियों के माध्यम से सक्रिय। जुलाई-2006 में प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका 'आउटलुक' द्वारा एक प्रतियोगिता में पुरस्कृत, जो कि शैक्षणिक गतिविधियों से परे जीवन का प्रथम पुरस्कार। ब्लागिंग में भी सक्रियता और सामुदायिक ब्लॉग "युवा-मन" (http://yuva-jagat.blogspot.com) के माडरेटर। 21 दिसंबर 2008 को आरंभ इस ब्लॉग पर 250 के करीब पोस्ट प्रकाशित और 110 से ज्यादा फालोवर।
ई-मेलः amitky86@rediffmail.com
ब्लॉग : http://yuva-jagat.blogspot.com/ (युवा-मन)
(चित्र में : हिंदी भवन, दिल्ली में 'हिंदी साहित्य निकेतन', परिकल्पना डाट काम, और नुक्कड़ डाट काम द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मलेन में श्रेष्ठ नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) की तरफ से उत्तरांचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक', वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामदरश मिश्र, डा. अशोक चक्रधर इत्यादि द्वारा सम्मान ग्रहण करते अमित कुमार यादव)प्रस्तुति : रत्नेश कुमार मौर्य : 'शब्द-साहित्य'
गुरुवार, 22 सितंबर 2011
सम्मान

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में विगत दिनों हिंदी पखवारा बड़े ही हर्रोल्लास से मनाया गया उक्त अवसर पर डा रमेश कुमार निर्मेश को उनके हिंदी के प्रति उल्लेखनीय योगदान के लिए आधुनिक कविता के ध्वजवाहक श्री ज्ञानेन्द्रपति जी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रोफेसर लालजी सिंह जी द्वारा संयुक्त रूप से प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया
शनिवार, 17 सितंबर 2011
भगवन के ही बनाये इन जिन्दा बुतों में ..........

दादा टिकट
टिकट
रामदीन ने हाँ बाबु कहते हुए
कमर की धोती में खोसें
टिकट को निकला
जिसे देखते ही टीटी महोदय
का चढ़ गया पारा
चालू टिकट ले कर
शयनयान में सफ़र करते हो
शर्म नहीं आती तुम लोगों को
अरे कम से कम
भगवन से क्यों नहीं डरते हो
मै सामने वाली सीट पर
खिड़की के पास बैठा
अभी तक तेजी से भागते
बियाबान जंगल को देख रहा था
इस खटपट से तन्द्रा भंग हो उ
नकी तरफ मुखातिब हो गया था
रामदीन और उसकी कृशकाय वृद्धा पत्नी
दोनों हाथ जोड़े खड़े हो गए थे
टीटी से विनम्रता से विनती कर रहे थे
भैया तबियत ठीक ना रहा
केमै बैठा जावे हमन के
ठीक से पता ना रहा
हम जनित कि टिकट लई के
बस के माफिक पूरा गाड़ी में
कहियों बैठ सकित है
बाबू तनी दया करी के हमे बतईत
त अगला टेशन पर उतर हम
ओम बैठ जाईत
चुप बुढ़िया
बहुत नौटंकी आवत है
हमका बेवकूफ बनावत है
नव सौ रुपया पहिले
जुरमाना का निकालो
नहीं तो चलो जेल काटो
रामदीन गिरगिदा पड़ा
बाबू जब से हमरा बेटवा समुआ
दिल्ली बम कांड में गुजर गवा
एक साथ इतना पैसा देखे
न जाने कितना दिन गुजर गवा
अब कौउनो सहारा नहिनी
यहि वदे हम बिटिया के यहाँ जात रहा
हमका माफ़ कर देईब
अगला टेशन पर हम
जरूर उतर लेईब
बुढहू ढँर चालक बने का
कोशिश जिन करो
चलो अच्छा जो कुछ है
उसी को निकालो
कोई रास्ता न देख रामदीन ने
धोती के दूसरे कोने से
कुछ मुड़े हुए नोटों को निकाला
जिसे टीटी ने लपक कर
अपने जेब में डाला
शीघ्रता से आगे बढ़ गया
मन मेरा विचलित हो गया
इधर रामदीन अपने गंदे अंगोछे से
अपने आंसुओं को पोछने लगा
आगे सफ़र कैसे कटेगा
अपनी पत्नी से कह सिहर गया
सारे घटनाक्रम ने
एकबार पुनः मुझको हिला दिया
मेरी संवेदनशीलता ने मुझे
भीतर तक झकझोर कर रख दिया
तभी मैंने एक फैसला किया
डिब्बे में बैठे यात्रियों से चंदा लेकर
कुछ रूपये इकठ्ठा कर
उस वृद्धा दंपत्ति को
भेट कर दिया
अश्रुपूरित नेत्रों से
रुपये लेते समय रामदीन कृतज्ञता से
विह्वल हो गया
अचानक से बोल पड़ा
बाबू ये आज के इंसानों को
क्या हो गया है
भगवन के ही बनाये
इन जिन्दा बुतों में
कैसे और क्यों इतना अंतर
हो गया है
गुरुवार, 15 सितंबर 2011
अंडमान में कृष्ण कुमार यादव ने किया हिंदी-पखवाडा का शुभारम्भ
निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने अपने उद्बोधन में बदलते परिवेश में हिन्दी की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और कहा कि- भूमण्डलीकरण के दौर में दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र, सर्वाधिक जनसंख्या वाले राष्ट्र और सबसे बडे़ उपभोक्ता बाजार की भाषा हिन्दी को नजर अंदाज करना अब सम्भव नहीं रहा। आज की हिन्दी ने बदलती परिस्थितियों में अपने को काफी परिवर्तित किया है। विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर तमाम विषयों पर हिन्दी की किताबें अब उपलब्ध हैं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रचलन बढ़ा है, इण्टरनेट पर हिन्दी की बेबसाइटों और ब्लॉग में बढ़ोत्तरी हो रही है, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई कम्पनियों ने हिन्दी भाषा में परियोजनाएं आरम्भ की हैं। निश्चिततः इससे हिन्दी भाषा को एक नवीन प्रतिष्ठा मिली है। मनोरंजन और समाचार उद्योग पर हिन्दी की मजबूत पकड़ ने इस भाषा में सम्प्रेषणीयता की नई शक्ति पैदा की है पर वक्त के साथ हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में विकसित करने हेतु हमें भाषाई शुद्धता और कठोर व्याकरणिक अनुशासन का मोह छोड़ते हुए उसका नया विशिष्ट स्वरूप विकसित करना होगा अन्यथा यह भी संस्कृत की तरह विशिष्ट वर्ग तक ही सिमट जाएगी। श्री यादव ने जोर देकर कहा कि साहित्य का सम्बन्ध सदैव संस्कृति से रहा है और हिन्दी भारतीय संस्कृति की अस्मिता की पहचान है। निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषन को मूल......आज वाकई इस बात को अपनाने की जरूरत है।
(पोर्टब्लेयर से ए. के़. प्रशान्त, सहायक डाक अधीक्षक की रिपोर्ट)
प्रस्तुति : रत्नेश कुमार मौर्य
गुरुवार, 8 सितंबर 2011
शहीदों को पैदा करने का ठेका


मम्मी देखों
क्या गजब हो गया
गुड्डू का सेकेण्ड लेफ्टिनेंट में
चयन हो गया
उसे परसों जाना है
घर में प्रवेश करते हुए आशु ने कहा
चलो अच्छा हुआ
बेचारा बहुत दिनों से रोजगार के लिए
प्रयासरत और परेशान था
देश की सेवा करने का पुण्य फल
अंततः उसे प्राप्त हो गया
निरापद यदि सीमा की रक्षा करते हुए
शहीद भी हो गया
तो इतिहास में अमर हो जायेगा
अमर जवान ज्योति का
हिस्सा बन जायेगा
साथ ही कुल कुल खानदानका नाम भी
रोशन कर जायेगा
सम्प्रति आज देश को आवश्यकता है
जहाँ अन्ना जैसे कर्तव्यपरायण
निःस्वार्थ एकनिष्ठ
सामाजिक कार्यकर्ता की
वही आवश्यकता है
ऐसे ही वीर कर्तव्यनिष्ठा
साहसी युवावों की
जो अपनी वीरता से अपना नाम
स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगें
मरने के उपरांत भी पूरे सम्मान से
याद किये जायेगें
चलो जल्दी से फ्रेश हो लो
चलके उसे और उसके परिवार को
उसकी इस सफलता पर
बधाई तो दे दे
अपने आप को संभालते हुए
आशु ने पुनः कहा
माँ मेरा भी उसके साथ ही
चयन हो गया है
मुझे भी परसों उसके साथ जाना है
क्या कहा गरजते हुए माँ ने कहा
एकाएक पूरा परिदृश्य बदल जाता है
माहौल ग़मगीन और
एकपक्षीय हो जाता है
तो तुम सेना में जाओगे
तुम्हे कोई और काम नहीं मिला है
तेरा दिमाग ख़राब हो गया है
क्या इसी दिन के लिए तुम्हे
पैदा किया था
पाल पोस कर इतना बड़ा किया था
कि जब हमें सहारा देने का
वक़्त आएगा
तो तुम हमें इतनी
निष्ठुरता से भूल जायेगा
अरे इश्वर न करे कही तुम
सीमा पर शहीद हो गए
तो हम तो कहीं के न राह जायेगें
जीते जी मर जायेंगे
केवल तेरी यादों के सहारे
जिन्दगी कैसे काटेंगे
अरे कुछ तो सोचा होता
अपने इस माँ बाप का
ध्यान तो किया होता
जिनके तुम एकमात्र सहारे हो
फिर हमसे करते क्यों किनारे हो
पर माँ अभी तो तुम
गुड्डू के चयन पर इतनी
प्रसन्नता व्यक्त कर रही हो
तो मेरे चयन पर इतना
अवसादित क्यों हो रही हो
वह भी तो अपनी माँ क
एकमात्र संतान है
जबकि मेरी तो अभी एक
बहन भी विराजमान है
उसके शहादत पर यदि उसके
कुल खानदान का गौरव बढेगा
तो मेरी शहादत से मेरे खानदान का
गौरव क्यों घटेगा
चुप रहों ज्यादा बढ़ बढ़ कर
बातें मत किया करों
अपने बड़ो से जबान
मत लड़ाया करो
आज तक जो तुम्हे नीति धर्म
दर्शन ज्ञान और विज्ञानं की
जो शिक्षा दी गयी है
उसके मर्यादा भंग मत करों
अपनी मर्यादा में रहना सीखों
तुम्हे लेकर अपने भविष्य के
कितने सपने हमने बुन रखा है
ये सब बेकर की बातें
क्या शहीदों को पैदा करने का
हमने ही ठेका ले रखा है
चलो जल्दी से तैयार हो जाओ
चलकर उसे बधाई दे आयें
साथ ही तुम्हारे न जाने का
तर्कसंगत कारण उसे बता आयें
आशु बेमन से तैयार होने लगा
वह निर्मेश की उस पक्ति को
गुनगुनाने लगा
हाथ अपना कटे तो अहसास होता है
दुसरे का कटा हाथ तो बस
एक समाचार होता है
ऐसी स्वार्थयुक्त सोचों से
संकीर्णता का दीवाल खड़ा होता है
मरते तो बहुत लोग
नित्य दुर्घटनाओं में भी
फिर देश की सीमा का नाम ही
क्यों बदनाम होता है
शनिवार, 3 सितंबर 2011
अहसानों का कर्ज
प्रबल बेग से
वरुण देव बरस रहे थे
सावन से भादों दुब्बर नहीं है को
सिद्ध कर रहे थे
लग रहा था कि आज
पूरे बनारस को डुबो कर
ही दम लेगे
खेतों की निगरानी कर
में सीवान से लौट रहा था
वर्षा का आनंद लेते हुए एक
पारंपरिक बनारसी कजरी की
धुन गा रहा था कि
मिर्जापुर कईला गुलजार
कचौड़ी गल्ली सून कईला बलमू
दूर दूर तक कोई भी पशु पक्षी
दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था
सहसा खेत के मेड़ के किनारे
मेरा निगाह गया था
एक कबूतर अपने पंखों को फैलाये
लगा जैसे मरणासन्न पड़ा था
घायल समझ कर मैंने
उसे हाथ लगाया
मेरी सहायता लेने के बजाय
वह और घबराया
मैंने प्रयास कर जब उसे उठाया
उसके पंखों के नीचे
उसके दो बच्चों को पाया
अवाक् रह गया मै
हृदय दग्ध हो हाहाकार कर उठा
एक बेजुबान मां की विशाल ममता देख
मेरा कलेजा भर गया
उसके प्रतिरोध के बावजूद भी
किसी तरह उनको अपने गमछे में लपेट
मै घर लौट आया
दालान में मचान के ऊपर एक
कृत्रिम घोसला बना कर
उस पर मैंने उन्हें ठहराया
दिन बीतते गए
बच्चे शिशु से क्रमशः युवा होने लगे
पर मेरे प्रयास के उपरांत भी
मेरा आवास छोड़ने को वे सब
किसी कीमत पर तैयार नहीं थे
मैंने भी उनसे समझौता कर लिया
उनसे एक अंजना रिश्ता बना लिया
जब भी मै भोजन करता
निडर मेरे पास वो चले आते
मेरे भोजन से वे निःसंकोच
अपन हिस्सा पाते
भादों की स्याह रात
मै दालान में चारपाई पर लेटा था
विविध भारती के गानों को
अपने रेडियो पर सुनते हुए सो गया था
एकाएक उन कबूतरों की आवाज से
नीद मेरा भंग हो गया
बैठ कर सिरहाने देखा
दंग रह गया
एक सर्प मेरे तकिये के पास
करीब पहुँच ही गया था
निकट पास में ही लाश
मादा कबूतर का पड़ा था
चीत्कार कर उठा मन मेरा
मौत को इतने करीब देख
झंकृत हो गया तन
सारा खेल देख
तभी निकट उपलों के ढेर में
वह सर्प ओझल हो गया था
बेशक उस माँ कबूतर ने
मेरे प्राणों की रक्षा के लिए
अपने प्राणों को सहर्ष न्योछावर कर दिया था
मेरे उपकारों का पूर्ण समर्पण से
बदला चुका दिया था
अपने को इस सृष्टि की श्रेष्ठतम
योनिओं से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया था
बेशक उसे पूर्ण विश्वास के साथ
गुमान होगा इस बात का
अपने बच्चों की सम्पूर्ण सुरक्षा
और उनके सुरक्षित भविष्य का
निसंदेह वह अपने परिवार को
मेरे सानिध्य में अत्यधिक ही सुरक्षित
पा रहा था
पर उसके बलिदान ने मुझे
बुरी तरह मंथित कर
अन्दर तक हिला दिया था
उसका इस तरह मेरे अहसानों का
कर्ज चुकाना मुझे भीतर तक
साल रहा था


