गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
बचपन का जमाना
खुशियों का खजाना होता था,
चाहत चाँद को पाने की
दिल तितली का दीवाना होता था,
खबर न थी कुछ सुबह की
न शामों का ठिकाना होता था,
थक-हार के आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना होता था,
दादी की कहानी होती थीं
परियों का फसाना होता था,
बारिश में कागज की कसती थी
हर मौसम सुहाना होता था,
हर खेल में साथी होते थे
हर रिश्ता निभाना होता था,
पापा की वो डांटें गलती पर
माँ का मनाना होता था,
कैरियर की टेंशन न होती थी
ना ऑफिस को जाना होता था,
रोने की वजह ना होती थी
ना हंसने का बहाना होता था,
अब नहीं रही वो जिन्दगी
जैसा बचपन का जमाना होता था
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
मानों विराट क्षितिज को दे दिया हो जैसे एक छोटा सा बसेरा
माँ को मै गाँव से शहर लाया
सोचा माँ के ममता की
बनी रहेगी मुझ पर छाया
काफी दिनों से दूर था
मुझसे मेरी माँ का साया
चूंकि बापू की बीमारी और
गाँव को न छोड़ने की चाहत ने
मुझे कई बार सिद्दत से तडपाया
टीस हमेशा थी की अपनी
इच्छानुसार मै उनकी
सेवा कर नहीं पाया
एक पिता की चाहत होती है
उम्र के इस मुकाम पर
हरदम रहे पुत्रो का साथ
जीवन की इस राह पर
पर रोजी रोटी के ठौर ने
इस जैविक चाह को
जी भर कर रुलाया
बापू को न चाहते हुए भी
मैंने है बहुत तरसाया
किसी तरह माँ को दे दिलासा
अपने साथ लाया
बेशक माँ तो गाँव छोड़ने को
नहीं थी तैयार
बापू के यादों से भरा था घर द्वार
पर अंत में यह समझ कर की
वह हो गयी है अब बेकार
पहले तो बापू की सेवा में
दिनरात गुजर जाता था
रात को भरपूर नीद आता था
पर कैसे कटेगे यहाँ दिन और रात
काटने को दौडेगे खेत
खलियान और बाग़
यह सोच कहीं बबुआ
चला चली अब तोहरे ही साथ
हमरे ऊपर ज रही तोहार हाथ
तो हमारो नैया हो जाई पार
स्टेशन से जी भर गाँव को देखा
पुनः माँ के माथे पर देख
चिंता की रेखा
मैंने कहा माँ कहे तू होए रहू उदास
ऐजेहा फिर आवा जायेगा
बापू का याद तजा किया जावेगा
ऐसा कह मै उन्हें हँसाने का
करने लगा एक असफल प्रयास
पर कभी विशाल खेत खलियान
और बखरी होते थे जिनके गवाह
शहर की संकीर्ण जिंदगी में
रुक गया उनके जीवन का प्रवाह
किसी के पास उनके करीब
बैठने के लिए समय नहीं
अकेले बालकनी में बैठी
रहती थी आपही
बस देखती सूरज को होते अस्त
पत्नी गृहकार्य और बच्चो के
होम्वोर्क में व्यस्त
शेष समय दूसरों से गप्पें
मारने में मस्त
बच्चे आधुनिक पदाई से पस्त
में भी हो चला था क्रमशः
अपराधबोध से ग्रस्त
शायद माँ सबके लिए बोझ बन गयी थी
लग रहा था किसी तरह
जिंदगी की गाड़ी को खीच रही थी
ऊपर से अपनी प्रेयसी के बार बार
माँ के आने से अन्पैठ
लगने की बात
पहुचाते बहुत ही ह्रदय पर आघात
में बेबस हो चला था लाचार
में चाह कर भी नहीं छेदता
अपने साले साली और सास
के आने की बात
जिनके आने पर घर में छा जाती थी
रौनक और खुशियों की बरसात
बच्चे भी उड़ाते बात बात में
माँ का उपहास
सबके मध्य मेरे समायोजन का प्रयास
माँ का देख चेहरा उदास
जी किया माँ को ले गाँव ही लौट जाऊ
छोड़ कर नौकरी घर वही बसौऊ
तभी दिखता मुझे
एक तरफ अतीत तो
दूसरी तरफ भविष्य करता परिहास
कार्यालय से आने पर
में माँ की गोद में रख सर
अपने बचपन की यादे ताजा करते हुए
माँ के साथ अपनी भी
पूरी करता इछ्छा
वह भी हर शाम बेसब्री से करती
मेरे कार्यालय से लौटने की प्रतीक्षा
सोचता हूँ कैसी
अभागी है आज की पीढ़ी
चढ़ाना चाहती है ऊपर
निचे गिरा कर सीढ़ी
ये जानेगे क्या माँ के आँचल
और गोद की ममता
सच तो यह है की जिन्सवाली माँ पर
आँचल कहाँ है फबता
आज का युवा तो बस
नौकरों के हाथ ही पलता
बरबस में सोचता की में
माँ को कौन सा सुख दे रहा हूँ
अपने स्वार्थ के लिए उन्हें
खेत खलिहानों से दूर कर
उसे दुःख ही तो दे रहा हूँ
जैसे एक स्वतंत्र गौरैया को
पिजड़े में डौल कर रख दिया
उसके पास चावल का कसोरा
मानों विराट क्षितिज को दे दिया हो
जैसे छोटा सा एक बसेरा
निर्मेश सच जहाँ हो अपने चाहनेवाले
वही होता है परिवार
खून के रिश्ते तो अब
लगने लगे है बेकार
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
बुधिया
आपाधापी से पस्त
फिर भी मस्त
बड़े ही अनुनय से एक
विवाह समारोह का बना मै गवाह
जहा जारी था अपने चरम पर
बारात का प्रवाह
युवाओ के मध्य तलाशता रहा मै
किंचित एक बूढ़ा
पर हमें ढूढ़ने से भी नहीं मिला
मै भूल गया की
ये है बीसवी कम इक्कीसवी सदी ज्यादा
आजका बुजुर्ग तो स्वयं
ऐसे अवसरों से दूर रह
बचाता है अपनी मर्यादा
तभी दिखा भीड़ मे उम्मीद का एक दिया
जिज्ञासवास पूछने पर
नाम बताया बुधिया
सर पर रखे प्रकाशपुंज का कलश
देखने मे लगता था एकदम
लचर और बेबस
अन्य मजदूरो के साथ प्रयासरत
मिलाता कदम से कदम
उर्जहीन बदन दिखता था बेदम
क्षुदा और उम्र से बेबस
व्यग्र दिखता लुटाने को सरवस
तभी आज मेरे यार की शादी की बजी धून
मदिरारत युवा नाचते
नाचते हो गए संग्यशुन्य
एक जाकर बुधिया से टकराया
पलट कर बुधिया को
एक घूसा भी जमाया
साले कायदे से नहीं चलते
हमें देख कर तुम भी मचलते
बुधिया गिर पड़ा
पर अपने रोशनी के गमले
पर पिल पड़ा
सोचा अगर ये टूट गया तो
मालिक कम से निकाल देगा
आज की मजदूरी भी कट लेगा
तो कल वो अपनी बीमार
लछिया की दवा और खाना
कहा से लायेगा
यह सोच उसे टूटने से
न केवल बचाया
वरन मुस्तैदी से उसे पुनः
अपने सर पर सजाया
इसी बीच वह युवक अन्य से
लड़ने मे हो गया तल्लीन
मेरा अच्छा खासा मन
हो गया मलीन
गृह स्वामी सबसे कहता
रहा भाई भाई
किसी को भी उस पर दया नहींआयी
उस युवक पर कई लोग पिल पड़े
पड़ने लगी उस पर जुटे चप्पले
तभी बुधिया अपना प्रकाश कलस
रख किनारे उस युवक के करीब आया
उसके ऊपर लेट कर
उसे मार से बचाया
लोगो से बोला पहले ही
कितनी देर हो गयी है
आपलोगों को क्या पड़ी है
यहाँ गृहस्वामी की मर्यादा
दाव पर लगी है कहकर लोगो को समझाया
बारात को आगे बढाया
मैंने पूछा चाचा ये कैसे हो गया
जिसने मारा आपको वही
आपका प्रिय हो गया
बुधिया बोला बेटा उसमे मुझे
आज से बीस वर्ष पहले
खो चुके बेटे की छबि पाया
किनारे खड़ा वह युवक शायद
पश्चाताप के आंसू बहा रहा
लहूलुहान हुए अपने किये की
सजा पा रहा
बुधिया स्नेह से उसे सहला रहा
रविवार, 17 अक्टूबर 2010
मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010
मीठी वाणी से पाला
पुरे दिन की माथापच्ची से त्रस्त
कार्य की अधिकता से पस्त
दूर होते ही सूरज की छाया
मैं घर को लौट आया
की तभी एकाएक मेरा
मोबाइल घनघनाया
थके हाथो से मैंने मोबाइल को
कान पर लगाया
उधर से बहूत ही शांत धीर
व एक मधुर स्वर को पाया
लगा कानो में किसी ने
शहद घोल दिया हो
मिश्री से पूरे
बदन को तौल दिया हो
पूरे दिन के थकन से
मनो निजात मिल गयी हो
न चाहते हुए भी मानो
कोई सौगात मिल गयी हो
वस्तुतः
वह एक इन्वेस्टमेंट कम्पनी
की मुलाजिम थी
एक पौलिसी के लिए
पीछे पड़ी थी
मैंने पैसे के अभाव का देकर वास्ता
बंद करना ही चाहा था उसका रास्ता
तभी उसने कहा सर
प्लीज़ मेरी बात पहले सुन ले
फिर आपको जो लगे
गुण ले
मुझे उसकी आवाज की मधुरता ने
पुनः उसमे छिपी व्यथा ने
पूरी पवित्रता से
तरंगित कर डाला
एक अवांछित अनिच्छा से ही सही
उससे पर गया पला
बातें करते करते मुझे
हलकी नीद ने आगोश में ले लिया
तभी मेरी भार्या ने मुझे हिलाया
लिए हाथ में गरम चाय का प्याला
तब तलक उसकी बातें थी jaree
मुझे लगा की किस्मत की है वो मरी
लगता है टार्गेट की है लाचारी
करती भी क्या बेचारी
में थोडा द्रवित हुआ
फोन कटते हुए कहा की
अच्छा कल बिचार करेंगे
उसने तुरंत ही कहा सर
हम आपके फोन का सकारात्मक
पहल के साथ इंतजार करेंगे
चाय पीकर में सोचने लगा
मीठी वाणी का प्रभाव
लगता था की सारी थकन का
हो गया आभाव
आया रहीम की वो पंक्ति
जिसमे थी ये उक्ति
मीठी वाणी बोलिए मन का आप खोय
औरन को सीतल करे आपहु सीतल होय
यह सोचते सोचते
मैंने उनसे कल मिलाने को
अपनी डायरी में सकारात्मक
तिप्परियों के साथ नोट कर डाला
बेशक मेरा भी पद गया था
मीठी वाणी से पाला
में लगा सोचने
की अगर इतनी ताकत है मीठी वाणी में
की कुछ ही मिनटों में
कर ले दुनिया मुठ्ठी में
तो फिर हम अपनी सर्दारीयत के लिए
कटु वचनों व कटु युद्धरत कर्मो का
लेते है क्यों सहारा
देकर दुहाई धर्मो का
शनिवार, 9 अक्टूबर 2010
जीवन सजीव !
नित टूट रहे संयुक्त परिवार
लगने लगे है बेमानी
पैत्रिक घर द्वार
मायने खोते जा रहे सिवान
बीमार हो रहे बखरी
और खलिहान
पप्पू तो उड़ चले अमेरिका
बबलू भी चले ब्रिटेन
अम्मा और बाबु को पूछता है कौन
बेबस वो चल पड़े गाँव की ओर
ले दादी की चटाई और दद्दा का लालटेन
ज्यादा चाहने की लालच मेंहै कुछ टूट रहा
मानवीय संवेदनाओ से साथ
पीछे छूट रहा
लुप्त हो रही क्रमशः रिस्तो की मिठास
वो गाँव के चौपालों के rasile अहसास
सहानुभूति परोपकार प्यार व मस्ती
अपनापन कही गूम हो गया
पश्चिम का प्रभाव हमारे समाज पर है
इस कदर हावी हो गया
की दम तोड़ते ओ गढ़ते नित
रिश्तो की नयी परिभाषा
जिनके बचने की दिखती
अब नहीं कोई आशा
संस्कारयुक्त शिछा के अभाव में
ये युवा नैतिक लछ्य से भटक जाते
अपने जनको को छोड़
देसी बिदेशी मेमो के साथ उड़ जाते
ऐश और भोग को जीवन का आदर्श बनाते
मनो अपने माँ बाप से
अपने खो चुके बचपन का बदला चुकाते
जिन्होंने बाजारवाद का दे वास्ता
छीन कर उनका बचपन
उनको दिखाया विकास का रास्ता
अपनी वन्छ्नाओ को उन पर लद्दा
सिखाया उनको कमाना ज्यादा
अस्तु अब हमारे दोनों ही
hatho में है जल भरा
कब तलक वो संभलेगा भला
आज हमें भी इस दिशा में सोचना होगा
नए सिरे से पुनः मंथन करना होगा
ऐसी स्थिति के लिए
हम भी कम नहीं जिम्मेदार
अपने बच्चे में पलते सपने हज़ार
और उन्हें किसी भी कीमत पर
पूरा करना चाहते है
बदले में उनके बचपन का बलिदान मागते hai
आज विज्ञानं भी इस बात को मानता
की प्रकृति किसी के साथ अन्याय नहीं करती
सबके अन्दर वो कोई एकगुण विशेष भारती
उन गुणों को विकसित करने के jagah
हम उन पर चलते है अपनी
जिसके बदले में वो हमें देते है सजा
बदल देते है एक सुसंगठित समाज की फिजा
अतःशिछा ही नहीं संस्कार भी
चाहियेविकास की इस अंधी दौड़में
नैतिक मूल्यों की पतवार चाहिए
निर्मेश तभी रख पायेगे हम
एक मजबूत समाज की नीव
बेशक वो भी जी पायेगे
हमारे साथ जीवन सजीव !
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
पूस का पाला
अभी कल की बात
मै था अस्सी घाट पर
मित्रो के साथ
पता चला बी एच यूं अ इ टी के
तिन छात्र डूब गए
हम सकते मै आ गए
पुरे घाट पर छात्रो और
अध्यापको की भीड़ भारी
किनारे पर बैठी उनके माएं बिचारी
रुदन से उनके वातावरण
गमगीन हो गया सारा
स्तब्ध गंगा को अपलक निहारता
पिता किस्मत का मारा
क्या क्या उम्मीदे थी उसे
की किस तरह बनेगे वे नौनिहाल
उनके बुदापे की लाठी ये लाल
पर बीच मै ही सफ़र जिंदगी का
छोड़ कर चले गए
न जाने किसके सहारे वे अपने
बूड़े माँ बाप को छोड़ गए
मन मेरा उद्वेलित हो गया
एकाएक आक्रोस से भर गया
की आखिर क्या समझते है
ये बच्चे अपने आपको
क्यों समझते नहीं
वो इस पापको
की क्या उनके माँ बाप ने
इसी दिन के लिए उन्हें पाला था
क्या अपने खाने का निवाला
इसीलिए पहले उन्ही के मुह में डाला था
तनिक भी अगर सोचे होते
बेजा मौज मस्ती से बचे होते
जिसे की होस्टल को चलते समय
बापू ने कम पर माँ ने बहुत
ज्यादा समझाया होगा
कितने अरमानो से आचार और मुरब्बे का
डब्बा थमाया होगा
और कितनी बलिया लेकर कहा होगा
बचवा जातां से रहियो
अपन ख्याल रखियो
मौज मस्ती के चक्कर मै
जीतेजी उनको मार डाला
इसके बूते वो सहेगे
अब पूस का पाला
क्या खूब ख्याल रखा उनका इन्होने
पाला था बारे अरमानो से उन्हें जिन्होंने
बुधवार, 29 सितंबर 2010
विचलित है मन
अपने विराट स्वरुप का दर्शन
विचलित है मन
आसन्न एक परिवर्तन
गीता का भाष्य
पठनीय पाठ्य
पूरित परिपथ
निश्चित दर्शनीय
एक और अग्निपथ
पिटती परंपराओं की लकीरें
क्या खोल पायेगी
उन शहीदों की तकदीरें
जिन्होंने सहर्ष
किया था जीवन अर्पण
उनकी विधवाएं मांजती
आज इन नेताओं के घर बर्तन
बच्चे जिनके चाटते
इनके आज जूठन
सरकारी अनुदानों हेतु
लगाते चक्कर
खाते टक्कर पे टक्कर
भूखे भेड़ियों का बन गयी शिकार
अस्मत हो गई तार -तार
बिक गए घर-द्वार
आज भी जोहती निराला की वह तोड़ती पत्थर
अपना पालनहार !!
मंगलवार, 28 सितंबर 2010
हिंदी दिवस
एक और उत्सव
पूछता पुनः एक बार अपना भावार्थ
विस्मृत युगबोध का यथार्थ
कल्पित
स्तित्वाहिनता का आभास
निरंतर प्रसरित पावन प्रकाश
लक्षित
एक पुनर्जागरण
याकि करना वैराग्य का वरण
जागृत
चेतना की शिखार्यात्रा
यदि हो विवेक की लाघुमात्र
अलाम्बित एक नूतन प्रभात
विलंबित
राग्यमिनी से गुजित
धवल आकाश
होगी रंगीन पुनः
सुरमई शाम
चमकेगा छितिज पर
आर्यावर्त का क्या नाम
याकि छिरेगी
एक और बहस
es यथार्थ पर
सत्य से दूर
मद से चूर
प्रारंभ होगी
एक और नई
यात्रा अंतहीन
pidit दिन और मलिन
सोमवार, 27 सितंबर 2010
आज भी धन्नी नहीं बिक सका
सुबह से शाम हो गयी
दिन तक़रीबन ढल गयी
पर आज भी धन्नी नहीं बिका
एक भी पैसा नहीं वो कमा सका
सामने मुनिया का
बुखार से तपता चेहरा हूम रहा था
जिससे सुबह hi उसने कहा था
आज वो जरुर दावा लेकर आयेगा
और पपू की फ़ीस भी दे पायेगा
ताकि वो पढ़ कर बड़ा आदमी बनेगा
हमरे दुखो को वो हारेगा
सोचते सोचते उसकी अखे भर आई
wah रे किस्मत की माई
काम के तलश में साथ लायी
रोटिय भी सुख चुकी थी
शाम एकदम ढल चुकी थी
थका हरा वो चल pada घर की और
तन में तनिक भी नहीं था जोर
सूखे pero की माफिक वो
रस्ते से बेखबर चला जा रहा था
उधर से एक ट्रक तेजी से आ रहा था
उसने समाप्त कर दिया धन्नी का जीवन
उसके बच्चो को कर गया
अनाथ आजीवन
शनिवार, 25 सितंबर 2010
माँ की गोद
एक दिन माँ की गोद में
रख कर सर
मैं सो रहा था बाखबर
नीद के आगोश में
हो गया था तन
कल से ही था बेचन ये मन
माँ गुनगुना रही थी प्यारी लोरियां
मेरे सर पे घुमाती अपनी बहिया
एकाएक माँ के लोरियों में से
दर्द की आवाज आई
मैंने कहा क्या हुआ माई
उसने कहा कुछ नहीं बेटा
शायद किसी का है तोता
तभी मने देखा गोद दस निचे से
रक्त की धर
मई हो गया bajar
सोचा वह रे माँ
कैसी है तुम्हारी दुनिया
पर आज के बेटे क्या समझेगे
की क्या होती है पुरनिया
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
सृजनात्मक लेखन कार्यशाला हेतु ब्लॉगरों से प्रविष्टि आमंत्रित
संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-
प्रतिभागियों को 20 अक्टूबर, 2010 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा । पंजीयन फ़ार्म संलग्न है ।
प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।
प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 40 वर्ष से अधिक ना हो ।
प्रतिभागियों में 5 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।
प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।
प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।
कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।
प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं ।
प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था संस्थान द्वारा किया जायेगा ।
प्रतिभागियों को कार्यशाला में संदर्भ सामग्री दी जायेगी ।
प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।
प्रतिभागियों को 12 नवंबर, 2010 शाम 5 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल - बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा । पंजीकृत/चयनित प्रतिभागी लेखकों को कार्यशाला स्थल (होटल) की जानकारी, संपर्क सूत्र आदि की सम्यक जानकारी पंजीयन पश्चात दी जायेगी ।
प्रस्तावित/संभावित विषय एवं विशेषज्ञ लेखक
दिनाँक 13 नवंबर, 2010
रचना की दुनिया – दुनिया की रचना – श्री चंद्रकांत देवताले – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी – प्रभाकर श्रोत्रिय
रचना में यथार्थ और कल्पना – श्री राजेन्द्र यादव – नीलाभ – केदारनाथ सिंह
रचना और प्रजातंत्र – श्री अखिलेश – रघुवंशमणि – परमानंद श्रीवास्तव
रचना और भारतीयता – श्री नंदकिशोर आचार्य – श्री अरविंद त्रिपाठी – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
रचना : महिला, दलित और आदिवासी –– सुश्री अनामिका - कात्यायनी - मोहनदास नैमिशारण्य
रचना और मनुष्यता के नये संकट - श्री विनोद शाही- श्रीप्रकाश मिश्र – सीताकांत महापात्र
दिनाँक 14 नवंबर, 2010
रचना और संप्रेषण – श्री कृष्ण मोहन – ज्योतिष जोशी – मधुरेश
शब्द, समय और संवेदना – श्री नंद भारद्वाज - श्रीभगवान सिंह – ए.अरविंदाक्षन
कविता की अद्यतन यात्रा – श्री वीरेन्द्र डंगवाल – ओम भारती - अशोक बाजपेयी
कविता - छंद और लय – श्री दिनेश शुक्ल – राजेन्द्र गौतम – डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
कैसा गीत कैसे पाठक ? - श्री राजगोपाल सिंह – यश मालवीय – माहेश्वर तिवारी
कहानी-विषयवस्तु, भाषा, शिल्प – श्री शशांक – डॉ. परदेशीराम वर्मा – गोविन्द मिश्र
दिनाँक 15 नवंबर, 2010
कहानी की पहचान – सुश्री उर्मिला शिरीष - सूरज प्रकाश – सतीश जायसवाल
लघुकथा क्या ? लघुकथा क्या नहीं ? – श्री अशोक भाटिया – फ़ज़ल इमाम मल्लिक - बलराम
आलोचना क्यों, आलोचना कैसी? श्री शंभुनाथ – डॉ. रोहिताश्व - विजय बहादुर सिंह
ललित निबंध : कितना ललित-कितना निबंध – श्री नर्मदा प्रसाद उपा.-अष्टभुजा शुक्ल – डॉ.श्रीराम परिहार
(अंतिम नाम निर्धारण स्वीकृति/अस्वीकृति उपरांत)
संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664
बिलासपुर
श्री सुरेन्द्र वर्मा, मो.-94255-70751
श्री राजेश सोंथलिया, 9893048220
पंजीयन हेतु आवेदन पत्र फार्म नमूना
01. नाम -
02. जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03. शैक्षणिक योग्यता –
04. वर्तमान व्यवसाय -
05. प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06. प्रकाशित कृति का नाम –
07. ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08. अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09. पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता (ई-मेल सहित) –
हस्ताक्षर
(जयप्रकाश मानस द्वारा प्रेषित प्रेस-विज्ञप्ति)
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
हिंदी दिवस पर एक सन्देश...
रविवार, 12 सितंबर 2010
अंध विश्वाश और उसका प्रचार
एस. आर. भारती
शनिवार, 11 सितंबर 2010
नशे में डूबा युवा वर्ग...
भारतीय समाज हमेशा से ही पूरे विश्व के लिए एक आदर्श और कौतुहल रहा है !सयुइंक्त परिवार में रहने वाले बच्चे बहुत ही संस्कारशील होते है !इसी करण हमारे युवा काफी समय तक कुरीतियों से दूर रहे और अपने आप को नशे से बचाए रखा....परन्तु अब ऐसा नही रहा!सयुंक्त परिवार टूटने लगे है..बच्चे पढने और करियर बनाने बड़े शहरों में जाने लगे है !इन महानगरों में वे अपना सामजस्य नही बना सके,यहाँ की व्यस्त जीवन शैली ने उन्हें तोड़ के रख दिया!
ऐसे में वे विभिन्न प्रकार के नशों के जाल में उलझ कर रह गए !अनुभव की कमी और पहले के कड़े अनुशासन में रहे ये युवा अब अचानक आज़ाद हो गए!शहर की एकल जीवन शैली ने भी इन्हें बढ़ावा दिया जिसके चलते ये नशे की गिरफ्त में फंसते चले गए !अपने व्यस्त कार्यालय समय के बाद वे नशे को ही आराम समझने लगे !आज का युवा परम्परागत नशे नही करता...क्यूंकि शराब बीयर आदि की महक इनकी पोल खोल देती है,इसलिए इन्होने नए नशे तलाश लिए जो आसानी से उपलब्ध है और जिनके सेवन का किसी को पता भी नही चलता....जैसे-आयोडेक्स ,विक्स वेपोरब,व्हाइटनर,दीवारों के पेंट और कफ सिरप! ये नशे हर जगह और कम कीमत में मिल जाते है !इसके बाद नंबर आता है दुकानों पर मिलने वाली विभिन्न टेबलेट्स जो कई नामों से बेचीं जाती है !ये गोलियां बिना डाक्टर की पर्ची के सब जगह मिल जाती है !केमिस्ट भी कभी तनाव दूर करने तो कभी एकाग्रता बढ़ने के नाम पर इन्हें बेचते है !मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले अधिकांश बच्चे इन्हें इस्तेमाल करते है !
इन छोटे मोटे नशों को करते करते ये नशे की उस अंधी दुनिया में पहुँच जाते है जहाँ से वापिस आना नामुमकिन है !शहर वसे दूर फार्म हॉउस में होने वाली रेव और कोकटेल पार्टियाँ इनकी मनपसंद जगह बन जाती है !शौक शौक में शुरू हुआ ये खेल अब इनकी आदत बन जाता है !नशे का बढ़ता प्रभाव आखिर एक दिन जान लेकर छोड़ता है !
इन सब से बचने का एकमात्र रास्ता है बच्चों को शुरू से ही नशे के दुष्प्रभाव बताये जाएँ ,टी वी पर नशे से सम्बंधित दृश्य और विज्ञापन प्रतिबंधित किये जाएँ !लगभग सभी शराब कम्पनियां सोडे के नाम पर शराब बेचती है !स्कूलों और कालेज में नशों की जानकारी के बारे में शिक्षा दी जाए तथा जरूरत पड़ने पर नशा मुक्ति केंद्र की भी व्यवस्था हो.......वरना युवाओं को नशे से बचाना मुश्किल हो जायेगा.....!
सोमवार, 6 सितंबर 2010
संपादक की ओर से
सब जन कहत कागज की लेखी । हम हैँ कहत आँखिन की देखी - महान संत कवि कबीर दास का यह कथन हमारा आदर्श है ।इस साइट को प्रारम्भ करने का उद्देश्य साहित्य . संस्कृति . कला . विज्ञान और अन्यान्य विधाओं के साम्प्रतिक रूप से पाठकों को अवगत कराना ही नही अपितु उनकी साझेदारी भी सुनिश्चित कराना है ।इन्कलाब एक खुला मंच है . इसमे प्रत्येक विधा और क्षेत्र के रचनाधर्मियों एवं समीक्षकों के लेखकीय सहयोग का स्वागत है । यह हमारा . आपका , सबका मंच है - जो जहाँ . जैसा . जिस तरह है . प्रस्तुत करने के लिए . और अच्छा बनाने के लिए ।
ईश्वर कहाँ मिलेगा... (कविता : एस. आर. भारती)
मन्दिर, मस्जिद ,गुरूद्वारे एवं गिरजाघर में
"ईश्वर"को खोजते हुए,
मन्नतों के लिए दर-दर भटकते हुए
वे जानते हैं कि "ईश्वर" वहाँ नहीं मिलेगा
’फिर व्यर्थ क्यों खोजते हैं तुष्टि के लिए’
एक यक्ष प्रश्न ने सिर उठाया
फिर ”ईश्वर“ कहाँ मिलेगा ’
सोचते-सोचते चिन्तन आगोश में खो गया
अचानक अन्र्तमन के पट पर
चलचित्र की तरह कुछ पात्र उभरे
मन ने माना कि ये ही ”ईश्वर“ के रूप हैं
किसान ,माँ ,डाक्टर ,
गिरते को उठाने वाला ,
मरते को बचाने वाला ,
सबकी प्यास बुझाने वाला ,
सबकी भूख मिटाने वाला ,
भटके को राह दिखाने वाला ,
बिछडे़ को मिलवाने वाला ,
गुणगान योग्य है ऐसा गुणवान
यही सुपात्र की नजर में ”भगवान“ है ।
रविवार, 5 सितंबर 2010
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
गाँधी जी पर आधारित हिन्दी फिल्म का शुभारम्भ पोर्टब्लेयर में
निर्देशक नरेश चंद्र लाल ने बताया कि सेलुलर जेल के बाद महाराष्ट्र के वर्धा स्थित गाँधी आश्रम सेवा ग्राम में भी इस फिल्म की शूटिंग होगी और यह फिल्म दिसम्बर, 2010 में रिलीज होगी।
नरेश चन्द्र लाल, निदेशक - अंडमान पीपुल थिएटर एसोसिएशन, पोर्टब्लेयर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
बुधवार, 1 सितंबर 2010
अब टचस्क्रीन 3डी टीवी ...
मंगलवार, 24 अगस्त 2010
रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें

रक्षाबंधन पर्व बहन की, समाज की, राष्ट्र की रक्षा हेतु बंधन से जुड़ने का प्रतीक त्यौहार है. यह धार्मिक स्वाध्याय के प्रचार का, विद्या विस्तार का पर्व भी है इस दिन यज्ञोपवीत बदला जाता है और द्विजत्व को धारण किया जाता है, वेद मंत्रों से मंत्रित किया जाता है. नारी जाति पर कोई कष्ट न आए, इसके लिये संकल्पित होने, संस्कृति की शालीनता को बचाए रखने हेतु संकल्पबद्ध होने का भी यह अनूठा पर्व है. इस पर्व को इसकी मूल भावना के साथ मनाएं... !! रक्षाबंधन-पर्व की शुभकामनायें !!
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
सेलुलर जेल भी पहुँची क्वींस बैटन रिले
19 अगस्त 2010 को राष्ट्रमंडल खेलों की क्वींस बैटन रिले भारत के दक्षिणतम क्षोर अण्डमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में भी चेन्नई से पहुंची, जहाँ सवेरे 7.45 बजे पोर्टब्लेयर हवाई अड्डे पर बैटन रिले का भव्य स्वागत किया गया. रिले औपचारिक रूप से शाम को 3 बजे ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल परिसर से आरंभ हुई, जहाँ उपराज्यपाल (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) भूपेंद्र सिंह द्वारा इसका शुभारम्भ किया गया. सेलुलर जेल में बैटन का आगमन एक तरह से उन तमाम क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि भी थी, जिन्होंने इन्हीं चहारदीवारियों में रहकर आजाद भारत और उसकी तरक्की का सपना देखा था. अंडमान-निकोबार ओलम्पिक असोसिअशन के अध्यक्ष जी. भास्कर ने राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अतिरिक्त महानिदेशक (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) राज कड़ियान से क्वींस बैटन को प्राप्त कर इसे उपराज्यपाल को सौंपा और इसी के साथ विश्व-प्रसिद्ध ऐतिहासिक सेलुलर जेल और यहाँ एकत्र तमाम सैन्य व सिविल अधिकारी, खिलाडी और गणमान्य नागरिक इस पल के जीवंत गवाह बने. उपराज्यपाल ने प्रतीकात्मक रूप से कुछ देर दौड़ लगाकर इसे प्रथम धावक के रूप में मुख्य सचिव विवेक रे को सौंपा और फिर तो बढ़ते क़दमों के साथ कड़ियाँ जुडती ही गईं. वाकई इसे नजदीक से देखना एक सुखद अनुभव था. राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल से शुरू होकर क्वींस बैटन रिले पोर्टब्लेयर के विभिन्न प्रमुख भागों - घंटाघर, माडल स्कूल, बंगाली क्लब, गोलघर, दिलानिपुर, फिनिक्स बे, लाइट हाउस सिनेमा, गाँधी प्रतिमा, अबरदीन बाजार, घंटाघर से होते हुए ऐतिहासिक नेताजी स्टेडियम पहुँचकर सम्पन्न हुई, जहाँ सांसद श्री विष्णुपद राय ने क्वींस बैटन को प्राप्त कर सक्षम अधिकारियों को सौंपा. इस शानदार अवसर पर बैटन रिले को यादगार बनाने के लिए जहाँ प्रमुख स्थलों पर तोरण द्वार स्थापित किये गए, वहीँ पोर्टब्लेयर के डा0 बी. आर. अम्बेडकर सभागार में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया . यही नहीं अबर्दीन जेटी और रास द्वीपों के बीच जहाजों को रोशनियों से सजाया भी गया और पूरा पोर्टब्लेयर मानो रंगायमान हो उठा. रिले के दौरान भारी संख्या में स्कूली विद्यार्थी और नागरिक जन इसका स्वागत करते दिखे. रिले के दौरान द्वीपों के राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त खिलाड़ियों और अधिकारीयों के अलावा करीब 30 लोग बैटन धारक के रूप में इसे लेकर आगे बढ़ते रहे. पोर्टब्लेयर में क्वींस बैटन रिले का आगमन भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाता है, क्योंकि यहाँ देश के प्राय: सभी प्रान्तों के लोग बसे हुए हैं और इसका लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया. इसे नजदीक से देखना वाकई एक यादगार अनुभव रहा. क्वींस बैटन रिले के इस परिभ्रमण के साथ ही द्वीपवासियों और देशवासियों की शुभकामनायें भी इससे जुडती जा रही हैं और आशा की जानी चाहिए की 3 अक्तूबर, 2010 से दिल्ली में आरंभ होने वाले कामनवेल्थ गेम्स भी ऐतिहासिक होंगें और विश्व-पटल पर भारत को एक नई पहचान देंगें !!
मंगलवार, 10 अगस्त 2010
कृष्ण कुमार यादव जी को जन्मदिन पर हार्दिक बधाई
कृष्ण कुमार यादव सर को उनके जन्मदिन 10 अगस्त पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें. आप एक अच्छे प्रशासक और साहित्यकार के साथ-साथ अच्छे व्यक्ति भी हैं, आपका सान्निध्य हम सब को प्राप्त है. आपके सान्निध्य में हम लोगों को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ है. आपके जन्मदिन पर आपके सुखी, समृद्ध एवं यशस्वी जीवन की कामना करते हैं. 





